मंगलवार, 3 दिसंबर 2024

                                                              

समर की शायरी में परिपक्वता की झलक

                                     - अजीत शर्मा ‘आकाश’

 


                                    

‘मोहब्बत का समर’ शायर डॉ. इम्तियाज़ ‘समर’ की ग़ज़लों का संग्रह है। पुस्तक की ग़ज़लें पाठकों को प्रभावित करने में सक्षम है। कथ्य एवं शिल्प दोंनों की दृष्टि से शायरी में परिपक्वता झलकती है। शायरी के तमाम ख़ूबसूरत पहलू पाठकों के समक्ष उजागर होते हैं।   ग़ज़ल आज के दौर की अत्यन्त लोकप्रिय विधा है। दो मिसरों में पूरी बात समेट लेने का हुनर इसी विधा के पास है। हर शायर का अपना एक अलग अंदाज़ और रंग होता है, जिससे उसकी विशेष पहचान बनती है। अपने इस गज़ल-संग्रह के माध्यम से डॉ. इम्तियाज़ ‘समर’ संजीदा और ग़ज़ल-विधा की पर्याप्त जानकारी रखने वाले ग़ज़लकार रूप में पाठकों के समक्ष आते हैं। संकलन की रचनाएं ग़ज़ल की कसौटी पर खरी उतरती हैं। ग़ज़ल का बह्र में होना ही उसकी मूलभूत शर्त होती है, जिसे शायर ने बख़ूबी निभाया है। संग्रह की ग़ज़लों में विषयवस्तु की दृष्टि से विविधता है। शायर ने इनमें ज़िन्दगी के सभी रंगों को समेटने का प्रयास किया है। जीवन के अनुभव और संत्रास भी ग़ज़लों में दिखायी देते हैं। आज का दौर शायर को चिन्तित करता है। अच्छे-बुरे हालात, रिश्तों का निर्वाह, मानवीय संवेदनाएं, आम आदमी की पीड़ा-इन सबका ज़िक्र ग़ज़लों में किया गया है। इनके अतिरिक्त प्यार, मुहब्बत की भावनाओं को उजागर करती हुई ग़ज़लें भी हैं। कहा जा सकता है कि बड़ी सादगी और सच्चाई के साथ स्वाभाविकता से जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श करने का प्रयास किया गया हैं। 

ग़ज़ल संग्रह के कुछ उल्लेखनीय अंश प्रस्तुत हैं मुहब्बत की बात करते हुए अशआर- ‘मचलने लगा है दिल अब ख़ुशी से/मोहब्बत हमें हो गयी है किसी से।’ कितनी ख़ुशियों ने दिल पे दस्तक दी/इक तुम्हारे क़रीब आने से।’ आज के सियासी हालात का चित्रण-‘मुक़द्दर के सिकन्दर हो गये हैं/जो दरिया थे समन्दर हो गये हैं।’ आज के दौर का इंसान-‘बिक गया इंसाफ़ सिक्कों के एवज़/मुंसिफ़ों के लब पे ताले पड़ गये।’ आम आदमी का चित्रण-‘कांधों पे अपने टाट का बिस्तर लिये हुए/देखो वो जा ररहा है कोई घर लिये हुए।’ मशक्क़्त ख़ूब करता है, लहू दिन भर जलाता है/कहीं तब जाके इस महंगाई में वो घर चलाता है।“      ग़ज़लों में कहीं-कहीं कुछ दोष भी दृष्टिगत होते हैं।, यथा- ऐबे-तनाफ़ुर (स्वरदोष-मिसरे में किसी शब्द के अंतिम अक्षर की उसके बाद वाले शब्द के पहले अक्षर से समानता), तक़ाबुले रदीफ़ (मतले के अलावा किसी शे’र के दोनों मिसरों का अन्त समान स्वर पर होना) आदि। कुछ ग़ज़लों में भरती के शब्द भी आये हैं। इसके अतिरिक्त पुस्तक में रह गयी प्रूफ़ सम्बन्धी त्रुटियों के कारण कुछ स्थानों पर व्याकरण एवं वर्तनीगत अशुद्धियाँ भी परिलक्षित होती हैं, यथा- बेहीसी, मुशिफ, पुछिए, ऊर्दू, दिजिए, ख़्याल, रूत्बा आदि। पुस्तक का मुद्रण एवं गेट अप अच्छा है। कवर पृष्ठ आकर्षक है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ‘मोहब्बत का समर” पठनीय एवं सराहनीय ग़ज़ल संग्रह है। 128 पृष्ठों की इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य रू0 200/- मात्र है।   


 उदय प्रताप के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का झरोखा



कई दशकों से हिन्दी काव्यमंच के अग्रगण्य और सफलतम कवि 91 वर्षीय शब्द साधक उदय प्रताप सिंह को अभिनंदित कर उन्हें जन्मशती सम्मान प्रदान किये जाने के अवसर पर ‘इटावा हिन्दी सेवा निधि’ द्वारा ‘उदय उमंग’ पुस्तक का प्रकाशन किया गया है। इसके माध्यम से उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर सविस्तार प्रकाश डाला गया है। कविवर उदय प्रताप सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद के गढ़िया ग्राम के चौधरी परिवार में 18 मई, 1932 को हुआ। उनका जीवन पहले एक अध्यापक, बाद में प्राचार्य के रूप में प्रारम्भ हुआ। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जी को उनका विद्यार्थी होने का गौरव प्राप्त है। उन्हीं के निवेदन एवं अनुरोध पर उदय प्रताप जी ने वर्ष 1989 एवं 1991 में दो बार मैनपुरी से लोकसभा चुनाव लड़ कर भारी बहुमत से विजय प्राप्त की। लोकसभा के पश्चात् वे राज्यसभा के सम्मानित सदस्य रहे। इसके बावजूद अपने साहित्यकार और कवि के ऊपर उन्होंने राजनीति को कभी हावी नहीं होने दिया। उदय प्रताप सिंह अंग्रेजी के प्राध्यापक थे, किन्तु हिन्दी में काव्य-रचना की। वह आज भी हिन्दी काव्य मंचों की शोभा हैं। कवि सम्मेलनों के मंचों पर उनकी गरिमायी उपस्थिति सफलता की एक आश्वस्ति मानी जाती रही है। उदय प्रताप ने हिन्दी कविता की वाचिक परम्परा को समृद्ध किया है। 

‘उदय उमंग’ में गोपालदास नीरज, बेकल उत्साही, बालकवि बैरागी, सोम ठाकुर, मुनव्वर राणा, डॉ. रमाकांत शर्मा जैसे स्वनामधन्य एवं मूर्धन्य कवियों तथा साहित्यकारों के संस्मरणात्मक आलेख संग्रहीत हैं, जो उनके जीवन, कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हें। कविवर बेकल उत्साही ने उन्हें अनूठा रचनाकार तथा अछूती सोच का व्यक्ति बताया है। स्वनामधन्य कविवर गोपालदास नीरज ने उन्हें एक समन्वयवादी विचारक बताया है, तो सोम ठाकुर उन्हें भाव पुरूष कहते हैं। मैनपुरी जनपद के निवासी कवि एवं साहित्यकार डॉ. रमाकांत शर्मा ने उन्हें ‘हमारी माटी के अक्षय वट’ कहते हुए अपने संस्मरणात्मक आलेख में उदय प्रताप का सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं कृतित्व दर्शाया है। आलेख में उन्होंने बताया है कि वे अपने छात्र जीवन में उदय प्रताप जी के निकट सानिध्य में रहे हैं तथा उन्हें निकट से देखा एवं समझा है। कविवर उदय प्रताप सिंह का अंग्रेज़ी, हिन्दी एवं उर्दू का ज्ञान अद्भुत है। उन्होंने साहित्य का गहन अध्ययन किया है। उनकी साहित्यिक एवं प्रेरक कविताएं श्रोताओं को सम्मोहित कर लेने की सामर्थ्य रखती हैं। अपने विचारों एवं लेखन में कविवर उदय प्रताप सिंह सदैव समाजवादी, समन्वयवादी तथा प्रगतिशील विचारधारा के पोषक रहे। उनका सदैव मानना रहा है कि कवि जनता का होता है, किसी सरकार का नहीं होता। भाव पक्ष की दृष्टि से उनकी कविताएँ साम्प्रदायिक सद्भाव को पोषित करती हैं। उनकी कविताओं के विषय आमजन के सरोकारों से सीधे जुड़े होते हैं। कविताओं में मानवीय संवेदना के जीवन्त चित्र उपलब्ध होते हैं।

 पुस्तक के काव्य खण्ड के अन्तर्गत उनकी ग़ज़लों एवं छन्दों के साथ ही बांच के देख, पत्तियाँ, चिड़िया बैठ गई, चांदनी, शिशु जी की स्मृति में, होली, भुजबन्धन ढीले कर दो, उमर ख़ैयाम हो जाए, मयख़ाने नहीं आए शीर्षक कविताएं सम्मिलित हैं, जो यह दर्शाती हैं कि काव्य के शिल्प पक्ष पर उनकी कितनी गहरी पकड़ है। आज भी वे अपने चिन्तन, लेखन के प्रति समर्पित हं् तथा हिन्दी साहित्य की सेवा में निरन्तररत हैं। उनकी कविताओं के कुछ अंश प्रस्तुत हैं -‘अब उसकी मुहब्बत का हम कैसे यकीं कर लें/मौसम के मुताबिक़ जो ईमान बदलता है।’, ‘मोबाइलों के दौर के आशिक को क्या पता/रखते थे कैसे ख़त में कलेजा निकाल के।’, ‘न तेरा है न मेरा है ये हिन्दुस्तान सबका है/नही समझी गई यह बात तो नुक़सान सबका है।’, ‘जो आनन्द अमीरी में है, उससे अधिक फ़क़ीरी में/ दरबारों में सर ऊँचा कर पाते हैं हम लैसे लोग।’ श्रृंगार का छन्द- काले घुँघराले केश घेरे नवनीत मुख/बादलों में चादहवीं क चाँद लगती थी वह/यौवन की नदी का उफ़ान बाँधे देहयष्टि/तोड़ती हुई-सी तटबाँध लगती थी वह।’

 पुस्तक का प्रकाशन अत्यन्त सराहनीय कार्य है, किन्तु हिन्दी की साहित्यिक संस्था द्वारा प्रकाशित होने के बावजूद पुस्तक में यत्र-तत्र शब्दों की वर्तनीगत अशुद्धियां हैं, जो खटकती हैं, यथा- स्वस्थ्य पृ.-11, कवियत्रियों पृ.-15, आशिर्वाद पृ.-19, आश्वस्ती पृ.-47 आदि। अनुस्वार सम्बन्धी त्रुटियों की अनेक स्थानों पर हैं। इसके अतिरिक्त प्रूफ़ रीडिंग में पुस्तक के सम्पादक द्वारा अत्यन्त असावधानी बरती गयी है, जिसके कारण अनेक अशु़द्धयाँ रह गयी हैं। बावजूद इसके इस प्रकार की पुस्तकों का प्रकाशन अत्यन्त सराहनीय कार्य है। ‘उदय उमंग’ पुस्तक इटावा हिन्दी सेवा निधि, प्रयागराज द्वारा प्रकाशित की गयी है, जिसके सम्पादक डॉ. कुश चतुर्वेदी हैं।


पठनीय एवं संग्रहणीय श्रेष्ठ कहानी-संग्रह 



डॉ. विद्यानिवास मिश्र पुरस्कार एवं यशपाल पुरस्कार से सम्मानित, राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, उत्तर प्रदेश एवं अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत कुशल कथा-शिल्पी राम नगीना मौर्य की नवीनतम कथा-कृति ‘आगे से फटा जूता’ अपने समय के सच का बयान करती हुई नयी भाव-भूमि, तथा नए तेवर की कहानियों का संग्रह है। राम नगीना मौर्य अत्यन्त संवेदनशील एवं चिन्तनशील आधुनिक कथाकार अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं। पुस्तक के प्रारम्भ में ‘अपनी बात’ के अन्तर्गत लेखक ने पूर्व प्रकाशित अपने कहानी संग्रहों की समीक्षाओं के अंशों तथा पाठकों की प्रतिक्रियाओं को सविस्तार उद्धृत किया है, जिनके माध्यम से इनकी कथागत विशेषताएं परिलक्षित होती हैं। उनका ‘आगे से फटा जूता’ श्रेष्ठ कहानी-संग्रह बन पड़ा है। पुस्तक में ‘ग्राहक देवता’, ‘पंचराहे पर’, ‘लिखने का सुख’, ’सांझ-सवेरा’, ‘उठ ! मेरी जान’, ‘ढाक के वही तीन पात’, ‘ग्राहक की दुविधा’, ‘ऑफ स्प्रिंग्स’, ‘गड्ढा’, ‘परसोना नॉन ग्राटा’ तथा आगे से फटा जूता’ शीर्षकों से उनकी 11 यथार्थपरक कहानियां सम्मिलित हैं। इन कहानियों में वर्तमान समय की विसंगतियों तथा सामाजिक एवं राजनीतिक विद्रूपताओं तथा विडम्बनाओं को चित्रित करने का सफल प्रयास किया गया है। कहानियां रुचिकर और प्रासंगिक है, जिनके माध्यम से मध्य वर्ग के लोगों का संत्रास एवं ऊहापोह खुलकर सामने आता है। 

 प्रस्तुत संग्रह का नामकरण ‘आगे से फटा जूता’ कहानी के आधार पर किया गया है। लेखक ने अपनी इस कहानी की रचना-प्रक्रिया की चर्चा भी विस्तारपूर्वक एवं रोचक ढंग से की है। प्रथम दृष्ट्या ऐसा प्रतीत होता है कि यह किसी दीन-हीन व्यक्ति अथवा लेखक की कहानी होगी, किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं है। इस कहानी में एक नया प्रयोग करते हुए एक सेमीनार हॉल में आये प्रतिभागियों के जूतों की आपस में बातचीत करायी गयी है, जिसके माध्यम से कथाकार ने समाज का आइना प्रस्तुत करने की चेष्टा की है। एक नवीन कथा शैली पाठकों के समक्ष उजागर होती है। संवादों की दृष्टि से भी कहानियों में अच्छे प्रयोग किये गये हैं। पात्रों की संवाद शैली अद्भुत है। कहानी की आवश्यकतानुसार संवादों में चुटिलता एवं रोचकता का भी समावेश रहता है, जो पात्रों में निरन्तर जीवन्तता बनाये रखते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आगे से फटा जूता कहानी संग्रह के माध्यम से राम नगीना मौर्य अत्यन्त सफल कथाकार के रूप में पाठकों के समक्ष उपस्थित होते हैं। बहरहाल, कहानियों का यह श्रेष्ठ संग्रह पठनीय एवं संग्रहणीय है। नये कहानी लेखकों के लिए यह अत्यन्त प्रेरक सिद्ध हो सकता है। रश्मि प्रकाशन, लखनऊ द्वारा प्रकाशित 132 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 220/- रूपये है।


पठनीय एवं सरहनीय ग़ज़ल संग्रह


 
 क़ुर्बान ‘आतिश’के ग़ज़ल संग्रह ‘सुलगता हुआ सहरा’ में उनकी 116 ग़ज़लें संकलित हैं। कथ्य एवं शिल्प, दोनों ही दृष्टियों से संग्रह की ग़ज़लें श्रेष्ठ एवं सराहनीय हैं। संग्रह की ग़ज़लें शिल्प की कसौटी पर खरी उतरती हैं। ग़ज़ल की मुलभूत पहचान इसकी छन्दबद्धता और लयात्मकता है। ग़ज़ल कहने के बहुत से क़ायदे-क़ानून तथा ऐब-हुनर हैं जिनके बारे में शायर को अच्छी जानकारी है तथा शायर ने इनको ध्यान में रखा है। शायर ने बह्र-विधान के बारे में सतर्कता और सावधानी का परिचय दिया है। यही कारण है कि लेखन में सरलता, सहजता तथा रवानी परिलक्षित होती है। ग़ज़लें कथ्य की दृष्टि से भी सराहनीय हैं। आज के समाज और उसके बदलते परिवेश के प्रति गहरी चिंता जाहिर करते हुए शायर ने सामाजिक तथा राजनीतिक विसंगतियों पर प्रहार किया है। साथ ही एक ऐसी ख़ूबसूरत और हसीन दुनिया की तलाश करने की कोशिश की है, जहां इंसानियत, प्रेम और सच्चाई हो। जहां इंसान एक दूसरे का संगी-साथी हो और एक दूसरे के सुख-दुख का सहभागी बने। शायर एक ओर सामाजिक विसंगतियों को लेकर चिंतित हैं, वहीं आज की स्वार्थपरक राजनीति से भी खिन्न भी दिखाई पड़ता है। संग्रह के माध्यम से रचनाकार ने ग़ज़लों को बहुत ही सशक्त और आम आदमी से जुड़ा हुआ बना दिया है। आज के नेताओं की सियासत और उनकी स्वार्थपरता को कुछ इस तरह व्यंजित किया है-‘जिस घड़ी धुंध सोच लेती है/सुब्ह का जिस्म नोच लेती है।’,ःतेरी फ़रियाद क्या सुनेगा वह/आसमां पर दिमाग़ है जिसका।’, ‘तीरगी और फैलती ही गई/उसने कंदील वह जलाई है।’, ‘वो हवा बह रही है हर जानिब/एक दहशत बनी है हर जानिब।’ आज के आदमी की स्वार्थवृत्ति का चित्रण-‘मिलते हैं हर क़दम पर अब बैर करने वाले/क्या उठ गये जहाँ से सब ख़ैर करने वाले।’ समाज में व्याप्त शोषण और अन्याय -‘यह मुझसे आज कैसी आज़माइश हो रही है/शिकस्ता जिस्म पर पत्थर की बारिश हो रही है।’   

    संकलन की ग़ज़लों में कहीं-कहीं ऐबे तनाफ़ुर, ऐबे शुतुरगुर्बा जैसे कुछ सामान्य दोष भी रह गये हैं।, कहीं-कहीं भर्ती के शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। प्रूफ़ रीडिंग तथा भाषा-व्याकरण सम्बन्धी अशुद्धियाँ भी हैं, यथा-स्तिम, प्याम, ख्याल हूकूमत आशीकी, करिशमा आदि। कुल मिलाकर, शायर की रचनाधर्मिता एवं सृजनात्मकता की दृष्टि से ग़ज़ल संग्रह पठनीय एवं सराहनीय है। 144 पृष्ठों की यह पुस्तक को मंत्री मण्डल सचिवालय (राज्य भाषा विभाग) बिहार के अनुदान से प्रकाशित की गयी है, जिसका मूल्य 225 रुपये है।

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रहस्यवाद की छाया से युक्त रचनाएं



‘अपने शून्य पटल से’ पुस्तक में रचनाकार स्व. बालकृष्ण लाल श्रीवास्तव की 53 काव्य रचनाएं सम्मिलित हैं, जिन्हें रमेश चन्द्र श्रीवास्तव ‘रचश्री’द्वारा संकलित एवं सम्पादित किया गया है। यह पुस्तक एक प्रकार से रचनाकार को श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत की गयी है। पुस्तक में लेखक के लगभग सभी सगे-संबन्धियों, नाते-रिश्तेदारों द्वारा उनके भूमिका आलेखों द्वारा भावपूर्ण स्मरण किया गया है। भूमिका आलेख संक्षिप्त एवं विस्तृत, दोनों ही स्वरूपों में लिखे गये हैं, जिनके माध्यम से उनके व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए उन्हें अपनी ओर से भाव-पुष्प अर्पित किये गये हैं। पुस्तक के अन्त के पृष्ठों में सभी परिवारीजनों के फ़ोटो भी हैं। काव्य रचनाओं के वर्ण्य विषय के अन्तर्गत प्रेम, हास्य, करूणा के भाव सम्मिलित हैं। कुछ रचनाओं के माध्यम से दहेज, तथा अन्य सामाजिक कुरीतियों एवं दुनिया के छल-छद्म पर प्रहार भी किया गया है। कहीं-कहीं व्यंग्य भी है। इनके अतिरिक्त प्रकृति-प्रेम तथा हृदयगत अन्य भावनाओं का निरूपण भी रचनाओं में दृष्टिगत होता है। पुस्तक में प्रमुख रूप से अध्यात्म एवं ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्था के भावों से युक्त रचनाओं को स्थान प्रदान किया गया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अध्यात्मप्रेमी एवं ईश्वरवादी पाठकों के लिए यह पुस्तक रुचिकर लगेगी।

कुछ रचनाओं के अंशः- ‘प्रेम सम्बन्धी अवधारणा- एक एहसास है, दिल के जो पास है/हम सभी प्रेम कहते हैं उसकोमगर/जानते ही नहीं उसमें क्या खास है (एक एहसास है)।  उनकी यादों के पल दो पल, इतनी तेजी से आते हैं/ तन को रोमांचित कर देते, मन को विह्वल कर जाते हैं (यादों के पल)। इनके अतिरिक्त सिन्दूरः दहेज, संसार, प्रीति के दीप, उसी का वजूद, वहाँ क्यों होती प्रज्ञा मौन, पथ पाएगा कभी भटकता आदि काव्य रचनाएं भी उल्लेखनीय कही जा सकती हैं। निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा द्वारा 116 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 350 रुपये है।

( गुफ़्तगू के अप्रैज-जून 2023 अंक में प्रकाशित  )

सोमवार, 2 दिसंबर 2024

 स्वतंत्रता आंदोलन के सिपाही फरीदुल हक़ अंसारी 

                                                         - सरवत महमूद खां 

                                      

 सोशलिस्ट आन्दोलन के संस्थापक और स्वतंत्रता संग्राम के मशहूर सिपाही फरीदुल हक अंसारी का जन्म एक जुलाई सन 1895 ई. को युसुफपूर मुहम्मदाबाद में हुआ था। आप के पिता निज़ामुल हक़ अंसारी युसुफपूर मुहम्मदाबाद के प्रतिष्ठित काजी परिवार के सदस्य थे। काजी निज़ामुल हक़ की गणना गाजीपुर कांग्रेस के संस्थापक सदस्य के रूप मे की जाती है। फरीदुल हक अंसारी का परिवार ग़ाज़ीपुर का रईस जमीन्दार और सम्पन्न परिवार था, लेकिन वह इस आरामपसंद नहीं थे और विलासिता से काफी दूर ही रहे।


फरीदुल हक अंसारी


  फरीदुल की प्रारम्भिक शिक्षा स्टीफेंस स्कूल के बाद अलीगढ विश्वविद्यालय से हुई। इस के बाद उच्च शिक्षा के लिए लंदन चले गए। लंदन से वार-एट-ला की डिग्री हासिल की। लंदन में पढ़ाई के दौरान वह जवाहरलाल नेहरू के सहपाठी थे और वहीं से नेहरू जी से घनिष्ठता हो गई थी। सन् 1925 में लंदन से वापसी पर अपने सगे मामू ड़ॉ. मुख्तार अहमद अंसारी की कोठी नम्बर-1, दरियागंज, देहली में रहकर वकालत शुरू कर दी। दिल्ली के रेन्ट कंट्रोल एक्ट के चयन समिति के सदस्य बनाये गये। जिसके कारण सभी सरकारी सुविधायें मिलने लगीं। मगर देश प्रेम की भावना के कारण अस्वीकार कर दिया। देशद्रोह के एक मुकदमे में अपने मुवक्किल को सजा से मुक्त न करा सके, जिससे दुखी होकर सदा के लिए वकालत छोड़ दिए।

  सन 1920 में कांग्रेस के सक्रिय सदस्य बने। सन 1927 में साइमन कमीशन का खुलकर विरोध किया। 17 मई 1922 को पटना में आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में हुए सम्मेलन में उसमें भाग लिया। सन 1927 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य एवं 1929-30 मंे दिल्ली कांग्रेस कमेटी के सचिव बनाये गये। सन 1938 में दिल्ली कांग्रेस कमेटी के आरगनाइजर बनाये गये। फरीदुल हक़ अंसारी, स्वामी सहजानन्द सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर 23 अक्टूबर 1938 को अपने गृह नगर मुहम्मदाबाद में किसान सम्मेल शामिल हुए। यहां संबोधित करने के लिए नरेंद्र देव व सहजानन्द सरस्वती को आमंत्रित किया गया था। कांग्रेस पार्टी में समाजवादी विचार धारा के पोषक थे। इसी वजह से उनकी जो ज़मीन और बाग़ान काश्तकारों से उपयोग था, उसे बांट दिया। जिसके लिए पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने धन्यावाद दिया था। 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेने के कारण इन्हें जेल भेज दिया गया था। इसी प्रकार 1942 में जनक्रांति में शामिल होने पर छह माह की कारावास की सजा हुई। इनको फिरोजपुर जेल भेजा गया। इसी समय माता एवं पत्नी का देहांत हो गया, लेकिन इस मार्मिक घटना से भी विचलित नही हुए लेकिन यह दर्द उन्हे जीवन भर सालता रहा। सन् 1945-46 में युसुफपुर लौट आए। 1946 में संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश ) में धारा सभा (विधानसभा) का चुनाव होना था। मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के कारण पंडित नेहरू ने उन्हे गाजीपुर जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया, लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस की हार के कारण इस्तीफा दे दिया और साथ ही उ. प्र कांग्रेस कार्यकारिणी से भी इस्तीफा दे दिया। 

 आप गांधी जी के उस विचार से सहमत थे कि आजादी मिलने के बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए। अपने इसी विचार और अक्खड़ स्वभाव से कांग्रेस से संबंध विच्छेद कर बाद में आजीवन सोशलिस्ट विचारधारा के साथ रहे। यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति व कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख मार्शल टीटो के निमंत्रण पर भारत से समाजवादियों का प्रतिनिधिमंडल 1952 में आप ही के नेतृत्व में यूगोस्लाविया गया था। इस प्रतिनिधिमंडल में कर्पूरी ठाकुर, बांके बिहारी दास,  शांति नारायण नाईक और मधु दंडवते शामिल थे। पंडित नेहरू बहुत चाहते थे कि आप कांग्रेस में लौट आएं, लेकिन फरीदुलहक इसके लिए तैयार नहीं हुए। आपका घनिष्ठतम संबंध नेता जी सुभाष चन्द्र बोस एवं किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती से थे। 1940-41 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस गाजीपुर आये थे तो स्वामी सहजा सहजानन्द सरस्वती के साथ आप भी नेता जी से मिले थे। इसके पूर्व भी 1938 में आपकी एक गुप्त भेंट पटना में नेता जी सुभाषचंद्र बोस से हुई थी। आप राज्यसभा के दो बार ( 3 अप्रैल1958 से 2 अप्रैल 1964  एवं  3 अप्रैल 1964 से 4 अप्रैल 1966 तक) सांसद रहे। 4 अप्रैल 1966 को 70 वर्ष की आयु में बम्बई के एक अस्पताल में इंतिकाल हो गया।  उनकी अन्तिम इच्छा थी कि उन्हे उनके आबाई कब्रिस्तान युसुफपुर में दफन किया जाय, इसलिए बम्बई से उनके पार्थिव शरीर को फौजी हवाई जहाज से गाजीपुर लाया गया। उनके पार्थिव शरीर के साथ बम्बई से उनके शिष्य और आस्था रखनेवाले चन्द्रशेखर बलिया (जो बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने ) सेवक के रूप में आये थे। उन्हें उनके पैतृक कब्रिस्तान कोटीया (युसुफपुर )में दफनाया गया।


(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2023 अंक में प्रकाशित )

रविवार, 1 दिसंबर 2024

कार्य क्षेत्र को ही जीवन मान लेना व्यक्ति की सबसे बड़ी नादानी: डॉ. अखिलेश निगम ‘अखिल’ 


अखिलेश निगम ‘अखिल’


शिव मंगल सिंह सम्मान (पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी द्वारा वर्ष-1996 में प्रदत्त), राष्ट्रपति का पुलिस पदक (पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा वर्ष-2015 में प्रदत्त),  पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश द्वारा प्रशंसा चिह्न (वर्ष-2023), साहित्य शिरोमणि सारस्वत सम्मान, साहित्य गौरवसम्मान, सुमित्रानन्दन पन्त सम्मान, डॉ. विद्या निवास मिश्र सम्मान और विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा 150 से अधिक सम्मानों से विभूषित, लोकप्रिय कवि, शायर एवं कहानीकार डॉ. अखिलेश निगम ‘अखिल’ का जन्म  05 अगस्त, 1966 ग्राम हसनपुर खेवली, लखनऊ में हुआ है। एम. काम., एल.एल.बी. एवं आई.सी.डब्लू.ए. की परीक्षा पास करने के बाद आपका चयन पुलिस सेवा (आइ पी एस) के पद पर हुआ। वर्तमान में आप डी.आई.जी. (आर्थिक अपराध शाखा) के पद लखनऊ में कार्यरत हैं। हिन्दी के प्रति अत्यधिक प्रेम की वजह से आपने, नौकरी करते हुए, हिंदी में स्नातकोत्तर उपाधि तथा अंततः हिंदी में डाक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि प्राप्त की है। ‘अभिलाषा’, ‘उत्तर देगा कौन?’, ‘गजलें अखिल की’, ‘अखिल दोहा सतसई’, ‘गिरगिट’,‘ललित निबंध और डॉ. रघुवीर सिंह’ और ‘भाव कलश’ आदि नाम से आपकी पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं। लखनऊ स्थित कार्यालय में पहुंचकर अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’ ने इनसे विस्तृत बात की है। प्रस्तुत उस बातचीत के प्रमुख अंश -

सवाल: वर्तमान समय में ग़ज़ल का क्या भविष्य है,  और ग़ज़लों की विषय वस्तु पर आपका क्या दृष्टिकोण है?

जवाब: पहले ग़ज़ल का कथ्य बहुत सीमित था, ग़ज़ल में सिर्फ़ श्रंृगार की ही बात होती थी। मगर, वर्तमान समय में जीवन के सभी पहलुओं पर ग़ज़ल में बात होती है। आज की ग़ज़लें, व्यक्तिगत, सामाजिक समस्याओं, कुरीतियों तथा पर्यावरण संबंधित समस्याओं को उजागर करती हुई उनका समाधान भी प्रस्तुत कर रही हैं। ग़ज़लें अब एक पक्षीय न होकर बहुपक्षीय हो गई हैं। ग़ज़लें अब व्यक्ति और समाज दोनों से जुड़ रही हैं। हालांकि उर्दू ग़ज़लों में सामाजिक विषयों पर कम काम हुआ है। हिन्दी की तरह ही, उर्दू ग़ज़लों में भी, धीरे-धीरे विभिन्न सामाजिक विषयों का समावेश हो रहा है। मेरी ग़ज़ल कृति ‘ग़ज़लें अखिल की’ में कुल 101 ग़ज़लों में से केवल 8-10 ग़ज़लें ही रोमांटिक हैं, बाकी सभी, सामाजिक विषयों से संबंधित हैं। जहां शरीर, मन और आत्मा का एकाकार होता है, वहीं से साहित्य की शुरूआत होती है। बात न्याय की ही होनी चाहिए। दिनों-दिन ग़ज़लों का भविष्य मुझे निरंतर निखरता हुआ ही दिखता है।


सवाल: साहित्य में आपका रुझान कब, क्यों और कैसे हुआ ?

जवाब: मुझे बचपन से ही साहित्य अध्ययन एवं सृजन का शौक रहा है। उम्र के साथ-साथ यह शौक भी बढ़ता गया। विद्यार्थी काल में राजकीय इंटर कालेज की वार्षिक पत्रिका में मेरी  कविता छपी, जिससे साहित्य के प्रति मेरे इस आकर्षण को और बल मिला। पढाई के दौरान, कविताओं में रुचि होने के कारण बहुत सी कविताएं मुझे कंठस्थ थी। अतः मेरा चयन, कालेज की अंत्याक्षरी टीम के कैप्टन के पद पर भी हुआ। शुरूआती दौर में कविताएं लिखने के दौरान ही मेरी लेखनी मुझे गजलों की तरफ मोड़ने लगी। वर्ष-2003 में मेरी मुलाकात प्रसिद्ध शायर डॉ. मिर्जा हसन ‘नासिर’ जी से हुई। उनसे कई बार की मुलाकातों ने मेरे अंदर के ग़ज़लकार को परिष्कृत कर बाहर निकाला और मेरी ग़ज़ल लेखन यात्रा वर्ष-2004 से प्रारंभ हो गई जो कविता, कहानी लेखन  के साथ-साथ फलती फूलती रही। मेरी पहली पुस्तक ‘अभिलाषा’ है, जो कि छंदबद्ध गीत, कविता और ग़ज़ल पर आधारित है तथा ‘उत्तर देगा कौन ?’ जो नई कविताओं पर आधारित है, वर्ष-2006 में प्रकाशित हुई। तत्पश्चात वर्ष-2015 में ‘अखिल दोहा सतसई’ दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष मेरा कहानी-संग्रह ‘गिरगिट’ भी प्रकाशित हुआ। ग़ज़ल लेखन यात्रा वर्ष-2004 से प्रारंभ तो हुई पर मेरे ग़ज़लों का संग्रह ‘ग़ज़लें अखिल की’ वर्ष-2022 में ही प्रकाशित हो पाया। 

सवाल: पुलिस सेवा में रहते हुए, आप अदब के लिए समय कैसे निकालते हैं?

जवाब: कार्य क्षेत्र को ही जीवन मान लेना व्यक्ति की सबसे बड़ी नादानी है और यही अहंकार का कारण है। मैं जीवन से जुड़े हर दायित्व एवं कर्तव्य के लिए आवश्यक समय निकालकर उनमें संतुलन बनाए रखता हूं। यह जीवन रंगमंच है, मैं यहां कार्यालय में डी आई जी का रोल, घर परिवार में परिवार के सदस्य/मुखिया  के रूप में, मित्रों के साथ मित्र के रूप में, तथा रिक्त समय एवं साहित्यिक गोष्ठियों के समय में साहित्यकार का रोल निभाते हुए, सबको उपयुक्त समय देते हुए आवश्यक संतुलन बरकरार रखता हूं। आजकल व्यक्ति का मोटो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ से परिवर्तित होकर ‘कुटुम्ब कैव वसुधा’ में हो गया है। अपनी असीमित आकंक्षाओं एवं लालसा में फँसा हुआ मनुष्य, पूरा जीवन इन्हीं को हासिल करने में बिता देता है और यही उसके तनाव का कारण है।


अखिलेश निगम ‘अखिल’(बीच में) से बात करते अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’(दाएं) साथ में इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी (बाएं) 

सवाल: ऐसा माना जाता है कि पुलिस बहुत ही कठोर होती है, साहित्य सृजन कोमल हृदय वालों लोगों का काम है। इस बारे में आपका क्या मानना है?

जवाब: जितनी भी नदियां हैं सभी पहाड़ों से निकलती है। तरल की उत्पत्ति कठोरता से हुई है। सरसों का तेल कठोर सरसों से, बेल का जूस कठोर बेल से ही तरल रूप में प्राप्त होता है। तरल से तरल की उत्पत्ति नहीं दिखाई देती। साहित्य की संरचना, कल्पना, भाव और यथार्थ के मिश्रण से होती है। हां, इनके अनुपात, समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। जब व्यक्ति अन्य कार्यक्षेत्र में है तो उसको कविता या कहानी के लिए प्लाट ढूंढना पड़ता है। लेकिन पुलिस अधिकारी के पास कविता, कहानी का प्लाट स्वयं आता है। पुलिस के पास लोग अपनी अपनी समस्याएं लेकर आते हैं। हर समस्या, कहानी, कविता या ग़ज़ल का, प्लाट हो सकती है। जिस समय व्यक्ति आता है उस समय उसके दिल में दर्द, मस्तिष्क में झंझावात और वाणी मूक होती है। चाह कर भी वह कुछ बोल नहीं पाता है। सामने बैठा व्यक्ति यदि संवेदनशील है तो यही उसके सृजन के लिए एक प्लाट होता है। मेरी अपनी बहुत सी कहानी कविता के प्लाट इसी तरह से तैयार हुए हैं।

सवाल: साहित्य पुलिस के लिए किस-प्रकार मददगार साबित हो सकता है?

जवाब: उत्तम साहित्य पुलिस विभाग के किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देता है। जिससे वह आम आदमी की समस्याओं को अच्छी तरह से समझ कर उनके निवारण का सम्यक प्रयास कर सकता है।

सवाल: वर्तमान समय के सबसे महत्वपूर्ण शायर आप किन्हें मानते हैं?

जवाब: मेरी दृष्टि में बशीर बद्र की रचनाएं वर्तमान समय की रचनाओं में सबसे ऊपर आती हैं। राहत इंदौरी और दुष्यंत कुमार जी की रचनाओं का भी मैं बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। हालांकि मंचीय कविताएं कुछ अलग तरह की होती हैं।

सवाल: गुफ़्तगू पत्रिका को तकरीबन आप शुरू से देख रहे हैं, क्या कहना चाहेंगे इसके बारे में ?

जवाब: ग़ज़लों के संबंध में ‘गुफ्तगु’ भारत की उत्कृष्ट पत्रिकाओं में से एक है जो व्यक्ति समाज और राष्ट्र की विभिन्न प्रकार की समस्याओं तथा उनके सम्यक समाधान को साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह पत्रिका मानवीय दृष्टिकोण, सर्वधर्म समभाव को आगे बढ़ाती हुए साहित्य को एक नई ऊंचाई पर ले जाती है। मनमोहक पठन सामग्री के लगातार प्रकाशन हेतु ‘गुफ्तुगु’ पत्रिका के संपादक मंडल बधाई के पात्र हैं। जहां तक पत्रिका के कलेवर की बात है तो काव्य जगत की अन्य विधाओं को भी अगर सम्मिलित किया जाए तो यह बहुत उपयोगी सिद्ध होगी।

सवाल: नई पीढ़ी तो कविता या शेर को सोशल मीडिया पर पब्लिश करके वाह-वाही पा लेने को ही कामयाबी मानती है, आप इसे किस रूप में देखते हैं?

जवाब: सोशल मीडिया की अपनी सीमा है एवं प्रयोग का भी एक दायरा है। हर चीज को केवल सोशल मीडिया पर प्रकाशित करना उचित नहीं हो सकता है। सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया का स्थान नहीं ले सकता है। प्रिंट मीडिया का कोई विकल्प नहीं है। नई पीढ़ी में पठनीयता की कमी उनको अधूरा ज्ञान देती है तथा ज्ञान की संपूर्णता में बाधक सिद्ध होती है। सोशल मीडिया की अपनी लक्ष्मण रेखा है उससे आगे वह नहीं जा सकती है।

सवाल: आजकल आपका कौन-सा सृजन-कार्य और अध्ययन चल रहा है?

जवाब: आजकल मेरे कहानी-संग्रह गिरगिट का चार भाषाओं (बांग्ला, असमिया, उड़िया एवं कन्नड़) में अनुवाद चल रहा है। कन्नड़ और बांग्ला भाषा में अनुवाद प्रकाशित भी हो चुके हैं।

सवाल: शायरी के लिए उस्ताद का होना, कितना जरूरी मानते हैं आप?

जवाब: जीवन का कोई भी क्षेत्र हो यदि उस क्षेत्र में पारंगत और सही पथप्रदर्शक/उस्ताद मिल जाय तो ज्ञानार्जन करना और उसमें पारंगत होना आसान हो जाता है। मार्ग सरल और सुगम हो जाता है। स्वाध्याय से भी मंजिल प्राप्त हो सकती है परंतु रास्ता कठिन, श्रमसाध्य और मंजिल अक्सर अस्पष्ट होती है। उस्ताद के मामले में मैं बड़ा भाग्यशाली रहा हूं। ग़ज़ल लेखन में, लखनऊ के डॉ. मिर्जा हसन ‘नासिर’ साहब मेरे उस्ताद रहे है। ग़ज़ल का व्याकरण सीखने के लिए मैं उनके घर अनेक बार गया। उनके सानिध्य में मैने ग़ज़ल की बारीकियां सीखी। उनके निरंतर मार्ग दर्शन ने मेरी ग़ज़लों के स्तर को निखारा।

सवाल: साहित्य के क्षेत्र में आने वाले नये लोगों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे? 

जवाब: नई पीढ़ी से मैं यह कहना चाहूंगा कि वर्तमान समय में व्यक्ति और सामाजिक समस्याओं एवं विसंगतियों को केन्द्र में रखते हुए, यथार्थ की भूमि पर साहित्य सृजन करना, साहित्य तथा समाज को नई दिशा देगा। ख्याली पुलाव के आधार पर किए गए सृजन की उपादेयता संदेहशील है।

(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2023 अंक में प्रकाशित )

शनिवार, 30 नवंबर 2024

 नई कविता के प्रवर्तक हैं डॉ. जगदीश गुप्त

घर में ही लगता था बड़े साहित्यकारों का जमघट

बेटे विभु ने बचपन से ही देखी है साहित्य मंडली

                                      - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 नई कविता के प्रवर्तकों में शामिल डॉ. जगदीश गुप्त हिन्दी साहित्य के प्रमुख लोगों में शामिल हैं, जिनकी वजह से समाज की प्रमुख धारा में साहित्य बना रहा है। नये लोगों को भी डॉ. गुप्त की वजह काफी प्रोत्साहन मिलता रहा है। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में जन्मे डॉ. गुप्त का कर्मस्थल इलाहाबाद ही रहा है। इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के लिए हरदोई से यहां आए और फिर यहीं के होकर रह गए। पहले महादेवी वर्मा से जुड़े और फिर ये सिलसिला बढ़ता चल गया। बचपन में ही पिताजी का देहांत हो गया था। इसलिए पढ़ाई का खर्च भी खुद ही निकालना था। इस खर्च को पूरा करने के ये कई प्रतिष्ठित साहित्यकारों की किताबों का कवर पेज भी डिजाइन किया करते थे, शुरूआत महादेवी वर्मा की किताब से हुई थी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अध्यापन कार्य से जुड़ने के बाद गृहस्थ जीवन में जुड़ गए। शादी हुई और फिर परिवार बढ़ा। तीन बेटियों के बाद तीन बेटों का जन्म हुआ। तीन बेटियों के बाद सबसे बेटे विभु गुप्त का जन्म हुआ। विभु ने अपने पिता और उनके मित्रों को देखा है, उनका आना-जाना और साथ में घुलना-मिलना बचपन से ही रहा था।

डॉ. जगदीश गुप्त

प्रतिष्ठित कवि होने के कारण अक्सर ही डॉ. जगदीश गुप्त के घर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, फ़िराक़ गोरखपुरी, दुष्यंत कुमार, सुमित्रानंदन पंत, नरेश मेहता, धर्मवीर भारती, विष्णुकांत शास्त्री, श्रीनारायण चतुर्वेदी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रामकुमार वर्मा, विजय देव नारायण शाही आदि साहित्यकारों को आना-जाना लगा रहता था। अक्सर ही डॉ. गुप्त के घर काव्य गोष्ठियों हुआ करती थीं, तब उस समय के प्रतिष्ठित और युवा कवियों का जमावड़ा होता था। साहित्यिक प्रतिष्ठा और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अध्यापन कार्य के साथ-साथ डॉ. जगदीश गुप्त अपने सभी छह बच्चों का पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा का भी विशेष ध्यान रखते थे। अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से कभी विमुख नहीं हुए।

महादेवी वर्मा से बैठे हुए डॉ. जगदीश गुप्त

विभु गुप्त ने स्नातक करने के बाद फोटोग्राफी में डिप्लोमा किया और इसके बाद अख़बारों में फोटोग्राफर हो गए। पहले ‘अमृत प्रभात’ अख़बार और उसके बाद ‘राष्टीय सहारा’ में बतौर फोटोग्राफर नौकरी करते हुए रिटायर हुए हैं। रिटायरमेंट के बाद से ही विभु अपने पिता के लेखन और पेंटिंग को संजोने में जुटे हुए हैं। इन्होंने वेबसाइट बनाकर अपने पिता के लगभग सभी लेखन और पेंटिंग को इस वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। वर्ष 2018 में इन्होंने ूूूण्रंहकपेीहनचजण्बवउ नाम से वेबसाइट बनाई है। इसमें डॉ. गुप्त की सारी चीज़े अपलोड करने में जुटे हुए हैं। डॉ. अटल बिहारी वाजपेयी की पुस्तक ‘मेरी 51 कविताएं’ की भूमिका भी डॉ. गुप्त ने ही लिखी है।

 विभु बताते हैं कि पिताजी खुद तो हमलोगों को नहीं पढ़ाते थे, लेकिन हम भाई-बहनों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान रखते थे। किसकी पढ़ाई कैसी चल रही है, कैसे पढ़ाई करनी चाहिए आदि-आदि का ध्यान रखते थे। साथ ही उस ज़माने में भी ट्यूशन लगा दिया था। डॉ. जगदीश गुप्त के निर्देशन में हरिशंकर मिश्र शोध कार्य करते थे। हरिशंकर ही डॉ. गुप्त के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे। बाद में हरिशंकर मिश्र लखनउ यूनिवर्सिटी में हिन्दी के विभागाध्यक्ष भी हुए थे। विभु बताते हैं कि हम भाई बहनों की पढ़ाई पर अपना कोई विचार नहीं थोपते थे, जिसकी रुचि जिस क्षेत्र में हो उसे उसी क्षेत्र में आगे बढ़ाने के हिमायती थे। यही वजह है कि विभु अपनी रुचि अनुसार फोटोग्राफर बने।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से भारत-भारती सम्मान प्राप्त करते डॉ. जगदीश गुप्त। 


 विभु बताते हैं कि जब मैं कोई अच्छी तस्वीर खींचकर लाता था तो वे उसकी प्रशंसा भी करते थे। डॉ. गुप्त कवि होने के साथ बहुत ही अच्छा पेंटिंग और स्केच बनाते थे। उनके पास हमेशा काले स्याही वाली कलम होती थी। रास्ता चलते जब कोई अच्छी चीज़ देखते थे तो छोटे-छोटे कार्ड पर उसका रेखाचित्र बना लेते थे, जिस तरह आजकल लोग मोबाइल से फोटो खींच लेते हैं। 

विभु बताते हैं कि डॉ. जगदीश का पोेता जिसे वे ‘वासु’ नाम से बुलाते थे, उसी को केदिं्रत करते हुए एक किताब ‘वासुनामा’ लिखा है। वासु के बहाने उन्होंने बच्चों को केंद्रित यह किताब लिखी गई है, जिसका शीघ्र ही विभु गुप्ता प्रकाशन कराने जा रहे हैं। आदिकाल की मूर्तियों को एकत्र करने का भी डॉ. गुप्त को बहुत शौक़ रहा है। एक विशाल संग्रह उन्होंने अपने घर में किया था, जिसे विभु गुप्ता ने बहुत ही संजोकर रखा है।

भारत भूषण वार्ष्णेय, डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़़ाज़ी और विभु गुप्त

डॉ. गुप्त को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की तरफ से भारत-भारती पुरस्कार मिला था, यह पुरस्कार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने हाथ से दिया था। मध्य प्रदेश हिन्दी संस्थान की तरफ से मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार के अलावा तमाम सम्मान से इन्हें नवाजा गया था। इनके निधन होने पर पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भी घर आये थे। डॉ. गुप्त एक सफल चित्रकार भी थे, इसलिए उन्होंने चित्रमय काव्य की परम्परा को पुनर्जीवित किया। हिंदी काव्यधारा में महादेवी जी ने चित्र और काव्य का जो अंतः सम्बंध स्थापित किया उसका अगला विकास गुप्त जी की कविताओं मे दिखाई देता है। इनकी 28 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। 



( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2024 अंक में प्रकाशित )


गुरुवार, 28 नवंबर 2024

 गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2023 अंक में



4. संपादकीय-स्तरीय साहित्य सामने आना चाहिए

5-7. उर्दू वर्तन एवं उच्चारण में हमज़ा का महत्व - अमीर हमज़ा

9-10. मुनव्वर के आंसुओं से तैयार हुआ एक जलमहल - यश मालवीय

11-19. ग़ज़लें: आर.डी.एन.श्रीवास्तव, सरफ़राज़ अशहर, तलब जौनपुरी, वीरेंद्र खरे अकेला, शमा फ़िरोज., राहिब मैत्रेय, अरविन्द असर, मंजुला शरण मनु, शगुफ़्ता रहमान सोना, डॉ. शबाना रफ़ीक़, प्रवीण परीक ‘अंशु’, अरविंद अवस्थी, विवके चतुर्वेदी, डॉ. सोनिया गुप्ता, पंकज सिद्धार्थ, शादाब शब्बीरी, मुकेश सिंघानिया, आबिद बरेलवी,

20, दोहा- राज जौनपुरी

21-26. कविताएं: यश मालवीय, अमर राग, डॉ. प्रकाश खेतान, डॉ. प्रमिला वर्मा, खेमकरण सोमान, डॉ. मधुबाला सिन्हा, केदारनाथ सविता, डॉ. नरेश सागर

27-30. इंटरव्यू: अखिलेश निगम अखिल

31-35. चौपाल: कविता के नाम पर लतीफ़ेबाजी और बतकही करने वालों को कवि कहना चाहिए ? 

36-40. तब्सेरा: मोहब्बत का समर, उदय उमंग, आगे फटा जूता, सुलगता हुआ सहरा, अपने शून्य पटल से

41-43. उर्दू अदब: खलिस, हर्फ-हर्फ खुश्बू, मुकद्दस यादें

44-45. गुलशन-ए-इलाहाबाद: असद क़ासिम

46-47. ग़ाज़ीपुर के वीर:फ़रीदुल हक़ अंसारी

48-52. अदबी ख़बरें 

53-84. परिशिष्ट-1  निहाल चंद्र शिवहरे

55. अपने परिवेश की कविताएं- डॉ. दामोदर खड़से

56 कविताओं की भाषा रोचक, सहज और प्रवाही - साकेत सुमन चतुर्वेदी

57. मौलिकताओं के चितेरे: निहाल चंद्र शिवहरे - डॉ. रामशंकर भारती

58. निहाल चंद्र शिवहरे के काव्य में पर्यावरण चेतना - डॉ. मिथिलेश दीक्षित

59-84. निहाल चंद्र शिवहरे की कविताएं

85-115. परिशिष्ट-2: ख़ान हसनैन आक़िब

86-88. प्रेम और मानवीय संवेदना से भरपूर सम्मिश्रण - अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’

89-90. इश्क़-मोहब्बत से भरपूर अशआर - डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’

91-93. शायरी में ज़िन्दगी का हर रंग नुमाया - अनिल मानव

94-95. सशक्त संदेश संग प्रवाहित होती कविताएं - नीना मोहन श्रीवास्तव

96-115. ख़ान हसनैन आक़िब की ग़ज़लें

116-144. परिशिष्ट-3: मधुकर वनमाली

117-119. भाषागत और शैलीगत की परिपक्वता- डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी

120. कविताओं में समय के विविध रंग - डॉ. मधुबाला सिन्हा

121-122. साहित्य के उपवन का मधुकर वनमाली - डॉ. इश्क़ सुल्तानपुरी

123-144. मधुकर वनमाली की कविताएं




बुधवार, 27 नवंबर 2024

 मानव की शायरी में समाज का सच्चा मूल्यांकन: बसंत 

पुस्तक ‘अनिल मानव के चुनिन्दा अशआर’ का विमोचन और मुशायरा



प्रयागराज। अनिल मानव हमारे समाज के  युवा शायर हैं। इन्होंने ग़ज़ल की शायरी शुरू करने से पहले उस्ताद के ज़रिए इसकी छंद की बारीकी को सीखा है और उसी रूप में अपनी शायरी को ढ़ाला है, इसलिए इनकी शायरी परिपक्व और दोषरहित है। इनकी शायरी की ख़ास बात यह है कि उन्होंने समाज का सही आबजर्वेशन करके उसे शायरी में उतार दिया है। इसलिए इनकी शायरी बोलती है। इन्होंने समाज के दर्द को खूब अच्छी तरह से महसूस किया है और उसे अपनी शायरी में तार्किक ढंग से ढाल दिया है। यह बात उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य यात्री परिहवन प्रबंधक बसंत कुमार शर्मा ने कही। 20 अक्तूबर की शाम साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू की तरफ से विमोचन समारोह और मुशायरे का आयोजन सिविल लाइंस स्थित प्रधान डाक घर में किया गया। 

 गुफ़्तगू के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि अनिल मानव अपनी शायरी में समाज के दर्द और अव्यवस्था को उकेरते हैं। एक तरह से उनकी शायरी अदम गोडंवी की शायरी के काफी करीब लगती है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडीज़ सेंटर के कोआर्डिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा ने अनिल मानव के एक शेर का अंश ‘उम्रभर भरते रहो चांबियां विश्वास की’ को प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह शायरी आज के समाज की हक़ीक़त है। शिक्षक हमेशा उपदेश देता है और अगर वह शिक्षक शायर भी हो जोए उसका उपदेश और अधिक तमन्यता से समाज के सामने आ जाता है। यही बात अनिल की शायरी में दिखाई देती है। डॉ. चोपड़ा ने यह भी आज के दौर में जब किताबें बहुत महंगी हो गई हैं, ऐसे में गुफ़्तबू पब्लिकेशन की यह किताब केवल 25 रुपये की है, यह देखकर मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुई।

भारतीय डाक सेवा के एडीशनल डायरेक्टर-2 मासूम रज़ा राशदी ने कहा कि किसी भी शायर की पहली किताब का आना उसी तरह से है जैसे परिवार में एक नया सदस्य जुड़ गया। इनकी शायरी समाज और परिवार के कई मुद्दों को रेखांकित करती है। डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी ने कहा कि अनिल की शायरी आज के समय में सबसे अलग है, इस किताब का अलग ढंग से मूल्यांकन किया जाएगा। नरेश महरानी ने भी अनिल मानव की शायरी की प्रशंसा की।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। नीना मोहन श्रीवास्तव, शिबली सना, हकीम रेशादुल इस्लाम, धीरेंद्र सिंह नागा, अफ़सर जमाल, आसिफ़ उस्मानी, प्रभाशंकर शर्मा, शशिभूषण मिश्र, अजीत शर्मा आकाश, निखत बेगम, शिवनरेश भारती, विक्टर सुल्तानपुरी, देवी प्रसाद पांडेय, गीता सिंह, असद ग़ाज़ीपुरी और सुजीत जायसवाल आदि ने कलाम पेश किया।




बुधवार, 7 जून 2023

महरानी की ग़ज़लां में समाज का दर्द

पुस्तक ‘मेरी तल्खियां’ के विमोचन अवसर पर बोले छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजी



प्रयागराज। नरेश महरानी की ग़ज़लों में समाज का लगभग प्रत्येक पहलू स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, इनकी ग़ज़लों में समाज का दर्द स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने समाज की जिन विडंबनाओं और खूबियों को देखो है, उसी को शायरी का विषय बना लिया है। यही वजह कि इनकी ग़ज़लें आज के समय में पूरी तरह से प्रासंगिक होती दिखाई देती हैं। अपनी अति व्यस्त जीवन में से कुछ समय निकालकर इन्होंने अदब को दिया है। जिसका परिणाम है कि इनका ग़ज़ल संग्रह ‘मेरी तल्खिायां’ प्रकाशित होकर समाज के सामने आ गया है। यह बात 04 जून 2023 को ‘गुफ़्तगू’ की ओर सिविल लाइंस स्थित बाल भारती स्कूल में नरेश महरानी के ग़ज़ल संग्रह ‘मेरी तल्खियां’ के विमोचन अवसर पर छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी मोहम्मद वजीर अंसारी ने कही। श्री अंसारी ने कहा कि नरेश महरानी जैसे कलमकार आज से समय की जरूरत हैं। ऐसी किताब का समाज में स्वागत किया जाना चाहिए।

 सी.एम.पी. डिग्री कॉलेज में हिन्दी की विभागाध्यक्ष डॉ. सरोेज सिंह ने कहा कि नरेश महरानी ने समय का बहुत अच्छा उपयोग करते हुए रचानाकर्म किया है। जिसका परिणाम है कि इनकी पुस्तक प्रकाशित होकर समाज के सामने आ गई है। जो संवेदनशील नहीं होता, वह इंसान नहीं हो सकता। बेहद व्यस्त व्यापारी होने के साथ-साथ इनके अंदर संवेदनशीलता बहुत अधिक है, इसकी वजह यह है कि इनके अंदर एक कवि बैठा हुआ है। नरेश महरानी  आज के समय के बेहतरीन और काबिले-कद्र शायर हैं। 

 डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कहा कि आज के समय में जब लोगों का शब्दों से नाता टूट रहा है, ऐसे में किसी रचनाकार की किताब ्रप्रकाश में आती है तो यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। महरानी की ग़ज़लों में जगह-जगह ख़बरनवीसी दिखाई देती है, ऐसा लगता है कि ये अपनी ग़ज़लें के जरिए ख़बरें लिख रहे हैं। इन्होंने अपनी ग़ज़लों के जरिए समाज की अच्छी पड़ताल की है।

 गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि ग़ज़लों को छंद की तलवार से काटने की कोशिश नहीं करना चाहिए। ग़ज़ल के लिए छंद ज़रूरी है, लेकिन सिर्फ़ छंद ही ग़ज़ल नहीं हो सकती। नरेश महरानी इसी मानक को परिपूर्ण करते हुए बड़ी बात अपनी ग़ज़लों के कथन में कहते हैं। इन्होंने जिन चीज़ों को समाज में देखा है उसे ही अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया है। डॉ. वीरेंद्र तिवारी ने कहा नरेश महरानी की ग़ज़लें अपने कथ्य में पूरी तरह से सफल हैं, आज ऐसी ही ग़ज़लें कहे जाने की आवश्यकता है। नरेश महरानी ने कहा मैंने समाज में जो भी देखा और समझा है, उसे अपनी ग़ज़लों में बांध दिया है। अब पाठक को फैसला करना है कि मेरी ग़ज़लें कैसी हैं।

दूसरे सत्र में मुशायरे का आयोजन किया गया। अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’, अनिल मानव, प्रभाशंकर शर्मा, नीना मोहन श्रीवास्तव, धीरेंद्र सिंह नागा, हकीम रेशादुल इस्लाम, अफसर जमाल, संजय सक्सेना, शिबली सना, कमल किशोर, तलब जौनपुरी, कविता महरानी, नाज़ ख़ान, सुजीत जायसवाल, मसर्रत जहां, राजेंद्र यादव, तस्कीन फ़ात्मा, अजय वर्मा ‘साथी’, राकेश मालवीय आदि ने कलाम पेश किया। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया।


गुरुवार, 25 मई 2023

समय की बात करती हैं प्रमोद दुबे की कहानियां

डॉ. समर की ग़ज़लें वास्तविक समय का चित्रण

दो किताबों के विमोचन पर बोले मशहूर न्यूरो सर्जन डॉ प्रकाश खेतान



प्रयागराज। आज के समय में अपनी रचनाओं के जरिए समाज की विडंबनाओं को उकेरना, ग़लत चीज़ों के खिलाफ़ अपनी रचनाओं के जरिए खड़ा होना बड़ी बात हैं। कहानियों और ग़़ज़लों के जरिए क़लमकार अपनी बात कहता आया है और आगे भी कहता रहेगा। यह चीज़ स्पष्ट रूप से प्रमोद दुबे की कहानी संग्रह ‘घोंसला’ और डॉ. इम्तियाज़ समर के ग़ज़ल संग्रह ‘मोहब्बत का समर’ में दिखाई देती हैं। इन दोनों ही लोगों ने वर्तमान समय की विसंगतियों को समझा, देखा और परखा है, इसी हिसाब से सृजन किया है। यह बात 21 मई 2023 को साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ की ओर से करेली स्थित अदब घर में अयोजित कार्यक्रम के दौरान  मशहूर न्यूरो सर्जन और कवि डॉ. प्रकाश खेतान ने अपने वक्तव्य मेें कही।

श्रीप्रकाश मिश्र


गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि प्रमोद दुबे और डॉ. इम्तियाज़ समर 21वीं सदी के उल्लेखनीय रचनाकार हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं से शानदार उपस्थिति दर्ज़ कराई है। डॉ. वीरेंद्र तिवारी ने कहा कि प्रमोद दुबे ने अपनी कहानियों में समाज की विसंगतियों को बहुत ही मार्मिक ढंग से रेखांकित किया। रेलवे में नौकरी करते हुए श्री दुबे ने जो-जो अनुभव किया, उसका बहुत सटीक ढंग से मूल्यांकन और रेखांकन किया है। कहीं-कहीं इनकी कहानियों में प्रेमचंद की कहानियों के पुट भी मिलते हैं।



 डॉ. प्रकाश खेतान

अजीत शर्मा ‘आकाश’ ने कहा कि डॉ. इम्तियाज़ समर को ग़ज़ल की बारीकियों और छंद-बह्र की बहुत अच्छी जानकारी हैं। यही वजह है कि इनके कहन में ग़ज़ल का सलीक़ा और परंपरा पूरी तरह से जगह-जगह दिखाई देती है। आज के समय में ऐसी ही ग़ज़लें लिखे जाने की आवश्यकता है।

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


 प्रमोद दुबे ने कहा कि आज प्रयागराज आकर यहां की साहित्यिक गतिविधियों को देखकर धन्य हो गया। जिसके लिए यह शहर मशहूर है, वह आज स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। डॉ. इम्तियाज़ समर ने कहा कि गुफ़्तगू और प्रयागराज ने साहित्य की परंपरा को बरकरार रखा है, यह हमारे लिए गर्व की बात है। मेरी किताब का यहां विमोचन मुझे गौरवान्वित करता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि लिखना आपके प्रगतिशील होने का प्रमाण है, जो व्यक्ति प्रगतिशील होता है, वहीं अपने विचारों कागज पर उकेरता है। प्रमोद दुबे और डॉ. इम्तियाज़ समर की रचनाएं मौलिक, पारदर्शी और समाज को दिशा देने वाली हैं, आज के समय में ऐसे ही लेखन की आवश्यकता है। कार्यक्रम का संचालन अजीत शर्मा ‘आकाश’ ने किया। 

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। नरेश महरानी, अफसर जमाल, प्रभाशंकर शर्मा, संजय सक्सेना, शिवाजी यादव, अर्चना जायसवाल, मुसर्रत जहां, फ़रमूद इलाहाबादी, विजय लक्ष्मी विभा, किरन प्रभा, असलम निज़ामी, भारत भूषण वार्ष्णेय, आसिफ उस्मानी आदि ने कलाम पेश किया।


मंगलवार, 16 मई 2023

स्तरीय काव्य रचनाओं का श्रेष्ठ संग्रह

                                   - अजीत शर्मा ‘आकाश’

                                             

 
‘हमारे चाहने वाले बहुत हैं’ कवि एवं शायर स्व. पं. बुद्धिसेन शर्मा का काव्य संग्रह है, जिसे उनके परम शिष्य डॉ. कण्व कुमार मिश्र ‘इश्क’ सुल्तानपुरी ने प्रकाशित करवाया। पुस्तक के प्रारंभ में डॉ. कण्व कुमार मिश्र, यश मालवीय, फ़ारूक़ जायसी, ताहिर फ़राज़, इम्तियाज़ अहमद ‘ग़ाज़ी’, डा. वेद प्रकाश शुक्ल ‘संजर’, इबरत मछलीशहरी और मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ के महत्वपूर्ण आलेख हैं, जो बुद्धिसेन शर्मा के जीवन परिचय तथा उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर पर्याप्तरूपेण प्रकाश डालते हैं। इस पुस्तक में बुद्धिसेन शर्मा की 61 ग़ज़लें एवं फुटकर शेर, 91 दोहे, तथा 10 गीत सम्मिलित हैं। रचनाएं संख्या में भले ही कम हैं, किन्तु वे गुणवत्तापूर्ण हैं, जो एक सच्चे कवि की कसौटी होती है। समस्त रचनाएँ काव्य व्याकरण तथा ग़ज़ल व्याकरण की कसौटी पर पूर्णरूपेण खरी उतरती हैं। ग़ज़लों की फ़ारसी बह्रें हों अथवा हिन्दी के शास़्त्रीय छन्द हों, दोनों की काव्यशास्त्रीय शर्तों का पूर्ण निर्वाह किया गया है। इसी कारण सम्पूर्ण काव्य में भरपूर रवानी तथा लय एवं यति का सुन्दर सामंजस्य एवं निर्वाह है। एक-एक रचना पढ़ते समय पाठक रचनाकार के साथ तत्काल तादात्म्य स्थापित कर लेता है। संग्रह में कुछ गीत और दोहे भी हैं, लेकिन रचनाकार की विशेष पहचान ग़ज़लों से होती नज़र आती है। उनकी शायरी में सूफ़ियाना रंग झलकता है। रचनाओं की भाषा अत्यन्त सरल, सहज एवं बोधगम्य है। आम बोलचाल की हिन्दुस्तानी भाषा में लिखी गयी रचनाएं पाठक के दिलो-दिमाग़ में उतर जाती हैं। 
पुस्तक में सम्मिलित ग़ज़लों के कुछ अंश प्रस्तुत हैं-‘राजनीति के गलियारों में मत जाना/ नागिन अपने बच्चों को खा जाती है।, ‘हमारी जान का बचना है मुश्किल/हमारे चाहने वाले बहुत हैं।’, ‘ये गुरुद्वारे ये गिरजा और ये बुतख़ाने बना डाले/हज़ारों रूप तेरे तेरी दुनिया ने बना डाले।’, ‘रास्ता तो एक ही था, ये किधर से आ गये/ बिछ गयी क्यों इनके नीचे बनके चादर रौशनी।’ पुस्तक में शामिल कुछ गीत इस प्रकार से हैं-‘जिस तट पर प्यास बुझाने में अपमान प्यास का होता हो/उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा मर जाना बेहतर है।’, ‘शस्त्रों से सजी हुई बीसवीं सदी अपने ही लोगों की है/अपनी संगीनें हैं, अपने ही सीने, अपनों का अपनों से अन्धा टकराव/घड़ी-घड़ी मरहम है, घड़ी-घड़ी घाव।’ कहा जा सकता है कि ‘हमारे चाहने वाले बहुत हैं’ काव्य संग्रह में सामाजिक सरोकार, जीवन एवं उसकी विसंगतियां तथा भ्रष्ट राजनीति और उच्छ्रंखल समाज और सामाजिक परिस्थितियों की विडम्बना पर किये गये सटीक व्यंग्य रचनाकार के कृतित्व की वास्तविक पहचान हैं। 144 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 300 रूपये है, जिसके रचनाकार बुद्धिसेन शर्मा हैं, पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है।

विविध रंगों से सुशोभित ‘अम्बर छलके’




 ‘अम्बर छलके’ काव्य संग्रह में डॉ.एस.एन.भारद्वाज ‘अश्क’ की कविता, गीत एवं ग़ज़ल की रचनाएं सम्मिलित हैं। संकलन को आराधन, राष्ट्र, भाव, तरुण, महाव्याधि शोक एवं ग़ज़ल- इन सात तरंगों में विभाजित किया गया है। आराधन-तरंग में आध्यात्मिक भावों की 6 रचनाएं सम्मिलित हैं। राष्ट्र-तरंग में 6 देश प्रेम की रचनाएं हैं। भाव-तरंग में विभिन्न मनोभावों का चित्रण एवं प्रकृति वर्णन है। हास्य-व्यंग्य की कुछ रचनाओं को भी इसमें स्थान प्रदान किया गया है। तरुण-तरंग में कवि के कथनानुसार अल्हड़ उम्र की कुछ कविताएं है। महाव्याधि की शोक-तरंग के अन्तर्गत कोरोना काल से सम्बन्धित 8 रचनाएं पुस्तक में हैं। ‘मैंने ईश्वर देखा है’, ‘आशा के सपने’, ‘सड़क पर ग़रीब’, ‘बस कोरोना को रोना क्यूं’ रचनाओं के माध्यम से कोरोना की विभीषिका को दर्शाते हुए लोगों की मानसिक, शारीरिक, आर्थिक स्थितियों एवं जीवन-संघर्ष को प्रदर्शित करने की चेष्टा की गई है। अंतिम भाग ग़ज़ल-तरंग में रचनाकार की 10 ग़ज़लें सम्मिलित हैं, जिनमें ग़ज़ल के व्याकरण एवं इसकी अन्य शर्तों को पूरा करने का प्रयास किया गया है।
 पुस्तक में सम्मिलित कविताओं, गीतों एवं ग़ज़लों में विभिन्न मनोभावों एवं विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान करने की चेष्टा की गई है। इनका वर्ण्य विषय प्रमुखतः श्रृंगार एवं प्रणय, वर्तमान समाज का चित्रण, जीवन की अनुभूतियां एवं संवेदनाएं, सामाजिक सरोकार, आम आदमी का संकट, जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण आदि है। कथ्य की दृष्टि से रचनाओं में विविधता परिलक्षित होती है। यथा-‘माँ ! मुझको एक रोटी दे दे’ कविता के अन्तर्गत एक बालक की अपनी मज़दूर माँ से एक ख़्वाहिश- भूख से मुझे निजात दिला दे/अपन दुख मां किसे सुनाऊँ/ख़ाली पेट न मैं सो पाऊं/गिरा अभावों की खाई में/उम्मीदों की चोटी दे दे/मां ! मुझको एक रोटी दे दे। रचनाओं की भाषा सहज एवं भावानुकूल है। आम भाषा से लेकर साहित्यिक भाषा तक के शब्दों का प्रयोग इनमें किया गया है। कहीं-कहीं सामान्य बोलचाल के अंग्रेजी शब्दों का भी प्रयोग है। इस काव्य संग्रह की कुछ रचनाओं की झलकें प्रस्तुत हैः- करें विचार एक क्षण, जो उत्सवों में लीन हैं/स्वतंत्र वो भी हों कि जो स्वतंत्रता विहीन हैं (“जो स्वतंत्रता विहीन हैं”)। कोना-कोना खिल जाएगा मुरझाऐ तन-मन का/काश कहीं से फिर आ जाए दौर सुहाना बचपन का  (“बचपन”)। थोड़े-से सच्चे हो जाएँ/आओ फिर बच्चे हो जाएँ! (“स्नेह-सूत्र”)। इनके अतिरिक्त “धूप और बारिश”, “शान्त शरद आया”, “भोर का गीत” आदि कविताएं भी सराहनीय हैं। तकनीकी दृष्टिकोण से पुस्तक का मुद्रण, गेट अप, शब्द संयोजन उत्तम कोटि का है तथा आवरण पृष्ठ आकर्षक है, यद्यपि प्रूफ़ आदि तकनीकी दोष भी कहीं-कहीं रह गये हैं। कुल मिलाकर ‘‘अम्बर छलके...’’ डॉ. एस.एन.भारद्वाज ‘अश्क’ का एक अच्छा काव्य-संग्रह है। अमृत प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 136 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 400 रुपये है।

गांवों की पहचान है मिट्टी की सोंधी महक




  अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’ के ‘सोंधी महक’ काव्य संग्रह में आज के ग्राम्य जीवन एवं ग्रामीण परिवेश की अनेक परिदृश्य प्रस्तुत किये गये हैं। संग्रह में कुल 30 कविताएं सम्मिलित हैं, जिनमें गांव एवं उसके जन-जीवन’ का चित्रण परिलक्षित होता है। कविताओं में गांव के साथ-साथ समाज और देश की चिन्ताओं को भी उजागर करते हुए अनेक सामाजिक एव राजनीतिक विसंगतियों पर प्रहार करने का प्रयास किया गया है। रचनाकार ने वर्तमान ग्रामीण जीवन का यथार्थ चित्रण करने की चेष्टा की है। किसानों को कभी सूखा और कभी बाढ़ का क़ह्र झेलना पड़ता है। कर्जों में फंसे, तंगी में जीते, छोटे-छोटे झगड़ों को निपटाने के लिए कचहरी के चक्कर लगाते हुए भोले-भाले ग्रामीण अपना जीवन बिता देते हैं। कृषि कार्य से अब एक सामान्य कृषक के पूरे परिवार की ज़रूरतें को पूरी नहीं हो पाती। इसके अतिरिक्त जनसंख्या विस्फोट, रूढ़िवादिता तथा अंधविश्वासों से भी ग्रामीण जन ग्रसित हैं। गरीबी और अशिक्षा के कारण पुरानी परंपराओं तथा सामाजिक बंधनों ने उन्हें जकड़ रखा है। आज गांव में भी बदलाव आता जा रहा है। अनेक विसंगतियाँ ग्रामीण जनों को भी घेरती सी दृष्टिगत होती हैं। गांववासी विशेषकर युवा, नगरों की चकाचौंध से प्रभावित होते जा रहे हैं। उन्हें गांवों में रहना अब अच्छा नहीं लगता। वह शिक्षा, नौकरी और सुख सुविधाओं का पीछा करते हुए नगर पहुंचना चाहता है। इन सभी समस्याओं को संग्रह की कविताओं में स्थान दिया गया है।
 संग्रह की लगभग सभी कविताओं में बुधिया नामक पात्र एक आम ग्रामीण का प्रतिनिधित्व करता है, जिसको केन्द्रित कर ग्रामीणजन की छटपटाहट एवं उसके भीतर की कसक तथा गांवों की दशा-दुर्दशा को शब्दचित्रों के माध्यम से उजागर किया गया है। कहा जा सकता है कि सभी रचनाएँ ग्राम्य जनों के मनोभावों एवं ग्रामीण परिवेश को व्यक्त करने में काफ़ी हद तक सफल रही हैं। पुस्तक को पढ़ना ग्राम्य जीवन को समझना है। संग्रह की कविताएँ गाँव में बोली जाने वाली सहज एवं सरल भाषा में हैं, जिनमें आम बोलचाल के शब्दों का ही प्रयोग किया गया है। पुस्तक का मुद्रण एवं कवर पृष्ठ आकर्षक है। 128 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 175 रूपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है।

सृजनात्मक लेखन का सराहनीय प्रयास



 ‘अक्षर-अक्षर गढ़कर’ काव्य संग्रह में कवयित्री शगुफ़्ता रहमान ‘सोना’ की 97 कविताएँ सम्मिलित हैं। इन रचनाओं के माध्यम से जीवन की विसंगतियों एवं विभिन्न परिस्थितियों को पाठकों के समक्ष लाने का प्रयास किया गया है। रचनाओं का वर्ण्य विषय प्रमुख रूप से सामाजिक एवं राजनीति व्यवस्था, समाज के प्रति चिन्तन, मानवता का कल्याण, सामाजिक समरसता आदि है। इसके अतिरिक्त देशभक्ति, नारी शक्ति, प्रकृति का सौन्दर्य के साथ ही प्रेम एवं र्श्रृगार से सम्बन्धित कविताएं भी हैं। रचनाओं में विभिन्न प्रकार के संदेश हैं तथा अंधकार में प्रकाश की आशा रखने के भाव निहित हैं। रचनाओं में अनेक स्थलों पर जीवन के यथार्थ चित्रण की झलक है। कविताओं में मनोभावों एवं अनुभूतियों को शब्द प्रदान किये गये हैं। पुस्तक में जीवन के विविध आयामों को स्पर्श करते हुए विभिन्न मनोभावों एवं विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है। पुस्तक की रचनाकार एक शिक्षिका हैं, अतः रचनाओं पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। पुस्तक में कुछ रचनाएँ विद्यालय एवं बच्चों से सम्बन्धित हैं। ‘मेरा देश, ‘सच्चा मानव’, ‘ईद कैसे मनाऊँ, ‘आजा काले बादल, ‘ये दौर है नया-नया, ‘वसन्त ऋतु, ‘नारी, प्रेम तुम्हारा पाकर, ‘अनमोल प्रेम’आदि कुछ कविताओं के शीर्षक हैं। काव्य-संग्रह की कुछ रचनाओं के अंश प्रस्तुत हैं - ‘नफ़रत का बीज-मजहब बड़ा और खुदा का घर छोटा हो गया/इंसान की सोच को यहां अब क्या हो गया।’, ‘मेरा देश कविता में-यह मेरा देश, मेरा देश/तेरा भी वतन, ये तेरा भी वतन/झूम-झूम गाएं हम, सबका है वतन, सबका है वतन’, ‘नारी- हिम्मत की पहचान है नारी/हौसलों का जान है नारी।’
रचनाओं का भावपक्ष एवं कथ्य सराहनीय है, किन्तु शिल्प की दृष्टि से काफ़ी कमज़ोर हैं। कविताओं में प्रायः सपाटबयानी-सी आ गयी है। अधिकतर कविताओं को ग़ज़ल के फ़ॉर्म में लिखने का प्रयास किया गया है। संग्रह को पढ़ते समय रचनाकार में काव्य-व्याकरण सम्बन्धी ज्ञान का अभाव प्रतीत होता है। रचनाकार की यह पहली पुस्तक है। आशा है भविष्य के संग्रहों में और अच्छी रचनाएं सम्मिलित होंगी। 128 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 175 रूपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है।

शे’रगोई के समुन्दर में तैराक ही उतरते हैं




ग़ज़लकार पदम ‘प्रतीक’ के ग़ज़ल-संग्रह ‘सरगोशियाँ’ में उनकी 45 ग़ज़लें सम्मिलित हैं। सम्पूर्ण पुस्तक तथा उसकी सभी ग़ज़लें हिन्दी एवं उर्दू, दोनों ही भाषाओं में हैं। ध्यातव्य है, कि ग़ज़ल का एक विशेष अनुशासन एवं व्याकरण है। ग़ज़ल फ़ारसी से होती हुई हिन्दी में आयी है। ग़ज़ल कहने के लायक बनने के लिए बहुत से क़ायदे-क़ानून एवं ऐब-हुनर हैं जिन्हें एक शायर के लिए जानना तथा सीखना अत्यन्त आवश्यक है। इस तथ्य के प्रति सजग रचनाकार अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं। शायर पदम ‘प्रतीक’उन्हीं में से एक हैं। संकलन में कुछ ग़ज़लें रिवायती हैं, कुछ आधुनिक समाज का दर्पण भी हैं। ग़ज़लें अपनी परम्पराओं से जुड़ी हुई हैं, जो इस विधा को निरन्तर आगे बढ़ाये जाते रहने के लिए निहायत ज़रूरी चीज़ है। संग्रह में सम्मिलित ग़ज़लों की भाषा मधुरता और सरसता लिए हुए आम फ़हम भाषा है, जिसे हर कोई आसानी से समझ सकता है। बड़ी ही खूबसूरती और सलीक़े की शायरी है। गजलें रचनाकार के अपने अनुभव से कही गयी हैं, जिनमें जीवन का तत्व एवं तथ्य झलकता है। मन के भावों की सफल प्रस्तुति की गयी प्रतीत होती है। पुस्तक की शायरी आम और खास इंसान के हर एहसास को बयान करती है। संग्रह की ग़ज़लें अच्छे स्तर की हैं तथा उनकी बुनावट ठीक है। सभी ग़ज़लें शिल्प की कसौटी पर खरी उतरती हैं। ग़ज़ल-व्याकरण का पूरी तरह पालन किया गया है। विशेष तौर पर बह्र-विधान का पूर्णतः ध्यान रखा गया है। रचनाकार को उर्दू की अच्छी जानकारी होने के कारण अशुद्ध शब्दों का प्रयोग भी ग़ज़लों में नहीं है।  फिर भी ऐबे तनाफ़ुर (अब बहाने पृ.79, उभर रहा पृ. 97 आदि) तथा तक़ाबुले रदीफ़ (पृ.-61,87,97) जैसे दोष भी यत्र-तत्र दिख जाते हैं। पुस्तक में प्रूफ़ रीडिंग सम्बन्घी मामूली दोष (जैसे मज़बूर- पृ.37) भी कहीं-कहीं रह गये हैं। 
      कथ्य की दृष्टि से ग़ज़लों में श्रृंगार एवं प्रणय, वर्तमान समाज का चित्रण, जीवन की अनुभूतियाँ तथा संवेदनाएं, सामाजिक सरोकार, आम आदमी का संकट, राजनीतिक हालात आदि की झलक भी देखने को मिलती है। अपने एवं ज़माने के दुख-दर्द को भी शायर ने अभिव्यक्ति प्रदान की है। पुस्तक की कुछ ग़ज़लों के उल्लेखनीय अशआर इस प्रकार हैं-‘जो क़ाबू जु़बां पर हमारा रहे तो/मुनासिब है जो ये वही बोलती है।’, ‘हर बुराई से अब करो तौबा/जब भी जागो तभी सवेरा है।’, ‘कतर के पर मुझे आज़ाद करके/वो बस अहसां जताना चाहता है।’ ग़ज़लें सलीक़े से कही गयी हैं, इनमें एक सहजता है। इन्हें पढ़कर लगता है, कि शायर दिल की गहराइयों में उतरकर अपनी बात कह रहा है। ग़ज़लकार का यह शे’र स्वयं उन्हीं पर सटीक बैठता है- शे’रगोई तो वो समुन्दर है, जिसमें तैराक ही उतरते हैं। पदम ‘प्रतीक’निश्चित रूप से शे’रगोई के समुन्दर के कुशल तैराक हैं। कहा जा सकता है कि ग़ज़ल संग्रह अत्यन्त सराहनीय है। अमृत प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 112 पृष्ठों की इस सजिल्द पुस्तक का मूल्य 300 रुपये है। 

 सृजन के क्षेत्र में सराहनीय प्रयास

 


  डॉ. मधुबाला सिन्हा के कविता-संग्रह ‘प्यार बिना’ में उनकी  छन्दबद्ध तथा छन्दहीन प्रकार की छन्दबद्ध तथा छन्दहीन प्रकार की 75 कविताएँ सम्मिलित हैं, जिनमें जीवन, विशेषकर नारी-जीवन के विभिन्न रंगों एवं पहलुओं को उजागर करने की चेष्टा की गयी है। अधिकतर कविताओं में कहा गया है कि नारी प्रेम को ही जीती है, क्योंकि दुनिया में प्रेम से परे और कुछ भी नहीं है। प्रेम ही जीवन की वास्तविकता है। अधिकतर रचनाओं में नारी के मूर्त रूप एवं उसके अन्तर्मन का चित्रण परिलक्षित होता है, जिसमें नारी की पीड़ा, उसकी भावना, बेचौनी, तड़प, ख़ुशी, दुःख, प्यार आदि विभिन्न रंग समाहित हैं। उसकी संवेदना, चेतना, भाव-संघर्ष, जीवन-संघर्ष और द्वन्द्व से रचनाएं सीधे जुड़ी हैं। इसके अतिरिक्त जीवन की विभिन्न विसंगतियों एवं विडम्बनाओं को भी रचनाओं का आधार बनाया गया है। कुछ रचनाओं में वर्तमान समय के सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहलुओं को भी उजागर करने की चेष्टा की गयी है। साथ ही, प्रकृति-चित्रण एवं प्रेम तथा श्रृंगार विषयक रचनाएँ भी हैं। कविता-संग्रह में मन की भावनाओं के कई रूप हैं, जिन्हें अभिव्यक्ति प्रदान करने का प्रयास किया गया है। कविताओं के माध्यम से जीवन में व्याप्त संत्रास, घुटन, वेदनाओं एवं अनुभूतियों को शब्द प्रदान किये गये हैं। रचनाओं में जीवन के अन्य अनेक रंग भी परिलक्षित होते हैं। इन कविताओं के माध्यम से कवयित्री ने सृजनात्मकता को उजागर करने का प्रयास किया है। यह कहने का प्रयास किया गया है कि ज़िन्दगी के तमाम धागे प्यार बिना अनसुलझे ही रहते हैं। हालाँकि पुस्तक के शीर्षक ‘प्यार बिना‘ नामक कोई कविता संग्रह मे नहीं है। संकलन की रचनाओं में कवयित्री के मनोभावों की अभिव्यक्ति परिलक्षित होती हैं। कविताओं में विषम परिस्थितियों में भी जीवन का सन्देश प्रदान करने का प्रयास किया गया है। कुछ कविताओं के उल्लेखनीय अंश प्रस्तुत हैं- पनपते रिश्ते- दबी राख के नीचे से/चमक उठते हैं दबे रिश्ते/सुधरने की आस में फिर से जी उठते हैं। सोचती हूं- आज पूछ ही डालूँ मैं भी प्रश्न/जो जाने कब से/समंदर की गहराइयों में/छटपटा रहे हैं। इनके अतिरिक्त उठता धुआँ, जीवन की रेल, मैं आती हूं, मेरा जीवन, मज़दूर, सच्चा धर्म, नदी का दर्द आदि रचनाएँ भी सराहनीय हैं। शिल्प की दृष्टि से संकलन की छन्दबद्ध कविताएँ कमज़ोर प्रतीत होती हैं। छन्द विधान एवं छन्दानुशासन का अभाव परिलक्षित होता है, जिसके कारण प्रवाह एवं लयबद्धता बाधित होती है। कविताओं को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि रचनाकार को काव्य व्याकरण एवं छन्द शास्त्र की सम्यक् जानकारी नहीं है। पुस्तक में संग्रहीत कविताओं के कथ्य को दृष्टिगत रखते हुए कहा जा सकता है कि रचनाकार के लेखन में सरलता और सहजता है, लेकिन भाषागत एवं व्याकरणिक अशुद्धियां यत्र-तत्र दृष्टिगत होती हैं। इसके अतिरिक्त महत्वकांक्षा, अठ्ठाहास, झंझावत, ख़्याल, भर्मित, संसय जैसे अशुद्ध वर्तनीयुक्त शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिसे साहित्यिक लेखन की दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है। साहित्यिक सृजन हेतु काव्य व्याकरण एवं भाषा व्याकरण का सम्यक् ज्ञान रचनाकार को निश्चित रूप से होना चाहिए। कह सकते हैं कि सृजन के क्षेत्र में यह एक सार्थक एवं सराहनीय प्रयास है, जो रचनाकार की सृजनात्मकता का द्योतक है। जिज्ञासा प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद द्वारा प्रकाशित 114 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 200 रूपये है।


(अक्तूबर-दिसंबर 2022 अंक में प्रकाशित )

शनिवार, 6 मई 2023

गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2023 अंक में



4. संपादकीय: दो प्रशासनिक अधिकारियों की शायरी

5. पवन कुमार का परिचय

6-7. प्रशासन और साहित्य का रिश्ता बहुत अहम - पवन कुमार

8-9. एक संजीद शायर पवन कुमार - शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी

10-11. अहसासों की आवाज़ है पवन की शायरी  - शीन काफ़ निज़ाम

12. बारहागे ग़ज़ल का एक खिदमतगार- अक़ील नोमानी

13-14. इम्कानात की राहों के रौशन चिराग़ हैं पवन कुमार - डॉ. राकेश तूफ़ान

15-18. नई पीढ़ी का अलबेेला शायर पवन कुमार - डॉ. फुरकान अहमद सरधनवी

19-21.साहित्य के पटल पर जगमगाता सितारा - अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’

22-61. पवन कुमार की ग़ज़लें

62. अनुराग मिश्र ‘ग़ैर’ का परिचय

63-64. अफ़सरी लबादा उतारकर अमरोहा के गली-कूचों के नशिस्तों में होता हूं शामिल- अनुराग ग़ैर

65. किधर है राजधानी ढूढ़ते हैं - यश मालवीय

66-67. रोमांश के सफल ग़ज़लकार अनुराग ग़ैर- अखिलेश मयंक

68-69. ग़ैर की ग़ज़लों में अपनापन- इश्क़ सुल्तानपुरी

70-71. ग़ैर की ग़ज़लों में जीवन के अनेक रंग- डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’

72-73. नई उम्मीदें जगाता एक शायर- अतिया नूर

74-75. समाज के सभी पहलुओं पर रेखांकित शायरी-शगुफ़्ता रहमान ‘सोना’

76-78. शानदार कृतित्व के रचनाकार हैं ग़ैर- नीना मोहन श्रीवास्तव

79. प्रेम, रति, हास और मनुहार का समावेश- साजिद अली सतरंगी

80-111. अनुराग मिश्र ‘ग़ैर’ की ग़ज़लें

112-118. तब्सेरा: हमारे चाहने वाले बहुत हैं, अंबर छलके, संोंधी महक, अक्षर-अक्षर गढ़कर, सरगोशियां, प्यार बिना, मेरी तल्खियां

119-121. उर्दू अदब:  ग़ज़ल पारा, नियामतउल्लाह अंसारी-शख़्सियत और कारनामे, सवांही नॉॅवेल, काविश-ए-तलअत, 

122-123. गुलशन-ए-इलाहाबाद: सादिक़ हुसैन सिद्दीक़ी

124-125. ग़ाज़ीपुर के वीरः स्वामी सहजानंद सरस्वती

126-130. अदबी ख़बरें

131-132. अमर राग की कविताएं


शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

ऐतिहासिक दस्तावेज है ‘21वीं सदी के इलाहाबादी’

                           
‘21वीं सदी के इलाहाहाबादी’ का विमोचन करते अतिथि ।


प्रयागराज। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की किताब ‘21वीं सदी के इलाहाबादी’ में इलाहाबाद की महत्वपूर्ण विभूतियों की पूरी जानकारी दी गई है। यह इतिहास में दर्ज़ की जानी वाली किताब है, इस तरह के काम का विशेष महत्व है। हालांकि अभी कई अन्य लोगों इसमें शामिल किए जाने की आवश्यकता है, जिसे इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने खुद भाग-2 और तीन में पूरा करने की बात कही है। यह बात 05 मार्च को गुफ़्तगू की ओर से मोतीलाल नेहरु मेडिकल कॉलेज के डॉ. प्रीतमदास प्रेक्षागृह में आयोजित कार्यक्रम के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति पंकज मित्थल ने कही। इस मौके पर इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की पुस्तक ‘21वीं सदी के इलाहाबादी’, नरेश कुमार महरानी की पुस्तक ‘मेरी तल्ख्यिां’ और शगुफ़्ता रहमान ‘सोना’ की पुस्तक ‘अक्षर-अक्षर गढ़कर’ का विमोचन किया गया। साथ ही ‘21वीं सदी के इलाहाबादी’ में शामिल सभी लोगों को सम्मानित किया गया।                             
कार्यक्रम के दौरान लोगों को संबांेधित करते सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति पंकज मित्थल।
   
 मुख्य अतिथि माननीय पंकज मित्थल ने कहा कि गुफ़्तगू और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ऐसा कार्य कर रहे हैं, जिसके लिए इलाहाबाद पहचाना जाता है। यह बहुत उल्लेखनीय कार्य है, इसकी हर स्तर पर सराहना की जानी चाहिए। कार्यक्रम का संचालन मशहूर गीतकार यश मालवीय ने किया। राज्य उपभोक्ता विवाद परितोष आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने कहा कि ‘21वीं सदी के इलाहाबादी’ एक बेहद की महत्वपूर्ण किताब है, ऐसे कार्य से हम इतिहास को सहेजते हैं, इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने इसे करके दिखा दिया है।                                                               
‘21वीं सदी के इलाहाहाबादी सम्मान’ प्राप्त करते पूर्व मंत्री डॉ. नरेंद्र सिंह गौर।

                                                
‘21वीं सदी के इलाहाहाबादी सम्मान’ प्राप्त करते पूर्व विधायक अनुग्रह नारायण सिंह।

                                                       
‘21वीं सदी के इलाहाहाबादी सम्मान’ प्राप्त करतीं पद्मश्री राज बवेजा।

  
                                       
‘21वीं सदी के इलाहाहाबादी सम्मान’ प्राप्त करते लालजी शुक्ला।


‘21वीं सदी के इलाहाहाबादी सम्मान’ प्राप्त करते यश मालवीय।


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि इलाहाबाद में महत्वपूर्ण कार्य करने वाले लोगों के बारे में अपनी अगली पीढ़ी को बताने के लिए यह किताब लिखी गई है। आमतौर साहित्यकारों के बारे में तो कुछ न कुछ लिख ही दिया जाता है, लेकिन दूसरे क्षेत्रों में काम करने वालों के बारे में प्रायः नहीं लिखा जाता है, इसलिए भी इस किताब का लिखना बहुत जरूरी था।
‘21वीं सदी के इलाहाहाबादी सम्मान’ प्राप्त करते डॉ. एस.पी. सिंह।


  अघ्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रमराव ने कहा कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। ऐसी किताबों से दूसरें लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए। आमतौर पर पत्रकारों के बारे में नहीं लिखा जाता, लेकिन इम्तियाज ग़ाज़ी ने इसमें पत्रकारों को भी शामिल करके एक बड़ा और अनोखा कार्य किया है। गुफ़्तगू के सचिव नरेश महरानी के सबके प्रति धन्यावद ज्ञापन किया। 

कार्यक्रम के दौरान एक साथ बैठे हुए चिदुप अग्रहरि, अनुग्रह नारायण सिंह और डॉ. नरेंद्र सिंह गौर।

‘21वीं सदी के इलाहाहाबादी सम्मान’ प्राप्त करते इंटरनेशनल बैडमिंटन खिलाड़ी अभिन्न श्याम गुप्ता।