गुरुवार, 6 अगस्त 2020

मुशायरों के बेताज़ बादशाह थे ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी


 

ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी


                                                               - शहाब ख़ान गोड़सरावी
   
 उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित ग़ाज़ीपुर जिला कई मायने में बहुत ख़ास है। सेना और पुलिस में तो यहां के नौजवनों की तादाद काफी है ही, कलम से भी अपना जौहर दिखाने वालों की तादाद भी काफ़ी है। कई ऐसे लोगा भी हैं जो पूरे देश में अपनी कलमकारी के लिए विख़्यात रहे हैं। इनमें राही मासूम रज़ा, गोपाल राम गहमरी, भोलानाथ गहमरी, हारून रसीद और ख़ामोश ग़ाज़ीपुर समेत अनेक नाम शुमार हैं। आमतौर पर शिक्षा के मामले में ग़ाज़ीपुर को पिछड़ा माना जाता रहा है, इसके बावजूद कुछ लोगों ने अपनी क़ाबलियत का जौहर इस तरह से पेश किया कि तो लोग ‘वाह-वाह’ किए बिना नहीं रह पाते। इन लोगों में से ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का एक ख़ास मुकाम है, जिन्होंने अपनी ग़ज़लों को खुद के ही शानदार तरंनुम में पेश कर लोगों को वाह-वाह करने के लिए मज़बूर किया। अपने समय में ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी जिन मुशायरों में जाते उसे कामयाब बनाने की जमानत बन जाते। 
मुजफ़्फ़र हुसैन उर्फ़ ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का जन्म 20 जुलाई 1932 ई० को गाजीपुर शहर के मुहल्ला सट्टी मस्जिद में हुआ था। आपके पिता मुनव्वर हुसैन नेक परहेजगार इंसान थे। ख़ामोश की शुरूआती तालीम घर व मदरसे में कुरआन मजीद से शुरू हुई। उसके बाद मदरसा चश्म-ए-रहमत ओरियंटल कॉलेज गाजीपुर से मुन्शी, फारसी, उर्दू, अव्लव दर्जे से हाईस्कूल पास किए। सन 1953 में जामिया उर्दू अलीगढ़ से अदीब-ए-माहिर और अदीब-ए-कामिल की डिग्री लेकर मदरसा चश्म-ए-रहमत में ही अध्यापन कार्य करने लगे। सन 1953-56 के बीच चश्म-ए-रहमत कॉलेज में तीन साल उर्दू के अध्यापक रहे। शादी के बाद तीन बेटे और एक बेटी के बाप बने। उन्हें बचपन से ही शायरी का शौक़ था। सन 1956 के बाद कॉलेज छोड़ने पर मुशायरों में कलाम पेश करना शुरू कर दिया। मुशायरों में मिलने वाले पारिश्रमिक को ही अपनी रोजी-रोटी का ज़रिया बना लिया। उन्होंने अपनी शायरी का उस्ताद शुरू में अबुल गौस ग़ा़जीपुरी को बनाया। उनके वफ़ात के बाद सरोश मछलीशहरी के शागिर्द हो गए। जब वे मुशायरों में दाखिल हुए तो वह 

साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, फैज अहमद फैज, कैफी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी का दौर था, उस समय उन्होंने इन सबसे अलग ख़ास पहचान बनाई। अपनी बेहतरीन ग़ज़लों और शानदार तरंनुम की वजह से वे मुशायरों का धड़कन कहलाने लगे। वे जब जब मुशायरों के मंच पर आकर ग़ज़लें पढ़ना शुरू करते तो महफिल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठतीं। मुशायरों में इतने अधिक मक़बूल हो गए कि महीनों सफ़र में रहते। 
मुगल-ए-आज़म फिल्म में एक गीत है- 
हमें काश  तुम से  मुहब्बत  न होती,   कहानी  हमारी  हक़ी़कत  न  होती। 
न दिल तुम को देते न मजबूर होते, न दुनियां  न दुनियां के  दस्तूर  होते 
क़यामत से पहले क़यामत न होती।
यह गीत फिल्म के शकील बदायूंनी के नाम से है। जबकि इसके असली शायर ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की है जो मशहूर शमा पत्रिका के सितंबर 1951 में छपी थी। तब शायर शकील बदायूंनी ख़ामोश के दोस्त वकील इशरत जाफरी, भूरे बाबू, मौलवी फैयाज सिद्दीक़ी, चश्म-ए-रहमत के उस्ताद ख़लिश ग़ाज़ीपुरी ने ख़ामोश के लाख मना करने के बावजूद एक नोटिस रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेज दी। तुरंत शकील साहब ने मुंबई से दो अपने आदमियों को भेजा। जो ख़ामोश साहब से आकर मिले और एक बन्द लिफाफा दिया। उसमे अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए लिखा कि मेरी इज़्ज़त चाहे तो उछाल दो या बदनामी से बचा लो, अब आपके हाथ में है। उस बन्द लिफाफे में बदायूंनी साहब ने 3500 रुपये भेजे थे। 49 वर्ष की उम्र में 11 अक्टूबर सन 1981 को इस दुनियां-ए-फानी को अलविदा कह गये।खामोश की आखि़री आरामगाह गाजीपुर स्थित इमामबाड़ा कब्रिस्तान में है। सन 1985 में ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की ग़ज़ल संग्रह ‘नवा-ए-खामोश’ उनके सहयोगी साथी ख़लिश ग़ाज़ीपुरी, मंजर भोपाली वगैरह बड़े शायरों द्वारा स्थापित संस्था ‘बज़्म-ए-ख़ामोश’ के मेम्बरान के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुआ। उनका यह शेर शायरी की दुनिया में बेहद मक़बूल है। 
             मैं वो सूरज हूं न डूबेगी कभी जिसकी किरन,
             रात  होगी  तो  सितारों  में  बिखर  जाउंगा।
(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2020 अंक में प्रकाशित )





शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

‘पहले से भी दीन दशा में हैं होरी, धनिया और हल्कू’

प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर गुफ़्तगू का वेबिनार
प्रयागराज। गुफ़्तगू की ओर से 30 जुलाई की शाम मुंशी प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर वेबिनार का आयोजन किया गया, वेबिनार का विषय था ‘प्रेमचंद की कहानियां के पात्र आज कितने प्रासंगिक’। मशहूर कथाकार ममता कालिया ने कहा कि किसे पता था कि प्रेमचंद के होरी धनिया और हल्कू आज पहले से भी दीन दशा में हमारे समाज में दिखाई देंगे। कम से कम तब वे जीवित तो थे। आज बेचारे पेड़ों पर लटके हुए हैं खुदकुशी करने को मजबूर हैं।
मशहूर साहित्यकार नासिरा शर्मा ने कहा कि मुंशी प्रेमचद्र की कहानियों और उनके उपन्यास पर सवाल करना तब वाजिब बनता है जब हिंदुस्तान मंे हर वर्ग ने करवट बदल ली हो, और उसका मुखड़ा बदल गया हो। कहने का मतलब ही कि ऊपरी पहनावा तो लोगो का बदल गया है, अब हाथों में मोबाइल आ गया है, फैशनबल कपडे भी लोगो ने पहन लिये हैं। दिखावे के बाज़ार ने घर भी सजा दिये है। अब तो निम्न से निम्न वर्ग भी मैगी खाता है, मतलब, जिस बात को प्रेमचंद ने इंगित किया है वो इंसान की प्रवृत्ति नहीं बदली है, और न ही हालात बदले हंै। इसलिये मुझे तअज्जुब होता है, जब लोगो से कहते सुनती हूं कि आज के दौर में प्रेमचंद जी की कहानियां प्रासंगिक नही है। तो मैं आश्चर्य के साथ सोचती हूं कि वो कहानी या उपन्यास में किस चीज़ को देखकर ऐसी बात करते हैं। ऊपरी दिखावे को, प्रवृतियों को, हालात को या लापरवाहियों को। करप्शन मौजूद है, किसान पहले आत्महत्या नहीं करते थे अब कर रहे हैं, और अब तो डॉक्टर, पत्रकार भी सुसाइड कर रहे हैं। वजह क्या है? मेरे ख्याल से अगर प्रेमचंद जी होते वे इसके बारे में भी लिखते। हिंदुस्तान के मौजूदा हालात पर परत दर परत नीचे जाकर उसमें हमेशा प्रेमचंद सांसे लेंगे। इसलिए मैं प्रेमचंद के अदब को बहुत ही ज़्यादा इज़्ज़त से देखती हूं। उन्होंने ने अपने समय के नब्ज़ को बहुत ही संवेदनशील अंदाज़ से अपनी अंगुलियों को रख कलम चलाया है। मुझे आज खुशी है कि उनके लिये आज मै कुछ कह रही हूं, क्योकि हमेशा उनकी कहानियां मेरे लिये बहुत ज़्यादा राह को रोशन करने वाली हुई है। मैं हमेशा कहती हूं कि मेरा नज़रिया बदला है, अगर मैं बूढ़ी काकी न पढ़ती तो मेरा नजरिया क्या था बचपन में। बहरहाल मुझे एक नई रोशनी मिली कि बुजुर्गों के साथ क्या और कैसा बर्ताव होना चाहिए। बडे घर की बेटी पढ़ी तो लगा कि सब चीज़ों के बाद भी घर नहीं टूटना चाहिये, और आज के संदर्भ में कहूंगी की रिश्ते नहीं टूटने चाहिए। ईदगाह पढ़ के भी अनुभव हुआ कि संवेदना कहां हंै गहरी। एक बच्चा है, जो रोज दादी का हाथ जलता देखता है।दूसरों के घरों में चिमटा देखता है। तो ये तीन मेरी पसंदीदा कहानियां हैं। अगर हम हिंदुस्तान के इंटेरीरयर में जाएं तो उनकी कहानियों के पात्र जिन्दा मिलेंगे। बड़े घर की बेटी में रिश्तो के संजोने की तथा छोटे मोटे झगड़े सुलझाई या दिखलायी गयी है वो बडे पैमाने पर भी दिखाई पड़ती है। जो विश्व स्तर पर हो रहा है क्योंकि वो घर से शुरू होकर विश्व स्तर तक ले जाता है। देखिए, जहां संवाद होना चाहिए वहां लड़ाइयां हो रही हैं जो बात वेबिनार से तय हो सकती है। वहां हथियार के इस्तेमाल हो रहा है। तो कहानियां कई तरीके से अपने को खोलती है। वो ज़मीनी बात करती है ऐसी सोच देती हैं, यहां तक कि विश्व स्तर की परेशानियो मे भी जाकर मिल जाती है। और प्रासंगिक है। इसलिए प्रेमचंद को हर काल मे पढ़ने और समझने की ज़रुरत होगी और नए तरीके से होगी
मशहूरश की मौजूदा हालात में मुंशी प्रेमचंद के किरदारों को लौटने में पचास शायर मुनव्वर राना के मुताबिक दे साल से अधिक लग जाएंगे, देश का माहौल नफ़रत से भरा हुआ बना दिया गया है। ऐसे में वे पात्र फिर से नहीं लौटने वाले। प्रेमचंद के गरीब, मजदूर, लाचार पात्र भी उनकी कहानियों में बादशाह की तरह मुख्य किरदार में होते थे, जिनका आज के समाज में लौटना लगभग नामुमकिन है।
फिल्म संवाद लेखक संजय मासूम ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियां और उनके सारे पात्र आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने वे अपने रचना समय में थे। वक़्त बदलने के साथ बदलाव तो बहुत हुए हैं, लेकिन जो ज़मीनी लेवल पर हर क्षेत्र में बदलाव होना चाहिए, वो नहीं हुआ है। किसानों की हालत बहुत ज्यादा वैसी है, मजदूरों की भी वैसी ही है। गांव में आप चले जाइए, तो जो व्यवस्थाएं हैं, जाति को लेकर, रुतबे को लेकर, वो ऑलमोस्ट लगभग वैसी ही हैं। कहने को तो कागज़ों पर काफी कुछ हुआ है, लेकिन स्थितियां कुल मिलाकर वैसी ही हैं। तो मुझे लगता है कि प्रेमचंद के सारे पात्र आज भी बहुत प्रासंगिक हैं। मेरा मानना है कि अमर रचनाकार जो भी होता है, वह समय से परे होता है।
इम्तियाज अहमद गाजी ने कहा कि प्रेमचंद के पात्र आज भी समाज में हमारे सामने खड़े हैं, उनकी समस्याएं कम होने के बजाए दिनो-दिन बढ़ती जा रही हैं। जिन लोगों की जिम्मेदारी इनकी समस्याएं कम करने की है, वे लोग उनकी समस्याओं में इज़ाफ़ा कर रहे हैं, यह हमारे लिए बहुत ही दुखदायी है।
मासूम रज़ा राशदी के मुताबिक पूस की रात का बेचैन हल्कू हर गांव में आज भी अनिद्रा का शिकार है। हर ईदगाह में अपनी बूढ़ी दादी के लिए चिमटा खरीदता हामिद आज भी नज़र आता है, अपने किसी संबंधी की लाश सड़क किनारे डाल कर कफन के नाम पर चंदा उगाहते घीसू और माधव हम सब ने कभी न कभी अवश्य देखे हैं। आप को झूट बोलना पड़ेगा यदि आप ये कहें कि आपने सद्गति प्राप्त किसी दुखी चमार को कभी नहीं देखा और बेटों वाली विधवा फूलमति किस घर में नहीं है आज? ईमानदारी से दिल पर हाथ रखिए और खुद से पूछिये, ये तो कुछ बानगी भर है। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का हर चरित्र मानव समाज के हर काल खंड में जीवित और प्रासंगिक है और रहेगा।
वरिष्ठ रंगकर्मी ऋतंधरा मिश्रा ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद एक ऐसे कालजयी कहानीकार व नाटककार हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी के कौशल से अनेक कहानियों व नाटकों की रचना की। इन रचनाओं ने जनमानस को आंदोलित करने के साथ-साथ समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व भी किया। जहां तक वर्तमान समय की बात है, उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज के शोषित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई देते हैं। प्रेमचंद का साहित्य अपने समय, समाज और परिस्थितियों से गहरा जुड़ा हुआ है। जहां कफन में वे धार्मिक परंपराओं व गरीबी को निशाना बनाते हैं। रंगभूमि में औद्योगिकीकरण की समस्या को बखूबी दर्शाते हैं। गरीबी और शोषण का जीवंत चित्रण सवा सेर गेंहू और पूस की रात में किया गया है। मंत्र कहानी के द्वारा भी उन्होंने एक आम आदमी की मानसिकता को बहुत अच्छी तरह दर्शाया है जो अपने साथ बुरा होते हुए भी दूसरों का भला चाहता है। कर्मभूमि में उन्होंने राजनीतिक विकृतियों के साथ साथ सामाजिक रूढ़ियों और परंपराओं के विरोध के संघर्ष को भी दिखाया है।
शगुफ्ता रहमान ‘सोना’ ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनकी रचनाओं के बिना हिंदी साहित्य में साहित्य की चर्चा करना अधूरा प्रतीत होता है। आज भी उनकी कहानियों के पात्र समाज के प्रत्येक वर्ग, अमीर-गरीब, धर्म, ऊंच-नीच, भ्रष्टाचार आदि पर प्रहार करते हैं। ‘पंच परमेश्वर’ में जुम्मन शेख और अलगू चैधरी का किरदार अनुकरणीय है। ‘ईदगाह’ में गरीबी के कारण हामिद का चिमटा खरीद कर लाना मन को झकझोर देने वाला है। ‘नमक का दरोगा’, ‘पूस की रात’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘गुल्ली डंडा’ आदि कहानियों के पात्र समाज को आईना दिखाते हैं। कहानियों के पाश्चात्य विधा को जानते हुए भी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में मूल रूप से अपने परिवेश से जुड़े पात्रों के माध्यम से अन्ध परंपराओं पर चोट कर मानवीय मूल्यों को समाज के समक्ष आदर्श रुप प्रस्तुत किए हैं। जो भारतीय समाज के लिए अनुकरणीय है। डाॅ. नीलिमा मिश्रा ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद की कहानियां सिर्फ़ मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि यथार्थ के धरातल पर दार्शनिकता और भावनात्मक लक्ष्य को लेकर लिखी गयी हैं, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी वह अपने काल में थीं, जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था। प्रेमचंद ने जीवन की कठोर वास्तविकता, गरीबी, सामाजिक भेदभाव, अंध-संस्कार, धार्मिक ढोंग, जातिवाद, नारियों की दयनीय दशा, न्याय का अभाव, घूसखोरी, राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक रूढ़िवादिता, अशिक्षा, कुटिल राजनीतिक कुचक्र जैसे तमाम विषयों को कहानी का विषय बनाया और अपनी शैल्पिक विशेषताओं, भाषा की गंभीरता, सशक्त संवाद, प्रवाहमयी शैली, चरित्र चित्रण से कहानियों को अद्वितीय बना दिया। उनकी कहानियों को पढ़ते समय कथा के पात्र स्वयं पाठक के मन पर ऐसा गहरा असर छोड़ते हैं कि लगता है कि वह स्वयं उस कहानी का पात्र हो गया हो। जो दिल और दिमाग दोनों पर अपनी अमिट थाप छोड़ती हैं।
अर्चना जायसवाल सरताज के मुताबिक हिदी साहित्य जगत मुंशी प्रेमचंद के बिना अधूरा है, समाज के हरेक वर्ग का ऐसा सटीक व सारगर्भित चित्रण मुंशी जी ने अपनी रचनाओं में किया है कि आज भले ही प्रेमचंद जी हमारे बीच में नहीं, मगर उनकी कथाओं के सभी पात्र मूल रूप में मौजूद हैं। साथ ही कहानियों का मूल भाव भी उसी रूप में आज भी प्रासंगिक व स्वीकार्य है। मुंशी जी की शब्द-भाषा इतनी सरल व सुग्राह्य है कि पाठक चाहे कम से कम पढ़ा हो या विद्वान से विद्वान हो पढ़ते वक्त तल्लीन व भावुक होकर एक-एक शब्द को पी जाना चाहता है। कई बार पढने के बाद भी इनकी रचनाओं को बार-बार पढ़ने का जी चाहता है। शायद इसलिय की इनकी हर बात आज के समय नमे भी प्रासंगिक लगती हैं।
दयाशंकर प्रसाद ने कहा कि ‘पूस की रात’ के पात्र हल्कू की तरह से ही किसान मजबूर होकर आज मजदूर बन गए हैं। ‘आधार’ कहानी की विधवा पात्र अनूपा भारतीय समाज में व्याप्त अनमेल विवाह पर प्रहार करती हुई आदर्श की स्थापना करती है ‘नमक का दरोगा’ के पात्र बंशीधर जैसा ईमानदार दरोगा के सामने पंडित अलोपीदीन जैसे प्रतिष्ठित जमींदार भी झुकने को मजबूर हो गए। प्रेमचंद की विभिन्न कहानियों के पात्र आज भी समाज में किसी न किसी रूप में सजीव परिलक्षित होते हैं। प्रभाशंकर शर्मा ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद के पात्र मानवीय मूल्यों का उजला पक्ष हैं और उनके पात्र सिर्फ कल्पना मात्र नहीं हैं बल्कि वह सामाजिक बुराइयों पर पूरा प्रहार करते नज़र आते हैं। यही वजह है कि आज भी मुंशी प्रेमचंद के पात्रों को भुलाया नहीं जा सकता। चाहे वह धनिया हो या बुधिया, होरी या ईदगाह का हमीद। मुंशी प्रेमचंद के पात्र जरा भी बनावटी नहीं बल्कि परिवेश से लिए गए पात्र थे वह इस तरह कहानियों व उपन्यास में उभर कर सामने आते थे। जैसे हम पाठक स्वयं में उस चरित्र को महसूस कर रहे हों। प्रेमचंद ने अपने पात्रों में पूरा मनोवैज्ञानिक पहलू उजागर किया है पात्र के हिसाब से ही उनकी भाषा का चयन और परिदृश्य होता था। डाॅ. ममता सरुनाथ ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियों के पात्र अगर हम नज़र घुमा कर देखें तो आज भी हमारे इर्द-गिर्द दिखाई पड़ जाते हैं। कितनी ही स्त्रियां आज भी निर्मला की तरह जीवन जीने को मजबूर हैं। कितने ही हल्कू होरी और धनिया आज भी अपनी लाचारी और बेचारगी भरे जीवन जीने पर मजबूर हैं। कुछ तो ऐसे हैं, जो हालात का सामना न कर पाने की स्थिति में आत्महत्या तक के कदम उठा लेते हैं। प्रेमचंद ने जो प्रयास किया अपने साहित्य के माध्यम से समाज को एक नया दृष्टिकोण देने का समाज को बदलने की कोशिश की शायद आज के लेखकों को भी ऐसे प्रयास करने की आवश्यकता है ।
इसरार अहमद के मुताबिक मुंशी प्रेमचंद की कहानियां आज के आधुनिक दौर के सभ्य समाज को आईना दिखाने का कार्य करती हैं। इनके कहानियों के पात्र आज के समाज के जीवंत पात्रों पर सटीक प्रहार करते हुए नज़र आते हैं। आज के दौर की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं में सामंतवादी सोच वाली पात्रों का इस समाज के दबे कुचले एवं वंचित समाज के प्रति किए जाने वाले व्यवहार एवं कार्य अंग्रेजों के द्वारा किए गए गणित कार्यों की याद दिलाते हैं। पूस की एक रात नामक कहानी में हल्कू का अपने कुत्ते जबरा के साथ पूस की ठंडी रात्रि में एक साथ सोना उस समय की गरीबी को दिखा रहा था, जो आज भी ऐसे बहुत से इस समाज में हल्कू मौजूद हैं। जिनकी तरफ आज के नेताओं की या सभ्य समाज के बुद्धिजीवियों की कोई नज़र नहीं जाती है। नमक के दरोगा में उस समय इंस्पेक्टर द्वारा नमक पर खुश खाना उस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर कर रहा था जो आज के दौर में पुलिस एवं संबंधित विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करता है। वास्तव में कहानियों में प्रयुक्त पात्र आज के दबे कुचले समाज एवं वंचित समाज के लोगों की वास्तविक स्थिति को उजागर करते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट कराती हैं की आज के दौर की सावंतवादी शक्तियां किस प्रकार से दबे कुचले एवं पंचित परिवार का शोषण कर रहे हैं।
रचना सक्सेना ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद ऐसे साहित्य साधक थे जिन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों के पात्रों के माध्यम से जहां एक ओर अंध परम्पराओं पर चोट की, वहीं सहज मानवीय संभावनाओं और मूल्यों को भी खोजने का प्रयास किया। इसी वजह से उनकी कहानियां व उपन्यास हिन्दी साहित्य की अमर रचनाओं व कृतियों के रुप में अमिट धरोहर बन गयी। उनकी कहानियों को जब हम आज के परिप्रेक्ष्य में देखते है तो भी उनके चरित्र आज भी अपने इर्द-गिर्द किसी न किसी रुप में मिल जाते हैं। निर्मला के रुप में आज भी भारतीय नारी अपनी परिस्थितियों सें और अनेक विकट समस्याओं से जूझती हुई दिख जाऐगी। अतः इस दृष्टि से उनके कहानियों और उपन्यासों के चरित्र आज भी पूर्णतया प्रासंगिक हैं।

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

सोशल मीडिया शायरी नहीं सिखा सकता : मुनव्वर राना

मुनव्वर राना से बात करते अनिल मानव
मुनव्वर राना एक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित शायर है, इन्होंने शायरी को एक नया मोड़ और मुकाम दिया है। भाषा-शैली और कहन की ताज़गी सहजता, सरलता की वजह से राना साहब हर दिल अज़ीज़ है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुशायरों में आपका होना क़ामयाबी की अलामत है। पुरानी पीढ़ी के साथ नयी पीढ़ी में भी आपकी शायरी की धमक सिर चढ़कर बोलती है। कहा जाता है कि मुनव्वर राना ग़ज़ल को महबूब-महबूबा और कोठे से उठाकर ‘मां’ तक लाये हैं। आपने ‘मां’ पर इतनी अच्छी शायरी की है कि इस विषय पर लिखना अब जैसे जूठन सा जान पड़ता है। 
 उनका जन्म 26 नवम्बर 1952 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में हुआ है। आपकी शुरूआती शिक्षा-दीक्षा कोलकाता में हुई। वर्तमान में आप लखनऊ में रहकर अदब की सेवा में लगे हुए हैं। मुनव्वर राना के पारिवारिक सदस्य और बहुत से रिश्तेदार भारत-पाक विभाजन के वक़्त पाकिस्तान चले गए, लेकिन साम्प्रदायिक तनाव के बावजूद मुनव्वर राना के पिता ने अपने वतन में रहने को ही अपना कर्तव्य समझा। आपने ग़ज़लों के साथ संस्मरण और आत्मकथा भी लिखी है। इनकी लेखन की लोकप्रियता के कारण उनकी रचनाओं का अनुवाद कई अन्य भाषाओं में भी हुआ है। इनकी पुस्तक ‘शाहदाबा’ के लि वर्ष 2014 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से नवाज गया था। इनकी अब तक एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें ‘मां’, ‘ग़ज़ल गांव’, ‘पीपल छांव’, ‘बदन सराय’, ‘नीम के फूल’, ‘सब उसके लिए’, ‘घर अकेला हो गया’, ‘कहो जिल्ले इलाही से’, ‘बग़ैर नक़्शे का मकान’, ‘फिर कबीर’, ‘नये मौसम के फूल’, ‘मुहाज़िरनामा’ आदि प्रमुख हैं। 08 दिसंबर 2019 को टीम गुफ़्तगू उनसे उनके लखनऊ स्थित आवास पर मिलने पहुंची। अनिल मानव ने उनसे बातचीत की। प्रतुस्त है उस बातचीत के प्रमुख अंश-
सवाल: गुफ़्तगू की 17 वर्ष की यात्रा को किस रूप में देखते हैं ?
जवाब: गुफ़्तगू का सबसे बड़ा कमाल यह है कि उसने नये लोगों का परिचय कराया और सिर्फ़ यहीं नहीं बल्कि पुराने लोगों को हमेशा सम्मान भी दिया। चाहे वे संरक्षक कमेटी हो, चाहे एडवाइजरी बोर्ड हो, चाहे उसके लेखन हों, चाहे वो जीवित हों या न हों, सबको याद रखना, सबको साथ लेकर चलना आदि। ये इसका बहुत बड़ा कमाल है। आमतौर पर जो पत्रिकाएं है, उर्दू में हों या हिन्दी में, वो हमारे जो पूर्वज है वो उनको भूल जाती हैं। शायरी हो चाहे गद्य हो केवल नये लोगों को भर लेते हैं। पुराने लोगों को लेने से एक बड़ा कमाल ये होता है कि मीर ने क्या कहा, ग़ालिब, दाग़ और अकबर ने क्या कहा और इसके बाद नये लोग क्या कह रहे हैं इसका पता चलता है। इससे एक फ़ायदा यह होता है कि जो नये लोग कह रहे हैं, उनको ये मालूम हो जाता है कि हमारे पूर्वज लोग ये कह कर गए हैं। सोशल मीडिया वो आईना है जिसमें आदमी सिर्फ़ अपने का देखता है और खुश रहता है। इसमें तो लाइक, लाइक, लाइक...। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो सिर्फ़ लाइक लगा देते हैं। उनको पता भी नहीं होता कि इसमें लिखा क्या है। लेकिन गुफ़्तगू एक ऐसा आईना है जिसमें हम अपने माज़ी को भी देख सकते हैं, गुज़रे हुए दिन और गुज़रे हुए साहित्य को भी देख सकते हैं।

सवाल: वर्तमान समय में आप साहित्यिक पत्रिकाओं को किस रूप में देखते हैं ?
जवाब: देखिए, पत्रिकाओं का बहुत बुरा वक़्त चल रहा है। अब ये तय करना मुश्किल है कि 10-15 साल बाद कितनी पत्रिकाएं जिन्दा कर पायेंगी । पहले ही पढ़ने लिखने का चलन कम होता गया था, इसलिए कि भागदौड़ और सफ़र की ज़िन्दगी में समय कम मिल पाता है। पहले होता क्या क्या था कि शहर छोटा होता था। उसी में लोग घूम-फिर के रहते थे। अब लोग दूर-दूर रहते हैं कि उनके पास वक़्त नहीं है कि वे साहित्यिक गतिविधियों में शामिल हो सकें। ये भी देखते हैं कि अगर वक़्त ज़्यादा हो गया, जैसे हमें नक्ख़ास कोना, इलाहाबाद से बम्हरौली जाना है और गाड़ी छूट गयी तो टैक्सी करके जाना होगा, जिसमें 200 रुपये तक खर्च होंगे। पहले ऐसा नहीं था। पहले करीब होता था सब, यहां-वहां हर जगह। उसका एक नुकसान हुआ, जैसे हमने बहुत शहरों में देखा था। पटना में बहुत साहित्यिक गतिविधियां थीं। छोटा शहर था, सब पास-पास रहते थे। अब इतनी दूर-दूर काॅलोनियां बन गयी हैं कि लोग घड़ी देखते हैं कि हमें गाड़ी नहीं मिलेगी, तो इसका नुकसान हुआ। पहले साथ बैठते थे तो चर्चा होती थी कि लोग ये हंस पत्रिका, गुफ़्तगू पत्रिका है हसमें ये लेख छपा है वो लेख छपा है, तो दूसरे आदमी को भी होता था कि पत्रिका खरीदे। लेकिन अब वो पत्रिका जहां बिकती है वो उससे दूर रहता है। अब ज़माना वो आ गया है कि आप झूठ-मूठ एक कार कम्पनी का फोन लगा दीजिए कि हमें कार खरीदना है तो चार कार कम्पनी आ जाती हैं गाड़ी लेकर कि आप देख लीजिए जो लेना चाहते हैं। पत्रिका के लिए हम इंतज़ार करते हैं कि हम छाप करके बैठें हैं दुकान में और जलेबी है लोग ले जाएंगे। ऐसा नहीं होता, इसके लिए भी रास्ता होना चाहिए। जैसे हाॅकर है या कोई सिस्टम होना चाहिए कि हम अभी कोई भी किताब खरीद सकते हैं। कोई पत्रिका हिन्दी या उर्दू की जाए तो हम उसको ले सकते हैं। लेकिन ये पाॅसिबल नहीं है कि एक गोमती नगर का आदमी अमीनाबाद खरीदने आये पत्रिका और वो न मिले इसके बाद वो फिर लौट आए। मालूम 10 रुपये की पत्रिका और उसका 150 रुपये खर्च हो जाए तो इसकी एक सहूलत होनी चाहिए।

मुनव्वर राना के आवास पर: बाएं से- मुनव्वर राना, अफ़सर जमाल, इश्क़ सुल्तानपुरी और अनिल मानव

सवाल: आने वाले समय में ग़ज़ल का क्या भविष्य देखते हैं ?
जवाब: ग़ज़ल का जो फ्यूचर है, आप यूं कह लें कि हर ज़माने में उलट-पुलट के ठीक हो जाती है। एक ज़माना आता है हो सकता है बहुत लोगों ने नहीं देखा होगा। बरसात में एक लाल रंग का कीड़ा निकलता है उसे कहते हैं ‘लिल्ली घोड़ी’। तो लोग कहते हैं साहब, ये ग़ज़ल नहीं है बस लिल्ली घोड़ी बिठा दीजिए यानी दो मिसरे लिख दिये गये। तो आप समझिए ग़ज़ल लिखना बहुत मुश्किल काम है, बाबा रामदेव का च्यवनप्राश एक कैप्सूल में भरना है। लेकिन लोग इसको आसान समझते हैं। जो लोग कविता कहते हैं, वो समझते हैं कि ग़ज़ल लिखना बहुत आसान काम है, इसे कोई भी कर लेगा। ग़ज़ल कहना बहुत मुश्किल काम है। अच्छी ग़ज़ल या बुरी ग़ज़ल का फैसला तो पचास साल बाद होता है। ऐसा नहीं है कि वन-डे मैच है और शाम को रिजल्ट मालूम हो गया। लेकिन जो हमाने नए लिखने वाले आए हैं उनके यहां एक ये सबसे बड़ी ख़राबी ये है कि उस्तादी-शार्गिदी के चलन का अनुसरण नहीं कर रहे हैं। उसमें ये था कि उस्ताद जो होता था वो बिल्कुल जैसे बहु खाना पकाती थी तो सास उसमें नमक डाल देती थी और यही तमीज़ सीखाती थी कि नमक कितना होना चाहिए। अंगीठी से चैला बाहर निकाल देती थी कि आंच कितनी होनी चाहिए। तो उस्ताद का काम यही होता था। बाकी शब्दावली, थाॅट्स, भावनाएं आपकी हुआ करती थी। उस्ताद सिर्फ़ इतना करता था कि ये शब्द यहां पर अच्छा नहीं इसे सही कर लो।

सवाल: क्या आज के दौर में ग़ज़ल के अच्छे उस्ताद मिल पाते हैं ?
जवाब: उस्ताद आजकल बहुत कम हो गए लेकिन जितना सम्मान मिलना चाहिए उतना भी तो आजकल नहीं मिलता, तो फिर क्यों कोई उस्ताद बने। ज़माना ऐसा आ गया है कि जिसको आप सिखाते हैं वो जिस दिन दस ग़ज़लें कह लेता है उस दिन स्टेज पर आपके सामने सिगरेट पीकर धुआं मारता है। और फूंकते हुए कहता है और उस्ताद क्या हाल है ? जिस परम्परा के हम लोग हैं कि एकलव्य ने अंगूठा काटकर दे दिया। ये लोककथा हो, सच हो, नहीं हो, लेकिन ये है कि अच्छा लगता है। हमारे यहां पर एक तरीका था कि जब मां कसम दे देती थी कि तुझे हमारे दूध की कसम है तो जो है वो जान कुर्बान कर देता था। अब कैसे मां कसम देगी, वो तो ‘नेस्ले’ का दूध पिलाती है। उसी तरह से जब आप उस्ताद अच्छा नहीं चुनते हैं तो या उस्ताद को वो दर्ज़ा नहीं देते तो ठीक नहीं है। जैसे कहा जाता है कि पहले जो नया शायर आता था तो वो दस साल लगभग गिलास धोता था। पीने की तो इज़ाज़त ही नहीं थी।

सवाल: नई पीढ़ी के ग़ज़लकारों के लिए आप क्या कहना चाहते हैं ?
जवाब: जो नए ग़ज़लकार हैं, उनको एक चीज़ का ध्यान रखना चाहिए कि आपके जो सीनियर्स हैं उनक इज़्ज़त कीजिए। उनसे सीखने की कोशिश कीजिए। अगर आप ऐसा करते हैं तो इसमें आपको नुकसान कुछ नहीं होना वाला। दूसरी बात आप जितना पढ़ सकते हैं  उतना अधिक पढ़ें। सोशल मीडिया आपको शायरी नहीं सिखा सकता। गूगल आपको ये नहीं बता सकता है कि किस दिन आपको मरना है। जिस दिन गूगल आपको ये बता देगा कि आपको मरना किस दिन है उस दिन दुनिया खत्म हो जाएगी। उसी तरह शायरी में आपको ये कोई नहीं बता सकता कि निराला कौन बनेगा, बच्चन कौन बनेगा, महादेवी वर्मा कौन बनेगी, ग़ालिब, फ़िराक़ कौन बनेगा, कुछ नहीं मालूम। सब एक दौड़ में हैं। जिसका नसीब अच्छा होता है, जिसने खि़दमत की होती है, जिसने बुजुर्गों से सोहबतें की होती हैं, अल्लाह नवाजता है। ग़ज़ल हिन्दी या उर्दू नहीं होती है, न ग़ज़ल हिन्दू-मुलसलमान होती है। ग़ज़ल में सिर्फ़ लिखा जाता है कि ये ग़ज़ल है।

सवाल: गुफ़्तगू के ‘रक्षक विशेषांक’ को आप किस रूप में देखते हैं?

मुनव्वर राना: गुफ्तगू यक़ीनन एक बड़ा काम कर रही है। क्योंकि वो लोग, जो अपनी पूरी जिं़दगी देश और देशवासियों के रक्षा में गुजार देते हैं, उनकी शायरी या उनकी कहानियां पढ़ने से एक अजब तरह का एहसास होता है। जैसे चमन में कुछ फूल ऐसे होते हैं, जिनकी की खुशबू सबसे अलग और अच्छी होती है। जीवन में इतनी कठिनाइयों, मुसीबतों, चैलेंज, दुख और मुकाबले में शामिल रहने के बाद भी अपने कवि हृदय को जिंदा रखना खुद एक कविता है। मैं इम्तियाज गाजी और उनकी पूरी टीम को मुबारकबाद देता हूं, कि इस अंक के बाद अभी वो ख़ामोश नहीं बैठेंगे, बल्कि कोशिश करके और भी एकाध अंक निकालेंगे, ताकि यह सामग्री महफूज हो जाए। जो जीवित हैं या नहीं है, उनको मुबारकबाद देने का इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

लोग अपनी प्यास बुझाते हैं चले जाते हैं

 
                                                                        - मुनव्वर राना
 
मुनव्वर राना
                             
 इलाहाबाद की मिट्टी ज़रख़ेज़ हो या न हो लेकिन इस शहर के मिज़ाज में मुरव्वत और मिट्टी में इल्म व अदब का ख़मीर शामिल है। सियासी बाज़ीगर शाह को पिटवाते रहें लेकिन इल्म की देवी सरस्वती अपनी मंदिर में सियासी मुजरे की इज़ाज़त कभी नहीं दे सकती। आती-जाती सरकारें नए सिरे से इस शहर की हदबंदी करती रहें, इस शहर के जुगराफिये की कितनी ही कांट-छांट की जाए लेकिन जब तक्सीमे मुल्क के बाद भी अदब की तारीख़ इब्ने सफ़ी इलाहाबाद के ही रहे तो फिर दुनिया की कोई ताक़त ‘नूह’ नारवी को इस शहर से अलग नहीं कर सकती। शहरों का जुग़राफ़िया तो सैलाब का पानी भी बदल देता है लेकिन तारीख़ तो किताबों के समंदर और दिलों के निहाख़ानों में हमेशा महफूज रहती है। इस गंगा-जमनी तहज़ीब वाले शहर से अगर अकबर इलाहाबादी, निराला, फ़िराक़ गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, सुमित्रा नंदन पंत और राज़ इलाहाबादी को अलग कर दें तो अदब बेवा की सूनी कलाइयों जैसा होकर हर जाएगा। अदब से हिन्दी, उर्दू या किसी भी ज़बान को अलग करना बिल्कुल ऐसा ही है जैसे किसी घने और छायादार पेड़ पर सिर्फ़ एक तरह की चिड़िया को बसेरे की इज़ाज़त दी जाए। अदब रखैल की की तरह नहीं होता कि जिसके जिस्म और सांसों पर शहर के किसी एक रईस का कब्जा बरक़रार रहता है बल्कि अदब तो उस मुक़द्दस मां की तरह है होता है जिसकी छाती से उबलता हुआ दूध मसलक और मज़हब की क़ैद से आज़ाद कर नन्हें बच्चे के प्यासे होंठों तक पहुंचने क लिए बेताब रहता है। अज़ीम होती हैं वो माएं जो अपनी छातियां किसी फ़िरके, किसी मज़हब के नवज़ाइदा बच्चे के हलक़ में उंडेल देती है। अदब को ज़बान की बुनियाद पर तक़सीम करने वाले दहशतगर्त तो हो सकते हैं लेकिन शायर और अदीब हरगिज नहीं हो सकते, क्योंकि दुनिया की किसी भी ज़बान में शायर को शायर और दहशतर्गत को दहशतगर्त ही कहा जाता है। मोहतात सियासतदां पंडित नेहरू से लेकर बेनियाज़ी की तस्वीर माहिर इलाहाबादी तक इस शहर के ऐसे रोशन सितारे हैं जिन्होने इस शहर का सिर बुलंद रखने के लिए सांसों की सारी पंूजी दयारे ग़ैर में खर्च कर दी, इस शहरे तबस्सुम से मुस्कुराते हुए रुख़्सत हुए और वापस हुए तो अर्थी, मय्यत और कलश की शक्ल में आये।
               लाश तक घर को न पहुंची ऐसा मक़तल भा गया,
               हमने सोचा था कि कुछ सांसें बचा ले जायेंगे।
इस शहर में आईने हमेशा कम फरोख़्त होते हैं क्योंकि यहां हर चेहरा आईना सिफ़त रहा है। जहां आंखें बोलती और बात करती हैं। हालांकि इसी शहर में त्रिवेणी ग्लास जैसी कंपनी मौजूद है जो सारे एशिया को आईना साज़ी का हुनर और चेहरे को खूबसूरत दिखाने के आदाब सिखाती है। हिमालय की आग़ोश से निकली हुई गंगा और जमुना एक दूसरे से बेनियाज़ होकर हज़ारों मील तक बहती रही लेकिन इलाहाबाद पहुंचते ही दोनों एक दूसरे में इस तरह मुदग़म हो गयीं जैसे मुद्दतों की बिछड़ी हुई बहनें एक-दूसरे से लिपट जाती हैं। गंगा और जुमना की इस हम आग़ोशी का एहतराम बंगाल की खाड़ी में बहती हुई वह हुगली नदी भी करती है जिसे दुर्गा और काली के शहर कलकत्ता का आंचल भी कहा जाता है। गंगा-जमुना की इस खुदसुपुर्दगी और हम आग़ोशी का ही करिश्मा है कि हिन्दुस्तान की हर ग्लास कंपनी इलाहाबाद की शीशा सिफ़त बालू के बग़ैर वीरान रहती है। चंदौसी से कलकत्ता और कलकत्ता से इलाहाबाद तक का सफ़र जेके अग्रवाल और उनके बुजुर्गों ने सिर्फ़ इस चमकती हुई बालू को शीशे में बदल देने के लिए ही तय किया था।
                 हमें महबूब को अपना बनाना तक नहीं आया,
                 बनाने वाले आईना बना लेते हैं पत्थर से।
मैं पूरे एतमाद से यह बात अर्ज़ कर रहा हूं कि जब तक इस शहर में गिरीश वर्मा, डीएन आर्या जैसे लोग मौजूद हैं, इस शहर का रज्जू भैया और मुरली मनोहर जोशी से कोई ख़तरा नहीं हैं क्योंकि आज तब इस शहर के दरो-दीवार से नेहरू के कलंदराना रविश, लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी, राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह की फकीराना तबीयत, हेमवंती नंदन बहुगुणा की हर दिल अज़ी़ज़ी और मुस्तफ़ा रशीद शेरवानी की इनसान दोस्ती का नूर उबल रहा है। शायद यही वजह है कि इलेक्ट्रिक सप्लाई वालों की मुस्तक़िल नाफ़रमानी के बावजूद इस शहर में हर वक़्त उजाला रहता है। उस अदबी चैपाल की रौनक कभी कम हो ही नहीं सकती जिसके इर्द-गिर्द डाॅ. रामकुमार वर्मा, मुस्तफ़ा ज़ैदी, डाॅ. जगदीश गुप्ता, मुजाविर हुसैन रिज़वी, डाॅ. हरिदेव बहरी, पंडित उदय नारायण तिवारी, हरिवंश राय बच्चन और शफ़ीक इलाहाबादी जैसे लोगों ने कहानियां बुनी हों और ग़ज़लों के फूल चुने हों। अभी इस शहर की फ़ज़ाओं में मौलाना तुफैल अहमद मदनी की बाज़गश्त महसूस होती है। अभी दायरा शाह अजमल के बुजुर्गों के कश्फ़ोकरामात से दुनिया नावाक़िफ नहीं हुई है। अभी इलाहाबाद स्टेशन पर आराम फ़रमाते हुए लाइन शाह बाबा के मज़ार पर हाज़िरी देने से पहले लोग अपनी सियासी पगड़ियों का उतार देते हैं। अभी जमुना के मुकद्दस पानी से बुजुर्गों के सज़दों की खुश्बू आती है। अभी मुकद्दस गंगा की सुनहरी लहरों से चंदन टीके की महक महसूस होती है। ऐसे इल्मी और अदबी दर्सगाह की बेअदबी इनसान तो इनसान आबो-हवा भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। कंक्रीट से बनायी हुई इमारतें उस वक़्त शर्मिंदा हो जाती हैं जब गोश्त पोस्त का इंसान अपनी जात को मिट्टी में मिलाकर उसे और भी गुलज़ार बना देता है।
                हमको इस मिट्टी में बो देंगी हमारी नस्लें,
                हम कहीं भी नहीं इस शहर से जाने वाले।
 यह अदबी चैपाल अगर कोयले को राख बनाती देख चुकी है तो हरी शाख़ों को कोयला होते हुए देखना भी इसका मुकद्दर है। इल्म की गर्मी और अदबी सरगर्मी को ज़िन्दा रखने के लिए शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी, रवींद्र कालिया, इक़बाल माहिर, सुहैल ज़ैदी, ममता कालिया, नस्र कुरैशी, सैयद अब्दुल करीम, हमीद क़ैसर, काएद हुसैन कौसर, यश मालवीय, जुल्फ़िकार सिद्दीक़ी और हमदून उस्मानी जैसे बड़े चिराग़ बरसों रौशनी लुटाते रहे। हरचंद कि वक़्त की आंधी ने उनमें से कई चिराग़ों को मुज़महिल किया और कई चिराग़ों को निगल भी गयी। आंधी कितनी ही ताक़तवर क्यों न हो उसका जोर ज़्यादा देर तक नहीं रहता लेकिन पुराने चिराग़ बुझते-बुझते भी नये चिराग़ों को अपना हुनर सौंप देते हैं। आंधी और चिराग़ की जंग जब तक दुनिया है जारी रहेगी -
                   मिलेंगे आपको हम लोग हर ज़माने में,
                   हमारे पैरों में ज़जीरे माहो साल नहीं।
आज भी शहरे इलाहाबाद के अदबी जज़्बात सर्द नहीं हुए। आज भी गंगा और जमुना की लहरों का सुरीलापन बाक़ी है। आज भी मुस्लिम हाॅस्टल की गहमा-गहमी का वही आलम है। आज भी बरकत टी स्टाल शायरों और अदीबों का मयख़ाना है। आज भी सियासत इस शहर में आंखें नीची करके चलती है। आज भी अमरूद की महक सारे शहर को दीवाना कर देतीे है। आज भी ग़ज़ल के शैदायी अपना मज़हब नहीं जानते। आज भी सुलाकी हलवाई की पूड़ी-सब्ज़ी और क़ादिर हलवाई के गाजर के हलवे के दीवनों की गिनती नहीं की जा सकती। आज भी इमाम बख़्श (जल्लाद) की चाय अपने गांव में कई बोतलों का नशा रखती है। हाईकोर्ट की पुरशिकोह इमारत जो इंसाफ और नाइंसाफी के हज़ारों वाक़ियात की चश्मदीद गवाह है, सियासी इक़तिदार और हवसे नग़मये तर ने इसे इमारत के विक़ार को भी मैला कर दिया है। आनंदभवन एक तारीख़ साज़ इमारत है, एक ज़माने तक यह मुजाहिदीने आज़ादी की सबसे बड़ी छावनी थी। इस इमारत में दाखिल होते ही हिन्दुस्तान के शरीफ़ सियासतदानों के चेहरे निगाहों के सामने घूमने लगते हैं। खुसरो बाग़ और जमुना किनारे का क़िला आज भी हिन्दुस्तानी मुग़लिया सल्तनत की सलीकेमंदी की दाद तलब करते महसूस होते हैं। सफ़ाई के एतबार से यह शहर उत्तर प्रदेश के और दूसरे तमाम शहरों के मुक़ाबिले में ग़नीमत है। मुमकिन है, क़लम कुछ और फ़रोख़दिली का सुबूत देता लेकिन पेशे नज़र ‘ग़ीबत कदा’ अदब का हेड क्वार्टर है जिसे उर्फ़े आम में सिर्फ ‘ओरियंट’ कहा जाता है। कुछ समय पहले तक इसे बहुत से लोग ग़ज़ल कदा भी कहते थे, लेकिन मेरी निगाह में यह शहर का सबसे बड़ा अदबी पड़ाव था। जिस तरह किसी ज़माने में शहर के उमरा (बड़े लोग) अपने-अपने साहबज़ादगान को तहज़ीब और आदाबे महफ़िल सीखने के लिए ‘कूचए अरबाबे निशात’ (हसीनाओं की गली) का तवाफ़ (परिक्रमा) करवाते थे उसी तरह तश्नगाने अदब (साहित्य के प्यासे) अपनी इल्मी और अदबी प्यास और दिलजले शायर व अदीब अपने दिल की भड़ास निकालने के लिए उसी तरफ़ रुख़ करते थे। देखने में तो ये दवा की दुकान है लेकिन वक़्त ज़रूरत यहां से हर महफ़िल में सुर्खरू रहने के लिए बेहतरीन कलाम की सप्लाई भी होती थी। यह ‘ग़ज़लकदा’ उबैद खान आसिफ उस्मानी जैसे ज़हीन और ख़तरनाक लोगों का हैलीपैड रहा है, अशरफ़ अली खान की कछार था। इनको इतने लोग पापा कहते हैं कि इनकी जवानी के प्रिंट आउट कश्कूक (संदिग्ध) लगते हैं। ख़्वाजा जावेद अख़्तर और हादी का ट्रेनिंग सेंटर रहा है, जद्दन भाई की नयी ख़ानकाह है जहां वह अपने आधा दर्जन पीरों के ज़रिये ज़ेहनी तौर पर बालिग़ किये जाते हैं। ग़रज़ की नैयर आक़िल (अब मरहूम) और अबरार अहमद का यह दवाख़ाना वह अदबी मीनार है जहां से पूरे शहर का नज़ारा किया जा सकता है। राज़ साहब जब भी इस दवाख़ाने में आते थे, हमेशा दुकान भरी-भरी लगती थी। जब तक जिन्दा रहे इलाहाबाद भरा-भरा लगता था। उनकी कमी मुद्दतों अदब वालों को महसूस होती रहेगी।
                  इस भीड़ में कुछ मेरी हक़ीक़त नहीं लेकिन,
                  दब जाउंगा मिट्टी में तो सब याद करेंगे।
   इलाहाबाद का मौजूदा अदबी मंज़रनामा दिलचस्प भी है और तवील भी। मेरी मालूमात महदूद है फिर भी इस शहर से इतना तवील रिश्ता है कि दूसरे लोगों के मुकाबले में मेरी तलाश और जुस्तजू की बुनियादें ज़्यादा मज़बूत होंगी। नये मंज़रनामे में जो नाम बहुत तेज़ी से उभरकर सामने आये उनमें सरे-फेहरिस्त अली अहमद फ़ातमी का नाम है। फ़ातमी ने नस्र को अपने इज़हार का ज़रिया बनाया। नैयर आक़िल, असलम इलाहाबादी, सालेहा, नदीम, इक़बाल दानिश, अहमद अबरार, अख़्तर अज़ीज़, सैयद मोहम्मद अली काज़मी(अब मरहूम), एहतराम इस्लाम, निजाम हसनपुरी, बुद्धिसेन शर्मा, दूधनाथ सिंह, कैलाश गौतम (अब मरहूम), यश मालवीय, अज़ीज़ इलाहाबादी, असरार गांधी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, रविनंदन सिंह, अतीक़ इलाहाबादी (अब मरहूम), नायाब बलियावी, जावेद शोहरत, सुधांशु उपाध्याय, हरीशचंद्र पांडेय, फरमूद इलाहाबादी, मनमोहन सिंह तन्हा, आदि अहम नाम हैं।
( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2017 अंक में प्रकाशित )

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

गुफ़्तगू के रेलकर्मी विशेषांक (अप्रैल-जून 2020 अंक) में


3. (संपादकीय) ‘जीवन रेखा’ के सहभागी रचनाकार
4. डाक
5-6. बदलते वक़्त में बदल गई रेल - मुनेश्वर मिश्र
7-8. रेल और साहित्य का मेल - शैलेंद्र जय
10-21. (गजलें)- केके सिंह मयंक, बसंत कुमार शर्मा, जावेद अली, बीआर विप्लवी, गौरव कृष्ण बंसल, निगम राज
22-49. (कविताएं)- रामकिशोर उपाध्याय, मनोज कुमार अग्रवाल, यतीश कुमार, अमन वर्मा, डाॅ. ब्रजेश खरे, संतोष कुमार पांडेय प्रयागवासी, वीरेंद्र सेन राजहंस, अरविन्द कुमार वर्मा, विकास प्रसाद, मनोज कुमार गोयल, डाॅ. अरुण कुमार श्रीवास्तव अर्णव, श्रीराम तिवारी, जितेंद्र सिंह जितुजी
50-52. (इंटरव्यू) डीआरएम अमिताभ
53-57. (चैपाल)-  लाॅकडाउन में काव्य परिचर्चा को किस रूप में देखते हैं ?
58-60. (तब्सेरा)- दीवान-ए-अना, हथेलियों में चांदनी, सिसकता दर्द, खिड़कियों से झांकती आंखें
61-63. (उर्दू अदब) मर्सिये की जमालियात, ऐसा क्यों है ?, कोई आंखों में रहता है 
64. गुलशन-ए-इलाहाबाद ;  फराज जैदी
65-66. गाजीपुर के वीर ; ख़ामोश गाजीपुरी
67. श्रद्धांजलि ; गुलजार देहलवी
68-97. परिशिष्ट-1 ; शैलेंद्र कपिल
68-69. शैलेंद्र कपिल का परिचय
70. सूर्य की अरुणिमा में प्रकृति के दर्शन - शैलेंद्र जय
71. प्रकृति के चितेरे कवि शैलेंद्र कपिल - जमादार धीरज
72-73. कविताओं में प्रकृति प्रेम के सुंदर दर्शन - नरेश महरानी
74-75. कहानियों से संदेश देने में माहिर हैं रणविजय - शैलेंद्र कपिल
76-97. शैलेंद्र कपिल की कविताएं
98-127. परिशिष्ट-2 : रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे
98. रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे का परिचय
99. अपने कर्तव्य बोध के प्रति सजग है सहस्रबुद्धे - डाॅ. शैलेष वीर
100. गहरे अनुभूति की उपज है सहस्रबुद्धे की रचनाए- प्रभाशंकर शर्मा
101-102. शायरी में वास्तविक जीवन का ताना-बाना
103-127. रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्ध की रचनाएं
124-143. (कवि और कविता):  वसीम बरेलवी, इब्राहीम अश्क, डाॅ. हरिओम, मासूम रजा राशदी, डाॅ. राकेश तूफान, विजय प्रताप सिंह, शिवकुमार राय, नीना मोहन श्रीवास्तव


सोमवार, 29 जून 2020

इतिहास के आईने में इलाहाबाद

                                                            - कृष्ण कुमार यादव
                                                           
कृष्ण कुमार यादव
भारत के ऐतिहासिक मानचित्र पर इलाहाबाद एक ऐसा प्रकाश स्तम्भ है, जिसकी रोशनी कभी भी धूमिल नहीं हो सकती।  इस नगर ने युगों की करवट देखी है, बदलते हुये इतिहास के उत्थान-पतन को देखा है, राष्ट्र की सामाजिक व सांस्कृतिक गरिमा का यह गवाह रहा है तो राजनैतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र भी।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस नगर का नाम ’प्रयाग’ है। ऐसी मान्यता है कि चार वेदों की प्राप्ति पश्चात ब्रह्म ने यहीं पर यज्ञ किया था, सो सृष्टि की प्रथम यज्ञ स्थली होने के कारण इसे प्रयाग कहा गया। प्रयाग माने प्रथम यज्ञ। कालान्तर में मुगल सम्राट अकबर इस नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता से काफी प्रभावित हुआ।  उसने भी इस नगरी को ईश्वर या अल्लाह का स्थान कहा और इसका नामकरण ’इलहवास‘ किया अर्थात जहां पर अल्लाह का वास है।  परन्तु इस सम्बन्ध में एक मान्यता और भी है कि इला नामक एक धार्मिक सम्राट, जिसकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर (अब झूंसी) थी के वास के कारण इस जगह का नाम ’इलावास‘ पड़ा। कालान्तर में अंग्रेजों ने इसका उच्चारण ’इलाहाबाद‘ कर दिया।  

इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और संस्कृति कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। इलाहाबाद को संगमनगरी, कुम्भनगरी और तीर्थराज भी कहा गया है। प्रयागशताध्यायी के अनुसार काशी, मथुरा, अयोध्या इत्यादि सप्तपुरियांँ तीर्थराज प्रयाग की पटरानियां हैं, जिनमें काशी को प्रधान पटरानी का दर्जा प्राप्त है। तीर्थराज प्रयाग की विशालता व पवित्रता के सम्बन्ध में सनातन धर्म में मान्यता है कि एक बार देवताओं ने सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तकुलपर्वत, सप्तपुरियाँ, सभी तीर्थ और समस्त नदियाँ तराजू के एक पलड़े पर रखीं, दूसरी ओर मात्र तीर्थराज प्रयाग को रखा, फिर भी प्रयागराज ही भारी रहे। वस्तुतः गोमुख से इलाहाबाद तक जहाँ कहीं भी कोई नदी गंगा से मिली है उस स्थान को प्रयाग कहा गया है, जैसे-देवप्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग आदि।  केवल उस स्थान पर जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है प्रयागराज कहा गया। इस प्रयागराज इलाहाबाद के बारे में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-’’ को कहि सकई प्रयाग प्रभाऊ, कलुष पुंज कुंजर मगराऊ। सकल काम प्रद तीरथराऊ, बेद विदित जग प्रगट प्रभाऊ।।’’

अगर हम प्रागैतिहासिक काल में झांककर देखें तो इलाहाबाद और मिर्जापुर के मध्य अवस्थित बेलनघाटी में पुरापाषाण काल के पशु-अवशेष प्राप्त हुये हैं। बेलनघाटी में विंध्यपर्वत के उत्तरी पृष्ठों पर लगातार तीन अवस्थायें-पुरापाषाण, मध्यपाषाण व नवपाषाण काल एक के बाद एक पाई जाती हैं।  भारत में नवपाषाण युग की शुरूआत ईसा पूर्व छठीं सहस्त्राब्दी के आसपास हुयी और इसी समय से उपमहाद्वीप में चावल, गेहूँ व जौ जैसी फसलें  उगायी जाने लगीं।  इलाहाबाद जिले के नवपाषाण स्थलों की यह विशेषता है कि यहाँ ईसा पूर्व छठी सहस्त्राब्दी में भी चावल का उत्पादन होता था।  इसी प्रकार वैदिक संस्कृति का उद्भव भले ही सप्तसिन्धु देश (पंजाब) में हुआ हो, पर विकास पश्चिमी गंगा घाटी में ही हुआ।  गंगा-यमुना दोआब पर प्रभुत्व पाने हेतु तमाम शक्तियाँ संघर्षरत रहीं और नदी तट पर होने के कारण प्रयाग का विशेष महत्व रहा ।  आर्यों द्वारा उल्लिखित द्वितीय प्रमुख नदी सरस्वती प्रारम्भ से ही प्रयाग में प्रवाहमान थीं।  सिन्धु सभ्यता के बाद भारत में ’द्वितीय नगरीकरण‘ गंगा के मैदानों में ही हुआ। यहाँ तक कि सभी उत्तरकालीन वैदिक ग्रंथ लगभग 1000-600 ई0पू0 में उत्तरी गंगा मैदान में ही रचे गये।  उत्तर वैदिक काल के प्रमुख नगरों में से एक कौशाम्बी था, जो कि वर्तमान में इलाहाबाद से एक पृथक जनपद बन गया है।  प्राचीन कथाओें के अनुसार महाभारत युद्ध के काफी समय बाद हस्तिनापुर बाढ़ मेें बह गया और कुरूवंश मेें जो जीवित रहे वे इलाहाबाद के पास कौशाम्बी में आकर बस गये।  बुद्ध के समय अवस्थित 16 बड़े-बड़े महाजनपदों में से एक वत्स की राजधानी कौशाम्बी थी।

मौर्यकाल में पाटलिपुत्र, उज्जयिनी और तक्षशिला के साथ कौशाम्बी व प्रयाग भी चोटी के नगरों में थे। प्रयाग में मौर्य शासक अशोक के 6 स्तम्भ लेख प्राप्त हुये हैं। संगम-तट पर किले में अवस्थित 10.6 मी0 ऊँचा अशोक स्तम्भ 232 ई0पू0 का है, जिस पर तीन शासकों के लेख खुदे हुए हैं।  200 ई0 में समुद्रगुप्त इसे कौशाम्बी से प्रयाग लाया और उसके दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित ’प्रयाग-प्रशस्ति‘ इस पर खुदवाया गया।  कालान्तर में 1605 ई0 में इस स्तम्भ पर मुगल सम्राट जहाँगीर के तख़्त पर बैठने का वाकया भी खुदवाया गया। 1800 ई0 में किले की प्राचीर सीधी बनाने हेतु इस स्तम्भ को गिरा दिया गया और 1838 में अंग्रेजों ने इसे पुनः खड़ा किया। 
  
गुप्तकालीन शासकों की प्रयाग राजधानी रही है। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित ’प्रयाग-प्रशस्ति‘ उसी स्तम्भ पर खुदा है, जिस पर अशोक का है।  इलाहाबाद में प्राप्त 448 ई0 के एक गुप्त अभिलेख से ज्ञात होता है कि पांचवीं सदी में भारत में ’दाशमिक पद्धति‘ ज्ञात थी।  इसी प्रकार इलाहाबाद के करछना नगर के समीप अवस्थित गढ़वा से एक-एक चन्द्रगुप्त व स्कन्दगुप्त का और दो अभिलेख कुमारगुप्त के प्राप्त हुए हैं, जो उस काल में प्रयाग की महत्ता दर्शाते हैं।  ’कामसूत्र‘ के रचयिता मलंग वात्सायन का जन्म भी कौशाम्बी में हुआ था।

भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट माने जाने वाले हर्षवर्धन के समय में भी प्रयाग की महत्ता अपने चरम पर थी।  चीनी यात्री हृवेनसांग लिखता है कि-’’ इस काल में पाटलिपुत्र और वैशाली पतनावस्था में थे, इसके विपरीत दोआब मेें प्रयाग और कन्नौज महत्वपूर्ण हो चले थे।‘‘ हृवेनसांग ने हर्ष द्वारा महायान बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ कन्नौज और तत्पश्चात प्रयाग में आयोजित ’महामोक्ष परिषद‘ का भी उल्लेख किया है।  इस सम्मेलन में हर्ष अपने शरीर के वस्त्रों को छोड़कर सर्वस्व दान कर देता था।  स्पष्ट है कि प्रयाग बौद्धों हेतु भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा है, जितना कि हिन्दुओं हेतु।  कुम्भ में संगम में स्नान का प्रथम ऐतिहासिक अभिलेख भी हर्ष के ही काल का है।

प्रयाग में घाटों की एक ऐतिहासिक परम्परा रही है। यहाँ स्थित ’दशाश्वमेध घाट‘ पर प्रयाग महात्म्य के विषय में मार्कंडेय ऋषि द्वारा अनुप्राणित होकर धर्मराज युधिष्ठिर ने दस यज्ञ किए और अपने पूर्वजों की आत्मा हेतु शांति प्रार्थना की।  धर्मराज द्वारा दस यज्ञों को सम्पादित करने के कारण ही इसे दशाश्वमेध घाट कहा गया। एक अन्य प्रसिद्ध घाट ’रामघाट‘ (झंूसी) है। महाराज इला जो कि भगवान राम के पूर्वज थे, ने यहीं पर राज किया था। उनकी संतान व चन्द्रवंशीय राजा पुरूरवा और गंधर्व मिलकर इसी घाट के किनारे अग्निहोत्र किया करते थे। धार्मिक अनुष्ठानों और स्नानादि हेतु प्रसिद्ध ’त्रिवेणी घाट‘ वह जगह है जहाँ पर यमुना पूरी दृढ़ता के साथ स्थिर हो जाती हैं व साक्षात् तापस बाला की भांति गंगा जी यमुना की ओर प्रवाहमान होकर संगम की कल्पना को साकार करती हैं।  त्रिवेणी घाट से ही थोड़ा आगे ’संगम घाट‘ है। संगम क्षेत्र का एक ऐतिहासिक घाट ’किला घाट‘ है। अकबर द्वारा निर्मित ऐतिहासिक किले की प्राचीरों को जहाँ यमुना स्पर्श करती हैं, उसी के पास यह किला घाट है और यहीं पर संगम तट तक जाने हेतु नावों का जमावड़ा लगा रहता है।  इसी घाट से पश्चिम की ओर थोड़ा बढ़ने पर अदृश्य सलिला सरस्वती के समीकृत ’सरस्वती घाट‘ है।  ’रसूलाबाद घाट‘ प्रयाग का सबसे महत्वपूर्ण घाट है। महिलाओं हेतु सर्वथा निषिद्व शमशानघाट की विचारधारा के विरूद्ध यहाँ अभी हाल तक महाराजिन बुआ नामक महिला शमशानघाट में वैदिक रीति से अंतिम संस्कार सम्पन्न कराती थीं।

सल्तनत काल में भी इलाहाबाद सामारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। अलाउद्दीन खिलजी ने इलाहाबाद में कड़ा के निकट अपने चाचा व श्वसुर जलालुद्दीन खिलजी की धोखे से हत्या कर अपने साम्राज्य की स्थापना की।  मुगल-काल में भी इलाहाबाद अपनी ऐतिहासिकता को बनाये रहा।  अकबर ने संगम तट पर 1583 ई0 में किले का निर्माण कराया।  ऐसी भी मान्यता है कि यह किला अशोक द्वारा निर्मित था और अकबर ने इसका जीर्णोद्धार मात्र करवाया। पुनः 1838 में अंग्रेजों ने इस किले का पुनर्निर्माण करवाया और वर्तमान रूप दिया।  इस किले में भारतीय और ईरानी वास्तुकला का मेल आज भी कहीं-कहीं दिखायी देता है।  इस किले में 232 ई0पू0 का अशोक का स्तम्भ, जोधाबाई महल, पातालपुरी मंदिर, सरस्वती कूप और अक्षय वट अवस्थित हैं। ऐसी मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान राम इस वट-वृक्ष के नीचे ठहरे थे और उन्होंने उसे अक्षय रहने का वरदान दिया था सो इसका नाम अक्षयवट पड़ा।  किले-प्रांगण में अवस्थित सरस्वती कूप में सरस्वती नदी के जल का दर्शन किया जा सकता है। इसी प्रकार मुगलकालीन शोभा बिखेरता ’खुसरो बाग‘ जहांगीर के बड़े पुत्र खुसरो द्वारा बनवाया गया था।  यहाँ बाग में खुसरो, उसकी माँ और  बहन सुल्तानुन्निसा की कब्रें हैं।  ये मकबरे काव्य और कला के सुन्दर नमूने हैं।  फारसी भाषा में जीवन की नश्वरता पर जो कविता यहाँ अंकित है वह मन को भीतर तक स्पर्श करती है।

 बक्सर के युद्ध (1764) बाद अंग्रेजों ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर आधिपत्य कर लिया, पर मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय अभी भी नाममात्र का प्रमुख था।  अंततः बंगाल के ऊपर कानूनी मान्यता के बदले ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने शाह आलम को 26 लाख रूपये दिए एवं कड़ा व इलाहाबाद के जिले भी जीतकर दिये।  सम्राट को 6 वर्षो तक कम्पनी ने इलाहाबाद के किले में लगभग बंदी बनाये रखा।  पुनः 1801 में अवध नवाब को अंग्रेजों ने सहायक संधि हेतु मजबूर कर गंगा-यमुना दोआब पर कब्जा कर लिया।  उस समय इलाहाबाद प्रान्त अवध के ही अन्तर्गत था।  इस प्रकार 1801 में इलाहाबाद अंग्रेजों की अधीनता में आया और उन्होंने इसे वर्तमान नाम दिया।  स्वतंत्रता संघर्ष आन्दोलन में भी इलाहाबाद की एक अहम् भूमिका रही।  राष्ट्रीय नवजागरण का उदय इलाहाबाद की भूमि पर हुआ तो गाँधी युग में यह नगर प्रेरणा केन्द्र बना।  राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठन और उन्नयन में भी इस नगर का योगदान रहा है। 1857 के विद्रोह का नेतृत्व यहाँ पर लियाकत अली ने किया । कांग्रेस पार्टी के तीन अधिवेशन यहाँ पर 1888,1892 और 1910 में क्रमशः जार्ज यूल, व्योमेश चंद बनर्जी और सर विलियम बेडरबर्न की अध्यक्षता में हुये। महारानी विक्टोरिया का 1 नंवबर 1858 का प्रसिद्ध घोषणा पत्र यहीं अवस्थित मिण्टो पार्क (अब मदन मोहन मालवीय पार्क) में तत्कालीन वायसराय लार्ड केनिंग द्वारा पढ़ा गया था।  नेहरू परिवार का पैतृक आवास स्वराज भवन और आनन्द भवन यहीं पर है।  नेहरू-गाँधी परिवार से जुडे़ होने के कारण इलाहाबाद ने देश को प्रथम प्रधानमंत्री भी दिया।  उदारवादी व समाजवादी नेताओं के साथ-साथ इलाहाबाद क्रांतिकारियों की भी शरणस्थली रहा है।  चंद्रशेखर आजाद ने यहीं पर अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों से लोहा लेते हुये ब्रिटिश पुलिस अध्यक्ष नाॅट बाबर और पुलिस अधिकारी विशेश्वर सिंह को घायल कर कई पुलिसजनों को मार गिराया औरं अंततः खुद को गोली मारकर आजीवन ’आजाद‘ रहने की कसम पूरी की।  1919 के रौलेट एक्ट को सरकार द्वारा वापस न लेने पर जून 1920 में इलाहाबाद में एक सर्वदलीय सम्मेलन हुआ जिसमें स्कूल, काॅलेजों और अदालतों के बहिष्कार के कार्यक्रम की घोषणा हुयी, इस प्रकार प्रथम असहयोग और खिलाफत आंदोलन की नींव भी इलाहाबाद में ही रखी गयी।
  
 वाकई इलाहाबाद इतिहास के इतने आयामों को अपने अन्दर छुपाये हुए है कि सभी का वर्णन सम्भव नहीं। 1887 में स्थापित ’पूरब का आॅक्सफोर्ड‘ कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अपनी अलग ही ऐतिहासिकता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना 17 नवंबर 1887 को हुई थी। इससे पूर्व यह म्योर सेंट्रल काॅलेज के नाम से जाना जाता था और कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध था। इसे 14 जुलाई 2005 को केंन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ। इस संस्थान से शिक्षा प्राप्त कर जगद्गुरू भारत को नई ऊँचाईयाँ प्रदान करने वालों की एक लम्बी सूची है। इसमें उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त, उत्तराखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के प्रथम अध्यक्ष जस्टिस रंगनाथ मिश्र, स्वतंत्र भारत के प्रथम कैबिनेट सचिव धर्मवीर, राष्ट्रपति पद को सुशोभित कर चुके डाॅ0 शंकर दयाल शर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री द्वय वी0पी0सिंह व चन्द्रशेखर, राज्यसभा की उपसभापति रहीं नजमा हेपतुल्ला, मुरली मनोहर जोशी, मदन लाल खुराना, अर्जुन सिंह, सत्य प्रकाश मालवीय, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस के0एन0 सिंह, जस्टिस वी0एन0 खरे, जस्टिस जे0एस0 वर्मा.....इत्यादि न जाने कितने महान व्यक्तित्व शामिल हैं। शहीद पद्मधर की कुर्बानी को समेटे इलाहाबाद विश्वविद्यालय सदैव से राष्ट्रवाद का केन्द्रबिन्दु बनकर समूचे भारत वर्ष को स्पंदित करता रहा है। देश का चैथा सबसे पुराना उच्च न्यायालय (1866) जो कि प्रारम्भ में आगरा में अवस्थित हुआ, के 1869 में इलाहाबाद स्थानान्तरित होने पर आगरा के तीन विख्यात एडवोकेट पं0 नन्दलाल नेहरू, पं0 अयोध्यानाथ और मुंशी हनुमान प्रसाद भी इलाहाबाद आये और विधिक व्यवसाय की नींव डाली।  मोतीलाल नेहरू इन्हीं प0 नंदलाल नेहरू जी के बड़े भाई थे। कानपुर में वकालत आरम्भ करने के बाद 1886 में मोती लाल नेहरू वकालत करने इलाहाबाद चले आए और तभी से इलाहाबाद और नेहरू परिवार का एक अटूट रिश्ता आरम्भ हुआ। इलाहाबाद उच्च न्यायालय से सर सुन्दरलाल, मदन मोहन मालवीय, तेज बहादुर सप्रू, डा0 सतीशचन्द्र बनर्जी, पी0डी0टंडन, डा0 कैलाश नाथ काटजू, पं0 कन्हैया लाल मिश्र आदि ने इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी।  उत्तर प्रदेश विधानमण्डल का प्रथम सत्र समारोह इलाहाबाद के थार्नहिल मेमोरियल हाॅल में (तब अवध व उ0 प्र0 प्रांत विधानपरिषद) 8 जनवरी 1887 को आयोजित किया गया था। 


इलाहाबाद में ही अवस्थित अल्फ्रेेड पार्क भी कई युगांतरकारी घटनाओं का गवाह रहा है। राजकुमार अल्फ्रेड ड्यूक ऑफ एडिनबरा के इलाहाबाद आगमन को यादगार बनाने हेतु इसका निर्माण किया गया था।  पुनः इसका नामकरण आजा़द की शहीदस्थली रूप में उनके नाम पर किया गया।  इसी पार्क में अष्टकोणीय बैण्ड स्टैण्ड है, जहाँ अंग्रेजी सेना का बैण्ड बजाया जाता था। इस बैण्ड स्टैण्ड के इतालियन संगमरमर की बनी स्मारिका के नीचे पहले महारानी विक्टोरिया की भव्य मूर्ति थी, जिसे 1957 में हटा दिया गया।  इसी पार्क में उत्तर प्रदेश की सबसे पुरानी और बड़ी जीवन्त गाथिक शैली में बनी ’पब्लिक लाइब्रेरी‘ (1864) भी है, जहाँ पर ब्रिटिश युग के महत्वपूर्ण संसदीय कागजात रखे हुए हैं। पार्क के अंदर ही 1931 में इलाहाबाद महापालिका द्वारा स्थापित संग्रहालय भी है।  इस संग्रहालय को पं0 नेहरू ने 1948 में अपनी काफी वस्तुयें भेंट की थी।
       साहित्य, कला, संस्कृति की त्रिवेणी इलाहाबाद में प्राचीन काल से ही प्रवाहित है। इन विधाओं में यहाँ की विभूतियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम की है। प्रयाग का पहला साहित्यकार वैष्णव मत के आचार्य रामानंद को माना जाता है। साहित्य के क्षेत्र में इलाहाबाद की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि यहाँ से अब तक पाँच लोगों को ज्ञानपीठ सम्मान से विभूषित किया जा चुका है।  इनमें  सुमित्रानंदन पंत, रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, नरेश मेहता और अमरकांत का नाम शामिल है।


इलाहाबाद की अपनी एक धार्मिक ऐतिहासिकता भी रही है।  छठवें जैन तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभु की जन्मस्थली कौशाम्बी रही है तो भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तम्भ रामानन्द का जन्म प्रयाग में  हुआ।  रामायण काल का चर्चित श्रृंगवेरपुर, जहाँ पर केवट ने राम के चरण धोये थे, यहीं पर है।  यहाँ गंगातट पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम व समाधि है।  भारद्वाज मुनि का प्रसिद्ध आश्रम भी यहीं आनन्द भवन के पास है, जहाँ भगवान राम श्रृंगवेरपुर से चित्रकूट जाते समय मुनि से आशीर्वाद लेने आए थे। अलोपी देवी के मंदिर के रूप में प्रसिद्ध सिद्धिपीठ यहीं पर है तो सीता-समाहित स्थल के रूप में प्रसिद्ध सीतामढ़ी भी यहीं पर है। गंगा तट पर अवस्थित दशाश्वमेध मंदिर जहाँ ब्रह्य ने सृष्टि का प्रथम अश्वमेध यज्ञ किया था, भी प्रयाग में ही अवस्थित है। धौम्य ऋषि ने अपने तीर्थयात्रा प्रसंग में वर्णन किया है कि प्रयाग में सभी तीर्थों, देवों और ऋषि-मुनियों का सदैव से निवास रहा है तथा सोम, वरूण व प्रजापति का जन्मस्थान भी प्रयाग ही है। संगम तट पर लगने वाले कुम्भ मेले के बिना प्रयाग का इतिहास अधूरा है।  प्रत्येक बारह वर्ष में यहाँ पर ’महाकुम्भ मेले‘ का आयोजन होता है, जो कि अपने में एक ’लघु भारत‘ का दर्शन करने के समान है। इसके अलावा प्रत्येक वर्ष लगने वाले माघ-स्नान और कल्पवास का भी आध्यात्मिक महत्व है। महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार माघ मास में तीन करोड़ दस हजार तीर्थ प्रयाग में एकत्र होते हैं और विधि-विधान से यहाँ ध्यान और कल्पवास करने से मनुष्य स्वर्गलोक का अधिकारी बनता है। पद्मपुराण के अनुसार प्रयाग में माघ मास के समय तीन दिन पर्यन्त संगम स्नान करने से प्राप्त फल पृथ्वी पर एक हजार अश्वमेध यज्ञ करने से भी नहीं प्राप्त होता- प्रयागे माघमासे तु त्र्यहं स्नानस्य यत्फलम्। नाश्वमेधसहóेण तत्फलं लभते भुवि।। 
 कभी प्रयाग का एक विशिष्ट अंग रहे, पर वर्तमान में एक पृथक जनपद के रूप में अवस्थित कौशाम्बी का भी अपना एक अलग इतिहास है।  विभिन्न कालों में धर्म, साहित्य, व्यापार और राजनीति का केंद्र बिन्दु रहे कौशाम्बी की स्थापना उद्यिन ने की थी।  यहाँ पाँचवी सदी के बौद्धस्तूप और भिक्षुगृह हैं।  वासवदत्ता के प्रेमी उद्यन की यह राजधानी थी।  यहाँ की खुदाई से महाभारत काल की ऐतिहासिकता का भी पता लगता है। वाकई इलाहाबाद की ऐतिहासिकता अपने आप में अनूठी है। पर इलाहाबादी अमरूद के बिना यह वर्णन फीका ही लगेगा।  तभी शायर अकबर इलाहाबादी ने कहा है-

                         कुछ इलाहाबाद में सामां नहीं बहबूद के
                         धरा क्या है सिवा अकबर-ओ-अमरूद के।

( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2017 अंक में प्रकाशित)



रविवार, 21 जून 2020

फ़िराक़ गोरखपुरी के साथ एक सुबह

 
फ़िराक़ गोरखपुरी
                       
                                                                 - प्रो. अली अहमद फ़ातमी
                                     

प्रो. अली अहमद फ़ातमी
13 सितंबर 1973 की सुबह जब सज्जाद ज़हीर का देहांत हुआ तो पूरी साहित्य की दुनिया में हलचल मच गई। इसलिए सज्जाद जहीर सिर्फ़ एक इंसान एक साहित्यकार न थे, बल्कि एक तहरीक थे, एक तारीख थे। अख़बार हयात ने खासतौर पर अपने लीडर का ग़म मनाने का एलान किया और एक उत्कृष्ट विशेषांक प्रकाशित करने का इरादा किया और लेखक को यह जिम्मेदारी सौंपी की फिराक साहब से सज्जाद जहीर के बारे में ख्यालात इकट्ठा करके जल्द से जल्द रवाना करूं। फिराक साहब सज्जाद जहीर के करीबी साथियों में से थे। मैं एमए प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था, एहतेशाम हुसैन का इंतकाल हो चुका था और मौत पर फिराक साहब पर अच्छा-खासा असर था। मुझे इस बात का अंदाजा था कि सुबह के वक्त जब उनके हाथों में अखबार हो और सामने चाय की प्याली तो वह निस्बतन खुश रहते हैं। अखबार के हवाले से बात निकाली जा सकती है और उसे साहित्य की तरफ मोड़ा जा सकता है, इसलिए इसी नियत के साथ जब मैं एक सुबह तकरीबन नौ बजे उनके घर पहुंचा तो जंगले वाले दालान में बैठे हुए थे। रोज की तरह उनके हाथ में अखबार था, सामने चाय की प्याली। इसके अलावा एक बेहद खुबसूरत इजाफा भी था। सामने कुर्सी पर एक बहुत हसीन, गोरी चिट्टी आकर्षक लड़की, डायरी और कलम लिए बैठी हुई थी और फिराक साहब की बातों को लिखने में व्यस्त थी। ऐसे अनुचित मौके पर इतनी सुबह ऐसी हसीन लड़की को देखकर मैं डगमगा सा गया। हालांकि फिराक साहब के यहां जाते हुए कदम फूंक-फंूक रखने पड़ते थे, लेकिन आज मामला कुछ अजीब सा था। बहुत खामोशी से दालान में कदम रखा तो फिराक साहब अंग्रेजी साहित्य के किसी विषय पर जोरदार लेक्चर दे रहे थे। मैं लेक्चर समझ न सका, एक तो वह अंग्रेजी में था, दूसरे ये कि कोई जिन्दादिल इंसान ऐसी खूबसूरत चीज को देखकर लेक्चर समझना तो क्या सुनना भी गंवारा नहीं करेगा। चाहे वह कितना ही सौंदर्यात्मक क्यों न हो.... मैं कब चुपचाप एक मोढ़े पर टिक गया पता ही नहीं चला। फिराक साहब लेक्चर में व्यस्त, लड़की लेक्चर को समेटने में व्यस्त और मैं दृश्य में। वह वाकई बहुत खुबसूरत थी। ऐसा हुस्न जो कभी-कभी देखने को मिलता है। सबकुछ सब्र को डिबो देने वाला, बस जरा मेकअप कुछ ज्यादा था। वह लिखने में व्यस्त थी। उसकी नुकीली उंगुलियों में कलम बड़ी तेजी से कागज पर दौड़ रही थी, फिर मैंने फिराक साहब को गौर से देखा। उनकी नजरें छत की तरफ थीं और वह लड़की के बिल्कुल दूसरी तरफ छत तरफ घूरते हुए लेक्चर दे रहे थे, क्योंकि उनकी गुफ्तगू की अपनी अदाएं हुआ करती हैं, इसलिए पहले तो मैंने उसको भी अदा ही समझा। लेकिन कुछ देर बाद मैंने महसूस किया कि वह ऐसा जानबूझकर कर रहे हैं और उसको जाहिर भी कर रहे हैं। तो शायरे जमाल की हुस्न से यह बेपरवाह वाली अदा मेरे समझ में न आयी। मैं इतना जरूर समझ गया कि कोई बात ऐसी जरूर है जो फिराक की नाजुक तबीयत पर भारी गुजर रही है। शायद यह ग़लत वक्त पर आ गई या कोई ग़लत किस्म का सवाल कर लिया। मैं अभी इस पर गौर ही कर रहा था कि अचानक लेक्चर खत्म हो गया और उसी रफ्तार से लड़की की उंगलियां भी रुक गईं। ‘अच्छा मैं चलती हूं। नमस्ते’
वह उठी और चल दी और फौरन दृश्य बदल गया और फिर जोश के अनुसार... ‘पटरी चमक रही थी गाड़ी गुजर चुकी थी’। फिराक साहब ने अजीब...सी नजरों से मेरी तरफ देखा... और फिर एक यादगार मोहब्बत के साथ बोले ‘कहिए मौलाना...इतनी सुबह खैरियत तो है।’ ‘कुछ जरूरी बातें करनी हैं..’। मैंने दबे शब्दों में कहा। मेरी जहन पर अभी भी कुछ और सवाल था। ‘अभी रुक जाइए....पहले मैं नाश्ता करूंगा, एक प्याली गरम चाय की पिउंगा, उसके बाद...पन्ना...पन्ना।’
और पन्ना आदत के अनुसार तेज रफ्तार कदमों के साथ इंतजाम में व्यस्त हो गया। इसी बीच फिराक साहब ने सिगरेट सुलगाई। मैंने मौका गनीमत जानकर पूछा... ‘यह लड़की कौन थी..’ ‘कौन लड़की ।’ ‘अरे यह जो अभी यह बैठी हुई थी।’ ‘यह किसी डिग्री कालेज की लेक्चरार है। मुझसे कुछ पूछने आयी थी।’ ‘अच्छा, लेकिन आप उसकी तरफ देखकर बात क्यों नहीं कर रहे थे... इतनी खूबसूरत, खुश शक्ल लड़की आपसे बातचीत कर रही थी और आप छत की तरफ देख रहे थे... आखिर यह क्या बात हुई।’ मैंने हद से ज्यादा हिम्मत की।
फिराक ने एक लंबा कश हवा में फेंका और टेढ़ा मुंह करते हुए बोले- खुशशक्ल, खूबसूरत मियां साहबजादे अभी आप बच्चे हैं, खुबसूरत शख्सियत के लिए सिर्फ़ खुशशक्ल होना काफी नहीं होता। उसे थोड़ा सा समझदार भी होना चाहिए और फिर साहित्य वगैरह को समझने के लिए थोड़ी बहुत बदचलनी भी जरूरी है, जो इसके बस की बात नहीं थी... फिर आप उसके चेहरे को गोबर देख रहे थे...। ‘गोबर !’ मैं चैंका। जी हां .... उसकी मेकअप। ‘अब मेकअप तो लड़कियां करती ही हैं...’ मैंने कहा। ‘मेकअप लड़कियां नहीं, औरतें करती हैं.. जनाबे आला मेकअप का अपना फलसफा होता है।’
‘मेकअप का फलसफा...वह किस तरह..’ मैंने सवाल किया ‘जी आप इसे अभी नहीं समझ सकेंगे... भाई  सीधी सी बात यह है कि हुस्न अगर वाकई हुस्न है तो फिर उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती, जो हुस्न सहारा मांगे तो फिर वह फितरी हुस्न नहीं मिलावट हो गया। सच तो यह है कि मेकअप की जरूरत उस वक्त पड़ती है जब हुस्न ढल रहा हो, तब उसको सहारा देने की गरज से मेकअप की मदद ली जाती है।’ इसी बीच उनका नौकर पन्ना चाय लेकर आ गया। बातचीत रुकी और वह चाय पीने लगे। फिर हिम्मत करके मैंने बात बदल  कर बात शुरू की। मैंने कहा हुजूर मैं सज्जाद जहीर के बारे में आपसे कुछ बातें करना चाहता हूं, अगर आपको तकलीफ न हो तो। ‘क्या भाई खैरितय तो है’। ‘दरअसल बात यह है कि हयात, सज्जाद जहीर का विशेषांक निकाल रहा है। इस सिलसिले में आपके कुछ ख्यालात व तास्सुरात जानना चाहता हैं, इसकी जिम्मेदारी मुझ पर है।’  पूछो भाई... बन्ने के बारे में भी पूछ लो। फिर वह बगैर पूछे खुद ही बोल पड़े। ‘अरे भाई... अब यादें रफ्तगा की भी ताकत नहीं रही। 80 साल हो रहा हूं मेरा भाई तो 61 साल में चल बसा... दूसरा बीमार चल  रहा है... बन्ने  भी मेरे भाई जैसा ही था।’ उन्होंने यह वाक्या बड़े दुख साथ अदा किए और फिर बोलने लगे.... ‘सज्जाद जहीर, सर वजीर हसन के लड़के थे। उनकी पिता कुछ तबकाती कमजोरियों के बावजूद एक अजीम आदमी थे। इलाहाबाद के मशहूरों में उनका शुमार होता था। हम लोगों के  यहां से आना-जाना था। बस उन्हीं के जरिए से सज्जाद जहीर से मुलाकात हुई। शुरू-शुरू में सज्जाद जहीर से कम उनके दूसरे भाइजयों से ज्यादा अच्छे ताल्लुकात रहे, लेकिन रफ्ता-रफ्ता मैं अपने आपको को यह महसूस करने लगा कि मेरा जेहनी झुकाव सज्जाद जहीर की तरफ होता जा रहा है। बाद में तो सज्जाद जहीर से ऐसे ताल्लुकात हो गए कि कलेजा का टुकड़ा समझता रहा। बड़ा अफसोस हुआ मुझे उनके इंतकाल का..।’ इस तरह फिराक साहब ने सज्जाद जहीर के बारे में बहुत कुछ बताया, अंत में मैंने कहा- हुजूर एक छोटा सा सवाल और अर्ज है। ‘हां पूछो भाई।’
‘जिस वक्त आपने सज्जाद जहीर की मौत की खबर सुनी तो क्या प्रतिक्रिया रही’। ‘जब मैंने सज्जाद जहीर की मौत की खबर सुनी तो मैं बहुत गमगीन हो गया। बड़ी देर तक सोचता रहा। एक निहायत काबिले कद्र हिन्दुस्तानी और एक बहुत अच्छा दोस्त और एक बोर्न एंड हाइली गिफ्टेड लीडर हमारे बीच नहीं रहा।’ बातें तो शायद और हो सकती थीं, लेकिन अब मैं उनको और ज्यादा तकलीफ देकर अपनी इज्जत और आबरू खतरे में नहीं डालना चाह रहा था। इजाजत लेकर रुखसत हुआ।
( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2017 अंक में प्रकाशित )
                                     

मंगलवार, 16 जून 2020

महान महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं अमजदी बानो


                                               -मोहम्मद वज़ीर अंसारी
                                             
मोहम्मद वज़ीर अंसारी
अमजदी बानो बेगम ऐसी महिला हुई हैं, जिनका परिचय कई मायने में बेहद ख़ास है, और जिनका काम देश व समाज के लिए बेहद ख़ास और उदाहरण के लायक है। वे हमीदा गल्र्स कालेज की संस्थापक, अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन की संवाहिका, जामिया मिल्लिया इस्लामिया कालेज की प्रबंधक, मुस्लिम लीग की प्रथम महिला अध्यक्ष रही हैं। इसके साथ वे ऐसी स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्हें महात्मा गंाधी ‘ए ब्रेव वूमन’ कहते थे। अमजदी बानो बेगम का जन्म 1885 में रामपुर में हुआ था। इनके पिता अमजद अली ख़ान रामपुर राज्य के उच्च न्यायालय में कार्य करते थे। बचपन में ही इनकी माता का निधन हो गया, दादी और चाची ने पालन-पोषण किया था।

आरंभिक शिक्षा अपने घर से ही पूर्ण करने के बाद 17 वर्ष की आयु में ही 1902 में मौलाना मोहम्मद अली ज़ौहर के साथ आपका विवाह हुआ। अपने पारिवारिक दायित्वों के सफलतापूर्वक निर्वहन के साथ ही देश को आज़ाद कराने के मूल कर्तव्य का बखूबी निर्वहन करती रहीं। परिवार के लोगों का इन्हें पूरा सहयोग मिलता रहा, मोहम्मद अली जौहर की माता का भी समर्थन प्राप्त था। इन दोनों ने मिलकर समाज और देश सेवा हेतु खिलाफ़त आंदोलन के लिए 40 लाख रुपये दान दिया था।

अमजदी बेगम ने 1917 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की सभा में भाग लिया। सन 1920 में इन्हें अखिल भारतीय खिलाफ़त कमेटी का महिला विंग का सचिव नियुक्त किया गया। सन 1921 में अहमदाबाद में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस की कार्यकारिणी कमेटी में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। 1930में इन्होंने लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में अपने पति के साथ हिस्सा लिया। इन्हें आल इंडिया मुस्लिम लीग की वर्किंग कमेटी का सदस्य नामित किया गया औंर वर्ष 1938 में मुस्लिम लीग की महिला विंग का अध्यक्ष नामित किया गया। इनकी अध्यक्षता में हजारों महिलाओं ने मुस्लिम लीग ज्वाइन किया।
इन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए अनेक महत्वपूर्ण कार्य किया। महिला सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया सबसे महत्वूपर्ण कदम इलाहाबाद में हमीदा गल्र्स कालेज का स्थापना है, जो वर्तमान में हमीदिया गल्र्स कालेज के नाम से बालिका शिक्षा का पुनीत कार्य संपादित कर रहा है। महिलाओं को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए इन्होंने अलीगढ़ में खादी भंडार की स्थापना की, इनके इन्हीं सेवा संकल्पों और राष्टीय स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए गांधी जी ने अपनी पुस्तक ‘यंग इंडिया’ में अमजदी बेगम को ‘ए ब्रेव वूमन’ करके संबोधित किया है। अमजदी बेगम एक प्रखर वक्ता थीं, जिनके भाषण स्वतंत्रता सेनानियों और महिलाओं में नवीन उर्जा का संचार करती थीं। प्रखर वक्ता के होने के साथ ही लेखन में भी इनकी विशेष रुचि थी। इनके द्वारा दैनिक समाचार पत्र ‘रोजनामा हिन्द’ का प्रकाशन किया जाता था। जिसमें उच्च स्तरीय लेख प्रकाशित किए जाते थे और स्वतंत्रता सेनानियों के विचारों का संवहन करते हुए आज़ादी की लड़ाई को जन-जन तक पहंुचान में सहायता करते थे।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया कालेज के तत्कालीन प्रबंधक माजिद साहब की गिरफ्तारी के बाद अमजदी बेगम ने इस कालेज का दायित्व संभाल कर अपनी कुशलता कर परिचय दिया। कुल मिलाकर अमजदी बानो बेगम ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने पर्दाप्रथा से बाहर निकलकर समाज सेवा और देशभक्ति को अपना धर्म बनाया। इनके ये सराहानीय कार्य युग-युगांतर तक भुलाया नहीं जा सकता।
(गुफ़्तगू के जुलाई-सितम्बर 2017 अंक में प्रकाशित )

मंगलवार, 9 जून 2020

ग़ालिब फ़कीराबाद में नासाज हो गया

                                                          - अजय राय
                                                             वरिष्ठ पत्रकार-अमर उजाला
                                                             मोबाइल नंबर 9675898311                                                         

अजय राय
हिमालय और विंध्याचल के बीच का वह स्थान जहां सरस्वती का बालू में लोप हो जाता है, उसे इन दिनों इलाहाबाद के नाम से जाना जाता है, उक्त वर्णन करने वाली मनुस्मृति ने जिसे प्रयाग कहा है। जहां आकर मशहूर शायर ग़ालिब की तबियत खराब हो गई थी। ग़ालिब ने लिखा अपने एक ख़त में अपनी भावना जाहिर की-अगर जन्नत का रास्ता इलाहाबाद से होकर जाएगा तो मैं जहन्नुम जाना पसंद करूंगा। एक शेर में लका हजर अत फितन ए इलाहाबाद यानी इलाहाबाद के फितनों से खुदा पनाह दे। फितना यानी लगाई-बुझाई करने वाले, षड्यंत्रकारी, साजिशकर्ता आदि-आदि। अब कोई पूछेगा कि सरस्वती के लोप होने और लगाई-बुझाई में रिश्ता क्या है। पर सोचिए जहां सरस्वती का लोप हो जाएगा वहां लगाई-बुझाई नहीं होगी तो और क्या होगा। आप कह सकते हैं कि यहां पूरब का आक्सफोर्ड और शिक्षा का केंद्र है। पर इसी शहर में रजाई गद्दे लेकर डेलीगेसी में एक अदद तंग कोठरी खोजते हुए तमाम छात्र सीख जाते हैं कि क्लर्की का काम केवल डबल रोटी का जुगाड़ है (बकौल अकबर इलाहाबादी- कर क्लर्की खा डबल रोटी, खुशी से फूल जा।) और जब क्लर्की मिलती है तो ग़ालिब की तरह सीना चैड़ा कर कहीं भाग लेते हैं, मानो बिना शर्त रिहाई हो गई हो। 

 कमरे की खोज में किराए की साइकल लेकर भटकते हुए कई बार जीवन दर्शन से मुलाकात हो जाती है। वैसे भी प्रयाग की अनौपचारिक शिक्षा में सब कुछ यहां दान कर देने की नसीहत है तो औपचारिक तौर पर विश्वविद्यालय में दशर्नशास्त्र सबसे ज्यादा चाव से पढ़ा जाने वाला विषय। दर्शन का जलवा है कि तमाम फिजिक्स (भौतिक) के कई अध्येता और प्रोफेसर भी पूरी जिंदगी मेटाफीजिक्स (पारभौतिक) की राजनीति करते रहे। दर्शन पढ़कर बहुतों को ज्ञान होता है कि वे जो कुछ अक्षर में सीख रहे हैं, दरअसल वह शंकराचार्य के मुताबिक अविद्या है और मिथ्या जगत से मुक्ति विद्या से मिलती है। विद्या ब्रह्म ज्ञान है। प्रयाग के इतिहास की चर्चा जब होती है तो थानेश्वर के राजा श्रीहर्ष या हर्षवर्धन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। श्रीहर्ष के साथ सन 644 में चीनी यात्री ह्वेनसांग प्रयाग (जिसे उसने पोलोयेकिया नाम दिया है) आया था। उसकी यह बात अक्सर कोट की जाती है कि राजा और धनिक यहां आतेच हैं को अपना धन दान-पुण्य में दे जाते हैं। महाराजा हषवर्धन ने पांच वर्ष का संचित धन एक दिन में बांट दिया। उसने यह भी लिखा है कि 50 वर्ग मील में फैले इस क्षेत्र की उष्ण जलवायु स्वास्थ्य के अनुकूल है। यहां के लोग सुशील हैं और उन्हें पठन-पाठन व विद्या से विशेष प्रेम है लेकिन असत्य सिद्धांतों पर उनका विश्वास अधिक है, जिसकी चर्चा जरा कम होती है। पहले की चर्चा ज्यादा करने का फायदा है यह है कि जो कुछ है दान देकर जाओ जबकि दूसरे हिस्से की चर्चा बेमानी लगती है।
प्रयाग का अर्थ है बहुत बड़ा यज्ञ। कहते हैं यह यज्ञ पृथ्वी को बचाने के लिए ब्रह्मा ने किया था। उसमें विष्णु यजमान और शिव देवता थे। तीनों देवों ने अपने शक्तिपुंज से पृथ्वी के पाप के बोझ को हल्का करने के लिए एक वृक्ष उत्पन्न किया। बरगद का यह वृक्ष अक्षयवट के नाम से जाना जाता है। आइए ह्वेनसांग की नजर में इस अक्षयवट को देखते हैं। वह लिखता है कि नगर में एक देव मंदिर है जो चमत्कारों को लिए विख्यात है, वहां एक पैसा चढ़ाने पर हजार स्वर्ण मुद्राओं के बराबर फल मिलता है। मंदिर के आंगन के आंगन में एक पेड़ है, जिसके नीचे अस्थियों के ढेर लगे हैं। ये उन लोगों की अस्थियां हैं, जो स्वर्ग की लालसा में इस वृक्ष से कूद कर जान दे देते थे। धरती का बोझ कम करने का यह तरीका देख कर ग़ालिबन कौन होगा जिसकी बुद्धि न चकरा जाए और जो जन्नतनशीं होने के इस तरीके पर अमल करने के बजाय ग़ालिब की तरह दोजख जाना न पसंद करे।
प्रयाग कुदरत की एक अनूठी जगह का नाम है। दो अलग-अलग रंगों की धाराओं के बीच का भूभाग है। इस दोआब में राम ने नदियों का कलरव सुनकर लक्ष्मण से कहा था कि लगता है हम संगम तट पर आ गए हैं। ऋषि भारद्वाज ने अपने आश्रम से विदा करते समय राम से कहा था कि गंगा के किनारे जाइए कुछ दूरी पर एक विशाल वट वृक्ष मिलेगा, जिसके चारों ओर बहुत से छोटे-छोटे पौधे उगे होंगे। उसके नीचे सिद्दगण बैठे तप कर रहे होंगे। उसके आगे सघन फलदार वन हैं, जिससे होकर आप चित्रकूट का रास्ता है। गौर करिए उस ज़माने में भी वट वृक्ष के नीचे छोटे-छोटे पौधे थे, जहां तपस्वी तप करते थे। आज -क्वाट रैमी टाट एरबोरस (जितनी शाखा उतने वृक्ष-इलाहाबाद विश्वविद्यालय का ध्येय वाक्य)- वाले बरगद के गिर्द भी बौने पौधे ही हैं, जो तपस्वी लोगों के तप का जरिया बने हुए हैं। तप भी उतना ही जिससे नौकरी सध जाए। ज्यादातर लोग ऐसा ही करते हैं। इसके बीच से ही कुछ सोच भी निकलती है। कुछ लोग हैं जो अकबर इलाहाबादी वर्णित डबलरोटी वृत्ति से पार चले जाते हैं पर ऐसे लोग बनने अब कम हो गए हैं। 
थोड़ा और इतिहास खंगाल लेते हैं। शायद कुछ और मिल जाए। महाभारत में प्रयाग, प्रतिष्ठानपुरी, बासकी (नाग बासुकी) और दशाश्वमेध (दारागंज) का जिक्र है। मत्स्य, अग्नि और कूर्म पुराण इसे धरती की जांघ बताते हैं। पुराणों में ही हंस तीर्थ, समुद्रकूप आदि का जिक्र आता है। दरअसल प्राचीन काल में प्रयाग कोई नगर नहीं था बल्कि तपोभूमि था। ह्वेनसांग ने अक्षयवट को शहर के भीतर बताया है। इससे जाहिर है कि प्रयाग का विस्तार ज्यादा नहीं था। बाद में अकबर ने किला बनाया तो प्रयाग उसके गिर्द ही सिमट गया और वह इलाबास और फिर इलाहाबाद हो गया। अतरसुइया को लोग पुराना मुहल्ला मानते हैं। मान्यता है अत्रि ऋषि की पत्नी सती अनसुया के नाम पर बसा है। खुल्दाबाद जहांगीर ने बसाया। औरंगजेब के कार्यकाल में सवाई राजा जयसिंह ने बसाया था। पुराना दशाश्वमेध दारा शिकोह के नाम पर दारागंज हो गया। खुसरोबाग आबाद हो गया था। मुगलकाल के अंत तक काफी इलाहाबाद आबाद हो गया था, जब चचा ग़ालिब यहां आए। उस समय ज्ञान केंद्र 12 दायरे और 18 सराय आबाद हो गई थीं, जिनकी वजह से इस शहर का एक नाम फ़कीराबाद भी हो गया था। अब फ़कीरों के शहर में भी चचा की तबियत नासाज हो गई और चैन मिला काशी में आकर। चचा के रहते रहते ही 1857 का गदर हो गया, जिसमें इलाहाबादी लड़े भी और उनकी जासूसी करने वाले जागीरों से नवाजे भी गए। मेवातियों का गांव सम्दाबाद तबाह हो गया। यहां बाशिंदे मीरापुर भाग गए। छीतपुर लूट लिया गया। वहां गवनर्मेंट हाउस और जार्ज पंचम के चचा ड्यूक आफ एडिनबरा अल्फ्रेड के नाम पर 133 एकड़ का पार्क बना दिया गया, जिसे अब कंपनी बाग कहते हैं जहां कभी विक्टोरिया की मूर्ति लगी थी। तमाम गांवों को तबाह करके कमिश्नर थर्नहील ने सिविल लाइंस बसाया। उसका नाम वायसराय के नाम पर कैनिंग टाउन रखा गया था। अब थर्नहील के नाम पर एक रोड़ है और कैनिंगटन एक मुहल्ला। पहले कलेक्टर आर एहमुटी के नाम पर मुट्ठीगंज, किले के कमांडेंट कीड के नाम पर कीडगंज बसा। सर विलियम म्योर ने हाईकोर्ट, गवनर्मेंट प्रेस, पत्थर गिरजा, रोमन कैथलिक चर्च और म्योर सेंट्रल कालेज (साइंस फैकेल्टी) बनवाया। कलेक्टर विलियम जान्सटन के मन में सड़क बनवाने का खयाल आया तो उन्होंने घनी बस्ती उजाड़ कर सड़क बनवा डाली। जान्सटन गंज का इलाका आज इसी का नाम है। चैक में गड़ही के किनारे सब्जी और बिसातखाने की दूकानें लगती थीं, जिसे पटवाकर कमसिरएट के गुमाश्ता रामेश्वर राय चैधरी ने सब्जी बाजार और बिसतखाना बनवा डाला। सर जेम्स डी लाटूश ने लूकर गंज बसाया जिसका नाम गवर्नमेंट प्रेस के सुपरिटेंडेंट एफ लूकर के नाम पर रखा गया। पायोनियर के संपादक जार्ज एलन के नाम पर एलनगंज और म्युनिसपल बोर्ड के चेयरमैन ममफोर्ड के नाम पर ममफोर्डगंज बसा। घनी बस्ती से लोगों के उजाड़कर हीवेट रोड बनाई गई और जीरो रोड निकाली गई। कर्नलगंज में सैनिक छावनी बनी। इस शहर में एक झील है, जिसका नाम एक इंजीनियर के नाम पर रख दिया गया था, मैकफसरन लेक। आजकल यहां नेहरू पार्क हुआ करता है। यानी सड़क, झील, गांव सब मटियामेट हो गए। नाम बदल दिए गए। इस शहर का छाप और तिलक सब छीन लिया गया। एक आधुनिक शिक्षा का केंद्र भी उन्नीसवीं सदी के आखिर में बना, जो अफसरों और बाबूओं को गढ़ने की फैक्ट्री था और है। उस गदर (1857 का स्वतंत्रता संग्राम)  की तबाही देखने के बाद जिस ग़ालिब ने लिखा था कि -अपने ही दर पर होनी थी ख़्वारी की हाय हाय। उसे इलाहाबाद में कैसा सलूक मिला कि वह इस रास्ते से स्वर्ग तक नहीं जाना चाहता जबकि काशी में जाकर महीने भर एक अदना सी सराय में बैठकर उसे सुकून मिलता है।  
 प्रयाग जो साहित्य का केंद्र है। सुमित्रानंदन पंत, हरिऔध, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हरिवंश राय बच्चन, फ़िराक़ गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती और जाने-जाने भी कैसी-कैसी विभूतियां यहां हुईं। उन्होंने हिंदी साहित्य को नया रूप दिया। मानवता के मुक्ति के गीत गाए। इलाहाबाद की आबोहवा जिससे ह्वेनसांग भी प्रभावित हुआ था, उसमें बहुत कुछ है जो सेहत ठीक कर सकत है समाज की। उसे धार देने के लिए जरूरी है कि नए अंदाज में सोचा जाए। ग़ालिब की पीड़ा को समझा जाए और कोई आने वाला यहां ग़ालिब की तरह किसी फितना विचार का मारा न हो, इसका खयाल रखा जाए।
गुफ़्तगू के इलाहाबाद विशेषांक (जुलाई-सितंब 2017 अंक) में प्रकाशित

रविवार, 24 मई 2020

रहनुमाए हज व उमरा, बन्द मुट्ठियों में क़ैद धूप, चाबी वाला भूत, दृष्टिकोण और एक टुकड़ा धूप

                                                                 
                                                              -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
मौलाना मुजाहिद हुसैन रज़वी मिस्बाही की किताब ‘रहनुमाए हज व उमरा’ का हिन्दी संस्करण प्रकाशित हुआ है। इससे पहले यह किताब उर्दू में थी, जिसका हिन्दी रुपांतरण सय्यद इम्तियाज़ हुसैन हबीबी ने किया है। इस किताब की ख़ास बात यह है कि हज करने के दौरान क्या-क्या प्रक्रियाएं हैं, कहां, कैसे और कब जाना होता है आदि की संपूर्ण जानकारी  दी गई है। जो लोग हज या उमरा करने जाते हैं उनके लिए तो यह किताब ख़ास है ही, जो हज करने नहीं जा पाते वे लोग भी ये प्रक्रियाएं ज़रूर जानने चाहेंगे। हर मुसलमान की यह ख़्वाहिश होती है कि हज करे और अगर न भी कर पाए तो उसके बारे में जानकारी हासिल करे। मसलन, ‘एहराम के बारे में बताया गया है कि हज या उमरा की अलग-अलग या हज व उमरा की एक साथ नीयत करके लब्बैक पढ़ लेने को एहराम कहा जाता है, चूंकि हालते एहराम में मर्दोें को हुक्म है कि वह बिना सिली एक चादर ओढ़े और बिना सिली एक चादर पहने इसलिए मजाज़न इन चादरों को एहराम कहा जाता है। औरतें हालते एहराम में अपने मामूल का लिबास पहनेंगी मगर इस हालत में मर्दों की तरह उन्हें भी चेहरा छुपाना हराम है। हां कोई ग़ैर महरम सामने आ जाए तो दस्ती पंखे या दफ्ती वग़ैरह से फ़क़त आड़ करने की इजाज़त है, चेहरे से चिपकाने की इजाज़त नहीं है। एहराम की जो चीज़ें हराम हैं, उनकी लिस्ट यूं है। (1) औरत से सोहबत करना (2) शहवत के साथ उसका बोसा लेना, छूना, गले लगाना या उस की शर्मगाह को देखना, औरतें के सामने उसका नाम लेना (3) फ़हश बेहूदा गोई गुनाह का कोई भी काम यंू भी हराम हैं हालते एहराम में और सख़्त हराम (4) किसी से दुनियावी लड़ाई-झगड़ा करना (5) अपना या किसी दूसरे का नाखून काटना या किसी दूसरे से अपना नाखून कटवाना (6) जंगल का शिकार करना या शिकार करने में किसी भी तरह से हिस्सेदार होना (7) सर से पांव तक कहीं से कोई बाल किसी तरह जुदा करना (8) किसी कपड़े वग़ैरह से मुंह या सर छुपाना (9) बस्ता या कपड़े की गठरी सर पर रखना (10) सर पर इमाम बांधना (11) बुर्क़ा पहनना (12) सिला हुआ कोई भी कपड़ा पहनना (13) दास्ताना पहनना (14) वस्ते क़दम को छुपाने वाले जूते पहनना (15) बालों, कपड़ों या बदन में खुश्बू लगाना (16) मुश्क, अंबर, ज़ाफ़रान, जावित्री, लौंग, इलायची, दारचीनी जंजबील वग़ैरह किसी भी ख़ासिल खुश्बू को खाना वगैरह। इस तरह कुला मिलाकर यह किताब हर मुसलमाना के लिए बेहद ख़ास है। 80 पेज की इस किताब को रेेज़ाए मुस्तफ़ा खिदमते हुज्जाज कमेटी की तरफ से प्रकाशित किया गया है, जिसकी कीमत 75 रुपये है।

  ‘बन्द मुट्ठियों में क़ैद धूप’ एक लधुकथा संग्रह है। विजय लक्ष्मी भट्ट शर्मा ‘विजया’ के इस लधुकथा संग्रह में 37 लधुकथाएं संग्रहित हैं। इस विधा में आमतौर पर समाज में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाओं को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, विडंबनाओं और प्रताड़ना के साथ आपसी सौहाद्र और प्रेम-प्रसंग के वाकए को चुटेले अंदाज़ प्रस्तुत करके पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना ही लधुकथा कहलाता है। बड़ी कहानियों की अपेक्षा लधुकथा पढ़ना लोग अधिक पसंद करते हैं। विजय लक्ष्मी जी ने भी इसी तरह की लधुकथाओं का सृजन मार्मिक ढंग से सजगता के साथ किया है। ‘परिचय’ नामक लधुकथा में लेखिका स्त्री मन के दुख-दर्द का बयान करती है, बताती है कि स्त्रियों को किन हालात का सामना करना पड़ता है। इस लधुकथा में कहती है-‘हमने कभी मां के उस दुःख को समझने की कोशिश नहीं की जो उनके अंदर जमा होकर नासूर बन रहा था, शायद ये ही ममता का असली रूप है कि अपने दुःख को पीकर अपनी संतान की खुशी के लिए जीना। आज जब मैं भी मां हूं दो बच्चों की तो इस बात का मतलब समझ पा रही हूं, उनका दुःख महसूस कर पा रही हूं। आज उस बात का भी जवाब मिल रहा है कि क्यों मां चुपचाप पिताजी की हर ज़्यादती सह लेती थी। स्त्री को भगवान ने बहुत ही सहनशील बनाया है और ये ही वजह है रही होगी कि ईश्वर ने औरत को ही मां बनने का सौभाग्य दिया।’ इसी तरह लगभग हर कहानी में परिवार और समाज में स्त्री के काम-काज, दुखःदर्द और उसके परिदृश्य का वर्णन विभिन्न छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से किया गया है। कुल मिलाकर स्त्री के परिदृश्य का एक बेहतरीन संग्रह यह पुस्तक। 128 पेज के इस सजिल्द पुस्तक की कीमत 300 रुपये है, जिसे केबीएस प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

 नीमच, मध्य प्रदेश के रहने वाले ओम प्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ एक सक्रिय कलमकार हैं। अब तक सात किताबें प्रकाशित हो चुकी है। हाल में बाल कहानी संग्रह ‘चाबी वाला भूत’ प्रकाशित हुआ है। कभी तमाम बाल पत्रिकाएं निकलती थीं, अभिभावक अपने बच्चों को ये पत्रिकाएं खरीदकर पढ़ने के लिए देते थे, बच्चे भी खूब आनंद लेकर पढ़ते थे। इनमें प्रकाशित कहानियां काफी शिक्षाप्रद और नैतिक शिक्षा के प्रति सजग करने वाली होती थीं। अब वह माहौल हमारे समाज का नहीं रहा। बाल पत्रिकाएं बच्चे कम ही पढ़ते हैं। इसके बावजूद बाल कहानियों का अपना एक स्थान है, जो बच्चों में नैतिक शिक्षा का विकास करते हैं। इस पुस्तक में विभिन्न विषयों को रेखांकित करती हुई 17 बाल कहानियां संग्रहित की गई हैं। ‘राबिया का जूता’ नामक कहानी में बच्ची राबिया का नए जूता लेने की जिद का वर्णन बेहद मार्मिक ढंग से खूबसूरती के साथ किया गया। जिसमें राबिया नए जूते के बिना स्कूल न जाने की जिद करती है, तब उसके पिता उसकी जिद पूरी कर देते हैं, मगर सुबह पिताजी बिस्तर पर लेटे रहते हैं, उन्हें बहुत तेज बुखार होता, जिसकी वजह से आफिस नहीं जा पाते, दवा के लिए रखे पैसे से ही उसके पिता जूता ले आए थे और आज दवा के लिए पैसा नहीं था। इसकी जानकारी होते ही राबिया अपनी जूते की ख़्वाहिश को त्याग देती है और जूते को वापस करके अपनी पिता के लिए दवा ले आती है। कहानी में बच्ची की मार्मिकता और समझदारी का वर्णन शानदार ढंग से किया गया है। इसी तरह अन्य कहानियों में विभिन्न विषयों को बच्चों की चंचलता और समझादारी का वर्णन रोचक ढंग से किया गया है। 74 पेज के इस पेपर बैक संस्करण की कीमत 150 रुपये है, जिसे दीक्षा प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

 सेना सेवानिवृत्त हुए दीपक दीक्षित आजकल लेखन के प्रति काफी सक्रिय और संवदेनशील हैं। कथा लेखन के प्रति अधिक रुचि है। हाल ही में इनका कथा संग्रह ‘दृष्टिकोण’ प्रकाशित हुआ है। 25 कहानियों के इस संग्रह में तमाम रोचक और ज्ञानवर्धक विषय वस्तु का चयन लेखक ने बड़ी होशियारी के साथ की है। लेखक खुद अपने बारे में लिखता है-‘कुछ कहानियां बहुत छोटी हैं पर शायद लधुकथ के मानकों पर खरी न बैठें। वैसे भी मैं अपनी बात को सीधे सपाट न कहते हुए अपने लहजे में उसका वर्णन करना ज्यादा पसंद करता हूं और इसमें मुझे आनंद आता है। इस संग्रह की अधिकतर कहानियां मैंने पिछले दो-तीन सालों लिखी हैं पर कुछ पुरानी कहानियां भी हैं।’ ‘सितारा’ नामक कहानी में नायिका के ख़्यालात यूं बयान किया गया है-‘क्या कुछ नहीं पा लिया उसने जीवन में- यश, धन। अब जो वो कहती थी वही हाजिर हो जाता था पलक झपकते ही, पर सारी चाहतें न जाने कहां गुम होती जा रही थीं।..... अचानक उसका ध्यान घड़ी पर गया और सारे ख़्यालों को एक तरफ झटक कर वो चल दी रात की पार्टी के लिए तैयार होने।’ इसी तरह वास्तविक जीवन के विभिन्न पहलुओं का वर्णन अलग-अलग कहानियों में किया गया है। 100 पेज के इस पेपरबैक संस्करण को लेखक ने खुद प्रकाशित किया है।



देवास, मध्य प्रदेश के रहने वाले अश्विन राम वर्तमान समय में प्रयागराज पाॅवर जनरेशन के.लि. बारा में कार्यरत हैं। कविता सृजन बहुत ही सजगता से कर रहे हैं। हाल ही में ‘एक टुकड़ा धूप’ नाम से इनका कविता संग्रह आया है। छोटी-छोटी 78 कविताओं का यह संग्रह बेहद पठनीय और रोचक भी है। छोटी-छोटी घटनाओं और उनसे उपजे एहसास को कविता के रूप में मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। नई कविता यह स्वरूप बेहद ख़ास सा प्रतीत होता है, वर्ना इस विधा में लोग चार-चार पांच-पांच पेज की बोझिल कविताएं लोग लिख रहे है, जिसे देखते ही मन उचट जाता और पढ़ने का तो बिल्कुल ही मन नहीं करता। लेकिन अश्विन राम ने ऐसा नहीं किया है, छोटी-छोटी कविताओं के माध्यम से मार्मिक, रोचक और पढ़नीय बात कहने का भरपूर प्रयास किया है। पुस्तक की एक कविता यूं है- ‘मैंने/तुमसे पूछा/प्रेम करती हो?/और तुमने कहा ‘हां’/निराश हुआ था उस दिन/मैंने इतना आसान/ सवाल तो नहीं किया था/कि तुम कह दो/तपाक से ‘हां’।’ एक कविता में अपनी अभिव्यक्ति यूं व्यक्त करते हैं-‘तुम्हारे/दरवाज़े पर/मेरी दस्तक देना/पसंद हो या न हो/तब भी दस्तक देता रहूंगा/हो सकता है/मेरी फ़कीरी/तुम्हारे बादशाह होने का/निमंत्रण बन जाए।’ इसी तरह की रोचक कविताएं पूरी किताब में जगह-जगह भरी पड़ी हैं, जिन्हें एक बार अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। पुस्तक के लिए कवि बधाई का पात्र है। 100 पेज के इस पेपर बैक संस्करण को रश्मि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 199 रुपये है।

( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )