मंगलवार, 21 नवंबर 2017

गुफ्तगू ने साहित्य की बुलंदी बरकरार रखी है


शैलेंद्र जय परिशिष्ट का विमोचन और मुशायरा 
इलाहाबाद। विपरीत हालात में जहां बड़ी-बड़ी पत्रिकाएं बंद हो रही हैं। रचनाएं और रचनाकार ख़ासकर साहित्यिक रचनाकारों के सामने संकट कम नहीं है, ऐसे में इलाहाबाद सरीखे साहित्यिक नगरी में साहित्य की बुलंदी बरकारार रखना उम्मीद जगाता है। गुफ्तगू पत्रिका ने यह काम कर दिखाया है। यह बात मुख्य अतिथि वरिष्ट रेलवे अधिकारी शैलेंद्र कपिल ने ‘गुफ्तगू’ के शैलेंद्र जय परिशिष्ट विमोचन के अवसर पर 12 नवंबर को सिविल लाइंस स्थित बाल भारती स्कूल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कही। उन्होंने कहा कि शैलेंद्र की शायरी कई मायने में बेहद ख़ास है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पं. बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि आज के दौर में जब धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाएं बंद हो गईं हैं, ऐसे माहौल में ‘गुफ्तगू’ के लगातार 14 साल से प्रकाशित होते रहना बड़ी कामयाबी है। इलाहाबाद जैसे शहर से ही ऐसी पत्रिका निकल सकती है। रविनंदन सिंह ने कहा कि शैलेंद्र जय की कविता अपनी अलग पहचान रखती हैं, नए बिंब और नए प्रतीक इनकी कविताओं में मिलते हैं।‘गुफ्तगू’ ने ऐसे कवि को परिशिष्ट निकालकर एक बड़ा काम किया है। इस अंक में प्रो. नामवर सिंह का इंटरव्यू और डाॅ. बशीर बद्र का सौ शेर इसको बेहद स्तरीय बना रहा है। नंदल हितैषी ने कहा कि इलाहाबाद से ऐसी पत्रिका का प्रकाशन बेहद खास है, इस तरह की स्तरीय पत्रिका निकालना बड़ी है। कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया।
 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। अख़्तर अज़ीज़, सागर होशियारपुरी, जमादार धीरज, मोईन उस्मानी, शिवपूजन सिंह, नरेश महरानी, अनिल मानव, प्रभाशंकर शर्मा, भोलानाथ कुशवाहा, कृष्ण चंद्र श्रीवास्तव, लोकेश श्रीवास्तव, वंदना शुक्ला, मोइन उस्मानी, वाक़िफ़ अंसारी, डाॅ. नईम साहिल, अर्पणा सिंह, माहिर मजाल, योगेंद्र मिश्र, वंदना शुक्ला, रमोला रूथ लाल, विवेक सत्यांशु, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, अजय कुमार पांडेय, अरविंद वर्मा, सुनील दानिश, अजीत शर्मा आकाश, अरुण कुमार श्रीवास्तव और अदिति मिश्रा ने काव्य पाठ किया।


गुरुवार, 2 नवंबर 2017

स्त्री में अभी तक अपेक्षित चेतना नहीं आई: ममता


सुप्रसिद्ध साहित्यकार ममता कालिया से डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव की बातचीत
ममता कालियो से बातचीत करते डाॅ. गणेश शंकर श्रीवास्तव
 सवाल: अपने जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
जवाब: (मुस्कुराते हुए) देखिए महिलाओं का परिवार तो दो बार बनता है। इसलिए मैं शादी से पहले से शुरू करूंगी। मेरे पिता विद्या भूषण अग्रवाल मूलरूप से मथुरा के थे। उनकी शिक्षा आगरा में हुई। अंग्रेजी उनका एक विषय था, लेकिन वो हिंदी के बहुत बड़े विद्वान थे। उन्होंने इलाहाबाद हिन्दी साहित्य सम्मेलन से साहित्य रत्न में गोल्ड मेडल प्राप्त किया था। मेरे चाचा भारत भूषण अग्रवाल भी हिंदी अंग्रेजी दोंनों के ही विद्वान थे। अतएव हमारे घर में ऐसा वातावरण था कि अंग्रेजी पढ़ो, लेकिन हिंदी न भूलो। उसी परंपरा में मेरा पालन-पोषण हुआ। मैं अलग-अलग शहरों में पढ़ी जैसे दिल्ली, नागपुर, मुंबई, पुणे वगैरह। अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने के बावजूद मुझे घर में हिंदी ठोंक-ठोंक कर पढ़ाई गई। मेरी मां बिल्कुल बौद्धिक नहीं थीं, किंतु उन्होंने मेरी शिक्षा एवं स्वतंत्रता पर कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया न ही कभी मुझसे कोई घरेलू काम लिया। मैंने छोटी सी उमर में ही गांधी, नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद आदि की आत्मकथाएं पढ़ ली थी। पिता के संरक्षण में मैंने एम.ए किया फिर दिल्ली में दौलत राम काॅलेज में मुझे मेरे पहले साक्षात्कार से ही नौकरी मिल गई। फिर 1965 में जब मुझे रवि (रवीन्द्र कालिया) मिल गए तब से मेरी रचनात्मकता में समृद्धि आती चली गई। 

सवाल: आप एक कवयित्री, कथाकार, उपन्यासकार तो हैं ही, आपने अनुवाद और संपादन कार्य भी किया है। अपने इस विविध रचनाकर्म में आप कैसे सामाजंस्य बैठा पाती हैं।

जवाब: इसका उपाय है कि जो चीज़ आपके सामने आ जाए उसे पूरे मनोयोग से करिए। हर विधा के अपने-अपने भाषागत, शिल्पगत पक्ष होते हैं। अमरकांत की रचनाओं का एक संकलन निकलना था, तो रवि ने मुझे संपादन कार्य में लगाया। संपादन का कार्य मुझे रुचिकर लगने लगा। काॅलेजों में पाठ्यक्रम की दृष्टि से मैंने कुछ अनुवाद कार्य भी किए। कविता, कहानी और उपन्यास मैं बराबर रचती रही हूं। 
सवालः आपने ढेर सारी कहानियां और उपन्यास लिखे हैं। उपन्यास एवं कहानी के आपसी संबंधों के बारे में आप क्या समझती है?
जवाबः दोनों में काफी फर्क है। दोनों की कथा भूमि अलग-अलग है। कहानी कोई छोटी घटना या समस्या के एक पक्ष को लेकर लिखी जाती है या किसी एक खास ‘मूड’ (मनःस्थिति) मे रची जाती है। जबकि उपन्यास में काफी बड़ा फलक रखना पड़ता है। उपन्यास में तो लेखक पूरा जीवन ही उतार देते है। इसीलिए ‘गाथा’ शब्द का इस्तेमाल होता था। अगर कोई कम विषय या किसी चरित्र की कम जानकारी लेखक दें, तो ऐसे उपन्यास को पाठक रिजेक्ट कर देते हैं। उपन्यास लिखना कहानी लिखने से ज्यादा मुश्किल है, क्योंकि इसमें अनुशासन और धीरज चाहिए और लेखक में इतनी क्षमता भी होनी चाहिए कि वह विषयवस्तु को फैला सके। उपन्यास लिखने के तरीके भी अलग-अलग होते हंै। हम लोग मजाक करते थे कि नरेश मेहता एक पेड़ को देखकर भी पचहत्तर पन्ने लिख देते थे। हम लोग ऐसे उपन्यासकार नहीं है। हमारे उपन्यासों में वक्त तेजी से गुजरता है। क्योंकि आज के पाठक के पास इतना धैर्य नहीं है। पाठकों को घटनाक्रम में रफ्तार चाहिए। अतः हमें चाहिए कि ऐसा लिखें कि पाठक बोर न हों।

सवाल: आजकल असहिष्णुता का मुद्दा छाया हुआ है। कलाकार भी इस असहिष्णुता के शिकार रहे हैं। आपके क्या विचार हैं ?
जवाब: यह मुद्दा मुझे राजनीति से प्रेरित लगता है। यह तब शुरू होता है जब राजनीति विचार पर हावी हो जाती है। यदि आपको किसी के विचारों की मुखालफ़त ही करना है तो विचारों से ही करिए। साहित्य, कला, संगीत, ललित कला, नृत्य, विचार, बहस के लिए तो आपको सहिष्णुता की सख्त जरूरत है। राजनीति देखिए, प्रधानमंत्री के मुंह से बात निकली नहीं कि कार्यान्वित करने के लिए डंडे लेकर पहुंच गए, यह बहुत गलत बात है। अनेक शहरों में कलाकार को परेशान किया गया। आपको याद होगा एम. एफ. हुसैन की पेंटिग्स के ऊपर कालिख लगाई गई थी, उनकी आर्ट गैलरी जलाई गई थी। उनकी विश्व में इतनी शोहरत है, उनको देश छोड़कर जाना पड़ा। असहिष्णुता की यह प्रवृत्ति बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं मानती हूं कि अगर आपके अन्दर सच का इतना भी शऊर नहीं रहा तो आप किस प्रकार का समाज बना रहे हैं। इस समाज में सबके लिए जगह होनी चाहिए।
सवालः आज भी पुरूषों पर आक्षेप का जो लेखन महिला लेखकों द्वारा किया जा रहा है, उस पर आपकी क्या सहमति असहमति है?
जवाब: पहली बात तो ये है कि स़्त्री विमर्श और स्त्री लेखन दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। स्त्री लेखन में बहुत सी सामथ्र्य होने के बावजूद एक सीमा है कि लेखिकाएं अतिवाद में चली जाती हंै। ये एक किस्म का अतिवादी दृष्टिकोण है कि स्त्रीलेखन एकदम पुरूष विरोधी स्वर अपनाए और पुरूषविहीन समाज की कल्पना करें। आपको मैं बता दूं कि स़्त्री विमर्श के सबसे बड़े समर्थक, सहयोगी और पैरोकार तो पुरूष ही हैं। ये एक बहुत अस्वाभाविक स्थिति है, जिसमें स्त्री लेखन को एक अतिरंजित रूप में पेश किया जाए या एक अक्रामक तेवर अपनाया जाए। सच यह है कि लिखते समय हम यह भूल जाते है कि हम स्त्री हैं या पुरूष। क्योंकि एक कृति में स्त्री और पुरूष, दोनों ही पात्र दिखाने होते हैं। पुरूष पात्रों के साथ आप तब तक न्याय नहीं कर सकते जब तक कि पुरूषों के प्रति अपका रवैया एकदम संतुलित न हो। पुरूष और स्त्री एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों को मिलकर रहना है तभी आगे की पीढ़ी संभव है।

सवाल: एक स्त्री होने के नाते क्या आपको साहित्य में किन्ही चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
जवाब: सौभाग्यवश मुझे कभी इस प्रकार की चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा। मैंने जब गंभीर लेखन शुरू किया, तो उस समय देश के विभिन्न हिस्सों से निकलने वाली पत्रिकाओं ने मेरी रचनाओं को खूब प्रकाशित किया। धीरे-धीरे 1964-65 के आसपास कविता का वातावरण देहवादी हो गया था। इस समय जगदीश चतुर्वेदी, सौमित्र मोहन जैसे लेखकों को पता नहीं क्या हो गया कि देहवाद, देहमुक्ति, एवं यौन चेतना इनकी कविताओं के केंद्र में आ गए। लेकिन मैं ऐसे वातावरण से बची रही और सार्थक रचनाएं करती रही।

सवाल: अपने एक साक्षात्कार में बहुत पहले कुछ रचनाकारों को संदर्भित करते हुए कहा था कि ‘इनके चित्रण में नारी मादा की तरह पुरूषों की तलाश में घूमती रहती है’?
जवाब: दरअसल हमारे यहां ब्रिटिश कविता का एक एब्जर्ड आंदोलन चला था। उस दौरान एलन डिजबर्ग, पीटर और लाॅस्की जैसे कवि भारत आए थे। इन्होंने विभिन्न दुष्प्रचार भारत में किए। नशा और उन्माद को बढ़ावा दिया। इस कारण से उन दिनों कुछ रचनाकरों की रचनाओं का स्वरूप बिगड़ गया। मोना गुलाटी, सतीश जमाली जैसे लोग इस तरह के प्रभाव में आ गए।
सवाल: हिंदी-उर्दू में मेल-बेमेल को लेकर जो बहसें अदब की दुनिया में उठतीं रहतीं हैं, इसे आप किस रूप में देखती हैं?
जवाब: निस्संदेह हिंदी और उर्दू सगी बहनें हैं। एक को लहूलुहान किए बगैर दूसरी को अलग नहीं कर सकते। बोलते समय क्या हम ये ख़्याल रखते हैं कि कौन सा शब्द हिंदी का है और कौन-सा उर्दू का। इन भाषाओं को मिलाए बिना कविता, कहानी नहीं लिखी जा सकती, यहां तक कि आपस में गुफ़्तगू भी नहीं की जा सकती। इधर प्रतिक्रियावादी ताक़तें बहुत तेजी से उभरी हैं जो सत्ता को खुश करने के लिए इनके संबंधों को विवाद की तरह उठाते रहते हैं। 
सवाल: हमारे साहित्य में प्रबुद्ध संपादकों की एक समृद्ध परंपरा रही है। समय के साथ संपादकों का चिंतन मात्र प्रबंधन कौशल तक सीमित होने लगा है। इस प्रवृत्ति को आप किस प्रकार देखती हैं ? 
जवाब: देखिए आप जो बात कह रहे हैं , उस पाए के साहित्यकार अब संपादन में नहीं जा रहे हंै। आप देखिए गणेश शंकर विद्यार्थी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, माखन लाल चतुर्वेदी फिर, अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी जैसे साहित्यकार संपादन करते रहे। ये सब संपादक के साथ ही साथ सर्जक भी थे, अतः ये पत्रिका की सामग्री चयन से लेकर भाषा-भाव और शैलीगत पक्षों में हस्तक्षेप रखते थे। धीरे-धीर पत्रिकाओं के स्वामियों ने संपादक को प्रबंधन के कार्य में लगाना शुरू कर दिया, तब साहित्य के कम जानकार लेकिन बाजार संभाल लेने वाले लोग संपादक बनने लगे, इसी कारण यह नुकसानदेह प्रवृत्ति साहित्य में तेजी से उभरी है। 
सवाल: आज के दौर में साहित्य और अख़बार में संबंध पर आपका क्या विचार है?
जवाब: अख़बार की इंच-इंच जगहों पर आज विज्ञापनों का कब्जा है। इसमें बाजारवाद का बड़ा हाथ है। एक समय था जब अखबार इतने पठनीय थे कि हमें रोजाना दो-दो घंटे अखबार पढ़ने में लग जाते थे, अब दस-पंद्रह मिनट में अखबार निपट जाता है। जहां तक साहित्य सामग्री के स्थान कम होते जाने का प्रश्न है, साहित्य तो हर जगह से कम होता जा रहा है। साहित्य के लिए पर्याप्त बजट ही नहीं बनाया जाता। जबकि अनावश्यक सामग्री, योजनाओं में पैसा व्यय किया जाता है। ऐसा लगता है कि साहित्य और पत्रकारिता के सघन, सार्थक रिश्ते को लगातार धकेला जा रहा है। एक जमाने हम लोग ‘जनसत्ता’ का इंतजार करते थे, ‘दिनमान’ में बडी अच्छी समीक्षएं आती थीं। सब धीरे-धीरे बंद हो गया। सहारा के ‘हस्तक्षेप’ में जरूर अच्छी सामग्री आती है, फिर भी वह काफी नहीं है। 
सवाल: समाज द्वारा जहां दलित समाज बहिष्कृत रहा, वहीं महिलाएं तिरस्कृत रहीं। आपको क्या लगता है इन दोनों के बहिष्कार-तिरस्कार की पीड़ा समान है अथवा इनका अलग-अलग समाजशास्त्रीय पहलू हैं?
जवाब: इन दोनों विमर्शों में बहुत हद तक समानता है क्योंकि एक समय था जब स्त्री दलितों की भी दलित थी। जितने अधिकार या आजादी दलितों को प्राप्त थे उतने भी स्त्री को नहीं, अतः मेरे विचार से स्त्री विमर्श और दलित विमर्श एक जगह जाकर मिल जाते हंै। प्रश्न यह है कि आज स्त्री-विमर्श और दलित विमर्श कहां खड़े हैं। मुझे लगता है कि दलित चेतना को विकसित करने में उसका जो बौद्धिक तबका है, उसका बहुत बड़ा हाथ है। जैसे तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ पढ़कर दलितों के हालात का पता चलता है। वीर भारत तलवार जैसे गैर-दलित लेखकों ने भी आदिवासियों, दलितों पर बहुत ही सहानुभूतिपूर्वक लिखा है। समग्र रूप से डाॅ. अंबेडकर का तो महतीय योगदान है ही। इन सबका परिणाम दलितों के आत्मविश्वास के रूप में सामने आया। आज दलित अपनी जाति छुपाता नहीं है बल्कि गर्व से कहता है कि मैं दलित हूं। वही दूसरी ओर मुझे ऐसा लगता है कि स्त्री में अभी तक वह अपेक्षित चेतना नहीं आई है कि वह डटकर खड़ी रह सके। 
सवाल: ममता कालिया आज के समाज में किन चुनौतियों को गंभीर मानती हैं ?
जवाब: हम एक हिंसक मानसिकता के समय में रह रहे हैं। हम एक दूसरे के अस्तित्व को काई मोल नहीं दे रहे हैं। आज स्वयं के अतिरिक्त हम किसी को नहीं पहचानते। हम लोगों को बोझ की तरह अपनाते हैं। समाज में एक दूसरे को जानने-समझने की कोई जिज्ञासा नहीं रही। रिश्तों में हम ठंडे होते जा रहे हैं। यह एक ऐसा खतरनाक संकेत है कि शीघ्र ही हम माता-पिता, पुत्र-पुत्री के रिश्तों को भी बोझ की तरह ढोएंगे। कितनी विचित्र बात है कि हम विचारों के लिए असहिष्णु हो गए हैं और अपराधों के लिए सहिष्णु। अब अपराध का स्तर यह है कि लड़कियों के साथ रेप ही नहीं गैंग-रेप होता है। यह हम कैसा समाज बना रहे हैं। 
सवाल: अपनी समकालीन महिला रचनाकारों की रचना दृष्टि से आप अपनी रचनाधर्मिता को किस प्रकार जोड़ती या पृथक करती हैं?
जवाब: सभी अपनी-अपनी तरह से यथार्थ की पड़ताल करती हैं। समाज को देखने का सबका अपना नज़रिया है। मौजूदा समय में लेखिकाएं दोनांे तरह से लिख रहीं हैं, कुछ पीछे फ्लैश-बैक में जाकर अतीतजीवी किस्म की रचनाएं कर रही हैं, कुछ हैं जो आज के समाज की सच्चाई, समस्याओं को पकड़ना चाहती हैं। आज लेखिकाएं विविध विषय उठा रही हैं। इस दृष्टि से मृदुला गर्ग का ‘वसुधा कुटुम्ब’, चित्रा मुदगल का ‘नाला सोपारा पोस्ट बाक्स नं. 203’, मृणाल पाण्डेय का ‘पटरंगपुर पुराण’, अलका सरावगी का ‘जानकीदास तेजपाल मैनशन’, नासिरा शर्मा ‘कागज की नाव’, अक्षयवट आदि उल्लेखनीय हैं। मुझे लगता है कि पुरूषों के लेखन से कहीं ज्यादा विविधिता तो स्त्रियों के लेखन में हैं क्योंकि वे जीवन से ज्यादा जुड़ी हंै और महिलाएं किसी भी विषय को उठाने से नहीं डरतीं। मेरे नवीनतम उपन्यास ‘कल्चर-वल्चर’ में कला, साहित्य और संस्कृति के बाजार को पैदा करने वाले माफियावाद आदि का चित्रण है। एक अन्य उपन्यास ‘सपनों की होम डिलीवरी’ में मैंने स्त्री-पुरूष संबंधों में तनाव के अलावा युवा पीढ़ी में नशे की समस्या को उठाया है।

सवाल: अपने जीवन साथी के रूप में रवीन्द्र कालिया जैसे व्यक्तित्व को आपने जिया। अपने जीवन में उनके होने को आप कैसे महसूस करती हैं और कालिया जी की भौतिक अनुपस्थिति को आप कैसे भर पाती हैं।
जवाब: हमारा रिश्ता बहुत जीवंत था। यह केवल पति-पत्नी का रिश्ता नहीं था, यह दो साथियों का, दो दोस्तों का रिश्ता था। लोग पति की पूजा तो करते हंै, लेकिन उन्हें दोस्त नहीं मानते। रवि से मेरी सब जरूरतें पूरी होती थीं-दोस्ती की, दुश्मनी की, बहस-मुबाहसे की प्यार-मोहब्बत की...........(भावुक हो गई) वो मेरे बहुत अच्छे सालाहकार भी थे। जहां बैठते थे हंसी ठहाके से वातावरण साकारात्मक कर देते थे। मेरे लिए उनकी भौतिक अनुपस्थिति स्वीकार करना वाकई बहुत कठिन काम है। वस्तुतः मैंने उनको अपने अन्दर बसाया हुआ है। मैं अभी आपसे बात कर रहीं हूं तब भी लग रहा है कि वो पीछे वाले कमरे में है, अभी तक मैंने उनको अनुपस्थित नहीं माना है। हम दोनों एक-दूसरे को लेखन की पूरी आजादी देते थे। आज तक हमने एक-दूसरे की रचनाएं प्रकाशित होने से पूर्व नहीं पढ़ी हंै। जनवरी 1965 में हम मिले थे और दिसम्बर 1965 में हमारी शादी हो गई। 2016 की जनवरी में ही वे संसार से चले गए।

सवाल: आजकल आपकेे अध्ययन कक्ष में क्या चल रहा है?
जवाब: अभी मैं ‘पापा’ उपन्यास पर काम कर रही हूं। जीवन में मुझे दो विलक्षण व्यक्तियों का साथ मिला। एक मेरे पापा (पिता) दूसरे रवि (पति)। ‘पापा’ उपन्यास एक ऐसे व्यक्ति के बारे में है, जो साहित्य की आर्दश आंखों से समाज को देखता है, परंतु समाज की विसंगतियों से दुःखी-परेशान होता है।

सवाल: आपको अपनी सबसे प्रिय रचना कौन-सी लगती है?
जवाब: इतनी प्रिय रचना तो अभी लिखी जानी है। हां, दो कहानियां हंै जो मैंने बडे़ मन से लिखी हैं, एक ‘आपकी छोटी लड़की ’ और दूसरी ‘लड़के’।
सवाल: पत्रिका ‘गुफ़्तगू’ के बारे में आपके क्या ख़यालात है?
जवाब-‘गुफ़्तगू’ नियाहत दिलचस्प और समय के साथ चलने वाली पत्रिका है। चाहे आपको अच्छे शेर तलाशनें हो या अच्छी कविताएं, यह दोनों में बहुत काम आती है। इसमें अन्य सामग्री भी बहुत उत्कृष्ठ है, इतनी अच्छी सामग्री की पहुंच सब तक होनी चाहिए। इसकी मार्केटिंग पर और ध्यान दिया जाना चाहिए। जैसे रेलवे स्टाॅल इत्यादि में भी इसकी उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस छोटी सी मैगजीन में साहित्य के क्षेत्र में बड़ा काम करने की क्षमता मौजूद है। 


( गुफ्तगू के अप्रैल-जून: 2017 अंक में प्रकाशित )

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

गुफ्तगू के अक्तूबर-दिसंबर: 2017 अंक में




3. ख़ास ग़ज़लें: मीर तक़ी मीर, अकबर इलाहाबादी, परवीन शाकिर, मज़रूह सुल्तानपुरी
4. संपादकीय: समाज के प्रति जिम्मेदारी
5. आपकी बात
ग़ज़लें
6. प्रो. वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, बुद्धिसेन शर्मा, सैयद रियाज़ रहीम
7. सागर होशियारपुरी, डाॅ. नाहिद कयानी, तलब जौनपुरी, ऐनुल बरौलवी
8. अलका जैन शरर, चित्रा भारद्वाज, कृष्ण कुमार, अना इलाहाबादी
9. शशि मेहरा, मीनाक्षी नाज़, मनोज एहसास, कुमारी स्मृति
10. सविता वर्मा ग़ज़ल, इरशाद आतिफ़, अतिया नूर, अरविंद असर
11. आर्य हरीश कोशलपुरी, शमीम देवबंदी, गुलफिशां फात्मा अंजुम

12-19. कविताएं-
रामकृष्ण सहस्रबुद्धिे, दिलेर आशना दिओल, शशि पाधा, डाॅ. ज्योति मिश्रा, अंजली मालवीय मौसम, अमरनाथ उपाध्याय, गीता कैथल, नेहा अग्रवाल, अनुभूति गुप्ता, बिहाग श्रीवास्तव मुकुल, लीना चंदर, नवनीत अत्री, रुचि भल्ला, अनिता महुआर, लक्ष्मी श्रीवास्तव कादिम्बिनी
20-21. तआरुफ़: अनिल मानव
22-27. इंटरव्यू: प्रो. नामवर सिंह
28-30. चैपाल: साहित्य के पाठकों की संख्या कम हो रही है ?
31-32. विशेष लेख: प्रयाग का कुंभ और मेला संस्कृति: चंद्र प्रकाश पांडेय
33-35. कहानी: हलजोता - डाॅ. इश्तियाक़ सईद
36. उर्दू अदब: नोवेल की शेरियात - डाॅ. नीलोफ़र फिरदौस
37-40. तब्सेरा: पत्थर की आंख, पदचाप तुम्हारी यादों की, इतवार छोटा पड़ गया, मन दर्पण, समय की रेत पर, तिश्नाकाम, सहरा के फूल
41-45. अदबी ख़बरें
46. गुलशन-ए-इलाहाबाद: प्रो. राजेंद्र कुमार
47-50. डाॅ. बशीर बद्र के सौ शेर
परिशिष्ट: शैलेंद्र जय
51. शैलेंद्र जय का परिचय
52-53. कविता के प्रति सजग और प्रतिबद्ध: रविनंदन सिंह
54-56. मानवता की संरक्षता के लिए लिखी गई कविताएं: डाॅ. श्याम विद्यार्थी
57. समय को साथ लेकर चलने वाले कवि: अरुण शीतांश
58-80. शैलेंद्र जय की कविताएं

शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

बेहद ज़रूरी किताब है ‘काव्य व्याकरण’

इम्तियाज़ ग़ाज़ी की संपादित पुस्तक ‘काव्य व्याकरण’ का विमोचन

गाजीपुर। यूं तो ग़ज़ल व्याकरण की बहुत सी किताबें जगह-जगह से छप रही हैं, यह एक चलन सा हो गया है। लेकिन ग़ज़ल के साथ-साथ हिन्दी-उर्दू काव्य की सभी विधाओं के व्याकरण को शामिल करते हुए किसी पुस्तक का प्रकाशन अब तक नहीं हुआ था। इस जरूरत का महसूस करते हुए इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने ‘काव्य व्याकरण’ का संपादन करके प्रकाशित किया है। वर्तमान समय में ऐसी किताब की ही जरूरत है। इस जरूरत को समझते हुए ही इम्तियाज़ गा़जी ने यह काम किया। इनके इस काम की जितनी तारीफ की जाए कम है। यह बात छत्तसीगढ़ के डीजी मोहम्मद वजीर अंसारी ने ‘काव्य व्याकरण’ के विमोचन  अवसर पर कही। कार्यक्रम का आयोजन 01 अक्तूबर को गाजीपुर जिले के दिलदानगर थाना क्षेत्र के उसिया गांव स्थित अली अहमद अहाता में किया गया। जिसकी अध्यक्षता मदरसा तेगिया शम्सुल उलूम के प्रंबधक मौलाना रियाज हुसैन खान शम्सी ने किया। 
श्री वजीर अंसारी ने कहा कि इम्तियाज ग़ाजी ने यह काम करके जहां देशभर नौजवानों का मार्गदर्शन किया है, वहीं गाजीपुर जिले में एक नए रूप  से साहित्यिक अलख जगा दी है। उनके इस काम से जिले के लोगों को बहुत कुछ जानने-समझने का अवसर प्राप्त होगा। मशहूर शायर मिथिलेश गहमरी ने कहा कि व्याकरण का मतलब अनुशासन होता है, इस किताब के जरिए इम्तियाज गाजी ने लोगों को हिन्दी-उर्दू पद्य साहित्य का अनुशासन जानने-समझने का मौका दिया है। बिना अनुशासन के किसी चीज़ की सही रूप में न तो जानकारी हो सकती है और न ही रचना का सही मायने में सृजन। अब जरूरत इस बात की है कि लोग ‘काव्य व्याकरण’ को गंभीरत से पढ़कर काव्य विधाओं की जानकारी हासिल करें। शायर जुबैर दिलदानगरी ने कहा इस किताब में ग़ज़ल के साथ-साथ दोहा, हाइकु, नात, हम्द, माहिया, रूबाई आदि विषयों की जानकारी बेहद आसान भाषा में समझाकर दी गई है। नौजवानों के लिए यह किताब बहुत ही काम की है। भोपाल से आए मक़बूल वाजिद ने कहा कि यह किताब बेहद ही उल्लेखनीय है, बिना व्याकरण की जानकारी के शेरो-शायरी के काम को ठीक ढंग से अंजाम नहीं दिया जा सकता। काव्य व्याकरण के जरिए इम्तियाज गाजी ने साहित्य प्रेमियों के लिए एक अजीम तोहफा पेश किया है, यह लगभग हर वर्ग के लिए लाभदायक है। 
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मौलाना रियाज हुसैन ने कहा कि जिस तरह वीर अब्दुल हमीद, डिप्टी सईद और वजीर अंसारी आदि अपने-अपने क्षेत्रों में बेहतरीन काम के लिए जाने जाते हैं, उसी तरह इम्तियाज़ गा़ज़ी ने साहित्य के क्षेत्र में बेहतरीन काम करके गाजीपुर का रौशन किया है, उम्मीद है कि इनकी कामयाबी का सफ़र अभी और आगे जाएगा। मैं इम्तियाज को बचपन से जानता हूं, इस लड़के में मेहनत से काम करने की क्षमत शुरू से रही है, यही वजह है कि आज काव्य व्याकरण जैसी किताब लोगों के लिए पेश किया है। कार्यक्रम का संचालन कर रहे इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी ने कहा कि मैंने अपने स्तर पर एक अच्छा काम करने का प्रयास किया है, अगर आप लोगों का सहयोग रहा तो आगे और भी बेहतर काम किए जाएंगे। इस मौके पर कमसानामा के लेखक सुहैल खां, कुंवर नसीम रजा खां, शहाब खां, मार्कण्डेय राय, करीम रजा खां, अतीक खां, जमालुद्दीन खां आदि मौजूद रहे।


मंगलवार, 19 सितंबर 2017

साहित्य से कटने के खतरे कम नहीं

 ‘हमसफ़र’, ‘मां’ और ‘काव्य व्याकरण’ का विमोचन 

इलाहाबाद। साहित्य से कट जाने का मतलब समाज के कई सरोकारों से कट जाना है। इसके खतरे भी बहुत हैं। इसलिए ये जरूरी है कि साहित्य की लौ को न सिर्फ जलाए रखा जाए बल्कि इसे महफूज भी रखा जाना चाहिए। 03 सितंबर को हिंदुस्तान एकेडमी में साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ ने तीन पुस्तकों के विमोचन और मुशायरे का आयोजन किया। इस दौरान साहित्य की विभिन्न विधाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। कहा गया कि साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाना है। अंजली मालवीय ‘मौसम’ की गजल और नज्मों का संग्रह ‘हमसफ़र’, सीपी सिंह का काव्य संग्रह ‘मां’ और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की संपादित पुस्तक ‘काव्य व्याकरण’ के विमोचन के बाद वक्ताओं ने साहित्य की रचनाधर्मिता के विभिन्न विधाओं पर चर्चा की। मुख्य वक्ता बुद्धिसेन शर्मा ने बदलते वक्त में साहित्य की दशा को रेखांकित किया। आगाह किया कि साहित्य को रचना और उस पर व्यापक तरीके से चर्चा करना बेहद जरूरी है। वैचारिक मंथन ही साहित्य को नयी रोशनी देगा। अध्यक्षता कर रहे समाचोलक नीलकांत ने साहित्य पर मंडराते खतरों की तरफ लोगों को आगाह किया। कहा कि मौजूदा हालात में साहित्य के सामने संकट कम नहीं हैं। रविनंदन सिंह ने साहित्य के वजूद की चर्चा की। कहा कि इतिहास गवाह है कि साहित्य की ताकत काफी मजबूत होती है। शैलेंद्र कपिल ने कहा कि ख़ासतौर पर नए लोगों के लिए ‘काव्य व्याकरण’ बहुत अच्छी किताब है। अंजली मालवीय और सीपी की किताबों में शामिल कविताएं बेहद उल्लेखनीय हैं। धनंजय चोपड़ा ने कहा कि कवयित्री अंजली मालवीय जहां रिश्तों के सरोकार को उल्लेखित करती हैं, वहीं सीपी सिंह अपनी कविताओं से समाज के बदलते रिश्ते को रेखांकित करते हैं। ‘काव्य व्याकरण’ का संपादन करके इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने काव्य सृजन सीखने वालों के लिए तोहफा पेश किया है। नंदल हितैषी और शैलेंद्र कपिल ने साहित्य में आए बदलाव पर चर्चा की। इस अवसर पर भारत भूषण मालवीय, शिवाशंकर पांडेय ने भी विचार रखे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया।  
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। बुद्धिसेन शर्मा, भोलानाथ कुशवाहा, डाॅ. श्वेता श्रीवास्तव, डाॅ. विनय श्रीवास्तव, शिवाजी यादव, मनमोहन सिंह ‘तन्हा, धर्मेंद श्रीवास्तव, नरेश महरानी, संजय सागर, सागर होशियारपुरी, फरमूद इलाहाबादी, प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, माहिर मजाल, शैलेंद्र जय, रामायण प्रसाद पाठक, जमादार धीरज, डाॅ. राम आशीष यादव,  इरफ़ान कुरैशी, इम्तियाज़ अहमद गुमनाम, लोकेश शुक्ला, पीयूष मिश्र पीयूष, अवनीश यादव, अजीत शर्मा आकाश, अमित वागर्थ, नायाब बलियावी, महक जौनपुरी, महेंद्र कुमार, अशोक कुमार स्नेही, अरुण सरकारी, शालिनी साहू, डाॅ. नईम साहिल, अर्पणा सिंह आदि ने काव्य पाठ किया। 
                                                    


शनिवार, 9 सितंबर 2017

सामाजिक परंपराओं के खत्म होने का खतरा सामने

गुफ्तगू के इलाहाबाद विशेषांक और श्रद्धा सुमन का विमोचन 

इलाहाबाद। गुफ़्तगू के विमोचन समारोह में इलाहाबाद शहर के साहित्यिक पुरोधाओं को शिद्दत से याद किया गया। अकबर इलाहाबादी, धर्मवीर भारती, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा से लेकर कैलाश गौतम तक के अलावा शहर के मिजाज की विस्तार से चर्चा की गई। दूसरे सत्र में आयोजित मुशायरे में स्वर लहरियां गूंजी। समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. अली अहमद फातमी ने गौरवशाली परंपराओं को सहेजने पर जोर देते हुए याद दिलाया कि बाजारीकरण के खतरनाक दौर में एक शहर के मूल को तलाशना और उसके मिजाज को सामने लाना किसी गंभीर चुनौती से कम नहीं। आगाह किया कि कई तरह के सैलाबों के इस दौर में सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं के खत्म हो जाने का भी खतरा सामने है। इसे हर हाल में बचाने के लिए सामने आना होगा। 
 16 जुलाई को हिन्दुस्तानी एकेडमी में गुफ्तगू विमोचन समारोह एवं मुशायरे का आयोजन किया गया कार्यक्रम की अध्यक्षता उमेश नारायण शर्मा ने किया, मुख्य अतिथि प्रो. अली अहमद फ़ातमी थे। समारोह में दूर दराज से सैकड़ों साहित्यकारों का जुटान हुआ। रामचंद्र राजा के काव्य संग्रह श्रृद्धा सुमन और गुफ्तगू के इलाहाबाद विशेषांक का विमोचन किया गया। दूसरा सत्र मुशायरे का रहा। करीब डेढ़ दर्जन कवि, शायरों ने अपने कलाम पेश कर समां बांध दिया। उमेश शर्मा ने इलाहाबाद शहर के साहित्यिक मिजाज की चर्चा करते हुए कहा, इस शहर के हर मुहल्लों की संस्कृति अलग-अलग है, विभिन्न संस्कृतियों वाले इस शहर का आंकलन करना आसान नहीं है। बस्ती जिले से आए रामचंद्र राजा ने लेखन के अनुभव साझा किया। वाराणसी से आए पत्रकार अजय राय ने इलाहाबाद को साहित्य का गढ़ बताया। यश मालवीय ने इलाहाबाद को साहित्य के बैरोमीटर की संज्ञा दी। कहा कि देश की राजधानी भले ही दिल्ली हो पर साहित्य की राजधानी अभी इलाहाबाद ही है। इस शहर के दिल में अभी भी साहित्य धड़कता है। इस शहर से साहित्यिक यात्रा शुरू करने वाले देश के कई दिग्गज साहित्यकारों के दिल में आजीवन गहराई से इलाहाबाद रचा बसा रहा। रविनंदन सिंह ने शहर के साहित्यिक गतिविधियों की विस्तार से चर्चा की। अशरफ अली बेग और मुनेश्वर मिश्र ने ऐसे आयोजनों को उपयोगी बताया। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने की। 
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता सागर होशियापुरी और संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। अख़्तर अज़ीज़, जावेद शोहरत, शकील ग़ाजीपुरी, नरेश महरानी, प्रभाशंकर शर्मा, हरिभजन लाल श्रीवास्तव, आरसी शुक्ल, अनशनकारी कौशल, डाॅ. रामलखन चैरसिया, सीमा वर्मा अपराजिता, शाहिद सफर, केशव सक्सेना, रमेश नाचीज, हमदम प्रतापगढ़ी, तलब जौनपुरी, अनिल मानव, शादमा जैदी शाद, वजीहा खुर्शीद, डाॅ. पूर्णिमा मालवीय,  शिबली सना, शैलेंद्र जय, जमादार धीरज, भोलानाथ कुशवाहा, मनमोहन सिंह तन्हा, शिवपूजन सिंह, नंदल हितैषी, अजीत शर्मा ‘आकाश’, राजेश राज जौनपुरी, रामचंद्र राजा, डाॅ. महेश मनमीत, योगेंद्र मिश्रा आदि ने कलाम पेश किया। 
कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

लोगों को संबोधित करते उमेश नारायण शर्मा

लोगों को संबोधित करते प्रो. अली अहमद फ़ातमी

लोगों को संबोधित करते यश मालवीय

लोगों को संबोधित करते अजय राय

लोगों को संबोधित करते मुनेश्वर मिश्र

लोगों को संबोधित करते अशरफ़ अली बेग

लोगों को संबोधित करते रविनंदन सिंह

लोगों को संबोधित करते रामचंद्र राजा

अपना कलाम पेश करते जावेद शोहरत

अपना कलाम पेश करते प्रभाशंकर शर्मा

अपनी कविता प्रस्तुत करते शैलेंद्र जय

अपनी कविता पेश करते अनिल मानव

अपनी ग़ज़ल पेश करते शकील ग़ाज़ीपुरी

अपनी ग़ज़ल पेश करते रमेश नाचीज़

अपनी ग़ज़ल पेश करते तलब जौनपुरी

अपनी ग़ज़ल पेश करतीं शिबली सना


अपनी कविता पेश करती सीमा वर्मा

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

अब भी सक्रिय हैं नरेश मिश्र

                                     
    
नरेश मिश्र

                             -ंइम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
नरेश मिश्र इलाहाबाद और पूरे देश में साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में एक जाना-ंउचयमाना वयोवृद्ध नाम है। कई अख़बारों में नियमित काॅलम और आकाशवाणी इलाहाबाद में नौकरी के दौरान प्रस्तुत किए गए अपने कार्यक्रमों की बदौलत इन्होंने अपनी सक्रियता और लेखन का कुशल परिचय हमारे समाज को दिया है। 15 सितंबर 1934 को पंडित तारा शंकर मिश्र के घर जन्मे नरेश मिश्र चार भाई और दो बहनें थीं। पिता तार शंकर मिश्र उस ज़माने में इलाहाबाद में मशहूर वैद्य थे। दूर-ंदूर से लोग इलाज के लिए आते थे। माता बैकुंठी देवी सकुशल गृहणि थीं। प्रारंभिक शिक्षा के बाद राधा रमण इंटर कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद पिता जी इन्हें वैद्य बनाना चाहते थे, चिकित्सक की शिक्षा के लिए इनका दाखिला करा दिया। चंद दिनों के अंदर ही एक दिन शिक्षा के दौरान ही एक लाश सामने लाकर उसके बारे में बताया जाने लगा, इस प्रक्रिया से वे बेहद घबरा गए और चिकित्सक की पढ़ाई छोड़कर चले आए। फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में स्नातक के लिए दाखिला लिया, लेकिन यहां भी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। क्योंकि उस समय डाॅ. जगदीश गुप्त अध्यापक थे जो इनके पिताजी को जानते थे, उनको लगा कि पिता की मर्जी के विपरीत इस विभाग में एडमीशन लेकर पढ़ाई कर रहा है, इसलिए उन्होंने कहा कि अपने पिताजी से लिखवाकर ले आओ की यहां पढ़ाई करनी है। डाॅ. जगदीश गुप्त इनके पिताजी को जानते थे, नरेश मिश्र अपने पिताजी से लिखवाकर नहीं ला पाए, इसलिए पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी। 1956 में आपको दिल का दौड़ा पड़ा, फिर दुबारा अटैक आया। जिसकी वजह से आप गंभीर बीमार हो गए। संपूर्ण इलाज के बाद जब 1960 में ठीक हुए तो फिर से पढ़ाई और नौकरी की चिंता सताने लगी। इनके सारे दोस्त कहीं न कहीं नौकरी पा चुके थे।
नरेश मिश्र के दोस्त बद्री नाथ तिवारी उस समय ‘भारत’ अख़बार में नौकरी कर रहे थे। उन्होंने इनसे लिखने के लिए कहा। उनके कहने पर नरेश मिश्र पहली कहानी लिखकर दे आए। जब बद्री नाथ तिवारी आफिस से लौटे तो 10 रुपये थमाते हुए कहा कि यह तुम्हारी कहानी का पारिश्रमिक है, बाउचर पर हस्ताक्षर करके यह पैसा ले लो और आगे भी लिखने का काम जारी रखो, बहुत अच्छा लिखते हो। पत्र-ंपत्रिकाओं में लिखने का क्रम शुरू हो गया। फिर कादंबिनी का संपादन कार्य इलाहाबाद से शुरू हुआ तो उसके संपादकीय विभाग में नौकरी करने लगे। इसके बाद गांधी मेमोरियल ट्रस्ट में गांधी साहित्य के संपादन का काम तीन वर्षों तक किया। 1962 में आकाशवाणी इलाहाबाद में स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर चयन हुआ, लेकिन पांच साल तक नियुक्ति के लिए इंतज़ार करना पड़ा क्योंकि आकाशवाणी की तरफ से वैकेंसी नहीं हो रही थी, 1967 में नियुक्ति मिली। 25 साल दो महीने तक आकाशवाणी से नौकरी की, इस दौरान कई बार प्रमोशन का आफर मिला, लेकिन प्रमोशन के साथ तबादले की शर्त थी, इसलिए प्रमोशन नहीं लिए। आपकी कुल पांच संताने थीं, जिनमें एक पुत्र का देहांत हो चुका है। दो पु़त्रों में एक पुत्र लेबर विभाग से सेवानिवृत्त हो चुका है, दूसरा पुत्र कचेहरी में नौकरी करता हैं। दोनों की पुत्रियों की शादी हो चुकी है, अपने-ंअपने घरों में आबाद हैं।
अब तक आपकी 70 से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें ‘इंद्रधनुष’, ‘इतिहास बिथी’, ‘क्रांति के स्वर’, ‘इतवारी लाल’ और ‘कश्मीरियत के लिए’ आदि प्रमुख हैं। दो किताबों के प्रकाशन का कार्य प्रगति पर है, शीघ्र ही सामने आएंगी। 82 वर्ष की आयु में आज भी लेखन के प्रति सक्रिय हैं, जो लोगों के लिए मिसाल है।

( गुफ्तगू के जुलाई-ंसितंबरः 2017 अंक में प्रकाशित )

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

गुफ्तगू के इलाहाबाद विशेषांक में


3. संपादकीय: इलाहाबाद विशेषांक और ‘गुफ्तगू’
4-5. आपकी बात
6-10. धरोहर: महादेवी वर्मा
11-24. आज़ादी से पहले इलाहाबाद: प्रो. सैयद अक़ील रिज़वी
25-29. अकबर के यहां मुकम्मल नज़रिया: शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी
30-31. बच्चन, निराला और महादेवी वर्मा का इलाहाबाद: मुकुटधारी अग्रवाल
32-40. इलाहाबाद की उर्दू तहज़ीब व तख़्लीक़: प्रो. अली अहमद फ़ातमी
41-43. लोग अपनी प्यास बुझाते हैं चले जाते हैं: मुनव्वर राना
44-50. कैलाश गौतम: जमात से बाहर का कवि: दूधनाथ सिंह
51-58. प्रयाग की विरासत के स्मारक ; डाॅ. मीनू अग्रवाल
59-61. अच्छा दोस्त और मोहसिन नय्यर आक़िल: अख़्तर अज़ीज़
62-63. फ़िराक़ गोरखपुरी के साथ एक सुब्ह: प्रो. अली अहमद फ़ातमी
64-65. इलाहाबाद और रंगमंच की परंपरा: अजीत पुष्कल
66-68. ग़ालिब फ़कीराबाद में नासाज हो गया: अजय राय
69-73. इतिहास के आईन में इलाहाबाद: कृष्ण कुमार यादव
74-79. हिन्दी आलोचना और इलाहाबाद: रविनंदन सिंह
80. महान महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं अमजदी बानो: मोहम्मद वज़ीर अंसारी
81-82. धर्मयुग को स्थापित करके दम लिया: संगीत सिंह ‘भावना’
83-85. डाॅ. ज़मीर अहसन-यादों के दरीचों से: अतिया नूर
86-87. और बंद हो गईं उर्दू की पत्र-पत्रिकाएं: इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
88-89. सिर्फ़ कवयित्री नहीं हैं महादेवी वर्मा: शाज़ली ख़ान
90-91. हिन्दी प्रसार का प्रमुख केंद्र साहित्य सम्मेलन: इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
92-95. एक अज़ीम शख़्सियत नीलाभ जी अश्क: भूमिका द्विवेदी
96-98. इलाहाबाद विश्वविद्यालय की है अपनी पहचान: अंजली केसरवानी
99-101. हालावाद के पुरोधा हरिवंश राय बच्चन: प्रिया श्रीवास्तव
102-103. तहज़ीब और लियाकत का शहर: ज्योतिर्मयी
104-105. निराला के बाल साहित्य का शैक्षिक अवदान: डाॅ. नितिन सेठी
106. 9 एलगिन रोड: नीरजा मेहता
107. चंद्रशेखर आज़ाद का खून लगा पीपल का पत्ता: केदारनाथ सविता
108-109. हास्य का उपहार लुटाते उपाध्याय जी: नरेश मिश्र
110. हिन्दी साहित्य में प्रयाग: डाॅ. विनय कुमार श्रीवास्तव
111. कल्पवास: शिवानी मिश्रा
112-114. इंटरव्यू: काॅमरेड ज़ियाउल हक़
115. चैपाल: हिन्दी उर्दू साहित्य में इलाहाबाद का योगदान
116. गुलशन-ए-इलाहाबाद- नरेश मिश्र
117-125. ग़ज़लें: दिल उन्नावी, सागर होशियारपुरी, डाॅ. असलम इलाहाबादी, बुद्धिसेन शर्मा, एमए क़दीर, वजीहा खुर्शीद, तलब जौनपुरी, रमोला रूथ लाल, शकील ग़ाज़ीपुरी, अख़्तर अज़ीज़, फ़रमूद इलाहाबादी, डाॅ. नईम साहिल, अजीत शर्मा आकाश, सुनील दानिश, वाक़िफ़ अंसारी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, भारत भूषण जोशी, शाहिद सफ़र, शिबली सना, शादमा ज़ैदी शाद, डाॅ. हसीन ज़िलानी, ज़फ़र सईद जिलानी, डाॅ. राम आशीष यादव, संजू शब्दिता, अमित वागर्थ, रुस्तम इलाहाबादी, राजेश राज जौनपुरी, सगीर अहमद सिद्दीक़ी, रजनीश प्रीतम, अहमद सिद्दीक़ी इलाहाबादी, सोमनाथ शुक्ला, अरुण सरकारी, महक जौनपुरी
126. क़त्आत: जावेद शोहरत
127-128. नरेश महरानी के दोहे
129-132. डाॅ. अशरफ़ अली बेग के सौ शेर
133-147. कविताएं: यश मालवीय, संजय पुरुषार्थी, शैलेंद्र जय, श्लेष गौतम, प्रभाशंकर शर्मा, वसुंधरा पांडेय, अंजली मालवीय मौसम, अमरनाथ उपाध्याय, डाॅ. शिल्पी श्रीवास्तव, लोकेश श्रीवास्तव, तनु श्रीवास्तव, ललित पाठक नारायणी, रुचि श्रीवास्तव, पुष्पलता शर्मा, उर्वशी उपाध्याय, अनिल मानव, पीयूष मिश्र, ईश्वरशरण शुक्ल, शालिनी साहू, नंदल हितैषी, वेदांत विप्लव, रामचंद्र शुक्ल, डाॅ. महेश मनमीत, जयचंद्र प्रजापति ‘कक्कू’, अदिति मिश्रा, मोनिका मेहरोत्रा, अलका श्रीवास्तव
148-159. अदबी ख़बरें
150-174. परिशिष्ट: देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’
175-208. परिशिष्ट: मनमोहन सिंह ‘तन्हा’

मंगलवार, 20 जून 2017

नई पीढ़ी हड़बड़ी में दिख रही है: प्रो. राजेंद्र कुमार

बाएं से- प्रभाशंकर शर्मा, प्रो. राजेंद्र कुमार और नरेश कुमार महरानी

ग़ज़ल की गहराई एवं आलोचना के मर्म को समझने वाले प्रो. राजेंद्र कुमार की आधुनिक हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान है। अत्यंत सरल स्वभाव वाले प्रो. राजेंद्र कुमार जी की कविताएं देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होती रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त प्रो. राजेंद्र कुमार इन दिनों जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। बचपन में राजेंद्र कुमार के मन में अपने बाबा की संगत में बचपन से ही संस्कार के रास्ते साहित्य कब प्रवेश कर गया, पता ही नहीं चला। शुरूआती छात्र जीवन में विज्ञान विषय का विद्यार्थी होने के बावजूद आपकी साहित्य में रुचि रही। आपकी प्रमुख पुस्तकों में ‘ऋण गुणा ऋण’, ‘हर कोशिश है एक बगावत’,‘लोहा लक्कड़’, ‘शब्द घड़ी में समय’, ‘प्रतिबद्धता के बावजूद’ आदि हैं। प्रभाशंकर शर्मा, नरेश कुमार महरानी और लोकेश श्रीवास्तव ने आपसे मुलाकात कर विस्तृत बातचीत की, प्रस्तुत है उसका संपादित भाग।
सवाल: पाठकों की तरफ से सबसे पहले हम आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और शुरूआती जीवन के बारे में जानना चाहेंगे ?
जवाब: मेरे परिवार में चाचा, ताउ, किसी ने सरकारी नौकरी नहीं की। जमींदारी खत्म हुई तो रस्सी जल गई ऐंठन नहीं गई, लगातार आर्थिक स्थिति गिरती गई। दो साल की उम्र में ही मां का देहांत हो गया। बाबू जी मेरे लिए माता-पिता दोनो थे। वे मुझे बहुत प्यार करते थे, लेकिन ज्यों-ज्यों हम बड़े होते गए हमारे बाप-बेटे में तल्खी आती गई, क्योंकि उनको लगता था कि हम कैसे-कैसे लोगों के साथ उठते-बैठते हैं। कारण यह था कि हम कम्युनिष्ट पार्टी के मेम्बर थे। हालांकि हम पढ़ने में तेज़ थे। मेरा जन्म कानपुर में हुआ था, कानपुर उन दिनों मिलों-मजदूरों का शहर था, और हम सुल्तान नियाजी और काॅमरेड रामआसरे आदि की संगत में रहते थे, मिलों के गेट पर धरना-प्रदर्शन आदि में हिस्सा में लेते थे। यह सब पिताजी को खराब लगता था। यह 1957 की बात है जब मैं हाईस्कूल में था। मैं शुरू में विज्ञान का विद्यार्थी था, बीएससी और एमएससी किया। पढ़ाई के विषय में तो घर वालों को हमसे कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन मेरा घूमना-फिरना नागवार लगता था।
सवाल: विज्ञान के विद्यार्थी होकर भी आप साहित्य में कैसे आ गए?
जवाब: मेरा अपने बाबा से तालमेल बैठता था। मैं अपने बाबा का हुक्का भरता था और उनके ज्यादा करीब था। उस ज़माने में लोग उर्दू और फारसी जानते थे। अक्सर वे मुझे फिरदौसी, ग़ालिब आदि के शेर सुनाया करते थे। मेरी दादी रामचरितमानस पढ़ती थीं और उनका निधन हो गया था। एक दिन मेरे बाबा ने कहा दादी की आलमारी खोलो और उसमें पीले कपड़े में लिपटी किताब निकालकर मुझे उसका एक पेज रोज़ सुनाया करो। और बाबा को रामचरित मानस सुनाते-सुनाते संस्कार में साहित्य आ गया। जब हम हाईस्कूूल में पढ़ते थे तो मेरे हिन्दी के जो अध्यापक थे उनका हुलिया पं. नेहरु से मिलता था। उनका श्रीमान शुक्ला था। वे हमें बहुत प्रोत्साहित करते थे, हम कविता पाठ और डिवेट में हिस्सा लेते थे। और हिन्दी साहित्य से जुड़ते चले गए।
सवाल: परंतु विज्ञान का छात्र होते हुए आप हिन्दी के प्रोफेसर कैसे हो गए ?
जवाब: घर में असंतोष का माहौल था, पिताजी से तालमेल नहीं था। आर्थिक समस्याओं के चलते ट्यूशन पढ़ाता था। कई बार घर से भागा। गंगानगर व दिल्ली भी गया, पर घर की याद आई तो वापस आ गया। कानपुर में जेएनके इंटरमीडिएट कालेज में विज्ञान का अध्यापक हो गया था। कानपुर में सीपीआई का सदस्य होने के कारण और मजदूर आंदोलनों में हिस्सा लेने (1958 से 1965 के बीच) के कारण पुलिस हमें परेशान करती थी। चिट्ठी-पत्री के माध्यम से हम अमृत राय और श्रीपत राय (मुंशी प्रेमचंद्र के पुत्र) के संपर्क में आ गया। अमृत राय जी ‘हंस’ पत्रिका के संपादक थे और उन्होंने हमें इलाहाबाद बुला लिया। मेरा उनका रिश्ता लेखक और संपादक का था। अमृत राय जी के यहां एहतेशाम हुसैन साहब का आना-जाना था। हुसैन साहब ने एक दिन मुझसे कहा सिर्फ़ अदब से घर नहीं चलता, कुछ बेअदबी भी करो (उनका इशारा कुछ कामधाम यानि धनोपार्जन से था)। इसके बाद उन्होंने मुझे तीन  फार्म लाकर दिए। हिन्दी,  उर्दू और अंग्रेजी, और कहा कि जिसमें तुम्हारा एडमीशन हो उस विषय में एमए कर लो, और हिन्दी में मेरा एडमीशन हो गया। 1970 में मेरा एमए पूरा हुआ और 1971 में मैं सीएमपी डिग्री कालेज में लेक्चरर हो गया। कई पत्रिकाओं में लिखना-पढ़ना चलता रहा। दिल्ली और कोलकाता की पत्रिकाओं में लेखन चलता रहा और साहित्य का सिलसिला चल पड़ा। 1979 में मैं इलाहाबाद विश्वविद्याल में आ गया और यहीं से विभागाध्यक्ष हिन्दी पद से 2003 में सेवानिवृत्त हुआ। 
सवाल: आप आधुनिक हिन्दी में आलोचक के रूप में जाने जाते हैं?
जवाब: आलोचना से नहीं मैं कविता से जुड़ा था और जब अध्यापक हो गया तो पढ़ाना और व्याख्या करना होता था, और लोग लिखाने लगे। मांग और पूर्ति के इस क्रम में हम आलोचक हो गए। मेरी पहली कविता की किताब 1978 में ‘ऋण गुणा ऋण’ छपी थी। इस पर मुझे हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कार मिला, तब तक आलोचना पर मेरी कोई किताब नहीं छपी थी। मेरी प्रचार-प्रसार में कोई रुचि नहीं थी।
सवाल: आलोचना की आपकी दृष्टि में वास्तविक परिभाषा क्या है ?
जवाब: आलोचना में विवेक की स्वतंत्रता पहली चीज़ है। आलोचना साहित्य का विज्ञान है। पानी चाहे कुएं का हो या बिसलेरी का, सबका सू़त्र एचटूओ है। लेकिन साहित्य में लोगों की राय में विभिन्नता होती है। जितने आब्जेक्टिबली हम साइंस में होते हैं, उतने हम साहित्य में नहीं हो सकते। साहित्य में संवेदनशीलता भी ज़रूरी है। विवेक और संवदेना का संतुलन ही आलोचना है।
सवाल:  क्या आलोचक ग्रुपों में बंटे हुए हैं ?
जवाब: पहले प्रलेस नाम का एक संघ था, बाद में इसकी शाखाएं जलेस और जसम भी बनीं और मतभेत होता गया। लोग अपने-अपने ग्रुपों को प्रोत्साहित करने लगे। अगर वास्तविक लेखक है तो उसके लिए संगठन गौड है, मूलरूप से हम लेखक हैं। ईमानदार लेखन को किसी सांचे में या खूंटे में नहीं बांधा जा सकता। 
सवाल: हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल में किस प्रकार से भिन्नता है ? सिर्फ़ छंद के स्तर पर फ़र्क़ है या विषय वस्तु के आधार पर भी अंतर है ?
जवाब: ग़ज़ल शब्द का अर्थ है माशूका से बातचीत। हिन्दी कविता रूमानियत को खराब मानती है, जबकि ग़ज़ल में आज भी रूमानियत है। ग़ज़ल मूलतः प्रेम विषयक थी। जब सामाजिक सतह पर समस्याएं आईं और प्रगतिशील लेखक संघ बना। सज्जाद जहीर अच्छे संगठनकर्ता थे। इससे ग़ज़ल का मिज़ाज शोषित और वंचित के पक्ष में आ गई। नए बिंब और प्रतीक लाए गए। उर्दू लेखकों ने शाक़ी, शराब और बुलबुल छोड़कर देशी प्रतीकों का चयन किया। लेकिन उर्दू ग़ज़ल छंद शास्त्र की बहुत पाबंद है, इसमें बह्र, रदीफ़, क़ाफ़िया बिल्कुल दुरुस्त होना चाहिए। उर्दू में एक परंपरा रही इस्लाह की, जिसे उस्ताद दुरुस्त करते थे। हिन्दी ग़ज़ल बहुत सी शर्तें नहीं निभा पाई, जो उर्दू ग़ज़ल निभाती है। चाहे हमारे यहां दुष्यंत कुमार ही क्यों न हों उनकी ग़ज़ल में भी कहीं-कहीं संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्द आ गए हैं। ग़ज़ल में आम शब्द होने चाहिए।
सवाल: साहित्य के पाठक कम होते जा रहे हैं ? क्या इसकी वजह इलेक्टानिक मीडिया है या कुछ और ?
जवाब: ये व्यवस्था की गड़बड़ियां हैं, जब जीविका का संकट होगा तो साहित्य कैसे आगे बढ़ेगा ? पंूजवादी समाज का फार्मूला होता है कि कम मेहनत में कम समय में हम ज़्यादा हासिल कर लें, पर साहित्य में यह संभव नहीं। पिछले दिनों नोटबंदी के कारण इलाहाबाद में पुस्तक मेला टल गया। जब धन का आदर बढ़ा तो साहित्य का आदर कम होता गया।
सवाल: युवा पीढ़ी या हमारे नए साहित्यकारों के नाम आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?
जवाब: आज की पीढ़ी संघर्ष के ज़्यादा उपलब्धि पर जोर दे रही है। इनमें संघर्ष का धैर्य नहीं है। छोटी-छोटी उपलब्धियों से ही संतुष्ट हो जाते हैं। नई पीढ़ी अनुभव से ज़्यादा इंटरनेट के भरोसे चलना चाहती है। उदाहरण के तौर पर कोई युवा साहित्यकार नेट पर देखकर किसान जीवन की कहानी बना लेता है, जबकि उसे किसान जीवन का कोई अनुभव नहीं रहता है। नई पीढ़ी हड़बड़ी में दिख रही है। किसी कहानी, कविता को फेसबुक पर 200-300 लाईक मिल गई तो उसी में खुश हो जाते हैं, जबकि रचनात्मकता को धार संघर्ष से मिलती है और संघर्ष से ही आत्मविश्वास आता है।
बाएं से -लोकेश श्रीवास्तव, प्रभाशंकर शर्मा, प्रो. राजेंद्र कुमार और नरेश कुमार महरानी

(गुफ्तगू के जनवरी-मार्च 2017 अंक में प्रकाशित)

रविवार, 28 मई 2017

मौन की बांसुरी, पिघलते हिमखंड, लड़कियां, नदी को सोचने दो और.......



  -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


डाॅ. तारा गुप्ता देश की सुप्रसिद्ध साहित्यकारों में से एक हैं। ग़ाज़ियाबाद में रहती हैं, तमाम साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी हैं। वर्ष 2016 में इन्हें ‘गुफ्तगू’ की ओर से ‘सुभद्रा कुमारी चैहान सम्मान’ प्रदान किया गया था। हाल में इनका ग़ज़ल संग्रह ‘मौन की बांसुरी’ प्रकाशित हुआ है। 112 पेज वाली सजिल्द पुस्तक में 80 ग़ज़लें शामिल की गई हैं। पुस्तक की भूमिका में डाॅ. कुंअर बेचैन लिखते हैं- ‘डाॅ. तारा गुप्ता की ग़ज़लों में जो शब्द-व्यवहार हैं, जिससे कभी आत्म-तत्व और बाहा्र-जगत की टकराहट की दर्शन होते हैं तो कभी आत्म-तत्व की विजय के। जिसे हम आत्म-तत्व कहते हैं वह भी अपने अंदर एक मौन संगीत छुपाए रहता है, या यूं कहें कि यह संगीत ‘मौन की बांसुरी’ बनकर अपनी अनुगूंज से भीतर-भीतर एक ऐसी हलचल पैदा करता है जो ब्रहा्र के चारों और आत्माओं का नृत्य बन जाता है, मन वृंदावन में महारास को जन्म देता है।’ इस टिप्पणी से सहज ही समझा जा सकता है कि इनकी ग़ज़लों में वह संगीत है, जिसे ‘ग़ज़ल’ की वास्वतिक परिभाषा से जोड़ा जाता है। एक ग़ज़ल के मतला में कहती हैं- ‘हम न मानेंगे बुरा तुम शौक़ से इल्ज़ाम दो क्या ज़रूरी है हमाने नाम का उपनाम दो।’ इस तरह पूरी पुस्तक में जगह-जगह उल्लेखनीय अशआर से सामना होता है। इस पुस्तक को अयन प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 220 रुपये है।

‘एहसास कभी मरते नहीं/एहसास ज़िन्दा हैं/ तो ज़िन्दगी है/वक़्त के आंचल में सहेजे/लम्हा-लम्हा एहसास/खुदा की बंदगी है’-यह कविता रजनी छाबड़ा की है, वे लेखन क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं, तमाम सोशल साइट्स, ब्लाग आदि पर खूब लिख रही हैं। राजस्थान में शिक्षा विभाग मे सक्रिय हैं। कई किताबें अब तक छप चुकी हैं। पिछले दिनों ‘पिघलते हिमखंड’ नाम से इनका काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ है। प्रायः स्त्रियों की कविताओं में प्रेम-प्रसंग और व्यक्गित जीवन के दुख का वर्णन होता है। इसी परंपरा का पालन करते हुए रजनी छाबड़ा ने भी काव्य लेखन किया है। छंदमुक्त कविताओं में इन्होंने कहीं-कहीं तीज-त्योहारों और जीवन के अन्य परिदृश्यों का भी जिक्र किया है। एक कविता में कहती हैं- ‘हर शहर की/हर गली में/कुछ इबादतख़ाने और/कुछ बुतख़ाने होते हैं/जहां लोग अपनी-अपनी आस्था के बुत/बना देते हैं/अपने-अपने रस्म-ओ-रिवाज़ों से/उनको सजा लेते हैं/बाकी दुनिया के/धर्म कर्म से फिर वे बेमाने होत हैं।’ इसी तरह जगह-जगह उल्लेखनीय कविताएं पूरी पुस्तक में पढ़ने को मिलती हैं। 96 पेज की इस सजिल्द पुस्तक की कीमत 200 रुपये है, जिसे अयन प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है।
रांची, झारखंड की वीना श्रीवास्तव पत्रकार रही हैं और अब स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं। सात किताबें अब तक छप चुकी हैं, इनमें एक किताब का सपंादन भी शामिल है। पिछले दिनों ‘लड़कियां’ नाम से इनकी काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ है। पुस्तक में लंबी-लंबी 13 कविताएं शामिल की गईं है। कवयित्री ने अपने जीवन के अनुभवों को इन कविताओं में विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया है। पुस्तक की पहली कविता ‘लड़कियां’ और दूसरी कविता ‘लड़के’ शीर्षक से हैं। इन दोनों ही कविताओं में लड़कियों और लड़कों की मनः स्थिति का वर्णन अपने नज़रिए से किया है। लड़कियां कविता में कहती हैं-‘कुछ लड़कियां/होती हैं/जटिल निबंध/क्लिष्ट भाषा, बड़े-बड़े वाक्य /जिन्हें समझना है/बहुत मुश्किल/अपने आस-पास/ हठधर्मिता का कचव ओढ़े/जीती हैं ज़िन्दगी/कुछ होती हैं/प्रेमचंद की कहानियों की तरह/सीधी, सरल, प्रवाहमयी/भोली-भाली, गांव की गोरी/कुछ होती हैं/पंत की कविता की तरह/निर्मल, कोमल/प्रकृति की तरह निश्छल/जिसमें चाहता है दिल रम जाना।’ लड़के शीर्षक की कविता में कहती हैं-‘कुछ होते हैं/बादल से मनचले/जिनका नहीं होता/ठौर-ठिकाना/जो उड़ते रहते हैं/एक शहर से दूसरे शहर/मिट जाती है/ज़िंदगी जिनकी/दूसरे को/कुछ होते हैं/ उस माली की तरह जो अपने ही बाग के फूल को/बेच देते हैं/ दूसरे के हाथ कभी बालों में/ सजने के लिए /कभी गजरा बांधने के लिए।’ इसी तरह इस पुस्तक में शामिल ‘झरेगा हरसिंगार’, ‘वो बूढ़ी अम्मा’,‘नियति’,‘अनुत्तरित प्रश्न’, ‘सजा क्यों’, ‘सत्य परम’ आदि कवितों में विस्तृत वर्णन किया है, अपना नज़रिया पेश किया है। 136 पेज वाले इस पेपरबैक पुस्तक की कीमत  149 रुपये है, जिसे ज्योतिपर्व प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद ने प्रकाशित किया है।

रश्मि शर्मा रांची, झारखंड की रहने वाली हैं, काफी दिनों से लेखन कर रही हैं, पहले भी कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही उनकी नई पुस्तक ‘नदी को सोचने दो’ प्रकाशित हुआ है। इस काव्य संग्रह में 100 कविताएं हैं। अधिकतर कविताओं में प्रेम-प्रसंग के अंतर्गत अपने एहसास का वर्णन किया गया है। काव्य का एक प्रमुख केंद्र बिंदु ‘प्रेम’ रहा है। उर्दू काव्य में तो प्रेम-प्रेसंग कविताएं ही प्रमुखतः रची गई हैं, लेकिन हिन्दी में सामाजिक विसंगतियांें केे साथ-साथ काव्य अपना स्थान रहा है। कवयित्री के पास अपने एहसास को पिरोने के लिए सही शब्द विधान है और उसकी उक्तियों में व्यक्त व्यंजनाओं में गहरे उतरने का कौशल भी। कई बार तेज बहाव में तैरती हुई बातें वर्णित होती हैं तो भी अभिव्यक्ति में भाषाई विसंगति प्रायः नहीं दिखती। उसके बिम्बों में उर्दू नज़्म की तासीर कहीं-कहीं अवश्य झलकती है, लेकिन उसके उद्गारों में प्रयुक्त उपालम्भों की ऐकांतिक निजता उनकी अपनी अर्जित पूंजी है। एक कविता में कहती हैं- ‘ओस की बूंदें पड़ने पर/लाजवंती/झुका के सर शरमाती थी/सुर्ख गुलाब की/पंखुड़ियां/छूते ही बिखर जाती थी/कुछ खूबसूरत सी सुनहरी तितलियां/ मेरे आंगन में मंडराती थीं/एक वक़्त ऐसा था जब दुनिया की सारी रानाइयां/मेरे घर आती थीं।’ प्रेम-प्रसंग से इतर आसमान छू लेने की इच्छा व्यक्त करते हुए कवयित्री कहती है-‘बाबा मेरे/ नहीं करना ब्याह मुझे/मैं कालंबस की तरह/ दुनिया की सैर पर जाउंगी/ ना दो मुझे तुम दहेज/मत बनाओ जायदाद का हिस्सेदार/बस मुझे दे दो/ एक नाव/ज़िन्दा रहने भर रसद/ और ढेर सारी किताबें।’ इसी तरह जगह-जगह अच्छी कविताओं से सामना इस किताब में होता है। 160 पेज वाले इस पेपर बैक संस्करण को बोधि प्रकाशन, जयपुर ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 120 रुपये है।

मूलत: उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की रहने वाली किरण सिंह बिहार के पटना शहर में रहती हैं। अब तक इनकी तीन किताबें छप चुकी हैं, हाल में चैथी पुस्तक ‘मुखरित संवेदनाएं’ प्रकाशित हुई है। कवयित्री ने अपने जीवन के अनुभवों और प्रेम के एहसास का बयान करते हुए रचनाओं का सृजन किया है। जगह-जगह अपने एहसास को नया स्वरूप और अभिव्यक्ति का रूप देने के प्रयास में मशगूल होती दिख रही हैं। एक कविता में अपने एहसास का जिक्र यूं करती हैं- ‘लाज शरम से होठ सिले हैं/पलकें भी हैं बंद/मन ही मन में भाव उमड़कर/गढ़ गईं नव छंद/तुमसे कैसे कहूं।’ अपने प्रियतम से बतियाते हुए कहती हैं- रात अंधेरी/स्वप्न सुनहरी/आंखें उनींदी/दिन दोपहरी/क्यों ख़्याल बन आई/क्या प्रिय तुमको लाज न आई।’प्रेम प्रसंग के अलावा जीवन के जूझने, सच से लड़ने और लोगों को सजग करने का काम भी कवयित्री ने अपनी कविताओं के माध्यम से किया है। 96 पेज पेपर बैक पुस्तक को वातायन प्रकाशन,पटना ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 125 रुपये है।
बदायूं, उत्तर प्रदेश की रहने वाली डाॅ. ऋचा पाठक वर्तमान समय में उत्तराखंड में अध्यापिका हैं। कहानी संग्रह पहले ही प्रकाशित हो चुका है, हाल ही ‘अंबेडकर आज भी’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुआ है। इस पुस्तक में डाॅ. ऋचा पाठक ने देश के संविधान निर्माता डाॅ. भीमराव अंबेडकर की पूरी जीवनी को नए परिदृश्य में सफलतापूर्वक पेश किया है। प्रस्तावना, डाॅ. बीआ अंबेडकर का राजनीति में प्रवेश, डाॅ. अंबेडकर के राजीतिक विचार, डाॅ. अंबेडकर के समय की सामाजिक बुराइयां, अंबडेकर के धर्म विषयक विचार, अस्पृश्यता-निवाराण/चेतना व संघर्ष, डाॅ. अंबेडकर का आधुनिक भारत का सपना, उपसंहार,बाइबिलाग्राफी, और संदर्भ ग्रंथ सूची समेत  दस खंडों में डाॅ. अंबेडकर के बारे में उनके एक-एक पहलू को रेखांकित किया है। अंबेडकर के अमेरिका में शिक्षा ग्रहण करने के हालत का वर्णन करते हुए बताया है -‘उन दिनों महाराजा सयाजीराव बंबइग् में थे और उच्च शिक्षा दिलाने के लिए कुछ विद्यार्थियों को अमेरिका भेजने की व्यवस्था कर रहे थे, इसी समय भीमराव अंबेडकर बड़ौदा में अपने निवास की समस्या लेकर पहुंचे कि उनको देखते ही महाराज ने पूछो- क्या तुम उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अमेरिका जा सकोगे? उनके सहर्ष तैयार होते ही तीन साल के लिए ग्याहर पौंड मासिक छात्रवृत्ति मंजूर हो गई, जिसकी अवधि 15 जून 1913 से 16 जून 1916 तक थी। इसके बदले भीमराव को इकरारनामा लिखना पड़ा कि शिक्षा पूरी होने पर दस वर्ष बड़ौदा रियासत की नौकरी करेंगे।’ उनके राजनीति के प्रवेश का उल्लेख करते हुए इस पुस्तक में बताया गया है कि वे ज्योतिबा फुले, महादेव गोबिन्द रानाडे, जाॅन स्टुअर्ट मिल, माक्र्स और प्लेटो, अरस्तू आदि के विचारों से काफी प्रभावित रहे। राजनीति में आने के बाद दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिए प्रयासरत रहे। 206 पेज के इस सजिल्द पुस्तक को आधारशिला प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 350 रुपये है।
मुंबई की रहने वाली डाॅ. सुमि ओम शर्मा ‘तापसी’ पेशे से चिकित्सक हैं, मेडिकल की चिकित्सा सेव के अलावा साहित्य और चिकित्सा की तमाम गतिविधियों से जुड़ी हुई हैं। जिनमें स्लम में रहने वाले लोगों के लिए चेरिटेबिल क्लिनिक भी शामिल है। साहित्य में कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पिछले दिनों इनका कहानी संग्रह ‘मातृछाया’ प्रकाशित हुआ है। 112 पेज वाले इस संग्रह
में कुल छह कहानियां शामिल की गई हैं। अधिकतर कहानियों में महिलाओं के परेशानियों, उनके हालात और उनके अनुभवों विभिन्न परिदृश्य में उल्लेखित किया गया है। पुस्तक की परिकल्पना में ‘दो शब्द’ के अंतर्गत लेखिका कहती है- ‘छोटे शहरों और देहात में तो नारी जीवन एक कसौटी पर सतत कसा जा सकता है। पुरुष प्रधान समाज उसे बराब कटघरे में खड़ा कर प्रताड़ित करता है। आज भी बाल विवाह, सतीप्रथा, अकेली रह गयी स्त्री को डायन घोषित कर देना... ये सब हमारे भारतीय समाज के माथे पर दाग़ है। पराश्रित, प्रताड़ित स्त्री कहां जाये? चारो ओर रक्षक ही भक्षक बने बैठे हैं।’ लेखिका के इस कथन से इनकी कहानियों के परिदृश्य का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इस सजिल्द पुस्तक को रचना साहित्य प्रकाशन, मुंबई ने प्रकाशित किया है।
(गुफ्तगू के अप्रैल-जून 2017 अंक में प्रकाशित)

रविवार, 14 मई 2017

आजकल तो बहुत लोग बड़े कवि हो गए हैं: डाॅ. जगन्नाथ पाठक

डाॅ. जगन्नाथ पाठक
हा जाए तो विद्वान, समझा जाए तो बेहतरीन अनुवादक और पढ़ा जाए तो साहित्यकार, डाॅ. जगन्नाथ पाठक ऐसे साहित्यकार हैं, जो 82 वर्ष की उम्र में भी लेखन से जुड़े हुए हैं। संस्कृत में किए गए आपके उत्कृष्ट कार्यों के लिए सन 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने आपको सम्मानित किया था। आपने संस्कृत की उच्च शिक्षा बनारस हिन्दू विश्वविद्याल से प्राप्त की और फिर पीएचडी किया। हिन्दी, संस्कृत के अलावा आपको उर्दू, अंग्रेेज़ी, बांग्ला, मैथली और पर्सियन भाषाओं का ज्ञान है। विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन कार्य करते हुए गंगानाथ झा केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ से प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। संस्कृत भाषा में प्रकाशित प्रमुख पुस्तकों में ‘कापिशायनी (पद्य संग्रह), मृद्विका, पिपासा (संस्कृत ग़ज़ल गीतियों का संग्रह), विच्छित्ति वातायनी (दो हजार मुक्तक प्रार्याओं का संग्रह), आर्यासस्राराममृ और विकीर्णपत्र लेखम् (लघु नाटिका) आदि हैं। इनके अतिरिक्त आपने कुछ संस्कृत ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद किया है। जयशंकर प्रसाद की कृतियांः कामायनी और आंसू का संस्कृत पद्य में और ग़ालिब के दीवान का संस्कृत पद्य में अनुवाद ‘ग़ालिब काव्यम्’ नाम से किया है।
संस्कृत साहित्य में आपके योगदान के लिए राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत होने के साथ आपको कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। जिनमें प्रमुख रूप से ‘कापिशायनी’ के लिए साहित्य अकादमी नई दिल्ली और उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार, ‘मृद्विका’ पर वाचस्पति और पिपासा पर उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी का विशिष्ट पुरस्कार के अतिरिक्त कई अन्य सम्मान-पुरस्कार आपको प्राप्त हुए। गुफ्तगू के उप संपादक प्रभाशंकर शर्मा और  डाॅ. विनय श्रीवास्तव ने आपसे मुलाकात करके विस्तृत बातचीत की, प्रस्तुत है उसका संपादित अंश। 
सवाल: आप अपने पारिवारिक जीवन के शुरूआती दिनों के बारे में बताइए?
जवाब: मेरा जन्म 1934 में सासाराम, बिहार में हुआ था। मैंने अपने दादा, पिता, माता सबको देखा, सभी सीधे-सादे छल-कपट रहित लोग थे। मेरी आरंभिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में ही हुई, जहां रटन्त विद्या थी, यही कमी थी। लेकिन मैं जिज्ञासु छात्र था। पं. रामरूप पाठक जी जो साहित्य अकादमी से सम्मानित थे, उन्होंने मुझमें संस्कृत में लिखने व कविता करने की प्रवृत्ति जागृत की और मैं लिखने लगा, उस समय मेरी आयु 15-18 वर्ष की रही होगी। 19 वर्ष की अवस्था में बनारस आ गया और वहां से मध्यमा और शास्त्री की परीक्षा पास की।
सवाल: आप मूलरूप से संस्कृत के विद्वान थे, उर्दू के प्रति आपका लगाव कैसे हुआ?
जवाब: मैं विद्वान तो नहीं विद्याथी रहा हूं। सासाराम में हिन्दुओं के अतिरिक्त मुस्लिम भी कवि और शायर हैं, और साधारण से लगने वाले एक शायर मानुष सहसरावीं (अल्ताफ़ हुसैन मानुष सहसरावीं) से मिला, उन्होंने मुझे उर्दू सिखाया। वे घड़ी बनाकर और बीड़ी बनाकर अपनी जीविका चलाते थे
सवाल: आपके मन में उर्दू सीखने की इच्छा क्या हुई?
जवाब: कुछ मुसलमान मेरे साथी थे जो उर्दू पढ़ लेते थे, तो मुझे लगा कि मैं उर्दू क्यों नहीं पढ़ सकता। मुझे उर्दू के शेर अच्छे लगते थे। मैंने कुछ सिनेमा भी देखा था। हिन्दी सिनेमा में उर्दू के सरल वाक्य और कहन के ढंग ने मुझे प्रभावित किया। मैं मानुष साहब के संपर्क में आया, उनकी 2-3 पुस्तकें भी छपी हैं, उन पर लोगों ने पीएचडी भी की है। कुल मिलाकर मानुष साहब के चलते मेरा उर्दू में लगाव बढ़ा और वही मेरे प्रेरक रहे।
सवाल: उर्दू और संस्कृत में किसी स्तर पर कोई समानता है?
जवाब: मूल तो दोनों का एक ही है। हिन्दी-उर्दू की लिपि भिन्न हो गई।
सवाल: आपने संस्कृत में आर्या छंद पर विशेष रूप से कार्य किया है, इसके विषय में जानकारी दें ?
जवाब: मुक्तक काव्य रचना आर्या छंद में होती है, इसमें प्रत्येक छंद का भाव अलग होता है, जैसे उर्दू के एक शेर में पूरी बात कही जा सकती है, उसी तरह आर्या में थोड़े से शब्दों में पूरी बात कही जा सकती है। आर्या शप्तशती बिहारी सतसई के पहले लिखी गई है। इस छंद में नफ़ासत भी है और कहने की क्षमता भी। यह मात्रिक छंद इसके पहले और तीसरे चरण में 12-12 मात्राएं और दूसरे तथा चैथे चरण में क्रमशः 18-15 मात्राएं होती हैं।
सवाल: आप अपनी आवाज़ में एक आर्या सुनाएं ?
जवाब: खर्जूर यं ग्रदध्रं, स्थितमद्राक्षं निदा मध्याह्ने
       हन्त तमेव रसालद्रुमेदद्य पश्यामि कृतनीड्म।
सवाल: उर्दू के नामचीन शायर ग़ालिब के दीवन का आपने संस्कृत में ‘ग़ालिब काव्यम्’ नाम से अनुवाद किया, यह योजना आपके दिमाग़ में कैसे आई ?
जवाब: ग़ालिब जैसे शायर को जब मैंने पढ़ना शुरू किया तो तब मुझे लगा कि ग़ालिब को समझना मेरे बस की बात नहीं है। फिर मैंने यह घृष्टता की और ग़ालिब के दीवान को अनुवाद करने की कोशिश की। ग़ालिब ह्दय से मुझे खींचता है, उनका एक शेर -
      देखना तकदीर की लज़्ज़त जो उसने कहा,
      मैंने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है।
इस शेर को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि मैं भी कह सकता हूं। बनारस में पढ़ते हुए मेरे मन में लगा कि क्यों न किसी मौलवी साहब से मैं फारसी पढ़ूं, ग़ालिब को और समझ सकूं। इसी विचार के साथ मैं मौलवी साहब से पांच रुपये प्रतिमाह देकर फारसी पढ़ने लगा। यह बात 1960 से 1970 के बीच की है। अनुवाद के सिलसिले में मैं अलीगढ़ गया और वहां पर परमानंद शास्त्री जी से मिला तो उन्होंने बताया कि मेरे मन में यह बात आई, लेकिन अभी तक तय तक नहीं किया था। तो मुझे लगा कि क्यों न मैं यह काम करूं। ग़ालिब के कुछ संस्करण हिन्दी में छपे हैं, उसे आधार बनाकर मैंने काम शुरू किया, मुझे लगा कि कुछ सफलता मिल रही है। अनुवाद एक सतत प्रक्रिया है और मैंने कोशिश की।
सवाल: हिन्दी के तमाम मूर्धन्य साहित्यकारों जैसे हजारी प्रसाद द्विवेदी, वासुदेव शरण के सपंर्क में आप रहे, उनके साथ आपका क्या अनुभव रहा ?
जवाब: जब मैं शास्त्री का विद्यार्थी था तब उनके छोटे भाई ने पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी से मुझे मिलवाया। पं. जी हंसे और मुझसे बोले, मैं भी पहले संस्कृत में लिखता था, बाद में हिन्दी में लिखने लगा क्योंकि हिन्दी जानन वाले ज़्यादा लोग हैं। संस्कृत में लिखने वाला जहां का तहां रह जाता है। जैसे रात में बंधी नाव को खेने वाला। मेरी भाषा पर भी पं. जी का प्रभाव पड़ा। डाॅ. वासुदेव शरण जी के साथ मैं ज्याद बैठता था, वे 60 की आयु तक रहे संसार में , लेकिन बहुत ज़्यादा काम कर गए। उनसे मैंने ग्रहण किया। उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘तुम भोजपुरी पर काम करो और शब्दों की व्युपत्ति की जानकारी रखो।’
सवाल: वर्तमान समय में संस्कृत को लेकर एक वर्ग विशेष की बात होती है, इस पर आपकी क्या राय है ?
जवाब: संकीर्ण दृष्टि हर जगह है। लोग संस्कृत या उर्दू को वर्ग विशेष की भाषा मानते हैं। बाक़ी तो संस्कृत में दाराशिकोह ने भी लिखा है, ऐसा नहीं है कि संस्कृत सिर्फ़ ब्राह्मणों की भाषा रही है। च्रंदभान ब्राह्मण ने फारसी में भी रचना की थी, कायस्थों व जैन लोगों ने भी संस्कृत में लिखा है।
सवाल: साहित्यकारों की भीड़ बढ़ रही है और पाठक कम होते जा रहे हैं, इसकी आप क्या वजह मानते हैं ?
जवाब: जीवन में व्यस्तता की वजह है से साहित्य पढ़ने वाले कम हो गए हैं। पठनीयता की कमी हो रही है, किन्तु मैंने देखा है बिहार में पढ़ने वाले ज़्यादा हैं, वहां पुस्तकों की बिक्री ज्यादा होती है। अपनी-अपनी भाषाओं में लोग पढ़ रहे है। मेरा ख़्याल है कि अब ‘गुफ्तगू’ को पढ़ने वालों की संख्या भी बढ़ी है।
सवाल: ‘गुफ्तगू’ पत्रिका के विषय में आपकी क्या राय है ? इसमें हम और क्या सुधार कर सकते हैं ?
जवाब: ‘गुफ्तगू’ पत्रिका के विषय में बड़ी अच्छी धारणा है। इसके बारे में मेरी पुष्कल जी से बात होती है, उन्होंने कहा कि यह इलाहाबाद के अनुकूल है। ‘गुुफ्तगू’ पत्रिका में उर्दू के शेर ज़्यादा हैं, कुछ और भी कविताएं जोड़ी जाएं और हिन्दी के दोहे भी छापे जाएं।
सवाल: कबीरदास जी की भाषा तो खिचड़ी है, तो इन्हें हिन्दी कवि कैसे मानते हैं ?
जवाब: तो किसका कवि मानें ? मीराबाई तो राजस्थान की थीं, किन्तु हिन्दी की ही मानी जाती हैं। तुलसी अवधी के थे, सूर बृज के थे, क्या से भाषाएं हिन्दी नहीं हैं? हिन्दी बृहद रूप में हैं क्षेत्रीय भाषाएं, चाहे जो भी रही हों।
सवाल: उर्दू अदब में उस्ताद-शार्गिद की परंपरा है, ऐसा हिन्दी जगत में नहीं है क्यों?
जवाब: कोई प्रमाण तो नहीं मिलता, किन्तु हिन्दी में भी यह परंपरा रही है। लोग मार्गदर्शन करते थे। बाद में लोगों ने समझा हम ही सबकुछ हैं और परंपरा कम हो गई। मैंने संस्कृत में लिखने का अभ्यास किया है, लेकिन मुझे कोेई कवि कहता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता, क्योंकि कवि होना बड़ी बात है। मैं सिर्फ़ विनम्रता के नाते यह बात नहीं कर रहा हूं। सचमुच कवि होना कठिन है। आजकल तो बहुत से लोग ‘बड़े’ कवि हो गए हैं।
सवाल: आप युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे ?
जवाब: आधुनिक साहित्य की पत्रिका ‘दृक’ है, इसमें हिन्दी, अंग्रेज़ी और संस्कृत तीनों भाषाओं में लेखते हैं। यह काम इलाहाबाद में हो रहा है। इससे प्रेरणा लेकर और काम किए जाने की आवश्यकता है।
सवाल: आपके जीवन का कोई आदर्श या मार्गदर्शक शेर ?
जवाब: हां, जौक़ साहब का एक शेर है-
              है उसकी सादगी भी तो कुछ इक फ़बन के साथ,
              सीधी सी बात भी है तो इक बाकपन के साथ।

बाएं से: रविनंदन सिंह, अजीत पुष्कल, डाॅ. जगन्नाथ पाठक और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

(गुफ्तगू के जुलाई-सितंबर 2016 अंक में प्रकाशित)
नोट: 08 मार्च 2017 को डाॅ. जगन्नाथ पाठका निधन हो गया।