01 अक्तूबर 1950 से शुरू हुआ ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’
एचटी मीडिया ग्रुप की इस पत्रिका के पहले संपादक थे मुकुट बिहारी वर्मा
एक प्रति का मूल्य ’तीन आना’ था, नौ रुपये में मिलती थी पूरे वर्ष पत्रिका
- डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
देश से प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का ख़ास स्थान रहा है। 1950 के दशक में पत्रिकाएं खूब पढ़ी जाती थीं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के प्रकाशन के साथ ही इसकी प्रतिस्पर्धा ‘धर्मयुग’ से शुरू हुई थी। देश के लगभग सभी बड़े लेखक इन पत्रिकाओं में छपते थे। नये लोगों की रचना का इसमें प्रकाशन हो जाना किसी सपने से कम नहीं था। इन पत्रिकाओं में छपने वाले ‘पाठकों के पत्र’ में भी छप जाना ख़ास अहमियत रखता था। पत्र छप जाने पर ही नये लोग अपने को लेखक मानने लगते थे, फूले नहीं समाते थे। 26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू होने के लगभग आठ महीने बाद ही इसका पदार्पण हुआ और देशभर में यह पत्रिका छा गई।
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| साप्ताहिक हिन्दुस्तान का कवर पेज |
नई दिल्ली में एचटी मीडिया ग्रुप से शुरू हुई इस पत्रिका के प्रबंधक देवी प्रसाद शर्मा और पहले संपादक मुकुट बिहारी वर्मा थे। 01 अक्तूबर 1950 को छपे पहले अंक में जैनेंद्र कुमार का लेख ‘हम कहां क्यों ?’ और ‘गांधी जी बापू क्यों ?’ शीर्षक से बनारसी दास चतुर्वेदी का लेख प्रकाशित हुआ। इसी अंक के पेज नंबर पांच पर एक चित्र प्रकाशित हुआ था। इस चित्र में गिरधारी कृपलानी और श्रीमती कृपलानी के नवजात शिशु को महात्मा गांधी आशीर्वाद दे रहे हैं। इसी अंक के पेज नंबर 23 पर महात्मा गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु का चित्र छपा था। 08 अक्तूबर 1950 के दूसरे अंक के पेज नंबर एक पर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का गीत और पेज तीन पर सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘आवाहन’ प्रकाशित हुई थी। तब पत्रिका की एक प्रति का मूल्य मात्र तीन आना था, छह महीने की सदस्यता शुल्क पांच रुपये और एक वर्ष का नौ रुपये था।
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| साप्ताहिक हिन्दुस्तान के पहले का पहला पेज |
01 अक्तूबर 1950 के अंक में यह संदेश प्रकाशित हुआ था-‘‘गांधी जयंती के अवसर पर गांधी जी के जीवन की प्रमुख विशेषताओं की पुनरावृत्ति करना या उनकी प्रार्थना सभाओं में दिए गए बहुमूल्य संदेशों की फिर चर्चा करना कोई नई बात नहीं होगी। यह संदेश तो आज भी देश के कोने-कोने में हर स्त्री, पुरुष और बच्चों के दिल में गूंज रहे हैं। अतः यहां हम एक दूसरे महापुरुष -- गोपाल कृष्ण गोखले -- के उन उद्गारों को उद्घृत कर रहे हैं, जो उन्होंने गांधी जी के प्रति आज से 38 वर्ष पूर्व सन 1912 में व्यक्त किए थे, जब इन पंक्तियों के अधिकांश पाठक या तो नन्हें बच्चे थे या जन्मे ही नहीं थे। बहुतों के लिए तो यह पंक्तियां बिल्कुल नई होंगी और जो इनसे परिचित हैं, उन्हें इनका पुनः पारायण करने में आनंद आएगा। गंाधी जी के संबंध में इनसे अधिक प्रशंसात्मक शब्दों का प्रयोग आज तक किसी ने नहीं किया। फिर भी भारतीय जनता जानती है कि गोखले से बढ़कर शांत और अधिक संतुलित व्यक्ति देश में और कोई नहीं हुआ। यह देशभक्त 1912 में दक्षिण अफ्रीका गया था, जबकि भारतीय प्रवासियों का जनरल बोथा तथा स्मट्स की गोराशाही से भयंकर संग्राम चल रहा था। यह भाषण गोखले जी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटकर लाहौर में भारतीय कांग्रेस के 24वें अधिवेशन के अवसर पर दिया था। उसे यहां प्रकाशित करने का केवल यही कारण नहीं है कि उसमें गांधी जी के प्रति कुछ अमर उद्गार व्यक्त किए गए हैं। बल्कि यह भी कि उनका आज की दक्षिण अफ्रीका संबंधी समस्त समस्या से घनिष्ठ संबंध हैं। गोखले जी अपने समय के एक महान राजनैतिक नेता था और सार्वजनिक रंगमंच पर तथा शाही धारा सभा के भीतर दिए गए उनके भाषणों से अपने को धर्मात्मा मानने वाले ब्रिटिश शासकों का अहंकार उतना ही विचलित हो उठा था, जितना रानाडे, तिलक, अरविंद घोष और लाजपत राय जैसे अन्य समकालीन तथा बाद के नेताओं के कार्य से। कुछ भाषण, जिनका श्री नटेसन ने संग्रह किया है, बड़ा ही जोखि़म उठाकर दिए गए थे, क्योंकि उनसे लार्ड कर्जन जैसे शक्तिशाली व्यक्ति के अप्रसन्न होने की निरंतर आशंका बनी रहती थी।’’
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| हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संग्रहालय में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ की फाइल देखते डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और दुर्गानंद शर्मा। |
इस पत्रिका के एक अंक में 26 जनवरी 1950 को उप प्रधानमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल द्वारा दिया गया यह संदेश प्रकाशित हुआ था-‘‘आज से ठीक 20 वर्ष पूर्व हमने पूर्ण स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा की थी। इस प्रतिज्ञा के पीछे संपूर्ण जनता का निश्चय तथा बल छिपा था। 15 अगस्त 1947 को मिली स्वतंत्रता अधूरी थी। ईश्वर की कृपा से आज हमारी प्रतिज्ञा पूर्ण हो गई। इस महान अवसर पर हमें अपने राष्ट्रपिता की याद आना स्वाभाविक है।
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| 07 जनवरी 1951 के अंक में छपा यह चित्र इलाहाबाद के बमरौली हवाई अड्डे का है। सरदार बल्लभ भाई पटेल का अस्थिपात्र हाथ में लिए खड़े हैं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद। |
वे यहां अनुपस्थित रहकर भी ऊपर से अपना आशीर्वाद हमें दे रहे रहे हैं। आज का दिन भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। विदेशी सत्ता की समाप्ति के साथ हमें वास्तविक स्वतंत्रता मिल गई है, हम अब अपने भाग्यविधाता हैं। पुनर्निर्माण के लिए हमें अभी अनेक बलिदान करने पड़ेंगे। अतः हम उत्सव की गंभीरता को समझकर कठोर परिश्रम करें। ईश्वर हमारी सहायता करेगा।’’ यह संदेश आज भी हमारे लिए अनुकरणीय है।
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| साप्ताहिक हिन्दुस्तान के पहले अंक में प्रकाशित चित्र। इसमें गिरधारी कृपलानी और श्रीमती कृपलानी के नवजात शिशु को महात्मा गांधी आशीर्वाद दे रहे हैं। |
साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 07 जनवरी 1951 के अंक में एक चित्र प्रकाशित हुआ था, जिसमें इलाहाबाद के बमरौली हवाई अड्डे पर सरदार बल्लभ भाई पटेल का अस्थिपात्र हाथ में लिए खड़े हैं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद। 29 अप्रैल 1951 के अंक में मासिक पत्रिका ‘जीवन साहित्य’ का विज्ञापन प्रकाशित है, इस पत्रिका के संपादक के तौर पर हरिभाऊ उपाध्याय और यशपाल जैन का नाम छपा है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 12 जनवरी 1992 के अंक में सआदत हसन मंटो के बारे में देवेन्द्र इस्सर का लेख ‘उर्दू का वह युगांतरकारी कहानीकार था’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इस लेख में मंटो की कहानियों की शानदार ढंग से समीक्षा की गई है। साथ ही मंटो की लेखन-शैली का भी उल्लेख किया गया है। 12 अप्रैल 1992 के अंक में मनोहर श्याम जोशी का लेख ‘अमूर्त कला: भ्रांतियां और सच्चाई’ प्रकाशित हुआ था।
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| 08 अक्तूबर 1950 के अंक में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का गीत। |
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| 08 अक्तूबर 1950 के अंक में सुमित्रानंदन पंत की कविता। |
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडी सेंटर के को-ऑडिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा बताते हैं-‘‘1977 के बाद 80 के दशक में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के अलावा ‘रविवार’ और ‘दिनमान’ नामक साप्ताहिक पत्रिकाएं भी निकलती थीं। लेकिन इनमें साप्ताहिक हिन्दुस्तान ही पारिवारिक पत्रिका थी। इसमें हर तरह का स्वाद मौजूद था। बेहतरीन प्रस्तुति थी। कई बड़े उपन्यासों के धारावाहिक भी इसमें प्रकाशित हुए। हम बड़े चाव से इसे पढ़ते थे।’’ वरिष्ठ पत्रकार स्नेह मधुर के मुताबिक-एक साप्ताहिक पत्रिका का इस तरह से प्रकाशन होना गौरव की बात थी। बड़े-बड़े विद्वान लेखक इसमें छपते थे। धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान में आपस में जबरदस्त मुकाबला भी था। वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय कहते हैं-‘‘हिन्दुस्तान की पत्रकारिता में एक तरह जबरदस्त बदलावा आ गया था। अख़बारों की पत्रकारिता के साथ अब साहित्यिक पत्रकारिता का दौर शुरू हो गया था। ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं ने लोगों को बताया कि साहित्यिक पत्रकारिता की अलग ही धारा है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान को पढ़ने वाले देश के कोने-कोने में मौजूद थे। बड़े-बड़े लेखकों को इस पत्रिका में स्थान मिलता था। साहित्य के अलावा अन्य विषयों को भी पर्याप्त स्थान मिलता रहा। 80 से लेकर 90 के शुरूआती दशक तक पत्रिकाओं का खूब बोलबाला था।’’
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| साप्ताहिक हिन्दुस्तान में यह चित्र भी प्रकाशित हुआ। |
इस पत्रिका के पहले संपादक मुकुट बिहारी वर्मा थे। इनके बाद क्रमशः बांके बिहारी भटनागर, मनोहर श्याम जोशी और मृणाल पांडेय इसकी संपादक रहे हैं। 10-16 मई, 1992 का अंक ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का अंतिम पड़ाव था। इसके बाद यह पत्रिका बंद कर दी गई।
(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित )








