शुक्रवार, 14 मई 2021

शकील ग़ाज़ीपुरी और फ़ज़्ले हसनैन का जाना बेहद दुखदायी

कोरोना से जूझ रहे शकील ग़ाज़ीपुरी का इंतिकाल

                                                                               -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी




प्रयागराज के कसारी-मसारी निवासी बुजुर्ग शायर शकील ग़ाज़ीपुरी का 05 मई को इंतिकाल हो गया। वे कोरोना से संक्रमित थे, उन्हें हृदय रोग भी था, जिसकी वजह से हार्ट लाइन में उनका इलाज चल रहा था। उनके परिवार में पत्नी, दो बेटे और एक बेटी है। एक सितंबर 1948 को ग़ाज़ीपुर जिले के वाजिदपुर में जन्में शकील ग़ाज़ीपुरी माध्यमिक परिषद विभाग में कार्य करते हुए सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी दो पुस्तकें ‘लम्हे-लम्हे ख़्वाब के’ और ‘अभिलाषा’ प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी उनकी ग़ज़लें समय-समय पर प्रकाशित होती रही हैं। उन्हें ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’, ‘प्रयाग गौरव सम्मान’, ‘प्रयाग पुष्पम् सम्मान’ और ‘सरदार अली जाफरी एवार्ड’ प्रदान किए गए थे। 


        हर घटना में व्यंग्य तलाश लेते थे फ़ज़्ले हसनैन

  


जाने-माने उर्दू अदीब, व्यंग्यकार और पत्रकार फ़़ज़्ले हसनैन का 24 अप्रैल को इंतिकाल हो गया, इसी के साथ एक ऐसे अध्याय का अंत हो गया, जिसकी पूर्ति कोई नहीं कर सकता। वे वे अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो हर छोटी-बड़ी घटना को व्यंग्य का रूप देने एक्सपर्ट थे। मुझे याद है, तकरीबन 17-18 साल पहले की बात है, मालिकाना झगड़े में उन दिनों ‘अमृत प्रभात’ के कर्मचारियों को तनख़्वाह कई महीने से नहीं मिल रहा था। ‘अमृत प्रभात’ के दफ़्तर में मैं कार्यकारी संपादक मुनेश्वर मिश्र जी के केबिन बैठा हुआ। उसी दिन कर्मचारियों को 200-200 रुपये दिए गए थे। अचानक फ़ज्ले हसनैन केबिन में दाखिल हुए, मुनेश्वर जी से मुख़ातिब होकर बोले-‘मिश्रा जी आज 200 रुपये मिल गए हैं, सोच रहा हूं कि इतनी बड़ी रकम कैसे लेकर जाउंगा, कहीं रास्ते में कोई छीन न ले। आप संपादक हैं, पुलिस से बात करके सुरक्षा के इंतज़ाम करा दीजिए।’ इसके बाद केबिन में बैठे सभी लोग जोर-जोर से हंसने लगे। यह उनके व्यंग्य का नमूना भर है। ऐसी बहुत से वाक़यात हैं।

 फ़ज़्ले हसनैन का जन्म 07 दिसंबर 1946 को प्रयागराज के लालगोपालगंज स्थित रावां नामक गांव में हुआ था। इंटरमीडिएट तक की परीक्षा लालगोपालगंज में ही उत्तीर्ण करने के बाद 1973 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से उर्दू विषय में स्नातकोत्तर किया था। प्र्रयागराज से प्रकाशित नार्दन इंडिया पत्रिका से पत्रकारिता की शुरूआत की थी, फिर अमृत प्रभात और स्वतंत्र भारत में भी सेवाएं दीं। व्यक्तिगत लेखन की शुरूआत हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में 1974 में किया था। ग़ालिब पर लिखी इनकी पुस्तक ‘ग़ालिब एक नज़र में’ को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया था। आपकी कहानियां, नाटक और व्यंग्य देश-विदेश की पत्रिकाओं और अख़बारों छपते रहे हैं। 1982 में इनका पहला व्यंग्य संग्रह ‘रुसवा सरे बाज़ार’ प्रकाशित हुआ था, इस पुस्तक पर उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया था। इनके तीन नाटक संग्रह ‘रोशनी और धूप’, ‘रेत के महल’, ‘रात ढलती रही’ छपे हैं। वर्ष 2001 में व्यंग्य रचना संग्रह ‘दू-ब-दू’ प्रकाशित हुआ। प्रयागराज के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का परिचय कराती आपकी एक पुस्तक ‘हुआ जिनसे शहर का नाम रौशन’ वर्ष 2004 में छपी थी, इस पुस्तक के तीन संस्करण प्रकाशित हुए हैं। इन्होंने कौमी उर्दू कौसिंल बराय फरोग उर्दू नई दिल्ली के अनुरोध पर मशहूर उपन्यासकार चाल्र्स डिकेंस के उपन्यास ‘डेविड कापर फील्ड’ का उर्दू में अनुवाद किया था। 

 वरिष्ठ पत्रकार एसएस खान उनके बारे में लिखते हैं- ‘फजले हसनैन उर्दू अदब में महारथ के साथ अंग्रेजी और हिंदी में भी वह बराबर का दखल रखते थे। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी व्यंग रचनाएं आज भी लोगों के जेह्न पर नक्श हैं। उनके साथ अमृत प्रभात में काम करते हुए बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। उनके लिखने और बोलने का अंदाज़ बिल्कुल जुदा था। रोजमर्रा की जिं़दगी में होने वाली बातों, छोटी बड़ी घटनाओं को जिस सहज तरीके से शब्दों में पीरोते वह अनायास ही एक श्रेष्ठ व्यंग्य रचना का शक्ल अख़्तियार कर लेता. आचार-व्यवहार सियासत-शिक्षा हो या फिर रीति रिवाज व धरम-करम. इन सब विषयों पर कटाक्ष करती उनकी कलम हर किसी को अपना मुरीद बना लेती। उनकी इसी काबिलियत व फनकारी को देखते हुए मैंने इलाहाबाद में अमर उजाला और दैनिक जागरण में कार्यकाल के दौरान उनकी सैकड़ों व्यंग्य रचना सिलसिलेवार तरीके से प्रकाशित की। उसी दौरान इलाहाबाद के 10 चोटी के साहित्यकारों के साहित्य लेखन और उनके जीवन के अनछुए पहलुओं पर भी उन्होंने कलम चलाई. उनका यह लेख न सिर्फ़ इलाहाबाद में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हुआ, यह लेख दैनिक जागरण के विशेष फीचर पेज पर प्रत्येक बुधवार को ‘हुआ जिससे शहर का नाम रोशन’ कालम के अंतर्गत प्रकाशित होता था। बाद में यही लेख किताब की शक्ल में इसी नाम से प्रकाशित हुआ।’


मंगलवार, 11 मई 2021

अभिव्यक्ति के ज़रिए अपनी बात कहते क़लमकार

                                                                            - अजीत शर्मा ‘आकाश‘ 



 वैश्विक कोरोना महामारी के कारण के अन्य देशों की भांति 25 मार्च 2020 से देशभर में लॉकडाउन लागू कर दिया गया। लॉकडाउन देश में पहली बार हुआ। सभी देशवासी एक अनिश्चित अवधि के लिए अपने-अपने घरों में एक प्रकार से नज़रबंद-से हो गये। रोज़ाना दिन भर के लिए काम पर निकलने वालों के सामने एक नयी और अनोखी समस्या उठ खड़ी हुई कि इस ख़ाली समय में क्या किया जाए। देश में एक ठहराव-सा आ गया। अपनी-अपनी तरह से सभी ने इस अवधि को किसी प्रकार व्यतीत किया, किन्तु ‘लॉकडाउन के 55 दिन’ पुस्तक का लेखन कार्य करके इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने ख़ाली समय का वास्तविक सदुपयोग किया है। पुस्तक-लेखन का यह रचनात्मक कार्य सीधे-सीधे साहित्यिक माहौल से जुड़ा है, जिसने अनुभवी रचनाकारों के साथ-साथ नवांकुरित रचनाकारों के लिए भी साहित्यिक वातावरण प्रस्तुत किया है। अतः लॉकडाउन के 55 दिन’ नामक यह पुस्तक एक सार्थक एवं सराहनीय उपलब्धि कही जा सकती है, जिसमें 25 मार्च से 18 मई, 2020 तक के 55 दिनों का दैनिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के लेखक ने समय का सदुपयोग विभिन्न पुस्तकों के अध्ययन के माध्यम से किया, जैसा कि पुस्तक में उल्लेखित है। इस अवधि में लेखक ने अनेक कवि, लेखक, शायरों एवं रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया, जो समयाभाव के कारण पूर्व में नहीं हो सका था। इसके अतिरिक्त गुफ़्तगू प्रकाशन की प्रारम्भ से लेकर अब तक की प्रमुख घटनाओं एवं कार्यक्रमों का विवरण भी पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है।

 25 मार्च 2020 से प्रारम्भ करते हुए उत्तर प्रदेश सहित सम्पूर्ण देश की प्रत्येक दिन के कोरोना की स्थिति का संख्यात्मक विवरण एवं अन्य उल्लेखनीय घटनाओं का विवरण भी साथ में प्रदान किया गया है। इसके अंतर्गत देश-दुनिया में प्रतिदिन के कोरोना की स्थिति कोरोना संक्रमितों की संख्या, हालात और विस्तृत विवरण को भी रेखांकित किया गया है। इस दौरान जनता एवं कोरोना योद्धओं के समक्ष तमाम कठिनाइयाँ भी उपस्थित रहीं, यथा- मास्क की कमी, खाद्य एवं अन्य सामग्रियों के दामों में भारी किल्लत, पुलिस द्वारा आवश्यक कार्यों से बाहर निकले लोगों के प्रति व्यवहार आदि। लॉकडाउन के कारण बेरोजगार हुए मज़दूरों का सैकड़ों किलोमीटर की दूरी से अपने गांवों को पलायन एवं उनकी दुर्दशा का उल्लेख भी किया गया है। लॉकडाउन के दौरान शायरी और कविताओं पर परिचर्चा का आयोजन पुस्तक का सर्वाधिक उल्लेखनीय अंश है। इसका कारण बताते हुए सम्पादकीय में लिखा गया है कि रचनाकारों में अच्छा लिखने और शायरी को समझने और उस पर तार्किक ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त करने की क्षमता विकसित करने का प्रयास इस आयोजन के माध्यम से किया गया। इसी उद्देश्य के मद्देनज़र लॉकडाउन अवधि में काव्य परिचर्चा करायी गई, जिसके अन्तर्गत प्रत्येक दिन विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं एवं उनकी कृति पर विभिन्न लेखकों एवं रचनाकारों द्वारा समीक्षात्मक टिप्पणियां की गयीं, जिनके माध्यम से विभिन्न मन्तव्य व्यक्त किए गए। इस क्रम में जनकवि स्व. कैलाश गौतम, स्व. डॉ जमीर अहसन, विज्ञान व्रत, यश मालवीय जैसे स्थापित रचनाकारों के साथ ही नवांकुरित एवं अन्य रचनाकारों पर भी सामूहिक चर्चा की गयी। यह एक उल्लेखनीय एवं सराहनीय कार्य है। लॉकडाउन के 55 वें दिन ऑनलाइन मुशायरा एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें वयोवृद्ध शायर सागर होशियारपुरी, सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार विज्ञान व्रत, इम्तियाज अहमद ग़ाज़ी सहित अनेक श्रेष्ठ कवियों एवं नवांकुरित प्रतिभाओं ने हिस्सेदारी की। पुस्तक का मुद्रण, प्रकाशन एवं तकनीकी पक्ष सराहनीय है। कवर पृष्ठ आकर्षक बन पड़ा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि लॉकडाउन के प्रारंभिक 55 दिनों के एक प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में यह पुस्तक हमारे समक्ष उपस्थित है। इस हेतु पुस्तक के लेखक इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी अत्यन्त सराहना एवं बधाई के पात्र हैं। 256 पेज के इस पेपर बैक संस्करण की कीमत 300 रुपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।

 



 ‘दिल्ली की सात कवयित्रियां’ महिला रचनाकारों की रचनाधर्मिता एवं उनकी सृजनात्मकता को उजागर करता है। कवयित्रियां मनोभावों को व्यक्त करने में काफी हद तक सफल रही हैं। सोनिया सूर्य प्रभा की कविताओं में अच्छे सृजन की झलक दिखायी देती है। समाज में महिला के योगदान और उसके महत्व को कवयित्री ने इस प्रकार रेखांकित किया हैः-मैं औरत हूं लिख लेती हूं/मैं औरत को लिख लेती हूं (मैं तो बस उसको जीती हूं)। डा. सरला सिंह ‘स्निग्धा‘ की ‘गरीबी’, ‘ये भूख है साहिब’, ‘भुखमरी’ कविताओं में आम आदमी की दशा का चित्रण है- तरह तरह के पेट यहां पर/कुछ का थोड़े से भर जाता है/कुछ में करोड़ों भी कम पड़ जाता है। रिंकल शर्मा ने कविताओं में मन के उद्गार कुशल ढंग से व्यक्त किये हैं। इनकी ‘प्रेम‘ शीर्षक कविता में प्रेम को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया गया है- प्रेम एक सागर है/जिसकी असीम गहराई है। ‘कोई ये माने, कोई वो माने‘ साम्प्रदायिक सद्भाव का सन्देश देती है। ‘घोटाला‘ कविता आज की राजनीति पर टिप्पणी करती है। डा. फौजिया नसीद शाद ने अपनी छोटी-छोटी रचनाओं के माध्यम से मनोभाव प्रकट किये हैं। ‘मानव-मानव का दुश्मन क्यों है‘ कविता में मानव की स्वार्थ लिप्सा को उजागर करने का प्रयास किया गया है।‘ संकलन में रीता सिवानी की 22 गजलों में से कुछ अच्छी बन पड़ी हैं। कुछ उल्लेखनीय पंक्तियां- अबला ही मत उसको समझो/दुर्गा-काली भी नारी है/लालच में ये होता है/जो है वो भी खोता है/सारी दुनिया जिसने जीती/खुद से कैसे हारा देखो। आम आदमी वर्तमान की दशा का यथार्थ वर्णन करती हैं। प्रभा दीपक शर्मा ने अपनी कविताओं में जिजीविषा, देशप्रेम एवं हृदय के उद्गार अच्छे ढंग से व्यक्त करने का प्रयास किया है। ‘अपंगता‘ रचना हौसलों को बुलन्द करने वाली एवं जीने का सन्देश देती है- देखो मेरी हिम्मत को/हार नहीं स्वीकार मुझे (अपंगता)। पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सजग करती हुई रचना- आहत हूं आज बहुत मैं/अपने बच्चों की करनी पर (धरा की पुकार)। ‘हमारा प्यारा भारत‘, ‘देश की माटी‘ रचनाएँ देशप्रेम का भाव लिए हुए हैंरू- इस माटी पर जन्म लिया है, इस पर ही मर जाना है (देश की माटी)। ‘सावन, ‘पराया लगता है’, ‘आइना’ श्रृंगार की कविताएं हैं। आम आदमी की दशा का यथार्थ चित्रण कवयित्री ने इस प्रकार किया है- अथक परिश्रम करता रहता/पैसे चार कमाने को (मजदूर)। संकलन में सम्मिलित रोली शुक्ला की कविताएँ पाठकों को आशान्वित करती हैं। ‘वाणी का आधार’ कविता में शब्दों की महिमा बताने का प्रयास किया गया है। शहीदों की पत्नियों का दर्द मार्मिक रचना बन पड़ी है। 128 पेज के इस पेपर बैक संस्करण की कीमत 200 रुपये है, जिसे गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।



हिन्दी और उसकी क्षेत्रीय भाषाओं में भी ग़ज़ल कही और सराही जा रही है। लेकिन यह तथ्य ध्यातव्य है कि ग़ज़ल का एक विशेष अनुशासन एवं व्याकरण है और ग़ज़ल के लिए ज़रूरी बातों के प्रति उनकी ग़ज़लकार की सतर्कता की मांग करती है। जो रचनाकार इस तथ्य के प्रति सजग हैं, वह अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं। इसी क्रम में सुमन ढींगरा दुग्गल का ग़ज़ल संग्रह ‘गुंचे‘ सामने आया है। संग्रह की लगभग सभी ग़ज़लें शिल्प की कसौटी पर खरी उतरती हैं। शायरा ने बह्रों के बारे में पूरी सतर्कता और सावधानी का परिचय दिया है। हर एक मिसरे में रवानी है। शिल्प और बेमिसाल कथ्य का यह संगम ‘गुंचे‘ को श्रेष्ठ ग़ज़ल संग्रह बनाता है। शायरा का शब्द-भण्डार विपुल है। संग्रह की अधिकतर ग़ज़लें प्रेम, श्रृंगार एवं विरह की विविध अवस्थाओं के चित्रण से मन की कोमल भावनाएं स्वत: प्रकट होने लगती हैं। प्रेम के विविध आयाम के अशआर देखें - ‘आजकल खुद पे इख़्तियार नहीं/और क्या है अगर ये प्यार नहीं।’,‘ तेरे चेहरे से जो टपकता है/चांद में नूर वो कहां जानां।’,‘होश अपना है न दुनिया की ख़़बर/इश्क़ तेरा हमको ले आया कहां।’ विरह-वेदना की तीव्र अनुभूति के स्वर-‘धरती काटे अंबर काटे/तुम बिन हर इंक मंजर काटे।’,‘तुम गये सब चला गया दिल से/इक ख़लिश है वहीं नहीं जाती।’ कहा जा सकता है कि ग़ज़लकार मोहब्बत की शायरा हैं। इसके साथ ही वर्तमान समाज का चित्रण एवं जीवन के विविध पहलुओं को भी उजागर किया गया है। सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक आदि जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श करते हुए जीवन की अनुभूति, मानव संवेदना, आदि प्रमुख विषयों को भी ग़ज़ल के अशआर में इंगित किया गया हैं। ये अशआर सियासत की तल्ख़ हक़ीक़त बयान करते हैंः-‘वो लोग जिन्हें अपनी बुलंदी का नशा है/सब की निगाहों से उतर जाएंगे इक दिन।’ आज के युग की विडम्बना यही है-‘हर एक शहर सुलगता दिखाई देता है/उमीद क्या थी मगर क्या दिखाई देता है।’ शायरा की साफगोई का खुबसूरत अन्दाज देखें-‘मेरी अच्छाई की सनद ये है/मैं खुद को ख़राब लिखती हूं।’ इस शे’र में मुहावरे का कैसा सुन्दर प्रयोग किया गया है-‘हम तो दरिया में डाल देते हैं/नेकियां तुम संभालते हो क्या ?’ इन सब खूबियों के बीच ग़ज़ल-व्याकरण की दृष्टि से कुछ ग़ज़ल रचनाओं में ऐब (दोष) भी हैं, लेकिन ये नाम मात्र के लिए ही हैं। उदाहरणार्थ- बाब-अहबाब (क़ाफ़िया दोष), जाते जाते देख मुड़ कर आखि़री (रदीफ दोष), कई बाऱ रोज, बयाऩन, अब़ बेअसर, हऱरंग, बेबाक़ कर, मऱ रहा, सर ़रहे ऐबे तनाफुर (स्वरदोष)। तकाबुले रदीफ, ऐबे शुतुरगुर्बा भी किन्हीं-किन्हीं शेरों में हैं। वर्तनी दोष - रंज, राज, ऊंगली, जबान, यकीं, मिजाज, ताज, जिया (जिया)। हिन्दी में अच्छी ग़ज़लें कही जा रही हैं, सुमन ढींगरा दुग्गल का यह श्रेष्ठ संग्रह इस बात का साक्षात प्रमाण है। 112 पेज के इस संग्रह को उत्कर्ष प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 150 रुपये है।


 ‘ग़ज़ल का सफ़र’ मरहूम शायर वेद दीवाना की 80 ग़ज़लों का संग्रह है, जिसे उनके पुत्र राजीव दीवाना द्वारा प्रकाशित कराया गया है। पंजाब के ग़ज़लकारों में वेद दीवाना का नाम बहुत एहतराम से लिया जाता है। इस संग्रह में वेद दीवाना ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से कुछ दिल की, कुछ ज़िन्दगी की, कुछ संसार की और कुछ आज की बातें कही हैं। आपबीती के साथ ही जगबीती इन ग़ज़लों में साफ-साफ दिखायी देती है। इनमें दिल की धड़कनें सुनायी देती हैं, तो आम आदमी की आवाज़ को भी आसानी से महसूस किया जा सकता है। पुस्तक की कुछ ग़ज़लें रिवायती हैं, कुछ आधुनिक समाज का दर्पण भी हैं। ग़ज़लें अपनी परम्पराओं से जुड़ी हुई हैं, जो ग़ज़ल-विधा को निरन्तर आगे बढ़ाये जाते रहने के लिए निहायत ज़रूरी चीज है। वेद दीवाना की ग़ज़लों की भाषा मधुरता और सरसता लिए हुए आमफहम भाषा है, जिसे हर कोई आसानी से समझ सकता है। बोझिलता कहीं नहीं है। मुश्किल से मुश्किल बात को भी आसान लफ़्ज़ों में पिरो देना उन्हें आता है। बड़ी ही खूबसूरती और सलीके़ की शायरी है। हर तरह और हर मुद्दे पर अशआर कहे हैं। उनकी ग़ज़लें उनके अपने अनुभव से कही गयी हैं, जिनमें जीवन का निचोड़ झलकता है। मन के भावों की सफल प्रस्तुति हुई है। इनकी शायरी आम और ख़ास इंसान के हर एहसास को बयां करती है। वेद दीवाना के अपने रंग में रंगी हुई हैं उनकी ये ग़ज़लें। शिल्प की दृष्टि से ग़ज़लों की बुनावट ठीक है। कहीं-कहीं ग़ज़लों में तकाबुले रदीफ, ऐबे तनाफुर, ऐबे तख़ालुफ जैसे छोटे-मोटे दोष भी दिख जाते हैं। एक-आध मिसरे बे-बह्र भी हैं। प्रूफ रीडिंग सम्बन्घी दोष कहीं-कहीं रह गये हैं। ख़ोफ, पुछूंगा, बदगुमाना, पहली वार, ऐक, बरदात, ऐहले आदि जैसी वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियां संग्रह की साहित्यिकता की गरिमा के विपरीत हैं। लेकिन, इन सबके बावजूद ग़ज़ल का सफर संग्रह पठनीय एवं सराहनीय है। पुस्तक की ग़ज़लों के कुछ अशआर, जो बरबस ही ध्यान आकृष्ट कर लेते हैं, मुलाहिजा फरमायें- ‘खुद पर उसे ग़रूर अगर था तो इसलिए/सब कुछ था उसके घर में मगर आईना न था।’,‘मिजाज अपना भला बदलेगा सूरज/ये अंगारा है अंगारा रहेगा।’ अपना हाले-दिल शायर ने कुछ इस तरह बयान किया है-‘मैं बिखर जाऊं न सुखे हुए फूलों की तरह/मुझको इन तेज हवाओं से बचा कर ले जा।’,‘ एक तिनका हूं हवा मुझको झटक देगी कहीं/तू तो दरिया है मुझे साथ बहा कर ले जा।’, ‘क्या अजब मेरा भी तुमको जिक्र मिल जाए कहीं/तुम किताबे दिल के कुछ पन्ने उलट कर देखना।’ 80 पेज की पुस्तक को मन्नत पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 300 रुपये है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित )

शनिवार, 1 मई 2021

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की रगों में दौड़ती थी उर्दू


 

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

   25 दिसंबर की सुबह दिल्ली से प्रयागराज पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने दुनिया को अलविदा कह दिया। एक महीना से भी अधिक तक दिल्ली में इलाज करा रहे फारूकी साहब को जैसे अपने जन्मभूमि पहुंचने की ही प्रतीक्षा थी। पूरी दुनिया में उर्दू अदब की आलोचना जगत में उनका नाम सरे-फेहरिस्त है। पाकिस्तान के ‘निशान-ए-इम्तियाज’ एवार्ड से लेकर पद्मश्री तक सफर उन्होंने तय किया। उर्दू की सेवा के लिए अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, रूस, हालैंड, न्यूजीलैंड, थाईलैंड, बेल्जियम, कनाडा, तुर्की, पश्चिमी यूरोप,सउदी अरब और कतर आदि देशों का दौरा किया था। अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड के कई विश्वविद्यालयों में कई बार लेक्चर दिया था। 30 सितंबर 1935 को प्रतापगढ़ में पैदा होने वाले श्री फारूकी छह बहन और सात भाइयों में पांचवें नंबर पर थे। पिता मोहम्मद खलीकुर्रहमान फारूकी डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल थे। प्रतापगढ़ में प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद आप पढ़ाई के लिए इलाहाबाद आ गये। 1955 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। अपने बैच

में प्रथम स्थान हासिल किया, लेकिन लेक्चरशिप नहीं मिला। हताश नहीं हुए और सतीश चंद्र डिग्री कालेज बलिया में और इसके बाद शिब्ली नेशनल कालेज आजमगढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य करने लगे। 1958 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (एलाइड) के लिए आप चयनित हो गए। भारतीय डाक सेवा में कार्य करते हुए आपने विभिन्न राज्यों में अपनी सेवाएं दीं, 1994 में रिटायर हुए थे। अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी ने 2002 में और मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी हैदराबाद ने 2007 में आपको डी.लिट की मानद उपाधियों से विभूषित किया। 1991 से 2004 तक यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसलवानिया, फिलाडेल्फिया (यूएसए) में मानद प्रोफेसर रहे, 1997 से 1999 तक ‘खान अब्दुल गफ्फार खां प्रोफेसर’ के पद पर कार्यरत रहे। नेशनल कौंसिल फार प्रमोशन ऑफ उर्दू (नई दिल्ली) के वाइस चेयरमैन के रूप में उर्दू की तरक्की के लिए किया गया काम आपकी महत्वपूर्ण सेवाओं में से है। 


शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी


 मीर तकी मीर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर श्री फारूकी ने चार खंडों में ‘शेर-शोर अंगेज’ नामक किताब लिखकर तहलका मचा दिया। इस किताब पर 1996 में ‘सरस्वती सम्मान’ प्रदान किया, सम्मान के रूप में मिला पांच लाख रुपये उस समय का सबसे बड़ी इनामी राशि वाला सम्मान था। 1996 में ही आपने ‘शबखून‘ नामक मासिक पत्रिका निकाली, जो दुनिया-ए-उर्दू अदब में चर्चा का विषय हुआ करती थी। इनकी किताब ‘उर्दू का इब्तिदाई जमाना’ उर्दू और हिन्दी के अलावा अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुआ है। अंग्रेजी में इसे आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित किया है। शायरी में चार किताबें छप चुकी हैं, जिनके नाम ‘गंजे-सोख्ता’, सब्ज अंदर सब्ज’,‘चार सिम्त का दरिया’ और ‘आसमां मेहराब’ हैं। गद्य की किताबों में ‘लफ्जी मआनी’,‘फ़ारूक़ी के तब्सरे’,‘शेर गैर शेर और नस्र’,‘अफसाने की हिमायत में’, ‘तफहीमे-ग़ालिब’,‘दास्ताने अमीर हमजा का अध्ययन’ और ‘तन्कीदे अफकार’ आदि हैं। अंग्रेजी किताबों में ‘द सीक्रेट मिरर’,‘अर्ली उर्दू लिटेरेरी कल्चर एंड हिस्टी’,‘हाउ टु रीड इकबाल‘ हिन्दी में ‘अकबर इलाहाबादी पर एक और नजर’ वगैरह विशेष उल्लेखनीय हैं। हाल ही में अंग्रेजी में प्रकाशित उनका नाविल ‘कई चांद थे सरे आसमां’ का हिन्दी अनुदित संस्करण काफी चर्चा में रहा है। ‘उर्दू की नई किताब’ और ‘इंतिख़ाबे-नस्रे’ समेत कई किताबों का संपादन भी किया। श्री फ़ारूक़ी ने कुछ किताबों का अंग्रेजी से उर्दू अनुवाद भी किया है, जिनमें अरस्तू की पुस्तक ‘पाएटिक्स’ का उर्दू अनुवाद ‘शेरियत’ है। ‘शेर शोर अंगेज’ नामक पुस्तक चार खंडों वाली किताब में मीर तक़ी मीर के एक-एक शेर की व्याख्या और उसके विशलेषण में उसी विषय के कवियों के अश्आर की मिसालें दे-देकर ऐसा लिखा है की उर्दू अदब में तहलका सा मच गया, बड़े-बड़े आलिम चैंक पड़े। उनकी पुस्तक ‘एसेज इन उर्दू क्रिटिसिज्म एंड थ्योरी’ के अलावा गालिब और मुसहफी की जिदगी पर आधारित कहानियां हैं। उर्दू में ऐसे शब्दों और मुहावरों को शामिल करते हुए एक शब्दकोश की पुस्तक तैयार किया, जो आम शब्दकोश में मिलना लगभग असंभव है।

 ( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित)