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सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

भगवान और महानायक की संज्ञा क्यों ?







पिछले लगभग एक दशक से महानायक और भगवान शब्द के वास्तविक अर्थ से खिलवाड़ किया जा रहा है। सचिन तेंदुल्कर को भगवान और अमिताभ बच्चन को महानायक की संज्ञा दी जा रही है। जबकि ये दोनों ही उपाधियां किसी भी दृष्टि से सहीं नहीं है। भगवान वह होता है जिसके अंदर ईश्वरी शक्ति हो और देश का महानायक उसे कहा जा सकता है जिसने बिना किसी लोभ-धन के देश की सेवा की हो। अब परिदृश्य में देखा जाए तो, न तो सचिन तेंदुल्कर भगवान हो सकते हैं और न नहीं अमिताभ बच्चन महानायक।इसमें कोई शक नहीं है कि भारत मुनियों-फकीरों का देश है। यहां राम,कृष्ण और गौतम ने जन्म लिया है और परविश पाई है। देश और समाज के लिए कार्य करने वालों का आदर किया जाता रहा है। महात्मा गंाधी जैसे अहिंसावादी नेता की पूरी दुनिया कायल है, सारी दुनिया में अहिंसा के प्रतिमूर्ति के रूप में उन्हें जाना जाता है। गांधी के अलावा भारत को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए हजारों लोगों ने बिना किसी निजी स्वार्थ के अपनी जान की कुर्बानी दी है। सरदार भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, अशफाकउल्ला जैसे तमाम लोग इसकी जीती जागती मिसाल हैं। इन सबके बीच यदि अमिताभ बच्चन को देश के महानायक की उपाधि दी जा रही है, तो यह किस तर्क पर आधारित है। जहां तक अमिताभ बच्चन के शख्सियत का सवाल है तो इसमें कोई शक नहीं है कि वे भारतीय फिल्म इंडस्टृी के सबसे कामयाब सितारे हैं, उन्होंने बालीवुड को नई दिशा दी है। बड़े-बड़े फिल्म निमार्ता-निदेशक उनके साथ काम करके खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सच है कि वे फिल्मों में काम खुद के धन और ख्याति अर्जित करने के लिए करते हैं। टीवी चैनलों के कार्यक्रमों में आते हैं, तरह-तरह की चीजों की एड और माकेर्टिंग करते हैं, जिसके बदले संबंधित कंपनियों से करोड़ों रुपए लेते हैं। और यह धन खुद के लिए अर्जित करते हैं। इससे देश और समाज को कोई खास फायदा नहीं होता। अब ऐसे में सवाल उठता है कि जो आदमी एक-एक क्लिप का लाखों रुपए वसूलता हो, दंत मंजन से लेकर ठंडा तेल जैसे प्रोडक्ट का प्रचार करता हो, वह बहुत बड़ा कलाकार तो हो सकता है, लेकिन देश का महानायक कैसे हो सकता है। आखिर किस आधार पर उन्हें देश के महानायक की संज्ञा दी जा रही है।इसी तरह सचिन तेंदुल्कर को भगवान की संज्ञा दी जा रही है। सचिन की क्रिकेट की प्रतिभा से किसी को इंकार नहीं हो सकता है। उन्होंने समय-समय पर अतुलनीय बल्लेबाजी की है, ढेर सारे रिकार्ड उनके नाम दर्ज हो चुके हैं और आने वाले दिनों में उसमें इजाफा ही होने वाला है।बड़े-बड़े दिग्गज गेंदबाजों को उन्होंने धूल चटाया है। व्यक्तिग रिकार्ड के हिसाब से निःसदेह वे दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट बल्लेबाज हैं। अनगिनत बार उनके प्रदर्शन से भारत को जीत हासिल हुई है। इन सबके बीच हमें यह भी देखना चाहिए कि वे जितने बड़े खिलाड़ी हैं, भारत की क्रिकेट टीम दुनिया के अन्य टीमों के मुकाबले उतनी बड़ी नहीं है, उतनी कामयाबी और रिकार्ड भारतीय क्रिकेट टीम के नाम पर दर्ज नहीं हैं। अगर उन्हें भगवान की संज्ञा दी जा रही है, तो जिस टीम के सदस्यों में एक भगवान हो, उस टीम के हिस्से में पराजय तो कभी आनी ही नहीं चाहिए। जब से वे क्रिकेट खेल रहे हैं, तब से छह विश्वकप का आयोजन हो चुका हैं,मगर छह विश्वकपों में से भारत सिर्फ एक बार ही विश्वविजेता बन सका है, आखिर क्यों। भगवान तो वह होता है जिसके अंदर ईश्वरीय शक्ति हो।क्या सचिन के अंदर ईश्वरी शक्ति है। इसके साथ-साथ हमें यह भी देखना चाहिए कि उन्होंने क्रिकेट के मैदान में जो प्रदर्शन किया है उसके बदले उन्हें करोड़ों रुपए मिलते रहे हैं। क्रिकेट की वजह से ही उन्हें बेशुमार दौलत और शोहरत मिली है। विभिन्न प्रोडक्ट्स का प्रचार टीवी चैनलों पर करते हैं, उसके बदले करोड़ों रुपए वसूलते हैं। इससे साफ जाहिर हो जाता है कि उनके बेहतरीन प्रदर्शन से सबसे अधिक उनको व्यक्तिगत लाभ हुआ है। ऐसे में व्यक्तिगत लाभ के लिए बड़े से बड़े काम करने वाले को क्या भगवान कहा जाना उचित है। इसमें कोई शक नहीं है कि उनके द्वारा बनाए गए रिकार्ड की चर्चा होती है और वे देश के अन्य तमाम खिलाड़ियों से बेहतर दिखाई पड़ते हैं तो हमें गर्व होता है कि इतने सारे रिकार्ड बनाने वाला खिलाड़ी हमारे देश का है। लेकिन इसके लिए उसे भगवान कैसे कहा जा सकता है। कितनी हैरानी की बात है कि देश को आजाद को कराने के लिए हंसते-हंसते फंासी का फंदा चूमने वाले और अंग्रेजों की गोलियों खाने वालों को तो देश के महानायक की संज्ञा नहीं दी जा रही है। देश से भ्रष्टचार मिटाने के लिए बिना किसी निजी स्वार्थ के संघर्ष करने वाले, समय-समय पर विभिन्न प्रकार का मोर्चा लेने वाले अन्ना हजारे के काम याद नहीं है। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला, मंगल पांडेय, वीर सावरकर, महारानी लक्ष्मीबाई, बाबा आम्टे और अन्ना हजारे जैसे लोग जिन्होंने खुद के फायदे के लिए कोई कार्य नहीं किया, इनकेा महानायक नहीं कहा जा रहा है। जो एक-एक क्लिप और एक-एक प्रदर्शन के बदले बकायदा सौदा करते हैं और करोड़ों रुपए वसूलते हैं, वे देश के महानायक है, आखिर इसका आधार क्या है।


नाज़िया गाजी

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

साहित्यिक पुस्तकों की कीमत इतनी अधिक क्यों

------------- -------------------- नाजिया गाज़ी ---------------------------------------------- अदब की दुनिया में यह चर्चा आम है की पठनीयता कम हो रही है. किताबें पढ़ने के बजाये लोग टीवी चैनलों पर खबर,फिल्म और सीरियल देखना व इन्टरनेट सर्फ़ करना ज्यादा पसंद करते हैं. ज़ाहिर है सूचना टेक्नालाजी के युग में लोग नई तकनीक का इस्तेमाल करेंगे और उसका आनंद लेंगे. नई चीजों का लुत्फ़ हर कोई लेना चाहता है, मगर इसका मतलब यह नहीं है की पुरानी चीज़े बिसरा दी जाती हैं. पठनीयता चाहे किताबों की हो या अखबारों की कम नहीं हो रही है. अखबारों और किताबों का कोई विकल्प नहीं हो सकता है. हाँ, समय के साथ लोगों की मानसिकता, सोच समझने का तरीका और पढ़ने की विषय वास्तु बदलती है. साथ ही पढ़ने के लिए उपलब्ध सामग्री और आदमी के बज़ट पर बहुत कुछ निर्भर करता है. क्योंकि कमरतोड महंगाई के बेच पहले लोग रोटी,शिक्षा और सेहत की ज़रूरतें पूरी करते हैं, इसके बाद ही पढ़ने के लिए किताबें या अखबार मगाने की सोचते हैं. ऐसे में अगर किताबों की कीमत अधिक होगी तो लोग नहीं खरीदेंगे या फिर बहुत कम खरीदेंगे. पिछले दो-तीन दशकों से खासतौर पर साहित्यिक किताबों के दाम में जिस तरह से इजाफा हुआ उससे तो यही लगता है पठनीयता कम होने की मुख्य वजह किताबों का मूल्य है. महंगाई के दौर में किताबों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई, जिसका असर पठनीयता पर पड़ा है और विकल्प खोजने को मजबूर हुए हैं. आज हालात यह हैं की सौ से दो सौ पेज वाले किताबों का दाम सौ रुपये से लेकर पांच सौ रूपये तक है. ऐसे माध्यम आय वर्ग का कोई पाठक कोई काव्य संग्रह या कहानी संग्रह पढ़ने के लिए इतना धन क्यों खर्च करेगा. अगर किताब खरीदने की हिम्मत भी जुटाता है तो साल एक या दो किताबें ही खरीद पाता है. ऐसे में लोग डेढ़ दी सौ रूपये में डिस्क कनेक्सन लेकर महीने भर टीवी देखेगा या किताबें खरीदेगा. विडम्बना यह है कि प्रकाशकों का लक्ष्य आम आदमी को किताब बेचना रहा ही नहीं. ऐसा नहीं है कि किताबों पर लागत मूल्य अधिक हो जाने कि वजह से दाम इतने अधिक रखे जाते हैं. हकीकत यह है कि आज भी सौ पेज की सजिल्द किताब का लगत मूल्य दस से बारह रुपये ही आता है, मगर इनको बेचने की कीमत दो सौ से तान सौ रूपये रखा जाता है. दरअसल, लगभग सभी प्रकाशकों ने सरकारी और एनजीओ वाले लायेब्रेरियों में जुगाड़ भिड़ा रखा है और उन्हीं के लिए किताबें प्रकाशित कर रहे हैं. पुस्तकालय के लिए खरीदारी करने वालों को अलग से तय कमीशन देकर अपनी किताबें बेच लेते हैं. किताब का दाम तीन रूपये प्रिंट कर दिया, लाएब्रेरियन से दो सौ रूपये में तय कर लिया, सौ रूपये लाएब्रेरियन की जेब में गया और प्रकाशक की किताबें भी बिक गयीं. इस तरह का खेल ज़ारी है, इस खेल की जानकारी सभी को है लेकिन इसपर चिंतन करने वाला कोई नहीं है. ऐसे में पठनीयता घटने के लिए टीवी चैनलों पर आने वाले कार्यक्रम और इन्टरनेट की सुविधाएँ जिम्मेदार कैसे हो सकती हैं. यह सब मनोरंजन के अन्य माध्यम हैं, जिसका लुत्फ़ लोग उठा रहे हैं. किताबों का दाम अधिक होने के कारण पढाई के लिए निकाले जाने वाला समय भी इन्टरनेट और टीवी को दिया जा रहा है. और यह रास्ता पाठकों ने मज़बूरी बस चुना है, स्वेच्छा से नहीं. अख़बारों के पाठकों में लगातार वृद्धि होना भी साबित करता है कि पढ़ने कि प्रवृत्ति कम नहीं हुई है. अब तप मध्यवर्गीय परिवारों और छोटे-छोटे कस्बों में भी अखबार पहुँचने लगे हैं. गावों और कस्बों का आलम यह है की एक अखबार को चालीस से पचास लोग पढ़ते हैं. गाव के चौपालों में अखबार आता है, सुबह बारी-बारी से एक-एक पन्ने बांटकर कई लोग पढ़ते हैं, उसके बाद बारी-बारी से घरों में वही अखबार पढ़ा जाता है, जो महिलायें साछर हैं वो अखबार ज़रूर पढ़ती हैं और बाकायदा प्रकाशित खबरों पर चर्चा करती हैं. शहरों में रहने वाले लोग भी भले ही इन्टरनेट सर्फ़ करते हों और टीवी देखते हों लेकिन अखबार और किताबें ज़रूर पढ़ते हैं. ऐसे पठनीयता कम होने की बात कहना किसी हिसाब से मुनासिब नहीं हो सकता. अख़बारों की पठनीयता बढ़ने की वजह इनका दाम है. अख़बारों के दाम आज आम आदमी की बज़ट में है, इसलिए अधिकतर लोग अखबार मागंते और पढ़ते हैं.अगर सिर्फ उत्तर प्रदेश का उदहारण लें तो लगभग चार साल पहले कुछ टैबलाईट साइज के अखबार लंच हुए जिनका दाम एक रूपये है. इन अख़बारों की बिक्री खूब हो रहो है, जिन घरों में अधिक दाम के कारण बड़े साईज वाले अखबार और किताबें नहीं आती थीं, वहाँ भी अब अखबार आने लगा है. वैसे भी टीवी चैनल और इन्टरनेट अखबार और किताबों के विकल्प कभी नहीं हो सकते हैं. हम घर, बाज़ार,दूकान,दफ्तर,सफर, खेत-खलिहान आदि जगहों पर जिस आसनी और अपने समय के अनुसार पढ़ सकते हैं, उतनी आसनी से टीवी चैनल और इन्टरनेट का लुत्फ़ नहीं उठा सकते. आज ज़रूरत इस बात की है कि प्रकाशक किताबों का कम कारण, और दूसरी ओर पुस्तकालयों में अधिक कीमतों वाली किताबों कि खरीद पर पाबंदी लगे या इसलिए कोई मानक निर्धारित कर दिया जाए।

इस मुद्दे पर गुफ्तगू से उपसंपादक डाक्टर शैलेष गुप्त वीर ने कई साहित्यकारों से बात की जो गुफ्तगू के अप्रैल-जून २०११ अंक में प्रकाशित हो रहा है।

बेकल उत्साही: मैं आपसे पूछता हूँ कि वो कौन सी पुस्तकें हैं जो बहुत सस्ती हैं. देखिये कागज़ महंगा है, प्रिंटिंग महँगी तो पुस्तक क्यों नहीं होगी? क्रिकेटरों पर आप करोड़ों खर्च कर रहें हैं, साहित्यकारों पर एक नया नहीं.जो बुनियाद है कमेंट्री लिखता है, फिल्म के लिए संवाद लिखता है, स्क्रिप्त लिखता है, गीत लिखता है, उसके लिए आपके यहाँ कोई कीमत नहीं और फिल्म पर काफी पैसा खर्च करते हैं, गानेबाजी पर करोड़ों लुटाते हैं ..... और रूस आदि देश में साहित्य और साहित्यकारों को प्रोत्साहित करते हैं, उनपर खर्च करते हैं, हमारे मुल्क में क्यों नहीं? हमारे मुल्क के पीएम और प्रेसिडेंट क्रिकेट देखने के लिए आठ घंटे बैठ जाते हैं चाहे मुल्क तबाह हो जाए।

वसीम बरेलवी: साहित्यिक किताबों के साथ मामला यह है कि ये कम छपती हैं और छापने वाले प्रकाशक भी बहुत कम हैं. प्रकाशक आमतौर पर वो लिट्रेचर अधिक छापना पसंद करते हैं जो बाज़ार के अंदर ज्यादा से ज़्यादा बिके. बड़े ख्यालात और चिंतन विषयक पुस्तकों के पाठक बहुत कम हैं, इन्हें छपने पर प्रकाशकों को इनका रिटर्न नहीं मिल पाटा. आज कि दुनिया बिजनेस के हिसाब से चलती है. साहित्य भी एक जगह जाकर कारोबारियों के हाथ में आ जाता है और कारोबारी अपनी दृष्टिकोण से उसे देखते हैं. अतः उन्हें दोष देना बहुत अधिक उचित नहीं होगा.ज़रूरत इस बात की है कि सरकार साहित्य को प्रोत्साहित करने के लिए इस प्रकार कि सब्सिडी दे ताकि प्रकाशकों को इस प्रकार की किताबें छापने में कम लागत आये और पाठकों को कम से कम कीमत में उपलब्ध हो सके।

बुद्धिनाथ मिश्र: यह तो प्रकाशकों का सरासर अत्याचार है, जो दो दीन में ही करोड़पति बनाना चाहते हैं.यह जो पुस्तक व्यवसाय है उसकी तुलना शेयर बाज़ार या अन्य शार्टकट व्यवसाय से नहीं करना चाहिए, यह सारस्वत व्यवसाय है और जीने के लिए जितना ज़रुरी है उतना ही लाभ ले तो ज्यादा अच्छा है. आजकल होता यह है कि लेखक दरिद्र से दरिद्र होते चले जाते हैं और प्रकाशक अमीर से अमीर होते जा रहे हैं.लेखक को निचोडकर सारा कुछ तो प्रकाशक ले जाता है. अतः प्रकाशकों को सय्यम बरतना चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोग साहित्य से जुड़ें. अधिक प्रकाशन से लागत भी कम आएगी. यह बात प्रकाशकों को समझनी चाहिए. जो रचनाकार खुद ही पुस्तक प्रकाशित कर्वात्व हैं,वे भी उन्ही कि देखादेखी अधिक कीमत रखते हैं क्योंकि उन के पास न तो प्रसार का कोई माध्यम है न ही बिक्री का. अतः जो थोड़ी बहुत पुस्तकें बिक सकती हैं वे उन्ही से अपनी लागत निकाल लेना चाहते हैं।

अनवर जलालपुरी: देखिये ऐसा है, हिंदी-उर्दू कि यह बदकिस्मती हो गई है कि साहित्य को खरीदकर पढ़ने वालों कि कमी हो गई है. सिर्फ जो सनसनी पैदा करने वाला साहित्य है या जो फिल्म से सम्बंधित साहित्य है जिनमें नग्नता,उत्तेजना और हिंसा आदि है. हमारी पीढ़ी उसी में दिलचस्पी रखती है तो वो उन्हें खरीद लेती है भले ही उनकी कीमत कुछ भी हो किन्तु साहित्यिक पुस्तकों के खरीदार नहीं हैं. अतः जब हमें यह किताबें सिर्फ बाँट देनी है तो और लेखकों का स्तर बना रहना चाहिए. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि नामवर सिंह, शम्सुर्रहमान फारुकी या गोपीचंद नारंग की किसी पुस्तक का दाम ३००-४०० के बजाय २५ रूपये रख दिया जाए तो उसे लेकर ४०० पेजों की किताबें पढ़ने वाले मिलेंगे. जो पढ़ने के शौक़ीन लोग हैं किताब का दाम थोडा अधिक भी होगा तो वे उसे खरीदकर ज़रूर पढेंगे और अगर साहित्य में किसी की दिलचस्पी नहीं है तो किताब उसे मुफ्त दे देने पर भी वह किताब केवल गर्द ही खायेगी।

नवाब शाहाबादी: आप सही बोल रहे हैं, इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि साहित्यिक पुस्तकें बिक नहीं रही हैं, कोई ऐसा प्रकाशक नहीं है जो इन्हें बेचे, रचनाकार खुद ही छपाता है और खुद ही बेचने कि कोशिश करता है. दूसरी बात यह है कि व्यावसायिक किस्म के रचनाकार जिनकी सरकारी पुस्तकालयों या संस्थाओं में सांठगाँठ है, जानबूझकर पुतकों की कीमतें अधिक रखते हैं. तीसरी बात पुस्तक की छपाई भी आजकल बहुत महँगी हो गई है और कागज़ के दाम भी पहले से काफी बढ़ गए हैं. इधर साहित्य के नाम पर काफी कुछ कूड़ा करकट भी परोसा जा रहा है.

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

ताकि साहित्य समाज का आइना बना रहे



-------------- इम्तियाज़ अहमद गाजी--------------------------


साहित्य को समाज का आइना कहा जाता है, क्योंकि इसमें समाज के विभिन्न पहलुओं का बारीकी से उल्लेख किया होता है। आमतौर पर यह अवधारणा रही है कि साहित्यकार समाज कि बेहतरी के लिए रचनाधर्मिता अपनाते हैं। समाज में फैली विसंगतियों को दूर करने का प्रयास अपने नज़रिए से करते करते रहे हैं। इन्ही वजहों से साहित्यकारों को अन्य वर्गों से भिन्न और बेहतर माना जाता रहा है। मगर आज इन तथ्यों कि कि वास्तविकता पर गौर किया जाये तो स्थिति काफी भिन्न नज़र आती है। साथ ही तमाम तरह के सवाल मन में उठने लगते हैं। ऐसा लगता है कि अदब से जुड़े लोगों का आचरण और लेखन में दोमुहांपन भरा पड़ा है। कई साहित्यकारों कि रचना में देशप्रेम,समाज सेवा और इंसानियत के लिए जीने के उपदेश भरे पड़े रहते हैं, लेकिन उनकी खुद की जिंदगी में इन चीजों का बेहद अभाव दिखता है। जिन तत्वों से परहेज़ करने की बात वे अपनी रचनाओं में करते हैं, ठीक उसी के विपरीत आचरण वे अपनी जिंदगी में करते हैं। ऐसे में चिंता की लकीर बढ़ना स्वाभाविक है। अहम सवाल यह है की क्या राजनीतिज्ञों की तरह साहित्यकार भी सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए रचनाओं में अच्छी-अच्छी बातें लिखते हैं।क्या साहित्य रचना का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन भर है। वैसे मनोरंजन के कई सरल और रोमांचक साधन अब मौजूद हैं, तो फिर साहित्य क्या ज़रूरत।अगर साहित्य प्रभावी नहीं हो रहा, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है।


कवि सम्मेलनों में शामिल होने, पत्रिकाओं में छपने और पुरस्कार हासिल करने के लिए जिस तरह साहित्य जगत में तोड़जोड़ की राजनीत और गुटबाजी के दौर चल रहा है, उसे देखकर लगता है कि साहित्यकार अब नेताओं को इन सबमें पीछे छोड़ देने के लिए कमर कस चुके हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में तोड़जोड़ कि राजनीत अब हैरान करने वाली बात नहीं लगती। साहित्यकारों के अलग-अलग गुट बन गए हैं। इसी आधार पर पत्रिकाओं का बंटवारा सा हो गया है। संपादक अपने गुट के लोगों कि रचनाओं को तरजीह देते हैं। हालात यह हैं कि संपादक के नाम को देखकर ही पता लग जाता है कि इसमें किस-किस कि रचनाएँ शामिल होंगी। जिन साहित्यिक पत्रिकाओं में पारिश्रमिक का प्रावधान है वहाँ स्थिति और खराब है। वहाँ ठेके पर रचनाएं प्रकाशित कि जा रहीं हैं।ऐसा काम करने वाले लोग जब किसी सेमिनार में बोलने के लिए खड़े होते हैं तो नैतिकता कि दुहाई देते नहीं थकते।इनकी बातों को सुनकर इनके आचरण के बारे में अंदाजा लगाना हो तो बड़े-बेड़े गच्चे खा जाएँ।पुरस्कारों का भी यही आलम है। साहित्य अकादमी से लेकर हिंदी संसथान के पुरस्कारों सहित लगभग सभी पुरस्कारों पर हर साल विवाद होना आमबात है।देशभर में ऐसे तमाम साहित्यकार हैं, जो बहुत अच्छा लिख रहे हैं लेकिन उनका कोई गुट नहीं है, इसलिए न तो उनको किसी साहित्यिक आयोजन में बुलाया जाता है और न ही पत्र-पत्रिकाओं में उन्हें ठीक से स्थान मिल पाता है। पुरस्कारों के लिए उनके बारे में सोचना तो बहुत दूर कि बात है।उच्च पद पर कार्यरत किसी साहित्यकार के पीछे साहित्यकारों कि भीड़ जमा रहना अब आमबात है।इसी तरह कई साहित्यकार नेताओं कि चमचागिरी करके अपना और सहित्य जगत का महत्व कम करते जा रहे हैं.


एक बहुत मशहूर वाकया है।प्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कि रचनाओं से प्रभावित होकर देश के पहले पप्रधानमंत्री पंडित जवाहर ली नेहरु ने उनसे मुलाकात करने का निश्चय किया। निरालाजी इलाहबाद के दारागंज मोहल्ले में रहते थे।नेहरूजी ने जिलाधिकारी के माध्यम से उन्हें घ्रर पर ही मुलाक़ात करने का सन्देश भिजवाया । निरालाजी ने स्वीकृति देदी।किसी कवि के घर देश का प्रधानमंत्री खुद उनसे मिलने आयें ये बड़े गर्व कि बात हो सकती है। नेहरूजी दिल्ली से दारागंज में निरालाजी के यहाँ पहुंचे लेकिन तय समय से लेट हो गए थे। निरालाजी का दरवाजा बंद मिला। जिलाधिकारी ने दरवाजा खटखटाया, टी निरालाजी नि खिडकी से झांककर देखा। जिलाधिकारी ने कहा नेहरूजी आपसे मिलने आये हैं। निरालाजी ने दोटूक जवाब दिया यह भी कोई मिलने का समय है। उनसे कहिये मैं अभी सोने जा रहा हुईं दिन में आयें। यह प्रसंग मौजूदा समय में जुगाड़ टाइप लेखकों के सामने एक मिशाल है। मौजूदा समय में साहित्य जगत को आत्मचिंतन कि ज़रूरत है, ताकि साहित्य समाज का आइना बहना रहे।


अमरउजाला काम्पक्ट में १९ नवंबर २०१० को प्रकाशित

सोमवार, 10 जनवरी 2011

हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल हो ग़ज़ल


इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विहंगम दृश्य


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
ग़ज़ल मूलतः फारसी की विधा है। हिंदुस्तान में आने के बाद धीरे-धीरे यह उर्दू भाषा में इस तरह समाहित हुई कि उर्दू की विधा बन गई। आज ग़ज़ल उर्दू की विधा मानी जा रही है, यह सब ग़ज़ल की लोकप्रियता का प्रमाण है। ग़ज़ल की लोकप्रियता यहीं नहीं रुकी, उर्दू में घुलने मिलने के बाद इसने कई दूसरी भाषाओं पर जादू बिखेरा, इनमें प्रमुख रूप से हिन्दी है। आज ग़ज़ल हिन्दी भाषी लोगों के काफी करीब हो चुकी है, हिन्दी भाषी लोगों में इस कदर घुल मिल गई कि तमाम लोग इसे हिन्दी की विधा समझने लगे हैं। हिन्दी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं तेलुगु, कन्नड़ बंगाली और मराठी के साथ ही विदेशी भाषा चीनी व फ्रेंच में भी ग़ज़ल खूब कही जा रही है। आज हिन्दुस्तान में ग़ज़ल को उर्दू से ज्यादा हिन्दी भाषा के जानकार लिख और पढ़ रहे हैं। ये और बात है कि कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग इसे उर्दू भाषा की विधा समझते हुए छूत समझते हैं। मगर इसके विपरीत बहुत से साहित्यकार हिन्दी उर्दू को अलग भाषा न मानकर एक साथ मिलजुल कर काम रहे हैं। आज तमाम स्थानों पर कवि सम्मेलन और मुशायरा एक ही साथ एक मंच पर आयोजित किए जा रहे हैं। ऐसे में मंच पर पढ़ने वाला व्यक्ति जब ग़ज़ल पढ़ता है तो यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि मंच पर खड़ा होकर पढ़ने वाला हिन्दी का कवि है या उर्दू का शायर। कहने का मतलब यह है कि ग़ज़ल को हिन्दी भाषियों ने तहेदिल से अपना लिया है। ये लोग इसे अपने से अलग बिल्कुल भी नहीं समझते। ऐसे हालात में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि ग़ज़ल को हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। इसके पक्ष में कई तर्क दिए जा रहे हैं, तो विरोध करने वालों की भी कमी नहीं है। विरोध करने वाले कहते हैं कि ग़ज़ल शुद्ध रूप से उर्दू की विधा है, इसलिए इसे हिन्दी के पाठ्यक्रम में क्यों शामिल किया जाए, विरोध करने वाले बहुत से लोग समझते हैं कि उर्दू विदेशी या मुसलमानों की भाषा है। मगर, यह बात सच्चाई से परे है। उर्दू भारत की ही भाषा है और भारत में ही पली बढ़ी है। अंग्रेज़ों ने भारत के लोगों को भाषागत आधार पर भी बांटने का कुचक्र रचा था, जिसमें वे काफी हद तक कामयाब भी रहे। अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म की बातें हिन्दी में और मुसलिम धर्म की बातें उर्दू में अनुवाद करवाया। आज़ादी के बाद जहां भारत में राष्ट्र भाषा को लेकर अभी विचार विमर्श चल रहा था, वहीं पाकिस्तान में आनन-फानन में उर्दू को राष्ट्र भाषा घोषित कर दिया गया। इसी का असर था कि भारत में फौरन ही हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। ग़ज़ल का विरोध कई लोग इस वजह से भी करते हैं कि उन्हें इसके छंद को लेकर परेशानी है। इसका बेहद जटिल छंद समझ में न आने के कारण झल्ला जाते हैं और कहते हैं कि इसका छंद बदला जाना चाहिए। इनका अपना तर्क है कि रटे-रटाए छंद में ही ग़ज़ल कब तक कही जाती रहेगी, अब कुछ नया होना चाहिए। इसी दलील के तहत कई लोग अनाप-शनाप और बिना किसी छंद के ग़ज़ल लिख रहे हैं और इसे नई विधा बता देते हैं। यहां कई चीजें समझने की जरूरत है। पहले तो यह कि ग़ज़ल की अपनी एक पहचान है, और यह पहचान इसके अपने छंद और लय के कारण ही है। ग़ज़ल की लोकप्रियता भी इसके छंद और लय के चलते ही है। ऐसे में यह कहना कि इसके छंद और लय को ही बदल बदला जाए, किसी भी हिसाब से मुनासिब नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह जैसे कि कोई व्यक्ति पायजामा को पैंट कहना शुरू कर दे, और दलील दे कि यह नया अंदाज़ है मैं तो इसे पैंट ही कहूंगा। जैसे दोहा का अपना एक निर्धारित छंद है, उसी तरह ग़ज़ल के अपने पैमाने हैं जिसके साथ छेड़छाड़ करके शायरी करना और उसे ग़ज़ल बताना सही नहीं कहा जाएगा। जब ग़ज़ल को हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात आती है तो इसके चाहने वाले अपना तर्क देते हैं। इनका कहना है कि विधा की कोई भाषा नहीं होती है। जब ग़ज़ल हिन्दी भाषियों के बीच अपना मुकाम बना चुकी है तो इसे हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने में कोई हर्ज नहीं है। गौरतलब है कि भारत के कई विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल को शुमार किया गया है जो छात्र-छात्राओं के बीच काफी लोकप्रिय है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के विश्वविद्यालय इनमें अग्रणी हैं। अब जरूरत इस बात कि है कि उत्तर प्रदेश और अन्य प्रदेशों के विश्वविद्यालयों सहित इंटरमीडिएट और हाईस्कूल के पाठ्यक्रमों में ग़ज़ल को शामिल किया जाए। इसके लिए साहित्यकारों के बीच रायशुमारी कराई जा सकती है। किसी विधा को भाषा विशेष से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

अमर उजाला काम्पैक्ट में 12 सितंबर 2010 को प्रकाशित

चित्र admissiondiary.com से साभार

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

अपने ही शहर में बेगाने


उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र इलाहाबाद में आयोजित मुशायरे का एक दृश्य



इलाहाबाद उर्दू-हिन्दी अदब का अहम मरकज़ है। निराला, पंत, फ़िराक़, महादेवी, अकबर और राज इलाहाबादी जैसे साहित्यिक पुरोधाओं की कर्मस्थली है। देश का कोई भी अदबी सेमिनार, कवि सम्मेलन-मुशायरा इनके बिना अधूरा समझा जाता था। आज भी राष्ट्रीय स्तर के साहित्यकारों की टीम मौजूद हैं। ऐसे में जब भी किसी अखिल भारतीय कवि सम्मेलन या मुशायरे की रूपरेखा बनती है तो उसमें आमंत्रित किये जाने वाले कवियों और शायरों के नाम पर चर्चाएं शुरू हो जाती हैं। लेकिन आश्चर्य तब होता है, जब बाहर से आने वाले कवियों और शायरों की भीड़ में इस साहित्यिक नगरी से सिर्फ़ एक या दो लोग ही दिखाई देते हैं। जाहिर है काफी लोगों को निराश होना पड़ता है। सालभर में इलाहाबाद कम से कम दो आयोजन होते हैं। पहला उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र और दूसरा त्रिवेणी महोत्सव। सांस्कृतिक केंद्र के शिल्प मेले के अवसर पर होने वाले मुशायरे को लेकर उठा-पटक शुरू हो जाता है, यही हाल त्रिवेणी महोत्सव के दौरान होने वाले आयोजन पर रहता है। इस साल 2005, से पहले तक कवि-सम्मेलन और मुशायरा अलग-अलग होता आया है, मगर इस साल संयुक्त रूप से कवि सम्मेलन और मुशायरा हुआ, जिसमें इलाहाबाद से कवि कैलाश गौतम और शायर अतीक़ इलाहाबादी को ही आमंत्रित किया गया। इतनी बड़ी साहित्यिक नगरी से सिर्फ़ दो लोगों को ही आमंत्रित किया जाना, कईयों को नागवार गुजरी। नतीजतन वे अपने-अपने तरीके से गुस्से का इज़हार कर रहे हैं।



सांस्कृतिक केंद्र में होने वाले कवि सम्मेलन और मुशायरे को जहां कुछ लोग ‘अपसंस्कृति का जमावड़ा’ कहकर परिभाषित करते हैं तो कुछ लोग यह मानते हैं कि इस तरह के आयोजन कराने वालों पर निर्भर करता है कि वे क्या करते हैं, यह केंद्र के लोगों की सोच समझ पर निर्भर करता है। सीनीयर पत्रकार और कवि सुधांशु उपाध्याय से इस बाबत बात करने पर कहते हैं,‘इलाहाबाद हिन्दी-उर्दू का अहम मरकज है इसलिए यहां कवि सम्मेलन-मुशायरों की रूपरेखा बनाते समय संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।’ वह यह भी जोड़ते हैं ‘ आमंत्रित किये जाने वाले कवियों और शायरों के स्तर से बिल्कुल समझौता नहीं करना चाहिए। निश्चित रूप से कैलाश गौतम और अतीक़ इलाहाबादी देश के मशहूर कवि और शायर हैं, लेकिन और लोगों का भी ध्यान रखना जरूरी है। विभिन्न मुशायरों में इलाहाबाद का प्रतिनिधित्व करने वाले डाक्टर असलम इलाहाबादी खासे नाराज़ दिखते हैं, ‘एक साजिश के तहत अच्छे शायरों को नहीं रखा जाता। एक तो उर्दू का आयोजन ही समाप्त कर दिया गया, उपर से असली शायरों का नाम लिस्ट से गायब कर दिया गया।’ इसके लिए शायरों को आगे आने की बात करते हुए डाक्टर असलम कहते हैं‘ सांस्कृतिक केंद्र के अधिकारियों को पता ही नहीं है कि नगर में अच्छा शायर और कवि कौन है।’ इसके विपरीत बुद्धिसेन शर्मा कहते हैं, ‘जो लोग आयोजन करते हैं, वही समझते हैं कि क्या सही है और क्या ग़लत है। किसी भी क़ीमत पर सभी को खुश नहीं किया जा सकता। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, यदि उनको आमंत्रित कर लिया जाता तो बाकी लोग विरोध करते। सांस्कृतिक केंद्र अपनी जरूरत के मुताबिक कवियों और शायरों को आमंत्रित करता है, किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए।



इस बार के आयोजन को लेकर मशहूर संचालक नजीब इलाहाबादी काफी खफ़ा हैं। कहते हैं, ‘सांस्कृतिक केंद्र पर उर्दू अदीबों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, पहले उर्दू का मुशायरा अलग होता था इस बार संयुक्त कर दिया गया। जिसकी वजह से उर्दू के तीन-चार शायर कम हो गए। कार्यक्रम अधिकारी को इस बात का ख़्याल रखना चाहिए कि कवियों और शायरों में संतुलन हो, बराबरी हो।’ प्रसिद्ध गीतकार यश मालवीय सांस्कृतिक केंद्र के अधिकारियों के रवैये को निरंकुश बताते हैं। फरमाते हैं, ‘यहां का कवि सम्मेलन और मुशायरा निरंकुश लोगों के हाथों में चला गया है। कवियों और शायरों की सूची में सिर्फ़ एक-दो नाम ही स्तरीय रखा जाता है ताकि मिसाल के तौर पर उन्हें दिखाया और गिनाया जा सके।’ यश मालवीय कहते हैं, ‘अदब का शहर इलाहाबाद अपसंस्कृति का अड्डा बन गया है, कवि सम्मेलन में पढ़ी जाने वाली कविताएं राजनीति टिप्पणियों एवम् औरतों पर की केंद्रित रहती हैं, मंच भी तमाशा हो गया है। इस तरह के आरोपों पर सांस्कृतिक केंद्र कार्यक्रम अधिकारी अतुल द्विवेदी का अपना तर्क है,‘यह सात राज्यों-उत्तर प्रदेश, बिहार,मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, झारखंड और उत्तरांचल का केंद्र है, सबका का प्रतिनिधित्व करना होता है। इलाहाबाद के कवियों और शायरों को तो लोग सुनते ही रहते ही रहते हैं, क्यों न बाहर के लोगों को सुना-सुनाया जाए।’संतुलन बनाए जाने के बारे में उनका तर्क है ‘उर्दू से वसीम बरेलवी, अतीक़ इलाहाबादी, पापुलर मेरठी और जाहिल सुल्तानपुरी, ब्रजभाशा से शशि तिवारी, अवधी से रफ़ीक़ सादानी और नौबत राय पथिक तथा भोजपुरी से हरिराम द्विेदी को आमंत्रित किया गया। बारी-बारी से सभी कवियों को बुलाया जाना है। पिछले साल राहत इंदौरी और बशीर बद्र बुलाए गए थे, इसलिए इस साल इन्हें नहीं रखा गया।’ कवि सम्मेलन एवम् मुशायरे को संयुक्त कर दिए जाने के सवाल पर कहते हैं,‘हिकमते अमली बदलती रहती है। ज़रूरी नहीं है कि एक ढाचे पर हर साल प्रोग्राम होते रहे, समय के साथ-साथ चीज़े बदलती रहती हैं।’



इलाहाबाद से सिर्फ़ दो लोगों को आमंत्रित किये जाने पर अतीक़ इलाहाबादी कहते हैं,‘यह सरकारी आयोजन है, उनको जो सही लगता है, करते हैं। कितने लोगों को बुलाना है, ये वही समझते और जानते हैं।’ कैलाश गौतम भी कुछ ऐसा ही कहते हैं,‘सरकारी आयोजनों की कार्य योजना केंद्र के अधिकारी ही बनाते हैं, इसमें बाहरी लोगों का कोई दखल नहीं होता है, उन्हें जो ठीक लगता है, करते हैं।’



बहरहाल, 1997 से उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पर शिल्प मेले का आयोजन होता आ रहा है। विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों के साथ कवि सम्मेलन और मुशायरे का भी एक दिवसीय आयोजन होता है। इस साल 2005, से पूर्व कवि सम्मेलन और मुशायरा अलग-अलग होता था, मगर इस साल दोनों को संयुक्त कर दिया गया, शायद इसी वजह से कवियों और शायरों की संख्या में कटौती करनी पड़ी है। फिर भी नगर के कवियों और शायरों की संख्या ‘दो’ तक सिमट जाने के कारण लोगों में निराशा देखी जा सकती है।

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

(राष्ट्रीय सहारा साप्ताहिक, के 18-24 दिसंबर 2005 अंक में प्रकाशित)


शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

अब तो बेटियों के मन को समझिए


बेटियों द्वारा बारात लौटाए जाने का सिलसिला जारी है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही औसतन रोज चार बारातें लौट जा रही हैं। पंचायत, पुलिस और वर-वधु पक्ष के लाख प्रयास के बावजूद सुलह नहीं हो पा रही है। इनमें ज्यादातर मामलों में लड़की का जिद ही बाधक बन रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि दोनों पक्षों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है, धन से लेकर समय तक। गौर करने लायक बात यह है कि ऐसी घटनाएं मध्यम वर्गीय परिवारों में ही हो रही हैं और ऐसे ही परिवार भारत सबसे अधिक हैं। इसके बावजूद अपने को सभ्य और सुसंस्कृत करने वाला यह समाज इसकी मुख्य वजह पर गौर करता नहीं दिख रहा है।



दरअसल, हम अपनी संस्कृति का ढोल तो पीटते हैं लेकिन इसकी विसंगतियों पर कभी भी गंभीरता से विचार नहीं करते। नतीजा यह होता है कि जो गलत चीजें प्रचलन में चल पड़ी हैं वो निरंतर जारी हैं। ऐसे में गलत चीजों के खिलाफ एक न एक दिन तो ज्वाला फूटेगा ही। बेटियों की शादी को लेकर यह बात बिल्कुल फिट बैठती है। हम अपने बेटे की शादी करते हैं तो उससे दस बार पूछते हैं। तरह-तरह से इत्मीनान कर लेते हैं कि बेटा खुशी से शादी कर रहा है या नहीं। जिन घरों ऐसा नहीं होता वहां लड़के शादी से साफ इंकार कर देते हैं। यह डर घरवालों को सताता रहता है, इसलिए उससे बार पूछा जाता है। मगर दुर्भाग्य से बेटी की शादी करते समय यह रास्ता अखितयार नहीं किया जाता। बल्कि हमारे यहां यह कहावत गढ दी गई है कि 'बेटी और गाय एक समान' यानी बेटी को जिस भी खूंटे में चाहो बांध दो। जब हम अपने बेटे की शादी उसकी मर्जी से करते हैं तो फिर बेटी की शादी करने से पहले उसकी मर्जी और सहमति क्यों जरूरी नहीं है। तमाम ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं कि कर्ज उतारने या कोई काम करवाने के लिए लोग अपनी बेटी की शादी बूढ़े, नशेड़ी, शारीरिक रूप से अक्षम और अयोग्य व्यक्ति से कर देते हैं। बेटियां न चाहते हुए भी गाय की तरह खूंटे से बंध जाती हैं। घरवाले उसकी मर्जी जानना तक जरूरी नहीं समझते। ऐसे मर्दों के साथ शादी करके बेटियां अपने पैदा होने तक पर अफसोस करती हैं, उनके मन की बात, उनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता। आखिर हम किस समाज और संस्कृति में रहते हैं और किस सभ्यता पर इतराते फिरते हैं, जिसमें लड़की की शादी करते समय उसकी मर्जी तक का जानना जरूरी नहीं है।



लगातार लौट रही बारातें हमें इस बात की सीख दे रही हैं कि बेटियों को भी अपनी मर्जी से जीने का पूरा हक है। उनकी मनोकामना को बहुत दिनों तक दबाकर नहीं रखा जा सकता है। अब उनके अंदर का मनुष्य जागने लगा है। हाल की तमाम घटनाएं हमें आगाह कर रहीं हैं हम अपनी बेटी की शादी में उसकी मर्जी और खुशी को भी शामिल करें। बारात लौटाने का जो सिलसिला जारी है वो हमें साफ संकेत दे रहा कि कोई न कोई बहाना बनाकर लड़कियां बारात वापस लौटा रही हैं। क्योंकि शादी तय करते समय लड़कियों की मर्जी नहीं पूछी जा रही। उस समय तो वो कुछ बोल नहीं पाती खासतौर पर पिता और भाई के सामने। पुरूष प्रधान समाज में औरतें परिवार के फैसलों में कुछ नहीं बोल पाती तो फिर बेटियां अपने पिता और भाई के सामने कैसे विरोध कर पाएंगीं। ऐसे में जब उनकी मर्जी के बिना शादी तय हो जाती है और बारात चौखट पर है, तब उन्हें मौका होता है अपने मन की बात को व्यक्त करने का। क्योंकि शादी के अवसर पर सारे रिश्तेदार मौजूद होते हैं उनकी मौजूदगी में पिता, भाई या अन्य कोई अभिभावक लड़की पर ज्यादा जोर नहीं डाल पाता या उसे मजबूर नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि बारातियों द्वारा हंगामा करने, बाराती पक्ष या दूल्हे के दोस्तों के शराब पीने, बारात के देर से आने, जेवर कम ले आने यहां तक की बारात में नौटंकी न ले आने का बहाना बनाकर लड़की शादी से इंकार कर देती है। नतीजतन बारातें वापस हो जाती हैं।बारातें लौटने की घटनाओं को देखा जाए तो लगभग हर मामले में लड़किया ने ही आगे आकर शादी करने से इंकार कर दिया है। फिर पंचायत, पुलिस, रिश्तेदार आदि लाख चाहकर भी लड़कियों को तैयार नहीं कर पा रहे हैं। इस तरह के मामलों में ज्यादातर तो यही होता है कि लड़की को उसकी जीवनसाथी पसंद नहीं होता जिसकी वजह से वह शादी न करने का बहाना खोजती रहती है। बाप के सामने बोल नहीं पाती मगर सारे रिश्तेदारों के सामने खुलकर बोल पाती है। कुछ मामलों में लड़की का प्रेम-प्रसंग कहीं और चलता रहता है, घरवाले सबकुछ जानते हुए भी दूसरी जगह शादी करना चाहते हैं, प्रेमी संग उसकी शादी करने पर विचार तक नहीं किया जाता। यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस तरह की घटनाएं मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय परिवारों में ही रही हैं। क्योंकि संपन्न परिवारों की लड़कियों की शादी उसकी मर्जी के बगैर नहीं की जा रही हैं। इन परिवारों में अब बेटियां अपने पिता से रूबरू बात करतीं हैं, लिहाजा यहां ऐसी स्थिति नहीं बन पाती। आज जरूरत है कि हम अपनी बेटियों की मर्जी का खयाल रखें और ऐसी घटना सामने न आने दें।



अमर उजाला कॉम्पैक्ट में 25 जुलाई 2010 को प्रकाशित



इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

चित्र http://www.indianmarriage.info/assets/ArticleImages/Bridal_Shoots_27.jpg से साभार