गुरुवार, 21 मई 2026

 

बेला, चंपा, गुलाब सब थे मगर/ तुम जो आए तो तीरगी महकी’

‘स्मार्ट सिटी कार्निवाल’ में कवि सम्मेलन और मुशायरा

अपना कलाम पेश करते डॉ. नायाब बलियावी

प्रयागराज। ‘स्मार्ट सिटी कार्निवाल-2026’ के अंतर्गत साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ की तरफ से 06 मई को सिविल लाइंस मेें कवि सम्मेलन और मुशायरे का आयोजन किया गया। अध्यक्षता डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने किया।

मशहूर शायर डॉ. नायाब बलियावी ने अपनी शायरी में संगम का शानदार उल्लेख किया-‘कली के शहर को शबनम का शहर कहते हैं/इलाहाबाद को संगम का शहर कहते हैं।’

गुफ़्तगू के सचिव नरेश कुमार महरानी ने ज़िन्दगी की हक़ीक़त को दर्शाया-‘न बदला है न बदलेगा, देख ज़माना रूप/कभी न फैलाऊं मैं पंख, पाकर ऊर्जा धूप।’ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की ग़ज़ल में प्रेमिका उल्लेख इस तरह था-‘बेला, चंपा, गुलाब सब थे मगर/तुम जो आए तो तीरगी महकी।’ मख़दूम फूलपुरी ने तरन्नुम से महफ़िल में उत्साह उत्पन्न कर दिया-‘सितमगरों में कभी अपना नाम मत करना/गिरो निगाह से सबकी वो काम मत करना।

कार्यक्रम के दौरान मंच पर मौजूद- (बाएं से) नरेश कुमार महरानी, डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, प्रयागराज के मेयर गणेश केसरवानी, राजेश गुप्ता और विधायक पूजा पाल

युवा शायर अनिल मानव की शायरी ने अलग छाप छोड़ी-‘ कहते हैं जिसको इबादत की बात है/सज़दा न आरती वो मोहब्बत की बात है’। शैलेंद्र जय की कविता काफी उल्लेखनीय रही-‘ज़िन्दगी का वही तो राज़ रखता है/जीने का अपना जो अंदाज़ रखता है।’

वरिष्ठ कवयित्री नीना मोहन श्रीवास्तव ने अपनी शायरी ने मोहब्बत का जिक्र किया-‘वो मोढ़ ढूढ लाएं फिर मिलते थे हम कभी/हर शै महकता हुआ हम भी थे अजनबी।’ रचना सक्सेना ने अपनी ग़ज़ल से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा-चोट पर यूं सितम ढा रही हैं सिसकियां/ज़ख़्म दिल के भरे जा रही हैं सिसकियां’। अना इलाहाबादी ने कहा-‘एक जैसी परविश दे, एक से अवसर/बेटियां होती नहीं, बेटों से कमतर।’इनके अलावा डॉ. प्रीता वाजपेयी, सुनील दानिश, मधु गौतम, शिबली सना, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, हरिनाथ शर्मा ‘सनसनी’, शाहीन खूश्बू आदि ने कलाम पेश किए। गौतम मुखर्जी और मोहम्मद आरिफ़ ख़ान ने संयुक्त रूप से धन्यवाद ज्ञापित किया। 


बुधवार, 20 मई 2026

 बच्चों के साथ खूब खेलते थे राही मासूम रज़ा

चारपाई पर लेटकर पतंग उड़ाने का था ख़ास शौक़

तीन फिल्मों के संवाद लेखन के लिए मिला फिल्मफेयर

                                                                            - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

                                 

राही मासूम रज़ा

राही मासूम रज़ा को टीवी सीरियल ‘महाभारत’ का संवाद लिखने के लिए सबसे ज़्यादा याद किया जाता है, हालांकि इन्होंने और भी बहुत सारे काम किए हैं। रविवार की सुबह नौ बजे जब यह सीरियल दूरदर्शन पर आता था, सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था, जैसे कफर््यू लगा हो। इस सीरियल के संवाद में इन्होंने ‘माताश्री’ और ‘पिताश्री’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया और हिन्दी भाषा को दो नये शब्द दिए। इसके पहले ये शब्द किसी ने सुना या पढ़ा नहीं था। टीवी सीरियल महाभारत के लिए लिखे गए उनके संवाद आज भी हमारे मन-मतिष्क में इस तरह से समाहित हैं कि इसके अलावा कोई अन्य संवाद स्वीकार हो ही नहीं सकता। फिल्म ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ (1979), तवायफ़ (1985) और लम्हे (1991) के लिए बेहतरीन संवाद लिखने पर उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ संवाद का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड प्रदान किया गया था।  

अपनी पत्नी नैयर जहां के साथ राही मासूम रज़ा।

 राही मासूम रज़ा की भांजी डॉ. शबनम रिज़वी बताती हैं-‘बच्चों से उनको बहुत लगाव था। जब कभी ग़ाज़ीपुर आते, पूरे परिवार और मुहल्ले के कई बच्चों को एकत्र करके उनके साथ खेलते थे, उनको कहानियां सुनाते थे। उनके लिए नई-नई कहानियां गढ़ते भी थे। बच्चों से उनकी स्कूल की बातें भी खूब सुनते थे। हर बच्चे से पूछते कि आज स्कूल में क्या-क्या हुआ। ज़रूरत के मुताबिक बच्चों को सलाह देते थे कि-क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।’ पढ़ने-लिखने के अलावा उनको पतंग उड़ाने का भी बहुत शौक़ था। ख़ासियत यह थी कि छत पर रखी हुई चारपाई पर लेटकर पतंग उड़ाते थे। घंटों पतंगबाजी करते थे, ग़ाज़ीपुर में रहने के दौरान यह काम भी ज़रूर करते थे और खूब करते थे।

परिवार के बच्चों के साथ राही मासूम रज़ा।

 वे काफी लंबे समय तक बीमार रहे। उन्होंने अपनी बीमारी को भी खूब इंज्वाय किया। डॉ. शबनम रिज़वी के मुताबिक-‘वे कहते थे कि बीमार हो जाने का मतलब यह नहीं है कि ज़िन्दगी ख़त्म हो गई।‘ उनकी दो शादी हुई थी। पहली पत्नी से कोई औलाद नहीं थी। उसके निधन हो जाने पर उन्होंने नैयर जहां से शादी की। दूसरी पत्नी पहले से तलाक़शुदा थी, उसके पहले से ही तीन बच्चे थे, इन्हें भी राही मासूम रज़ा ने अपने बच्चों की तरह पाला था। विधवा से विवाह करने के कारण उन्हें बहुत मुख़ालफ़त का सामना करना पड़ा था। इसी मुख़ालफत की वजह से उन्होंने अलीगढ़ छोड़ दिया था, जबकि वे इसी यूनिवर्सिटी में अध्यापक थे। मासूम रज़ा की एक बेटी मरियम है, जो वर्तमान समय में अपने पति मजाल मूनिस के साथ अमेरिका में रहती है। उनका एक बेटा शेखू है, जो इस समय मुंबई में रहता है।

 मासूम रज़ा राही का जन्म 01 सितंबर 1927 को ़उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने धार्मिक पुस्तकों का खूब अध्ययन किया। हिंदुस्तानी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने बाद उनकी रूझान साहित्य की तरफ हुई। 

ग़ाज़ीपुर के गंगौली गांव में स्थित राही का घर।

 वर्ष 1967 में अलीगढ़ छोड़कर वे मुंबई चले गए। यहां आकर इन्होंने फिल्मों के लिए लेखन शुरू किया। इनका हिंदी फ़िल्मों में करियर ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित रोमांटिक ड्रामा फ़िल्म ‘मिली’ (1975) से शुरू हुआ। उनके संवाद की काफ़ी प्रशंसा हुई, इसी के साथ हिंदी फ़िल्म उद्योग में उनके सफल करियर की शुरुआत हुई। गोलमाल (1979), कर्ज़ (1980), जुदाई (1980) और डिस्को डांसर (1982) जैसी कई सफल फ़िल्मों में काम करने के बाद बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ‘तवायफ़’ (1985) के लिए भी संवाद लिखा। एक तवायफ़ के जीवन और उसकी दुविधाओं को दर्शाती इस फ़िल्म में उनके संवादों ने किरदारों को मानवीय बनाने और कहानी की भावनात्मक गहराई को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे फ़िल्म को आलोचकों की प्रशंसा मिली। इसके बाद राही मासूम रज़ा ने हनी ईरानी के साथ मिलकर यश चोपड़ा की संगीतमय रोमांटिक ड्रामा ‘लम्हे’ (1991) की पटकथा और संवाद लिखा। कुल मिलाकर उन्होंने फिल्म मिली (1975), अलाप (1977), मैं तुलसी तेरे आंगन की (1978), गोलमाल (1979), कर्ज़ (1980), जुदाई (1980), हम पांच (1980), तवायफ़ (1985), अनोखा रिश्ता (1986), बात बन जाए (1986), नाचे मयूरी (1986), आवाम (1987), लम्हे (1991), परम्परा (1992) और आइना (1993) के लिए संवाद लेखन किया।

 उनकी प्रमुख किताबों में आधा गांव, दिल एक सादा कागज़, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद, कटरा बी आरज़ू, दृश्य संख्या-75, मौज-ए-ग़ुल मौज-ए-सबा (उर्दू), अजनबी शहर: अजनबी रास्ते (उर्दू), मैं एक फेरीवाला (हिन्दी), शीशे के मकान वाले (हिन्दी), छोटे आदमी की बड़ी कहानी और नीम का पेड़ आदि हैं। 15 मार्च 1992 को 62 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। शिक्षाविद् मूनिस रज़ा और विद्वान मेहंदी रज़ा के छोटे भाई थे मासूम रज़ा।


(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)   


शुक्रवार, 15 मई 2026

वर्तमान समय में उर्दू के लिए संजीदगी से काम करने की ज़रूरत है: शबनम हमीद

प्रो. शबनम हमीद उर्दू अदब की मशहूर शोधकर्ता, आलोचक, अनुवादक और शिक्षाविद हैं, जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग से लंबे समय से कार्यरत हैं। इनकी मशहूर किताबों में शेरी अस्नाफ, इंतखाबे ग़ज़लियात, हिंदुस्तानी किस्सों से माखूज उर्दू ड्रामा, आगा हश्र: शख़्सियत और फन, उर्दू साहित्य का इतिहास, और तनकीदी औराक आदि हैं। इन्होंने ड्रामा अनारकली को हिंदी लिपि में हस्तांतरित किया और नासिरा शर्मा के साहित्य अकेडमी एवार्ड से सम्मानित नाविल ‘कोईयां जान’ का हिंदी से उर्दू अनुवाद भी किया जो उनकी शोधीय  योग्यता का बेहतरीन उदाहरण है। रेशादुल इस्लाम ने इनसे ख़ास बातचीत की है, जो इस प्रकार है-

प्रो. शबनम हमीद

सवाल: तालीम के मैयार को बेहतर करने के लिए क्या करना चाहिए? 

जवाब: मेरे ख्याल में अगर शैक्षिक संस्थाएं तत्पर और एकजुट हो जाएं तो यहां की साहित्यिक गतिविधियां बेहतर और स्टैंडर्ड हो सकती हैं। इसके लिए संजीदगी से काम करने की ज़रूरत है। 


सवाल: आप तो बहुत सी उर्दू संस्थाओं से भी जुड़ी रही हैं वहां क्या स्थिति है? 

जवाब:इन संस्थाओं का मकसद उर्दू का प्रसारण एवं विकास जरूर है, मगर वहां के हालात भी संतोषजनक नहीं हैं। 


सवाल: आप यूनिवर्सिटी के जिस विभाग से जुड़ी हैं उस से प्रो. जामिन अली, प्रो. एजाज हुसैन, प्रो. एहतेशाम हुसैन, सैयद अकील रिजवी, प्रो. अली अहमद फातिमी वगैरह जैसे प्रसिद्ध अध्यापक जुड़े रहे हैं इन पर आपको गर्व तो होता होगा? 

जवाब: यकीनन मुझे गर्व महसूस होता है कि मैं इस ऐतिहासिक विभाग का हिस्सा रही हूं, जिस ने उर्दू के कई मशहूर चिंतक, शोधकर्ता और साहित्यकार पैदा किया। 

प्रो. शबनम हमीद से बातचीत करते रेशादुल इस्लाम।

सवाल: सरकारी उर्दू संस्थाओं को कैसे बेहतर किया जा सकता है ?

जवाब: अगर हम खुद को संगठित करें, संस्थाओं पर दबाव डालें, हुकूमत को सही स्थिति से आगाह करें तो स्थिति बदल सकती है। 


सवाल: इलाहाबाद में आप उर्दू भाषा एवं साहित्य  का भविष्य किस तरह देखती हैं? 

जवाब:लाहाबाद उर्दू कविता और साहित्य की एक उपजाऊ जमीन रही है और आज भी है। यहां की फिजाओं में साहित्य व कला की खुशबू रची बची है। छात्रों की दिलचस्पी भी बढ़ रही है यह हर्ष की बात है बस ज़रूरत इस बात की है कि बड़े बुजुर्ग आगे आएं और नई पीढ़ी का मार्ग दर्शन करें उनका प्रशिक्षण करें। 


सवाल: आपने उर्दू विभाग इलाहाबाद यूनिवर्सिटी कब से ज्वाइन किया? 

जवाब: मैंने 1977 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से शिक्षा का आरंभ किया। 1992 में उर्दू ड्रामा पर पीएचडी की डिग्री हासिल की। 2001 में इसी यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर की हैसियत से अपॉइंटमेंट हुआ। इसी साल यूपी सलेक्शन कमीशन के द्वारा प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्य के पद पर मेरा अपॉइंटमेंट हुआ, मगर मुझे अपने विद्यालय से इस हद तक मोहब्बत थी कि मैं ने महिला विद्यापीठ ज्वाइन नहीं किया। 


(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2026 अंक में प्रकाशित)


बुधवार, 13 मई 2026

 गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2025 अंक में 



07. संपादकीय : बाबा-ए-अदब और युग कवि

8-11. मीडिया हाउस: 01 अक्तूबर 1950 से शुरू हुआ साप्ताहिक हिन्दुस्तान - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

12-13. उर्दू नाटक: हे ग़ज़ाला, हे ग़ज़ाला - असग़र वजाहत

14-16.रूह के पुकार बने शकील बदायूंनी के गीत - डॉ. प्रमिला वर्मा

17-19. दास्तान-ए-अदीब: बच्चों के साथ खूब खेलते थे राही मासूम रज़ा - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

20-21. इंटरव्यू: प्रो. शबनम हमीद - उर्दू के लिए संजीदगी से काम करने की ज़रूरत

22-28. चौपाल: 30 लाख रुपये की रॉयल्टी को किस रूप में देखते हैं ?

29. उर्दू के मुस्तनद शायर फ़हीम जोगापुरी

30-37. ग़ज़लें: उदय प्रताप सिंह, क़ादिर हनफ़ी, बसंत कुमार शर्मा, अनुराग मिश्र ‘ग़ैर’, डॉ. इश्क़ सुल्तानपुरी, प्रेमचंद गुप्त, अरविंद असर, शिवचरण शर्मा ‘मुज़्तर’, डॉ. इम्तियाज़ समर, रामावतार सागर, अर्शी बस्तवी, प्रदीप बहराइची, मनजीत कौर मीत, यासीन अंसारी, नूरउद्दीन नूर, नितिन पांडेय

38. अमर राग के मुक्तक

39-44. कविताएं: यश मालवीय, अरविन्द सिंह, प्रियंका माथुर, अरुण आदित्य, अर्चना गुप्ता, कमल चंद्रा, डॉ. पूर्णिमा पांडेय, मंजुल शरण, केदारनाथ सविता, अरुणिमा बहादुर खरे, पूनम श्रीवास्तव

45-53. तब्सेरा: रार्बट गिल और अजंता की पारो, शाम तक लौटा नहीं, पतवारी तुम्हारी यादें, मैं कविता हूं, पहला वेतन, गहवर, शब्द रंग, मेरी कुंडलियां, प्रदीप बहराइची के सौ शेर

54-55. उर्दू अदब :  गुल हाय अक़ीदत, जुस्तजू

56-57. ग़ाज़ीपुर के वीर-31: सबके चहेते थे उसियां के असलम नेता-सुहैल ख़ान

58-62. अदबी ख़बरें


63-92. परिशिष्ट-1: डॉ. शबाना रफ़ी़क 

63. डॉ. शबाना रफ़ीक़ का परिचय

64-66. अनुभूति और लोकानुभूति को उकेरती कविताएं - अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’

67. नारी मन को उधेड़ती कविताएं - शैलेंद्र जय

68. एक बहुआयामी व्यक्तित्व - नरेश कुमार महरानी

69-70. समाज की विसंगतियों, कुप्रथाओं पर प्रहार- निरुपमा खरे

71-92. डॉ. शबाना रफ़ीक़ की कविताएं


93-125.परिशिष्ट-2 परिशिष्ट-2: शगुफ्ता रहमान ‘सोना’

93-94शगुफ्ता रहमान ‘सोना’ का परिचय

95-97. मिलने से बिछुड़ने तक का फलसफ़ा - डॉ. इश्क़ सुल्तानपुरी

98. शब्दों में पिरोकर किया दुनिया के हवाले- मनमोहन सिंह ‘तन्हा’

99. जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास - प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम्’

100. क़लम से जादू बिखेरती शगुफ़्ता रहमान -शिवाजी यादव

101-125. शगुफ़्ता रहमान की कविताएं


126-148. परिशिष्ट-3: जगदीश कुमार धुर्वे

126.जगदीश कुमार धुर्वे का परिचय

127-129. कविताओं में वस्तुस्थित का शानदार अवलोकन- नीना मोहन श्रीवास्तव

130-131. भरपूर मनोरंजन करतीं जगदीश कुमार धुर्वे की कविताएं- शिवाशंकर पांडेय

132-133. बहुमुखी प्रतिभा के प्रचारक-जयचंद प्रजापति ‘जय’

134-135. काव्यधारा में समाज के अनेक विषय समाहित-कमलचंद्रा

136-148. जगदीश कुमार धुर्वे की कविताएं


(गुफ़्तगू: अक्तूबर-दिसंबर 2025)


शनिवार, 9 मई 2026

 ‘गुफ़्तगू’ एक मजबूत दरख़्त बन चुका है: रज़ा मुराद

‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ के दूसरे दिन विभूतियों का हुआ सम्मान


लोगों को संबोधित करते रज़ा मुराद

प्रयागराज। 24 साल पहले गुफ़्तगू जो एक नन्हा पौधा था, आज वह एक मजबूत दरख़्त बना चुका है। ऐसे दरख़्त का खड़ा हो जाना बहुत बड़ी बात है। अगले साल इसकी सिल्वर जुबली होगी और बहुत ही शान से यह सिल्वर जुबली कार्यक्रम आयोजित करेंगे। यह बात 29 मार्च की शाम साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू की तरफ से आर्य कन्या इंटर कॉलेज में आयोजित ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ के दूसरे दिन फिल्म अभिनेता रज़ा मुराद ने कही। उन्होंने कहा कि डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी से जज़्बे को सलाम हैं, जिन्होंने लगातार अदब की खि़दमत की है। हमलोग तो जो अभिनय करते हैं, वह फिल्म के परदे और टीवी पर आ जाता है, मगर अदब का काम इस तरह से नहीं आ पाता। इसके बावजूद अदब का काम करना बहुत बड़ी बात है।

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि गुफ़्तगू का काम बहुत ही सराहनीय है, ऐसे ही साहित्य का काम होते रहना चाहिए। आज इस कार्यक्रम में आकर एक ऐसी शख़्सियत से मिलने का मौका मिला है, जिन्हें हम परदे पर देखते रहे हैं।

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी

गुफ़्तगू के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा सामूहिक प्रयास से हमलोगों ने ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ का आयोजन किया है। इस शहर की साहित्य के रूप में एक ख़ास पहचान रही है, जिसका बार-बार उल्लेख किया जाना चाहिए।

पूर्व अपर महाधिवक्ता क़मरूल हसन सिद्दीकी, अनिल कुमार ‘अन्नू भइया’, पंकज जायसवाल, डॉ. राकेश तूफ़ान, इश्क़ सुल्तानपुरी आदि ने भी लोगों को संबोधित किया। इस मौके पर गुफ़्तगू पत्रिका के नये अंक, डॉ. प्रमिला वर्मा की पुस्तक ‘पत्थर बोल उठे’, डॉ. शबाना रफ़ीक़ की पुस्तक ‘कोरोना तेरे काल में’ और मंजू लता नागेश की पुस्तक ‘यादों का कारवां’ का विमोचन किया गया।कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा और धन्यवाद ज्ञापित किया।

  इससे पहले सुबह के सत्र में ‘लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल और संचालन वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने किया। अजय राय, रविकांत, शिवाशंकर पांडेय, डॉ. एस.एम. अब्बास और डॉ. तारिक़ महमूद ने विचार व्यक्त किए। दोपहर के सत्र में कवि सम्मेलन-मुशायरे का आयोजन किया गया था।

 इस मौके प्रभाशंकर शर्मा, अफ़सर जमाल, अनिल मानव, नीना मोहन श्रीवास्तव, शिवाजी यादव, हकीम रेशादुल इस्लाम, अर्चना जायसवाल, मधुबाला गौतम, संजय सक्सेना, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, सिद्धार्थ पांडेय, डॉ. शबाना रफ़ीक, डॉ. पूनम अग्रवाल, मंजुलता नागेश, डॉ. सोमनाथ शुक्ल आदि मौजूद रहे।


इन्हें मिला अवार्ड


अकबर इलाहाबादी अवार्ड- शबीना अदीब 

अदब नवाज अवार्ड - न्यायमूर्ति अशोक कुमार, आसिफ़ उस्मानी 

डॉ. प्रीतम दास अवार्ड  

डॉ. संदीप कुमार (लखनऊ), डॉ. प्रकाश खेतान (प्रयागराज) 

 

कुलदीप नैयर अवार्ड- 

रामदत्त त्रिपाठी 

रविकांत 

पंकज श्रीवास्तव 

अक्षय चौहान ‘अक्स’


कैलाश गौतम अवार्ड - 

विश्वास दुबे (नीदरलैंड)

जितेंद्र कुमार गंगवार (लखनऊ)

डॉ. प्रदीप मिश्र (सतना)

कुंवर नाजुक (चन्दौली)


सुभद्रा कुमारी चौहान अवार्ड-  

सय्यदा तबस्सुम मंज़ूर (मंुबई)

डॉ. आरती कुमारी (मुजफ्फरपुर, बिहार)

डॉ. कुंकुम गुप्ता (भोपाल)

अर्पणा आर्या (प्रयागराज)

  

सीमा अपराजिता अवार्ड - 

मधूलिका श्रीवास्तव (भोपाल)

नाज़ पुरवाई (अमरावती)

 प्रियंका माथुर (नई दिल्ली)

  शालू सुधीर अवस्थी (भोपाल)


पुष्पिता अवस्थी अवार्ड -

 साँवत राम बैरवा (अजमेर)

  निरुपमा खरे (भोपाल)

   कमलचंद्रा (भोपाल) 

 पूजा गुप्ता (मिर्ज़ापुर)


धीरज अवार्ड - 

ज़किया शेख़ मोहम्मद अमीन (मुंबई)

शकुंतला मित्तल (गुरुग्राम, हरियाणा)

सत्यम भारती (बेगुसराय)

 सुधा श्रीवास्तव (प्रयागराज)


डॉ. सुधाकर पांडेय अवार्ड -

 जनार्दन ज्वाला (मरणोपरांत, ग़ाज़ीपुर), 

मोहन राकेश (दिलदारनगर), 

डॉ. अब्दुल मन्नान (नई दिल्ली), 

डॉ. वसीम रज़ा अंसारी (ग़ाज़ीपुर)


उमेश नारायण शर्मा अवार्ड - 

वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार यादव

 वरिष्ठ अधिवक्ता इमरान उल्लाह

  अधिवक्ता राहुल चौधरी

  अधिवक्ता अनिल कुमार वाजपेयी


मिल्खा सिंह अवार्ड -  

आर. पी. शुक्ल (वालीबाल)

 बिप्लब घोस (फुटबाल)


गुफ़्तगू अवार्ड - 

डॉ. कंचना सक्सेना (जयपुर) 

जगदीश कुमार धुर्वे (इटारसी)

डॉ. शैलेष गुप्त वीर (फतेहरपुर)

 रचना सक्सेना (प्रयागराज) 




प्रयागराज से ही पूर्ण होता है देश का साहित्य: मेयर 

कार्यक्रम के पहले दिन ‘हमारी सांस्कृति विरासत’ पर हुई संगोष्ठी 

 ‘गुफ़्तगू के 24 साल’ नामक स्मारिका का विमोचन करते अतिथि और टीम गुफ़्तगू के सदस्य।

प्रयागराज। हमारे शहर से ही पूरे भारतवर्ष का साहित्य संपूर्ण होता है, बिना प्रयागराज के साहित्य को शामिल किए बिना देश का साहित्य कभी मुकम्मल नहीं हो सकता। निराला, फ़िराक़ महादेवी, अकबर, पंत तो यहां की धरोहर हैं ही, इसके साथ-साथ महत्वपूर्ण यह है कि महर्षि बाल्मीकि ने भी रामचरित मानस की रचना इसी धरती से की थी। इसी परंपरा और ऐतिहास को रेखांकित करने के लिए साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ ने ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ का आयोजन किया है। इस प्रयास की जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम है। गुफ़्तगू परिवार ने साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया है। यह बात 28 मार्च की शाम आर्य कन्या इंटर कॉलेज में साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू की तरफ़ आयोजित ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ के पहले दिन ‘हमारी सांस्कृति विरासत’ विषय पर मेयर गणेश केसरवानी ने कही। उन्होंने कहा कि शहर की परंपरा और बेहतर ढंग से उल्लेखित करने के लिए नगर निगम की तरफ से ‘साहित्य तीर्थ’ की स्थापना की जा रही है। इस मौके पर पुस्तक ‘गुफ़्तगू के 24 वर्ष’ और ‘ए जनरी ऑफ अचिवमेंट एण्ड एस्पाइरेशन’ का विमोचन किया गया।

गुफ़्तगू के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि हमने प्रयागराज की परंपरा को एक बार फिर से पूरी दुनिया में उल्लेखित करने के लिए ही ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ का आयोजन किया है।

 इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडी सेंटर के कोआर्डिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कहा कि इस शहर का तहज़ीब कण-कण में बसा हुआ है। इस शहर को पत्रकारों, साहित्यकारों, ऋषियों-मुनियों, मौलवियों, चित्रकारों आदि ने मिलकर रचाया और बसाया है। इस शहर की ख़ासियत यहां की अक्कड़ी, फक्कड़ी और मक्कड़ी है, जो देश के किसी भी दूसरे शहर में नहीं मिलती।

 मुख्य अतिथि पूर्व पुलिस महानिरीक्षक लालजी शुक्ल ने कहा कि संस्कार को मूल में रखकर ही सांस्कृतिक विरासत तैयार होती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि अन्य चीज़ों के अलावा यहां की दही-जलेबी भी बहुत मशहूर है, जो कहीं और नहीं मिलती। अनिल कुमार ‘अन्नू’ भइया ने कहा कि गुफ़्तगू के प्रयास की जितनी भी सराहना की जाए कम है। डॉ. कंचन सक्सेना और अजीत शर्मा आकाश ने भी लोगों को संबोधित किया। संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और धन्यवाद ज्ञापन नरेश कुमार महरानी ने किया।