मंगलवार, 19 जनवरी 2021

उर्दू पत्रकारिता के नामवर सहाफी थे हारुन रशीद

                                                     

हारुन रशीद

                                                            - शहाब खान गोड़सरावी                                       

 सहाफ़त की दुनिया के सुप्रसिद्ध पत्रकार हारुन रशीद अलीग का जन्म 31 मई सन. 1942 ई. को मुंबई में हुआ। इनका पैतृक गांव उसिया है। इनके पिता इस्माईल खान मुंबई में टैक्सी ड्राइवर थे, माता हिफाजत बीबी जो नेक घरेलू खातून थी। हारून रशीद का गांव की तुलना में मुंबई में ज्यादा रहना हुआ। हारून रशीद श्अलीगश् के पिता समाजसेवी ईस्माईल खां ने क्षेत्रिय बच्चों की शिक्षा के लिए श्कमसार हॉस्टलश् के रूप में सन.1962 ई० को दिलदारनगर मे श्हाजी लॉजश् का निर्माण कराया। लम्बे ऊंचे कद के गोल मुखड़े में साधारण सा दिखने वाले हारुन रशीद को बचपन से नेक स्वभाव से जाना जाता था। जैनुल आबेदीन के मुताबिक  1960 ई. में हारून रशीद कक्षा चार की पढ़ाई गिरगांव, मुंबई के चैपाटी म्युनिसिपल स्कूल से पूरा करने के बाद पांचवीं की पढ़ाई के लिए मुंबई के अंजुमन इस्लाम बॉयज वींटी. हाईस्कूल में दाखिले के लिए गए तो उस स्कूल के प्रिंसिपल ने उनका दाखिला करना से मना कर दिया, उन्होंने कहा कि आपके पिता इस कॉलेज की फीस नहीं दे पाएंगे। वे रोते हुए वीटी काॅलेज से चरनी रोड के रास्ते घर वापस लौट रहे थे, तभी एक अजनबी की नज़र उन पर पड़ी। उस अजनबी ने बच्चे को रोते हुए देखकर रोने की वजह पूछी, और फिर अपनी कार मंे उन्हे बिठा उस स्कूल के रजिस्टार के दफ्तर पहुंचे, और उनका दाखिला कराया। 

 वीटी कॉलेज से मैट्रीक करने के बाद सन.1964 ई. मे कक्षा-11 वीं के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मे प्रवेश लिया। वहां से इंटरमीडिएट और ग्रेजुएशन के बाद उर्दू से एम.फिल. की डिग्री हासिल की। हारुन रशीद की समाज सेवा, लेखन के साथ-साथ खेलकूद में खास दिलचस्पी थी। वो अक्सर फ्री समय में क्रिकेट खेलना पसंद करते थे। इंडो-पाक के क्रिकेट मैच में उनकी खासी दिलचस्पी थी। अलीगढ़ पढ़ाई के दरमियान ही हारून रशीद अलीग को सन. 1964-70 ई. तक हर वर्ष बेहतरीन तकरीर के लिए पुरस्कृत किया गया था। पढ़ाई के दरम्यान उनकी शादी अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसारोबार एवं गंगापार कमेटी के संस्थापक खान बहादुर मंसूर अली के परिवार में हाजी मसिहुजम्मा उर्फ जंगा खां की छोटी लड़की रिफत जहां से हुई। पढ़ाई पूरी करने के बाद हारून रशीद रोजी रोटी की तलाश में लग गए। मुंबई में कई छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरियां की, लेकिन कहीं मन नहीं लगा, आखिर में उनका लिखने पढ़ने का हुनर काम आया और वो 1965-70 के बीच छोटे बड़े पत्र पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया। उनके मज़ामीन उर्दू टाइम्स, अखबारे-नौ, उर्दू ब्लिट्ज और उर्दू इंक़लाब में छपे, जिन्हें कई संपादको के द्वारा सराहा गया। उर्दू ज़बान-व-अदब पर उन्होंने ऐसी महारत हासिल की थी कि देखते ही देखते उन्हें मुंबई के साथ-साथ हैदराबाद, लखनऊ जैसे बड़े शहरों के उर्दू अख़बार और रसालों मे भी उनके मज़ामीन छपने लगे। उन्होंने अपने मज़ामीन के जरिए एक आज़ाद सहाफी के रूप मे समाज के बीच एक अच्छी पहचान बनाई। इनकी स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए महाराष्ट्र उर्दू-अकादमी द्वारा सन् 1980 ई० में पुरस्कृत हुए। सन् 1977 ई. मे मशहूर शायर हसन कमाल से इनकी पहली मुलाकात हुई और उर्दू बिल्टज मे बतौर सहाफी काम करना शुरू किया और 1979 ई. मे हारून रशीद अलीग साप्ताहिक उर्दू बिल्टज के संपादक बनाए गए। सन् 1995 के बाद उन्होने रोजनामा इन्क़लाब मे ‘खेल की दुनिया’ और ‘आलम-ए-इस्लाम’ व ‘कलम पे वॉर’ नामक बेहतरीन कालम लिखतेे और अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत इन्क़लाब के शुरुआती दौर में ही अव्वल दर्जे का उर्दू अख़बार बना दिया। इनकी स्पोर्ट्स कॉलम करंजिया हॉउस मुंबई से ब्लिट्ज, इन्क़लाब के उर्दू, हिंदी, इंग्लिश तीनों अख़बारों में छपती। जिसे देखते हुए करंजिया ग्रुप ऑफ न्यूज पेपर के संस्थापक आरक करंजिया हारुन रशीद से काफी प्रसन्न थे, उन्हें अपने बेटे की तरह मानते थे। जिसकी वजह से पांच वर्षो तक बतौर रोजनामा इन्क़लाब मे संपादक बने रहे।

 हारून रशीद अक्सर कमसार-व-बार इलाके के अंजुमन इस्लाहिया कमेटी के प्रोग्राम में शिरकत कर बतौर निजामत करते। सन् 1993 ई. मे बाबरी मस्जिद केस के दरमियान हिंदू-मुस्लिम भाईचारा को बनाये रखने के लिए वो सामने आए, जिसका नतीजा ये हुआ कि मुंबई ठाकुरद्वार स्थित मकान को दंगे मे जला दिया गया। सैकड़ों किताबों से भरी जिं़दगी की सारी मेहनत-मशकत की कमाई को पूरी लाइब्रेरी जलकर खाक हो गई। उनकी जब तक सांसे चली तब तक कौमी एकता के लिए काम किये और वो भी दिन आया जो अपनी तीन बच्चियों और एक बच्चे को छोड़कर 4 मार्च सन. 2000 ई. को दुनिया को अलविदा कह गये। उनकी मिट्टी उनके कहे के मुताबिक पैतृक गांव उसिया सतहवा मोहल्ला कब्रिस्तान में दफन की गई। गौरतलब हो कि हारुन रशीद की बेटी पत्रकार हुमा हारून जो ‘बीबीसी’ लंदन में बतौर एंकर रह चुकी है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित) 


सोमवार, 11 जनवरी 2021

गुफ़्तगू पत्रिका से ज्यादा आंदोलन है : पवन कुमार

पवन कुमार

    पवन कुमार का जन्म मैनपुरी में हुआ। आरंभिक पढ़ाई कई शहरों में हुई। पिता जी पुलिस सेवा में थे, तो लगातार तबादलों के दरमियां कभी इस शहर, कभी उस शहर कयाम बदलता रहा। कभी इस कस्बे की आबो-हवा से रब्तगी की, तब तक अगली पोस्टिंग का फरमान आ गया गया। लेकिन इन्होंने तबादलों को इन तब्दीलियों से बहुत कुछ सीखा। लोगों से समन्वय, संवाद, संबंध स्थापित करने में यह काफी सहायक साबित हुआ। साइंस से ग्रेजुएट करने के बाद लॉ किया। पहले ही प्रयास में प्रांतीय सिविल सेवा में चयन हो गया। कुछ साल प्रांतीय सिविल सेवा में बिताने के पश्चात भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रयास किया और वहां भी सिलेक्शन हो गया। वर्तमान में उत्तर प्रदेश संवर्ग में हैं। अनिल मानव से उनसे बातचीत की, प्रस्तुत उसके प्रमुख भाग।

सवाल: वर्तमान समय में ग़ज़ल का क्या भविष्य है ?

जवाब: साहित्य जिन्दा है और हमेशा जिन्दा रहेगा। साहित्य आदमी को सोचने का तरीका देता है। सोचने का एक जरिया है। और इसी साहित्य की एक विधा ग़ज़ल भी है। आप देखेंगे, कि आज से तकरीबन सात-आठ सौ साल पहले अमीर खुसरो से ग़ज़ल शुरू हुई और दुनिया के अलग-अलग भाषाओं और मुल्कों में ग़ज़ल की शायरी हो रही है। इन 700 सालों में जो ग़ज़ल का मेयार है, वो मीर से, ग़ालिब से, शौक से और बाद में जो प्रोग्रेसिव राइटर्स मजाज, साहिर लुधियानवी लुधियानवी, फ़िराक़ गोरखपुरी, बशीर बद्र साहब, कृष्ण बिहारी नूर और इसके बाद भी जो हमारी नयी पौध है, वहां तक इसका पूरा जलवा बरकरार है। और मैं समझता हूं कि आने वाले समय में ग़ज़ल की जो खूबसूरती है, उसकी गेयता के कारण, उसकी छंदबद्धता के कारण, उसकी लयबद्धता के कारण, हमेशा-हमेशा बनी रहेगी।


सवाल: साहित्य में आपका रुझान कब, क्यों और कैसे हुआ?

जवाब: साहित्य की तरफ रुझान बचपन से ही था। हमारे खानदान में हालांकि कोई लेखक तो नहीं था, लेकिन अध्ययन का माहौल था। धार्मिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, वैचारिक पुस्तकें पढ़ने का माहौल था। विशेषतया ननिहाल पक्ष से मुझे इस तरह की किताबों को पढ़ने और बौद्धिक चर्चाओं से जुड़ने का अवसर प्राप्त होता रहा। कॉलेज के दिनों में लेखन की ओर मुड़ा। अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख वगैरह प्रकाशित होने शुरू हुए। यह सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक कि मैं नौकरी में नहीं आ गया। नौकरी में आने के बाद लेख वगैरह लिखने कम हो गए। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और साहित्यिक विषयों पर लेखन कार्य फिर भी चलता रहा। बाद में कविताओं की ओर विशेषतया उर्दू शायरी से जुड़ाव हुआ। बरेली की पोस्टिंग के दौरान कई अदीबों और शायरों से मिलना-जुलना हुआ। वसीम बरेलवी, कमलेश भट्ट कमल, अकील नोमानी, वीरेन डंगवाल, सुधीर विद्यार्थी, गोपाल द्विवेदी, बी.आर. विप्लवी जैसे अदीबों से उठना-बैठना होता था। इनकी सोहबत का असर यह हुआ, कि ग़ज़ल की तरफ मेरे कदम बढ़ते गए। बाद में अक़ील नोमानी से ग़ज़ल की बारीकियां सीखीं। मैं बाद में जब बदायूं में जिलाधिकारी के पद पर तैनात हुआ, तो मुंतखब अहमद जिन्हें नूर ककरालवी के नाम से जाना जाता है, उनसे भी बहुत कुछ सीखने का मौका मिला।

सवाल: प्रशासनिक सेवा में रहते हुए, आप अदब के लिए समय कैसे निकालते हैं?

जवाब: हालांकि प्रशासन में रहते हुए अदब के लिए समय निकालना थोड़ा मुश्किल होता है, किंतु एक संवेदनशील आदमी उठते-बैठते, चलते-फिरते जो देखता है, समझता है उस पर विचार करता है। यही विचार जब कागज़ पर उतरते हैं, तो वह शेर, ग़ज़ल, कविता, लेख आदि का रूप इख़्तियार कर लेते हैं। यही मेरे साथ भी होता है। प्रशासन है क्या, इंसानी जज़्बातों को समझने, उनकी फिक्र से जुड़ने का जरिया ही तो है, मैं इसे इसी तरह लेता हूं। इन्हीं का इज्हार ही मेरा लेखन है।

सवाल: साहित्य प्रशासन के लिए किस-प्रकार मददगार साबित हो सकता है ?

जवाब: बड़ा ही महत्वपूर्ण सवाल आपने पूछ है। प्रशासन और साहित्य का रिश्ता बहुत अहम है। दरअस्ल प्रशासक किसी भी ओहदे पे हो पहले तो वो इंसान ही है। इंसानी एहसास और इंसानी तकाज़ों की समझ अगर प्रशासक को हो तो वेलफेयर स्टेट की अवधारणा खुद ही मआनीखेज हो जाती है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो साहित्यकार भी रहे और प्रशासन में भी रहे, और दोनों सिम्त उनकी शख़्सियत कमाल रही। मेरा सुझाव यही है कि प्रशासनिक ही क्या अन्य सेवाओं से जुड़े हुए लोग भी अच्छा सृजन कर रहे हैं।

सवाल: वर्तमान समय के सबसे महत्वपूर्ण शायर आप किन्हें मानते हैं?

जवाब: देखिए, इतनी बड़ी लिस्ट है और ग़ज़ल को होते-होते सात सौ साल गुजर गए हैं, तो जाहिर है, कि कभी कोई शेर पसंद आता है, तो कभी शायर पसंद आता है। ग़ज़ल का जो दयार है, दरबार है, यह इतना समृद्ध है, कि किसी एक का नाम लेना तो मुश्किल है, लेकिन फिर भी यदि क्लासिकल शायरों की बात की जाये, तो मीर, ग़ालिब, जा़ैक़, फ़िराक़ आदि वो शायर हैं, जिनको पढ़कर आप समझ सकते हैं, कि हमारी शायरी कितनी समृद्ध है।

सवाल: गुफ़्तगू पत्रिका को तकरीबन आप शुरू से देख रहे हैं, क्या कहना चाहेंगे इसके बारे में ?

जवाब: गुफ़्तगू एक पत्रिका से ज्यादा आंदोलन है। मौजूद वक़्त में जब ज्यादातर मैगजीन्स बन्द हो रही हैं, आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं, ऐसे में गुफ़्तगू एक आंदोलन के रूप में बढ़ती चली जा रही है। मेयार को बरकरार रखते हुए मुसलसल छपते रहने की चुनौती का कामयाबी के साथ सामना करने के लिए गुफ़्तगू परिवार मुबारकबाद का मुस्तहक है। ग़ाज़ी साहब और उनकी पूरी टीम को दिली मुबारकबाद!

सवाल: नई पीढ़ी तो कविता या शेर को सोशल मीडिया पर पब्लिश करके वाह-वाही पा लेने को ही कामयाबी मानती है, आप इसे किस रूप में देखते हैं?

जवाब: निश्चित रूप से सोशल मीडिया ने नये लेखकों को एक आसान प्लेटफार्म उपलब्ध कराया है, जहां वे खुलकर अपने आपको और अपनी रचनाओं को प्रस्तुत कर सकते हैं। किसी गॉडफादर की ज़रूरत नहीं। किसी बैकग्राउंड की आवश्यकता नहीं। लेकिन इसका नुकसान भी बहुत हुआ है, जल्दबाजी के चक्कर मे बहुत कुछ अधपका और अधकचरा परोसा जा रहा है। लोग कुछ भी लिखकर पोस्ट कर रहे हैं जो कई बार अदब की बुनियादी चीज़ों से भी बहुत दूर होते हैं। विधाओं की टेक्निक समझे बगैर सिर्फ़ लिखना और पोस्ट कर देना ही उनकी प्राथमिकता हो जाती है। प्रशंसकों के लाइक्स भी मिल जाते हैं। मेरी राय यह है कि सोशल मीडिया के दोनों पक्ष हैं, जिन्हें समझने की ज़रूरत है।

सवाल: आजकल आपका कौन-सा सृजन-कार्य और अध्ययन चल रहा है?

जवाब: मेरा लिखना पढ़ना तो लगातार चलता ही रहता है। आजकल जो लॉकडाउन का पीरियड था, इसमें ऑफिस के अलावा जब टाइम मिलता है, तो आप अपने शौक पूरे करते हैं। बीते दिनों में मैंने बहुत सारी नोबेल अपनी खत्म की हैं। कई ऐसी नई चीजें भी सामने आई हैं, जिन्हें पढ़ने का मौका मिला है। इधर कई नये-नये शायरों की बहुत खूबसूरत-सी किताबें छपी हैं जैसे-महेंद्र कुमार ‘फानी’, अभिषेक शुक्ला आदि ऐसे कई शायर हैं, जो हम तक पहुंचे हैं और हम उसे पढ़ रहे हैं, आनंद उठा रहे हैं और देख रहे हैं कि किस प्रकार की तब्दीलियां शायरी शायरी और साहित्य में आती हैं।

सवाल: शायरी के लिए उस्ताद का होना, कितना जरूरी मानते हैं आप?

जवाब: शायरी एक ऐसा फन है, जो बिना उस्ताद के मुकम्मल होना बड़ा मुश्किल होता है। उस्ताद और शागिर्द की जो उर्दू ग़ज़ल की परंपरा है, ये बहुत ही खूबसूरत चीज़ है। मुझे याद आता है, कि चकबस्त ब्रजनारायण साहब जो बड़े शायर हैं, उन्होंने कहा है-

अदब ताश्लीम का जौहर है जेवर है जवानी का

वही शागिर्द हैं जो खि़दमत-ए-उस्ताद करते हैं।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2020 अंक में प्रकाशित )


शनिवार, 26 दिसंबर 2020

समाज का वास्तविक चित्रण करता है साहित्यकार

‘गुफ़्तगू साहित्य समारोह-2020’ में बोले पं. केशरी नाथ

देशभर के साहित्यकारों को विभिन्न सम्मानों से नवाजा गया



प्रयागराज। साहित्य सिर्फ़ समाज का दर्पण ही नहीं है, बल्कि समाज का वास्तविक चित्रण भी साहित्य ही करता है। समाज हमेशा गतिशील रहता है, कभी रुकता नहीं है, इस गतिशीलता का सही मायने में रेखाकंन और चित्रण कवि ही करता है। कवि द्वारा किया गया चित्रण ही समय का असली मूल्याकंन है, इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए। यह बात गुफ़्तगू की ओर से 20 दिसंबर को हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘गुफ़्तगू साहित्य समारोह-2020’ के दौरान पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल पं. केशरीनाथ त्रिपाठी ने कही। उन्होंने कहा कि आज के साहित्यकार अनेक कठिनाइयों से गुजर रहे हैं, उनके लिए तमाम व्यवधान उत्पन्न हो रहे हैं, जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। कविताओं का सृजन तो कवि कर रहा है लेकिन उसको प्रकाशित करवाने के लिए उसे परेेशान होना पड़ रहा है, ठीक ढंग से रचनाओं का प्रकाशन नहीं हो पा रहा है। श्री त्रिपाठी ने कहा कि गुफ़्तगू ने लगातार 17 वर्षों से काम करके एक मिसाल कायम किया है, इनके काम को प्रशंसा मिलना चाहिए। नये-नये लोगों को गुफ़्तगू पत्रिका में स्थान दिया जा रहा है, प्रयागराज से हो रहे ऐसे काम का मूल्यांकन किया जा रहा है और आगे भी किया जाएगा।

 रविनंदन सिंह ने कहा कि प्रत्येक वर्ष देशभर के साहित्यकारों का गुफ़्तगू द्वारा सम्मान किया जाना एक अच्छी परंपरा है, विभिन्न प्रकार के सम्मान से लोगों को प्रत्येक वर्ष सम्मानित किया जा रहा है, इससे कलमकारों का उत्साहवर्धन हो रहा है। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि आज जिन लोगों को सम्मानति किया गया है उनकी जिम्मेदारी है कि अपने लेखन और सक्रियता से यह साबित करें कि वह इस सम्मान के लायक है। अच्छे लेखन से ही अपने को अच्छा रचनाकार साबित किया जा सकता है। वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि गुफ़़्तगू द्वारा प्रत्येक वर्ष किया जाना यह सम्मान समारोह निश्चित रूप से बेहद सराहनीय है। इसमें देशभर के साहित्यकारों का प्रात्साहन हो रहा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही डाॅ. सरोज सिंह ने कहा कि कविता के अलावा अन्य विधाओं पर कार्य करने की आवश्यकता है, यह अच्छी बात है कि कवियों के साथ-साथ लेखकों को भी सम्मानित किया गया है, हर विधा के लोगों को सम्मान मिलना चाहिए। इस अवसर पर जया मोहन के कहानी संग्रह ‘पारसी थाली’ का विमोचन भी किया गया। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने संचालन किया। 

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। नरेश कुमार महरानी, प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, डाॅ. नीलिमा मिश्रा, नीना मोहन श्रीवास्तव, संजय सक्सेना, शैलेंद्र जय, रेशादुल इस्लाम, संजय सागर, दयाशंकर प्रसाद, रामशंकर पटेल, राजेश केसरवानी, रचना सक्सेना, ममता सिंह, हिमांशु मेघवाल और रमेश नाचीज़ आदि ने कलाम पेश किया।

इन्हें मिला सम्मान

अकबर इलाहाबादी सम्मान

डाॅ. असलम इलाहाबादी


सुभद्रा कुमारी चैहान सम्मान 

लिपिका साहा (हावड़ा), डाॅ. शहनाज़ फ़ातमी (पटना), उर्वशी चैधरी (जयपुर), खुश्बू परवीन (हैदराबाद), डाॅ. अंजना सिंह सेंगर (नोएडा), डाॅ. शैल कुमारी तिवारी (जमशेदपुर) और डाॅ. ताहिरा परवीन (प्रयागराज)


बेकल उत्साही सम्मान 

विजय प्रताप सिंह (मैनपुरी), मासूम रज़ा राशदी (ग़ाज़ीपुर), डाॅ. राकेश मित्र ‘तूफ़ान’ (वाराणसी), अनुराग मिश्र ग़ैर (लखनऊ), डाॅ. रामावतार मेघवाल(कोटा), सलिल सरोज (नई दिल्ली), सागर होशियारपुरी (प्रयागराज) 


कुलदीप नैयर सम्मान 

सुरेंद्र प्र्रताप सिंह (राष्टीय सहारा), शरद द्विवेदी (दैनिक जागरण), मोहम्मद अशफ़ाक़ सिद्दीक़ी(अमर उजाला), ईश्वर शरण शुक्ला(हिन्दुस्तान), प्रदीप कुमार गुप्ता (स्वतंत्र भारत) 


सीमा अपराजिता सम्मान

गीता कैथल (लखनऊ), रानी कुमारी (पूर्णियां), वन्दना शर्मा (लखीमपुर खीरी), पूजा कुमारी रुही (प्रयागराज), प्रीति अरुण त्रिपाठी (प्रयागराज)





सोमवार, 14 दिसंबर 2020

गुफ़्तगू के जमादार धीरज विशेषांक (दिसंबर 2020 अंक) में



3. संपादकीय (ठीक ढंग से हो जमादार धीरज का मूल्यांकन)

4. पाठकों के पत्र

5-8. जमादार धीरज की कुछ स्मृतियां - माता प्रसाद

9. पापा को हम कैसे भूल पाएंगे - शीला सरन धीरज

10. आधा घंटे पहले पापा से हुई थी बात -उर्मिला सिंह

11-12. ...परंतु चमक अब भी आसपास है- मधुबाला धीरज

13. ‘तुम लोग घबराते क्यों हो, मैं हूं’- नीलम चंद्रा धीरज

14. हमारे मामाजी- डाॅ. रमेश कुमार

15-17. खड़ी बोली के साथ लोकभाषा में भी महारत- प्रो. सोम ठाकुर

18-21. रचनाओं में जीवन-जगत का अद्यतन स्वरूप् - अमरनाथ श्रीवास्तव

21. करुणामयी रस घोलते गीत - मनमोहन सिह तन्हा

22-24. प्रभावशाली अभिव्यक्ति के समर्थ कवि धीरज- विजय लक्ष्मी विभा

25-27. संवदना समर्पित जमादार धीरज की काव्य रचना- श्याम विद्यार्थी

28-29. एक अद्भुत व्यक्तित्व जमादार धीरज- सतीश आर्य

30-31. व्यक्तित्व से भी जीता दिल- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

32-33. सौम्य, सुशील जमादार धीरज- तलब जौनपुरी

34-35. सत्य पर आधारित जीवन दर्शन- सुरेश चंद्र द्विवेदी

36-37. भाव आते रहे, गुनगुनाते रहे- शैलेंद्र जय

38-40. जमादार धीरज-प्रयागराज की शान- डाॅ. रीता पांडेय ‘स्नेहा’ 

41-44. सृजन पताका पर मौत पड़ता है भारी- अनिल मानव

45-46. समाज की कुरीतियों से टकराते हैं जमादार धीरज- डाॅ. नीलिमा मिश्रा

47-48. उपेक्षित वर्ग के कवि थे जमादार धीरज-  उदय राज वर्मा ‘उदय’

49. प्रेरणास्रोत कवि जमादार धीरज- इसरार अहमद

50. कविताओं के जरिए सुंदर मूर्ति गढ़ने वाले कवि - शगुफ़्ता रहमान

51. गीतों में जीवन के कटु सत्य - नीना मोहन श्रीवास्तव

52. खड़ी बोली के साथ अवधी भाषा में भी महारत- रचना सक्सेना

53. हर कदम आंसुओं से भिगोता रहा- अर्चना जायसवाल

54-56. इंटरव्यू (गोपीकृष्ण श्रीवास्तव से अनिल मानव)

57-60. कविताएं (डाॅ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, मधुबाला गौतम, मिठी मोहन, शगुफ़्ता रहमान)

61. जमादार धीरज का परिचय

62-64. जमादार धीरज की यादें

65-96. जमादार धीरज की कविताएं

97-100. तब्सेरा (काव्य व्याकरण, सपनों का सम्मान, सहरा के फूल, मुनिसुतायन)

101-102. उर्दू अदब (लाॅकडाउन के 55 दिन, तन्हाइयां)

103-104. गुलशन-ए-इलाहाबाद (आसिफ़ उस्मानी)

105-106. ग़ाज़ीपुर के वीर (हारुन रशीद)

107-108. खि़राज़-अक़ीदत (काॅमरेड ज़ियाउल हक़)

109-111. अदबी ख़बरें

112. नवांकुर (विभु सागर)


मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाने जाते हैं इष्टदेव प्रसाद

                                         

इष्टदेव प्रसाद राय


                                                    -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 इष्टदेव प्रसाद राय चर्चित प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं। इन्होंने अपनी इमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से एक मिसाल पेश किया है, विभिन्न प्रतिकूल हालात में भी कभी डिगे नहीं, जिसकी वजह से अपनी सेवा के दौरान दो बार सस्पेंड भी होना पड़ा है। मगर काम के प्रति इमानदारी में कभी कोई कमी नहीं आई। 30 मार्च 1953 को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के सूरजपुर गांव में जन्मे इष्टदेव प्रसाद के पिता स्व. जमुना राय कांग्रेस के नेता थे। इंटर काॅलेज के प्रधानाचार्य रहने के साथ छह वर्ष तक ब्लाक प्रमुख रहे थे। मां स्वर्गीय प्रेमा कुमारी राय कुशल गृहणि थीं। तीन भाई और तीन बहनों में इष्टदेव सबसे बड़े हैं।

 आपने कक्षा आठ तक की पढ़ाई गांव में पूरी की। इसके बाद हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की पढ़ाई विक्ट्री इंटरमीडिएट काॅलेज से किया। बीएस-सी इलाहाबाद विश्वविद्याल से, एम.ए. और लाॅ की पढ़ाई गोरखपुर विश्वविद्यालय से पूरा किया। 1976 में लाॅ की पढ़ाई पूरी करते ही इसी वर्ष सेल्स टैक्स आफिसर के रूप में आपकी नियुक्ति हो गई। 1977 में प्रशासनिक न्यायिक सेवा में चयन हुआ, फिर 1978 में पीसीएस एक्सक्यूटिव में चयन हो गया। इस चयन के बाद पहली नियुक्ति अलीगढ़ एसडीएम के रूप में 1980 में हुई। वाराणसी और बाराबंकी में एसडीएम बनने के बाद 1986 में इलाहाबाद के एसडीएम हुए। दिसंबर 1986 में ही इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के संयुक्त सचिव के रूप में आपकी नियुक्ति हुई, जहां जनवरी 1991 तक कार्यरत रहे।

 1991 में ही पौड़ी गढ़वाल में उपनिदेशक समाज कल्याण बने, 1991 में ही अपर जिलाधिकारी परियोजना, 1992-93 में उपसंचालक चकबंदी बने। 1993 में ही रसड़ा के चीनी के प्रधान प्रबंधक बनाए गए। यह मिल एक अर्से से घाटे में चल रही थी, कर्मचारियों को समय से वेतन तक नहीं मिल रहा था। इष्टदेव प्रसाद ने अपने कुशल नेतृत्व में इस मिल का संचालन तीन साल तक किया, सभी कर्मचारियों का पेमेंट कराया, मिल को फायदे में ले आए और इसके लिए सरकार से कोई आर्थिक मदद भी नहीं लिया। 1996 में आपकी नियुक्ति लोक सेवा आयोग में संयुक्त के रूप में हुई, जहां आपने 2001 तक काम किया, वर्ष 1998 में ही आप आइएएस कैडर के अधिकारी हो गए। वर्ष 2001 में आप इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के सचिव बनाए गए। फिर 2002 में जौनपुर के मुख्य विकास अधिकारी और इसी पद पर 2003 में इलाहाबाद में नियुक्त हुए। वर्ष 2005 में सुल्तानपुर के सीडीओ बने। वर्ष 2006 में विशेष सचिव समाज कल्याण बनाए गए, 2007 से 2011 तक विशेष सचिव लोक निर्माण विभाग रहे। वर्ष 2012 में राज्य राज्यमार्ग प्राधिकरण में मुख्य कार्यपालक अधिकारी बनाए गए। वर्ष 2012 में ही कानपुर में आयुक्त एवं प्रशासक राम गंगा कमाण्ड बनाए गए, यही से 2013 में सेवानिवृत्त हो गए।

पूरे कार्यकाल के दौरान वर्ष 2005 और 2008 में निलंबित भी किए गए। 2005 में इलाहाबाद सीडीओ रहने के दौरान निलंबित हुए थे, 40 दिन तक निलंबित रहे। वर्ष 2008 में जब वे विशेष सचिव समाज कल्याण थे, उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार थी। इसी समय डाॅ. श्रीकांत श्रीवास्तव की एक पुस्तक छपी, जिसका नाम था ‘सुल्तानपुर आज और कल’। इस पुस्तक की तारीफ में इष्टदेव प्रसाद की भी कुछ पंक्तियां छपी थीं, इसी पर उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। संस्पेंशन के खिलाफ़ हाईकोर्ट गए, जहां उनकी जीत है। इसके खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट गई, वहां से भी सरकार हार गई। जिसके बाद उनका संस्पेंशन समाप्त हुआ।

 इष्टदेव प्रसाद राय की तीन बेटियां और एक बेटा है। बेटा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है, तीन बेटियों की शादी हो गई है। वे वर्तमान समय में कमला नेहरु नगर में रहते हैं।


 (गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2020 अंक में प्रकाशित )



गुरुवार, 26 नवंबर 2020

जासूसी पात्रों के जनक हैं गोपाल राम गहमरी

                                                     

गोपाल राम गहमरी

                                                               - शहाब ख़ान गोड़सरावी

     जब कभी जासूसी कहानियों या उपन्यास का जिक्र होता है, तो सबसे पहले गोपाल राम गहमरी का नाम ही सामने आता है। इन्होंने जासूसी कहानियां लिखकर पाठकों के बीच जो अपनी पहचान बनाई है, उसके करीब आज तक कोई भी जासूसी कहानियों का लेखक पहुंच सका है। इनका जन्म सन् 1866 ई. में गाजीपुर जिले के बारा गांव में हुआ था, लेकिन बचपन से ही वो अपने ननिहाल गहमर गांव में रहे। जब वे छह माह के थे, तभी उनके पिता की प्लेग से मौत हो गई, इससे घबराकर मां अपने बेटे गोपाल को लेकर अपने मायके चली आईं और यहीं रहने लगीं। 

 गोपाल ने मीडिल तक की पढ़ाई गहमर के ही उर्दू माध्यम के मीडिल स्कूल से पूरी की। इसके बाद इसी स्कूल में चार वर्ष तक छात्रों को पढ़ाते रहे। सन.1883 में पटना नार्मल स्कूल में भर्ती हुए, जहां इस शर्त पर प्रवेश हुआ कि उत्तीर्ण होने पर मिडिल पास छात्रों को तीन वर्ष पढ़ाना पड़ेगा। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण इस शर्त को उन्होंने स्वीकार कर लिया। उनकी हिंदी की लिखावट काफी अच्छी थी, इसलिए उन्हें बलियां में खसरा जमाबंदी की पहली नौकरी मिल गई। 1889 में रोहतासगढ़ मिडिल स्कूल में हेडमास्टर नियुक्त हो गए। मगर, यहां भी वे टिक नहीं पाए और बंबई के प्रसिद्ध प्रकाशक सेठ गंगा विष्णु खेमराज के आमंत्रण पर 1891 में बंबई चले गए। फिर 1892 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के कालाकांकर से निकलने वाले दैनिक ‘हिन्दोस्थान’ में वे नियमित काॅलम लिखने लगे। 1893 में फिर मुंबई का रुख किया और वहां के समाचार पत्र ‘बंबई ब्यापार सिंधु’ एवं ‘भाषा भूषण’ का संपादन करने लगे। जब खेमराज जी ने ‘श्री वेंकटेश्वर समाचार’ नाम से समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू तो गहमरी जी इससे जुड़ गए। 

 इसी दौरान प्रयाग से निकलने वाले ‘प्रदीप’ (बंगीय भाषा) में ट्रिब्यून के संपादक नगेंद्रनाथ गुप्त की एक जासूसी कहानी ‘हीरे का मोल’ प्रकाशित हुई थी। गहमरी जी ने इस कहानी का हिंदी में अनुवाद कर श्री वेंकटेश्वर समाचार में कई किस्तों में प्रकाशित किया। यह जासूसी कहानी बहुत लोकप्रिय हुई। इसकी लोकप्रियता से उनके समझ में आ गया कि जासूसी कहानियों के पाठकों एक बड़ा वर्ग है। इससे प्रभावित होकर गोपाल राम गहमरी ने सन 1900 में ‘जासूस’ नाम से पत्रिका निकालना शुरू किया, तब वे ‘भारत मित्र’ का संपादन कर रहे थे, उन्होंने ‘जासूस’ निकालने की सूचना ‘भारत मित्र’ में दे दी थी। इसका लाभ यह हुआ कि सैकड़ों पाठकों ने प्रकाशित होने से पहले ही पत्रिका की सदस्यता ले ली। हालांकि इसके उसके हर अंक में एक जासूसी कहानी के अलावा समाचार, विचार और पुस्तकों की समीक्षाएं भी छपती थीं। ‘जासूस’ का पहला अंक बाबू अमीर सिंह के हरिप्रकाश प्रेस से छपकर आया और पहले ही महीने में पौने दो सौ रुपए की आमदनी पत्रिका बिक्री से हुई। इसकी अपार लोकप्रियता को देखकर गोपालराम गहमरी जब जासूसी ढंग की कहानियों और उपन्यासों के लेखन की ओर प्रवृत्त हो हुए तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह पत्रिका 38 वर्ष तक गहमर रेलवे स्टेशन के निकट स्थित उनकी कोठी से निकलती रही। गहमरी जी ने जासूसी विधा से हटकर आध्यात्मिक विषयक दो पुस्तकें लिखीं। ‘इच्छाशक्ति’ और ‘मोहिनी विद्या’ है। सैकड़ों कहानियों एवं दो सौ उपन्यासों के अनुवाद किए। रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘चित्रागंदा’ काव्य का भी अनुवाद पहली बार इन्हीं के द्वारा किया गया। गहमरी जी ने जासूस पत्रिका से खूब धन कमायें। इसके बीच उस समय की की पत्र-पत्रिकाएं ‘बिहार बंधु’, ‘भारत जीवन’, ‘सार सुधानिधि’ आदि में भी लिखते रहे। सन्.1906-08 के बीच ‘बिहार बंधु’ पटना में संपादन का कार्य किया। 

 गौतम सान्याल ने हंस के एक विशेषांक में लिखा कि - ‘प्रेमचंद के जिस उपन्यास को पठनीयता की दृष्टि से सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, उस ‘गबन’ की अनेक कथा स्थितियां एक विदेशी क्राइम थ्रिलर से मिलती-जुलती हैं और जिसका अनुवाद गोपालराम गहमरी ने सन.1906 में जासूस पत्रिका में कर चुके थे।’ गोपालराम गहमरी ने जासूस की चोरी, खूनी का भेद, जमुना का खून, मालगोदाम में चोरी सहित कुल 88 उपन्यास, 6 नाटक एवं 9 कहानियां लिखने के साथ बंगला पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया है। वे अपने आखिरी दिनों में वाराणसी स्थित बेनियाबाग में रहने लगे थे, वहीं से अपनी जासूसी नामक पत्रिका का प्रकाशन करते रहे। उनका स्वर्गवास 20 जून 1946 को काशी में हुआ। सन 1965 ई० में गहमर के स्थानीय सात सदस्य टीम द्वारा उनकी याद में गोपालराम गहमरी सेवा संस्थान की स्थापना हुई। गोपालराम के करीबी मित्र सत्यनारायण उर्फ नन्दा और पद्मश्री डॉ. कपिल देव द्विवेदी द्वारा लिखी पुस्तक ‘गहमर खोज’ गहमरी जी पर ही आधारित है। गोपालराम गहमरी की याद में अखंड प्रताप गहमरी प्रत्येक वर्ष के सितंबर माह में कार्यक्रम का आयोजन करते हैं, जिसमें देशभर से साहित्यकार आते हैं। जमानियां के संजय कृष्ण की गोपालराम गहमरी पर अबतक चार किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2020 अंक में प्रकाशित)


सोमवार, 23 नवंबर 2020

काॅमरेड ज़ियाउल हक़ ने दुनिया को अलविदा कहा

काॅमरेड ज़ियाउल हक़
                                                                     
                                                                          - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
 22 नवंबर की दोपहर 100 वर्ष की उम्र में ज़िया भाई ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया है। 28 सितंबर 1920 को इलाहाबाद के दोंदीपुरी मुहल्ले में जन्मे श्री ज़ियाउल हक़ के पिता का नाम सैयद जीमल हक़ है। तीन भाई-तीन बहनों में आप सबसे बड़े थे। प्राइमरी तक की शिक्षा घर में ही हासिल की। गर्वमेंट कालेज में कक्षा पांच से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई पूरी की। 1940 में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही कम्युनिष्ट पार्टी से जुड़ गए थे। इन्हें पार्टी के अंडरग्राउंड काम के लिए नामित किया। इस काम को अंज़ाम देने के लिए इन्होंने बिना किसी को बताये ही अपना घर छोड़ दिया। तत्कालीन पोलित ब्यूरो सदस्य आरडी भारद्वाज के साथ पार्टी का काम करने के लिए इन्हें लगाया, घर छोड़ते ही इनके परिवार में कोहराम मच गया। इनके वालिद ने अपने सू़त्रों से बहुत खोज की इनकी, घर के बड़े लड़के के ही अचनाक लापता हो जाने से परिवार काफी परेशान हुआ। आप श्री भारद्वाज के लिए आने वाले डाक और उनके निदेर्शों को उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में पहुंचाने का काम करते रहे। इनके पिता ने इनके रहने के ठिकाने का पता लगा लिया और कम्युनिष्ट पार्टी के उस समय के बड़े नेता अजय घोष पर दबाव बनाया कि उनके लड़के को घर के लिए रवाना कर दिया जाए। छह महीने अंडरग्राउंड रहने के बाद वे घर लौट आए। लेकिन अंडरग्राउंड रहने के कारण इनका नाम सीआईडी में आ गया, जिसकी वजह से इनका घर में रहना मुमकिन नहीं था। इसी कारण फ़ैज़ाबाद में रहने वाले अपने मामू के यहां चले गए, फिर कुछ दिनों बाद इलाहाबाद लौटे और फिर एलएलबी भी किया। सन 1941-42 में देश में राजीनतिक बदलाव आया। कम्युनिष्ट पार्टी को कानूनी मान्यता भी मिल गई। 1942 में कम्युनिष्ट पार्टी का जीरो रोड पर कार्यालय खुला, कार्यालय खुलते ही एक बार फिर इन्होंने घर छोड़ दिया और पार्टी कार्यालय में ही रहने लगे। फिर पार्टी का कार्यालय जानसेनगंज में खुला, जो आज भी कायम है, यहीं आप रहने लगे, इस दौरान इन्हें पार्टी की तरफ से 15 रुपए प्रति माह वेतन मिलने लगा। 1947 तक इसी दफ्तर में काम करते रहे। 1948 में आप तीन महीने नैनी जेल में रहे, कांग्रेस ने कम्युनिष्ट पार्टी पर यह इल्जाम लगाते हुए इनके साथ अन्य लोगों को जेल भिजवा दिया, ये लोग कांग्रेस की हुकुमत नहीं बनने दे रहे हैं। विभिन्न मामलों केा मिलाकर श्री हक़ कुल तीन बार नैनी जेल गए। इसी दौरान बीमारी के चलते इनके छोटे भाई का इंतिकाल हो गया। इनके पिता पर बहुत दबाव पड़ने लगा कि वे परिवार के साथ पाकिस्तान चले जाएं, पिता के बहुत से दोस्त अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए थे। ऐसे में पिता परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए, लेकिन श्री ज़ियाउल हक़ यहीं रहे। आज भी आपकी तीन बहनें और एक भाई अपने परिवार के साथ पाकिस्तान में रहते हैं। 1952 में आम चुनाव हुआ, कांग्रेस की सरकार बनी। कम्युनिष्ट पार्टी दूसरे नंबर पर रही। पार्टी का उर्दू अख़बार ‘हयात’ शुरू हुआ तो आपको दिल्ली भेज दिया गया। फिर अंग्रेज़ी साप्ताहिक ‘न्यू ऐज़’ के लिए आपको विशेष संवाददाता बनाया गया। इस दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू का प्रेस कांफ्रेंस भी कवर करते रहे। 1955 में वल्र्ड यूथ फेस्टेविल का आयोजन ‘पौलैंड’ में किया गया, आप वहां कवरेज करने गए। वहीं से पूरा इंडियन डेलीगेशन मास्को गया। उस समय वियतनाम की लड़ाई जारी थी। कम्युनिष्ट पार्टी के सचिव अजय घोष उन दिनों मास्को में थे, उन्होंने आपको वियतनाम भेज दिया। तीन महीने वियतनाम में रहे। फिर सोवियत संघ और जर्मनी में भी ख़बरें कवरेज करने गए। 1960 में सोवियत संघ और अमेरिका के राष्टृपति की बैठक पेरिस में होनी थी, इसको कवर करने के लिए आपको भेजा गया। बैठक से ठीक पहले सोवियत संघ के राष्ट्रपति ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि आपने जासूसी करने के लिए मेरे देश में प्लेन भेजा था, जिसे हमने मार गिराया है, इसके लिए आपको माफी मांगनी पडे़गी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने माफी मांगने से इनकार कर दिया, जिसके वजह से बैठक नहीं हुई। फिर रूस में लेनिन की सौवां सालगिरह पर वहां गए। रसियन ऐम्बेसी ने भारत के तीन सीनियर पत्रकारों को इस मौके पर बुलाया था। इन लोगों में निखिल चतुर्वेदी और ए. राघवन के साथ जियाउल हक़ भी थे। 1978 में अंतिम बार रूस गये।1963-64 में क्यूबा में आजादी के पांचवीं वर्षगांठ पर भी आपको बुलाया गया। फिर कम्युनिष्ट पार्टी में फूट गई। आप भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी में रहे। जनवरी 1965 में आपने विवाह कर लिया और इसके कुछ ही दिनों फिर से इलाहाबाद लौट आए। इस दौरान बीच-बीच में अपने भाई-बहनों और उनके परिवार से मिलने पाकिस्तान भी जाते रहे। अंतिम बार 2005 में भाई के बेटे की शादी में पाकिस्तान गए थे।

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

साहित्यिक प्रतिभा से होता है रेलकर्मियों का मानसिक विकास: डीआरएम

बाएं से: मनमोहन सिंह तन्हा, अमिताभ और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

29 जून 1966 को स्वर्गीय रामेश्वर दयाल अग्रवाल के घर जन्मे अमिताभ वर्तमान समय में प्रयागराज रेल मंडल के मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) हैं। इन्होंने मैकेनिल इंजीनियरिंग में स्नातक और इंजीनियरिंग आॅफ प्रोडक्शन एवं मशीन-एक्वीपमेंट में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल किया है। आप आईआरएसएमई के 1987 बैच के अफसर हैं, सेलेक्शन के बाद रेलवे में विभिन्न पदों पर काम करते हुए 18 अप्रैल 2018 से प्रयागराज के मंडल रेल प्रबंधक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ‘रेलकर्मी विशेषांक’ के लिए उनका इंटरव्यू लेने इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और मनमोहन सिंह तन्हा  01 जून 2020 को उनके दफ्तर पहुंचे। मौजूद हालात में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए उनसे बातचीत की गई। प्रस्तुत है उस बातचीत के संपादित अंश।

सवाल: रेलकर्मियों के लेखन को किस रूप में देखते हैं ?

जवाब: रेलकर्मी बहुत ही मुश्किल हालात में 24 घंटे लगकर काम करते हैं, बहुत मेहनत और लगन से अपनी ड्यूटी का निर्वहन करते हैं। लेकिन किसी प्रकार की साहित्यिक प्रतिभा से उनका मानसिक विकास होता है, इससे उन्हें अपने नियमित काम करने में भी सहायता मिलती है। लेखन वही लोग करते हैं जो समाज और देश को लेकर संवेदनशील होते हैं, उनके अंदर अच्छी भावनाओं होती है। इससे मन का भी विकास होता है, ऐसे लोग बेहतर कर्मचारी भी होते हैं। रेलवे की तरफ से विभिन्न आयोजन होते रहते हैं, जिनमें रेलकर्मियों और उनके बच्चों को प्रोत्साहित करने का काम किया जाता है। कला और साहित्य के क्षेत्र में करने वाली विभिन्न प्रतिभाओं को पुरस्कृत किया जाता है।

सवाल: गुफ़्तगू के रेल कर्मी विशेषांक को किस प्रकार से देखते हैं ?

जवाब: यह बहुत अच्छा प्रयास है। रेलकर्मियों का जो साहित्यिक रूझान है उन्हें प्रोत्साहित करने का यह अच्छा प्रयास है, जो भी साहित्य के पाठक हैं, उनको पढ़कर अच्छा लगेगा। रेलेकर्मियों के लिए अच्छी बात हैं कि उनके लेखन को प्रकाशित करके तमाम पाठकों तक पहुंचाया जा रहा है, यह बहुत अच्छी बात है। रेलकर्मियों की रचना को किसी पत्रिका में स्थान मिलना भी बहुत महत्वूपर्ण है।

सवाल: सोशल मीडिया ने साहित्य सृजन और मानसिक विकास पर कितना प्रभाव डाला है ?

जवाब: सोशल मीडिया पर अधिकांश मैसेज फारवर्डेड होते हैं, मूल मैसेज बहुत कम होते हैं। अगर 1000 मैसेज आते हैं तो इनमें 10 ही मूल मैसेज होते हैं। सोशल मीडिया में उलझने का काम ज़्यादा होता है, मानसिक विकास की जगह मानसिक उलझन ज़्यादा होती है, मानसिक विकास की संभावना काफी कम हो जाती है। जब आप सोशल मीडिया पर लगातार चीज़ों को देखते और पढ़ते रहते हैं तो अंदर की प्रतिभा निकलकर आने की संभावना बहुत कम हो जाती है। सोशल मीडिया का प्रयोग लोग बहुत ही सावधानी से करें, जितनी आवश्यकता है उतनी ही करें, केवल कामभर का करें। हर प्रकार की ख़बरें हैं यहां, अगर बुरा देखेंगे, बुरा पढ़ेंगे, निगेटिव चीजों के बीच रहेंगे तो आपके अंदर निगेटिव चीज़ें ही आएंगी। इसलिए बहुत सावधानी की आवश्यकता है। अच्छी चीजों को देखेंगे, पढ़ेंगे तो अच्छा काम करेंगे।  

सवाल: प्रयागराज साहित्य का गढ़ रहा है, डीआरएम के रूप में आपने इसे किस प्रकार महसूस किया है ?

जवाब: मैं प्रयागराज में ही पैदा हुआ, यहीं पला, बढ़ा हूं। मेरी माता जी 2018 में गुजर गई थीं। यहीं डीपी गल्र्स इंटर काॅलेज में हिन्दी की प्राध्यापिका थीं। वो साहित्य से बहुत जुड़ी हुई थीं, महादेवी वर्मा समेत तमाम लोगों का आना-जाना था मेरे यहां। इस वजह से साहित्य के बड़े-बड़े लोगों से मिलना हुआ। निश्चित रूप से प्रयागराज साहित्य का बहुत बड़ा गढ़ है, यहां की हवा साहित्य लेखन में सहायक है। यहां साहित्य का बहुत अच्छा माहौल है।

सवाल: वर्तमान समय में समाज पर साहित्य लेखन का असर पड़ता है ?

जवाब: निश्चित रूप से असर पड़ता है। समाज पर लेखन का असर बहुत पड़ता है। जिस चीज़ को आप लिखेंगे उसे अधिक से अधिक लोग पढ़ेगे। जैसे सोशल मीडिया पर अच्छी चीज़ों को पढेंगे, अच्छी चीज़ों का चयन करेंगे पढ़ने के लिए तो बहुत अच्छा प्रभाव पड़ेगा। ज़रूरी है कि अच्छे लेखन को सोशल मीडिया और अख़बारों-पत्रिकाओं में सही जगह मिले। रचनाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए। हर कोई लिखने में सक्षम भले ही न हो लेकिन उसे पढ़कर लेखक की भावनाओं को कुछ हद तक समझकर उससे प्रभावित भी हो सकता है। ज़रूरी है कि अधिक से अधिक अच्छा लेखन हो।

सवाल: सोशल मीडिया की वजह से अख़बार, पत्रिका और किताबें पढ़ने की प्रवृत्ति कम हो रही है। इसका समाज पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा ?

जवाब: समय बदल रहा है। पहले मोटी-मोटी किताबें होती थीं, लंबे-लंबे लेख होते थे, बड़ी-बड़ी कहानियां होती थी, उपन्यास होेते थे। लेकिन यह शार्ट और स्वीट का समय है। आज की तारीख में अगर कोई हमारे काम पर फिल्म बनाकर भेजता है, काम को दिखाने का प्रयास करता है तो मैं कहता हूं की छोटे-छोटे पार्ट में ही भेंजे। अगर वो आठ या दस मिनट का होता है तो मैं कहता हूं कि उसे दो-दो मिनट का बनाकर भेजंे। आज की तारीख में इतना कुछ बाज़ार में है कि कोई एक ही चीज़ पर अधिक समय नहीं दे सकता है। आप बहुत लंबा समय नहीं निकाल सकते, पूरे उपन्यास को खतम करना बहुत मुश्किल है, लेकिन अगर वह लधुकथा के रूप में हो तो उसे ज़्यादा लोग पढ़ते हैं। रचनाकारों को भी ख़्याल रखना पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि उपन्यासों पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम हो जाएगी, अभी भी बहुत लोग हैं जो समय निकालेंगे। लेकिन जो युवा वर्ग है और जो एक्टिव लोग हैं, वो बड़े-बड़े लेख और उपन्यास नहीं पढ़ पाते। जो बुजुर्ग हैं, रिटायर हो गए हैं, उपन्यास पढ़ रहे हैं तो अच्छी बात है। लेकिन वो कमांडिंग जोन में नहीं हैं। जो सक्रिय लोग हैं उनके लिए बड़े उपन्यास पढ़ना संभव नहीं हैं। स्पोर्ट्स में भी देखिए 20-20 मैच का प्रचलन ज्यादा बढ़ा है, क्योंकि पूरा दिन एक मैच देखने पर देना बहुत ही मुश्किल है। शार्ट फिल्में भी बहुत अधिक संख्या मंें बनने लगीं है, जिन्हें खूब देखा जा रहा है।

सवाल: कोरोना काॅल में रेलवे आमलोगों की किस प्रकार मदद कर रहा है ? क्या यह मदद पर्याप्त है ?

जवाब: कोराना संक्रमण वैश्विक महामारी है, इस महामारी में सरकारें, संस्थाएं और व्यक्तिगत तौर पर मदद करने वाले लोग चाहे जितनी मदद कर लें उतना कम है, इसमें कमी रहेगी। हमेशा ही कुछ न कुछ कमी रहेगी। ऐसे माहौल में हम सबको काम भी करना है और बहुत संभालकर काम करना है। यह समय सभी लोगों के लिए चैलेंज है, क्योंकि सबको काम भी करना है और अपने आपको बचाकर काम करना है। यह सभी को ध्यान में रखना है। रेलवे ने बहुत काम किया है, बहुत सी श्रमिक स्पेशल गाड़ियां, माल गाडियां आदि चलाई हैं। पूरा विभाग लगा हुआ है लोगों की मदद के लिए।


( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2020 अंक मेें प्रकाशित )


शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2020

फ़राज़ ने अमेरिका में लहराया क़ाबलियत का परचम

                                                 

फ़राज़ ज़ैदी

       

                                                    -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 जब पूरी दुनिय कोरोना के कह्र कांप उठी है, कहीं कोई ख़ास और उपाय इसके खि़लाफ़ नहीं दिख रहा है। ऐसे में इलाहाबाद के फ़राज़ ज़ैदी ने अमेरिका में अपनी क़ाबलियत का परचम लहराते हुए आस की किरण दिखाई है। अमेरिका में कोविड-19 को मात देने के लिए वैक्सीन के इजाद का काम शुरू किया गया है। 25 वैज्ञानिकों की एक टीम बनाई गई है, जिसमें दुनियाभर के कई देशों के वैज्ञानिक शामिल हैं। इस टीम के नेतृत्व की जिम्मेदारी फ़राज़ ज़ैदी को सौंपी गई है। हमारे लिए गर्व की बात यह है कि फ़राज़ ज़ैदी अपने इलाहाबाद के हैं।

 फ़राज़ का जन्म इलाहाबाद के शौक़त अली मार्ग पर मजीदिया इस्लामिया काॅलेज के पास स्थित उसके ननिहाल में हुआ था। इनका पैतृक गांव फूलपुर तहसील का कपसा है, मगर फ़राज़ का घर करैली में भी है। इनके माता-पिता के जीवन का अधिकतम समय यहीं बीता है। फ़राज के एक और भाई हैं, उनकी कोई बहन नहीं है। इनके पिता डाॅ. इक़बाल जै़दी मुंबई में एक मशहूर चिकित्सक हैं, इसी वजह से फ़राज़ की प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में ही हुई। डाॅ. इक़बाल ज़ैदी मोती लाल नेहरु काॅलेज के छात्र रहे हैं। 1978 में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद मंुबई चले गए। डाॅ. सरिता बजाज, डाॅ. एके बंसल और डाॅ. आनंद मिश्र जैसे लोग इनके सहपाठी रहे हैं। फ़राज़ ज़ैदी ने शुरूआती तालीम के बाद पुणे के डीवाई पाटिल इंस्टीट्यूट आॅफ बायोटेक्नोलाॅजी एंड बायोइंडोफार्मेटिंग से बी-टेक की डिग्री हासिल किया। इसके बाद फिलाडेल्फिया के यूनिवर्सिटी आॅफ साइंस से सेल एंड बायोलाॅजी में मास्टर डिग्री हासिल किया। वर्तमान समय में विस्टार इंस्टीट्यूट में प्रोजेक्टर मैनेजर हैं, यह पिछले छह सालों से सेवा प्रदान कर रहे हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध संस्थान है, यहीं से रुबेला, रैबीज और जीका के वैक्सीन का इजाद किया गया था।

 समाजवादी पार्टी के नेता मुश्ताक़ काज़मी ने बताया कि ‘वर्ष 2017 में मेरे बेटे की शादी में शामिल होने के लिए फ़राज़ इलाहाबाद आए थे, उसके बाद उनका आना नहीं हो पाया, वे अमेरिका में बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। कभी-कभार ही उनका भारत आना होता है।’ किसी भी वैक्सीन को तैयार करना बेहद कठिन और गंभीर काम है। जनवरी 2020 से ही कोविड-19 का वैक्सीन बनाने के लिए फ़राज़ अपनी पूरी टीम के साथ दिन-रात जुटे हुए हैं। इन्होंने जो वैक्सीन तैयार कर लिया है और इसका जानवरों पर प्रयोग भी किया जा चुका है। पहले चरण में चूहों पर किया प्रयोग सफल बताया गया है। इसके बाद बंदरों पर प्रयोग किया गया, इन पर भी प्रयोग सफल रहा। अब इसका मनुष्यों पर ट्रायल शुरू कर दिया गया है। 250 से अधिक लोगों पर इसका प्रयोग किया। अब आगे की जंाच और प्रयोग के बाद इसका ठीक-ठीक पता लग सकेगा कि यह वैक्सीन पूरी तरह से सफल है या अभी और जांच और लैब टेस्ट आदि की ज़रूरत पडे़गी। पिता डाॅ. इक़बाल का कहना है कि कोविड-19 वैक्सीन के काम में जुट जाने के कारण फ़राज़ बहुत अधिक व्यक्त हैं, उनसे कम ही बात हो पाती है।

(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2020 अंक में प्रकाशित )



बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

गुफ़्तगू के प्रशासनिक सेवा विशेषांक (सितंबर-2020 अंक) में

 


3. संपादकीय (साधना से कम नहीं प्रशासनिक सेवा की रचनाएं)
4. डाक
5-10. ग़ज़लगोई की हक़ीक़त क्या है? - जोश मलीहाबादी
11-14. सरकारी-प्रशासनिक सेवा और रचनाकर्म - रविनंदन सिंह
15-35. ग़ज़लें (शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी, नज़र कानपुरी, डाॅ. हरिओम, मनीष शुक्ला, नरेंद्र कुमार सिन्हा, केके सिंह मयंक, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, ओम धीरज, इश्क़ सुल्तानपुरी, डाॅ. राकेश तूफ़ान, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, अंजु सिंह गेसू, अनुराग मिश्र ग़ैर, अजीत शर्मा आकाश, फ़रमूद इलाहाबादी, नायाब बलियावी, अमन वर्मा, शैलेंद्र जय, डाॅ. अंजना सिंह सेंगर, तामेश्वर शुक्ला तारक, डाॅ. बिपिन पांडेय)
36-38. दोहा ( अरुण अर्णव खरे, पंकज राहिब, राजपाल सिंह गुलिया)
39-51. कविताएं ( यश मालवीय, शैलेंद्र कपिल, कृष्ण कुमार यादव, शिव कुमार राय, प्रकाश चंद्र तिवारी, विनय कुमार पांडेय, गौरव वाजपेयी स्वप्निल, डाॅ. मीना कुमारी परिहार, सम्पदा मिश्रा, केदारनाथ सविता, श्रीराम तिवारी, संजय सक्सेना, जावेद आलम खान)
52-54. इंटरव्यू: पवन कुमार
55-56. चौपाल (प्रशासनिक सेवा में रहते हुए साहित्य के लिए कैसे समय निकालते हैं?)
57-58. तब्सेरा ( महिला काव्य का प्रतिनिधित्व करतीं पुस्तकें- अजीत शर्मा आकाश )
59-60. उर्दू अदब
61-62. गुलशन-ए-इलाहाबाद: इष्टदेव प्रसाद राय
63-64. ग़ाज़ीपुर के वीर-11: जासूसी पात्रों के जनक हैं गोपाल राम गहमरी
65. खि़राज़-ए-अक़ीदत: राहत इंदौरी को दोहरान नामुमकिन - प्रो. वसीम बरेलवी
66. खि़राज़-ए-अक़ीदत: कई भाषाओं के जानकार थे प्रो. फ़ज़ले इमाम - डाॅ. रेहान हसन
67-71. अदबी ख़बरें
!! परिशिष्ट-1: विजय प्रताप सिंह !!
72. परिचय - विजय प्रताप सिंह
73-75. गांव-देहात के जीवन की स्मृतियां - बलभद्र
76. दुष्यंत की परंपरा के ध्वजवाहक हैं विजय प्रताप- प्रभाशंकर शर्मा
77-78. अपनी ओर आकर्षित करती हैं विजय की ग़ज़लें- अर्चना जायसवाल
79-80. समाज का आईना है विजय प्रताप का काव्य- अफ़सर जमाल
81-95. विजय प्रताप की ग़ज़लें
96-103. विजय प्रताप की कविताएं
!! परिशिष्ट-2: मासूम रज़ा राशदी !!
104. मासूम रज़ा राशदी का परिचय
105. मुहावरा बना देने वाली शायरी करते हैं राशदी- यश मालवीय
106-107. फ़न की फरावानी से भरपूर, रसपूर ग़ज़लें - डाॅ. मधुर नज़्मी
108-109. ग़ज़लों से रूहानी मोहब्बत का पैग़ाम- डाॅ. नीलिमा मिश्रा
110. ग़ज़ल का होनहार शायर मासूम रज़ा राशदी- डाॅ. इम्तियाज़ समर
111. अलग अंदाज़ की शायरी करते हैं राशदी- मनमोहन सिंह तन्हा
112-136. मासूम रज़ा राशदी की ग़ज़लें
137-144. कवि और कविता (राहत इंदौरी, विज्ञान व्रत, संजय मासूम, दयाशंकर प्रसाद)

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

मुशायरों के बेताज़ बादशाह थे ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी


 

ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी


                                                               - शहाब ख़ान गोड़सरावी
   
 उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित ग़ाज़ीपुर जिला कई मायने में बहुत ख़ास है। सेना और पुलिस में तो यहां के नौजवनों की तादाद काफी है ही, कलम से भी अपना जौहर दिखाने वालों की तादाद भी काफ़ी है। कई ऐसे लोगा भी हैं जो पूरे देश में अपनी कलमकारी के लिए विख़्यात रहे हैं। इनमें राही मासूम रज़ा, गोपाल राम गहमरी, भोलानाथ गहमरी, हारून रसीद और ख़ामोश ग़ाज़ीपुर समेत अनेक नाम शुमार हैं। आमतौर पर शिक्षा के मामले में ग़ाज़ीपुर को पिछड़ा माना जाता रहा है, इसके बावजूद कुछ लोगों ने अपनी क़ाबलियत का जौहर इस तरह से पेश किया कि तो लोग ‘वाह-वाह’ किए बिना नहीं रह पाते। इन लोगों में से ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का एक ख़ास मुकाम है, जिन्होंने अपनी ग़ज़लों को खुद के ही शानदार तरंनुम में पेश कर लोगों को वाह-वाह करने के लिए मज़बूर किया। अपने समय में ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी जिन मुशायरों में जाते उसे कामयाब बनाने की जमानत बन जाते। 
मुजफ़्फ़र हुसैन उर्फ़ ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी का जन्म 20 जुलाई 1932 ई० को गाजीपुर शहर के मुहल्ला सट्टी मस्जिद में हुआ था। आपके पिता मुनव्वर हुसैन नेक परहेजगार इंसान थे। ख़ामोश की शुरूआती तालीम घर व मदरसे में कुरआन मजीद से शुरू हुई। उसके बाद मदरसा चश्म-ए-रहमत ओरियंटल कॉलेज गाजीपुर से मुन्शी, फारसी, उर्दू, अव्लव दर्जे से हाईस्कूल पास किए। सन 1953 में जामिया उर्दू अलीगढ़ से अदीब-ए-माहिर और अदीब-ए-कामिल की डिग्री लेकर मदरसा चश्म-ए-रहमत में ही अध्यापन कार्य करने लगे। सन 1953-56 के बीच चश्म-ए-रहमत कॉलेज में तीन साल उर्दू के अध्यापक रहे। शादी के बाद तीन बेटे और एक बेटी के बाप बने। उन्हें बचपन से ही शायरी का शौक़ था। सन 1956 के बाद कॉलेज छोड़ने पर मुशायरों में कलाम पेश करना शुरू कर दिया। मुशायरों में मिलने वाले पारिश्रमिक को ही अपनी रोजी-रोटी का ज़रिया बना लिया। उन्होंने अपनी शायरी का उस्ताद शुरू में अबुल गौस ग़ा़जीपुरी को बनाया। उनके वफ़ात के बाद सरोश मछलीशहरी के शागिर्द हो गए। जब वे मुशायरों में दाखिल हुए तो वह 

साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, फैज अहमद फैज, कैफी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी का दौर था, उस समय उन्होंने इन सबसे अलग ख़ास पहचान बनाई। अपनी बेहतरीन ग़ज़लों और शानदार तरंनुम की वजह से वे मुशायरों का धड़कन कहलाने लगे। वे जब जब मुशायरों के मंच पर आकर ग़ज़लें पढ़ना शुरू करते तो महफिल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठतीं। मुशायरों में इतने अधिक मक़बूल हो गए कि महीनों सफ़र में रहते। 
मुगल-ए-आज़म फिल्म में एक गीत है- 
हमें काश  तुम से  मुहब्बत  न होती,   कहानी  हमारी  हक़ी़कत  न  होती। 
न दिल तुम को देते न मजबूर होते, न दुनियां  न दुनियां के  दस्तूर  होते 
क़यामत से पहले क़यामत न होती।
यह गीत फिल्म के शकील बदायूंनी के नाम से है। जबकि इसके असली शायर ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की है जो मशहूर शमा पत्रिका के सितंबर 1951 में छपी थी। तब शायर शकील बदायूंनी ख़ामोश के दोस्त वकील इशरत जाफरी, भूरे बाबू, मौलवी फैयाज सिद्दीक़ी, चश्म-ए-रहमत के उस्ताद ख़लिश ग़ाज़ीपुरी ने ख़ामोश के लाख मना करने के बावजूद एक नोटिस रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेज दी। तुरंत शकील साहब ने मुंबई से दो अपने आदमियों को भेजा। जो ख़ामोश साहब से आकर मिले और एक बन्द लिफाफा दिया। उसमे अपनी दोस्ती का हवाला देते हुए लिखा कि मेरी इज़्ज़त चाहे तो उछाल दो या बदनामी से बचा लो, अब आपके हाथ में है। उस बन्द लिफाफे में बदायूंनी साहब ने 3500 रुपये भेजे थे। 49 वर्ष की उम्र में 11 अक्टूबर सन 1981 को इस दुनियां-ए-फानी को अलविदा कह गये।खामोश की आखि़री आरामगाह गाजीपुर स्थित इमामबाड़ा कब्रिस्तान में है। सन 1985 में ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी की ग़ज़ल संग्रह ‘नवा-ए-खामोश’ उनके सहयोगी साथी ख़लिश ग़ाज़ीपुरी, मंजर भोपाली वगैरह बड़े शायरों द्वारा स्थापित संस्था ‘बज़्म-ए-ख़ामोश’ के मेम्बरान के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुआ। उनका यह शेर शायरी की दुनिया में बेहद मक़बूल है। 
             मैं वो सूरज हूं न डूबेगी कभी जिसकी किरन,
             रात  होगी  तो  सितारों  में  बिखर  जाउंगा।
(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2020 अंक में प्रकाशित )





शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

‘पहले से भी दीन दशा में हैं होरी, धनिया और हल्कू’

प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर गुफ़्तगू का वेबिनार
प्रयागराज। गुफ़्तगू की ओर से 30 जुलाई की शाम मुंशी प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर वेबिनार का आयोजन किया गया, वेबिनार का विषय था ‘प्रेमचंद की कहानियां के पात्र आज कितने प्रासंगिक’। मशहूर कथाकार ममता कालिया ने कहा कि किसे पता था कि प्रेमचंद के होरी धनिया और हल्कू आज पहले से भी दीन दशा में हमारे समाज में दिखाई देंगे। कम से कम तब वे जीवित तो थे। आज बेचारे पेड़ों पर लटके हुए हैं खुदकुशी करने को मजबूर हैं।
मशहूर साहित्यकार नासिरा शर्मा ने कहा कि मुंशी प्रेमचद्र की कहानियों और उनके उपन्यास पर सवाल करना तब वाजिब बनता है जब हिंदुस्तान मंे हर वर्ग ने करवट बदल ली हो, और उसका मुखड़ा बदल गया हो। कहने का मतलब ही कि ऊपरी पहनावा तो लोगो का बदल गया है, अब हाथों में मोबाइल आ गया है, फैशनबल कपडे भी लोगो ने पहन लिये हैं। दिखावे के बाज़ार ने घर भी सजा दिये है। अब तो निम्न से निम्न वर्ग भी मैगी खाता है, मतलब, जिस बात को प्रेमचंद ने इंगित किया है वो इंसान की प्रवृत्ति नहीं बदली है, और न ही हालात बदले हंै। इसलिये मुझे तअज्जुब होता है, जब लोगो से कहते सुनती हूं कि आज के दौर में प्रेमचंद जी की कहानियां प्रासंगिक नही है। तो मैं आश्चर्य के साथ सोचती हूं कि वो कहानी या उपन्यास में किस चीज़ को देखकर ऐसी बात करते हैं। ऊपरी दिखावे को, प्रवृतियों को, हालात को या लापरवाहियों को। करप्शन मौजूद है, किसान पहले आत्महत्या नहीं करते थे अब कर रहे हैं, और अब तो डॉक्टर, पत्रकार भी सुसाइड कर रहे हैं। वजह क्या है? मेरे ख्याल से अगर प्रेमचंद जी होते वे इसके बारे में भी लिखते। हिंदुस्तान के मौजूदा हालात पर परत दर परत नीचे जाकर उसमें हमेशा प्रेमचंद सांसे लेंगे। इसलिए मैं प्रेमचंद के अदब को बहुत ही ज़्यादा इज़्ज़त से देखती हूं। उन्होंने ने अपने समय के नब्ज़ को बहुत ही संवेदनशील अंदाज़ से अपनी अंगुलियों को रख कलम चलाया है। मुझे आज खुशी है कि उनके लिये आज मै कुछ कह रही हूं, क्योकि हमेशा उनकी कहानियां मेरे लिये बहुत ज़्यादा राह को रोशन करने वाली हुई है। मैं हमेशा कहती हूं कि मेरा नज़रिया बदला है, अगर मैं बूढ़ी काकी न पढ़ती तो मेरा नजरिया क्या था बचपन में। बहरहाल मुझे एक नई रोशनी मिली कि बुजुर्गों के साथ क्या और कैसा बर्ताव होना चाहिए। बडे घर की बेटी पढ़ी तो लगा कि सब चीज़ों के बाद भी घर नहीं टूटना चाहिये, और आज के संदर्भ में कहूंगी की रिश्ते नहीं टूटने चाहिए। ईदगाह पढ़ के भी अनुभव हुआ कि संवेदना कहां हंै गहरी। एक बच्चा है, जो रोज दादी का हाथ जलता देखता है।दूसरों के घरों में चिमटा देखता है। तो ये तीन मेरी पसंदीदा कहानियां हैं। अगर हम हिंदुस्तान के इंटेरीरयर में जाएं तो उनकी कहानियों के पात्र जिन्दा मिलेंगे। बड़े घर की बेटी में रिश्तो के संजोने की तथा छोटे मोटे झगड़े सुलझाई या दिखलायी गयी है वो बडे पैमाने पर भी दिखाई पड़ती है। जो विश्व स्तर पर हो रहा है क्योंकि वो घर से शुरू होकर विश्व स्तर तक ले जाता है। देखिए, जहां संवाद होना चाहिए वहां लड़ाइयां हो रही हैं जो बात वेबिनार से तय हो सकती है। वहां हथियार के इस्तेमाल हो रहा है। तो कहानियां कई तरीके से अपने को खोलती है। वो ज़मीनी बात करती है ऐसी सोच देती हैं, यहां तक कि विश्व स्तर की परेशानियो मे भी जाकर मिल जाती है। और प्रासंगिक है। इसलिए प्रेमचंद को हर काल मे पढ़ने और समझने की ज़रुरत होगी और नए तरीके से होगी
मशहूरश की मौजूदा हालात में मुंशी प्रेमचंद के किरदारों को लौटने में पचास शायर मुनव्वर राना के मुताबिक दे साल से अधिक लग जाएंगे, देश का माहौल नफ़रत से भरा हुआ बना दिया गया है। ऐसे में वे पात्र फिर से नहीं लौटने वाले। प्रेमचंद के गरीब, मजदूर, लाचार पात्र भी उनकी कहानियों में बादशाह की तरह मुख्य किरदार में होते थे, जिनका आज के समाज में लौटना लगभग नामुमकिन है।
फिल्म संवाद लेखक संजय मासूम ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियां और उनके सारे पात्र आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने वे अपने रचना समय में थे। वक़्त बदलने के साथ बदलाव तो बहुत हुए हैं, लेकिन जो ज़मीनी लेवल पर हर क्षेत्र में बदलाव होना चाहिए, वो नहीं हुआ है। किसानों की हालत बहुत ज्यादा वैसी है, मजदूरों की भी वैसी ही है। गांव में आप चले जाइए, तो जो व्यवस्थाएं हैं, जाति को लेकर, रुतबे को लेकर, वो ऑलमोस्ट लगभग वैसी ही हैं। कहने को तो कागज़ों पर काफी कुछ हुआ है, लेकिन स्थितियां कुल मिलाकर वैसी ही हैं। तो मुझे लगता है कि प्रेमचंद के सारे पात्र आज भी बहुत प्रासंगिक हैं। मेरा मानना है कि अमर रचनाकार जो भी होता है, वह समय से परे होता है।
इम्तियाज अहमद गाजी ने कहा कि प्रेमचंद के पात्र आज भी समाज में हमारे सामने खड़े हैं, उनकी समस्याएं कम होने के बजाए दिनो-दिन बढ़ती जा रही हैं। जिन लोगों की जिम्मेदारी इनकी समस्याएं कम करने की है, वे लोग उनकी समस्याओं में इज़ाफ़ा कर रहे हैं, यह हमारे लिए बहुत ही दुखदायी है।
मासूम रज़ा राशदी के मुताबिक पूस की रात का बेचैन हल्कू हर गांव में आज भी अनिद्रा का शिकार है। हर ईदगाह में अपनी बूढ़ी दादी के लिए चिमटा खरीदता हामिद आज भी नज़र आता है, अपने किसी संबंधी की लाश सड़क किनारे डाल कर कफन के नाम पर चंदा उगाहते घीसू और माधव हम सब ने कभी न कभी अवश्य देखे हैं। आप को झूट बोलना पड़ेगा यदि आप ये कहें कि आपने सद्गति प्राप्त किसी दुखी चमार को कभी नहीं देखा और बेटों वाली विधवा फूलमति किस घर में नहीं है आज? ईमानदारी से दिल पर हाथ रखिए और खुद से पूछिये, ये तो कुछ बानगी भर है। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का हर चरित्र मानव समाज के हर काल खंड में जीवित और प्रासंगिक है और रहेगा।
वरिष्ठ रंगकर्मी ऋतंधरा मिश्रा ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद एक ऐसे कालजयी कहानीकार व नाटककार हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी के कौशल से अनेक कहानियों व नाटकों की रचना की। इन रचनाओं ने जनमानस को आंदोलित करने के साथ-साथ समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व भी किया। जहां तक वर्तमान समय की बात है, उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज के शोषित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई देते हैं। प्रेमचंद का साहित्य अपने समय, समाज और परिस्थितियों से गहरा जुड़ा हुआ है। जहां कफन में वे धार्मिक परंपराओं व गरीबी को निशाना बनाते हैं। रंगभूमि में औद्योगिकीकरण की समस्या को बखूबी दर्शाते हैं। गरीबी और शोषण का जीवंत चित्रण सवा सेर गेंहू और पूस की रात में किया गया है। मंत्र कहानी के द्वारा भी उन्होंने एक आम आदमी की मानसिकता को बहुत अच्छी तरह दर्शाया है जो अपने साथ बुरा होते हुए भी दूसरों का भला चाहता है। कर्मभूमि में उन्होंने राजनीतिक विकृतियों के साथ साथ सामाजिक रूढ़ियों और परंपराओं के विरोध के संघर्ष को भी दिखाया है।
शगुफ्ता रहमान ‘सोना’ ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनकी रचनाओं के बिना हिंदी साहित्य में साहित्य की चर्चा करना अधूरा प्रतीत होता है। आज भी उनकी कहानियों के पात्र समाज के प्रत्येक वर्ग, अमीर-गरीब, धर्म, ऊंच-नीच, भ्रष्टाचार आदि पर प्रहार करते हैं। ‘पंच परमेश्वर’ में जुम्मन शेख और अलगू चैधरी का किरदार अनुकरणीय है। ‘ईदगाह’ में गरीबी के कारण हामिद का चिमटा खरीद कर लाना मन को झकझोर देने वाला है। ‘नमक का दरोगा’, ‘पूस की रात’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘गुल्ली डंडा’ आदि कहानियों के पात्र समाज को आईना दिखाते हैं। कहानियों के पाश्चात्य विधा को जानते हुए भी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में मूल रूप से अपने परिवेश से जुड़े पात्रों के माध्यम से अन्ध परंपराओं पर चोट कर मानवीय मूल्यों को समाज के समक्ष आदर्श रुप प्रस्तुत किए हैं। जो भारतीय समाज के लिए अनुकरणीय है। डाॅ. नीलिमा मिश्रा ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद की कहानियां सिर्फ़ मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि यथार्थ के धरातल पर दार्शनिकता और भावनात्मक लक्ष्य को लेकर लिखी गयी हैं, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी वह अपने काल में थीं, जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था। प्रेमचंद ने जीवन की कठोर वास्तविकता, गरीबी, सामाजिक भेदभाव, अंध-संस्कार, धार्मिक ढोंग, जातिवाद, नारियों की दयनीय दशा, न्याय का अभाव, घूसखोरी, राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक रूढ़िवादिता, अशिक्षा, कुटिल राजनीतिक कुचक्र जैसे तमाम विषयों को कहानी का विषय बनाया और अपनी शैल्पिक विशेषताओं, भाषा की गंभीरता, सशक्त संवाद, प्रवाहमयी शैली, चरित्र चित्रण से कहानियों को अद्वितीय बना दिया। उनकी कहानियों को पढ़ते समय कथा के पात्र स्वयं पाठक के मन पर ऐसा गहरा असर छोड़ते हैं कि लगता है कि वह स्वयं उस कहानी का पात्र हो गया हो। जो दिल और दिमाग दोनों पर अपनी अमिट थाप छोड़ती हैं।
अर्चना जायसवाल सरताज के मुताबिक हिदी साहित्य जगत मुंशी प्रेमचंद के बिना अधूरा है, समाज के हरेक वर्ग का ऐसा सटीक व सारगर्भित चित्रण मुंशी जी ने अपनी रचनाओं में किया है कि आज भले ही प्रेमचंद जी हमारे बीच में नहीं, मगर उनकी कथाओं के सभी पात्र मूल रूप में मौजूद हैं। साथ ही कहानियों का मूल भाव भी उसी रूप में आज भी प्रासंगिक व स्वीकार्य है। मुंशी जी की शब्द-भाषा इतनी सरल व सुग्राह्य है कि पाठक चाहे कम से कम पढ़ा हो या विद्वान से विद्वान हो पढ़ते वक्त तल्लीन व भावुक होकर एक-एक शब्द को पी जाना चाहता है। कई बार पढने के बाद भी इनकी रचनाओं को बार-बार पढ़ने का जी चाहता है। शायद इसलिय की इनकी हर बात आज के समय नमे भी प्रासंगिक लगती हैं।
दयाशंकर प्रसाद ने कहा कि ‘पूस की रात’ के पात्र हल्कू की तरह से ही किसान मजबूर होकर आज मजदूर बन गए हैं। ‘आधार’ कहानी की विधवा पात्र अनूपा भारतीय समाज में व्याप्त अनमेल विवाह पर प्रहार करती हुई आदर्श की स्थापना करती है ‘नमक का दरोगा’ के पात्र बंशीधर जैसा ईमानदार दरोगा के सामने पंडित अलोपीदीन जैसे प्रतिष्ठित जमींदार भी झुकने को मजबूर हो गए। प्रेमचंद की विभिन्न कहानियों के पात्र आज भी समाज में किसी न किसी रूप में सजीव परिलक्षित होते हैं। प्रभाशंकर शर्मा ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद के पात्र मानवीय मूल्यों का उजला पक्ष हैं और उनके पात्र सिर्फ कल्पना मात्र नहीं हैं बल्कि वह सामाजिक बुराइयों पर पूरा प्रहार करते नज़र आते हैं। यही वजह है कि आज भी मुंशी प्रेमचंद के पात्रों को भुलाया नहीं जा सकता। चाहे वह धनिया हो या बुधिया, होरी या ईदगाह का हमीद। मुंशी प्रेमचंद के पात्र जरा भी बनावटी नहीं बल्कि परिवेश से लिए गए पात्र थे वह इस तरह कहानियों व उपन्यास में उभर कर सामने आते थे। जैसे हम पाठक स्वयं में उस चरित्र को महसूस कर रहे हों। प्रेमचंद ने अपने पात्रों में पूरा मनोवैज्ञानिक पहलू उजागर किया है पात्र के हिसाब से ही उनकी भाषा का चयन और परिदृश्य होता था। डाॅ. ममता सरुनाथ ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियों के पात्र अगर हम नज़र घुमा कर देखें तो आज भी हमारे इर्द-गिर्द दिखाई पड़ जाते हैं। कितनी ही स्त्रियां आज भी निर्मला की तरह जीवन जीने को मजबूर हैं। कितने ही हल्कू होरी और धनिया आज भी अपनी लाचारी और बेचारगी भरे जीवन जीने पर मजबूर हैं। कुछ तो ऐसे हैं, जो हालात का सामना न कर पाने की स्थिति में आत्महत्या तक के कदम उठा लेते हैं। प्रेमचंद ने जो प्रयास किया अपने साहित्य के माध्यम से समाज को एक नया दृष्टिकोण देने का समाज को बदलने की कोशिश की शायद आज के लेखकों को भी ऐसे प्रयास करने की आवश्यकता है ।
इसरार अहमद के मुताबिक मुंशी प्रेमचंद की कहानियां आज के आधुनिक दौर के सभ्य समाज को आईना दिखाने का कार्य करती हैं। इनके कहानियों के पात्र आज के समाज के जीवंत पात्रों पर सटीक प्रहार करते हुए नज़र आते हैं। आज के दौर की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं में सामंतवादी सोच वाली पात्रों का इस समाज के दबे कुचले एवं वंचित समाज के प्रति किए जाने वाले व्यवहार एवं कार्य अंग्रेजों के द्वारा किए गए गणित कार्यों की याद दिलाते हैं। पूस की एक रात नामक कहानी में हल्कू का अपने कुत्ते जबरा के साथ पूस की ठंडी रात्रि में एक साथ सोना उस समय की गरीबी को दिखा रहा था, जो आज भी ऐसे बहुत से इस समाज में हल्कू मौजूद हैं। जिनकी तरफ आज के नेताओं की या सभ्य समाज के बुद्धिजीवियों की कोई नज़र नहीं जाती है। नमक के दरोगा में उस समय इंस्पेक्टर द्वारा नमक पर खुश खाना उस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर कर रहा था जो आज के दौर में पुलिस एवं संबंधित विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करता है। वास्तव में कहानियों में प्रयुक्त पात्र आज के दबे कुचले समाज एवं वंचित समाज के लोगों की वास्तविक स्थिति को उजागर करते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट कराती हैं की आज के दौर की सावंतवादी शक्तियां किस प्रकार से दबे कुचले एवं पंचित परिवार का शोषण कर रहे हैं।
रचना सक्सेना ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद ऐसे साहित्य साधक थे जिन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों के पात्रों के माध्यम से जहां एक ओर अंध परम्पराओं पर चोट की, वहीं सहज मानवीय संभावनाओं और मूल्यों को भी खोजने का प्रयास किया। इसी वजह से उनकी कहानियां व उपन्यास हिन्दी साहित्य की अमर रचनाओं व कृतियों के रुप में अमिट धरोहर बन गयी। उनकी कहानियों को जब हम आज के परिप्रेक्ष्य में देखते है तो भी उनके चरित्र आज भी अपने इर्द-गिर्द किसी न किसी रुप में मिल जाते हैं। निर्मला के रुप में आज भी भारतीय नारी अपनी परिस्थितियों सें और अनेक विकट समस्याओं से जूझती हुई दिख जाऐगी। अतः इस दृष्टि से उनके कहानियों और उपन्यासों के चरित्र आज भी पूर्णतया प्रासंगिक हैं।

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

सोशल मीडिया शायरी नहीं सिखा सकता : मुनव्वर राना

मुनव्वर राना से बात करते अनिल मानव
मुनव्वर राना एक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित शायर है, इन्होंने शायरी को एक नया मोड़ और मुकाम दिया है। भाषा-शैली और कहन की ताज़गी सहजता, सरलता की वजह से राना साहब हर दिल अज़ीज़ है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुशायरों में आपका होना क़ामयाबी की अलामत है। पुरानी पीढ़ी के साथ नयी पीढ़ी में भी आपकी शायरी की धमक सिर चढ़कर बोलती है। कहा जाता है कि मुनव्वर राना ग़ज़ल को महबूब-महबूबा और कोठे से उठाकर ‘मां’ तक लाये हैं। आपने ‘मां’ पर इतनी अच्छी शायरी की है कि इस विषय पर लिखना अब जैसे जूठन सा जान पड़ता है। 
 उनका जन्म 26 नवम्बर 1952 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में हुआ है। आपकी शुरूआती शिक्षा-दीक्षा कोलकाता में हुई। वर्तमान में आप लखनऊ में रहकर अदब की सेवा में लगे हुए हैं। मुनव्वर राना के पारिवारिक सदस्य और बहुत से रिश्तेदार भारत-पाक विभाजन के वक़्त पाकिस्तान चले गए, लेकिन साम्प्रदायिक तनाव के बावजूद मुनव्वर राना के पिता ने अपने वतन में रहने को ही अपना कर्तव्य समझा। आपने ग़ज़लों के साथ संस्मरण और आत्मकथा भी लिखी है। इनकी लेखन की लोकप्रियता के कारण उनकी रचनाओं का अनुवाद कई अन्य भाषाओं में भी हुआ है। इनकी पुस्तक ‘शाहदाबा’ के लि वर्ष 2014 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से नवाज गया था। इनकी अब तक एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें ‘मां’, ‘ग़ज़ल गांव’, ‘पीपल छांव’, ‘बदन सराय’, ‘नीम के फूल’, ‘सब उसके लिए’, ‘घर अकेला हो गया’, ‘कहो जिल्ले इलाही से’, ‘बग़ैर नक़्शे का मकान’, ‘फिर कबीर’, ‘नये मौसम के फूल’, ‘मुहाज़िरनामा’ आदि प्रमुख हैं। 08 दिसंबर 2019 को टीम गुफ़्तगू उनसे उनके लखनऊ स्थित आवास पर मिलने पहुंची। अनिल मानव ने उनसे बातचीत की। प्रतुस्त है उस बातचीत के प्रमुख अंश-
सवाल: गुफ़्तगू की 17 वर्ष की यात्रा को किस रूप में देखते हैं ?
जवाब: गुफ़्तगू का सबसे बड़ा कमाल यह है कि उसने नये लोगों का परिचय कराया और सिर्फ़ यहीं नहीं बल्कि पुराने लोगों को हमेशा सम्मान भी दिया। चाहे वे संरक्षक कमेटी हो, चाहे एडवाइजरी बोर्ड हो, चाहे उसके लेखन हों, चाहे वो जीवित हों या न हों, सबको याद रखना, सबको साथ लेकर चलना आदि। ये इसका बहुत बड़ा कमाल है। आमतौर पर जो पत्रिकाएं है, उर्दू में हों या हिन्दी में, वो हमारे जो पूर्वज है वो उनको भूल जाती हैं। शायरी हो चाहे गद्य हो केवल नये लोगों को भर लेते हैं। पुराने लोगों को लेने से एक बड़ा कमाल ये होता है कि मीर ने क्या कहा, ग़ालिब, दाग़ और अकबर ने क्या कहा और इसके बाद नये लोग क्या कह रहे हैं इसका पता चलता है। इससे एक फ़ायदा यह होता है कि जो नये लोग कह रहे हैं, उनको ये मालूम हो जाता है कि हमारे पूर्वज लोग ये कह कर गए हैं। सोशल मीडिया वो आईना है जिसमें आदमी सिर्फ़ अपने का देखता है और खुश रहता है। इसमें तो लाइक, लाइक, लाइक...। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो सिर्फ़ लाइक लगा देते हैं। उनको पता भी नहीं होता कि इसमें लिखा क्या है। लेकिन गुफ़्तगू एक ऐसा आईना है जिसमें हम अपने माज़ी को भी देख सकते हैं, गुज़रे हुए दिन और गुज़रे हुए साहित्य को भी देख सकते हैं।

सवाल: वर्तमान समय में आप साहित्यिक पत्रिकाओं को किस रूप में देखते हैं ?
जवाब: देखिए, पत्रिकाओं का बहुत बुरा वक़्त चल रहा है। अब ये तय करना मुश्किल है कि 10-15 साल बाद कितनी पत्रिकाएं जिन्दा कर पायेंगी । पहले ही पढ़ने लिखने का चलन कम होता गया था, इसलिए कि भागदौड़ और सफ़र की ज़िन्दगी में समय कम मिल पाता है। पहले होता क्या क्या था कि शहर छोटा होता था। उसी में लोग घूम-फिर के रहते थे। अब लोग दूर-दूर रहते हैं कि उनके पास वक़्त नहीं है कि वे साहित्यिक गतिविधियों में शामिल हो सकें। ये भी देखते हैं कि अगर वक़्त ज़्यादा हो गया, जैसे हमें नक्ख़ास कोना, इलाहाबाद से बम्हरौली जाना है और गाड़ी छूट गयी तो टैक्सी करके जाना होगा, जिसमें 200 रुपये तक खर्च होंगे। पहले ऐसा नहीं था। पहले करीब होता था सब, यहां-वहां हर जगह। उसका एक नुकसान हुआ, जैसे हमने बहुत शहरों में देखा था। पटना में बहुत साहित्यिक गतिविधियां थीं। छोटा शहर था, सब पास-पास रहते थे। अब इतनी दूर-दूर काॅलोनियां बन गयी हैं कि लोग घड़ी देखते हैं कि हमें गाड़ी नहीं मिलेगी, तो इसका नुकसान हुआ। पहले साथ बैठते थे तो चर्चा होती थी कि लोग ये हंस पत्रिका, गुफ़्तगू पत्रिका है हसमें ये लेख छपा है वो लेख छपा है, तो दूसरे आदमी को भी होता था कि पत्रिका खरीदे। लेकिन अब वो पत्रिका जहां बिकती है वो उससे दूर रहता है। अब ज़माना वो आ गया है कि आप झूठ-मूठ एक कार कम्पनी का फोन लगा दीजिए कि हमें कार खरीदना है तो चार कार कम्पनी आ जाती हैं गाड़ी लेकर कि आप देख लीजिए जो लेना चाहते हैं। पत्रिका के लिए हम इंतज़ार करते हैं कि हम छाप करके बैठें हैं दुकान में और जलेबी है लोग ले जाएंगे। ऐसा नहीं होता, इसके लिए भी रास्ता होना चाहिए। जैसे हाॅकर है या कोई सिस्टम होना चाहिए कि हम अभी कोई भी किताब खरीद सकते हैं। कोई पत्रिका हिन्दी या उर्दू की जाए तो हम उसको ले सकते हैं। लेकिन ये पाॅसिबल नहीं है कि एक गोमती नगर का आदमी अमीनाबाद खरीदने आये पत्रिका और वो न मिले इसके बाद वो फिर लौट आए। मालूम 10 रुपये की पत्रिका और उसका 150 रुपये खर्च हो जाए तो इसकी एक सहूलत होनी चाहिए।

मुनव्वर राना के आवास पर: बाएं से- मुनव्वर राना, अफ़सर जमाल, इश्क़ सुल्तानपुरी और अनिल मानव

सवाल: आने वाले समय में ग़ज़ल का क्या भविष्य देखते हैं ?
जवाब: ग़ज़ल का जो फ्यूचर है, आप यूं कह लें कि हर ज़माने में उलट-पुलट के ठीक हो जाती है। एक ज़माना आता है हो सकता है बहुत लोगों ने नहीं देखा होगा। बरसात में एक लाल रंग का कीड़ा निकलता है उसे कहते हैं ‘लिल्ली घोड़ी’। तो लोग कहते हैं साहब, ये ग़ज़ल नहीं है बस लिल्ली घोड़ी बिठा दीजिए यानी दो मिसरे लिख दिये गये। तो आप समझिए ग़ज़ल लिखना बहुत मुश्किल काम है, बाबा रामदेव का च्यवनप्राश एक कैप्सूल में भरना है। लेकिन लोग इसको आसान समझते हैं। जो लोग कविता कहते हैं, वो समझते हैं कि ग़ज़ल लिखना बहुत आसान काम है, इसे कोई भी कर लेगा। ग़ज़ल कहना बहुत मुश्किल काम है। अच्छी ग़ज़ल या बुरी ग़ज़ल का फैसला तो पचास साल बाद होता है। ऐसा नहीं है कि वन-डे मैच है और शाम को रिजल्ट मालूम हो गया। लेकिन जो हमाने नए लिखने वाले आए हैं उनके यहां एक ये सबसे बड़ी ख़राबी ये है कि उस्तादी-शार्गिदी के चलन का अनुसरण नहीं कर रहे हैं। उसमें ये था कि उस्ताद जो होता था वो बिल्कुल जैसे बहु खाना पकाती थी तो सास उसमें नमक डाल देती थी और यही तमीज़ सीखाती थी कि नमक कितना होना चाहिए। अंगीठी से चैला बाहर निकाल देती थी कि आंच कितनी होनी चाहिए। तो उस्ताद का काम यही होता था। बाकी शब्दावली, थाॅट्स, भावनाएं आपकी हुआ करती थी। उस्ताद सिर्फ़ इतना करता था कि ये शब्द यहां पर अच्छा नहीं इसे सही कर लो।

सवाल: क्या आज के दौर में ग़ज़ल के अच्छे उस्ताद मिल पाते हैं ?
जवाब: उस्ताद आजकल बहुत कम हो गए लेकिन जितना सम्मान मिलना चाहिए उतना भी तो आजकल नहीं मिलता, तो फिर क्यों कोई उस्ताद बने। ज़माना ऐसा आ गया है कि जिसको आप सिखाते हैं वो जिस दिन दस ग़ज़लें कह लेता है उस दिन स्टेज पर आपके सामने सिगरेट पीकर धुआं मारता है। और फूंकते हुए कहता है और उस्ताद क्या हाल है ? जिस परम्परा के हम लोग हैं कि एकलव्य ने अंगूठा काटकर दे दिया। ये लोककथा हो, सच हो, नहीं हो, लेकिन ये है कि अच्छा लगता है। हमारे यहां पर एक तरीका था कि जब मां कसम दे देती थी कि तुझे हमारे दूध की कसम है तो जो है वो जान कुर्बान कर देता था। अब कैसे मां कसम देगी, वो तो ‘नेस्ले’ का दूध पिलाती है। उसी तरह से जब आप उस्ताद अच्छा नहीं चुनते हैं तो या उस्ताद को वो दर्ज़ा नहीं देते तो ठीक नहीं है। जैसे कहा जाता है कि पहले जो नया शायर आता था तो वो दस साल लगभग गिलास धोता था। पीने की तो इज़ाज़त ही नहीं थी।

सवाल: नई पीढ़ी के ग़ज़लकारों के लिए आप क्या कहना चाहते हैं ?
जवाब: जो नए ग़ज़लकार हैं, उनको एक चीज़ का ध्यान रखना चाहिए कि आपके जो सीनियर्स हैं उनक इज़्ज़त कीजिए। उनसे सीखने की कोशिश कीजिए। अगर आप ऐसा करते हैं तो इसमें आपको नुकसान कुछ नहीं होना वाला। दूसरी बात आप जितना पढ़ सकते हैं  उतना अधिक पढ़ें। सोशल मीडिया आपको शायरी नहीं सिखा सकता। गूगल आपको ये नहीं बता सकता है कि किस दिन आपको मरना है। जिस दिन गूगल आपको ये बता देगा कि आपको मरना किस दिन है उस दिन दुनिया खत्म हो जाएगी। उसी तरह शायरी में आपको ये कोई नहीं बता सकता कि निराला कौन बनेगा, बच्चन कौन बनेगा, महादेवी वर्मा कौन बनेगी, ग़ालिब, फ़िराक़ कौन बनेगा, कुछ नहीं मालूम। सब एक दौड़ में हैं। जिसका नसीब अच्छा होता है, जिसने खि़दमत की होती है, जिसने बुजुर्गों से सोहबतें की होती हैं, अल्लाह नवाजता है। ग़ज़ल हिन्दी या उर्दू नहीं होती है, न ग़ज़ल हिन्दू-मुलसलमान होती है। ग़ज़ल में सिर्फ़ लिखा जाता है कि ये ग़ज़ल है।

सवाल: गुफ़्तगू के ‘रक्षक विशेषांक’ को आप किस रूप में देखते हैं?

मुनव्वर राना: गुफ्तगू यक़ीनन एक बड़ा काम कर रही है। क्योंकि वो लोग, जो अपनी पूरी जिं़दगी देश और देशवासियों के रक्षा में गुजार देते हैं, उनकी शायरी या उनकी कहानियां पढ़ने से एक अजब तरह का एहसास होता है। जैसे चमन में कुछ फूल ऐसे होते हैं, जिनकी की खुशबू सबसे अलग और अच्छी होती है। जीवन में इतनी कठिनाइयों, मुसीबतों, चैलेंज, दुख और मुकाबले में शामिल रहने के बाद भी अपने कवि हृदय को जिंदा रखना खुद एक कविता है। मैं इम्तियाज गाजी और उनकी पूरी टीम को मुबारकबाद देता हूं, कि इस अंक के बाद अभी वो ख़ामोश नहीं बैठेंगे, बल्कि कोशिश करके और भी एकाध अंक निकालेंगे, ताकि यह सामग्री महफूज हो जाए। जो जीवित हैं या नहीं है, उनको मुबारकबाद देने का इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2020 अंक में प्रकाशित )

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

लोग अपनी प्यास बुझाते हैं चले जाते हैं

 
                                                                        - मुनव्वर राना
 
मुनव्वर राना
                             
 इलाहाबाद की मिट्टी ज़रख़ेज़ हो या न हो लेकिन इस शहर के मिज़ाज में मुरव्वत और मिट्टी में इल्म व अदब का ख़मीर शामिल है। सियासी बाज़ीगर शाह को पिटवाते रहें लेकिन इल्म की देवी सरस्वती अपनी मंदिर में सियासी मुजरे की इज़ाज़त कभी नहीं दे सकती। आती-जाती सरकारें नए सिरे से इस शहर की हदबंदी करती रहें, इस शहर के जुगराफिये की कितनी ही कांट-छांट की जाए लेकिन जब तक्सीमे मुल्क के बाद भी अदब की तारीख़ इब्ने सफ़ी इलाहाबाद के ही रहे तो फिर दुनिया की कोई ताक़त ‘नूह’ नारवी को इस शहर से अलग नहीं कर सकती। शहरों का जुग़राफ़िया तो सैलाब का पानी भी बदल देता है लेकिन तारीख़ तो किताबों के समंदर और दिलों के निहाख़ानों में हमेशा महफूज रहती है। इस गंगा-जमनी तहज़ीब वाले शहर से अगर अकबर इलाहाबादी, निराला, फ़िराक़ गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, सुमित्रा नंदन पंत और राज़ इलाहाबादी को अलग कर दें तो अदब बेवा की सूनी कलाइयों जैसा होकर हर जाएगा। अदब से हिन्दी, उर्दू या किसी भी ज़बान को अलग करना बिल्कुल ऐसा ही है जैसे किसी घने और छायादार पेड़ पर सिर्फ़ एक तरह की चिड़िया को बसेरे की इज़ाज़त दी जाए। अदब रखैल की की तरह नहीं होता कि जिसके जिस्म और सांसों पर शहर के किसी एक रईस का कब्जा बरक़रार रहता है बल्कि अदब तो उस मुक़द्दस मां की तरह है होता है जिसकी छाती से उबलता हुआ दूध मसलक और मज़हब की क़ैद से आज़ाद कर नन्हें बच्चे के प्यासे होंठों तक पहुंचने क लिए बेताब रहता है। अज़ीम होती हैं वो माएं जो अपनी छातियां किसी फ़िरके, किसी मज़हब के नवज़ाइदा बच्चे के हलक़ में उंडेल देती है। अदब को ज़बान की बुनियाद पर तक़सीम करने वाले दहशतगर्त तो हो सकते हैं लेकिन शायर और अदीब हरगिज नहीं हो सकते, क्योंकि दुनिया की किसी भी ज़बान में शायर को शायर और दहशतर्गत को दहशतगर्त ही कहा जाता है। मोहतात सियासतदां पंडित नेहरू से लेकर बेनियाज़ी की तस्वीर माहिर इलाहाबादी तक इस शहर के ऐसे रोशन सितारे हैं जिन्होने इस शहर का सिर बुलंद रखने के लिए सांसों की सारी पंूजी दयारे ग़ैर में खर्च कर दी, इस शहरे तबस्सुम से मुस्कुराते हुए रुख़्सत हुए और वापस हुए तो अर्थी, मय्यत और कलश की शक्ल में आये।
               लाश तक घर को न पहुंची ऐसा मक़तल भा गया,
               हमने सोचा था कि कुछ सांसें बचा ले जायेंगे।
इस शहर में आईने हमेशा कम फरोख़्त होते हैं क्योंकि यहां हर चेहरा आईना सिफ़त रहा है। जहां आंखें बोलती और बात करती हैं। हालांकि इसी शहर में त्रिवेणी ग्लास जैसी कंपनी मौजूद है जो सारे एशिया को आईना साज़ी का हुनर और चेहरे को खूबसूरत दिखाने के आदाब सिखाती है। हिमालय की आग़ोश से निकली हुई गंगा और जमुना एक दूसरे से बेनियाज़ होकर हज़ारों मील तक बहती रही लेकिन इलाहाबाद पहुंचते ही दोनों एक दूसरे में इस तरह मुदग़म हो गयीं जैसे मुद्दतों की बिछड़ी हुई बहनें एक-दूसरे से लिपट जाती हैं। गंगा और जुमना की इस हम आग़ोशी का एहतराम बंगाल की खाड़ी में बहती हुई वह हुगली नदी भी करती है जिसे दुर्गा और काली के शहर कलकत्ता का आंचल भी कहा जाता है। गंगा-जमुना की इस खुदसुपुर्दगी और हम आग़ोशी का ही करिश्मा है कि हिन्दुस्तान की हर ग्लास कंपनी इलाहाबाद की शीशा सिफ़त बालू के बग़ैर वीरान रहती है। चंदौसी से कलकत्ता और कलकत्ता से इलाहाबाद तक का सफ़र जेके अग्रवाल और उनके बुजुर्गों ने सिर्फ़ इस चमकती हुई बालू को शीशे में बदल देने के लिए ही तय किया था।
                 हमें महबूब को अपना बनाना तक नहीं आया,
                 बनाने वाले आईना बना लेते हैं पत्थर से।
मैं पूरे एतमाद से यह बात अर्ज़ कर रहा हूं कि जब तक इस शहर में गिरीश वर्मा, डीएन आर्या जैसे लोग मौजूद हैं, इस शहर का रज्जू भैया और मुरली मनोहर जोशी से कोई ख़तरा नहीं हैं क्योंकि आज तब इस शहर के दरो-दीवार से नेहरू के कलंदराना रविश, लाल बहादुर शास्त्री की ईमानदारी, राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह की फकीराना तबीयत, हेमवंती नंदन बहुगुणा की हर दिल अज़ी़ज़ी और मुस्तफ़ा रशीद शेरवानी की इनसान दोस्ती का नूर उबल रहा है। शायद यही वजह है कि इलेक्ट्रिक सप्लाई वालों की मुस्तक़िल नाफ़रमानी के बावजूद इस शहर में हर वक़्त उजाला रहता है। उस अदबी चैपाल की रौनक कभी कम हो ही नहीं सकती जिसके इर्द-गिर्द डाॅ. रामकुमार वर्मा, मुस्तफ़ा ज़ैदी, डाॅ. जगदीश गुप्ता, मुजाविर हुसैन रिज़वी, डाॅ. हरिदेव बहरी, पंडित उदय नारायण तिवारी, हरिवंश राय बच्चन और शफ़ीक इलाहाबादी जैसे लोगों ने कहानियां बुनी हों और ग़ज़लों के फूल चुने हों। अभी इस शहर की फ़ज़ाओं में मौलाना तुफैल अहमद मदनी की बाज़गश्त महसूस होती है। अभी दायरा शाह अजमल के बुजुर्गों के कश्फ़ोकरामात से दुनिया नावाक़िफ नहीं हुई है। अभी इलाहाबाद स्टेशन पर आराम फ़रमाते हुए लाइन शाह बाबा के मज़ार पर हाज़िरी देने से पहले लोग अपनी सियासी पगड़ियों का उतार देते हैं। अभी जमुना के मुकद्दस पानी से बुजुर्गों के सज़दों की खुश्बू आती है। अभी मुकद्दस गंगा की सुनहरी लहरों से चंदन टीके की महक महसूस होती है। ऐसे इल्मी और अदबी दर्सगाह की बेअदबी इनसान तो इनसान आबो-हवा भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। कंक्रीट से बनायी हुई इमारतें उस वक़्त शर्मिंदा हो जाती हैं जब गोश्त पोस्त का इंसान अपनी जात को मिट्टी में मिलाकर उसे और भी गुलज़ार बना देता है।
                हमको इस मिट्टी में बो देंगी हमारी नस्लें,
                हम कहीं भी नहीं इस शहर से जाने वाले।
 यह अदबी चैपाल अगर कोयले को राख बनाती देख चुकी है तो हरी शाख़ों को कोयला होते हुए देखना भी इसका मुकद्दर है। इल्म की गर्मी और अदबी सरगर्मी को ज़िन्दा रखने के लिए शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी, रवींद्र कालिया, इक़बाल माहिर, सुहैल ज़ैदी, ममता कालिया, नस्र कुरैशी, सैयद अब्दुल करीम, हमीद क़ैसर, काएद हुसैन कौसर, यश मालवीय, जुल्फ़िकार सिद्दीक़ी और हमदून उस्मानी जैसे बड़े चिराग़ बरसों रौशनी लुटाते रहे। हरचंद कि वक़्त की आंधी ने उनमें से कई चिराग़ों को मुज़महिल किया और कई चिराग़ों को निगल भी गयी। आंधी कितनी ही ताक़तवर क्यों न हो उसका जोर ज़्यादा देर तक नहीं रहता लेकिन पुराने चिराग़ बुझते-बुझते भी नये चिराग़ों को अपना हुनर सौंप देते हैं। आंधी और चिराग़ की जंग जब तक दुनिया है जारी रहेगी -
                   मिलेंगे आपको हम लोग हर ज़माने में,
                   हमारे पैरों में ज़जीरे माहो साल नहीं।
आज भी शहरे इलाहाबाद के अदबी जज़्बात सर्द नहीं हुए। आज भी गंगा और जमुना की लहरों का सुरीलापन बाक़ी है। आज भी मुस्लिम हाॅस्टल की गहमा-गहमी का वही आलम है। आज भी बरकत टी स्टाल शायरों और अदीबों का मयख़ाना है। आज भी सियासत इस शहर में आंखें नीची करके चलती है। आज भी अमरूद की महक सारे शहर को दीवाना कर देतीे है। आज भी ग़ज़ल के शैदायी अपना मज़हब नहीं जानते। आज भी सुलाकी हलवाई की पूड़ी-सब्ज़ी और क़ादिर हलवाई के गाजर के हलवे के दीवनों की गिनती नहीं की जा सकती। आज भी इमाम बख़्श (जल्लाद) की चाय अपने गांव में कई बोतलों का नशा रखती है। हाईकोर्ट की पुरशिकोह इमारत जो इंसाफ और नाइंसाफी के हज़ारों वाक़ियात की चश्मदीद गवाह है, सियासी इक़तिदार और हवसे नग़मये तर ने इसे इमारत के विक़ार को भी मैला कर दिया है। आनंदभवन एक तारीख़ साज़ इमारत है, एक ज़माने तक यह मुजाहिदीने आज़ादी की सबसे बड़ी छावनी थी। इस इमारत में दाखिल होते ही हिन्दुस्तान के शरीफ़ सियासतदानों के चेहरे निगाहों के सामने घूमने लगते हैं। खुसरो बाग़ और जमुना किनारे का क़िला आज भी हिन्दुस्तानी मुग़लिया सल्तनत की सलीकेमंदी की दाद तलब करते महसूस होते हैं। सफ़ाई के एतबार से यह शहर उत्तर प्रदेश के और दूसरे तमाम शहरों के मुक़ाबिले में ग़नीमत है। मुमकिन है, क़लम कुछ और फ़रोख़दिली का सुबूत देता लेकिन पेशे नज़र ‘ग़ीबत कदा’ अदब का हेड क्वार्टर है जिसे उर्फ़े आम में सिर्फ ‘ओरियंट’ कहा जाता है। कुछ समय पहले तक इसे बहुत से लोग ग़ज़ल कदा भी कहते थे, लेकिन मेरी निगाह में यह शहर का सबसे बड़ा अदबी पड़ाव था। जिस तरह किसी ज़माने में शहर के उमरा (बड़े लोग) अपने-अपने साहबज़ादगान को तहज़ीब और आदाबे महफ़िल सीखने के लिए ‘कूचए अरबाबे निशात’ (हसीनाओं की गली) का तवाफ़ (परिक्रमा) करवाते थे उसी तरह तश्नगाने अदब (साहित्य के प्यासे) अपनी इल्मी और अदबी प्यास और दिलजले शायर व अदीब अपने दिल की भड़ास निकालने के लिए उसी तरफ़ रुख़ करते थे। देखने में तो ये दवा की दुकान है लेकिन वक़्त ज़रूरत यहां से हर महफ़िल में सुर्खरू रहने के लिए बेहतरीन कलाम की सप्लाई भी होती थी। यह ‘ग़ज़लकदा’ उबैद खान आसिफ उस्मानी जैसे ज़हीन और ख़तरनाक लोगों का हैलीपैड रहा है, अशरफ़ अली खान की कछार था। इनको इतने लोग पापा कहते हैं कि इनकी जवानी के प्रिंट आउट कश्कूक (संदिग्ध) लगते हैं। ख़्वाजा जावेद अख़्तर और हादी का ट्रेनिंग सेंटर रहा है, जद्दन भाई की नयी ख़ानकाह है जहां वह अपने आधा दर्जन पीरों के ज़रिये ज़ेहनी तौर पर बालिग़ किये जाते हैं। ग़रज़ की नैयर आक़िल (अब मरहूम) और अबरार अहमद का यह दवाख़ाना वह अदबी मीनार है जहां से पूरे शहर का नज़ारा किया जा सकता है। राज़ साहब जब भी इस दवाख़ाने में आते थे, हमेशा दुकान भरी-भरी लगती थी। जब तक जिन्दा रहे इलाहाबाद भरा-भरा लगता था। उनकी कमी मुद्दतों अदब वालों को महसूस होती रहेगी।
                  इस भीड़ में कुछ मेरी हक़ीक़त नहीं लेकिन,
                  दब जाउंगा मिट्टी में तो सब याद करेंगे।
   इलाहाबाद का मौजूदा अदबी मंज़रनामा दिलचस्प भी है और तवील भी। मेरी मालूमात महदूद है फिर भी इस शहर से इतना तवील रिश्ता है कि दूसरे लोगों के मुकाबले में मेरी तलाश और जुस्तजू की बुनियादें ज़्यादा मज़बूत होंगी। नये मंज़रनामे में जो नाम बहुत तेज़ी से उभरकर सामने आये उनमें सरे-फेहरिस्त अली अहमद फ़ातमी का नाम है। फ़ातमी ने नस्र को अपने इज़हार का ज़रिया बनाया। नैयर आक़िल, असलम इलाहाबादी, सालेहा, नदीम, इक़बाल दानिश, अहमद अबरार, अख़्तर अज़ीज़, सैयद मोहम्मद अली काज़मी(अब मरहूम), एहतराम इस्लाम, निजाम हसनपुरी, बुद्धिसेन शर्मा, दूधनाथ सिंह, कैलाश गौतम (अब मरहूम), यश मालवीय, अज़ीज़ इलाहाबादी, असरार गांधी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, रविनंदन सिंह, अतीक़ इलाहाबादी (अब मरहूम), नायाब बलियावी, जावेद शोहरत, सुधांशु उपाध्याय, हरीशचंद्र पांडेय, फरमूद इलाहाबादी, मनमोहन सिंह तन्हा, आदि अहम नाम हैं।
( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2017 अंक में प्रकाशित )