मंगलवार, 19 जनवरी 2021

उर्दू पत्रकारिता के नामवर सहाफी थे हारुन रशीद

                                                     

हारुन रशीद

                                                            - शहाब खान गोड़सरावी                                       

 सहाफ़त की दुनिया के सुप्रसिद्ध पत्रकार हारुन रशीद अलीग का जन्म 31 मई सन. 1942 ई. को मुंबई में हुआ। इनका पैतृक गांव उसिया है। इनके पिता इस्माईल खान मुंबई में टैक्सी ड्राइवर थे, माता हिफाजत बीबी जो नेक घरेलू खातून थी। हारून रशीद का गांव की तुलना में मुंबई में ज्यादा रहना हुआ। हारून रशीद श्अलीगश् के पिता समाजसेवी ईस्माईल खां ने क्षेत्रिय बच्चों की शिक्षा के लिए श्कमसार हॉस्टलश् के रूप में सन.1962 ई० को दिलदारनगर मे श्हाजी लॉजश् का निर्माण कराया। लम्बे ऊंचे कद के गोल मुखड़े में साधारण सा दिखने वाले हारुन रशीद को बचपन से नेक स्वभाव से जाना जाता था। जैनुल आबेदीन के मुताबिक  1960 ई. में हारून रशीद कक्षा चार की पढ़ाई गिरगांव, मुंबई के चैपाटी म्युनिसिपल स्कूल से पूरा करने के बाद पांचवीं की पढ़ाई के लिए मुंबई के अंजुमन इस्लाम बॉयज वींटी. हाईस्कूल में दाखिले के लिए गए तो उस स्कूल के प्रिंसिपल ने उनका दाखिला करना से मना कर दिया, उन्होंने कहा कि आपके पिता इस कॉलेज की फीस नहीं दे पाएंगे। वे रोते हुए वीटी काॅलेज से चरनी रोड के रास्ते घर वापस लौट रहे थे, तभी एक अजनबी की नज़र उन पर पड़ी। उस अजनबी ने बच्चे को रोते हुए देखकर रोने की वजह पूछी, और फिर अपनी कार मंे उन्हे बिठा उस स्कूल के रजिस्टार के दफ्तर पहुंचे, और उनका दाखिला कराया। 

 वीटी कॉलेज से मैट्रीक करने के बाद सन.1964 ई. मे कक्षा-11 वीं के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मे प्रवेश लिया। वहां से इंटरमीडिएट और ग्रेजुएशन के बाद उर्दू से एम.फिल. की डिग्री हासिल की। हारुन रशीद की समाज सेवा, लेखन के साथ-साथ खेलकूद में खास दिलचस्पी थी। वो अक्सर फ्री समय में क्रिकेट खेलना पसंद करते थे। इंडो-पाक के क्रिकेट मैच में उनकी खासी दिलचस्पी थी। अलीगढ़ पढ़ाई के दरमियान ही हारून रशीद अलीग को सन. 1964-70 ई. तक हर वर्ष बेहतरीन तकरीर के लिए पुरस्कृत किया गया था। पढ़ाई के दरम्यान उनकी शादी अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसारोबार एवं गंगापार कमेटी के संस्थापक खान बहादुर मंसूर अली के परिवार में हाजी मसिहुजम्मा उर्फ जंगा खां की छोटी लड़की रिफत जहां से हुई। पढ़ाई पूरी करने के बाद हारून रशीद रोजी रोटी की तलाश में लग गए। मुंबई में कई छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरियां की, लेकिन कहीं मन नहीं लगा, आखिर में उनका लिखने पढ़ने का हुनर काम आया और वो 1965-70 के बीच छोटे बड़े पत्र पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया। उनके मज़ामीन उर्दू टाइम्स, अखबारे-नौ, उर्दू ब्लिट्ज और उर्दू इंक़लाब में छपे, जिन्हें कई संपादको के द्वारा सराहा गया। उर्दू ज़बान-व-अदब पर उन्होंने ऐसी महारत हासिल की थी कि देखते ही देखते उन्हें मुंबई के साथ-साथ हैदराबाद, लखनऊ जैसे बड़े शहरों के उर्दू अख़बार और रसालों मे भी उनके मज़ामीन छपने लगे। उन्होंने अपने मज़ामीन के जरिए एक आज़ाद सहाफी के रूप मे समाज के बीच एक अच्छी पहचान बनाई। इनकी स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए महाराष्ट्र उर्दू-अकादमी द्वारा सन् 1980 ई० में पुरस्कृत हुए। सन् 1977 ई. मे मशहूर शायर हसन कमाल से इनकी पहली मुलाकात हुई और उर्दू बिल्टज मे बतौर सहाफी काम करना शुरू किया और 1979 ई. मे हारून रशीद अलीग साप्ताहिक उर्दू बिल्टज के संपादक बनाए गए। सन् 1995 के बाद उन्होने रोजनामा इन्क़लाब मे ‘खेल की दुनिया’ और ‘आलम-ए-इस्लाम’ व ‘कलम पे वॉर’ नामक बेहतरीन कालम लिखतेे और अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत इन्क़लाब के शुरुआती दौर में ही अव्वल दर्जे का उर्दू अख़बार बना दिया। इनकी स्पोर्ट्स कॉलम करंजिया हॉउस मुंबई से ब्लिट्ज, इन्क़लाब के उर्दू, हिंदी, इंग्लिश तीनों अख़बारों में छपती। जिसे देखते हुए करंजिया ग्रुप ऑफ न्यूज पेपर के संस्थापक आरक करंजिया हारुन रशीद से काफी प्रसन्न थे, उन्हें अपने बेटे की तरह मानते थे। जिसकी वजह से पांच वर्षो तक बतौर रोजनामा इन्क़लाब मे संपादक बने रहे।

 हारून रशीद अक्सर कमसार-व-बार इलाके के अंजुमन इस्लाहिया कमेटी के प्रोग्राम में शिरकत कर बतौर निजामत करते। सन् 1993 ई. मे बाबरी मस्जिद केस के दरमियान हिंदू-मुस्लिम भाईचारा को बनाये रखने के लिए वो सामने आए, जिसका नतीजा ये हुआ कि मुंबई ठाकुरद्वार स्थित मकान को दंगे मे जला दिया गया। सैकड़ों किताबों से भरी जिं़दगी की सारी मेहनत-मशकत की कमाई को पूरी लाइब्रेरी जलकर खाक हो गई। उनकी जब तक सांसे चली तब तक कौमी एकता के लिए काम किये और वो भी दिन आया जो अपनी तीन बच्चियों और एक बच्चे को छोड़कर 4 मार्च सन. 2000 ई. को दुनिया को अलविदा कह गये। उनकी मिट्टी उनके कहे के मुताबिक पैतृक गांव उसिया सतहवा मोहल्ला कब्रिस्तान में दफन की गई। गौरतलब हो कि हारुन रशीद की बेटी पत्रकार हुमा हारून जो ‘बीबीसी’ लंदन में बतौर एंकर रह चुकी है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित) 


सोमवार, 11 जनवरी 2021

गुफ़्तगू पत्रिका से ज्यादा आंदोलन है : पवन कुमार

पवन कुमार

    पवन कुमार का जन्म मैनपुरी में हुआ। आरंभिक पढ़ाई कई शहरों में हुई। पिता जी पुलिस सेवा में थे, तो लगातार तबादलों के दरमियां कभी इस शहर, कभी उस शहर कयाम बदलता रहा। कभी इस कस्बे की आबो-हवा से रब्तगी की, तब तक अगली पोस्टिंग का फरमान आ गया गया। लेकिन इन्होंने तबादलों को इन तब्दीलियों से बहुत कुछ सीखा। लोगों से समन्वय, संवाद, संबंध स्थापित करने में यह काफी सहायक साबित हुआ। साइंस से ग्रेजुएट करने के बाद लॉ किया। पहले ही प्रयास में प्रांतीय सिविल सेवा में चयन हो गया। कुछ साल प्रांतीय सिविल सेवा में बिताने के पश्चात भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रयास किया और वहां भी सिलेक्शन हो गया। वर्तमान में उत्तर प्रदेश संवर्ग में हैं। अनिल मानव से उनसे बातचीत की, प्रस्तुत उसके प्रमुख भाग।

सवाल: वर्तमान समय में ग़ज़ल का क्या भविष्य है ?

जवाब: साहित्य जिन्दा है और हमेशा जिन्दा रहेगा। साहित्य आदमी को सोचने का तरीका देता है। सोचने का एक जरिया है। और इसी साहित्य की एक विधा ग़ज़ल भी है। आप देखेंगे, कि आज से तकरीबन सात-आठ सौ साल पहले अमीर खुसरो से ग़ज़ल शुरू हुई और दुनिया के अलग-अलग भाषाओं और मुल्कों में ग़ज़ल की शायरी हो रही है। इन 700 सालों में जो ग़ज़ल का मेयार है, वो मीर से, ग़ालिब से, शौक से और बाद में जो प्रोग्रेसिव राइटर्स मजाज, साहिर लुधियानवी लुधियानवी, फ़िराक़ गोरखपुरी, बशीर बद्र साहब, कृष्ण बिहारी नूर और इसके बाद भी जो हमारी नयी पौध है, वहां तक इसका पूरा जलवा बरकरार है। और मैं समझता हूं कि आने वाले समय में ग़ज़ल की जो खूबसूरती है, उसकी गेयता के कारण, उसकी छंदबद्धता के कारण, उसकी लयबद्धता के कारण, हमेशा-हमेशा बनी रहेगी।


सवाल: साहित्य में आपका रुझान कब, क्यों और कैसे हुआ?

जवाब: साहित्य की तरफ रुझान बचपन से ही था। हमारे खानदान में हालांकि कोई लेखक तो नहीं था, लेकिन अध्ययन का माहौल था। धार्मिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, वैचारिक पुस्तकें पढ़ने का माहौल था। विशेषतया ननिहाल पक्ष से मुझे इस तरह की किताबों को पढ़ने और बौद्धिक चर्चाओं से जुड़ने का अवसर प्राप्त होता रहा। कॉलेज के दिनों में लेखन की ओर मुड़ा। अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख वगैरह प्रकाशित होने शुरू हुए। यह सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक कि मैं नौकरी में नहीं आ गया। नौकरी में आने के बाद लेख वगैरह लिखने कम हो गए। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और साहित्यिक विषयों पर लेखन कार्य फिर भी चलता रहा। बाद में कविताओं की ओर विशेषतया उर्दू शायरी से जुड़ाव हुआ। बरेली की पोस्टिंग के दौरान कई अदीबों और शायरों से मिलना-जुलना हुआ। वसीम बरेलवी, कमलेश भट्ट कमल, अकील नोमानी, वीरेन डंगवाल, सुधीर विद्यार्थी, गोपाल द्विवेदी, बी.आर. विप्लवी जैसे अदीबों से उठना-बैठना होता था। इनकी सोहबत का असर यह हुआ, कि ग़ज़ल की तरफ मेरे कदम बढ़ते गए। बाद में अक़ील नोमानी से ग़ज़ल की बारीकियां सीखीं। मैं बाद में जब बदायूं में जिलाधिकारी के पद पर तैनात हुआ, तो मुंतखब अहमद जिन्हें नूर ककरालवी के नाम से जाना जाता है, उनसे भी बहुत कुछ सीखने का मौका मिला।

सवाल: प्रशासनिक सेवा में रहते हुए, आप अदब के लिए समय कैसे निकालते हैं?

जवाब: हालांकि प्रशासन में रहते हुए अदब के लिए समय निकालना थोड़ा मुश्किल होता है, किंतु एक संवेदनशील आदमी उठते-बैठते, चलते-फिरते जो देखता है, समझता है उस पर विचार करता है। यही विचार जब कागज़ पर उतरते हैं, तो वह शेर, ग़ज़ल, कविता, लेख आदि का रूप इख़्तियार कर लेते हैं। यही मेरे साथ भी होता है। प्रशासन है क्या, इंसानी जज़्बातों को समझने, उनकी फिक्र से जुड़ने का जरिया ही तो है, मैं इसे इसी तरह लेता हूं। इन्हीं का इज्हार ही मेरा लेखन है।

सवाल: साहित्य प्रशासन के लिए किस-प्रकार मददगार साबित हो सकता है ?

जवाब: बड़ा ही महत्वपूर्ण सवाल आपने पूछ है। प्रशासन और साहित्य का रिश्ता बहुत अहम है। दरअस्ल प्रशासक किसी भी ओहदे पे हो पहले तो वो इंसान ही है। इंसानी एहसास और इंसानी तकाज़ों की समझ अगर प्रशासक को हो तो वेलफेयर स्टेट की अवधारणा खुद ही मआनीखेज हो जाती है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो साहित्यकार भी रहे और प्रशासन में भी रहे, और दोनों सिम्त उनकी शख़्सियत कमाल रही। मेरा सुझाव यही है कि प्रशासनिक ही क्या अन्य सेवाओं से जुड़े हुए लोग भी अच्छा सृजन कर रहे हैं।

सवाल: वर्तमान समय के सबसे महत्वपूर्ण शायर आप किन्हें मानते हैं?

जवाब: देखिए, इतनी बड़ी लिस्ट है और ग़ज़ल को होते-होते सात सौ साल गुजर गए हैं, तो जाहिर है, कि कभी कोई शेर पसंद आता है, तो कभी शायर पसंद आता है। ग़ज़ल का जो दयार है, दरबार है, यह इतना समृद्ध है, कि किसी एक का नाम लेना तो मुश्किल है, लेकिन फिर भी यदि क्लासिकल शायरों की बात की जाये, तो मीर, ग़ालिब, जा़ैक़, फ़िराक़ आदि वो शायर हैं, जिनको पढ़कर आप समझ सकते हैं, कि हमारी शायरी कितनी समृद्ध है।

सवाल: गुफ़्तगू पत्रिका को तकरीबन आप शुरू से देख रहे हैं, क्या कहना चाहेंगे इसके बारे में ?

जवाब: गुफ़्तगू एक पत्रिका से ज्यादा आंदोलन है। मौजूद वक़्त में जब ज्यादातर मैगजीन्स बन्द हो रही हैं, आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं, ऐसे में गुफ़्तगू एक आंदोलन के रूप में बढ़ती चली जा रही है। मेयार को बरकरार रखते हुए मुसलसल छपते रहने की चुनौती का कामयाबी के साथ सामना करने के लिए गुफ़्तगू परिवार मुबारकबाद का मुस्तहक है। ग़ाज़ी साहब और उनकी पूरी टीम को दिली मुबारकबाद!

सवाल: नई पीढ़ी तो कविता या शेर को सोशल मीडिया पर पब्लिश करके वाह-वाही पा लेने को ही कामयाबी मानती है, आप इसे किस रूप में देखते हैं?

जवाब: निश्चित रूप से सोशल मीडिया ने नये लेखकों को एक आसान प्लेटफार्म उपलब्ध कराया है, जहां वे खुलकर अपने आपको और अपनी रचनाओं को प्रस्तुत कर सकते हैं। किसी गॉडफादर की ज़रूरत नहीं। किसी बैकग्राउंड की आवश्यकता नहीं। लेकिन इसका नुकसान भी बहुत हुआ है, जल्दबाजी के चक्कर मे बहुत कुछ अधपका और अधकचरा परोसा जा रहा है। लोग कुछ भी लिखकर पोस्ट कर रहे हैं जो कई बार अदब की बुनियादी चीज़ों से भी बहुत दूर होते हैं। विधाओं की टेक्निक समझे बगैर सिर्फ़ लिखना और पोस्ट कर देना ही उनकी प्राथमिकता हो जाती है। प्रशंसकों के लाइक्स भी मिल जाते हैं। मेरी राय यह है कि सोशल मीडिया के दोनों पक्ष हैं, जिन्हें समझने की ज़रूरत है।

सवाल: आजकल आपका कौन-सा सृजन-कार्य और अध्ययन चल रहा है?

जवाब: मेरा लिखना पढ़ना तो लगातार चलता ही रहता है। आजकल जो लॉकडाउन का पीरियड था, इसमें ऑफिस के अलावा जब टाइम मिलता है, तो आप अपने शौक पूरे करते हैं। बीते दिनों में मैंने बहुत सारी नोबेल अपनी खत्म की हैं। कई ऐसी नई चीजें भी सामने आई हैं, जिन्हें पढ़ने का मौका मिला है। इधर कई नये-नये शायरों की बहुत खूबसूरत-सी किताबें छपी हैं जैसे-महेंद्र कुमार ‘फानी’, अभिषेक शुक्ला आदि ऐसे कई शायर हैं, जो हम तक पहुंचे हैं और हम उसे पढ़ रहे हैं, आनंद उठा रहे हैं और देख रहे हैं कि किस प्रकार की तब्दीलियां शायरी शायरी और साहित्य में आती हैं।

सवाल: शायरी के लिए उस्ताद का होना, कितना जरूरी मानते हैं आप?

जवाब: शायरी एक ऐसा फन है, जो बिना उस्ताद के मुकम्मल होना बड़ा मुश्किल होता है। उस्ताद और शागिर्द की जो उर्दू ग़ज़ल की परंपरा है, ये बहुत ही खूबसूरत चीज़ है। मुझे याद आता है, कि चकबस्त ब्रजनारायण साहब जो बड़े शायर हैं, उन्होंने कहा है-

अदब ताश्लीम का जौहर है जेवर है जवानी का

वही शागिर्द हैं जो खि़दमत-ए-उस्ताद करते हैं।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2020 अंक में प्रकाशित )