बुधवार, 20 जून 2018

गुफ्तगू ने नए लोगों को दी पहचान

इलाहाबाद के आठ उर्दू अदीबों का किया गया सम्मान

इलाहाबाद। ‘गुफ्तगू’ की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसने नये लोगों को अवसर प्रदान करके देश के पटल पर स्थापित किया है, अगर ‘गुफ्तगू’ ने यह प्र्रयास नहीं किया होता तो बहुत से कवि-शायर दुनिया के सामने ही नहीं आ पाते, उनकी प्रतिभा कंठित हो जाती। यह बात वरिष्ठ शायर हसनैन मुस्तफ़ाबादी ने ‘गुफ्तगू’ द्वारा 17 जून को इलाहाबाद के करैली स्थित अदब घर में आयोजित सम्मान समारोह और मुशायरे के दौरान कही। उन्होंने कहा आज आठ उर्दू अदीबों का सम्मान करके ‘गुफ्तगू’ ने यह साबित कर दिया है अच्छा काम करने वालों की हौसलाअफ़ज़ाई करती रहेगी।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि अगर हौसला हो तो कामयाबी ज़रूर मिलेगी। मैं शुरू से गुफ्तगू को देखता आया हूं, 15 साल के सफ़र की जब शुरूआत हुई तो यह नहीं लगता था सफ़र इतना लंबा चलेगा, मगर इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की लगन ने इसे कामयाब किया है। गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी ने कहा कि उत्तर प्रदेश उर्दू एकेडेमी ने इलाहाबाद के लोगों को सम्मानित किया है, जो इलाहाबाद के लिए बेहद सम्मान की बात है, इसे देखते हुए हमने इन लोगों को सम्मानित करने का निर्णय लिया, ताकि इससे लोगों को प्रेरणा मिले और दूसरे साहित्यकार भी अच्छा लिखें। विशिष्ट अतिथि डाॅ. अशरफ़ अली बेग ने कहा कि जिन आठ लोगों को उत्तर प्रदेश उर्दू एकेडेमी ने एवार्ड दिया था, उन्हें सम्मानित करके गुफ्तगू ने एक बड़ा काम किया है। सरदार गुरमीत सिंह ने कहा कि ‘गुफ्तगू’ का साहित्यिक सफ़र आज इलाहाबाद की पहचान बन गया है। जब कभी भी इलाहाबाद की साहित्यिक पत्रिका का एतिहास लिखा जाएगा तो उसमें ‘गुफ्तगू’ का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने किया।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें नरेश महारानी, शिवपूजन सिंह, योगेंद्र कुमार मिश्र, प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, संपदा मिश्रा, सुनील दानिश, वाक़िफ़ अंसारी, शाहीन खुश्बू, फरमूद इलाहाबादी, गुलरेज़ इलाहाबादी, शैलेंद्र जय, रमेश नाचीज़, शादमा ज़ैदी, अख़्तर अज़ीज़, सैफ़, अजीत शर्मा आकाश, नौशाद कामरान, हसीन जिलानी, रजनीश पाठक और आसिफ ग़ाज़ीपुरी ने कलाम पेश किया। अंत में नरेश कुमार महरानी ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया।

इन्हें किया गया सम्मानित
असरार गांधी, फ़ाज़िल हाशमी, शाइस्ता फ़ाख़री, ज़फ़रउल्ला अंसारी, नौशाद कामरान, डाॅ. ताहिरा परवीन, डाॅ. सालेहा सिद्दीक़ी और रूझान पब्लिकेशन

                               

रविवार, 10 जून 2018

इफ्तार पार्टी से कौमी एकता का संदेश


                                                             -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
‘उनका जो काम है वो अहले सियासत जाने/मेरा पैगाम मोहब्बत है जहां तक पहुंचे।’ जिगर मुरादाबादी का यह शेर रमजान के महीने में प्रासंगिक हो उठता है। तमाम सियासतदान वोट बैंक की राजनीति के तहत तोड़-जोड़ में लगे रहते हैं और जनता इन्हीं के जाल में फंसी रहती है। मगर रमजान के महीने में विभिन्न समुदायों द्वारा आयोजित की जाने वाली रोजा-इफ्तार पार्टियां इस भ्रम को तोड़ देती हैं कि इंसानों को अलग-अलग ग्रुपों एवं नामों से संबोधित किया जाए। रोजा इफ्तार पार्टियों के दौरान आपसी भाईचारे और सौहार्द की अनोखी मिसाल बन जाती है। विभिन्न सरकारी संस्थानों, राजनैतिक पार्टियों, व्यापार मंडलों और मुखतलिफ कौमो-मजहब के लोग न सिर्फ रोजा-इफ्तार पार्टियों में शामिल होते हैं, बल्कि पूरी लगन और मेहनत से इसका आयोजन भी करते हैं। दरअसल, रमजान का महीना इस्लाम मजहब के अनुसार बरकतों वाला महीना है, जिसमें मुसलिम समुदाय के लोग एक महीने तक रोजा रखते हैं, तरावीह की नमाज पढ़ते हैं, सुबह सहरी खाते हैं और शाम को सूरज डूबने के समय रोजा खोलते हैं। दिनभर भूखे-प्यासे रहने के बाद शाम के वक्त सूरज डूबने पर जलपान वगैरह किया जाता है, तब इसी जलपान को इफ्तार कहते हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो इफ्तार उन लोगों के लिए है, जो दिनभर रोजा रहते हैं। लेकिन रोजेदार के साथ पूरे सलीके से बैठकर रोजा खोलने यानि में शामिल होने को भी इस्लामिक विधान के सवाब (पुण्य) का काम बताया गया है। रोजेदार के साथ रोजा खोलने की परंपरा ने इतनी मकबूलियत हासिल कर ली है कि आज न सिर्फ गैर मुसलिम रोजा इफ्तार में शामिल होते हैं, बल्कि रोजा इफ्तार पार्टियों के मेजबान भी बनते हैं। रोजा इफ्तार पार्टी के मामले में पंडित मोतीलाल नेहरु का नाम सबसे पहले आता है। इलाहाबाद में रोजा-इफ्तार पार्टी का सबसे पहला आयोजन करने वाले गैर मुसलिम व्यक्ति पंडित मोती लाल नेहरु ही थे। उन्होंने सबसे पहले आनंद भवन में रोजेदारों के लिए इफ्तार का आयोजन किया था। इसमें शहर के तमाम छोटे-बड़े मुसलमानों ने शिरकत की थी और उस दौर में पंडित मोती लाल नेहरु का यह आयोजन पूरे देश में चर्चा का विषय बना। 
 इस सिलसिले को आगे बढ़ाने और उसे जारी रखने में हेमवंती नंदन बहुगुणा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। 1974 में प्रदेश की मुख्यमंत्री की बागडोर संभालने के साथ ही बहुगुणा जी ने रोजा इफ्तार की नींव अपने जेरे-एहतमाम कर डाली और वह जब तक जीवित रहे, रोजा-इफ्तार पार्टी का आयोजन करते रहे। पूरे इलाहाबाद शहर के साथ गांवों के लोग जिनमें हिन्दू-मुसलिम दोनों ही थे, इस इफ्तार पार्टी में शिरकत करते। बाद के प्रमुख राजनीतिज्ञों में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंह राव से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक रोजा इफ्तार का आयोजन करते रहे हैं।
 बुजुर्ग मोहम्मद मुतुर्जा के मुताबिक ‘बहुगुणा जी के इस व्यक्तित्व से लगता था कि वह अपने घर और परिवार के व्यक्ति हैं। हिन्दू और मुसलिम का कोेई फर्क नहीं पता चलता था।’ साहित्यकार यश मालवीय कहते हैं, ‘राजाओं-महाराजाओं के जमाने में भी सामूहिक रोजे-इफ्तार का आयोजन होता रहा है, उस जमाने में समाज के मानिन्द बुद्धिजीवियों को खासतौर पर आमंत्रित किेया जाता था। आज इस तरह के आयोजनों में राजनैतिक लोग ज्यादा मौजूद रहते हैं। फिर भी यह भारतीय एकता को तो प्रदर्शित करता ही है।’ इलाहाबाद में खुल्दाबाद व्यापार मंडल प्रकोष्ठ के सरदार मंजीत सिंह भी खूब जोशो-खरोश से रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन करते हैं। कहते हैं ‘हमें ये नहीं लगता कि यह सिर्फ मुसलमानों का मामला है, यह भारतीय और इलाहाबादी कौमो-मिल्लत का पैगाम बन गया है। इफ्तार में जितने मुसलमानों भागीदारी होती है, उससे अधिक गैर मुसलमानों की होती है।’
 रोजा इफ्तार पार्टी के एक अन्य आयोजक अरमान खान करते हैं कि त्योहार आपसी  मिल्लत का पैगाम लेकर आते हैं, रोजा इफ्तार भी ऐसा ही एक त्योहार है। यह इलाहाबाद ही नहीं पूरे देश की तहजीब का अहम हिस्सा बन गया है, पूरे देश में इस तरह का आयोजन होने लगा है। हमारी देखा-देखी ही अमेरिका के राष्टृपति भी रोजा इफ्तार पार्टी में शामिल हो रहे हैं, और मेजबानी भी करने लगे हैं। यह सिर्फ  इस्लामी तहजीब नहीं बल्कि भारतीय तहजीब का हिस्सा बन गया है।’ इस मौके पर सभी धर्मों के लोगों का एक साथ रोजा इफ्तार में शामिल होना कौमी यकजहती का परिचय तो देता ही है। सलीम शेरवानी द्वारा आयोजित होने वाले इफ्तार पार्टी जिसमें मुलायम सिंह तक शिरकत करते रहे हैं, के अलावा फायर बिग्रेड, रेलवे, हाईकोर्ट के वकीलों, विभिन्न शहरों के व्यापार मंडल, तमाम अदबी तंजीमों द्वारा आयोजित होने वाले रोजा इफ्तार पार्टियां भारत के गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल हैं, जिसे नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं है।
हालांकि इसके एक बात यह भी उभरकर सामने आने लगी है कि रोजा निहायत धार्मिक मामला है, इसलिए इफ्तार पार्टी के आयोजन में यह जरूर देखा जाना चाहिए कि जिन लोगों या जिन संस्थाओं द्वारा ये आयोजन किए जा रहे हैं, उनकी आय स्रोत का जरिए जायज (हलाल की कमाई) है या नहीं है। कुछ शहरों में पुलिस विभाग द्वारा आयोजित होने वाले रोजा इफ्तार पार्टी में लोगों ने जाने से मना भी किया है।
                         

रविवार, 27 मई 2018

जागती आंखें, मंज़िल, अक्कासिये दिल और खुला आकाश


                    -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी



 मुरादाबाद  की रहने वाली मीना नक़वी देश की जानी-मानी उर्दू ग़ज़लकारा हैं, काफी समय से लेखन के प्रति सक्रिय हैं। पत्र-पत्रिकाओं के अलावा साहित्यिक आयोजनों में शामिल होती रही हैं। उर्दू में प्रकाशित इनके दो मजमुए ‘जागती आंखें’ और ‘मंज़िल’ मेरे सामने हैं। इन दोनों ही पुस्तकों को पढ़ते हुए शानदार ग़ज़लों से सामना होता है। जगह-जगह ऐसी ग़ज़लों से सामना होता है, जिन्हें पढ़कर ‘वाह-वाह’ कहना ही पड़ता है। ‘जागती आंखें’ में शायरी की शुरूआत ‘हम्द’ से की गई है। हम्द में कहती हैं ‘तेरी ज़मीन तेरा आसमां जहां भी तेरा/मकान भी है तेरा और लामकां भी तेरा। मेरे करीम कर तो अपनी मीना पर/कि ये हयात भी एहसाने बेकरां भी तेरा।’ आमतौर पर ग़ज़ल मजमुओं की शुरूआत लोग हम्द अथवा नात से करते हैं, मीना नक़वी ने भी यही किया है। हम्द से आगे बढ़ते ही एक से बढ़कर एक ग़ज़लें पढ़ने को मिलती हैं, जिनमें रिवायती और जदीदियत दोनों तरह की शायरी है। पहली ग़ज़ल में कहती है- ‘यूं गुलों के दरमियां हैं जागती आंखें मेरी/जैसे खुश्बू में निहां हैं जागती आंखें मेरी।’ इनकी ग़ज़लोें के बारे में नज़ीर फतेहपुरी लिखते हैं कि- ‘ज़िन्दगी एक ऐसी कहानी है, जिसमें किसी तन्हा किरदार के लिए गुंजाइश कम ही होती है और अगर उस कहानी में हालात का मारा हुआ कोई किरदार तन्हा है तो वह अपने आपमें इज्तराब का शिकार है। ऐसे हालात में इसे किरदारशानी की तलाश होती है। जब किरदारेशानी किरदारे अव्वल से मिल जाता है तो दास्तान मुकम्मल हो जाती है। लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी होती है जिनमें मुअवद्द किरदार जिसको कहानी के सारे किरदार तलाश कर रहे हों वह किरदार आएं तो दास्तान मुकम्मल हो’- कहां तुम हो वफ़ा तलाश में/तुम्हें किरदार सारे ढूंढ़ते है।’



इनके दूसरे मजमुए ‘मंज़िल’ की बात करें तो इस किताब में भी इसकी तरह की शायरी से सामना होता है। इस किताब की शुरूआत में हम्द के बाद नात में वह कहती हैं-‘ वह नूरे हक़ रहमतों के पैकर, सलाम उन पर दरूर उन पर/ है जिनके दम से जहां मुनव्वर, सलाम उनको दरूर उनको। शउर  उनको यूं ज़िन्दगी का आया, तमाम आलम पे नूर छाया/करम है उनका ये आगही पर, सलाम उनपर दरूर उन पर।’ फिर एक ग़ज़ल में कहती हैं-‘क्या अजब दिल का हाल है जानां/बस तबीयत नेढाल है जानां। कुरबतों से नवाज़ दे मुझको/मेरे लब ने सवाल है जानां।’ इस तरह कुल मिलाकर मीना नक़वी की शायरी में आज के समाज और इसमें गुजरती ज़िन्दगी और इसके हालात की तर्जुमानी मिलती है, जो शायरी का सबसे अहम पहलू होना चाहिए। ऐसी शायरी के लिए मीना नक़वी मुबारकबाद की हक़दार हैं।
 महामहिम श्री केशरी नाथ त्रिपाठी जी वर्तमान समय में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं। इलाहाबाद के रहने वाले श्री त्रिपाठी राजनीतिज्ञ के अलावा अधिवक्ता और कवि भी हैं। उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके काव्य संग्रह ‘मनोनुकृति’ का उर्दू अनुवाद ‘अक्कासिये दिल’ नाम से डाॅ. यासमीन सुल्ताना नक़वी ने किया है। डाॅ. यासमीन ने इस अनुवाद के जरिए उर्दू दां तक इस किताब को पहुंचाने का सराहनीय कार्य किया है। उनके इस काम पर टिप्पणी करते हुए प्रेम शंकर गुप्त जी लिखते हैं-‘ डाॅ. यासमीन को उर्दू मादरी ज़बान की शक़्ल में हासिल हुई, वह गंगा-जमुनी तहज़ीब की मुकम्मल शक़्ल की नुमाईंदा हैं। मैं सालों से उन्हें मुसलसल कामयाबी की सीढ़ी पर आगे बढ़ते देखकर खुश होता रहा हूं।’ स्वयं महामहिम केशरी नाथ त्रिपाठी जी कहते हैं-‘मुझे उर्दू नहीं आती। दिन-प्रतिदिन की बोल-चाल में प्रयुक्त, या न्यायालय कार्य से संबंधित दस्तावेज़ों में लिखे उर्दू के शब्दों तक ही मेरा ज्ञान है, परंतु इतना मैं अवश्य कहूंगा कि उर्दू भाषा में भी सम्प्रेषण शक्ति बहुत अधिक है। यदि अनुवाद के माध्यम से मेरी रचनाओं के भाव उर्दू-भाषी पाठकों के पास पहुंच जाय तो यह मेरा सौभाग्य है।’ ‘तलाश’ शीर्षक की कविता अनुवाद डाॅ. यासमीन ने यूं किया -‘ अभी भी मुझे तलाश है/उस अनमोल  पेंसिल-काॅपी की/जो मुझे मिली थी इनआम में/जब मैं काॅलेज का तालिब-इल्म था और साथ में मिली थी/ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट/ और पीठ पर शफ्क़त भरी थपथपाहट/जो बन गई मेरे लिए/मील का संगे-अव्वल।’ कुल मिलाकर डाॅ. यासमीन के इस कार्य की जितनी सराहना की जाए कम है। 164 पेज के तर्जुमे की किताब को उर्दू लिपी के अलावा देवनागरी में प्रकाशित भी किया गया है। किताब महल ने इसे प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 300 रुपये है।
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले की रहने वाली मंजू यादव अध्यापिका हैं, पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं, कई सहयोगी संकलनों में रचनाएं छपी हैं। कुल मिलाकर काफी समय से साहित्य के प्रति सक्रिय हैं, ख़ासकर कहानी और काव्य लेखन को लेकर। हाल ही में उनका कहानी संग्रह ‘खुला आकाश’ प्रकाशित हुआ है, पुस्तक का संपादन डाॅ. हरिश्चंद्र शाक्य ने किया है। इस संग्रह में कुल 10 कहानियां शामिल की गई हैं। इनकी कहानियों में आम आदमी की पीड़ा, घुटन, गरीबी, लाचारी, भुखमरी, शोषण, नारी मुक्ति आदि का चित्रण हैं, जो समाज की स्थिति का वर्णन कर रही हैं। पुस्तक की पहली कहानी ‘खुला अकाश’ जो कि पुस्तक का नाम भी है, इसमें महिला के जीवन की तुलना पिंजड़े में बंद चिड़िया के जीवन से की गई है। कहानी में बाल मनोविज्ञान के साथ-साथ नारी स्वतंत्रता की भावना का वर्णन है। छोटे बच्चे देव को उसके चाचू जन्म दिवस पर उपहार में रंग-बिरंगे चिड़िया से भरा पिंजड़ा देते हैं। चिड़िया पहले तो रिहाई की गुहार लगाती प्रतीत होती है, लेकिन जब उन्हें पिंजड़े में ही सुख-सुविधाएं मिलती हैं तो वे फिर पिंजड़े में ही रहने की आदि हो जाती हैं और पिंजड़ा खोल देने पर भी नहीं उड़ती हैं। जिस प्रकार खुला पिंजड़ा होने पर भी चिड़िया उड़ती नहीं है, उसी प्रकार औरत को भी खुला आकाश त्यागकर घर रूपी पिंजड़े में अपनों के साथ रहकर सारे सुख मिल जाते हैं। इसी प्रकार अन्य कहानियों में समाजी सरोकार को जोड़ते हुए औरत की स्थिति का वर्णन किया गया है। 80 पेज वाले इस सजिल्द पुस्तक को निरूपमा प्रकाशन, मेरठ ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 160 रुपये है।

गुफ्तगू अप्रैल-जून 2018 अंक में प्रकाशित

सोमवार, 21 मई 2018

अंग्रेज़ी से मेरा लगाव है, अंग्रेज़ियत का सख़्त विरोधी हूं

प्रो. ओपी मालवीय से साक्षात्कार लेते प्रभाशंकर शर्मा

इलाहाबाद में सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक 85 वर्षीय रिटायर्ट प्रोफेसर ओपी मालवीय का वास्ता आज भी सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ शिक्षण कार्य से है। ‘गुफ्तगू’ के उप संपादक प्रभाशंकर शर्मा और अनिल मानव ने आपसे मुलाकात कर बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत के संपादित अंश-
सवाल: सबसे पहले आप अपने शुरूआती जीवन के बारे बताइए ?
जवाब: मेरा जन्म 17 सितंबर 1933 को एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में रानीमंडी, इलाहाबाद में हुआ। हम 50 वर्षों से कल्याणी देवी मोहल्ले में रह रहे हैं। मेरी शिक्षा म्युनिसपल स्कूल और राजकीय विद्यालय से हुई। अध्ययन के प्रति अभिरुचि होने के कारण मुझे सफलता मिलती गई। इंटरमीडिएट परीक्षा में उस समय मुझे प्रदेश में तीसरा स्थान मिला था। मैंने एमए अंग्रेजी विषय से किया, उसमें भी अच्छा स्थान रहा। हमारे समय में अच्छा एकेडेमिक कैरियर होने पर तुरंत नौकरी मिल जाया करती थी। फिलहाल मेरे परिवार में पांच पुत्र और उनकी संतानें हैं।
सवाल: आप कई वर्षों तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर रहे, उस दौरान के माहौल के बारे में बताइए ?
जवाब: विश्वविद्यालय में मेरा अनुभव सुखद और प्रेरणादायक था। विश्वविद्यालय में कभी-कभी छात्र आंदोलन भी चलते थे, दूसरी तरफ कक्षाएं भी चलती थीं। एक तरफ छात्र आंदोलन और दूसरी तरफ अविरत पाठ्यक्रम, ये मेरे लिए अच्छा अनुभव था।
सवाल: आपके समय में फ़िराक़ गोरखपुरी साहब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में थे, उस समय उनका क्या प्रभाव था ? 
जवाब: मैं व्यक्तिगत रूप में फ़िराक़ साहब को जानता हूं। फ़िराक़ साहब मेरे आदरणीय रहे हैं। उन्होंने मुझे यह अवसर प्रदान किया कि मैं उनके चरणों के निकट बैठकर अनेक विषयों पर उनसे चर्चा कर सकूं। मैंने उनके उपर 14 मिनट की एक टाॅक तैयार की थी। मैं उनसे बहुत ही प्रभावित था, वे मेरे लिए बहुत ही प्रेरणादायक गुरु थे। उनके बारे में फैलाई गई भ्रांतियां द्वेषपूर्ण हैं। वे पढ़ाने में बहुत ही दिलचस्पी लेते थे। यह मेरा सौभाग्य था कि मैंने उनकी अंग्रेज़ी की रेग्युलर क्लासेज और सेमिनार अटेंड की है। मैंने उनकी ग़ज़लों को ताल और राग में निबद्ध किया है और इनका शास्त्रीय गायन भी किया है।

सवाल: आप शिक्षा जगत से जुड़े रहे हैं, बदलते परिवेश में क्या शिक्षा का पैटर्न बदलने की ज़रूरत है ?
जवाब: यह तो प्रतिक्षण महसूस हो रही है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जो सत्तारूढ़ लोग हैं, वे शिक्षा के सुधार की तरफ वास्तविक ध्यान नहीं दे रहे हैं। समय-समय पर उनके वक्तव्य प्रकाशित हो जाने से कोई लाभ नहीं है। शिक्षा में आमूल-चूल सुधार की आवश्यकता है। हमारा ‘डेमोग्राफिक डिवीडेंड’ यानी की कार्यशील युवकों की संख्या सर्वाधिक है। चीन औंर सारा यूरोप बूढ़ा हो रहा है। हमारे नवयुवक उर्जा संपन्न हैं, दृष्टि संपन्न हैं लेकिन ये अपने भविष्य के प्रति आश्वास्त नहीं हैं। इसके लिए जिस राजनीतिक संकल्प की आवश्यकता होनी चाहिए उसका बिल्कुल अभाव है।
सवाल: क्वालिटी एजुकेशन के मामले में सरकारी शिक्षण संस्थान एवं प्राइवेट शिक्षण संस्थान में क्या अंतर है ?
जवाब: बहुत बड़ा अंतर है। पहले तो हमारे सरकारी संस्थान थे, जिन्होंने बहुत बड़ा योगदान लोगों को शिक्षित करने में किया है। उनकी पूरी उपेक्षा हो रही है और इंग्लिश मीडियम के प्राइवेट संस्थान हैं इनका मुझे बहुत निकट का प्रतिक्षण अनुभव है। प्राइवेट संस्थानों में शिक्षक उतने योग्य नहीं हैं फिर भी छात्रों से फीस बहुत अधिक ली जाती है, ये मेरे लिए चिंता का विषय है। राजकीय विद्यालयों की उपेक्षा हो रही है, अध्यापक राजकीय विद्यालयों में पढ़ाने के लिए तैयार हैं, किंतु विद्यार्थी कम मिल रहे हैं। राजकीय विद्यालयों की उपेक्षा हो रही हंै और सारा ध्यान निजी अंग्रेज़ी स्कूलों पर दिया जा रहा है। यह मेरा दुखद अनुभव है और इसके बारे में मैं बड़ी निस्सहायता का अनुभव करता हूं।
सवाल: आज के सामायिम परिवेश में अंग्रेज़ी शिक्षा के संदर्भ में क्या कहना चाहेंगे ?
जवाब: मेरी शिक्षा किसी प्रकार से अंग्रेज़ी या निजी विद्यालय में नहीं हुई, लेकिन मैंने अंग्रेजी को अध्यापन विषय के रूप में चुना। अंग्रेज़ी के प्रति मेरा लगाव है अंग्रेज़ियत से मेरा सख़्त विरोध है।
सवाल: आपने कब्रिस्तान में पौधरोपण का कार्य कराया, इसका ख़्याल आपको कैसे आया ? क्या इसका कोई सामाजिक या धार्मिक विरोध नहीं हुआ ?
जवाब: यह बड़ा अच्छा प्रश्न हैं, इसके दो पहलू हैं। पहला तो यह कि पौधरोपण के प्रति मेरा रूझान क्यों हुआ। मैंने पढ़ाई के समय पंचमुखी महादेव विशाल शिवमंदिर के नीचे बैठकर पढ़ाई की है तो वृक्षों के प्रति मेरा मोह रहा है। दूसरी बात यह कि 1970 में एक कांफ्रेंस हुई ‘सेव द अर्थ’ उस कांफ्रेंस में बहुत सी बातें उभकर आईं, उसमें मैंने अनुभव किया कि पौधरोपण का कार्य प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है। कब्रिस्तान को मैंने प्रयोग स्थली बनाया और उस समय वृक्षों के सींचने के लिए बड़ी दूर से पानी लाना पड़ता था, जिसमें हमारे परिवार और हमारे विद्यार्थी सहयोग करते थे। मेरे पौत्र उत्कर्ष और पुत्र परिमल भी इस कार्य में लगे रहते थे। उत्कर्ष की दादी हर गुरुवार को मुख़्तार बाबा की मजार पर जाती थीं। उन्हीं के आग्रह पर कब्रिस्तान में पौधे लगाने की प्रेरणा मिली। कुल मिलाकर कब्रिस्तान पर पौधरोपण का ज्यादा विरोध नहीं हुआ, बल्कि सकारात्मक सहयोग ही मिला। हम लोगों ने पौधरोपण के लिए ‘वृक्ष मित्र समाज’ नामक संस्था भी बनाई है।
सवाल: 1992 के दंगों के समय शहर में कफ्र्यू लगा था, तब के माहौल के विषय में कुछ जानकारी दें ? शहर के क्या हालात थे और आपको कैसे हालात का सामना करना पड़ा ?
जवाब: 1992 के दंगों के प्रारंभ में तो घोर निराशा थी। ऐसा लगा कि कल्याणी देवी और दरियाबाद मोहल्ले आपस में विभक्त हो गए हैं और हम लोग आपस में मिल ही नहीं पाएंगे। फिर हम लोग बनवारी लाल शर्मा जी से मिले और हम लोग ने निकलना शुरू किया। लोगों से मिलकर सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया। सामंजस्य स्थापित करने में जितना सहयोग हमें मुसलमानों से मिला उतना हिंदुओं से नहीं मिला। हो सकता है इसके पीछे कोई कारण या सुरक्षा की भावना रही हो। अंत में लोगों में सहयोग की भावना पैदा हुई और फिर धीरे-धीरे एक-आध हफ्ते में ही माहौल सामान्य हो गया। हमारे यहां सहयोगपूर्ण वातावरण रहता है। रमजान के महीने में हमारे यहां इफ्तार पार्टी में सभी लोग आते हैं।
सवाल: इलाहाबाद में सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाने के लिए आपने बहुत काम किया है। सांप्रदायिकत सौहार्द बढ़ाने के लिए देश के मौजूदा हालात में क्या कदम उठाने की ज़रूरत है ?
जवाब: आर्थिक असमानता पूरे देश को एक सूत्र में बांधने में बाधक बन रहा है। सबसे ज़्यादा आवश्यकता है कि आर्थिक प्रगति हो। हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने इसी उद्देश्य से आर्थिक प्रगति के लिए योजना आयोग बनाया था, जो अब नहीं रहा। इस समय मैं रामचंद्र गुहा की एक पुस्तक पढ़ रहा हूं, जिसका नाम ‘भारत गांधी के बाद’ है। इसमें बड़ी ही निष्पक्षता, तटस्थता एवं भावुकता के साथ उस समय की समस्याओं का वर्णन किया है। आर्थिक प्रगति, असमानता के निराकरण के साथ एकेडेमिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम, साहित्य व संगीत की गोष्ठियों में सांप्रदायिकता की दीवारें टूट जाती हैं। मैं आशा और प्राथना करता हूं कि देश के इस तरह का वातावरण बने। पं. नेहरु जी का वाक्य ‘हू लाइव्स इफ इंडिया डाइज?  हो डाइज इफ इंडिया लाइव्स’ अर्थात भारत देश के जिन्दा रहने पर कोई नहीं मरेगा और अगर भारत नहीं है तो आप कहीं नहीं हैं। इस देश को बनाने और संवारने में एक-एक व्यक्ति का योगदान है और हमें अपने नौजवनों को सिखाना है कि वे अपने एक-एक क्षण का प्रयोग अपने अध्ययन और देश के निर्माण में करें।
सवाल: इलाहाबाद को आप लंबे अर्से से देख रहे हैं। आप तब के इलाहाबाद और अब के इलाहाबाद में क्या अंतर महसूस करते हैं?
जवाब: अंतर तो महसूस करते हैं पर वास्तविकताा यह है कि पिछले काफी दिनों से मैं इसी कमरे में रहता हूं। आज के इलाहाबाद को देखने का मुझे उतना अवसर नहीं मिला। सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होता हूं, जिसमें तात्कालिक उद्देश्य की तो पूर्ति हो जाती है पर आपके इलाहाबाद के बारे में मुझे उतनी जानकारी नहीं है। 
सवाल: जहां तक हमें जानकारी मिली है कि आप रिटायरमेंट के बाद भी विदयार्थियों को निःशुल्क ट्यूशन देते हैं ?
जवाब: जो विद्यार्थी फीस दे सकते हैं उसने आंशिक रूप में फीस लेता हूं और इसका एक हिस्सा सामाजिक कार्य में लगाता हूं। अभी तक मैंने बड़ी तल्लीनता के साथ शिक्षण कार्य किया है। पिछले एक-दो वर्षों से पढ़ाने में कठिनाई भी हो रही है, अब हो सकता है घर पर शिक्षा देने का कार्य उस गति से न चल पाए। जितने विद्यार्थियों को मैंने विश्वविद्यालय में पढ़ाया होगा उससे कहीं अधिक बच्चों को मैंने घर पर पढ़ाया है। मेरा फीस हमेशा नाम मात्र हुआ करती थी। मैंने अभी तक किसी बच्चे से 150 रुपये से ज़्यादा फीस नहीं ली है।
सवाल: आज के समय में प्रगतिशील लेखक मंच कहां तक प्रासंगिक है ?
जवाब: प्रासंगिक तो बहुत है, उसे हमेशा प्रासंगिक होना चाहिए क्योंकि यह ऐसे लेखको और साहित्यकारों का संगठन है जिसका उद्देश्य प्रगतिशील विचारों को संरक्षित करना और आगे बढ़ाना है। किंतु दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इस समय मैं इस संघ से संतुष्ट नहीं हूं। पुराने सदस्य तो संघ को छोड़ते जा रहे हैं और नए सदस्य निष्क्रियता के कारण नहीं आ रहे हैं। सदस्यों में आगे निकलने की ख़्वाहिश है, सभी पदाधिकारी बनना चाहते हैं।
सवाल: उम्र के इस पड़ाव में आपकी क्या कार्य योजना है ?
जवाब: अध्ययन मेरे जीवित रहने का प्रमाण है। अगर मैं अघ्ययन न कर पाउं तो समझूंगा कि मेरी उपयोगिता समाप्त हो गई। दूसरा, मेरी साधना एक विषय संगीत है, पिछले छह महीने से संगीत साधना नहीं कर पा रहा हूं। पर अभी कल ही मैंने अपने परपोते के उपलक्ष्य में गाया। मेरे पोते विमर्श और संघर्ष तबले व पखावज़ पर मुझे संगत देते हैं। विमर्श को बालश्री पुरस्कार मिल चुका है। अब इस उम्र में कितना कर पाउंगा देखना है। अभी मैंने ‘गोरा’ और ‘गोदान’ उपन्यास पर अनुशीलन लिखा है जो प्रकाशित होना है।

प्रो. ओपी मालवीय को ‘गुफ्तगू’ पेश करते हुए अनिल मानव
गुफ्तगू के जनवरी-मार्च: 2018 अंक में प्रकाशित

मंगलवार, 8 मई 2018

विपरीत हालात में गुफ्तगू का कार्य सराहनीय

गुफ्तगू साहित्य समारोह-2018’ का किया गया आयोजन


 ‘सुभद्रा कुमारी चाहौन’ और ‘बेकल उत्साही’ सम्मान से नवाजे गए रचनाकार
इलाहाबाद। आज लोग साहित्य से दूर भाग रहे हैं। पठन-पाठन लगातार कम होता जा रहा है। अधिकतर साहित्यिकार अपनी रचनाओं से लोगों को आकर्षित करने में नाकामयाब हैं। ऐसे विपरीत हालात में पिछले 15 वर्षों से गुफ्तगू का साहित्यिक सफ़र प्रासंगिकता के साथ जारी है, यह बेहद सराहनीय है। आज के माहौल यह कार्य बेहद ख़ास हो जाता है। यह बात वरिष्ठ साहित्यकार नीलकांत ने ‘गुफ्तगू’ की ओर से 29 अप्रैल को इलाहाबाद स्थित हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘गुफ्तगू साहित्य समारोह-2018’ के दौरान कही। कार्यक्रम के दौरान 11 महिला साहित्यकारों ’सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान’ और 15 साहित्यकारों को ‘बेकल उत्साही सम्मान’ प्रदान किया गया। साथ ही ‘गुफ्तगू’ के महिला विशेषांक-3 और 14 पुस्तकों का विमोचन किया गया। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।  अपने संबोधन में गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि पिछले 15 वर्षों से गुुफ्तगू के सफ़र को जारी रखने में तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ा। लेकिन कुछ लोगों के सहयोग से यह सिलसिला जारी है, और आगे भी जारी रहेगा। गीतकार यश मालवीय ने कहा कि सम्मान के साथ फूल होता है तो कांटों का ताज भी होता है, इसलिए जिन लोगों को आज सम्मानित किया गया है, उनकी जिम्मेदारी बन जाती है कि अपनी लेखनी और सक्रियता यह साबित करें कि उनकों सम्मानित करके सही किया गया है। श्री मालवीय ने कहा कि जब गुफ्तगू की शुरूआत हुई थी तब यह अंदाज़ा नहीं था कि यह सफ़र इतना लंबा होगा, लेकिन इम्तियाज गाजी ने अपनी सक्रियता से इसे सफल बनाया है। 
नंदल हितैषी ने कहा कि पठनीयत का संकट बढ़ा है, ऐसे में साहित्यिक पत्रिका का सफ़र इतना लंबा तय करना एक मिसाल है। गुफ्तगू ने अपनी सक्रियतो से लोगों को जोड़े रखा है, नये-नये रचनाकारों को आगे लाने काम किया है। डाॅ. असलम इलाहाबदी ने कहा कि इम्तियाज़ गाजी की सक्रियता ने इलाहाबाद की अदबी सरगर्मी को बनाए रखा है, ऐसी कोशिश का समर्थन होना चाहिए। उमेश नारायण शर्मा ने गुफ्तगू के कार्यों की सराहना की और बेहतर भविष्य की उम्मीद जताई।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, नरेश कुमार महरानी, धर्मेंद्र श्रीवास्तव, डाॅ. पीयूष दीक्षित, अमित वागर्थ, रमेश नाचीज़, सुनील दानिश, मयंक मोहन, भोलानाथ कुशवाहा, वाकिफ अंसारी, डाॅ. नईम साहिल,  केदारनाथ सविता, डाॅ. अनुराधा चंदेल ओस, रुचि श्रीवास्तव, फरमूद इलाहाबादी, रामनाथ शोधार्थी, सागर आनंद, शिवम हथगामी, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, शैलेंद्र जय, अजीत शर्मा ‘आकाश’, अपर्णा सिंह, शिवा सारंग, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, शिबली सना, जमादार धीरज आदि ने कलाम पेश किया। 

इन्हें मिला सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान
 नीरजा मेहता (ग़ाज़ियाबाद), मीनाक्षी सुकुमारन (नोएडा), डाॅ. ज्योति मिश्रा (बिलासपुर, छत्तीसगढ़), फौजिया अख़्तर (कोलकाता), डाॅ. यासमीन सुल्ताना नकवी (इलाहाबाद), माधवी चैधरी (सिवान, बिहार),  कांति शुक्ला (भोपाल), डाॅ. श्वेता श्रीवास्तव (लखनऊ), मंजू वर्मा (इलाहाबाद), डाॅ. ओरीना अदा (भोपाल) मंजू जौहरी (बिजनौर, उत्तर प्रदेश)। 

इन्हें मिला बेकल उत्साही सम्मान
रामकृष्ण सहस्रबुद्धे (नाशिक), डाॅ. आनंद किशोर(दिल्ली), आर्य हरीश कोशलपुरी (अंबेडकर नगर),  मुनीश तन्हा (हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश), अब्बास खान संगदिल (हरई जागीर, मध्य प्रदेश), डाॅ. इम्तियाज़ समर (कुशीनगर), मुकेश मधुर (अंबेडकर नगर), रामचंद्र राजा(बस्ती, उत्तर प्रदेश), शिवशरण बंधु (फतेहपुर), डाॅ. रवि आज़मी (आज़मगढ़), डाॅ. वारसी अंसारी (फतेहपुर), सुनील सोनी गुलजार (अंबेडकर नगर), ऋतंधरा मिश्रा (इलाहाबाद), डाॅ. विक्रम (इलाहाबाद), सम्पदा मिश्रा (इलाहाबाद)।


बुधवार, 2 मई 2018

गुफ्तगू के महिला विशेषांक-3 (अप्रैल-जून:2018 अंक) में


3. संपादकीय
4-5. पाठकों के पत्र
6-9. आधुनिक परिवेश में महिला कथाकार: अन्नपूर्णा बाजपेयी ‘अंजु’
10-12. साहित्य, सिनेमा और स्त्री: नाज़ ख़ान
13-15. हिन्दुस्तानी समाज में महिलाओं की भूमिका: शाज़ली खान
16-17. घरेलू महिला वित्तीय तौर पर हो सशक्त: कंचन शर्मा
18-21. चेहना पढ़ना जानती थीं महादेवी वर्मा: डाॅ. यासमीन सुल्ताना नक़वी
22-23. महिला सशक्तीकरण और भारतीय परिवार: डाॅ. निशा मौर्या
24-30. सुभद्रा जी की सफलता का रहस्य: मुक्तिबोध
31-34. बैंकिंग उद्योग के शीर्ष पर महिलाएं: नौशाबा ख़ान
35-41. इंटरव्यू (चित्रा मुद्गल)
42-45. चौपाल (आधुनिक साहित्य में महिलाओं का योगदान)
46-50. ग़ज़लें (मीना नक़वी, वजीहा खुर्शीद, डाॅ. सरोजनी तन्हा, कांति शुक्ला, चित्रा भारद्वाज ‘सुमन’, रमोला रूथ लाल ‘आरजू’, अना इलाहाबादी, चारु अग्रवाल ‘गुंजन’, फ़ौजिया अख़्तर ‘रिदा’, दीपशिखा सागर, डाॅ. ओरीना अदा, अतिया नूर, आभा चंद्रा, डाॅ. आरती कुमारी, महिमा श्री, संगीता चैहान विष्ट, रागिनी त्रिपाठी, प्रिया श्रीवास्तव )
51-72. कविताएं (ज्योति मिश्रा, ललिता पाठक नारायणी, विजय लक्ष्मी विभा, सरस दरबारी, अंजलि गुप्ता, मंजू वर्मा, डाॅ. जयश्री सिंह, ऋचा वर्मा, प्रतिभा गुप्ता, हेमा चंदानी ‘अंजुलि’, माला सिंह खुश्बू, प्रतिमा खनका, शिबली सना, मंजु जौहरी मधुर, पुष्पलता शर्मा, शालिनी साहू,  उर्वशी उपाध्याय, रुचि श्रीवास्तव, अंजली मालवीय मौसम, प्रीति समकित सुराना, गीता कैथल, स्वराक्षी स्वरा, वंदना शुक्ला, अर्चना सिंह, अपराजिता अनामिका, रचना प्रियदर्शिनी, डाॅ. कविता विकास,  कुमारी अर्चना, लक्ष्मी यादव, वीना श्रीवास्तव, माधवी चैधरी, मंजू यादव, वंदना राणा, मुक्ति शाहदेव, डाॅ. सुनीता देवदूत मरांडी, प्रिया भारतीय, शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’, सम्पदा मिश्रा, विनीता चैल, अपर्णा सिंह, सीमा वर्मा अपराजिता, इल्मा फ़ातिमा, अनीता अनुश्री )
73-77. लधु कथा (अलका प्रमोद, अदिति मिश्रा, सारिका भूषण, डाॅ. श्वेता श्रीवास्तव, भारती शर्मा)
79-80. तब्सेरा (जागती आंखें, मंज़िल, अक्कासिए दिल, खुला आकाश)
81-98. अदबी ख़बरें
83. गुलशन-ए-इलाहाबाद (डाॅ. यासमीन सुल्ताना नक़वी)
84. ग़ाज़ीपुर के वीर (वीर अब्दुल हमीद)- मोहम्मद शहाब खान
85- 86. परिशिष्ट-1: नीरजा मेहता- परिचय
87-89. अभिव्यक्ति की सितार पर गूंजते शब्द: डाॅ. अनुराधा चंदेल ‘ओस’
90. साथर्कता से ओतप्रोत नीरजा की कविताएं: डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
91-118. नीरजा मेहता की रचनाएं
119- 120. परिशिष्ट-2. मीनाक्षी सुकुमारन- परिचय
121-122. विसंगतियों और विडंबनाओं पर तीखा प्रहार: भोलानाथ कुशवाहा
123-124. मीनाक्षी सुकुमारन की कविताएं: शैलेंद्र जय
125-152. मीनाक्षी सुकुमारन की कविताएं



रविवार, 4 फ़रवरी 2018

साहित्य, कला का विकास नेहरु युग की देन: नामवर सिंह

प्रो. नामवर सिंह से इंटरव्यू लेते हुए डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव
                                                                           
प्रो. नामवर सिंह हिंदी के जाने-माने शीर्षस्थ मूर्धन्य आलोचक हैं। उनके कहे और लिखे गए वाक्य साहित्य जगत में ब्रह्म वाक्य के समान हैं। उन्होने हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य पर भी लिखा है। हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां, इतिहास और आलोचना, कविता के नए प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज, वाद विवाद संवाद, छायावाद सहित अनगिनत आलोचना पुस्तकों और वाचिक भाषणों से उन्होंने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया है। वे प्रगतिशील आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। 1965 से 1967 तक जनयुग (साप्ताहिक) और 1967 से 1990 तक फिर पुनः सन् 2000 से आलोचना के संपादक रहे। पहल, पूर्वग्रह, दस्तावेज, वसुधा, बहुवचन और पाखी जैसी देश की कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं ने नामवर पर कंेद्रित अंक प्रकाशित किए हैं। वह साहित्य जगत के युग पुरूष तो हैं ही राममनोहर लोहिया के खिलाफ चुनाव में उतरकर राजनीति का मजा भी चख चुके हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार, शलाका सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, शब्द साधक शिखर सम्मान, महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान सहित उन्हें साहित्य के कई बड़े पुरस्कार मिले हैं। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, जोधपुर विश्वविद्यालय, आगरा विश्वविद्यालय (क.मु. हिन्दी विद्यापीठ और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया है। वे महात्माा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी रहे हैं। डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव ने उनके दिल्ली स्थित आवास पर उनसे बात की। चित्रकारी उदित रावत ने की।
सवाल: अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में बताइए ?
जवाब: मेरे पिताजी प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते थे। सातवीं से लेकर इंटरमीडिएट तक काशी में मेरी स्कूलिंग हुई। मेरे स्कूल थे हीवेट क्षत्रिय हाईस्कूल और उदय प्रताप काॅलेज। हीवेट क्षत्रिय हाईस्कूल का हैडमास्टर अंग्रेज हुआ करता था। वहां हम 1940-1941 के बीच गांव से गए थे, मालूम हुआ था क्षत्रियों के लिए स्कूल है, बोर्डिंग हाउस है, खाने का इंतजाम है और फीस भी नहीं लगती। मैस मेें खाने का इंतजाम था। छात्रावास में जगह मिल गई। एक कमरे मे चार लड़के रहते थे। बड़ा नियमित जीवन था वहां का। घंटी बजती थी, हम हाॅस्टल के बाहर निकलते थे, हाजिरी होती थी, फिर एक घंटा पी.टी. के बाद दूध-नाश्ता मिलता था, फिर घंटी बजती तो हम दौड़ कर क्लास में पहुुंच जाते। दोपहर में खाना-पानी पाकर आराम करते थे। फिर शाम को 5 बजे खेलकूद के लिए अनिवार्य रूप से जाना ही पड़ता था। शाम को संध्या कराई जाती थी। संध्या में प्रवचन उपदेश भी सुनता था। संध्या के बाद तुरंत मैस में जाते थे, खाना खाते थे। फिर बारहवीं के बाद उदय प्रताप काॅलेज में पढ़ा जो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के दूसरे छोर पर था। हम गंगा घाट के किनारे गोविंद लाॅज में रहते थे। बी.ए. में मैंने हिंदी विषय का चयन किया साथ ही संस्कृत और प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विषय से बी.ए. किया। फिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.ए. और पी.एच.डी. किया। बाद मेें प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत मैं बी.एच.यू. में अस्थाई तौर पर अध्यापक नियुक्त हो गया।
सवाल: आपके अंदर रचना करने का संस्कार कैसे पैदा हुआ ? 
जवाब: इसका कारण स्कूल में होने वाली अंत्याक्षरी प्रतियोगिताएं हैं। अंत्याक्षरी के लिए मैं कवित्त, सवैया, चैपाई, दोहे इत्यादी कंठस्थ करता था। उधर मैंे समस्यापूर्ति भी करने लगा था। इससे धीरे-धीरे मेरी कविताओं में रुचि बढ़ने लगी। कई साहित्यकार हमारे स्कूल आते थे। श्याम नारायण पांडेय हमारे बगल में ही रहते थे और अक्सर आकर हमें ‘‘हल्दी घाटी‘‘ सुनाते थे। शंभू नाथ सिंह उदय प्रताप काॅलेज आया करते थे जो हमारे आदर्श बन गए थे। काशी के साहित्यिक संस्कार ने मेरे अंदर की रचनात्मकता को पल्लवित और पोषित किया और यह संस्कार अंत तक बना रहा। जब मैं एम.ए. में था तब मैं ‘‘नीम के फूल‘‘ लिख चुका था।
सवाल: फिर एक कवि आलोचना की ओर कैसे उन्मुख हुआ ?
जवाब: देखिए पढ़ाई के दौरान परीक्षाओं में वस्तुतः उत्तर में आलोचना ही लिखनी होती है। कविताएं तो उदाहरणार्थ दी जाती हैं। अतः पाठ्यक्रम की तैयारियों के लिए मैं आलोचना करने का अभ्यस्त होता गया। फिर प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों में जो बहस होती थी उसके लिए कविताएं नहीं बल्कि विचारों की आवश्यकता थी। तो आलोचना की ओर जाने का कारण ये गोष्ठियाॅ भी रहीं। फिर देखिए, प्रगतिशील आंदोलन भी लोगों को आलोचक बना देता है।
सवाल: इलाहाबाद शहर के साहित्यिक मिज़ाज पर आपके क्या विचार हैं ?
जवाब: गंगा-जमुनी तहज़ीब का शहर है। काशी और इलाहाबाद के सहित्यिक मिज़ाज में काफी समानता है। काशी में कर्मनाशा तो इलाहाबाद में संगम है। काशी भारतेंदु से लेकर अब तक साहित्यकारों का शहर माना जाता है। वास्तव में काशी और इलाहाबाद ही साहित्य के दो बड़े केन्द्र थे। दिल्ली में तो कुछ था ही नहीं, वह तो बहुत बाद में साहित्य का केन्द्र बनी। कहा जा सकता है कि इलाहाबाद में हिंदी और उर्दू का भी संगम था। वहां महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत जैसे हिंदी के साधक थे तो वहीं फिराक गोरखपुरी साहब भी कलाम कर रहे थे। ट्रेन से बनारस और इलाहाबाद का मात्र तीन घंटे का सफर था, तो अक्सर हम अवकाश के समय में इलाहाबाद अपने साथियों से मिलने पहुंच जाते थे। एक ओर साहित्यिक संस्कार की नगरी काशी थी तो दूसरी ओर पास ही इलाहाबाद में एक समृद्ध साहित्य की धारा बहती थी। इन दोनों शहरों से मेरा लगाव-जुड़ाव था। काशी और प्रयाग धर्म, संस्कृति, साहित्य एवं ज्ञान की नगरी हैं। सच पूंछिए तो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले मालवीय जी तो इलाहाबाद के ही थे। इलाहाबाद से बनारस आकर उन्होंने स्वयं गंगा किनारे विश्वविद्यालय खोलने के लिए काशी नरेश से ज़मीन मांगी थी। और यही बी.एच.यू. इतनी वैल प्लान्ड बनी जितनी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी भी नहीं है। ऐसी यूनिवर्सिटी मैैैंने इंग्लैंड में ही देखी है, अमेरिका तो गया नहीं। जितनी वैल प्लान्ड़ आॅक्सफोर्ड और कैेंब्रिज भी नहीं है। उससे ज्यादा सुनियोजित काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। हिंदी में योगदान की दृष्टि से इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, दोनों की ही महती भूमिका है।
सवाल: आलोचना का प्रारंभ पत्र पत्रिकाओं से माना जाता है, किंतु आज मीडिया में साहित्य और आलोचना हाशिये पर आ गए  हैं , इस पर आपके क्या विचार हैं?
जवाब: देखिए वाणिज्य युग अपने चरम पर है। बिजनेस केन्द्र में हो गया है। परिणामतः साहित्य और कला इत्यादि हाशिये पर चले गए हैं। मैं तो यह नेहरू युग की देन मानता हूं कि साहित्य कला इत्यादि विकसित हुए। नेहरू का ही विज़न था कि तीन अकादमियां खुलें जिनमें से एक साहित्य अकादमी के पहले अध्यक्ष खुद जवाहर लाल नेहरू थे। इसी क्रम में देश में ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा इत्यादि खोले गए।
सवाल: हिंदी-उर्दू सहित अन्य भारतीय भाषाओं के लिए आपने क्या कार्य किए हैं ?
जवाब: मैं एन.सी.ई.आर.टी. में हिंदी विंग का चैयरमैन भी रहा हूं। तब मैंने स्कूल लेवल से लेकर काॅलेज लेवल तक की कई टैक्स्ट बुक तैयार करवाई थीं। भारतीय भाषा केन्द्र (जे. एन. यू) में आर्ट फैकल्टी की बजाय स्कूल आॅफ लैंग्वैजेज था। इसमें विदेशी भाषाएं और हिंदी का अध्ययन कराया जाता है। इसमें हिंदी के अलावा संस्कृत, उर्दू और दक्षिण भारतीय भाषा तमिल भी शामिल है। हम ज्यादा से ज्यादा भारतीय भाषाओं को लेकर चलना चाहते थे। वहां मात्र हिंदी विभाग नाम का कोई विभाग नहीं है। यहां यह अनिवार्य किया गया कि जो छात्र हिंदी लेगा उसे उर्दू का एक कोर्स करना पड़ेगा और उर्दू के छात्र को हिंदी का एक कोर्स करना पड़ेगा। क्योंकि हिंदी उर्दू परस्पर गहरे रूप से संबंद्ध हैं।
सवाल: अकादमिक स्तर पर कार्य कर रहे हिंदी के शिक्षक इत्यादि और मात्र मसिजीवी लेखकों के योगदान के बारे में आप क्या सोचते हैं ?
जवाब: यह आपके जाॅब और रुचियों से जुड़ा हुआ है। था एक ज़माना जब इस देश को हिंदी वालों की जरूरत थी। देश की जरूरत के लिए भाषा तो साधन है लक्ष्य नहीं है। 
सवाल: पिछले दिनों असहिष्णुता को लेकर जो साहित्य अकादमी अवार्ड वापसी प्रकरण घटित हुआ उस पर आप क्या सोचते हैं?
जवाब: मेरी राय में वह एक राजनितिक निर्णय था। असहिष्णुता का इन पुरस्कारों, साहित्यकारों या साहित्य की संवेदना से कुछ लेना-देना नहीं था। देखिए अब वह क्रम रुक गया है।
सवाल: राजभाषा की दृष्टि से आप हिंदी की स्थिति को कैसा पाते हैं, क्या राजभाषा बन जाने से हिंदी अपना न्याय संगत स्थान प्राप्त कर चुकी है ?
जवाब: एक कहावत है मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। इसी प्रकार मजबूरी का नाम हिंदी है। राजभाषा के नियमों के चलते सरकारी लोगों की मजबूरी है कि वे हिंदी में कामकाज का प्रदर्शन करें। दरअसल हिंदी तो जन-भाषा है। राजभाषा कहकर या बना कर हम उसके महत्व को कैसे रेखाकिंत करेंगे। सोचिए, अकेले गांधी जी ने दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार किया, जबकि वे एक गैर हिंदी भाषी व्यक्ति थे। इस भाषा की एक व्यापक जन समूह तक पहुंच है। अंग्रेजी हमारे शासन प्रशासन के कामकाज में गहरे से विद्यमान है। (चुटकी लेते हुए) बी.जे.पी. वालों को अंग्रेजी आती कहां है। आर.एस.एस. की भाषा तो कायदे से मराठी होनी चाहिए। लेकिन उनकी सारी कार्यवाही हिंदी में होती है।
सवाल: कृपया अपने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कार्यकाल के अनुभवों के बारे में बताइए?
जवाब: मैं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में दो बार चांसलर रहा हूं। यह यूनिवर्सिटी कागज पर थी। बहुत गंभीरता से किसी ने काम किया नहीं था। एक वाइस चांसलर केरल के थे, एक सज्जन थे वे दिल्ली से ही राज करते रहे। तब मैंने बड़े ही व्यावहारिक आदमी विभूति नारायण राय को वाइस चांसलर बनवाया। तब जो विश्वविद्यालय कागज पर था, उसे विभूति जी ने अथक परिश्रम से ज़मीन पर उतार दिया। शिक्षण के स्तर पर कई गुणात्मक सुधार किए गए। शिक्षण खंड सहित रहने के लिए क्वाटर बनवाए गए।
सवाल: विश्व काव्य शास्त्र के मुकाबले भारतीय काव्य शास्त्र के बारे में आप क्या सोचते हैं ?
जवाब: हमारा देश इस मामले में सौभाग्यशाली है कि जिसे पोइटिक्स कहते है वह यहां बहुत समृद्ध है। हमारा साहित्य अंग्रेजी सहित फै्रंच, जर्मन इत्यादि दुनिया की दूसरी भाषाओं में अनूदित हो रहा है। अतः विश्व के नक्शे पर भारतीय साहित्य आ गया है। यद्यपि यूरोप में भी ग्रीक प्लूटो से आंरभ हुआ काव्य शास्त्र बहुत समृद्ध है। किंतु फिर भी दुनिया में सबसे समृद्ध काव्य शास्त्र किसी का है तो वह संस्कृत का है। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से लेकर पंडित राज जगन्नाथ तक। प्री-हिस्टोरिक पीरीयड से लेकर साहित्य शास्त्र की इतनी लंबी, महान और अद्वितीय परम्परा यूरोप के पास भी नहीं थी। यूरोपियों ने संस्कृत काव्यशास्त्रीय ग्रंथों के अंग्रेजी में अनुवाद करके अपने यहाॅ थ्योरी चला दीं।
सवाल: हिंदी आलोचना की परम्परा पर कुछ प्रकाश डालिए ?
जवाब: हिंदी में आलोचना की बड़ी समृद्ध परम्परा है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डाॅ. राम विलास शर्मा जैसे आलोचकों ने हिंदी आलोचना को समृद्ध किया है। हिंदी आलोचना भारतीय भाषाओं में किसी से कम नहीं है। क्योंकि जैसा कि मैंने बताया कि उसके पास संस्कृत काव्य शास्त्र की महान परम्परा है। मेरा मानना है कि जिस साहित्य की रचना बड़ी होती है, उस साहित्य की आलोचना भी बडी़ होती है।
सवाल: आलोचना को आप कैसे परिभाषित करेंगे?
जवाब: एक शेर है ‘‘कुछ लोग जिधर हंै वो उधर देख रहे हैं। हम देखने वालों की नज़र देख रहे है‘‘। आलोचक का काम होता है कि कवि क्या देख रहा है, उस देखने वाले कि आंख को तो भी देखना चाहिए इसलिए आलोचना का जो काम होता है वो देखने वालों की नज़र है। आलोचना में यह महत्वपूर्ण है कि कविता में मर्मस्पर्शी स्थलों को पहचाना जाए। कवि या उपन्यासकार इस दुनिया को एक ढंग से देख रहा है। आलोचक उसकी आंख में झांकेगा और यह जानने की चेष्टा करेगाा कि क्यों रचनाकार को ‘यही‘ दिखलाई पड़ रहा है ‘वह‘ क्यों नहीं दिखलाई पड़ रहा। मेरे गुरु आचार्य हजारी प्रसार्द िद्ववेद्वी ने ‘साहित्य सहचर‘ में लिखा है कि आलोचक साहित्यकार का सहचर होता है। आलोचना में रचनाकार, आलोचक और पाठक तीनों के तार आरकेस्ट्रा की भांति जुड़ जाते हैं। यह आलोचना की शुरूआती आवश्यकता है, फिर वह एक संवाद है। 
सवाल: रचना और आलोचना में आप क्या संबंध देखते हैं?
जवाब: रचना और आलोचना दोंनो इस तरह से परस्पर संबंद्ध हैं कि एक का उत्कर्ष दूसरे के उत्कर्ष का आधार बनता है। जिस दौर में रचना का स्तर उठता है उसी दौर मेें आलोचना का भी स्तर बढ़ता है। उदाहरणार्थ आप छायावाद की श्रेष्ठ कविताएं और आलोचना को देख सकते हैं। हमारे यहां आलोचना अब केवल टीका-भाष्य नहीं रह गई है, बल्कि आलोचना अब विमर्श बन गई है। परिणामतः रचनाकारों का मूल्यांकन विमर्श के धरातल पर होने लगा है।
सवाल: आप तो एक नामवर आलोचक हैं, पर क्या आपके भी कुछ आलोचक हैं?
जवाब: (ठहरकर) अभी मैंने देखने वालों की नज़र की बात की। उसके बाद एक और प्रक्रिया होती है- अपनी खुद की नज़र को देखना, जो बड़ा मुश्किल काम है। इसकी जांच भी करनी चाहिए कि जो मैं देख रहा हूं किसी पूर्वाग्रह से तो नहीं देख रहा। सवाल है अपनी आंख को कोई कैसे देखेगा? देखी गई नज़र को जब कागज़ पर उतार लेता हूं, फिर जांचता हूं कि मैने यह देखा है और यह लिखा है। फिर रिव्यू करता हूं  कि हमने क्या सचमुच वही देखा है जो हमने लिखा है। हमें देखना होता है कि किसी ने क्या देखा है और क्या छोड़ दिया है। आलोचक दोनों ही पक्षों पर प्रकाश डालता है।
सवाल: पहले के आलोचक और सामयिक आलोचकों में आप क्या अंतर देखते हैं ?
जवाब: अब अखबारनवीसी बढ़ गई है। आलोचना एक गंभीर और पित्तमार काम है लेकिन लोंगो को लिखने की और छपवाने की हड़बड़ी बहुत ज्यादा है। रचना करने में जितना आत्मसंघर्ष करना पड़ता है, रचना को देखने समझने के लिए दुगनी-तिगनी मेहनत करनी पड़ती है। आलोचक का काम ज्यादा मुश्किल है।
सवाल: आज के साहित्य में स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श के बारे में आप क्या सोचते हैं?
जवाब: दोनों जरूरी हैं। अब स्त्री स्वयं बोल रही है। पहले महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चैहान जैसी इक्का-दुक्का लेखिकाएॅ ही थीं। अब बड़ी संख्या में साहित्य के क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति है। स्त्री लेखन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अब दलित और बैकवर्ड सहित आदिवासी भी बहुत अच्छा लिख रहे हैं। हाँ, कहीं-कहीं उनमें कटुता ज्यादा है। यही कटुता उनकी कमज़ोरी है। क्योेंकि कोई कड़वाहट युक्त कहे तो उसका मुंह तो खराब होगा ही सुनने वाले के कान भी खराब होते हैं। अतः कटुता कला की दुश्मन है, दलित साहित्य को इस कटुता से मुक्त होना पडेगा। वे जरूर विरोध करें, विरोध करने से कोई मनाही नहीं है। लेकिन विरोध करने के लिए जो तेवर होना चाहिए उस तेवर की गरिमा को मेनटेन करना चाहिए। हम जानते हैं कि पहली कविता विरोध से ही हुई है, उस निषाद के गुस्से को तो किसी ने देखा नहीं, बल्कि वाल्मीकि का गुस्सा तो आज तक उस पहली कविता के रूप में अमर है। दरअसल यह वाल्मीकि का शोक है गुस्सा नहीं। शोक है इसलिए वह श्लोक बना अन्यथा गालीगलोज हो जाता। इसिलिए आचार्यों ने कहा यह कविता करूणा से निकली है।
सवाल: आपने तुलनात्मक साहित्य पर भी कार्य किया है, खासतौर पर बांग्ला पर?
जवाब: जी हां, स्वयं को मैंने हिंदी तक सीमित नहीं रखा बल्कि समस्त भारतीय भाषाओं के साहित्य पर लिखा है, बोला है। मैंने बांग्ला पर तुलनात्मक कार्य किया है। बांग्ला मुझे आती है। पढ़ लेता हूं, बोल लेता हूं। पहले मित्रों के साथ बांग्ला बोलता था। जब से उनका साथ छूटा तो बांग्ला का अभ्यास भी छूट गया। (नामवर जी उठते हैं अपने बेड रूम से एक पुस्तक लाकर मुझे देते हुए कहते हैं.....) ये ‘‘रवीन्द्रनाथ की संचियता‘‘ मैंने हाईस्कूल में बनारस से दस रुपये में खरीदी थी। यह अजिल्द थी। जिल्द मंैने बनवाई थी। उसी समय रवीन्द्रनाथ टैगोर को पढ़ने के लिए बांग्ला सीखी थी।
सवाल: कुछ समय पूर्व अशोक वाजपेयी ने कहा है कि हिंदी आलोचना बहुत बुरे दौर में है। बाद में कुछ और लोगों ने उनका समर्थन किया। इस बारे में आपका क्या कहना है ?
जवाब: ऐसा रिमार्क करने वालों को जरा रुक कर अपने अंदर भी देखना चाहिए, कि आप क्या लिख रहे हैं। दूसरे लोग तो खराब लिख रहे हैं आप कुछ बेहतर लिखें तब तो ठीक है। अशोक वाजपेयी खुद क्या लिख रहे हैं? एक लंबे अरसे से उनकी कोई कविता तो देखी ही नहीं, आलोचना भी नहीं देखी। था एक ज़माना जब वे लिखते थे। इसलिए दूसरों पर उंगली उठाने से अच्छा है कि ऐसे लोग स्वयं बेहतर लिख कर जवाब दें।
सवाल: आजकल आपके अध्ययन कक्ष में क्या चल रहा है?
जवाब: (मुस्कुराते हुए) ‘मसि कागद छुओं नहिं, कलम गह्यो नहिं हाथ‘ बहुत दिनों से लेखन में स्वास्थ्य बाधा बना हुआ है। लेखन के लिए जो तन्मयता और एकाग्रता चाहिए वह शारीरिक कारणों के चलते आ नहीं पाती। लिखने में मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ती है। अब खराब तो लिखा नहीं जाएगा, वर्ना दूसरों की नज़र में तो बाद में गिरूंगा पहले अपनी ही नज़र में गिर जाऊंगा। जैसा मैं चाहता हूं अगर वैसा नहीं लिख सकता तो बेहतर है कि ना लिखूं। (मुस्कुराते हुए) जीवनभर आपके लिए बहुत कुछ लिख और बोल दिया है।
(गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर: 2017 अंक में प्रकाशित)


गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

ख़्याल की नज़ाकत से बनते हैं ग़ज़ल के शेर

गुफ्तगू के ग़ज़ल विशेषांक का विमोचन और मुशायरे का आयोजन


इलाहाबाद। ग़ज़ल जिनती मक़बूल है, उतनी है ही नाजुक विधा है, ख़्याल की नज़ाकत से ग़ज़ल के शेर बनते हैं, गुफ्तगू के ग़ज़ल में विशेषांक में प्रकाशित ग़ज़लें इसकी तरजुमानी करती हैं। इस अंक की बड़ी खासियत यह है कि इसमें सरदार जाफ़री, फ़िराक़ गोरखपुरी, शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी जैसे लोगों के आलेख शामिल हैं, जो इस अंक को ख़ास बना रहे हैं। यह बात प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने ‘गुफ्तगू’ के ग़ज़ल विशेषांक के विमोचन के मौके पर 28 जनवरी को इलाहाबाद के सिविल लाइंस स्थित बाल भारती स्कूल में कही। कार्यक्रम अध्यक्षता कर रहे प्रो. फातमी ने कहा कि बाज़ारवाद के दौर में गुफ्तगू जैसी पत्रिका का निरंतर प्रकाशन बेहद कठिन काम है, लेकिन टीम गुफ्तगू ने यह काम करके दिखाया है। लगातार 15 वर्षों से पत्रिका का प्रकाशन और समय-समय पर विशेषांक का निकालना बड़ी बात है।
देहरादून से आए मुख्य अतिथि इक़बाल आज़र ने कहा कि इलाहाबाद में टीम गुफ्तगू हिन्दी-उर्दू साहित्य के लिए बहुत शानदार काम कर रही है, पिछले तीन-चार सालों से इस टीम से जुड़कर मुझे बहुत ही अच्छा लगा, बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। इसका मौजूद ग़ज़ल विशेषांक तो कई मायन में बेहद ख़ास है। सरदार जाफरी, फिराक गोरखपुरी, प्रो. अली अहमद फ़ातमी आदि जैसे लोगों के आलेख कई बिंब को खोजने में कामयाब दिख रहे हैं, इलाहाबाद की साहित्यि धरती से ही इस तरह के शानदान काम किए जा सकते हैं।
गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि ग़ज़ल आज के समय की सबसे लोकप्रिय विधा है, आज सबसे ज़्यादा ग़़ज़ल लिखी, पढ़ी और सुनी जा रही है, इसे देखते हुए इस विशेषांक का प्रकाशन किया गया है। टीम गुफ्तगू अपने इस काम में कितना कामयाब हुई है, इसे पाठक बताएंगे, टीम ने अपने तौर पर बेहतर काम करने का प्रयास किया है।
डाॅ. अशरफ़ अली बेग ने कहा कि इस मुश्किल दौर में साहित्य की पत्रिका का प्रकाशन बेहद कठिन काम है, लेकिन गुफ्तगू ने ऐसे माहौल में भी ग़ज़ल विशेषांक का प्रकाशन करके एक नजीर पेश किया है। मिर्जापुर से आए भोलानाथ कुशवाहा ने कहा कि गुफ्तगू का ग़ज़ल विशेषांक कई मायने में बेहद ख़ास है, इसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता पं. बुद्धिेसन शर्मा ने किया। प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, शैलेंद्र जय, शिवपूजन सिंह, शहाब अख़्तर अंसारी, शिवशरण बंधु, अंजली मालवीय ‘मौसम’, जमादार धीरज, सागर होशियारपुरी, अपर्णा सिंह, अजीत शर्मा आकाश, सुनील दानिश, शजली ग्यास खान, संपदा मिश्रा, ललिता पाठक नारायणी, संजू शब्दिता, अमित वागर्थ, योगेंद्र मिश्रा, प्रमोद चंद गुप्ता, विजय लक्ष्मी विभा, विपिन विक्रम सिंह, रमोला रूथ लाल, माहिर मजाल और अरशद ठाकुर आदि ने कलाम पेश किया। 

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

गुफ्तगू के जनवरी-मार्चः 2018 अंक में


3. संपादकीय: लोकप्रिय विधा बन गई ग़ज़ल
4. आपके ख़त
5-18. मीर की शायरी के रंग: सरदार जाफ़री
19-22. ग़ज़ल क्या है ?: फ़िराक़ गोरखपुरी
23. कोई भी ख़्याल अदा हो सकता है: शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी
24. दुष्यंत कुमार: परदेशी से त्यागी तक: कमलेश्वर
25-26. वह समय साहित्यिक सक्रियता का था: मार्कण्डेय
27-34. ग़ालिब और तरक्की पसंद फिक्र व शउर: प्रो. अली अहमद फ़ातमी
35-38. उर्दू शायरी का अहम नाम  मिर्ज़ा ग़ालिब: माहिर मजाल
39-40. तेरी खुश्बू का पता करती है: डाॅ अनुराधा चंदेल ‘ओस’
41-46. शेर जो नज़ीर बन गए: डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
47-49. एडिटर डेस्क: अब अख़बारों प्रायः ग़ज़लें नहीं छपतीं, क्यों ?
50-51. चौपाल-1ः  ग़ज़ल क्या है ?
52-54. चैपाल-2ः आज की ग़ज़ल से आप कितना संतुष्ट हैं ?
55-56. चौपाल-3  आप ग़ज़ल ही अधिक क्यों कहते हैं ?
57. चौपाल-4ः  अतीत से लेकर वर्तमान तक ग़ज़ल की विषय वस्तु में क्या बदलवा हुए हैं ?
ग़ज़लें
60. गुलजार, जावेद अख़्तर, डाॅ. बशीर बद्र, प्रो. वसीम बरेलवी
61. मुनव्वर राना, डाॅ. राहत इंदौरी, इक़बाल दानिश, बुद्धिसेन शर्मा
62. दिल उन्नावी, हस्ती मल हस्ती, डाॅ. असलम इलाहाबादी, डाॅ. बुद्धिान मिश्र
63. मीना नक़वी, सागर होशियारपुरी, विजयलक्ष्मी विभा, विज्ञान व्रत
64. तलब जौनपुरी, शकील ग़ाज़ीपुरी, हसन काज़मी, वजीहा खुर्शीद
65. अख़्तर अज़ीज़, प्रताप सोमवंशी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, प्रतिभा गुप्ता
66. डाॅ. अनिता सिंह, नायाब बलियावी, ऐनुल बरेलवी, अशोक अंजुम
67.कल्पना रामानी, अजय अज्ञात, जावेद पठान सागर, हरेंद्र सिंह कुशवाह
68. आर्य हरीश कोशलपुरी, चित्रा भारद्वाज, पुष्पलता शर्मा, चक्रधर शुक्ल
69. केपी अनमोल, सुनील सोनी गुलजार, रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे, डाॅ. गोपाल राजगोपाल
70. दीपशिखा सागर, खुमार देहलवी, गौतम  राजऋषि, विकास रोहिल्ला प्रीत
71. अरविंद असर, मनमोहन सिंह तन्हा, ऐनमीम क़ौसर, भारत भूषण जोशी
72. पूजा बंसल, समीर परिमल, संजू शब्दिता, अंजली मालवीय मौसम
73. नेमीचंद पारीक, डाॅ. सरोजनी तन्हा, कल्पना मनोरमा, ए.एफ़. नज़र
74. सुनील दानिश, शिवशरण बंधुा, डाॅ. वारिस अंसारी, रमेश नाचीज़
75. राजेश राज जौनपुरी, माहिर मजाल, डाॅ. शशि जोशी, सौरभ पांडेय
76. अमरनाथ उपाध्याय, कासिम इलाहाबादी, आस्था अर्पण, क़ासिम अली बीकानेरी
77. अमित वागर्थ, आदित्य विक्रम श्रीवास्तव, नितिन नायाब, प्रमोद कुमार कुश तन्हा
78. मिथिलेश गहमरी, इश्क़ सुल्तानपुरी, अना इलाहाबादी, मनोज एहसास
79. इरशाद आतिफ़, डाॅ. शमीम देवबंदी, अजय नमन, अरविंद अवस्थी
80. डाॅ. ओरीना अदा, अशरफ़ अली बेग, रमोला रूथ लाल आरजू, अंकित शर्मा इषुप्रिय
81. ललिता पाठक नारायणी, मनशाह नायक, बहर बनारसी, वकील अहमद मुजतर
82. चेतन आनंद, दीपक कुमार रोशन, नज़्म सुभाष, विमल कुमार वर्मा
83. शाबान अली, डाॅ. सादिक़ दवेबंदी, वंदना मोदी गोयल, रामानुज अनुज
84. विनय सागर जायसवाल, अनीता मौर्या अनुश्री, कृष्ण सुकुमार, संगीता चैहान विष्ट
85. अन्नपूर्णा वाजपेयी अंजू, मंजू जौहरी, अतिया नूर, तलत परवीन
86. पीयूष मिश्र पीयूष, अनिरुद्ध सिन्हा, चंद्रभाल सुकुमार, अंजना सिंह सेंगर
87. डाॅ. लवलेश दत्त पवन, प्रिया श्रीवास्तव दिव्यम्, अजीत शर्मा आकाश, डाॅ. शैलेष गुप्त वीर
88. डाॅ. आफ़ताब अहमद अंसारी, अंजली गुप्ता, संदीप सरस, सौरभ टंडन
89. धर्मेंद्र गुप्त साहिल, डाॅ. कविता विकास, फ़ौज़िया अख़्तर रिदा, दिलीप सिंह दीपक
90-94. इंटरव्यू: प्रो. ओपी मालवीय
95.खि़राज़-ए-अक़ीदत: मुशायरों की सफ़लता के गारंटी थे अनवर जलालपुरी
96.खि़राज-ए-अक़ीदत: दूधनाथ सिंह का जाना बड़े अध्याय का अंत जैसा
97-101. अदबी ख़बरें
102. ग़ाज़ीपुर के वीर: एसकेबीएम इंटर कालेज के संस्थापक डिप्टी सईद: मुहम्मद शहाब खान
परिशिष्ट-1
103. इक़बाल आज़र का परिचय
104-106. अपने ही इक़बाल का शायर: शहाब अख़्तर अंसारी
107-108. इक़बाज आज़र एक जिम्मेदार शायर: धमेंद्र गुप्त ‘साहिल’
109-133. इक़बाल आज़र के कलाम
परिशिष्ट-2
134. डाॅ इम्तियाज़ समर का परिचय
135-136. क़ाबिले कद्र शायर हैं इम्तियाज़ समर: फहीम जोगापुरी
137ः इम्तियाज़ समर किसी परिचय के मोहताज नहीं:  डाॅ. बीना बुदकी
138-163. डाॅ. इम्तियाज़ समर की ग़ज़लें
परिशिष्ट-3
164. खुर्शीद खैराड़ी का परिचय
165.  सच्चाई का शायर खुर्शीद खैराड़ी: मनमोहन सिंह तन्हा
166-168. धर्म का दरकिनार करना है: नंदल हितैषी
169-192. खुर्शीद खैराड़ी की ग़ज़लें


रविवार, 14 जनवरी 2018

दूधनाथ सिंह का जाना बड़े अध्याय के अंत जैसा

                                                        - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
दूधनाथ सिंह देश के प्रतिष्ठित ख्याति प्राप्त साहित्यकारों में से एक रहे हैं, 11 जनवरी की रात उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन इससे पहले उन्होंने साहित्य जगत को जो प्रदान किया है, उसे किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पर उनकी आलोचना की किताब ‘निराला आत्महंता आस्था’ बड़ी प्रसिद्ध रही है, आज भी माना जाता है कि निराला जी पर इससे अच्छी कोई किताब नहीं है। वर्तमान समय में आप देश के शीर्ष वरिष्ठतम साहित्यकारों में से एक थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लेकर महात्मा गांधी अंतरराष्टी हिन्दी विश्वविद्याय वर्धा में भी आपने अध्यापन का कार्य किया। जीवन के अंतिम क्षणों तक लेखन के प्रति सक्रिय रहे हैं ।
दूधनाथ सिंह
तकरीबन तीन साल पहले उन्होंने हिन्दी-उर्दू भाषा को लेकर एक बयान दिया था, जिस पर काफी दिनों तक अखबारों में पक्ष और विपक्ष में बयानबाजी चली। उनका कहना था कि ‘साहित्य के स्तर पर दोनों भाषाएं अलग-अलग हैं, लेकिन व्याकरणिक ढांचा एक ही है। फर्क यह है कि हिन्दी संस्कृत से अपनी शब्दावली ग्रहण करती है, जबकि उर्दू फारसी से। इसमें अगर कठोरता बरतेंगे तो दोनों भाषाएं विनष्ट हो जाएंगी। भारतेंदु ने 1872 में एक लेेख लिखा था जिसका शीर्षक ‘हिन्दी नई चाल में ढली’। इसमें उन्होंने भाषा का जो स्वरूप निर्धारित किया है उसी में सबकुछ संभव है। हिन्दी-उर्दू साहित्य में कोई समानता नहीं है‘ जबकि इसके विरोध में तमाम साहित्यकारों का मानना है कि हिन्दी और उर्दू में हर स्तर पर बहुत अधिक भिन्नता नहीं है। आपको मुख्यतः कहानीकार के रूप जाना जाता रहा है, लेकिन कहानियों के अलावा नाटक, आलोचना और कविता का भी खूब लेखन किया है। बाबरी मजिस्द विध्वंस की घटना के बाद आपने ‘आखिरी कलाम’ नाम से उपन्यास लिखा था, जिसमें धार्मिक और राजनैतिक पाखंड़ों पर करारा प्रहार किया गया है, इस पुस्तक की वजह से काफी दिनों पर पूरे देश में चर्चा में रहे हैं। अन्य पुरस्कारों के अलावा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने अपना सर्वोच्च सम्मान ‘भारत भारती सम्मान’ आपको प्रदान किया था।
 आपका जन्म 17 अक्तूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सोबंथा गांव में हुआ था। पिता देवनी नंदन सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे, 1942 के आंदोलन में उन्होंने सक्रियता से देश की आजादी के लिए भाग लिया था। प्रारंभिक शिक्षा गांव से हासिल करने के बाद आप वाराणसी चले आए, यहां यूपी कालेज से स्नातक की डिग्री हासिल की, इसके बाद एमए की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की, स्नातक तक आपने उर्दू की भी शिक्षा हासिल की है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आपको डॉ. धर्मवीर भारती और प्रो. धीरेंद्र वर्मा से शिक्षा हासिल करने का गौरव प्राप्त हुआ। इलाहाबाद से शिक्षा ग्रहण के बाद 1960 से 1962 तक कोलकाता के एक कालेज में अध्यापन कार्य किया। इसके बाद 1968 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन कार्य शुरू किया और यहीं से 1996 में सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद कई वर्षों तक महात्मा गांधी अंतरराष्टी हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में आपने विजटिंग प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
दूधनाथ सिंह
गजल लेखन और हिन्दी-उर्दू भाषा के बारे में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि -‘हिन्दी में ग़ज़ल लिखी ही नहीं जा सकती क्योंकि हिन्दी के अधिकांश ग़ज़ल गो शायर बह्र और क़ाफ़िया,रदीफ़ से परिचित नहीं हैं। इसके अलावा हिन्दी के अधिकांश शब्द संस्कृत से आए हैं जो ग़ज़ल में फिट नहीं बैठते और खड़खड़ाते हैं। मुहावरेदानी का जिस तरह से प्रयोग होता है वह हिन्दी खड़ी बोली कविता में नहीं होता, जैसे कि ग़ालिब का शेर है- मत पूछ की क्या हाल है, मेरो तेरे पीछे/ये देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।’ इस पूरी ग़ज़ल में ‘आगे’ और ‘पीछे’ इन दो अल्फाजों का इस्तेमाल हर शेर में ग़ालिब ने अलग-अलग अर्थों में किया है। हिन्दी वाले इस मुहावरेदानी को नहीं पकड़ सकते और अक्सर जब ग़ज़ल उनसे नहीं बनती तो उर्दू अल्फाज का सहारा लेते हैं। अरबी से फारसी और फारसी से उर्दू में आती हुई ग़ज़ल की अपनी परंपरा है। लोग कहते हैं कि हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाएं एक है, लेकिन ऐसा नहीं है। क्रिया पदों में भाषाओं का अंतिम निर्धारण नहीं होता। दोनों के मिजाज, संस्कार और परंपराएं अलग-अलग हैं। वली दकनी और मीर तकी मीर ने हिन्दुस्तान के एक शामिल भाषा के रूप में इसे विकसित करने की कोशिश जरूर की, लेकिन हिन्दी और उर्दू दोनों के कठमुल्लाओं ने भाषाओं को अलग करके ही दम लिया।’
इलाहाबाद के बारे में उनका कहना था कि ‘इलाहाबाद में साहित्य की चर्चा ज्यादा हो रही है जबकि कविता, कहानी, उपन्यास कम लिखे जा रहे हैं। नए इलाहाबादी लेखकों को कविता, कहानी, उपन्यास लिखना चाहिए। साहित्य चर्चा में अपना समय नहीं गंवाना चाहिए। यह बड़े और बूढ़ों पर छोड़ देना चाहिए, यही मेरा संदेश है।’ आज उनके इस वाक्यांश को याद करते हुए हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनका लिखा साहित्य रहती दुनिया तक पढ़ा और याद किया जाएगा।  
                                 

रविवार, 17 दिसंबर 2017

धीरज के छंद बेहद भावपूर्ण हैं: माता प्रसाद

जमादार धीरज की पुस्तक ‘भावांजलि’ का विमोचन
बाएं से: विजय लक्ष्मी विभा, जमादार धीरज, सतीश आर्या, डाॅ. माता प्रसाद और श्याम विद्यार्थी

इलाहाबाद। जमादार धीरज की काव्य रचनाओं में छंद बेहद भावपूर्ण होते हैं, इनकी जितनी सरहना की जाए, कम है। ‘भावांजलि’ की कविताओं को पढ़कर हुए तबीयत बहुत ही गमगीन हो जाता है, धीरज जी ने इस पुस्तक में अपनी स्वर्गीय पत्नी को समर्पित करते हुए बेहद शानदार ढंग से भावना को व्यक्त किया है। यह बात अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल डाॅ. माता प्रसाद ने ‘भावांजलि’ के विमोचन अवसर पर कही, कार्यक्रम का अयोजन राष्टीय साहित्य संगम के तत्वावधान में 16 दिसंबर को इलाहाबाद के राजरूपपुर स्थित धीरज आवास पर किया गया। अध्यक्षता दूरदर्शन केंद्र के पूर्व निदेशक श्याम विद्यार्थी और संचालन गोपी कृष्ण श्रीवास्तव ने किया। गोंडा के गीतकार सतीश आर्य ने कहा कि जमादार धीरज की यह पुस्तक आसंुओं में नहाई हुई है, इसकी जितनी सराहना की जाए कम है। धीरज के छंद अपने आपमें अतुलनीय है। राजरूपपुर के पार्षद अखिलेश सिंह ने कहा कि अपनी पत्नी का याद करते पुस्तक लिख देना बड़ी बात है, इसके लिए धीरज जी बधाई के पात्र हैं। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि जमादार धीरज शुरू से ही बेहतर रचनाकार रहे हैं, इनकी रचनाएं इनकी वेदना को शानदार तरीके व्यक्त करती है। जमादार धीरज ने कहा कि एक वर्ष पूर्व जब मेरी पत्नी का निधन हो गया तो लगा कि अब मैं कविता नहीं लिख पाउंगा, लेकिन बेटियों की प्रेरणा ने मुझे शक्ति दी और मैं इस पुस्तक का सृजन कर पाया। जमादार धीरज की पुत्रियां सीला शरण, उर्मिला सिंह, सीमा और मधुबाला ने भी विचार व्यक्त किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्याम विद्यार्थी ने कहा कि वेदना से ही काव्य स्मृति भूटती है, और धीरज की रचना में उनकी वेदना बहुत ही शानदार हैं। अपनी शानदार रचनाओं के जरिए धीरज एक सफल कवि के रूप में आए हैं। इनकी रचनाओं से खासकर नए लोगों को प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। 
दूसरे दौर में गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता विजय लक्ष्मी विभा और संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने किया। गोपी कृष्ण श्रीवास्तव, जमादार धीरज, फरमूद इलाहाबादी, शिवपूजन सिंह, डाॅ. विक्रम, यागेंद्र कुमार मिश्र, इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी, डाॅ. नईम साहिल, वाकिफ़ अंसारी, डाॅ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, राधेश्याम ठाकुर, तलब जौनपुरी, विक्टर सुल्तानपुरी, सुनील दानिश, अना इलाहाबादी, विपिन श्रीवास्तव, मधुबाला आदि ने कलाम पेश किया। अंत जमादर धीरज ने सबके प्रति धन्यवाद ज्ञापन प्रेषित किया।



रविवार, 10 दिसंबर 2017

तरह-तरह के फूल हैं इन किताबों में

                                                                     -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
                                               

मुजफ्फरपुर, बिहार के डाॅ. केबी श्रीवास्तव लंबे समय से लेखन में सक्रिय हैं। कविताओं के साथ ही कथा लेखन करते रहे हैं। हाल ही में उनकी कहानियों का संग्रह ‘पत्थर की आंख’ प्रकाशित हुआ है। पुस्तक में कुल 25 कहानियां सम्मिलित की गई हैं। इन कहानियों में सामाजिक जीवन के परिवेश का वर्णन अपने नज़रिए से लेखक ने किया है। कहानियों के ज़रिए यह बताने की कोशिश की गई है कि सच हमेशा विजयी होता है। लेखक पेशे से चिकित्सक है, जिसकी वजह से उसकी कहानियों में चिकित्सा से जुड़े संदर्भों का जिक्र सबसे अधिक है। अस्पताल में डाक्टरों-मरीजों की स्थिति और मेडिकल में एडमीशन के दौरान की स्थितियां इनकी कई कहानियों के विषय बने हैं। इस नज़रिए से इनकी कहानियां नए परिदृश्यों को पाठक के सामने रखती हैं। कुल मिलाकर लेखक के अपनी छोटी-छोटी कहानियों के ज़रिए समाज का ख़ाका खींचा है और बताया चिकित्सीय पेशे में किन-किन स्थितियों से गुजरना पड़ता है। 96 पेज की इस सजिल्द पुस्तक की कीमत 125 रुपये है, जिसे गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।
जोधपुर, राजस्थान के रहने वाले खुरशीद खैराड़ी लंबे समय से रचनारत हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। ब्लाग और अन्य सोशल साइट्स पर भी सक्रिय हैं। ‘पदचाप तुम्हारी यादों की’ नाम से इनका ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है। इनकी ग़ज़लों में जहां एक तरफ परंपरा की खुश्बू है, तो दूसरी तरफ जदीदियत का सलोनापन। दोनों की चीज़ें जगह-जगह ग़ज़लों में मिलने के कारण बेहद ख़ास हो रही हैं। इसके अलावा इनकी ग़ज़लों में छंद के कसाव के साथ उर्दू-हिन्दी के शब्द समान रूप से हैं। कुल मिलाकर एक बेहतरीन शायर के रूप में इस किताब के ज़रिए शायरी की दुनिया की धमक पेश करते हुए दिख रहे हैं खुर्शीद खैराड़ी। एक ग़ज़ल का मतला देखें -‘उंचाई का दंभ तजेगा अंबर इक दिन/आन लगेगा सर पर कोई पत्थर इक दिन।’ और फिर एक ग़ज़ल में कहते हैं-‘ सारा जग विपरीत गया/फिर भी सच तो जीत गया। फूल खिले फिर खुशियों के/ ग़म का मौसम बीत गया।’ भाग-दौड़ और परेशानी भरी दिनचर्या में इनकी ग़ज़लें नई उर्जा का संचार करती दिखती हैं, यही शायर की सफलता भी है। पुस्तक में कई ऐसी ग़ज़लों का सामना होता है। 96 पेज के इस पेपर बैक संस्करण को राजस्थानी ग्रन्थागार ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 150 रुपये है।
मशहूर पत्रकार प्रताप सोमवंशी की पुस्तक हाल ही में प्रकाशित हुई है। ‘इतवार छोटा पड़ गया’ नामक इस ग़ज़ल संग्रह में वर्तमान समय में आम आदमी के जीवन-यापन और उसकी समस्याओं का जिक्र जगह-जगह अपने अशआर के माध्यम से प्रताप सोमवंशी ने किया है। पुस्तक की पहली ग़ज़ल का मतला देखें -‘राम तुम्हारे युग का रावण अच्छा था/दस के दस चेह्रे सब बाहर रखता था।’ फिर एक और ग़ज़ल का मतला यूं है- ‘झूठ पकड़ना कितना मुश्किल होता है/सच भी जब साज़िश में शामिल होता है।’ इन दो ग़ज़लों के मतले से सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इनकी शायरी के परिदृश्य समाज की विडंबनाओं को रेखांकित हुए उनकी विसंगतियों पर प्रहार कर रहे हैं। शायद आज के सामाजिक परिदृश्य में ऐसी ही शायरी की आवश्यकता है। और फिर खुद ही अपनी शायरी के बारे में कहते हैं -‘ लायक कुछ नायलायक बच्चे होते हैं/शेर कहां सारे ही अच्छे होते हैं।’ एक शेर में अपने अनुभव का जिक्र भी करते हैं-‘तजुर्बे जीत जाते हैं बुजुर्गी काम आती है/कई मौकों पे शै कोई पुरानी काम आती है।’ हिन्दी शायरी का परिदृश्य हमेशा से ही सामाजिक रही है, उर्दू शायरी के मुकाबले यहां प्रेम-प्रेसंगों का जिक्र कम ही होता रहा है। प्रताप सोमवंशी इसी हिन्दी काव्य परंपरा के कवि हैं और इसी स्वभाव के अनुसार शायरी कर रहे हैं। मगर, इनकी शायरी में तमाम नए बिंब और परिदृश्य भी नज़र आते हैं, जो अन्य हिन्दी ग़ज़लकारों से अलग करते हैं। 144 पेज वाले इस पेपर बैक संस्करण को वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 150 रुपये है।
ग़ाज़ियाबाद की नीरजा मेहता लंबे समय से रचनारत हैं। कविताओं के अलावा गद्य लेखन भी करती रही हैं। आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। पिछले दिनों उनका काव्य संग्रह ‘मन दर्पण’ प्रकाशित हुआ है। आम जन-जीवन से जुड़ी हुई कविताओं के अलावा इस पुस्तक में जगह-जगज प्रेम-प्रसंगों का भी वर्णन अपने अंदाज़ में कवयित्री ने किया है। कहा जाता है कि आमतौर पर महिलााएं अपनी रचना में दुख-दर्द का वर्णन अधिक करती हैं। नीरजा में कविताओं में भी ऐसे परिदृश्य कई जगह दिखते हैं। ‘आंसू’ नामक शीर्षक की एक कविता कहती हैं- कभी खुशी का, कभी ग़म का/फरमान हैं आंसू/जब दिल में उठता है समुंद्र/एक दरिया बन/ज़ज्बात में बह जाते हैं आंसू।’ प्रेम प्रसंग का जिक्र करते हुए कहती हैं-‘तुम और मैं/ऐसे हैं जैसे/माला के चमकते मोती/जो रहते हैं/सदा मन रूपी प्रेम डोर से बंधे।’ और फिर कहती हैं - ‘मैं हाले दर्द/बताउं तो कैसे/ज़िन्दगी तुम बिन वीरान है/यह मैं जतलाउं कैसे।’ इसी तरह पुस्तक में जगह-जगह उल्लेखनीय कविताओं से सामना होता है। 104 पेज वाले इस सजिल्द पुस्तक को वाॅइस पब्लिकेशन्स ने प्रकाशित किया है। जिसकी कीमत 195 रुपये है।
जालंधर के बिशन सागर पिछले कई वर्षों से रचनारत हैं। लधुकथा, यात्रा संस्मरण, ग़ज़ल और नई कविता का सृजन करते रहे हैं। अब तक चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘समय की रेत पर’ उनका हालिया काव्य संग्रह है। जीवन के यर्थाथ मूल्यों को रेखांकित करती हुई कविताएं इस पुस्तक शामिल की गई हैं। कविताओं के माध्यम से मनुष्य को उसकी मनुष्यता याद दिलाने की कोशिश की गई है। बताया गया है कि मानव जीवन का क्या महत्व है, इसे कैसे व्यतीत करना बेहतर होगा। पुस्तक की पहली कविता में कहते हैं -‘अगर आज ही/ शाम तक/जाना पड़े ज़िन्दगी से वापिस/तो होगा कितना मलाल/कितने प्रियजनों से न मिल सका/न मांग सका माफी/उन कामों के लिए /जो मैंने जिन-स्वार्थ/ के लिए किए।’ फिर आगे एक कविता में आत्मिक प्रेम का वर्णन करते हुए कहते हैं-‘सोचता हूं/तुम आओगी तो/करेंगे/बहुत सी बातें/कुछ वर्तमान की बातें/पर नहीं करेंगे/उन रिश्तों की बातें/जिसका सफ़र केवल/जिस्स से जिस्म/तक ही होता है।’ इसी तरह अन्य कविताएं भी उल्लेखनीय हैं। 120 पेज वाले इस सजिल्द पुस्तक की कीमत 240 रुपये है, जिसे अयन प्रकाशन से प्रकाशित किया है।
शिमला के संजय ठाकुर का संबंध पत्रकारिता के साथ ही साहित्य जगत से भी है। विभिन्न अख़बारों के काम कर चुके हैं, वेबसाइट और ब्लाग पर सक्र्रिय हैं। हाल में ही इनका काव्य संग्रह ‘तिश्नाकाम’ प्रकाशित हुआ है। इस पुस्तक में ग़़ज़ल, रूबाई, क़तआ, नज़्म और गीत शामिल किए गए हैं। इनकी रचनाओं में दिल के जज़्बात, दुनियारी और ख़ाक हो रही इंसानियत का जिक्र किया गया है। कवि अपनी लेखनी से बताना चाहता है कि हर किसी को अपना नैतिक कर्तव्य अवश्य ही निभाना चाहिए, सच का साथ नहीं छूटना चाहिए। साहित्य से जुड़ा हर व्यक्ति शायद यही चाहता है, लेकिन ज़रूरी यह है कि दूसरों को उपदेश देने के साथ खुद भी उन पर अमल किया जाए। संजय ठाकुर की बातों से लगता है कि अवश्य ही वे खुद भी अमल करते होंगे। अपनी एक नज़्म में कहते हैं - ‘यह क्या इंसाफ-इंसाफ चिल्लाते हो/आखि़र ये इंसाफ़ कितने होते हैं/एक तो उनके हिस्से में चला गया/ अब तुम्हारे लिए कौन-सा बचा है/शायद तुम नहीं जानते/धागे में पिरो लिए जाने के बाद मोती/मोती नहीं रहता/’ इसी तरह अन्य रचनाओं से सामना इस किताब के पढ़ने के दौरान होता है। 120 पेज के इस सजिल्द पुस्तक को किताबघर पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 225 रुपये है।



राजस्थान के सवाईमाधोपुर के रहने वाले ए.एफ. नज़र मुख्यतः ग़ज़ल के शायर हैं। ये शायरी के विभिन्न आयाम से परिचित भी हैं। ‘सहरा के फूल’ नामक इनका ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ है। ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले हैं, इसलिए इनकी रचनाओं में गांव के वास्तविक परिदृश्य जगह-जगह दिखते हैं और ये अपनी में इंसानियत की बात भी उसी नज़रिए से सच्चाई के करते नज़र आते हैं। इनका एक शेर यूं है- ‘पहले जैसी बात कहां इन बेमौसम की फ़स्लों में /ख़ादों की भरमार ने मिट्टी का सौंधापन छीन लिया।’ और फिर वर्तमान दुनियादारी और उसकी विसंगतियों पर प्रहार करते हुए कहते हैं -‘ नई तहज़ीब दुनिया की मेरे घर तक नहीं पहुंची/खु़दा का शुक्र बेदर्दी मेरे दर तक नहीं पहुंची।’ इनकी रूमानी शायरी भी नए रंग में दिख रही है- ‘मेरे आने की तारीख़ें बराबर देखती होगी/वो हर शब सोने से पहले कलैंडर देखती होगी।’ इस तरह कुल मिलाकर इनकी शायरी नए तेवर के साथ वास्तविका का बखान करती हुई नज़र आती है। 88 पेज के इस पेपर बैक संस्करण को बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। जिसकी कीमत 100 रुपये है।
इंदौर के राजेश भंडारी बाबु काव्य रचना के प्रति सजग हैं। हिन्दी के साथ मालवी बोली में कविताओं का सृजन कर रहे हैं। पिछले दिनों इनकी मालवी कविताओं का संग्रह ‘पचरंगों मुकुट’ प्रकाशित हुआ। इनकी कविताओं में पारंपरिक बिंब दिखते हैं, जिनके जरिए समाज को बेहतर बनाने की बात कही गई है। जगह-जगह समाज में फैली विडंबनाओं को रेखांकित करते हुए इससे दूर होने की प्रेरणा कविताओं के माध्यम से दी गई है। इसके साथ ही कविताओं के माध्यम से प्रकृति का वर्णन भी बढ़िया ढंग से किया है, जिससे इनका प्रकृति प्रेम स्पष्ट दिखता है। एक कविता में कहते हैं-‘तू पाछी आईजा म्हारी चरकली रानी/सुनो हे धारा बिना म्हारो घर आंगन/सुना खेत खलिहान सुनो है म्हारो मन/चरकला का साथे आई जा ची ची करती।’ इसी तरह अन्य बिंब अलग-अलग कविताओं में दिखते हैंै। पुस्तक में जगह-जगह रेखाचित्र भी कविताओं अनुसार दिए गए हैं। 240 पेज की इस सजिल्द पुस्तक को राजेश भंडारी बाबु ने स्वयं प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 200 रुपये है।
(गुफ्तगू के अक्तूबर- दिसम्बर 2017 अंक में प्रकाशित)

रविवार, 3 दिसंबर 2017

पं. नेहरू खुद मार्क्सवादी थे: ज़ियाउल हक़

काॅमरेड ज़ियाउल हक़ से इंटरव्यू लेते प्रभाशंकर शर्मा

आजादी आंदोलन से लेकर आज़ादी के बाद भी पत्रकारिता धर्म का संजीदगी से सजोने वाले काॅमरेड ज़ियाउल हक़ साहब ने इलाहाबाद को कई परिदृश्यों में देखा और महसूस किया है। ‘गुफ्तगू’ के उपसंपादक प्रभाशंकर शर्मा और डाॅ. विनय कुमार श्रीवास्तव ने आपसे बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश-
सवाल: पाठकों की तरफ से हम सबसे पहले आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में जानना चाहेंगे ?
जवाब: इलाहाबाद की हमारी बहुत पुरानी फैमिली है। यहां एक मोहल्ला दोंदीपुर जो रेलवे स्टेशन के पास है, वहां पर हमारा पुराना घर है। मैं 1920 में पैदा हुआ थौ मेरे पिताजी इलाहाबाद के मानिंद वकील थे। मेरे पिताजी का नाम सैयद ज़मीरुल हक़ था। मेरे दो भाई और तीन बहनें थीं, इनमें मैं सबसे बड़ा था। मेरे एक भाई इस समय हयात में हैं, इस समय अमेरिका में रहते हैं।
सवाल: आप अपने जीवन के शुरूआती जीवन के बारे में बताइए ?
जवाब: जब मैं पैदा हुआ, उस समय राजनैतिक चहल-पहल बहुत थी, उसका हमारे उपर और हमारे साथियों पर बहुत असर पड़ा। हम लोग हाईस्कूल के ज़माने से ही राजनीतिक हो गए थे और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। हमारे बहुत अच्छे विश्वनाथ नरोड़े जी महाराष्ट के थे, सैयद नुरुल हसन जो बाद में मिनिस्टर हो गए थे, हमारे काफी अच्छे दोस्त थे। हमारा एटामाॅसफियर पढ़ने-लिखने के साथ राजनीतिक भी था। हमारे ज़माने मे चंद्रशेखर आज़ाद का वाक्या हुआ था। इस तरह के और भी वाक्यात हुए जिन्होंने हमारे उपर राजनीतिक असर पैदा किया। हम राजनीति में आ गए और माक्र्सवाद से जुड़ाव शुरू हुआ। जीआईसी के बाद यूनिवर्सिटी में आए, यहां पर कम्युनिष्ट पार्टी के बड़े नेता रुद्र दत्त भारद्वाज का प्रभाव मुझ पर पड़ा। उनके कहने पर हमने लगभग 1937-38 में अपना घर छोड़ दिया और राजनीतिक जीवन में सक्रिय हो गए। हमने अपना घर छोड़कर अपने परिवार के साथ बहुत ज्यादती की। उसी समय पार्टी ने हमें दिल्ली बुला लिया और दिल्ली में हम उर्दू अख़बार और फिर अंग्रेजी में काम करने लगे।
सवाल: आपने आज़ादी के पहले और उसके बाद का भी समय देखा है। उन दिनों देश दुनिया का क्या माहौल था ?
जवाब: इलाहाबाद पं. जवाहर लाल नेहरु और पं. सुंदर लाल जी थे, उनके आगे-पीछे घूमने का मौका मिला। उस जनरेशन में पर नेहरु का बहुत असर था। उनकी जीवनी और उनके काम का बहुत असर था, वही हमारे नेता थे।
सवाल: आप कह रहे हैं कि नेहरु जी ही आपके नेता थे, तो आप माक्र्सवादी कैसे हुए ? 
जवाब: पंडित जवाहर लाल नेहरु खुद मार्क्सवादी थे। हमारे साथी लोग उनको मार्क्सवादी मानते थे।
सवाल: आज़ादी के समय इलाहाबाद की क्या दशा थी। उस समय इलाहाबाद का क्या माहौल था ?
जवाब: हम लो सब अपने-अपने संघर्ष और राजनीतिक कार्यक्रम में लगे रहते थे। हम लोग राजनीतिक कार्यकर्ता थे, हमस ब एक दूसरे के साथ मिलते-जुलते रहतेे थे। यहां का राजनीतिक माहौल अच्छा था। यहां पढ़े-लिखे लोग थे। इलाहाबाद की पाॅलिटिक्स का लाइफ अच्छी थी। यहां के नेताओं के अच्छे लेख और भाषण हुआ करते थे।
सवाल: इलाहाबाद का वामपंथ से क्या संबंध रहा?
जवाब: इलाहाबाद में काफी अच्छा वामपंथ था। कांग्रेस के अंदर भी कुछ लोग वामपंथी थे। पं. नेहरु के साथ जेड.ए. अहमद और सज्जाद ज़हीर उनके दफ्तर में काम करते थे जो कि कम्युनिष्ट थे।
सवाल: आप अपने समय के इलाहाबाद और अब के इलाहाबाद में क्या अंतर पाते हैं?
जवाब: तब इलाहाबाद के लोग सामान्यतः ज्यादा सभ्य थे, जिसमें कुछ कमी आ गई है। पहले का इलाहाबाद उस लिहाज से बहुत अच्छा था, तब बहुत मान-दान वाले लोग थे, जिनकी बहुत इज़्ज़त थी। पत्रकारिता के लिहाज से भी तब के ज़माने और अब के ज़माने में अंतर आ गया है। इलाहाबाद में अच्छा लिखने वाले थे।
सवाल: इस समय आप अपनी पार्टी के लिए किस तरह सहयोग कर रहे हैं?
जवाब: हमारी पार्टी सीपीआई का अख़बार ‘न्यू एज़’ है, जिसका मोटो ‘सेव इंडिया’ ‘चेंज इंडिया’ है। यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र है। इसका हिन्दी संस्करण ‘मुक्ति संघर्ष’ नाम से है। इस अख़बार में मैं 1952 से काम करता रहा। इसमें मेरे लेख छपते थे, अब मेरी उम्र 98 वर्ष की हो गई है, अब मैं नहीं लिखता हूं।
सवाल: आज की युवा पीढ़ी के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?
जवाब: अनफाॅच्युनेटली हम कैसे कहें कि देश में कम्यनलिज़्म आ गया है, जो देश में पहले नहीं था। हो सकता है हमारा ख़्याल ग़लत हो, पर बहुत लोग राजनीति में इतने अंधे हो जाते हैं कि कुछ समझ में नहीं आता। ज़माना बहुत बदल गया है।
सवाल:  क्या आप अपने जीवने संबंधित कोई बात बताना चाहेंगे जो आपके मन में रह गई हो ?
जवाब: देश में बंटवारा के दौरान बहुत से लोग देश छोड़कर चले गए, यह दुखद बात हुई। ऐसा कोई मंच होना चाहिए और हो सकता जिसमें मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम लोग ज़्यादा बातचीत कर सकें। आज़ादी और बंटवारे के दौरान मेरे निकट संबंधी, बचपन में जिनका साथ रहा वो बिछड़ गए और कुछ लोग वहां से निकलकर अमेरिका चले गए।
(गुफ्तगू के जुलाई-सितंब: 2107 अंक में प्रकाशित)


बुधवार, 29 नवंबर 2017

महिला विशेषांक-3 के लिए रचनाएं आमंत्रित


चयनिय 11 रचनाकारों को मिलेगा ‘सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान’ 
इलाहाबाद। ‘गुफ्तगू’ के महिला विशेषांक-3 महिलाओं से रचनाएं आमंत्रित की जा रही हैं। इस अंक के लिए कविता, गीत, गजल, दोहे, लधुकथा आदि रचनाएं 31 दिसंबर 2017 तक भेजी जा सकती हैं, किसी भी एक विधा की दो रचनाएं भेजें। इसके अलावा महिलाओं से संबंधित विषयों पर लेख भेजे जा सकते हैं, लेख लिखने से पहले हमसे बात जरूर कर लें। वर्ष 214 से 2017 तक के बीच जिन महिला रचनाकारों की पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, उसकी समीक्षा प्रकाशित करवाने के लिए दो प्रतियां भेंजे। रचना के साथ अपना पूरा नाम, डाक का पता, मोबाइल नंबर और पासपोर्ट साइज फोटा पंजीकृत डाक, कोरियर या ई-मेल से भेंजे। इस अंक में प्रकाशित में सभी रचनाकारों में से 11 लोगों का चयन ‘सुभद्रा कुुमारी चौहान’ सम्मान के लिए किया जाएगा। पत्रिका में रचना प्रकाशन के लिए कोई शुल्क नहीं देना है, लेकिन हम पत्रिका किसी को मुफ्त में नहीं देते, इसलिए पत्रिका प्राप्ति के लिए ‘गुफ्तगू’ की सदस्यता लेना आवश्यक है। ‘गुफ्तगू’ की ढाई वर्ष की सदस्यता शुल्क 200 रुपये, आजीवन 2100 रुपये और संरक्षक शुल्क 15000 रुपये है। आजीवन और संरक्षक सदस्यों को ‘गुफ्तगू पब्लिकेशन’ की सभी पुस्तकें और ‘गुफ्तगू’ के उपलब्ध पुराने अंक दिए जाते हैं। संरक्षक सदस्यों का पूरा परिचय फोटा सहित हम एक अंक में प्रकाशित करते हैं, इसके बाद हर अंक में नाम छपता है। निधन के बाद भी हम संरक्षक सदस्यों का नाम ‘संस्थापक सरंक्षक’ के अंतर्गत प्रकाशित करते हैं, उनका नाम कभी हटाया नहीं जाता। सदस्यता शुल्क मनीआर्डर, चेक या सीधे ‘गुफ्तगू’ के एकाउंट पैसा जमाकर भेंजे। इसकी सूचना मोबाइल नंबर 8840096695 पर जरूर दें।
संपादक-गुफ्तगू
123ए-1, हरवारा, एनसीआर
इलाहाबाद- 211015
ई-मेल: guftgu007@gmail.com

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

गुफ्तगू ने साहित्य की बुलंदी बरकरार रखी है


शैलेंद्र जय परिशिष्ट का विमोचन और मुशायरा 
इलाहाबाद। विपरीत हालात में जहां बड़ी-बड़ी पत्रिकाएं बंद हो रही हैं। रचनाएं और रचनाकार ख़ासकर साहित्यिक रचनाकारों के सामने संकट कम नहीं है, ऐसे में इलाहाबाद सरीखे साहित्यिक नगरी में साहित्य की बुलंदी बरकारार रखना उम्मीद जगाता है। गुफ्तगू पत्रिका ने यह काम कर दिखाया है। यह बात मुख्य अतिथि वरिष्ट रेलवे अधिकारी शैलेंद्र कपिल ने ‘गुफ्तगू’ के शैलेंद्र जय परिशिष्ट विमोचन के अवसर पर 12 नवंबर को सिविल लाइंस स्थित बाल भारती स्कूल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कही। उन्होंने कहा कि शैलेंद्र की शायरी कई मायने में बेहद ख़ास है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पं. बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि आज के दौर में जब धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाएं बंद हो गईं हैं, ऐसे माहौल में ‘गुफ्तगू’ के लगातार 14 साल से प्रकाशित होते रहना बड़ी कामयाबी है। इलाहाबाद जैसे शहर से ही ऐसी पत्रिका निकल सकती है। रविनंदन सिंह ने कहा कि शैलेंद्र जय की कविता अपनी अलग पहचान रखती हैं, नए बिंब और नए प्रतीक इनकी कविताओं में मिलते हैं।‘गुफ्तगू’ ने ऐसे कवि को परिशिष्ट निकालकर एक बड़ा काम किया है। इस अंक में प्रो. नामवर सिंह का इंटरव्यू और डाॅ. बशीर बद्र का सौ शेर इसको बेहद स्तरीय बना रहा है। नंदल हितैषी ने कहा कि इलाहाबाद से ऐसी पत्रिका का प्रकाशन बेहद खास है, इस तरह की स्तरीय पत्रिका निकालना बड़ी है। कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया।
 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। अख़्तर अज़ीज़, सागर होशियारपुरी, जमादार धीरज, मोईन उस्मानी, शिवपूजन सिंह, नरेश महरानी, अनिल मानव, प्रभाशंकर शर्मा, भोलानाथ कुशवाहा, कृष्ण चंद्र श्रीवास्तव, लोकेश श्रीवास्तव, वंदना शुक्ला, मोइन उस्मानी, वाक़िफ़ अंसारी, डाॅ. नईम साहिल, अर्पणा सिंह, माहिर मजाल, योगेंद्र मिश्र, वंदना शुक्ला, रमोला रूथ लाल, विवेक सत्यांशु, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, अजय कुमार पांडेय, अरविंद वर्मा, सुनील दानिश, अजीत शर्मा आकाश, अरुण कुमार श्रीवास्तव और अदिति मिश्रा ने काव्य पाठ किया।