गुरुवार, 29 जुलाई 2021

‘उस नदी के घाट पर ही काफिला रह जाएगा’

लखनऊ के बीएसए विजय प्रताप के सम्मान में काव्य गोष्ठी



प्रयागराज। साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ की तरफ से 26 जुलाई को हरवारा, धूमनगंज में लखनऊ के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विजय प्रताप सिंह के सम्मान में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि शैलेंद्र कपिल ने किया, मुख्य अतिथि बीएसए विजय प्रताप सिंह थे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। सबसे पहले फरमूद इलाहाबादी ने हास्य-व्यंग्य की शायरी पेश की-‘यार बीबी को खंडर जब कह दिया तो कह दिया/ बरतरफ ख़ौफोखतर जब कह दिया तो कह दिया।’

प्रभाशंकर शर्मा की इन पंक्तियों को खूब सराहा गया-‘मेरे अल्फाज अदब जो भी हैं, दिल से कहता हूं मेरी मां जाने /उससे अपना जो भी रिश्ता है, दर्द कम होगा, बस दुआ जाने।’ शिबली सना ने कहा-‘याद आ रहा है वह जिसे भूला बैठे / आज दिल पे फिर गम के बादल का मौसम है।’ डाॅ. नीलिमा मिश्रा की गजल खूब सराही गईं-‘उल्फत है बेमआनी बिना ऐतबार के / भूले हैं सारे वादे वो अपने करार के।’

इम्तियाज अहमद गाजी के के अशआर यूं थे-‘कुछ सलीका सिखा गईं गजलें / फर्ज अपना निभा गईं गजलें। इश्को-माशूक तक नहीं कायम/ पूरे गुलशन में छा गईं गजलें।’ मुख्य अतिथि विजय प्रताप सिंह ने अलग अंदाज की शायरी पेश की, कहा-‘ बस नदी के पार तक ही लोग लेकर आएंगे / उस नदी के घाट पर ही काफिला रह जाएगा।’ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि शैलेंद्र कपिल की कविता यूं थी-‘कोई सुबह अजनबी नहीं होती / कोई मुलाकात अजनबी नहीं होती/ संयोग कर्मों के अनुसार उपस्थित होते, प्रयोगों, प्रयासों से जिन्दगी बनती/ छनती और संवरती।’ अंत में अफसर जमाल ने सबके प्रति धन्यावद ज्ञापित किया।

रविवार, 11 जुलाई 2021

उर्दू के सही उच्चारण के बिना फिल्मों में नहीं मिलता काम : अजमेरी


23 जनवरी 1961 को राजस्थान के अजमेर में जन्मे आफ़ताब अजमेरी फिल्म इंडस्ट्री में मुख्यत कलाकारों को उर्दू का सही उच्चारण करना सीखाते हैं। इंडस्ट्री के लगभग सभी बड़े स्टार को इन्होंने यह गुण सिखाया है और आज भी सिखा रहे हैं। आपने स्नातक की पढ़ाई अजमेर से पूरी करने के बाद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से अदीब, माहिर, कामिल की डिग्री हासिल की। शायरी का शौक़ बचपन से ही रहा है। पहले मां और फिर बाद में पत्नी ने इनके काम में काफी सहयोग किया। कलाकारों को उच्चारण सिखाने के साथ इन्होंने कई फिल्मों के लिए डायलाॅग और गीत भी लिखे हैं, तमाम फिल्मों और टीवी सीरियलो में अभिनय भी किया है। उर्दू शायरी के लिए उन्होंने अपने उस्ताद से अरुज़ आदि भी सीखा है। मुशायरों में भी जाते रहे हैं। अनिल मानव ने इनसे विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है उसका प्रमुख अंश।


                                 दिलीप कुमार के साथ आफ़ताब अजमेरी (फाइल फोटो)



सवाल: फिल्मी अदाकारों को उर्दू का उच्चारण सिखाने के लिए क्या करना पड़ता है, इसमें किस प्रकार की दिक्कतें आती हैं ?

जवाब: आपने बिल्कुल सही फरमाया। मैं बतौरे-ख़ास फिल्म स्टारों को उर्दू की तालीम देता हूं। जो अपने तलफ़्फुज, उच्चारण या प्रोनॉन्सिएशन सही करना चाहते हैं, उन्हें सीखताा हूं। मगर जिनको मैंने पढ़ाया उनका नाम मैं नहीं लेना चाहता, क्योंकि कुछ लोग कहते हैं जैसे- ऋषि कपूर, रितिक रोशन...। इनको थोड़ा सा एतराज है, कि साहब! आप हमारे नाम का सहारा लेकर अपने आप को पॉपुलर कर रहे हैं। जी-न्यूज में भी मैंने एक इंटरव्यू दिया था। उसमें सब स्टारों के नाम ले लिए थे। तो उनको नाराजगी हुई थी। कहा साहब! आप हमें पढ़ाते हो। उसके पैसे लिए थे। बहरहाल मैं यह अर्ज करना चाह रहा था कि पढ़ाने के लिए  जो स्टार हैं उनका तलफ्फुज़ दुरुस्त कराने होते हैं। उर्दू लिखना और पढ़ना नहीं सीखना होता। क्योंकि वह बोलते ग़लत हैं ‘सीन’ की जगह ‘शीन’ बोलते हैं। उनको यह मालूम नहीं होता, कि सीन, नून, ग़ैन ये कहां बोले जाते हैं। जबकि यह हुनर मैं जानता हूं। बहुत सारे लोग लिखते-पढ़ते भी हैं। और वो लिखना-पढ़ना भी सीखना चाहते हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि खाली हमारा तलफ़्फुज दुरुस्त करा दो, ताकि जब हम डायलॉग बोले, तो उसमें तलफ़्फुज की ग़लतियां न हो। इसके लिए मेरा नाम स्क्रीन पर भी आता है। जिन फिल्मों और सीरियलों के अंदर मुझे डायलॉग डायरेक्टर की हैसियत से बुलाया जाता है, वहां पर मैं अपना नाम देता हूं। हर सेट पर एक डायलॉग डायरेक्टर तो होता ही है। इससे अच्छा असर पड़ता है। ग़लतियां दुरुस्त हो जाती हैं। फिल्म अच्छी होती है। ऐसा लोगों का मानना है। इस काम के अंदर बहुत-सी दुश्वारियां आती हैं, क्योंकि जो भी शख़्स हो, वह जिस जगह का होता है। वहीं की भाषा बोलता है। पंजाब का एक बंदा मेरे पास आया। उसने कहा हम भी पढ़ेंगे।  उनका जो टोन और लबो-लहजा था। वह पंजाबी था। वह जब भी बोलते तो पंजाबी अंदाज़ में ही बोलते थे। जो नजाकत और नफ़ासत उर्दू में है, वह उनकी जुबान में नहीं आ रही थी। वह उनके लबो-लहजे में नहीं आ रहे थे। उर्दू तो माशाअल्लाह एक ऐसी मीठी और प्यारी जुबान है। किसी ने क्या खूब कहा कि--वो जो बोले तो हर एक लफ्ज से खुशबू आये/ ऐसी बोली वही बोले जिसे उर्दू आये।’ 

 आजकल मैं एक बंगाली लड़के को पढ़ा रहा हूं। वह बंगाल के फिल्मों का हीरो है। यहां वह मुम्बई में आया हुआ है। इसमें इतनी तकलीफ होती है, कि उसे तलफ़्फुज दुरुस्त आ ही नहीं रहा। लेकिन यहां की फिल्मों में काम करने के लिए उसे सही तलफ़्फुज वाली हिंदी-उर्दू बोलनी है। अभी-अभी आपने एक सवाल किया, कि मैं जो उर्दू पढ़ाता हूं। उसका सर्टिफिकेट उर्दू में क्यों नहीं आता। हां, यह एक बड़ी अजीब बात है। हमारी बहुत सारी फिल्में जैसे ‘लैला-मजनू’ और बहुत सारे सीरियल जैसे ‘इश्क सुबहान अल्लाह’ चल रहा है। इसके अलावा ‘कुबूल है’ सीरियल जिसके अंदर मैंने 3 साल तक काजी मौलवी का रोल किया है।  उसकी हीरोइन चेंज हो गई। हीरो आर्टिस्ट लोग आते रह जाते रहे। लेकिन गुलबानो जो इसकी प्रोड्यूसर है। उन्होंने कहा नहीं साहब आफ़ताब आजमेरी ही हमारे फिल्म का काजी रहेगा। और आखिर में तीन साल बाद ताजमहल में जाकर उसका आखिरी एपिसोड हुआ। मुंबई में उसके अंदर मैंने उसी हीरो-हीरोइन को निकाह पढ़ाया और फिल्म खत्म हुई। इसी तरह ‘जोधा-अकबर’ एक सीरियल है। उसके अंदर मैंने दो साल तक जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का सलाहकार के रूप में काम किया। और बहुत सारी सीरियल हैं जिसमें उर्दू की ज़रूरत पड़ती है। आप मुझे गूगल पर सर्च करेंगे तो उसके साथ काजी आफताब आजमेरी लिखा हुआ आएगा। हालांकि मैं काजी नहीं हूं। मैं तो शेख हूं। लेकिन क्या है, फिल्मों में काम कर-कर के ‘काजी’ वाला काम करते-करते मुझे गूगल वालों ने भी काजी आफ़ताब आजमेरी कर दिया। वैसे मैं रोल हर तरह का करता हूं। क्योंकि हम एक्टरों की जिं़दगी ऐसी ही है-‘रोज नए सांचे में ढलती रहती है/ज़िंदगी क्या-क्या रंग बदलती रहती है। मैं भी एक उम्मीद लगाए फिरता हूं/सुनता हूं तक़दीर बदलती रहती है।’ और यक़ीनन मेरी जिं़दगी बदल रही है अल्लाह का बड़ा एहसान है।


                                      सलमान खान के साथ आफ़ताब अजमेरी                             

सवाल: आपने यह काम कब से शुरू किया ? इसकी शुरूआत कैसे हुई ?

जवाब: फिल्म इंडस्ट्री में मैं आया नहीं, बल्कि लाया गया हूं। मैं अजमेर के मोनिया इस्लामिया हाई सेकेंडरी स्कूल के अंदर जे़रे-तालीम था, तो एक फिल्मी यूनिट आकर के ठहरा।  जिसके अंदर हाजी मस्तान साहब ने सोना को और सतीश कौल को लेकर एक फिल्म बनाई थी। उसका नाम था ‘सुल्तान-उल-हिंद’। उसकी शूटिंग होने के लिए आई तो सब लोग बड़े खुश थे। मैंने देख, कि मधुबाला की एक हमशक़्ल औरत बाद में उसका नाम पता चला कि वह मधुबाला नहीं थी, बल्कि सोना थी। और वही उस फिल्म की हीरोइन थी। एक शख़्स से हमने कहा कि हमें भी इस फिल्म में काम मिल जाए तो इसके लिए किस से बात करें। उन्होंने कहा कि वह सामने बैठे हैं लूंगी और कुर्ता पहने हुए वे हाजी मस्तान हैं। उनके पास जाकर कहो, वो काम दे सकते हैं। मैंने जाकर उन्हें सलाम किया और कहा कि सर मुझे भी आपकी फिल्म इंडस्ट्री में काम मिल जाए तो अच्छा होगा। उन्होंने चश्मा उतारते हुए कहा कि क्या काम जानते हो ? क्या करते हो ? मैंने कहा, कि मैं शायर हूं। मैं कुछ भी काम कर लूंगा। उन्होंने कहा शायर हो तो सरकार गरीब नवाज के लिए लिख रहे हैं हम। सरकार पर मनक़बत लिखो, कव्वाली लिखो, तो हम तुम्हें काम दे देंगे। तो मैंने कहा शुक्रिया। बस इतनी-सी बात की और सलाम करके चला आया। फिर उसके बाद मैं नसीम अजमेरी साहब से मिला और उनको मैंने बताया कि भाई इस-इस तरह से चाहिए। वह उस्ताद थे। बेहतरीन शायर थे। उनके साथ फिर हम लग गए। और हमने एक कव्वाली लिखी-‘आफताब-ए-रिसालत मदीने में है/ और किरण जगमगाती है अजमेर में।’ जो मशहूर कव्वाली हुई। पाकिस्तान के मशहूर कव्वाल ने गायी। साबरी ब्रदर्स, जिन्होंने पहले सरकार गरीब नवाज में यह कव्वाली गायी। फिर उसके बाद स्टूडियो के अंदर उसकी रिकॉर्डिंग हुई। और उसी यूनिट के साथ मैं यहां मुंबई आ गया। वह फिल्म जब तक बनती रही। तब तक मैं उनके ऑफिस के अंदर जो तारदेव में तीन महले पर था। हाजी मस्तान का ऑफिस, जिसमें मैं रहता रहा। खाना-पीना मुझे मिलता था। उनकी फिल्मी यूनिट के साथ शूटिंग के लिए चला जाता था। और उसके अंदर कई जगह मेरे छोटे-छोटे कुछ सीन भी हैं।  जहां ज़रूरत पड़ी, वहां मुझे उन्होंने इस्तेमाल किया। जब वह फिल्म कंप्लीट हो गई, तो उन्होंने मुझसे कहा भाई हमारी फिल्म हो गई और अच्छी चली। अब आप वापस अपने घर अजमेर जा सकते हैं। अब मैं क्या जाता ? किसको क्या मुंह दिखाता ? लिहाजा फिर मैं वहीं कोशिश करता रहा। आज मैं यहां फिल्मों में सिंटा का मेंबर हूं। जूनियर आर्टिस्ट का मेंबर हूं। चीफ सेना का मेंबर हूं। और आल इंडिया फिल्म राइटर एसोसिएशन का मेंबर हूं। मैंने राइटर एसोसिएशन में कई कहानियां भी लिखीं। सीन भी लिखता हूं। डायलॉग भी लिखता हूं। इसके अलावा मैंने एक फिल्म थी जो राज कपूर साउंड रिकॉड्रेस अलाउद्दीन खान साहब बना रहे थे। उनकी फिल्म का नाम था ‘खुफिया’। हीरो थे उस जमाने के जितेंद्र जी और विद्या सिन्हा हीरोइन थी। डेविड साहब ने उनके बाप का रोल किया था। बहुत अच्छी स्टार कास्ट थी उस ज़माने की। उनके पास मिलाया मुझे किसी ने। और कहा कि भाई यह शायर हैं, तो उन्होंने कहा कि तुम गाना लिखो। उन्होंने पहली बार कल्याणजी-आनंदजी भाई के पास ले गए। उनके बंगले पर हम लोग पहुंचे। उन्होंने कहा कि यह शायर हैं हमारे लिए ये गाना लिखेंगे। तो उन्होंने कहा, कि सिक्वेंस बता दिया आपने। उन्होंने कहा कि ‘हीरो-हीरोइन का छेड़छाड़ वाला गाना है।’ वो बैठ गए हारमोनियम पर और उन्होंने कहा डडा डडा डा डडा डूडू. मैंने कहा, ये क्या है। तो उन्होंने कहा भाई! यह लिख लो आप। मैंने कहा ये तो मेरे समझ में नहीं आया। मैंने आज तक जो शायरी की है। उसके अंदर एक मिसरा दिया जाता है और उसके ऊपर हम शायरी करते हैं। लेकिन उन्होंने ऐसी धुन दे दी और उसको कह दिया, कि यह मीटर है। इसी मीटर पर आपको लिखना है। यह मेरे लिए बड़ी दुश्वारी ही हुई। लेकिन मैंने कहा मुझे कोशिश करके कामयाब होना था। इसलिए मैंने उनका वह मीटर लिख लिया। और उस मीटर पर लिखने के बाद एक गाना लिखा। जो बहुत पॉपुलर हुआ। मोहम्मद रफी साहब और लता जी के आवाज में फिल्माया गया। और म्यूजिक डायरेक्टर उसके कल्यानजी भाई-आनंदजी भाई हैं। उसके फिल्म का नाम है ‘खुफिया’। मैंने लिखा- ‘हुस्न शिकारी बन कर आया हो गया खुदी शिकार/जीत के सपने देखने वाले हो गई तेरी हार।’ इसमें जितेंद्र जी का बड़ा थिरकना-मटकना जो उनकी स्टाइल थी। बहुत ही अच्छा किया। और वह मेरा पहला गाना इस तरह से हुआ। बाद में इंदीवर जी से जुड़ गया और उन्होंने मुझे अपना असिस्टेंट लिख रख लिया। उनके लिए मैं लिखता था। वह जो मिसरा मुझे देते थे, जो सिचुएशन बताते जाते थे मुझे उस पर मैं लिखता था। और फिर कई मुख़्तलिफ लोगों के साथ काम किया मैंने। खासतौर से मैंने क़ादर खान साहब के साथ। उन के बहुत सारे असिस्टेंट थे। उनमें मैं भी एक असिस्टेंट रहा। और मुझे रोज़ाना के पैसे मिलते थे जो मेरे खर्च के लिए काफी होते थे। इस तरह से मेरा यह फिल्मी सफ़र शुरू हुआ।


ऋषि कपूर के साथ आफ़ताब अजमेरी (फाइल फोटो)


सवाल: फिल्मों में अभिनय करने के ख़्वाहिशमंद नए लोगों के लिए उर्दू उच्चारण की सही जानकारी कितनी ज़रूरी है ?

जवाब: बहुत अच्छा सवाल किया मानव साहब आपने। जो नए लोग आते हैं उनका जब ऑडिशन होता है। नए लड़के और लड़कियां जो हैं, वो सही डायलॉग नहीं बोल पाते या उनका तलफ़्फुज वगैरह नहीं दुरुस्त होता। तो वहां कहा जाता है, कि ‘तुस्सी तो पंजाबी हो।’ यह उर्दू सीरियल है। यहां पर इससे काम नहीं चल पाएगा। आजकल फिल्मों के बजाय वेबसीरीज बहुत बन रही है। हुआ यह है कि फिल्म स्टार जबसे कोरोना आया है, जब से यह बीमारी शुरू हुई। तब से सारे स्टार्स कुछ तो मुंबई से बाहर चले गए हैं और कुछ जैसे सलमान खान जैसे लोगों ने अपने फॉर्म हाउस के अंदर ही सेट लगा दिया है। ‘बिग-बॉस’ करने के लिए वह घर से निकलते हैं और अपने सामने वाले मैदान पर डायलॉग बोलते हैं और वापस अपने घर में चले जाते हैं। आमिर खान, शाहरुख खान और बहुत सारे स्टार्स मुंबई से बाहर चले गए हैं। जब तक यहां खतरा है। वह लोग वहां से लौटकर नहीं आने वाले हैं। सही भी है जिं़दगी अनमोल है। लेकिन अक्षय ऐसे आदमी हैं, जो अभी तक शूटिंग कर रहे हैं। उनकी डे-नाइट शूटिंग चल रही है। उनका वही क्राउड है। वही शोर-शराबा है। खाली अक्षय यहां पर सक्रिय हैं और काम कर रहे हैं।

 वेब सीरीज इसलिए ज्यादा बन रही है, क्योंकि जो लड़के-लड़कियां नये आए हैं। वो ‘बालाजी’ या बालाजी जैसे और दूसरे प्रोडक्शन उन लोगों को हीरो-हीरोइन के रूप में ले लेते हैं। उन पर एक छोटी सी कहानी लिखते हैं। दो घंटे या एक घंटे की। और उसकी वेबसीरीज बनती है। वह सस्ती बन जाती है। फटाफट बनती है। क्योंकि डे-नाइट काम होता है। वो आर्टिस्ट ऐसी डेटों का प्रॉब्लम नहीं डालते, जैसे हमारे स्टार डालते हैं। उनकी अभी एक डेट है, फिर महीने दो महीने तक डेट नहीं होगी। वेब सीरीज वाली फिल्म जल्दी बन जाती है। और मोबाइल पर भी चलती है। इसलिए वह बिक भी जल्दी से जाती है। इसलिए वेबसीरीज आजकल अधिक कामयाब है। सीरियल तो बहुत मुख़्तसर चल रही हैं। जो डे-नाइट चल रही हैं। जो कई महीनों सालों से चल रही हैं, वही चलती जा रही हैं। उनको और बढ़ावा मिल रहा है। उनके अगले एपिसोड बनते रहते हैं। बस मैं यह कहना चाहता हूं, कि नए लोगों के लिए भी उर्दू सीखना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि जब तक वह सीख नहीं पाते हैं तब तक उन्हें काम नहीं मिलता है। उन्हें वापस कर दिया जाता है। बहुत से लोग फिल्मी दुनिया में काम करने के लिए आए और उनकी यहीं पर पूरी उम्र गुजर गई। कुछ नहीं कर पाए। छोटे-मोटे, कहीं पर खड़े हैं, कहीं बैठे हैं, कहीं एक लाइन का डायलॉग मिल गया, पूरी उम्र गुजर गई। अभी लाॅकडाउन में हमारे यहां बहुत सारे लोग आए थे करेक्टर करने के लिए। जो जूनियर आर्टिस्ट में थे। बहुत सारे लोगों की मौत हो गई। उनके पास घर-बार नहीं, ठिकाना नहीं। कुछ बना नहीं पाये। कुछ कर नहीं पाए। इसलिए वो लोग ऐसे ही मर गए। और जब उनके घर वाले को पता चला, वो लोग आए, तो हमें ताज्जुब हुआ कि वह बहुत बड़े घराने के लोग थे। बड़ा कामयाब बनाना था। बहुत पढ़े लिखे थे। और यहां पर ठोकरे खा-खाकर ख़त्म हो गए। तो यह मुंबई है, जो कि रोज नए सांचे में ढलती रहती है।


विनोद खन्ना के साथ आफ़ताब अजमेरी (फाइल फोटो)


सवाल: आप शायरी से कब से जुड़े हैं ? किन विधाओं की शायरी करते हैं, आपका कोई उस्ताद भी है ?

जवाब: बचपन से ही मैं शेरो-अदब की दुनिया में दिलचस्पी रखता हूं। इसके अंदर सबसे बड़ा दखल मेरी वालिदा मोहतरमा शफाद बानो मिर्ज़ा का है। जिन्होंने मुझे बचपन से नाते-नबी और इक़बाल के नगमे याद करा दिए थे। और मैं स्कूल के ज़माने में स्कूल के स्टेज पर या तो ख्व़ाजा गरीब नवाज के दरबार में मनक़बत पढ़ता था। इस तरह मेरी शेरो-अदब का जौक़ बढ़ता गया। पहले वहां एक बड़े मशहूर उस्ताद थे, जिनका नाम था आरसी उस्ताद। उन्होंने फिल्म डंका में गाने लिखें। उसके बाद एक हाफिज कमर आसिफ थे। एक कैसर शाहजहांपुरी मशहूर शायर थे, जो शकील बदायूनी के शागिर्द थे। उनसे भी मैंने इस्लाह ली और मैं बस कोशिश करता रहा। और जो भी मोतबर शख़्स मिला। उसे मैंने कहा कि मोहतरम इसे दुरुस्त कर दें। बस समझ लीजिए वही मेरे उस्ताद हैं। और इस तरह से मेरे कई उस्ताद रहे। आज भी मैं अपने आप को मुकम्मल नहीं पाता। मैं समझता हूं कि यह बहुत बड़ा समंदर है और इसके अंदर ढलने के लिए ज़रूरी है कि कोई एक सहारा हो। कोई एक पतवार हो, एक कश्ती हो। जिसके जरिए इस समंदर को पार कर सकें। दिल में तो एक समंदर है जितना पढ़ते जाइए बढ़ते जाइए। मैं गजलियात, नज्में, दोहे, कतात, नाते-नबी, मनक़बत आदि लिखता हूँ। 

सवाल: फिल्मों में जो गीत लिखे जाते हैं, उनके लिखने वाले ज्यादातर उर्दू के ही शायर है, ऐसा क्यों ?

जवाब: दरअसल यह है, कि उर्दू में जितने भी गाने लिखे गए या जितने फिल्मों में गीत लिखे जाते हैं। उसके गीतकार इंदीवर और बहुत सारे लोग हिंदू भी हैं, मगर मगर इत्तेफ़ाक़ की बात यह है कि वह पुराने जमाने के लोग हैं और उर्दू से वाक़फ़ियात रखते हैं। वहीं ज्यादा बेहतर लिख सकते हैं, जो उर्दू जानते हैं। क्योंकि उर्दू मीठी ज़बान है। उर्दू की जो शेरीयत है जहनो-दिल में उतरती चली जाती है। चैनो-सुकून बख्सती है, और वही कामयाब है। आज के दौर में जितने गाने लिखे जा रहे हैं। देर तक नहीं याद किए जाते। लोग सुनते हैं और फिल्म थिएटर हाल से बाहर निकलते-निकलते भूल जाते हैं। कि क्या था वो गाना यार ? उसी वक़्त वह गाना डिंग डोंग करके निकल जाता है। मगर पिछले ज़माने के गाने जो मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले आदि जितने भी लोगों ने गाए हैं। वो आज भी लोगों के जे़ह्न ओ दिल में है। अपने तन्हाई को दूर करने के लिए और सुकून हासिल करने के लिए आज भी सुने-सुनाये जाते हैं। 


सैफ़ अली खान के साथ आफ़ताब अजमेरी


 सवाल: फिल्मों के डायलाग कैसे मुकम्मल होता है ?

जवाब: जब मैं यहां आया था तो राज कपूर के साउंड रिकॉर्ड्स अलाउद्दीन खान की फिल्म में मौका मिला था और उसके बाद मैंने कई जगह लिखे, लेकिन वो गाने मेरे नाम से नहीं हो सके। जाहिर है, कि जब इंदीवर जी के साथ आप काम कर रहे हैं। असिस्टेंट हैं। तो जो भी लिखेंगे, जो भी नाम होगा, इंदीवर जी का होगा। कादर खान साहब अकेले थोड़ी लिखते थे सारे डायलॉग। उनके कई असिस्टेंट थे। एक स्क्रिप्ट आती थी। उसमें कह दिया जाता था, कि भाई! अमिताभ बच्चन का एक डायलॉग है। एक लाइन दी जाती थी मिसरे की तरह कि ये डायलॉग बोलना है। और यह सीन है। एक ही कहानी पर एक ही लाइन पर दस लोग डायलॉग लिखते थे और शाम को कादर खान आकर उसका करेक्शन करते थे। दिन भर काम करने वाले लोगों की पेमेंट उनको दी जाती थी। इस तरह से कादर खान की वह स्क्रिप्ट मुकम्मल होती थी। और उसे वह बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ से अपने जहन से कुछ अल्फाज़ मिलाकर प्रोड्यूसर को देते थे। उसके वह लाखों रुपए लेते थे। लिखने वाले लोगों को जो भी उनका मुआवजा तय होता था वह दे दिया जाता था। तो इस तरह से मैंने कोशिश भी की है और काम मिला भी है। अल इंडिया फिल्म रायटर्स एसोसिएशन का 35 साल पुराना मेंबर भी हूं।

( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित )


शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

गुफ़्तगू के जून-2021 अंक में

 


3. फोटो फीचर

4. संपादकीय (सोशल साइट्स पर भी लगाम ज़रूरी )

5-10. तरक़्क़ी पंसदी ने अब्दुल हई को साहिर बनाया- अली अहमद फ़ातमी

11-21. ग़ज़लें (बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, इब्राहीम अश्क, मंज़र भोपाली, आफ़ताब अजमेरी, बीआर विप्लवी, आरडीएन श्रीवास्तव, मासूम रज़ा राशदी,  इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, असगर शमीम, साजिद अली सतरंगी मेरठी, विजय प्रताप सिंह, तामेश्वर शुक्ल तारक, नरेश महरानी, अनिल मानव, अभिनव अरुण, ओम प्रकाश नदीम, मंजुल मंज़र लखनवी, प्रकाश प्र्रियम, शगुफ़्ता रहमान सोना, राज जौनपुरी)

22-31. कविताएं (यश मालवीय, शांतिभूषण, अरविंद असर, डाॅ. मृदुल शर्मा, शैलेंद्र जय, नीना मोहन श्रीवास्तव, मोतीलाल दास, संजय सक्सेना, रचना सक्सेना, ऋचा सिन्हा, अनुजा मिश्रा, अनिल मिश्र गुरुजी, केदारनाथ सविता, रमोला रुथ लाल आरजू, श्रीराम तिवारी सजह, ममता सिंह, रेनू मिश्रा दीपशिखा, सुजाता सिंह)

32-35. इंटरव्यू (जावेद अख़्तर )

36-37. नज़रिया (लावा यानी जावेद अख़्तर का जादू- पवन कुमार )

38-42. चौपाल (आप मुक्त छंद कविता को किस रुप में देखते हैं ?- सोम ठाकुर माहेश्वर तिवारी, यश मालवीय, विज्ञान व्रत, रविनंदन सिंह )

43-46. तब्सेरा ( पावन स्मृतियां, हम हैं देश के पहरेदार, निगाहों में बसा सावन, देश की 11 कवयित्रियां, उत्तर प्रदेश की सात कवयित्रियां, परसी थाली - अजीत शर्मा आकाश)

47-49. उर्दू अदब (कामयाबी सिर्फ़ छह कदम पर, बिहार, बंगाल और उड़ीसा के क़लमकार, सैयद मोहम्मद अली शाह मयकश अकबराबादी - डाॅ. हसीन जीलानी )

50-51. गुलशन-ए-इलाहाबाद (बेहद जिन्दादिल कमेंटेटर थे इफ्तेख़ार पापू - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी )

52. रंगमंच (विभांशु ने मेहनत से फिल्म और टीवी की दुनिया में बनाया मकाम - ऋतंधरा मिश्रा )

53-54. ग़ाज़ीपुर के वीर-14 (टी-सीरीज के चहेते गीतकार थे अंजुम ग़ाज़ीपुरी- मोहम्मद शहाबुद्दीन खान )

55-60. अदबी ख़बरें

!! परिशिष्ट: केके सिंह मयंक अकबराबादी !!

61. केके सिंह मयंक अकबराबादी का परिचय

62. कुछ ख़ास लोगों के साथ केके सिंह मयंक

63-64. मयंक के बारे में अदीबों की राय

65-66. विद्रूपताओं को अभिव्यक्त करने का सहज प्रयास- डाॅ. शैलेष गुप्त वीर

67. जीवन की तल्ख़ सच्चाई बयां करती हुई ग़ज़लें- शिवाजी यादव

68-127. केके सिंह मयंक अकबराबादी के कलाम

  


बुधवार, 30 जून 2021

रचनाओं में जीवन-जगत का अद्यतन स्वरूप



                                                
 अमर नाथ श्रीवास्तव

 कवि जमादार धीरज के गीत का समय है वह 40 वर्ष से उपर का है, इसलिए इनकी भाषा और काव्य दृष्टि को इसी संदर्भ में देखना और समझना ज़रूरी है। इनकी रचनाओं में जीवन-जगत का अद्यतन स्वरूप, जिसका एक सामाजिक सरोकार है, जगह-जगह देखने को मिलता है। लेकिन प्रकृति का वैभव और मनुष्य की गरिमा भी इनकी रचना केंद्र में हैं। जहां जीवन का  नाकारात्मक चित्रण है वहां भी ‘सबसे उपर मानुष....’ का भाव ही उभरकर सामने आता है। गीत एक मनः स्थिति विशेष और भावना विशेष के बिंदु का विस्तार है। इनके गीत चाहे रूपासिक्त को, निराश मन के उद्वेलन का है, चाहे देश प्रेम का, सबमें भावों के उद्मग का सफल विस्तार है। इस विस्तार का संप्रेषित करने में इनकी काव्य भाषा जो पिछले चालीस-बयालिस साल से अपना स्वरूप् निर्धारित कर रही है बहुत सहायक है। कभी-कभी तो आश्चर्य होता है कि ऐसी जन संप्रेष्य और जन संवेद्य भाषा का लोप क्यों होता जा रहा है ? क्या आधुनिकता के नाम पर जिस तरह हम बनावटी चमक-दमक में खुद की पहचान भूूलते जा रहे हैं, कभी भाषा के साथ भी तो ऐसा ही नहीं हो रहा है। समकालीनता और आधुनिकता के संदर्भ में निस्संदेह एक नई भाषा चाहिए जो अपनी जड़ से जुड़ी है। कवि जमादार धीरज की पहचान इनकी लोक भाषा की जड़ में है। इसको पहचानने के लिए इनकी अवधी की रचनाओं में भाव और भाषा की समृद्धि को पहचानना ज़रूरी है। मुझे याद है विद्वान समीक्षक डाॅ. राम विलास शर्मा ने अवधी अप्रतिम कवि पं. बलभद्र दीक्षित पढ़ीस को निराला को निराला के साथ ही उदकृत किया है। इन संदर्भ में उनका एक लेख भी महत्वपूर्ण है। 
  मैं जमादार धीरज की भाषा की जड़ इनकी अवधी ज़मीन में देख रहा हूं। इनकी एक कविता है ’सूखा’। कविता शुरू होती है-
                    हम कहा तेवार काउ करी
                    सूखा नहरा, बालू चमकड़
                    कीरा का केंचुल अस लपकड़
                    देखत-देखत अंखिया सूनी
                    ना बादर से टपकड़ बूनी
                    सूखी बेहनि, जरि गई बजरी
                    हम कहा तेरी काउ करी।
नहर का सूखना, सांप के केंचुल जैसा बालू का चमकना जैसा अप्रस्तुत विधान के साथ ही हम कहा तेवारी काउ करी, जैसा संबोधन जमादार की काव्य प्रतिमा को उद्भासित करता है। देस-जवार की चिन्ता, वहां की मिट्टी की खुश्बू और कीचड़-कांदो में सने रहकर भी इस मिट्टी की चमक से गौरवान्वित होने की अनुभूति और इस गौरव पर आये संकट की पहचान कवि धीरज की हिन्दी कविता में, इसी अवधी भाषा के शिल्प से आती है। इसलिए इनकी भाषा में शिल्प का प्रयोग कम है, लेकिन परंपरा के निर्वाह में नयेपन की एक चमक है, जो आजकल कम देखने को मिलती है।
  रचनाकार के गांव की मिट्टी देश की पवित्र मिट्टी बनती है और अपनी मातृभूमि की चिंता इनके गीतों में उजागर होती है। कवि काश्मीर की सुषमा और उस पर आये संकट को चित्रित करता है -
                           खुश नहीं क्यों आज बादल
                           वादियों को चूम कर
                           सेब की बगिया बुलाती
                           है नहीं क्यों झूमकर
                           क्यों कली कश्मीर की
                           सहमी हुई, सूखे अधर
                           झील की रंगीनियों को
                           लग गई किसी नज़र
जैसा मैंने पहले ही कहा कि इनकी भाषा को समझे बग़ैर इनकी कविताओं को समझना एक बंधे-बंधाये फार्मूले को अनुकरण जैसा ही होगा। जमादार धीरज के गांव की भारतीय नारी अब भी वही है जहां सालों पहले थी। उसकी मर्यादा इस आधुनिकता की दौड़ में भंग हुई है। गांव में शहरों के प्रवेश ने जीवन-मूल्य पर अर्थ को वरियता दी है। जिसकी शिकार सबसे पहले औरत है। इस चिन्ता को, जो उनके गांव की बहू बेटी की चिंता है और प्रकारान्तर से पूरे भारतीय समाज की चिंता है, रचनाकार ने अनेक रचनाओं में व्यक्त किया है। उनकी नारी शीर्षक की कविता में उस स्त्री की व्यथा-कथा है जो राजा की पत्नी होकर भी बेंच दी गई, दुर्दिन के बहाने। उस औरत की कहानी है जो वन में पति का साथ देती है, लेकिन वहां अपहृत हो जाती है। विरह की आग में झुलसती रही लेकिन जब दिन बहुरे तो उसे अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी। कवि पूछता है कि इससे किस मर्यादा की रक्षा हुई। कवि उस साध्वी स्त्री का भी जिक्र करता है, जहां भ्रष्ट और कामान्ध देवराज यथावत है किन्तु अबोध स्त्री को शिला होने का शाप झेलना पड़ता है। ये सभी मिथक निरर्थक हो जाते हैं अगर रचनाकार इन्हें तन्दूर में भून डाली गई सुनयना के पति की क्रूरता के साथ चित्रित नहीं करता। यह संदर्भ पाकर प्रस्तुत कविता अत्याधुनिक हो जाती है और निसंदेह रचनाकार की सामाजिक चेतना और उसकी मूलदृष्टि स्पष्ट होती है। यद्यपि यह रचना छंद की है लेकिन इसमें जो लयात्मकता है, इसे गीत की कोटि में लाती है। 
  जमादार धीरज के गीतों के मूल में एक पीड़ा है जो प्रत्यक्ष उनकी निजी है लेकिन उसका दायरा बड़ा है। सम्प्रेषणीयता के स्तर पर मुक्ति बोध का कथन समीचीन है कि ‘जो वस्तु देखने में निजी होती है, कविता में उसके बहुत बड़े हिस्से पर देश और समाज होता है’। इस प्रकार इनकी रचना अपनी क्षमता के चलते बहुतों की हो जाती और पूरे समाज की चिन्ता से  
उद्वेलित है। कवि अपनी ‘आंसू’ कविता मे कहता है -
                        नये गीत सब गई उमंगे
                        एक साथ मिट गयी तरंगे
                        सूखे अधर कंठ रूठे हैं
                        अब स्वर में संगीत नहीं है
                        आंसू है, यह गीत नहीं है।
इन आंसुओं के कारक के तत्व रचनाकार की स्मृतियां हैं-
                        मन के सागर में उठती है
                        यादों की अविराम तरंगे
                        रह-रह कर उभरी आती है
                        बीते क्षण की छिपी उमंगे
                        छोटे से जीवन में साथी
                        तेरे मन की थाह न पाया
संभवतः यह गीत किशोरावस्था का है और इसमें बाद की ‘जीवन सांझ’ ढलती वय का गीत है। दोनों रचनाओं में रचनाकार की उम्र बोलती है। उम्र की इन सीढ़ियों का अनुभव कविता में रचनकार बहुत की कुशलता से व्यक्त करता है। इन गीतों को ‘वियोगी होगा पहला कवि’ जैसी प्रसिद्धिा भले न मिले लेकिन इनकी भाव-सघनता रसात्मक है जो नहीं भूलती। यह समझना आनंदायक है कि रचनाकार के जीवन की निराशा में प्यार का रूप है या असफलता उसे जीवन की असफलताओं के रूपक से जोड़ती है। रचनाकार कहता है-‘ गीत रूठे हुए कंठ सूखे हुए, शब्द अधरों पे आने से डरने लगे’ लेकिन इसी पीड़ा के आसपास न घूम कर वह कहता है ‘ जल रहे हैं दिये पर हटा तम नहीं, हम सजाते हुए थाल चलते रहे’। प्यार की निराशा से उपजे अंधेरे का विस्तार तो रचनाकार की काव्य चेतना में है, लेकिन वह जगह-जगह रोशनी तलाशता है। इस तलाश में उसके अंदर आशा और उत्साह की तरंगें भी  उपतजी हैं। वह जीवन के प्रति सकारात्मक हो उठता है। लेकिन इससे पहले वह दर्द को गीत में बदलता है। इन गीतों में अपसंस्कृति का दर्द तो है ही। एक जगह रचनाकार कहता है-
                       कामना मन में यही, सरिता बहा दूं प्यार की
                       पर सदा मिलती रही सौग़ात मुझको हार की
                       लोग मेरी हार के उपहार पर हंसते रहे
                       हर कदम की हार को मैं जीत ही लिखता रहा
                       मैं नयन में नीर भरकर गीत ही लिखता रहा।
कवि अपने पराजय के क्षणों में भी उम्मीद की डोर नहीं छोड़ता। उसका सौंदर्य बोध एक समानांतर भाव भूमि का स्जन करता है। प्रकृति के विस्तृत प्रांगण में बसे हुए गांव अपनी गरीबी और अभाव के बावजूद वसंतागमन के उल्लास से प्रफुल्लित हो जाते हैं। इस उल्लास में कृषक और श्रमिक नारियां कहां पीछे रहने वाली हैं -
                        प्रातगात पुलकित हिय हर्षित
                        हंसिया हाथ लगाये
                        चलीं खेत को कृषक नारियां
                        नयनों में मुस्कायें
                        हाथ मिलाये चले मगन मन
                        गाते नूतन गीत रे।


जमादार धीरज


 रचनाकार की काव्यदृष्टि विस्तार पाती है। कविताओं में लोकमंगल की कामना जगह-जगह देखते बनती है। इन्हीं भावनाओं से प्रेरित और अपनी विरासत पर गर्व करने वाले रचनाकार जमादार धीरज की दृष्टि कभी अरुणाचल की सुषमा को समेटने का प्रयास करती है, मदर टेरेसा को अंतिम प्रणाम देेती है और देश के वीर जवानों को याद करती है। रचनाकार का निजत्व देश और समाज से जुड़ता है। लोक जीवन और लोक संस्कृति इनकी रचनाओं का आधार है। जिसमें शिल्प का अंधानुकरण नहीं करतीं। ये उन कवियों में भी नहेीं आते जो निरंकुश हुआ करते हैं। फिर भी इनकी हिन्दी का ग्राम्यत्व जो छंद और भाषा के स्तर पर है, एक चुनौती है। यह संस्कृतनिष्ठ हिन्दी प्रेमियों को चैंकाता ज़रूर है। लेकिन हिन्दी प्रेमियों को रुचिकर है। भरत मत के पुष्ट करते हुए भोज के ‘ग्रात्यत्व’ को विद्वदजनों की  उक्ति में गुण माना है, जो प्रत्यक्षत: उनकी दृष्टि में एक दोष है। किन्तु हिन्दी के वैयाकरण आचार्य भिखारी दास तो भाषा और भाव की समृद्धि की दृष्ट से इसे स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है-

                     ‘कहूं भदेषों होत कहुं, दोष होत गुन खान’

हिन्दी जैसी जीवित भाषा अपनी खुराक लोकभाषा से लेती है। यहां प्राय: ग्राम्यदोष एक सकारात्मक पक्ष है। भरत मुनि के शब्दों में भी दोष का विपर्यय गुण है। ‘न्यून पदत्व’ एक दोष है। इसके विपर्यय के लिए जमादार धीरज देशज और तद्भव शब्दों का प्रश्रय लेते हैं। रचानाकार ने एक ऐसी भाषा स्वीकार की है जो सरल, सर्वमान्य और सर्वग्राहा्र है। इनके शब्दों में पारंपरिक शब्द जैसे गीत, दर्द, दीपक, अंधेरा, जीत, हार, सौगात आदि का व्यवहार है क्योंकि ये शब्द लोकभाषा में यथावत है और इन्हें समझ लेने से कविता की चमक बढ़ जाती है। इनकी रचनाओं में बिम्ब-विधान संक्षिप्त और धारदार छंद कम हैं, क्योंकि कवि आवश्यकतानुसार वर्णनात्मक कविताओं में ही संवेदना और सप्रेषणीयता के गवाक्ष खोलता है, और अन्य आलम्बन तलाश करता है। कुछ ऐसी रचनाएं भी हैं जो कवि की काव्य दृष्टि की ओर संकेत करती हैं। ‘वक़्त आया सरकता गया पास से, हम खड़े बस बगल झांकते रहे गये साथ में जो बहे वे किनारे लगे, हम खड़े धूल को फांकते रह गये’। रचनाकार 26 जनवरी के गीत में भी कहता है -

                        आज देश पर ताक लगाये

                        तत्व स्वार्थी भ्रष्ट निगाहें

                        उनसे हमें सजग रहना है

                        चलो रोक दें उनकी राहें

                        हम प्रहरी है सजग राष्ट्र के

                        आओ स्वयं दीप बन जायें।

इस उद्बोधन गीत की मूल दृष्टि भगवान की ‘अत्त दीपो भव’ है। कवि अपनी एक कविता में कहता है।

                  मन को छलकर जीते-जीते जीवन भार हुआ

                  मीठे विष को पीते-पीते तन बेज़ार हुआ।

कविता में जो नकारात्मक है वह प्रकारान्तर में एक सकारात्मक भाव का सृजन करती है। विचारों में कहीं न कहीं एक दार्शनिकता है। जमादार धीरज की कविताएं पुराने शिल्प में  नवता की संकल्पना ज़रूरी हुआ तो उद्बोधन का भी आश्रय लेती है। इनकी रचनाओं में देश, समाज, गांव-घर और स्वयं की पीड़ा है, सुख-दुःख है और तद्जनित एक मूलदृष्टि है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)



गुरुवार, 17 जून 2021

’सौम्य, सुशील जमादार धीरज’


  
                    
     श्रीराम मिश्र ‘तलब जौनपुरी’

                                       

 जमदार धीरज से मेरी मुलाकात का सिलसिला कवि गोष्ठी, कवि सम्मेलन एवं मुशायरों के माध्यम से सन, 1990 के आसपास शुरू हुआ। निरंतरता के साथ नज़दीकी और अंततः दोस्ती में तब्दील हो गया और उनके जीवन पर्यंत बदस्तूर प्रगाढ़ता के साथ निभाता चला गया। जिससे मुझे धीरज जी के बारे मे जानने-समझने का अवसर मिला। उनके संबंध में आगे  कुछ कहने से पहले मैं उनके साहित्यिक गुरु स्व. डाॅ. श्रीपाल सिंह ‘क्षेम’ के गीत का एक चर्चित मुखड़ा उद्धृत करना चाहता हूं-
           एक पल ही जियो फूल बन कर जियो ,
           शूल बन कर ठहरना नहीं ज़िन्दगी।
जमादार धीरज के जीवन का यदि हम समग्रता के साथ सिंहावलोकन करें तो हमें उपरोक्त पंक्तिया पूर्ण रूप से चरितार्थ होती दिखती हैं। फूलों की तरह सुकोमल व्यक्तित्व, हमेशा मुस्कुराता हुआ चेहरा, शांत सौम्य स्वभाव, हरदिल अज़ीज़, अजातशत्रु जमादार धीरज एक मोहक व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। कोई भी मिलने-जुलने वाला व्यक्ति उनके आकर्षण से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। सांसारिक जीवन में संतुलन बनाकर जीवन यापन करना भी एक तरह की बहुत बड़ी साधना  होती है जो धीरज जी के जीवन में स्पष्टतः दृष्टिगोचर है। एयरफोर्स जैसे संवेदनशील विभाग में एक राजपत्रित अधिकारी के उत्तरदायित्व को बखूबी निभाते हुए एक कुशल गृहस्थ एवं उच्चकोटि के स्थापित साहित्य कार के जीवन में जो समन्वय बना कर धीरज जी ने  सफल जीवन जिया है वह क़ाबिल-ए-तारीफ है। अक्सर साहित्यकारों में देखा जाता है कि वह घर-गृहस्थी के प्रति कुछ उदासीन जरा फक्कड़पन लिए हुए होते हैं लेकिन धीरज जी इसके अपवाद रहे हैं। उनका साहित्यिक और गृहस्थ जीवन दोनों सजे संवरे रहे हैं।
 



 धीरज जी के सभी बच्चे सभ्य, सुशील एवं मिलनसार हैं। अपने-अपने कार्य में लगे हुए, उनकी एक बेटी श्रीमती मधुबाला गौतम स्थापित कवयित्री हैं, जो धीरज जी की विरासत को बखूबी आगे बढ़ा रही है। धीरज जी के घर पर सजने वाली अदबी महफ़िलों में उनके बच्चे  अपनी-अपनी सामथ्र्य के अनुसार बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। ख़ासकर सम्मिलित होने वाले कवियों और शायरों के आवभगत एवं खान पान की व्यवस्था बच्चों के हाथ में होती थी जिसको वह लोग बखूबी निभाते रहे हैं।

             कबिरा खड़ा बजार में दोनों दल की ख़ैर,

             ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर।

कबीर का यह दोहा इस पड़ाव पर मुझे अनायास ही नहीं याद आ गया इसके पीछे धीरज जी की और मेरी शुरूआती मुलाक़ात के ज़माने की साहित्यिक संस्था ‘राष्ट्रीय साहित्य संगम’ है जो आज भी सक्रिय है, का बड़ा रोल है। राष्ट्रीय साहित्य संगम का सृजन अभी  नया-नया ही हुआ था कुछ प्रतिष्ठित साहित्यकार धीरज जी सहित इसकी कार्यकारिणी में पदाधिकारी थे संस्था बहुत जोश ओ ख़रोश के साथ आगे बढ़ रही थी। इसकी साहित्यिक गतिविधि चरम पर थी, इसी दरम्यान कुछ अप्रिय घटना घट गई संस्था के मुख्य पदाधिकारियों के बीच उत्पन्न विवाद स्वरूप संस्था टूट कर दो भागों में विभक्त हो गई एक मूल संस्था राष्ट्रीय साहित्य संगम और दूसरी अक्षयवट राष्ट्रीय साहित्यिक एवम् सांस्कृतिक संस्था। जाहिर सी बात है  संस्था के पदाधिकारीगण भी अपनी-अपनी पसंद के मुताबिक बंट कर अलग-अलग संस्थाओं से जुड़ गए। मेरे आश्चर्य का ठिकाना तब नहीं रहा जब मैंने देखा जमादार धीरज दोनों संस्थाओं से शिद्दत के साथ जुड़कर पदाधिकारी के रूप में कार्यरत हो गए। धीरज जी का द्रष्टा भाव तो यह था, दुनिया में रहकर दुनिया से निर्लिप्त रहना। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं। वे जितने अच्छे साहित्यकार थे उससे अच्छे व्यक्ति थे। जितना अच्छा लिखते थे उससे अच्छा पढ़ते थे।

 उनकी रचनाएं कवि सम्मेलनों, गोष्ठियों में खूब वाह-वाही लूटती थी। आप छान्दस गीत के मर्मज्ञ थे। आपने अपनी कविताओं में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, राजनीतिक, आध्यात्मिक, समाजिक आदि विभिन्न पहलुओं पर सम्यक प्रकाश डाला है। युग प्रवर्तक डाॅ. भीमराव अम्बेडकर जी पर तो आपका एक पूरा प्रबन्धकाव्य ही है। धीरज जी की दर्द हमारी जीत हो, युग प्रवर्तक डा.भीमराव  अम्बेडकर, आंखिन की पुतरी बिटिया, दलित दर्पण एवं भावांजलि आदि कृतियां मंजर ए आम पर हैं जो बराबर पढ़ी व सराही जा रही हैं। आपकी कविताओं को प्रकाशन विभिन्न प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्रों एवम् पत्रिकाओं में होता रहा है। आपकी कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी एवम् दूरदर्शन पर भी होता रहा है। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से धीरज जी सम्मानित हुए हैं, जो उनकी साहित्यिक स्तरीयता का परिचायक है।

 यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि देश की प्रतिष्ठित पत्रिका ’गुफ़्तगू’ धीरज जी पर एक विशेषांक प्रकाशित करने जा रही है। जिसके लिए मैं संस्था के बानी इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी को बहुत बहुत मुबारकबाद पेश कर रहा हूं। यह बहुत ही सराहनीय कार्य है। धीरज जी जैसे लोग विरले ही मिलते हैं। अतः मैं अल्लामा इक़बाल का एक शेर

                हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती है,

                बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

उद्धृत करते हुए जमादार धीरज जी को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूं। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित )

बुधवार, 2 जून 2021

बतख़ मियां अंसारी और अक़ील रिज़वी

                                                                  - डाॅ. हसीन जीलानी

                                          


 एम. डब्ल्यू. अंसारी की मुरत्तिब की हुई किताब ‘बतख मियां अंसारी की अनोखी कहानी’ एक ऐसे मुजाहिद-ए-आज़ादी की कहानी है, जिन्होंने बिहार के चम्पारन में अंग्रेज़ अफसर के घर में गांधी जी की जान बचाने में अहम किरदार अदा किया था। आज जबकि गांधी जी के क़ातिल नाथूराम गोड़से के चाहने वाले और मानने वालों का एक गिरोह मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब को तबाह व बर्बाद करने और फ़िरक़ापरस्ती को हवा देने में सरगर्म-ए-अमल हैं। ऐसे में इस किताब की अहमियत बढ़ जाती है। यह किताब मुजाहिदीन-ए-आज़ादी की हयात व खिदमात और उनके कारनामों से नयी नस्ल को मुतआर्रिफ़ कराने और उनकी ज़ेहनी तर्बियत में यक़ीनन मददगार साबित होगी।

 बतख मियां अंसारी हमारी क़ौमी हम-आहंगी और मुश्तरका तहज़ीब की अलामत हैं। लेकिन आज़ादी के बाद बिहार में कांग्रेस, जनता दल और राजद जैसी सियासी पार्टियों के हुकूमत में रहने के बावजूद किसी ने भी बतख मियां अंसारी की जानिब ख़ातिर ख़्वाह तवज्जुह नहीं की। ऐसे में एम. डब्ल्यू. अंसारी का बतख मियां अंसारी के तअल्लुक से ज़्यादा से ज़्यादा मज़ामीन इकट्ठा करके किताबी शक्ल में शाया कर देना क़ाबिल-ए-तारीफ़ व मुबारकबाद अमल है। किताब में बखत मियां अंसारी के अहद के लिए क़ाबिल-ए-ज़िक्र क़लमकार, अदीब व शायरों की निगारिशात के साथ-साथ उन पर कही गयी बाज़ नज़्में भी शामिल हैं। आज जबकि हमारे भाई चारा और खुलूस व मुहब्बत में रोज़ ब रोज़ कमी आती जा रही है, बतख़ मियां की क़ुर्बानियों को याद किया जाना बेहद ज़रूरी है। 175 सफ़हात पर मुश्तमिल इस किताब की कीमत 250 रुपये है। पेपर बैक पर शाया इस किताब का कवर दिलकश है, जिसे अहमर हुसैन की जानिब से शाया किया गया है।



 प्रोफ़ेसर अली अहमद फ़ातमी की ताज़ा-तरीन किताब ‘प्रोफ़ेसर सय्यद मोहम्मद अक़ील उस्ताद और नक़्क़ाद’ हाल ही मेें शाया हुई है। तरक्की पसंद तन्क़ीद निगारों में प्रो. अक़ील का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। उनका शुमार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अहम असातज़ा में होता है। उन्होंने तक़रीबन चालीस बरस तक शोब-ए-उर्दू के तद्रीसी खिदमात अंजाम दी। 32 तलबा ने उनकी निगरानी में डी.फिल की डिग्री हासिल की। दो दर्जन से ज़्यादा किताबें लिखीं। मुतअद्दि एज़ाज़ व इकराम से भी उन्हें नवाज़ा गया। उनके इन्तिक़ाल के कुछ माह गुजरने के बाद उनके शार्गिद प्रो. अली अहमद फ़ातमी की जानिब से नज़रान-ए-अक़ीदत के तौर पर इस किताब का शाया होना एक मस्तहसन अमल है। आज जबकि उस्ताद और शार्गिद के रिश्ते रोज़ ब रोज़ टूटते जा रहे हैं, ऐसे में किसी शार्गिद का अपने उस्ताद के लिए इससे बेहतर नज़रान-ए-अक़ीदत और क्या हो सकता है। किताब के शुरू में प्रो. फ़ातमी लिखते हैं-‘उस्ताद-ए-मोहतरम सय्यद अक़ील पर लिखे गए चंद मज़ामीन, तब्सरे, इंटरव्यू जो अब बाद-ए-वफ़ात किताबी शक्ल में मज़र-ए-आम पर आ रहे हैं। ये सिर्फ़ और सिर्फ़ नज़रान-ए-अक़ीदत हैं, इसके अलावा कुछ भी नहीं।’ 

 इस किताब में कुल आठ मज़ामीन और दो इंटरव्यू शामिल हैं। जिनमें प्रोफेसर अक़ील की शख़्सियत और उनके अदबी कारनामों पर सरे हासिल गुफ़्तगू की गयी है। साथ ही उनकी कुछ अहम किताबों पर तब्सरे भी किये गए हैं। किताब के आखि़र में कुछ यादगार तस्वीर इस किताब को मज़ीद दीदा-ज़ेब बनाती है। प्रो. फ़ातमी की यह किताब इन मानों में अहम है कि उन्हें अक़ील साहब के ऐसे ख़ास शार्गिद होने का शरफ़ हासिल रहा है जो सफ़र व हज़र में अक्सर उनके साथ-साथ रहे हैं। अक़ील साहब की शख़्सियत को जितने करीब से फ़ातमी साहब ने देखा और समझा है शायद वो मौका अक़ील साहब के दूसरे शार्गिदों को कम ही मयस्सर हुआ हो। लिहाजा यह किताब अक़ील साहब के फिक्री और फ़न्नी कारनामों को समझने में नयी नस्ल के तालिबइल्मों के लिए यक़ीनन बेहद मुफ़ीद और कारआमद साबित होगी। 200 पेज की इस किताब का कवर निहायत दिलकश है। किताब की क़ीमत 250 रुपये है। प्रकाशक खुद प्रो. अली अहमद फ़ातमी हैं।

( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित )


सोमवार, 17 मई 2021

प्रो. लाल बहादुर वर्मा और राजा राम ने दुनिया को अलविदा कहा

                                                                       - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

प्रो. लाल बहादुर वर्मा


कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं प्रो. वर्मा की पुस्तकें

मशहूर इतिहासकार और साहित्यकार प्रो. लाल बहादुर वर्मा का 16 मई की देर रात निधन हो गया। उनका इलाज देहरादून के एक अस्पताल में चल रहा था। कोरोना से ठीक होने के बाद किडनी की बीमारी से पीड़ित हो गए थे, रविवार की रात उनकी डायलसिस होनी थी, लेकिन किसी वजह से नहीं हो पाई, देर रात निधन हो गया। प्रो.वर्मा मौजूदा दौर के उन गिने-चुने लोगों में से थे, जिनकी पुस्तकें देश अधिकतर विश्वविद्यालयों के किसी न किसी पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही हैं। वे लंबे समय तक इलाहाबाद में रहे, तकरीबन चार वर्ष पहले देहरादून शिफ्ट हो गए थे।


 10 जनवरी 1938 को बिहार राज्य के छपरा जिले में जन्मे प्रो. वर्मा ने प्रारंभिक हासिल करने के बाद 1953 में हाईस्कूल की परीक्षा जयपुरिया स्कूल आनंदनगर गोरखपुर से पास किया था; इंटरमीडिएट की परीक्षा 1955 में सेंट एंउृज कालेज और स्नातक 1957 में किया। स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही आप छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे। लखनउ विश्वविद्यालय से 1959 में स्नातकोत्तर करने के बाद 1964 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्रो. हरिशंकर श्रीवास्तव के निर्देशन में ‘अंग्लो इंडियन कम्युनिटी इन नाइनटिन सेंचुरी इंडिया’ पर शोध की उपाधि हासिल किया। 1968 में फ्रेंच सरकार की छात्रवृत्ति पर पेरिस में ‘आलियांस फ्रांसेज’में फे्रंच भाषा की शिक्षा हासिल किया।

 गोरखपुर विश्वविद्यालय और मणिपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करने के बाद 1990 से इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अध्यापन कार्य करते हुए यहीं से सेवानिवृत्त हुए। ‘इतिहासबोध’ नाम पत्रिका बहुत दिनों तक प्रकाशित करने के बाद अब इसे बुलेटिन के तौर पर समय-समय पर प्रकाशित करते रहे। इनकी हिन्दी, अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा में डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, इसके अलावा कई अंगे्रजी और फ्रेंच भाषा की किताबों का अनुवाद भी किया है। बीसवीं सदी के लोकप्रिय इतिहासकार एरिक हाब्सबाॅम की इतिहास श्रंखला ‘द एज आफ रिवोल्यूशन’ अनुवाद किया था, जो काफी चर्चित रहा। उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘अधूरी क्रांतियों का इतिहासबोध’,‘इतिहास क्या, क्यों कैसे?’,‘विश्व इतिहास’, ‘यूरोप का इतिहास’, ‘भारत की जनकथा’, ‘मानव मुक्ति कथा’, ‘ज़िन्दगी ने एक दिन कहा था’ और ‘कांग्रेस के सौ साल’ आदि हैं। जिन किताबों का हिन्दी में अनुवाद किया है, उनमें प्रमुख रूप से एरिक होप्स बाम की पुस्तक ‘क्रांतियों का युग’, कृष हरमन की पुस्तक ‘विश्व का जन इतिहास’, जोन होलोवे की किताब ‘चीख’ और फ्रेंच भाषा की पुस्तक ‘फांसीवाद सिद्धांत और व्यवहार’ है। 


हाईस्कूल में पढाया जाता है राजा राम शुक्ल का लिखा नाटक 

राजा राम शुक्ल


 15 मई को साहित्यकार राजा राम शुक्ल का निधन हो गया। उनके परिवार में दो बेटे, चार बेटियां, बहुएं पोते-पोतियां हैं। 30 जनवरी 1934 को प्रतापगढ़ जिले के खजुरनी गांव में जन्मे राजा राम शुक्ल दारागंज में रहते थे, इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक किया था। रेलवे में नौकरी करते हुए सेवानिवृत्त हुए थे। उनका लिखा हुआ नाटक ‘अब तो नींद खुले’ और खंड काव्य ‘कैवल्य’ बिहार के हाईस्कूल पाठ्यक्रम में शामिल है। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में कैवल्य (प्रबंध काव्य), अतृप्त (उपन्यास), गंगायतन (महाकाव्य), मारिषा (प्रबंध काव्य), विद्यार्थी अनुशासन (संकलन), प्रेरणापुरुष सुमित्रानंदन पंत (संस्मरण समीक्षा), अब तो नींद खुले (ऐतिहासिक नाटक), पंखुरी (अवधी काव्य संग्रह) और चिरंतन सुभाष (प्रबंध काव्य) हैं। हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा इन्हें डी.फिल की उपाधि दी गई थी। विभिन्न संस्थाओं ने सम्मानित किया था। 


शुक्रवार, 14 मई 2021

शकील, सुरेश , तूफान, स्नेही और उर्फी का जाना बेहद दुखदायी

कोरोना से जूझ रहे शकील ग़ाज़ीपुरी का इंतिकाल

                                                                               -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी




प्रयागराज के कसारी-मसारी निवासी बुजुर्ग शायर शकील ग़ाज़ीपुरी का 05 मई को इंतिकाल हो गया। वे कोरोना से संक्रमित थे, उन्हें हृदय रोग भी था, जिसकी वजह से हार्ट लाइन में उनका इलाज चल रहा था। उनके परिवार में पत्नी, दो बेटे और एक बेटी है। एक सितंबर 1948 को ग़ाज़ीपुर जिले के वाजिदपुर में जन्में शकील ग़ाज़ीपुरी माध्यमिक परिषद विभाग में कार्य करते हुए सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी दो पुस्तकें ‘लम्हे-लम्हे ख़्वाब के’ और ‘अभिलाषा’ प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी उनकी ग़ज़लें समय-समय पर प्रकाशित होती रही हैं। उन्हें ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’, ‘प्रयाग गौरव सम्मान’, ‘प्रयाग पुष्पम् सम्मान’ और ‘सरदार अली जाफरी एवार्ड’ प्रदान किए गए थे। 


   बहुत शानदार इंसान थे सुरेश चंद्र द्विवेदी 


   मशहूर साहित्यकार और टीम गुफ़्तगू के सक्रिय साथी प्रो. सुरेश चंद्र द्विवेदी का 13 मई की शाम दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनके परिवार में पत्नी, दो पुत्रियां और एक पुत्र हैं। 29 मार्च 1952 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले जन्मे प्रो. द्विवेदी वर्ष 2011 से 2013 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष थे। अंग्रेजी, हिन्दी और भोजपुरी में वे लेखन करते थे। उनकी लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें ‘माउथ आफ ट्रुथ, ‘प्रेसपेक्टिव आफ इजैकिला’, ‘कृष्णा श्रीनिवासरू ए पोएट आफ टोटल एक्सपीरियंस’, ‘द पोयट्री आफ राबर्ट फ्रोस्ट’ आदि प्रमुख हैं।


 बेहतरीन शायर और इंसान थे तूफ़ान इलाहाबादी



 कोरोना से जूझ रहे दरियाबाद निवासी शायर शोएब अब्बास उर्फ़ तूफान इलाहाबादी का 19 अप्रैल को इंतिकाल हो गया। 10 अगस्त 1966 को जन्मे तूफान इलाहाबादी के परिवार में एक पुत्र, एक पु़त्री और पत्नी हैं। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और एलएलबी किया था। इनका एक काव्य संग्रह ‘मौजे कौसर’ प्रकाशित हुआ है। 

              अपनी ख़ास प्रस्तुति के लिए जाने जाते थे अशोक स्नेही



वरिष्ठ कवि अशोक कुमार स्नेही का 18 अप्रैल की सुबह निधन हो गया। आठ दिन पहले उनकी पत्नी स्नेहलता श्रीवास्तव का निधन हो गया था, तब से वे डिस्प्रेशन में थे, उनका इलाज चल रहा था। उनकी तीन पु़ित्रयां और दो पुत्र हैं, एक अन्य पुत्री का लगभग 20 वर्ष पहले निधन हो गया था। अशोक कुमार स्नेही का जन्म 11 नवंबर 1944 को फतेहपुर जिले के लालीपुर गांव में हुआ था। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर किया था, सिंचाई विभाग में नौकरी करते हुए सेवानिवृत्त हुए थे। इनका एक काव्य संग्रह ‘इन्हीं कविताओं से’ प्रकाशित हुआ था। इनकी एक पुत्री का लगभग 20 वर्ष पहले निधन हो गया था। कवि सम्मेलनों में अपनी इसी पुत्री को समर्पित गीत ‘बह गया अब तो खाली घडे़ रह गए/जब कफन जल गया चीथड़े रह गए/लाश बेटी की गंगा बहा ले गई/हम किनारे खड़े के खड़े रह गए’ पढ़ते हुए रोने लगते थे। 

                   कलीम उर्फी की 100 से अधिक किताबें छपीं 


मशहूर वयोवृद्ध लेखक कलीम उर्फी का उनके अटाला स्थित निवास पर 11 अप्रैल को इंतिकाल हो गया। वे बीमार चल रहे थे, किडनी फेल हो जाने से उनका इंतिकाल हुआ। कलीम उर्फी का जन्म 02 अक्तूबर 1928 को प्रयागराज में हुआ था। शिक्षा के बाद मुंबई में रहने लगे थे। बीमार होने पर लगभग 10 वर्ष पहले वे प्रयागराज आ गए थे। उनकी हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में कुल 100 से अधिक किताबंे प्रकाशित हुई हैं। उनके बेटे जावेद उर्फी ने बताया कि केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार और बिहार सरकारों ने उन्हें सम्मानित किया था। मुंबई की फिल्मी दुनिया में राज कपूर, गुरुदत्त, और मनोज कुमार से कलीम उर्फी के काफी नजदीकी रिश्ते थे। वे मुख्यत: कहानियां और लधुकथाएं, संस्मरण आदि लिखते थे। 

मंगलवार, 11 मई 2021

अभिव्यक्ति के ज़रिए अपनी बात कहते क़लमकार

                                                                            - अजीत शर्मा ‘आकाश‘ 



 वैश्विक कोरोना महामारी के कारण के अन्य देशों की भांति 25 मार्च 2020 से देशभर में लॉकडाउन लागू कर दिया गया। लॉकडाउन देश में पहली बार हुआ। सभी देशवासी एक अनिश्चित अवधि के लिए अपने-अपने घरों में एक प्रकार से नज़रबंद-से हो गये। रोज़ाना दिन भर के लिए काम पर निकलने वालों के सामने एक नयी और अनोखी समस्या उठ खड़ी हुई कि इस ख़ाली समय में क्या किया जाए। देश में एक ठहराव-सा आ गया। अपनी-अपनी तरह से सभी ने इस अवधि को किसी प्रकार व्यतीत किया, किन्तु ‘लॉकडाउन के 55 दिन’ पुस्तक का लेखन कार्य करके इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने ख़ाली समय का वास्तविक सदुपयोग किया है। पुस्तक-लेखन का यह रचनात्मक कार्य सीधे-सीधे साहित्यिक माहौल से जुड़ा है, जिसने अनुभवी रचनाकारों के साथ-साथ नवांकुरित रचनाकारों के लिए भी साहित्यिक वातावरण प्रस्तुत किया है। अतः लॉकडाउन के 55 दिन’ नामक यह पुस्तक एक सार्थक एवं सराहनीय उपलब्धि कही जा सकती है, जिसमें 25 मार्च से 18 मई, 2020 तक के 55 दिनों का दैनिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के लेखक ने समय का सदुपयोग विभिन्न पुस्तकों के अध्ययन के माध्यम से किया, जैसा कि पुस्तक में उल्लेखित है। इस अवधि में लेखक ने अनेक कवि, लेखक, शायरों एवं रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया, जो समयाभाव के कारण पूर्व में नहीं हो सका था। इसके अतिरिक्त गुफ़्तगू प्रकाशन की प्रारम्भ से लेकर अब तक की प्रमुख घटनाओं एवं कार्यक्रमों का विवरण भी पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है।

 25 मार्च 2020 से प्रारम्भ करते हुए उत्तर प्रदेश सहित सम्पूर्ण देश की प्रत्येक दिन के कोरोना की स्थिति का संख्यात्मक विवरण एवं अन्य उल्लेखनीय घटनाओं का विवरण भी साथ में प्रदान किया गया है। इसके अंतर्गत देश-दुनिया में प्रतिदिन के कोरोना की स्थिति कोरोना संक्रमितों की संख्या, हालात और विस्तृत विवरण को भी रेखांकित किया गया है। इस दौरान जनता एवं कोरोना योद्धओं के समक्ष तमाम कठिनाइयाँ भी उपस्थित रहीं, यथा- मास्क की कमी, खाद्य एवं अन्य सामग्रियों के दामों में भारी किल्लत, पुलिस द्वारा आवश्यक कार्यों से बाहर निकले लोगों के प्रति व्यवहार आदि। लॉकडाउन के कारण बेरोजगार हुए मज़दूरों का सैकड़ों किलोमीटर की दूरी से अपने गांवों को पलायन एवं उनकी दुर्दशा का उल्लेख भी किया गया है। लॉकडाउन के दौरान शायरी और कविताओं पर परिचर्चा का आयोजन पुस्तक का सर्वाधिक उल्लेखनीय अंश है। इसका कारण बताते हुए सम्पादकीय में लिखा गया है कि रचनाकारों में अच्छा लिखने और शायरी को समझने और उस पर तार्किक ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त करने की क्षमता विकसित करने का प्रयास इस आयोजन के माध्यम से किया गया। इसी उद्देश्य के मद्देनज़र लॉकडाउन अवधि में काव्य परिचर्चा करायी गई, जिसके अन्तर्गत प्रत्येक दिन विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं एवं उनकी कृति पर विभिन्न लेखकों एवं रचनाकारों द्वारा समीक्षात्मक टिप्पणियां की गयीं, जिनके माध्यम से विभिन्न मन्तव्य व्यक्त किए गए। इस क्रम में जनकवि स्व. कैलाश गौतम, स्व. डॉ जमीर अहसन, विज्ञान व्रत, यश मालवीय जैसे स्थापित रचनाकारों के साथ ही नवांकुरित एवं अन्य रचनाकारों पर भी सामूहिक चर्चा की गयी। यह एक उल्लेखनीय एवं सराहनीय कार्य है। लॉकडाउन के 55 वें दिन ऑनलाइन मुशायरा एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें वयोवृद्ध शायर सागर होशियारपुरी, सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार विज्ञान व्रत, इम्तियाज अहमद ग़ाज़ी सहित अनेक श्रेष्ठ कवियों एवं नवांकुरित प्रतिभाओं ने हिस्सेदारी की। पुस्तक का मुद्रण, प्रकाशन एवं तकनीकी पक्ष सराहनीय है। कवर पृष्ठ आकर्षक बन पड़ा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि लॉकडाउन के प्रारंभिक 55 दिनों के एक प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में यह पुस्तक हमारे समक्ष उपस्थित है। इस हेतु पुस्तक के लेखक इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी अत्यन्त सराहना एवं बधाई के पात्र हैं। 256 पेज के इस पेपर बैक संस्करण की कीमत 300 रुपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।

 



 ‘दिल्ली की सात कवयित्रियां’ महिला रचनाकारों की रचनाधर्मिता एवं उनकी सृजनात्मकता को उजागर करता है। कवयित्रियां मनोभावों को व्यक्त करने में काफी हद तक सफल रही हैं। सोनिया सूर्य प्रभा की कविताओं में अच्छे सृजन की झलक दिखायी देती है। समाज में महिला के योगदान और उसके महत्व को कवयित्री ने इस प्रकार रेखांकित किया हैः-मैं औरत हूं लिख लेती हूं/मैं औरत को लिख लेती हूं (मैं तो बस उसको जीती हूं)। डा. सरला सिंह ‘स्निग्धा‘ की ‘गरीबी’, ‘ये भूख है साहिब’, ‘भुखमरी’ कविताओं में आम आदमी की दशा का चित्रण है- तरह तरह के पेट यहां पर/कुछ का थोड़े से भर जाता है/कुछ में करोड़ों भी कम पड़ जाता है। रिंकल शर्मा ने कविताओं में मन के उद्गार कुशल ढंग से व्यक्त किये हैं। इनकी ‘प्रेम‘ शीर्षक कविता में प्रेम को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया गया है- प्रेम एक सागर है/जिसकी असीम गहराई है। ‘कोई ये माने, कोई वो माने‘ साम्प्रदायिक सद्भाव का सन्देश देती है। ‘घोटाला‘ कविता आज की राजनीति पर टिप्पणी करती है। डा. फौजिया नसीद शाद ने अपनी छोटी-छोटी रचनाओं के माध्यम से मनोभाव प्रकट किये हैं। ‘मानव-मानव का दुश्मन क्यों है‘ कविता में मानव की स्वार्थ लिप्सा को उजागर करने का प्रयास किया गया है।‘ संकलन में रीता सिवानी की 22 गजलों में से कुछ अच्छी बन पड़ी हैं। कुछ उल्लेखनीय पंक्तियां- अबला ही मत उसको समझो/दुर्गा-काली भी नारी है/लालच में ये होता है/जो है वो भी खोता है/सारी दुनिया जिसने जीती/खुद से कैसे हारा देखो। आम आदमी वर्तमान की दशा का यथार्थ वर्णन करती हैं। प्रभा दीपक शर्मा ने अपनी कविताओं में जिजीविषा, देशप्रेम एवं हृदय के उद्गार अच्छे ढंग से व्यक्त करने का प्रयास किया है। ‘अपंगता‘ रचना हौसलों को बुलन्द करने वाली एवं जीने का सन्देश देती है- देखो मेरी हिम्मत को/हार नहीं स्वीकार मुझे (अपंगता)। पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सजग करती हुई रचना- आहत हूं आज बहुत मैं/अपने बच्चों की करनी पर (धरा की पुकार)। ‘हमारा प्यारा भारत‘, ‘देश की माटी‘ रचनाएँ देशप्रेम का भाव लिए हुए हैंरू- इस माटी पर जन्म लिया है, इस पर ही मर जाना है (देश की माटी)। ‘सावन, ‘पराया लगता है’, ‘आइना’ श्रृंगार की कविताएं हैं। आम आदमी की दशा का यथार्थ चित्रण कवयित्री ने इस प्रकार किया है- अथक परिश्रम करता रहता/पैसे चार कमाने को (मजदूर)। संकलन में सम्मिलित रोली शुक्ला की कविताएँ पाठकों को आशान्वित करती हैं। ‘वाणी का आधार’ कविता में शब्दों की महिमा बताने का प्रयास किया गया है। शहीदों की पत्नियों का दर्द मार्मिक रचना बन पड़ी है। 128 पेज के इस पेपर बैक संस्करण की कीमत 200 रुपये है, जिसे गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।



हिन्दी और उसकी क्षेत्रीय भाषाओं में भी ग़ज़ल कही और सराही जा रही है। लेकिन यह तथ्य ध्यातव्य है कि ग़ज़ल का एक विशेष अनुशासन एवं व्याकरण है और ग़ज़ल के लिए ज़रूरी बातों के प्रति उनकी ग़ज़लकार की सतर्कता की मांग करती है। जो रचनाकार इस तथ्य के प्रति सजग हैं, वह अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं। इसी क्रम में सुमन ढींगरा दुग्गल का ग़ज़ल संग्रह ‘गुंचे‘ सामने आया है। संग्रह की लगभग सभी ग़ज़लें शिल्प की कसौटी पर खरी उतरती हैं। शायरा ने बह्रों के बारे में पूरी सतर्कता और सावधानी का परिचय दिया है। हर एक मिसरे में रवानी है। शिल्प और बेमिसाल कथ्य का यह संगम ‘गुंचे‘ को श्रेष्ठ ग़ज़ल संग्रह बनाता है। शायरा का शब्द-भण्डार विपुल है। संग्रह की अधिकतर ग़ज़लें प्रेम, श्रृंगार एवं विरह की विविध अवस्थाओं के चित्रण से मन की कोमल भावनाएं स्वत: प्रकट होने लगती हैं। प्रेम के विविध आयाम के अशआर देखें - ‘आजकल खुद पे इख़्तियार नहीं/और क्या है अगर ये प्यार नहीं।’,‘ तेरे चेहरे से जो टपकता है/चांद में नूर वो कहां जानां।’,‘होश अपना है न दुनिया की ख़़बर/इश्क़ तेरा हमको ले आया कहां।’ विरह-वेदना की तीव्र अनुभूति के स्वर-‘धरती काटे अंबर काटे/तुम बिन हर इंक मंजर काटे।’,‘तुम गये सब चला गया दिल से/इक ख़लिश है वहीं नहीं जाती।’ कहा जा सकता है कि ग़ज़लकार मोहब्बत की शायरा हैं। इसके साथ ही वर्तमान समाज का चित्रण एवं जीवन के विविध पहलुओं को भी उजागर किया गया है। सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक आदि जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श करते हुए जीवन की अनुभूति, मानव संवेदना, आदि प्रमुख विषयों को भी ग़ज़ल के अशआर में इंगित किया गया हैं। ये अशआर सियासत की तल्ख़ हक़ीक़त बयान करते हैंः-‘वो लोग जिन्हें अपनी बुलंदी का नशा है/सब की निगाहों से उतर जाएंगे इक दिन।’ आज के युग की विडम्बना यही है-‘हर एक शहर सुलगता दिखाई देता है/उमीद क्या थी मगर क्या दिखाई देता है।’ शायरा की साफगोई का खुबसूरत अन्दाज देखें-‘मेरी अच्छाई की सनद ये है/मैं खुद को ख़राब लिखती हूं।’ इस शे’र में मुहावरे का कैसा सुन्दर प्रयोग किया गया है-‘हम तो दरिया में डाल देते हैं/नेकियां तुम संभालते हो क्या ?’ इन सब खूबियों के बीच ग़ज़ल-व्याकरण की दृष्टि से कुछ ग़ज़ल रचनाओं में ऐब (दोष) भी हैं, लेकिन ये नाम मात्र के लिए ही हैं। उदाहरणार्थ- बाब-अहबाब (क़ाफ़िया दोष), जाते जाते देख मुड़ कर आखि़री (रदीफ दोष), कई बाऱ रोज, बयाऩन, अब़ बेअसर, हऱरंग, बेबाक़ कर, मऱ रहा, सर ़रहे ऐबे तनाफुर (स्वरदोष)। तकाबुले रदीफ, ऐबे शुतुरगुर्बा भी किन्हीं-किन्हीं शेरों में हैं। वर्तनी दोष - रंज, राज, ऊंगली, जबान, यकीं, मिजाज, ताज, जिया (जिया)। हिन्दी में अच्छी ग़ज़लें कही जा रही हैं, सुमन ढींगरा दुग्गल का यह श्रेष्ठ संग्रह इस बात का साक्षात प्रमाण है। 112 पेज के इस संग्रह को उत्कर्ष प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 150 रुपये है।


 ‘ग़ज़ल का सफ़र’ मरहूम शायर वेद दीवाना की 80 ग़ज़लों का संग्रह है, जिसे उनके पुत्र राजीव दीवाना द्वारा प्रकाशित कराया गया है। पंजाब के ग़ज़लकारों में वेद दीवाना का नाम बहुत एहतराम से लिया जाता है। इस संग्रह में वेद दीवाना ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से कुछ दिल की, कुछ ज़िन्दगी की, कुछ संसार की और कुछ आज की बातें कही हैं। आपबीती के साथ ही जगबीती इन ग़ज़लों में साफ-साफ दिखायी देती है। इनमें दिल की धड़कनें सुनायी देती हैं, तो आम आदमी की आवाज़ को भी आसानी से महसूस किया जा सकता है। पुस्तक की कुछ ग़ज़लें रिवायती हैं, कुछ आधुनिक समाज का दर्पण भी हैं। ग़ज़लें अपनी परम्पराओं से जुड़ी हुई हैं, जो ग़ज़ल-विधा को निरन्तर आगे बढ़ाये जाते रहने के लिए निहायत ज़रूरी चीज है। वेद दीवाना की ग़ज़लों की भाषा मधुरता और सरसता लिए हुए आमफहम भाषा है, जिसे हर कोई आसानी से समझ सकता है। बोझिलता कहीं नहीं है। मुश्किल से मुश्किल बात को भी आसान लफ़्ज़ों में पिरो देना उन्हें आता है। बड़ी ही खूबसूरती और सलीके़ की शायरी है। हर तरह और हर मुद्दे पर अशआर कहे हैं। उनकी ग़ज़लें उनके अपने अनुभव से कही गयी हैं, जिनमें जीवन का निचोड़ झलकता है। मन के भावों की सफल प्रस्तुति हुई है। इनकी शायरी आम और ख़ास इंसान के हर एहसास को बयां करती है। वेद दीवाना के अपने रंग में रंगी हुई हैं उनकी ये ग़ज़लें। शिल्प की दृष्टि से ग़ज़लों की बुनावट ठीक है। कहीं-कहीं ग़ज़लों में तकाबुले रदीफ, ऐबे तनाफुर, ऐबे तख़ालुफ जैसे छोटे-मोटे दोष भी दिख जाते हैं। एक-आध मिसरे बे-बह्र भी हैं। प्रूफ रीडिंग सम्बन्घी दोष कहीं-कहीं रह गये हैं। ख़ोफ, पुछूंगा, बदगुमाना, पहली वार, ऐक, बरदात, ऐहले आदि जैसी वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियां संग्रह की साहित्यिकता की गरिमा के विपरीत हैं। लेकिन, इन सबके बावजूद ग़ज़ल का सफर संग्रह पठनीय एवं सराहनीय है। पुस्तक की ग़ज़लों के कुछ अशआर, जो बरबस ही ध्यान आकृष्ट कर लेते हैं, मुलाहिजा फरमायें- ‘खुद पर उसे ग़रूर अगर था तो इसलिए/सब कुछ था उसके घर में मगर आईना न था।’,‘मिजाज अपना भला बदलेगा सूरज/ये अंगारा है अंगारा रहेगा।’ अपना हाले-दिल शायर ने कुछ इस तरह बयान किया है-‘मैं बिखर जाऊं न सुखे हुए फूलों की तरह/मुझको इन तेज हवाओं से बचा कर ले जा।’,‘ एक तिनका हूं हवा मुझको झटक देगी कहीं/तू तो दरिया है मुझे साथ बहा कर ले जा।’, ‘क्या अजब मेरा भी तुमको जिक्र मिल जाए कहीं/तुम किताबे दिल के कुछ पन्ने उलट कर देखना।’ 80 पेज की पुस्तक को मन्नत पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 300 रुपये है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित )

शनिवार, 1 मई 2021

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की रगों में दौड़ती थी उर्दू


 

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

   25 दिसंबर की सुबह दिल्ली से प्रयागराज पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने दुनिया को अलविदा कह दिया। एक महीना से भी अधिक तक दिल्ली में इलाज करा रहे फारूकी साहब को जैसे अपने जन्मभूमि पहुंचने की ही प्रतीक्षा थी। पूरी दुनिया में उर्दू अदब की आलोचना जगत में उनका नाम सरे-फेहरिस्त है। पाकिस्तान के ‘निशान-ए-इम्तियाज’ एवार्ड से लेकर पद्मश्री तक सफर उन्होंने तय किया। उर्दू की सेवा के लिए अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, रूस, हालैंड, न्यूजीलैंड, थाईलैंड, बेल्जियम, कनाडा, तुर्की, पश्चिमी यूरोप,सउदी अरब और कतर आदि देशों का दौरा किया था। अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड के कई विश्वविद्यालयों में कई बार लेक्चर दिया था। 30 सितंबर 1935 को प्रतापगढ़ में पैदा होने वाले श्री फारूकी छह बहन और सात भाइयों में पांचवें नंबर पर थे। पिता मोहम्मद खलीकुर्रहमान फारूकी डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल थे। प्रतापगढ़ में प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद आप पढ़ाई के लिए इलाहाबाद आ गये। 1955 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। अपने बैच

में प्रथम स्थान हासिल किया, लेकिन लेक्चरशिप नहीं मिला। हताश नहीं हुए और सतीश चंद्र डिग्री कालेज बलिया में और इसके बाद शिब्ली नेशनल कालेज आजमगढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य करने लगे। 1958 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (एलाइड) के लिए आप चयनित हो गए। भारतीय डाक सेवा में कार्य करते हुए आपने विभिन्न राज्यों में अपनी सेवाएं दीं, 1994 में रिटायर हुए थे। अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी ने 2002 में और मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी हैदराबाद ने 2007 में आपको डी.लिट की मानद उपाधियों से विभूषित किया। 1991 से 2004 तक यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसलवानिया, फिलाडेल्फिया (यूएसए) में मानद प्रोफेसर रहे, 1997 से 1999 तक ‘खान अब्दुल गफ्फार खां प्रोफेसर’ के पद पर कार्यरत रहे। नेशनल कौंसिल फार प्रमोशन ऑफ उर्दू (नई दिल्ली) के वाइस चेयरमैन के रूप में उर्दू की तरक्की के लिए किया गया काम आपकी महत्वपूर्ण सेवाओं में से है। 


शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी


 मीर तकी मीर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर श्री फारूकी ने चार खंडों में ‘शेर-शोर अंगेज’ नामक किताब लिखकर तहलका मचा दिया। इस किताब पर 1996 में ‘सरस्वती सम्मान’ प्रदान किया, सम्मान के रूप में मिला पांच लाख रुपये उस समय का सबसे बड़ी इनामी राशि वाला सम्मान था। 1996 में ही आपने ‘शबखून‘ नामक मासिक पत्रिका निकाली, जो दुनिया-ए-उर्दू अदब में चर्चा का विषय हुआ करती थी। इनकी किताब ‘उर्दू का इब्तिदाई जमाना’ उर्दू और हिन्दी के अलावा अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुआ है। अंग्रेजी में इसे आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित किया है। शायरी में चार किताबें छप चुकी हैं, जिनके नाम ‘गंजे-सोख्ता’, सब्ज अंदर सब्ज’,‘चार सिम्त का दरिया’ और ‘आसमां मेहराब’ हैं। गद्य की किताबों में ‘लफ्जी मआनी’,‘फ़ारूक़ी के तब्सरे’,‘शेर गैर शेर और नस्र’,‘अफसाने की हिमायत में’, ‘तफहीमे-ग़ालिब’,‘दास्ताने अमीर हमजा का अध्ययन’ और ‘तन्कीदे अफकार’ आदि हैं। अंग्रेजी किताबों में ‘द सीक्रेट मिरर’,‘अर्ली उर्दू लिटेरेरी कल्चर एंड हिस्टी’,‘हाउ टु रीड इकबाल‘ हिन्दी में ‘अकबर इलाहाबादी पर एक और नजर’ वगैरह विशेष उल्लेखनीय हैं। हाल ही में अंग्रेजी में प्रकाशित उनका नाविल ‘कई चांद थे सरे आसमां’ का हिन्दी अनुदित संस्करण काफी चर्चा में रहा है। ‘उर्दू की नई किताब’ और ‘इंतिख़ाबे-नस्रे’ समेत कई किताबों का संपादन भी किया। श्री फ़ारूक़ी ने कुछ किताबों का अंग्रेजी से उर्दू अनुवाद भी किया है, जिनमें अरस्तू की पुस्तक ‘पाएटिक्स’ का उर्दू अनुवाद ‘शेरियत’ है। ‘शेर शोर अंगेज’ नामक पुस्तक चार खंडों वाली किताब में मीर तक़ी मीर के एक-एक शेर की व्याख्या और उसके विशलेषण में उसी विषय के कवियों के अश्आर की मिसालें दे-देकर ऐसा लिखा है की उर्दू अदब में तहलका सा मच गया, बड़े-बड़े आलिम चैंक पड़े। उनकी पुस्तक ‘एसेज इन उर्दू क्रिटिसिज्म एंड थ्योरी’ के अलावा गालिब और मुसहफी की जिदगी पर आधारित कहानियां हैं। उर्दू में ऐसे शब्दों और मुहावरों को शामिल करते हुए एक शब्दकोश की पुस्तक तैयार किया, जो आम शब्दकोश में मिलना लगभग असंभव है।

 ( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित) 


रविवार, 25 अप्रैल 2021

हर घटना में व्यंग्य तलाश लेते थे फ़ज़्ले हसनैन

    

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 

   जाने-माने उर्दू अदीब, व्यंग्यकार और पत्रकार फ़़ज़्ले हसनैन का 24 अप्रैल को इंतिकाल हो गया, इसी के साथ एक ऐसे अध्याय का अंत हो गया, जिसकी पूर्ति कोई नहीं कर सकता। वे वे अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो हर छोटी-बड़ी घटना को व्यंग्य का रूप देने एक्सपर्ट थे। मुझे याद है, तकरीबन 17-18 साल पहले की बात है, मालिकाना झगड़े में उन दिनों ‘अमृत प्रभात’ के कर्मचारियों को तनख़्वाह कई महीने से नहीं मिल रहा था। ‘अमृत प्रभात’ के दफ़्तर में मैं कार्यकारी संपादक मुनेश्वर मिश्र जी के केबिन बैठा हुआ। उसी दिन कर्मचारियों को 200-200 रुपये दिए गए थे। अचानक फ़ज्ले हसनैन केबिन में दाखिल हुए, मुनेश्वर जी से मुख़ातिब होकर बोले-‘मिश्रा जी आज 200 रुपये मिल गए हैं, सोच रहा हूं कि इतनी बड़ी रकम कैसे लेकर जाउंगा, कहीं रास्ते में कोई छीन न ले। आप संपादक हैं, पुलिस से बात करके सुरक्षा के इंतज़ाम करा दीजिए।’ इसके बाद केबिन में बैठे सभी लोग जोर-जोर से हंसने लगे। यह उनके व्यंग्य का नमूना भर है। ऐसी बहुत से वाक़यात हैं।

 फ़ज़्ले हसनैन का जन्म 07 दिसंबर 1946 को प्रयागराज के लालगोपालगंज स्थित रावां नामक गांव में हुआ था। इंटरमीडिएट तक की परीक्षा लालगोपालगंज में ही उत्तीर्ण करने के बाद 1973 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से उर्दू विषय में स्नातकोत्तर किया था। प्र्रयागराज से प्रकाशित नार्दन इंडिया पत्रिका से पत्रकारिता की शुरूआत की थी, फिर अमृत प्रभात और स्वतंत्र भारत में भी सेवाएं दीं। व्यक्तिगत लेखन की शुरूआत हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में 1974 में किया था। ग़ालिब पर लिखी इनकी पुस्तक ‘ग़ालिब एक नज़र में’ को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया था। आपकी कहानियां, नाटक और व्यंग्य देश-विदेश की पत्रिकाओं और अख़बारों छपते रहे हैं। 1982 में इनका पहला व्यंग्य संग्रह ‘रुसवा सरे बाज़ार’ प्रकाशित हुआ था, इस पुस्तक पर उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया था। इनके तीन नाटक संग्रह ‘रोशनी और धूप’, ‘रेत के महल’, ‘रात ढलती रही’ छपे हैं। वर्ष 2001 में व्यंग्य रचना संग्रह ‘दू-ब-दू’ प्रकाशित हुआ। प्रयागराज के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का परिचय कराती आपकी एक पुस्तक ‘हुआ जिनसे शहर का नाम रौशन’ वर्ष 2004 में छपी थी, इस पुस्तक के तीन संस्करण प्रकाशित हुए हैं। इन्होंने कौमी उर्दू कौसिंल बराय फरोग उर्दू नई दिल्ली के अनुरोध पर मशहूर उपन्यासकार चाल्र्स डिकेंस के उपन्यास ‘डेविड कापर फील्ड’ का उर्दू में अनुवाद किया था। 


फ़ज़्ले हसनैन


 वरिष्ठ पत्रकार एसएस खान उनके बारे में लिखते हैं- ‘ फ़ज़्ले हसनैन उर्दू अदब में महारथ के साथ अंग्रेजी और हिंदी में भी वह बराबर का दखल रखते थे। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी व्यंग रचनाएं आज भी लोगों के जेह्न पर नक्श हैं। उनके साथ अमृत प्रभात में काम करते हुए बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। उनके लिखने और बोलने का अंदाज़ बिल्कुल जुदा था। रोजमर्रा की जिं़दगी में होने वाली बातों, छोटी बड़ी घटनाओं को जिस सहज तरीके से शब्दों में पीरोते वह अनायास ही एक श्रेष्ठ व्यंग्य रचना का शक्ल अख़्तियार कर लेता. आचार-व्यवहार सियासत-शिक्षा हो या फिर रीति रिवाज व धरम-करम. इन सब विषयों पर कटाक्ष करती उनकी कलम हर किसी को अपना मुरीद बना लेती। उनकी इसी काबिलियत व फनकारी को देखते हुए मैंने इलाहाबाद में अमर उजाला और दैनिक जागरण में कार्यकाल के दौरान उनकी सैकड़ों व्यंग्य रचना सिलसिलेवार तरीके से प्रकाशित की। उसी दौरान इलाहाबाद के 10 चोटी के साहित्यकारों के साहित्य लेखन और उनके जीवन के अनछुए पहलुओं पर भी उन्होंने कलम चलाई. उनका यह लेख न सिर्फ़ इलाहाबाद में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हुआ, यह लेख दैनिक जागरण के विशेष फीचर पेज पर प्रत्येक बुधवार को ‘हुआ जिससे शहर का नाम रोशन’ कालम के अंतर्गत प्रकाशित होता था। बाद में यही लेख किताब की शक्ल में इसी नाम से प्रकाशित हुआ।’



शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

खड़ी बोली के साथ लोकभाषा में भी महारत

प्रो. सोम ठाकुर


                                            - प्रो. सोम ठाकुर
                                               
   गीत काव्य के पुरोधा महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की पांचवीं पीढ़ी के गीत-कवि जमादार धीरज की काव्य कृति भावांजलि पर दृष्टिपात करने से पूर्व हमें गीत काव्य की पूर्व पीढ़ियों पर विचार करना होगा। गीत काव्य शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग लोचन प्रसाद पांडेय ने ‘कविता कुसुम माला’ की भूमिका में किया और पाठकों से निवेदन के अंतर्गत लिखा, कि काव्य के तीन प्रकार हैं-
 गीत कवि जमादार धीरज की काव्यकृति भावांजलि के आरंभ में कवि ने का मूल स्रोत पीड़ा की ओर संकेत करते हुए कहा है- 
                     गीत सृजन वह प्रसव तीर पीर है
                     जिसको मां झेला करती है
                     बन जाती है मुस्कान मधुर जब
                     शिशु से वह खेला करती है।
                     दर्द भरे भावों से जुड़कर
                     शब्द सार्थक हो जाते हैं
                     बिना जुड़े कवि की पीड़ा से
                     गीत निरर्थक हो जाते हैं।
परम्परा के अनुसार धीरज ने सर्वप्रथम वाणी वन्दना की है -
                     वात्सल्यमयी जननी जग की
                     हे ! वीणा वादिन नमन चरन
                      उठ जाते तेरा वरद हम
                      सब शोक नशावन पाप हरन। 
                      स्वीकार करो सविनय वंदन
                      मां धीरज की तेरे अभय सरन
                      वात्सलयमयी जननी जग की
                      हे! वीणावादिनी नम चरण।

जमादार धीरज


 संसार में मनुष्य निष्कलंक संस्कार लेकर जन्म लेता है, किन्तु जगत में आकर वह यहां के मायाजाल में विकृतियों से घिर जाता है। इस भाववता को कवि ने निम्न पंक्तियों में व्यक्त किया है -

                      ढ़ूढ़ता सुख रहा दुख के संसार में

                      हर कदम आंसुओं से भिगोता रहा

                      एक पीड़ा-कसक-दर्द, तड़पन चुभन

                      झेलता मैं सिसकता ही रोता रहा

                      धोर के तम का पड़ा सोच का आवरण

                      अर्थ उन्माद ने ऐसा पागल किया

                      बस मुखौटे बदलता रहा रात दिन

                      छल कपट द्वेष पाखंड में ही जिया

                      देने वाले ने दी थी धवल ज़िन्दगी

                      बीज मैं वासनाओं के बोता रहा।

नारी कविता की मूल प्रेरणा स्रोत होती है। प्रिया के अभवा सृजन अकर्मण्यता की ओर अग्रसर होता है -

                       बासठ बरस संग बिताये पलों को

                       बताओ भला भूल पायेगें कैसे

                       तुम्हारे बिना लेखनी आज गुम सुम

                       भला गीत के भाव आयेंगे कैसे।

                       तुम्ही शब्द हो, छन्द हो, गीत हो तुम

                       तुम्ही गीत बनकर हो अधरों पे आई

                       तुम्ही गीत उद्गम, तुम्हीं प्रेरणा हो

                       प्रथम गीत सुनकर तुम्हीं मुस्कुराई

                       सदा प्यार में थी लपेटी शिकायत

                       तुम्हें गीत रचकर सुनायेंगे कैसे।

जमादार धीरज ने ऋतु प्रसंगों को बड़े कौशल से आत्मसात किया है, जो निम्न पंक्तियों से दृष्टव्य है -

                        फागुन में बहकी बहार बहे मस्त-मस्त

                        जन-जन के मन में उमंग आज होली में

                        बौराई बगिया में गंध उठे मदमाती

                        झूम-झूम गाये विहंग आज होली में

                        पीली चुनरिया में सर सैया शरमाये

                        गदराये गेहूं के संग आज होली में

                        मौसम वासंती है, जीव जन्तु मस्त हुए

                        जंगल में नाचे कुरंग आज होली में

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने फगुनाहट को पूर्ण सशक्त ढंग से शब्दायित किया है। नारी अस्तित्व और उसके सशक्तीकरण पर कवि ने बल दिया है -

                         सदियों से चलता चला आ रहा है

                         नारी के श्रम का यही सिलसिला है

                         कहते हैं देवी जनम दायिनी पर

                          विरासत में उसको कहो क्या मिला है?

पारिवारिक परिवेश पर हिन्दी में बहुत कम लिखा गया है। डाॅ. कुंवर बेचैन और डाॅ. सरिता शर्मा ने इस दिशा में अच्छे गीत लिखे हैं। जमादार धीरज ने बहन को श्रद्धांजलि देते हुए भलीभांति संवेदना को निम्न पंक्तियों में व्यक्त किया है-

                           क्यों मौन हुई कुछ बोली तो

                           मन कहता है तुमसे बात करूं

                           तुम बसी हुई तो वादों में

                           मैं क्या भुलूं? क्या याद करूं?

सर्वहारा वर्ग के प्रति कवि ने सकारात्मक ढंग से अपने गीत व्यक्त किये हैं, जिसमें लेबर वेलफेयर की सुगंध का अनुभव किया जा सकता है -

                           दो संस्कृतियों की सहमति से

                           जब समुद्र मंथन होता है

                           अमृत-विष के बंटवारे में

                           ठगा हुआ-सा श्रम रोता है

समाज के साथ सायुज्य के दायित्व पर जमादार धीरज ने बल दिया है -

                           साथ जो न ज़माने के ढल जाएगा

                           ज़िन्दगी को ज़माना ही छल जाएगा

                           वक़्त पहचानिए जो रुकेगा नहीं

                           अपना चेहरा छुपाये निकल जाएगा।

                           नाम सबका न इतिहास बनता यहां

                           काल कितनों को बैठा निगल जाएगा

                           आह को मैं सवारूं इसी चाह से

                           गीत में दर्द अपना बदल जाएगा।

उपर्युक्त पंक्तियों में पाठकों को नागरी ग़ज़ल की सुगंध अवश्य मिलेगी। हिन्दी में ऐसे कवि बहुत कम हैं, जिनको खड़ी बोली के साथ-साथ लोकभाषा में भी महारत हासिल हो। जमादार धीरज ने अवधी में अनेक रस-सिक्त गीतों की रचना की है। कवि ने गीत-ग़ज़ल और दोहों में भी अपनी रचनाशीलता का परिचय दिया है। जमादार धीरज ने जीवन, समाज, राजनीति आदि सभी पाश्र्वों का सफलतापूर्वक स्पर्श किया है।

( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)