शनिवार, 26 नवंबर 2022

फूल अब गुफ़्तगू भी करने लगे

                                      - डॉ. वारिस अंसारी 
                                           फतेहपुर
                                           मो. 9935005032



 ज़हे-नसीब आज मेरे हाथ में एक मशहूर सहाफी, गुफ्तगू जैसी अज़ीम पत्रिका के संस्थापक और मुनफरिद लब-ओ-लहजे के खूबसूरत शाइर इम्तियाज़ अहमद गाज़ी की ताज़ा तरीन किताब ‘फूल मुखातिब हैं’ मौजूद है। सवाल इस बात का है कि कोई किसी से क्यों मुखातिब होगा ? इसके दो तीन जवाब हो सकते हैं। एक तो ये कि मुख़ातिब होने वाले शख़्स का कोई काम हो, दूसरा रस्मी तौर पर भी लोग मुख़ातिब हो जाते हैं। तीसरी सबसे अहम वजह ये कि हम जिससे मुख़ातिब हैं, वह एक बा-सलाहियत और नेक इंसान है, वह लोगों की कद्र करना जानता है। यही सारी बातें इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के साथ भी लागू होती है कि वह बा-सलाहियत शख़्स के साथ-साथ नेक दिल इंसान भी हैं। आप कमाल की शायरी करते हैं। इस किताब में तीन सौ अशआर हैं, जिसमें कहीं फूल गाज़ी से बात कर रहे हैं और कहीं गाज़ी साहब फूलों से गुफ्तगू करते नज़र आ रहे हैं। एक शे’र देखते चलें- 
            उनको देखा तो ये हुआ मुमकिन,
            फूल अब गुफ्तगू भी करने लगे।
  ऐसे बहुत से अशआर हैं जो कि काबिले-तारीफ हैं। आपने आसानी से और नए रंग में अशआर पेश कहं हैं। खुद गाज़ी साहब की ज़ुबानी ‘मैने चाय की चुस्कियों के साथ ऐसे अशआर कहे हैं’ इस तरह इतने खूबसूरत की शे’र की तखलीक अपने आप में किसी मोजेजा से कम नहीं। आपकी शायरी में संजीदगी है। अमन और भाईचारे का संदेश है। मोहब्बत का खूबसूरत पैगाम है और यही एक सच्चे शाइर का मकसद होता है। खूबसूरत कवर के साथ इस किताब में 80 पेज हैं। गुफ्तगू पब्लिकेशन प्रयागराज से प्रकाशित इस किताब की कीमत 150 रुपए है। उम्मीद करता हूं कि गाज़ी साहब की ये किताब अदब में आला मुकाम हासिल करेगी ।


सच्चाई का अक्स गई हैं ख्वाबों का जज़ीरह



 ख्व़ाबों का जज़ीरह सरफराज अशहर का शेरी-मजमूआ है, जिसमें 56 गजलें हैं। मजमूआ में गज़लें भले ही कम लग रही हों लेकिन जितनी गज़लें हैं एक से बढ़ कर एक हैं। सारी गज़लें हालात की अक्कासी करती नज़र आ रही हैं। सरफराज़ अशहर ने वही ख़्यालात पेश किए हैं जो कि एक सच्चा अदीब पेश करता है। इनकी गजलों को पढ़ कर अंदाज़ा होता है कि शायरी सिर्फ इनका शौक़़ नहीं बल्कि इन्हें लोगों के दर्द का एहसास भी है। समाजी हालात को बा-ग़ौर देखने के साथ-साथ आदिल के इंसाफ पर भी पैनी नज़र रखते हैं। मुफलिसों का कर्ब इन्होंने करीब से देखा है। यही सब वजूहात हैं कि जाम ओ साकी, लब ओ रुखसार तक नहीं गया। इन्होंने अपनी शायरी में सच् की आवाज़ बुलंद की है। ज़ालिम और गुमराह लोगों को आइना दिखाने का काम किया है जो काबिले-तहसीन है। अशहर साहब बहुत ही सादगी से अपनी बात कहने का हुनर जानते हैं। इनकी शायरी की एक बड़ी खूबी ये है कि पाठक आसानी से पढ़ता चला जाता है और बोझिल होने का एहसास भी नहीं करता। इनकी शायरी में बला की सादगी है और पुरानी बातों को भी नए स्लूब में ढाल देते हैं। जिससे कारी सोचने पर मजबूर हो जाता है। इनकी शायरी झूट और बनावट से पाक है। अगर इनका मश्के सुखन यूं ही जारी रहा तो आने वाले कल के लिए इनकी शायरी अदब में एक मुनफरिद पहचान की हासमिल होगी। इस मजमूआ में 140 पेज हैं। खूबसूरत जिल्द के साथ किताब की कीमत सिर्फ 250 रुपए है। इस किताब की किताबत रूशान प्रिंटर्स देहली से हुई है और एजुकेशनल पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है। उम्मीद करता हूं ख्वाबों का एक जजीरह अवाम व अदब में एक बुलंद मुकाम तक मकबूल होगा।


अवाम का एहसास है एहसास-ए-मुजाहिद



 
मुजाहिद हुसैन चौधरी अदब का वह नुमाया नाम है, जिसे किसी तआरूफ की ज़़रूरत नहीं। कहीं वह अपने पेशे (वकालत) के लिए पहचाने जाते हैं तो कहीं समाजी कारकुन और लोगों के मददगार के रूप में जाने पहचाने जाते हैं। आपकी अदबी पहचान तो बिल्कुल ही मुनफरिद है।  आपका शेरी-मजमूआ ‘एहसास-ए-मुजाहिद’ बहुत ही खूबसूरत और नायाब है। मैंने पढ़ना शुरू किया तो मुझे पता ही नहीं चला कि कब मैंने पूरी किताब खत्म कर ली। कहने का मतलब कि शायरी में जिस तरह की रवानी है, सादा अल्फाज़ हैं, उम्दा खयालात हैं पढ़ने में एक अलग किस्म का मज़ा देते हैं। आपकी शायरी इश्क़, मोहब्बत,  हालात की अक़्क़ासी सब कुछ बहुत दिलकश अंदाज़ में देखने को मिलता है। एक ख़ास बात और कि आपके यहां वतन-परस्ती का जज़्बा भी खूब है। एक मतला मुलाहेज़ा करते चलें- 
            शहीदाने वतन की ज़िंदगी किस्मत से मिलती है, 
            वतन पर जां लुटाने की घड़ी किस्मत से मिलती है।
   आपकी शायरी पढ़ कर अंदाज़ा होता है कि आपने शायरी को कहीं भी मजरूह नहीं होने दिया और निहायत खूबसूरती के साथ अशआर कहे हैं। लोगों के दर्द को अपना दर्द समझा और फिर उस एहसास को लोगों तक पहुंचाया जो आसान काम नहीं है। आपकी शायरी एहसासत का ज़खीरा है जो कि दुनिया ए अदब में मील का पत्थर साबित होगी। इस किताब की कंपोजिंग हर्फ कंपोजिंग सेंटर दिल्ली ने की है और प्रकाशन सलमान आफसेट प्रेस मौज पुर दिल्ली से हुआ है। 128 पेज की इस किताब की कीमत 90 रुपए है। इस खूबसूरत मजमूआ के लिए मैं मुजाहिद हुसैन चौधरी साहब को अमीक दिल से मुबारकबाद पेश करता हूं और दुआ करता हूं कि ये किताब अदबी घराने में खूब मक़बूल हो।


ज्ञान का भंडार है पिकनिक



पिकनिक शब्द का अर्थ यूं तो सैर सपाटा या किसी मनोरम जगह का भ्रमण करना है लेकिन मोहतरमा शाह ताज खान ने पिकनिक के माध्यम से बहुत कह दिया। बेहद आसान ज़बान में सरल शब्दों का प्रयोग करके लिखी गई वाकई पिकनिक की तरह ही लग रही है। पढ़ना शुरू कर दो तो ऐसा लगता है पढ़ते ही चले जाओ। ऐसे-ऐसे उदाहरण दे कर बात की गई है कि बच्चे भी आसानी से समझ सकते है जिससे बच्चों में ज्ञान का भंडार भी बढ़ेगा और उन्हें आनंद भी आएगा। अक्सर कुछ चीजें होती हैं जो पढ़ने में काम लेकिन सुनने और देखने पर ज्यादा समझमें आती हैं। लेकिन इस किताब का यही कमाल है कि जब आप इस किताब को पढ़ेंगे तो महसूस करेंगे कि हम वही दृश्य, वही चीजे़ं देख रहे हैं जो इस किताब में मौजूद हैं। जैसे पहली कहानी ही ले लीजिए जिसका शीर्षक ही पिकनिक है। इस कहानी में हाथी को मास्टर साहब के किरदार में दिखाया गया है जबकि शेर  चीता, बंदर आदि जानवरों के बच्चों को विद्यार्थी के रूप में। मास्टर साहब के साथ जानवरों के ये बच्चे पिकनिक पर जाते हैं। जहां इंसानों को पिंजरे में कैद किया गया है। सचमुच ये कहानी इंसान को झकझोर देने वाली है। 

 इस किताब में अठारह कहानियां हैं जो कि एक से बढ़ कर एक हैं। नाखूून, नींद, ज़बान संभाल के जैसी कहानियों को पढ़ कर बहुत कुछ सीखा जा सकता है। और बच्चों के लिए तो ये किताब बेहद कारामद है जिससे उनका दिमाग भी तेज होगा। किताब के पीछे कवर पेज पर मतीन अचल पुरी की एक बहुत ही शानदार तौशीही नज़्म भी है। खूबसूरत कवर, उम्दा किस्म का कागज़ और शानदार प्रिंटिंग वाली इस किताब पिकनिक में 112 पेज हैं। यह किताब का दूसरा एडिशन है, जिसे शाह ताज खान आफसेट भिविंडी, महाराष्ट्र से कंपोज कराकर समर पब्लिकेशन मालेगांव महाराष्ट्र से प्रकाशित किया गया है। कवर पेज की डिजाइन क्षितिजा वाहुवाल पूना से हुई है। इस किताब की कीमत मात्र 120 रुपए है। 



 अवाम का दर्द है ‘देखो तो जरा


ज़रा देखो तो अशफाक ब्रदर के नसरी नज्मों का संग्रह है। जो कि अपने अंदर अवाम की आवाज़, अवाम का दर्द समेटे हुए है। एक दौर था जब उसातज़ह (गुरुजन) लोग इस तरह की नस्री नज़्म/कविता को शायरी के पैराए से अलग मानते थे। मज़ाक की निगाह से देखते थे लेकिन धीरे-धीरे वक़्त बदला, लोग बदले और बीसवीं सदी के करीब यह विधा भी कविता में शामिल हो गई। आज इस तरह की कविताओं का चलन बन गया है। कहा जाए तो यह दौर ही आधुनिक कविताओं का दौर है। आधुनिक कविताएं पढ़ने में तो आसान लगती हैं लेकिन इनकी रचना करना उतना ही मुश्किल है। हालांकि बहर, औजान, रदीफ ,क़ाफिया में कै़द शायरों ने कभी आज़ाद नज़्म की जानिब तवज्जह नहीं दी, मगर कुछ अदबी दानिशवरों ने इस तरफ पूरा ध्यान दिया और यहां तक कह दिया कि शेर वज्न और बह्र का मोहताज नहीं बल्कि जो वाक्य नस्र (गद्य) में होते हुए भी एक भाव पैदा करे वह भी शेर है। 

     ऐसे ही सिफत के मालिक अशफाक ब्रदर हैं, जो कि नई नज्मों के एक बाकमाल शायर की हैसियत रखते हैं और अदब में भी उनका एक अलग मुकाम है। अशफाक ने अपने अदबी सफर की शुरुआत 1980 के बाद अफसानों से किया। उनके अफसानों में भी शायरी की झलक मिलती है। अशफाक ब्रदर की किताब ‘जरा देखो तो’ नसरी नज्मों का मजमुआ है। जिसमें अवाम का दर्द है, लोगों के दिल की बात है। उन्होंने जो देखा और महसूस किया वही अपनी नज्मों में ढाल दिया। उनकी एक छोटी सी नज़्म की बानगी देखें जो इंसान को सोचने पर मजबूर कर देती है- ‘पल पल कर/जवां होते अहसासात/ आज/क्या मांग रहे हैं ?/ तालीम या दो वक्त की रोटी/या फिर दोनो/मगर इसमें/अहम तरीन कौन?/रोटी या तालीम।’ ऐसी ढेरों नज्में मौजूद हैं । 

बेहद मकबूल किताब जरा देखो तो खूबसूरत जिल्द के साथ 166 पेज की इस किताब की कीमत सिर्फ 200 रुपए है। जो कि अब्दुल बाकी कासमी कम्प्यूटर से कंपोज हुई और इंप्रेशन प्रिंट हाउस लाटूस रोड लखनऊ से प्रकाशित हुई है। इस खूबसूरत संग्रह के लिए अशफाक ब्रदर को खूब खूब मुबारकबाद। उम्मीद कि अदब में ये किताब मील का पत्थर साबित होगी।


( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2022 अंक में प्रकाशित )


शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

साहित्यकार की कल्पना में होती है वास्तविकता: एडीजी

 अमेरिका की डॉ. निशा समेत देशभर के साहित्यकारों का हुआ सम्मान

अपर पुलिस महानिदेशक प्रेम प्रकाश


प्रयागराज। देशभर से आए साहित्यकारों और पत्रकारों को सम्मानित करके गुफ़्तगू ने एक बेहद महत्वपूर्ण कार्य किया है। वेैसे भी प्रया्रगराज अकबर इलाहाबादी, बच्चन, पंत, निराला जैसे साहित्यकारों का शहर रहा है। ऐसे शहर में गुफ़्तगू की तरफ से कराया जा रहा आयोजन बेहद महत्वपूर्ण है। साहित्यकारों का काम होता है कि वे अपनी रचनाओं के माध्यम सेे देश और समाज में एकता और खुशहाली पैदा करने का संदेश दें। इसमें साहित्यकार सफल भी रहते हैं, उनकी कल्पना में भी समाज का सही चित्रण किसी न किसी में होता ही है। यह बात 13 november 2022 को हिन्दुस्तानी एकेडेमी में गुफ़्तगू की ओर से आयोजित ‘गुफ़्तगू साहित्य समारोह-2022’ के दौरान मुख्य अतिथि अपर पुलिस महानिदेशक प्रेम प्रकाश ने कही। उन्होंने कहा कि आज सम्मान समारोह में दूर-दूर से आए हुए लोगों को देखकर लगता है कि प्रयागराज और गुफ़्तगू का यह कार्यक्रम वास्तविक में भी संगम ही है और यह सब संगमनगरी में हो रहा है। इस आयोजन से एक साहित्यक परिदृश्य सामने आ रहा है। साहित्य समाज और देश की बेहतरी के लिए ही रचा जाता है।

गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि हमारी संस्था प्रत्येक वर्ष अच्छे रचनाकारों और पत्रकारों का सम्मान करती है। आज के दौर में जो लोग अच्छा लेखन कर रहे हैं, उनका सम्मान किया जाना चाहिए, इसी सोच के तहत गुफ़्तगे टीम कार्य करती रही है, बीस वर्ष से यह सिलसिला जारी है। आगे भी लोगों के सहयोग से इस तरह के साहित्यिक आयोजन होते रहेंगे।

कार्यक्रम के दौरान कुवैत की लेखिका नाज़नीज अली नाज़ की पुस्तक ‘खलिश’, आईएएस राम नगीना मौर्या की पुस्तक ‘आगे से फटा जूता’ और गुफ़्तगू के नए अंक विमोचन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. वीरेंद्र तिवारी ने कहा कि आज का आयोजन सही मायने में साहित्यकारों के सम्मान का कार्यक्रम है। गुफ़्तगू द्वारा प्रत्येक वर्ष देशभर के लोगों का सम्मान किया जा रहा है, यह एक बहुत नेक और शानदार आयोजन बन गया है।

डॉ. हसीन जीलानी ने कहा कि आज जहां एक तरफ साहित्यकारों का सम्मान हुआ वहीं दूसरी ओर नाज़नीज अली नाज़ की किताब ‘खलीस’ के हिन्दी और उर्दू संस्करणों का विमोचन किया गया। ‘खलिश’  एक बहुत शानदारी कहानी संग्रह है, जिसमें लेखिका ने समाज की स्थितियों का सटीक और बेहतरीन वर्णन किया है। नाज़नीन अली नाज़ ने कहा कि मेरी किताब को प्रयागराज जैसे साहित्यिक शहर में विमोचन होना, मेरे लिए बड़े गर्व की बात है, इसके लिए मैं गुफ़्तगू संस्था का आभारी हूं। कार्यक्रम का संचालन शैलेंद्र जय ने किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। नरेश महारानी, अनिल मानव, प्रभाशंकर शर्मा, अशोक श्रीवास्तव कुमुद, नीना मोहन श्रीवास्तव, राजेश राज, अफसर जमाल, रचना सक्सेना, शिबली सना, दयाशंकर प्रसाद, अतीक़ नूर, सेलाल इलाहाबादी, देवी प्रसाद पांडेय, धीरेंद्र सिंह नागा, राधा शुक्ला, शाहीन खुश्बू, असद ग़ाज़ीपुरी आदि ने कलाम पेश किया।



अकबर इलाहाबादी सम्मान

तलब जौनपुरी

कुलदीप नैयर सम्मान 

स्नेह मधुर (वरिष्ठ पत्रकार), सुशील कुमार तिवारी (सहारा समय), पंकज चौधरी (न्यूज 24), गिरीश पांडेय (लोकमित्र) 

सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान 

डॉ. निशा पंड्या (अमेरिका), डॉ. तस्नीमा परवीन (रांची), अनिला सिंह (जम्मू कश्मीर), शगुफ्ता रहमान (काशीपुर), निधि चौधरी (किशनगंज, बिहार), सुनीता सिंह (लखनऊ) 

कैलाश गौतम सम्मान 

राम नगीना मौर्या (लखनऊ), श्याम नारायण श्रीवास्तव (रायगढ़), मोहम्मद क़मर सलीम  (मुंबई), चौधरी मुजाहिद हुसैन (अमरोहा), चंद्र प्रकाश पांडेय (प्रयागराज)

 इब्राहीम अश्क सम्मान 

डॉ. प्रकाश खेतान (प्रयागराज) सुशील खरे वैभव (पन्ना, मध्य प्रदेश), डॉ. अशफ़ाक़ अहमद (गोरखपुर) 

धीरज सम्मान 

डॉ. नीलिमा तिग्गा (अजमेर), स्नेहा पांडेय (बस्ती), प्रदीप बहराइची (बहराइच), सीमा वर्णिका (कानपुूर), नरेश महरानी (प्रयागराज) 

सीमा अपराजिता सम्मान 

सरिता कटियार (लखनउ), ममता देवी (कानपुर),, स्वराक्षी स्वरा (कटिहार),, शहाना बेगम (प्रयागराज), डॉ. निशा मौर्या (प्रयागराज)


मंगलवार, 8 नवंबर 2022

नई पीढ़ी के प्रेरणा-स्रोत डॉ. विवेकी राय

                                             

डॉ. विवेकी राय

                 


                                                                                - अमरनाथ तिवारी ‘अमर’

                                             

  डॉ. विवेकी राय का जन्म 19 नवंबर 1924 को हुआ था। इनके पिताजी का नाम शिवपाल राय और माताजी का नाम जविता देवी था। उनका पैतृक गांव सोनवानी, ग़ाज़ीपुर है। 1940 में मिडिल और 1941 उर्दू से मीडिल करने के बाद 1942 में गांव लोवर प्राइमरी स्कूल में शिक्षक हो गए थे। इसके आगे की शिक्षा इन्होंने व्यक्तिगत विद्यार्थी के रूप में की। 1964 में एम.ए. और काशी विद्यापीठ वाराणसी से वर्ष 1970 में पी-एच.डी. की। इनके लेखन का प्रारंभ वर्ष 1945 में वाराणसी से प्रकाशित दैनिक ‘आज’ में उनकी छपी कहानी से माना जाता है। इसके बाद इस समाचार-पत्र में उनकी कविता, कहानी और लेख निरंतर छपते रहे। इनका एक चर्चित साप्ताहिक स्तंभ ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ वर्ष 1957 से 1970 तक इस अख़बार में छपा। जो बहुत लोकप्रिया हुआ। इसमें ललित निबंध, रेखाचित्र और रिपोर्ताज छपे। वर्ष 1964 में डॉ. विवेकी राय का स्नातकोत्तर महाविद्यालय ग़ाज़ीपुर में अध्यापन करने लगे। इससे पहले लगभग 13 वर्षों तक अपने गांव के निकट खरडीहा के सर्वोदय इंटर कॉलेज में भी इन्होंने  अध्यापन किया था। ग़ाज़ीपुर आने के बाद वे हिन्दी की चर्चित स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में लिखने-छपने लगे। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, नवनीत, कादंबिनी, कल्पना, ज्ञनोदय आदि पत्रिकाओं में निरंतर छपने लगे। उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्हें वर्ष 1974 में पुनगर्ठित हिन्दी समिति का सदस्य मनोनीत किया। बिहार सरकार ने 1978 में भोजपुरी एकेडेमी का सदस्य मनोनीत किया। 1971 में इन्हें आकाशवाणी इलाहाबाद के कार्यक्रम परामर्श दात्री समित का सदस्य बनाया गया। 1977 से कई वर्षों तक ये अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन की प्रवर समिति के सदस्य रहे। 1983 में वे इस संस्था के अध्यक्ष चुने गए। 1980 में डॉ. विवेकी राय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ग़ाज़ीपुर के हिन्दी विभाग से अवकाश ग्रहण किए।

डॉ. विवेकी राय की लगभग 70 पुस्तकें प्रकाशित हैं। ये पुस्तकें विभिन्न प्रकाशनों में छपी हैं। इनकी कहानियों और उपन्यासों का अनुवाद उर्दू, पंजाबी, मराठी, उड़िया आदि भाषाओं में भी हुआ है। इनका प्रारंभिक जीवन साधन विहीन गांव में अध्यापन और किसानी करते हुए बीता। बाद में पूर्वांचल के अति पिछड़े शहर ग़ाज़ीपुरी आए। अपनी अनवरत और एकनिष्ठ साधन के बल पर इन्होंने विविधि विधाओं में रचनाएं की। इन्होंने हिन्दी के साथ भोजपुरी साहित्य को भी समृद्ध किया। भोजपुरी में भी हिन्दी 10 पुस्तकें हैं। डॉ. विवेकी राय को विभिन्न राज्य सरकारों और साहित्यिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। प्रमुख पुरस्कार और सम्मान ये हैं- 1987 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सोनामाटी पर प्रेमचंद पुरस्कार, 1994 में साहित्य भूषण सम्मान, 2006 में महात्मा गांधी सम्मान, वर्ष 2006 में यश भारती सम्मान, 2002 में केंद्रीय हिन्दी संस्थान आगरा द्वारा राहुल सांकृतयायन सम्मान,  मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 1996-97 का शरद जोशी सम्मान, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर द्वारा वर्ष 2000 में पूर्वांचल रत्न सम्मान, साहित्य चेतना समाज ग़ाज़ीपुर द्वारा 2003 में ग़ाज़ीपुर गौरव सम्मान प्राप्त हुआ है। डॉ. विवेकी राय पर विभिन्न विधाओं पर देश-विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के माध्यम से 100 से अधिक लोगों ने शोघ किया है। इनके उपर दर्जनभर से अधिक शोध की पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इनका देहावसान नवंबर 2016 में हुआ। डॉ. विवेकी राय का व्यक्तित्व एंवं कृतित्व आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।


( गुफ़्तगू के लुलाई-सितंबर 2022 अंक में प्रकशित ) 


गुरुवार, 27 अक्तूबर 2022

बादल चटर्जी का नाम ही काफी है

     

बादल चटर्जी

 

                                                                     -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

                                          

 प्रयागराज में तैनात रहने वाले ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों का जब जिक्र होता है, तो महमूद भट्ट और बादल चटर्जी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इनका जन्म 03 फरवरी 1955 को हुआ। इनके प्रपिताहम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ब्रम्होबान्धव उपाध्याय, जो कवि गुरू रबिन्द्र नाथ ठाकुर के शान्ति निकेतन के प्रबन्धक रहे हैं और बंगाल पार्टीशन के विरोध में आन्दोलन किए थे। इनके पिता न्यायाधीश स्व. तारा नाथ चटर्जी अंग्रेजों के समय इलाहाबाद विश्वविद्यलय के ‘डन मेडल’ से सम्मानित किए गए थे। बादल चटर्जी की पत्नी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी़ विषय से स्नातकोत्तर हैं और इलाहाबाद में विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़ने के साथ-साथ एक अच्छी गायिका भी हैं। 

 बादल चटर्जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए, एमए एवं एलएलबी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने के साथ-साथ मेरिट लिस्ट में भी स्थान प्राप्त किया था। विश्वविद्यालय की पढ़ाई के बाद वे यूको बैंक की सिविल लाइन्स शाखा में प्रोबेशनरी अधिकारी के पद पर चयनित हुए थे, तभी इनका चयन आईएएस परीक्षा में हो गया। इन्हे इण्डियन डिफेन्स एकाउन्ट सर्विस 1982 बैच आवंटित हुआ था। प्रशासनिक कार्य में रुचि के कारण ये पीसीएस सेवा में सम्मिलित होकर आईएएस अधिकारी बने। बादल चटर्जी अपने समय के स्कूल क्रिकेट कैप्टन रहे है और हॉकी के कलर होल्डर वाइस कैप्टन थे। वे हॉकी के क्लास वन अम्पायर भी रहे हैं।

1997 से 1999 तक बादल चटर्जी इलाहाबाद में अपर जिलाधिकारी, नागरिक आपूर्ति रहे हैं। इस दौरान इन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। जिनमें-डीज़ल रेकेट का भंडाफोड़ महत्वपूर्ण है। मामा भांजा तथा गद्दोपुर में डीज़ल टेंकर में केरोसीन की मिलावट करके एक टैंकर को दो टैंकर किया जाता था। नमक की कमी की अफवाह को तत्काल नियंत्रित किया जो अन्य जनपदों में कई दिनो तक चलता रहा। गैस सिलेन्डर की होम डिलीवरी सुनिश्चित कराया तथा उसके व्यावसायिक उपयोग पर अंकुश लगाया।

 वर्ष 1999 से 2000 तक ये इलाहाबाद में अपर जिलाधिकारी, नगर रहे हैं। तब इनके कार्यों की चर्चा बहुत अधिक थी। इन्होंने लेबर एक्ट के अन्तर्गत दुकानों की बन्दी का समय और साप्ताहिक अवकाश सुनिश्चित कराया, जिससे श्रमिकों को राहत मिली और दुकान मालिकों को भी आनंद व मनोरंजन का समय मिला। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का शिक्षण सत्र जो पिछड़ गया था, तत्कालीन कुलपति प्रो. खेत्रपाल को सहयोग प्रदान कर सत्र नियमित कराया। इलाहाबाद छात्रसंघ के चुनाव को विश्वविद्यालय परिसर में ही सीमित कराया। लाउडस्पीकर, जो ध्वनि प्रदूषण का माध्यम था, पर पूर्ण अंकुश लगाया। टेक्स्ट बुक्स एक्ट के अन्तर्गत सरकारी बेसिक स्कूल की किताबों की डुप्लीकेट प्रति बनाकर बेचने के धन्धे को रोका और दोषी व्यक्तियों के विरूद्ध कार्यवाही की गई। दीपावली के पहले मउआइमा में छापा मारकर तीन ट्रक अवैध आतिशबाजी व पटाका नष्ट कराया, जिसके कारण इलाहाबाद में तेज बजने वाले पटाकों पर अंकुश लगा। पहली बार पटाकों को बजार से हटाकर क्षेत्रवार विभिन्न स्कूलों के मैदानों में स्थापित करा कर बिकवाया। इस कार्रवाई के दस साल बाद मउआइमा में पुनः अवैध तरीके से आतिशबाजी बनाने में भीषण लग जाने के कारण कई व्यक्ति झुलस कर मर गये। पायनीयर अखबार में लिखा गया था कि यदि बादल चटर्जी ने जो निरोधात्मक कार्रवाई दस साल पहले किया था, उसे उनके बाद के अधिकारीगण अगर करते, तो ऐसी घटना नहीं घट पाती।

 बादल चटर्जी वर्ष 2002 से 2003 तक इलाहाबाद नगर निगम के नगर आयुक्त थे। इस दौरान इन्होंने नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोका व कूड़ा उठाने वाली गाड़ी से सम्बन्धित डीज़ल रैकेट का भंडाफोड़ कर फैली अनियमितता को समाप्त किया। अंग्रजों के समय के पुराने नालों को ढंूढ निकाला जिसे लोगों ने ढक कर उनके ऊपर मकान बना लिया था। नाला सफाई मई, जून के महीने में कराया, जिससे शहर में पानी बरस जाने के बाद बाढ़ की स्थिति नहीं आयी। ैजवतउ ॅंजमत क्तंपद व सीवर को अलग करने की कार्यवाही प्रारम्भ किया। इलाहाबाद के पार्कों, विशेष रूप से नगर निगम कार्यालय के पार्क के सौन्दर्यीकरण का कार्य कराया। आज नगर निगम कार्यालय के पार्क का जो सुन्दर स्वरूप है, उन्ही की देन है। अतिक्रमण का सामान जो लोगों ने जुर्माना देकर नहीं लिया, उसका नीलामी करके उस पैसे से नगर निगम कार्यालय के पार्क को घेरवा दिया, जो आज भी विराजमान है। 

जुलाई 2004 से नवंबर 2004 तक आप उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग में सचिव के पद पर कार्यरत रहे हैं। इस दौरान इन्होंने वहां व्याप्त भ्रष्टाचार को रोका तथा अध्यक्ष व सदस्यों के विरुद्ध विजिलेन्स की जांच स्थापित कराया। इसके बाद उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में तैनाती रही।

 फरवरी 2014 में इनकी नियुक्ति इलाहाबाद मंडल केे कमिश्नर के पद पर हुई। तब इन्होंने चंद्रशेखर आजाद पार्क (अल्फ्रेड पार्क) का सौर्न्दयीकरण, पार्क में टहलने वालों के लिए टॉयलेट, सीविल लाइन्स की सड़कों का चौड़ीकरण और सौर्न्दयीकरण को स्वीकृति प्रदान किया। इन्हीं के देखरेख में फ्लाई ओवर्स का रोड मैप बनाया गया, जो बाद में बजट की स्वीकृति के बाद बना तथा और भी जहां-जहां फ्लाई ओवर्स का चिन्हीकरण किया गया, जो अब बन रहा है। खुसरो बाग में एक फ्लाई ओवर के कारण जाम की स्थिति उत्पन्न होती थी इसलिये दूसरे फ्लाई ओवर की योजना बनाई गई। शहर में पुलिस विभाग को सहयोग प्रदान करके खम्भों में कैमरा लगा कर अपराध पर अंकुश लगाया। गंगा नदी पर लाल बहादुर शास्त्री ब्रिज व फाफामऊ के ब्रिज का टोल टैक्स समाप्त कराया। स्वरूप रानी मेडिकल कॉलेज में एम. आर. आई. व सीटी स्केन नहीं था, जिसे स्थापित कराया। मण्डल में काफी डाक्टर लोग प्राइमरी हेल्थ सेन्टर व कम्युनिटी हेल्थ सेन्टर में नहीं जाते थे जिसके कारण बीमार गरीब व्यक्ति को चिकित्सा सुविधा तथा दवाई नहीं मिल पाती थी। ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा बिलकुल चरमरा गयी थी। इस लचर व्यवस्था को ठीक करने के लिए मोबाईल सर्विलान्स के माध्यम से इन डाक्टरों का लोकेशन लिया गया, जिससे डाक्टर ग्रामीण अंचल में निरंतर पहुंच कर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने लगे। स्वरूप रानी अस्पताल में जहां उनकों मुफ्त में दवाई व चिकित्सा सुविधा मिलनी चाहिए, वहीं कतिपय डाक्टर दलाल के साथ गठजोड़ कर मरीजों को प्राईवेट नर्सिंग होम में ले जाने की व्यवस्था करते थे, जहां उनका आर्थिक शोषण होता था। इनके द्वारा छापा मरवाकर 16 प्राईवेट एम्बूलेन्स को मेडिकल कॉलेज के परिसर से हटाकर जब्त कराया गया, जिससे ऐसा माहौल बना कि गरीब व स्थानीय लोगों की चिकित्सा सरलता के साथ उपलब्ध होने लगी। 

 सेवानिवृत्ति के बाद भी फरवरी 2015 में बादल चटर्जी समाज को बेहतर बनाने के लिए सक्रिय हैं। उस समय लोक सेवा आयोग में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर था। उन्होने छात्रों के साथ मिलकर हाईकोर्ट में दायर पीआईएल का समर्थन करके तथाकथित भ्रष्ट उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को हाईकोर्ट के आदेश से हटवाकर, प्रतियोगी छात्रों को न्याय दिलाने में एक अभूतपूर्व प्रयास किया। 

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2022 अंक में प्रकाशित )


शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2022

अकीदत और मोहब्बत के शाइर आरिफ नूरानी

                                            - डॉ. वारिस अंसारी 

                                                                              फतेहपुर 

                                                                           मो. 9935005032 

 नअत कहना आसान काम नहीं है। कहा गया है नअत कहना तलवार की धार पर चलने जैसा है। बताता चलूं कि जो अशआर नबी की शान में कहे जाते हैं नअत कहलाते हैं, लेकिन नअत कहने में इस बात का ख़्याल रखा जाता है कि नबी की शान में कमी भी न आने पाए, और खुदा की वहदानियत भी बाकी रहे। आइए बात करते हैं नअत के एक नायाब शाइर मो. आरिफ नूरानी का, जिनका नातिया मजमूआ ‘अकीदत के फूल’ बहुत ही खूबसूरत मजमूआ है। आरिफ का नअत कहने का अंदाज़ बहुत ही सादा है और आसान लफजों को भी बखूबी बरतना जानते हैं, जिससे कारी को पढ़ने में काफी आसानी होती है। आरिफ के अशआर में अकीदत और मोहब्बत के रंग बिखरे हुए हैं, जिससे ईमान में ताज़गी पैदा होती है। इन्होंने मोतारन्नुम बह्र का इस्तेमाल किया है। अहसासात और जज़्बात में रहकर इन्होंने होश नहीं खोया और आगाज़ में ही खुदा की हम्द करते हुए लिखते हैं- ‘तेरी तमसील मुमकिन हो कैसे तेरी अजमत बईद अज़ बयां है/तेरी कुदरत का अंदाज़ा मौला इब्ने आदम के बस में कहां है’ उनके अशआर से पता चलता है की सरवरे कायनात की मोहब्बत उनकी रग-रग में मौजूद है। उनकी जिंदगी का हर लम्हा यादे रसूल और ज़िक्रे इलाही में गर्काब है। वह नअतगोई को इबादत और जरिया ए निजात तसव्वुर करते हैं । एक जगह कहते है-‘खुदा तेरे आरिफ की ये आरज़ू है कि ताउम्र/वह नअते अहमद सुनाए अकीदत और मोहब्बत में डूबा।’ आरिफ साहब का ये पहला नातिया मजमूआ है। जिसमे 176 पेज हैं। किताब को आरिफ नूरानी ने उबैद उल्लाह अत्तारी नूरखान पुर भदोही से कम्पोज करा कर बज्मे अहले कलम भदोही से प्रकाशित किया है। किताब की कीमत 100 रुपए है ।


  अज़्मे-बिलाल है गुलदस्ता-ए-अकीदत


 

नअत के बहुत ही मोहतरम शाइर हाजी मोइनउद्दीन आसिम का नातिया मजमूआ है ‘अज़्मे बिलाल’ है। इस किताब के पढ़ने से ईमान में जान आ गई। दिल इश्के नबी में डूब गया और क़ारी का दिल इश्के नबी ने क्यों न डूबे जब आसिम साहब ने नबी की मोहब्बत में गर्काब हो कर अशआर कहे हों। देखें-‘कौन कहता है उसे ख्वाहिशे जन्नत होगी/ जिसकी आंखों में मेरे आका की सूरत होगी।’ ‘अब तो आसिम की आका खबर लीजिए/ये तो अपने से भी बेखबर हो गया।’ आसिम के अशआर में मिठास है, रूह की गिज़ा है, कठिन लफ्ज़ों से भी परहेज़ किया है, पढ़ने में सलासत है। यही सब खूबियां उनको मोहतरम बनाती हैं। वह नअत सिर्फ़ शायरी के इल्म की वजह से नहीं बल्कि इश्के नबी में बेदार रहने के लिए कहते हैं और वह नअतगोई को इबादत का दर्जा देते हैं। आसिम साहब की सबसे बड़ी खूबी ये है कि इनके अशआर सहल और आम फहम ज़बान में होते हैं और लफ्ज़ों का इस्तेमाल मजमून के मुताबिक करते हैं। वह इश्क नबी में गोताज़न हो कर कहते हैं-‘इश्के़-रसूले-पाक मताए-रसूल है /वह जी गया जो आपकी उल्फत में मर गया’, ‘हूरें हैं उसके वास्ते जन्नत में बेकरार/ निस्बत जिसे जहां में गुलामे नबी से है।’ मौजूदा हालात पर भी उनकी गहरी नज़र है। उम्मते मुसलमां के अंदर जो बद-एखलाकी, हकीकत से चश्म पोशी, बेअमली और शरीयत से मुखालिफत जैसी बुराइयां पैदा हैं, उन्हें सोच कर वह काफी फिक्र मंद नज़र आते हैं। कुल मिलाकर ‘अज़्मे बिलाल’ एक कामयाब नातिया मजमूआ है, जिसमें 216 पेज हैं और हदिया 100 रुपए है। जो कि इमामा साबरी कटरा बाज़ार भदोही से कम्पोज हो कर बज़्मे अहले कलम भदोही से शाया हुई है। दुआ है अल्लाह उनके इस नायाब तोहफा को कुबूल फरमाए।


’अज़ीम मुजाहिद-ए-आज़ादी शेख़ भिकारी अंसारी’



 भारत की आज़ादी में यूं तो हर कौमों मिल्लत ने लोगों बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। बहुत लोगों को हम जानते हैं और उन्हें याद भी करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे आज़ादी के दीवाने भी हुए हैं जो गुमनामी का शिकार हो गए, हम उन्हें भूल गए। ऐसे ही एक अज़ीम मुजाहिद ए आज़ादी शहीद शेख़ बुखारी उर्फ भिकारी अंसारी हुए हैं, जिन्हें टीपू सुल्तान का सानी कहा जाता था। एम. डब्ल्यू. अंसारी ने की एक ऐसी किताब का संपादन किया है, जिसमें अलग-अलग लेखकों ने शेख बुखारी पर मज़ामीन लिखा है। किताब का नाम ‘शहीद शैख़ बुखारी उर्फ भिकारी अंसारी और आज़ादी की पहली लड़ाई 1957 रखा’ इस किताब में लग भग ’28’ लोगों ने शेख़ भिखारी अंसारी की ज़िंदगी पर बड़े दिलचस्प अंदाज़ में मज़ामीन लिखा है, जो कि स्कालर्स के लिए भी एक कार आमद किताब है।

 एम. डब्ल्यू. अंसारी लिखते है कि शेख़ भिकारी अंसारी एक दानिशवर, बहादुर, मनसूबाबन्दी में  ऐसे माहिर थे कि फिरंगी उनके नाम से कांपते थे। इसका बेहतर अंदाज़ अंग्रेज़ो की फ़ौजी अदालत के एक तबसरे से होता है जो ’7’ जनवरी ’1857’ को शेख़ भिकारी और उनके साथियों को सज़ाये मौत सुनाते वक़्त लिखा गया। जिसका तर्जुमा था ‘कि शेख़ भिकारी बागियों में सबसे ज़्यादा मशहूर ख़तरनाक और इंक़लाबी हैं’ं बहरहाल शेख़ भिकारी की ज़िन्दगी और आज़ादी के लिए उनकी बहादुरी को दर्शाती हुई ये एक कारआमद किताब है जिसे पढ़कर सीने में वतन परस्ती का जज़्बा पैदा होता है। खूबसूरत जिल्द के साथ ’200’ रुपये की इस किताब में ’128’ पेज है जिसे न्यूज़, प्रिंटर्स सेंटर दरियागंज नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। इस खूबसूरत अदबी तारीखी तोहफे के लिए एम. डब्ल्यू. अंसारी और उनकी पूरी टीम को मुबारकबाद पेश करता हूं।


सफीर-ए-अदब आसिया तलअत

 


किसी भी तखलीककार पर लोगों से अलग-अलग राय मुतात्तिब करना कोई आसान काम नहीं। ये बड़ी मेहनत और हौसले का काम है। ‘सफीर-ए-इंशाइया मोहम्मद असद उल्लाह’ एक मारूफ इंशाइया निगार हैं, पूरी अदबी दुनिया में अपनी सलाहियतों का लोहा मनवा रहे हैं। आसिया तलअत ने उन पर अपनी और दीगर तखलीक कारों की राय जमा करके बड़ा ही अजीम काम अंजाम दिया है। इस किताब को उन्होंने पांच हिस्सों में तकसीम किया है। पहले बाब (हिस्से) में मतीन अचलपुरी की तौशीही नज़्म भी शामिल है, जिसे उन्होंने मोहम्मद असद उल्लाह की शान में उनके हर्फ (अक्षर) के नाम से तखलीक की है जो कि काबिले तारीफ है। इस किताब के मुकदमे में ही आसिया तलअत ने असद साहब की जिंदगी और उनकी पूरी अदबी  खिदमात का जिक्र किया है। आप सिर्फ मुकदमा पढ़कर ही आसिया तलअत की सलाहियतों का अंदाजा कर सकते हैं। उन्होंने बहुत ही खुश बयानी और सादह जबान में ही अपना इजहार ए ख्याल पेश किया है, जिसे कारी बआसानी पढ़ता चला जाता है और वह अपने आप को बोझिल भी नहीं महसूस करता। इसी पूरी किताब में उम्दा कागज का इस्तेमाल किया गया है, जिल्द के साथ इस किताब में 432 पेज हैं जिसकी कीमत 256 रुपए है, साहिल साहिल कंप्यूटर नागपुर से कंपोज कराकर इस किताब को दरभंगा हिंदी उर्दू प्रेस कामती ने प्रकाशित किया है। अहले अदब हज़रात एक बार इस किताब का मुताला ज़रूर करें उम्मीद करता हूं कि अदबी दुनिया में आने वाले कल तक भी इस किताब की अपनी एक अलग शिनाख्त होगी।

                        

 इंशाइया का तारीखी मजमुआ



 


   इंशाइया नस्र (गद्य) की वह सिन्फ (विधा) है, जो लगती तो मजमून की तरह है लेकिन होती मजमून से अलग है। ‘इंशाइया एक ख़्वाबे परेशां’ में लेखक आजादाना तौर पर बिना किसी नतीजे पर पहुंचकर अपनी तहरीर को खत्म कर देता है और नतीजा पाठकों पर छोड़ देता है। ‘इनशाइया एक ख्वाब ए परेशां’ ऐसा ही मजमुआ है जिसके मुसन्निफ जनाब मोहम्मद असद उल्लाह साहब हैं जिसमें मौसूफ ने तहकीक और को मौजू बनाकर ही दिलकश अंदाज में यह मजमुआ मुरत्तिब  किया है। अदब से लगाव रखने वालों के लिए ये किताब बहुत ही काम की है। मुसन्निफ़ ने निहायत ही आसान लफ़्ज़ों में इस्तेमाल किया है जिससे पाठक रवानी के साथ पढ़ता चला जाता है और दिल ही दिल में मज़े का तसव्वुर करता है। आपने इस किताब में इंशाइया की तारीफ व तारीख का बहुत खूबसूरत अंदाज़ में ज़िक्र किया है। मैंने अभी पूरी किताब का मुताअला तो नही किया लेकिन जितना पढ़ा उससे अंदाज़ा हो जाता है कि जनाब असद उल्लाह साहब ने इस किताब के लिए बड़ी मेहनत ओ मशक्कत की है। रातों की नींदें कुर्बान की हैं तब कहीं जा कर इतनी कारामद किताब मंजरे आम पर आई है। इस किताब से अदीबों के अलावा तालिबे इल्म भी भरपूर फायदा उठा सकते हैं। साहिल कंप्यूटर्स हैदरी रोड मोमिन पूरा भागलपुर महाराष्ट्र से प्रकाशित इस किताब की कीमत 141रुपए है। खूबसूरत सरे वर्क के अलावा इस किताब में 224 पेज हैं । अदब से वाबस्ता हजरात इस किताब को एक बार ज़रूर पढ़ें ।

 

(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में प्रकाशित )

सोमवार, 26 सितंबर 2022

गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2022 अंक में



4. संपादकीय:  भड़ैती में एक्सपर्ट हो चुके हैं मंचीय कवि

5-9. 1857 की बग़ावत में उर्दू अख़बारात का किरदार - डॉ. आमिर हमजा

10-11. निराला के बहाने हो रही कविता की दुर्गति - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 

12-24. ग़ज़लें:(डॉ. बशीर बद्र, मुनव्वर राना, देवी नागरानी, विश्वास लखनवी, पवन कुमार, डॉ. तारिक़ क़मर, विज्ञान व्रत, मासूम रज़ा राशदी, डॉ. राकेश तूफ़ान, अरविंन्द असर, डॉ.  नसीमा निशा, बहर बनारसी, सरफ़राज़ अशहर, विवके चतुर्वेदी, ए.एफ. नज़र, पदम प्रतीक, चाधैरी मुजाहिद,  अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’, डॉ. कविता नंदन, अरविंद अवस्थी, राज जौनपुरी, राकेश नामित, अतिया नूर, शगुफ्ता रहमान ‘सोना’,  मधुकर वनमाली, डॉ. रामावतार सागर )

25-31. कविताएं: ( यश मालवीय, डॉ. प्रकाश खेतान, जितेंद्र कुमार दुबे, ज्योति किरण, नीना मोहन श्रीवास्तव, रचना सक्सेना, पूजा सिंह, केदारनाथ सविता, मंजुला शरण )

32-35. इंटरव्यू: वेबसाइट पर उर्दू अकादमी की सारी जानकारियां - चौधरी कैफुल वरा

36-38. चौपाल:  गुफ़्तगू के सफ़र को किस नज़र से देखते हैं

39-41. तब्सेरा: ( ठोकर से ठहरो नहीं, अंतर्नाद, आईना-ए-हयात, पहली बंूद)

42-45. उर्दू अदब: ( फूल मुख़ातिब हैं, ख़्वाबों का जज़़ीरह, एहसास-ए-मुजाहिद, पिकनिक, देखो तो ज़रा )

46-47. गुलशन-ए-इलाहाबाद: बादल चटर्जी का बस नाम ही काफी है

48. ग़ाज़ीपुर के वीर: डॉ. विवेकी राय

49- 53. अदबी ख़बरे

परिशिष्ट-1: शमा फ़िरोज़

54. शमा फ़िरोज़ का परिचय

55-56. सीधे दिल पर असर करने वाली शायरी- सरफ़राज़ आसी

57-58. प्रेम की विविध अनुभूतियों का शानदार वर्णन - डॉ. शैलेष गुप्त वीर

59-60. विविध विषयों को रेखांकित करती ग़ज़लें - रचना सक्सेना

61-84. शमा फ़िरोज़ के कलाम


परिशिष्ट-2: अर्चना जायसवाल ‘सरताज’

85. अर्चना जायसवाल ‘सरताज’ का परिचय

86-87. बहुतेरी विधाओं की कवयित्री अर्चना सरताज- सीपी सुमन युसुफपुरी

88-89. विभिन्न रंग और खुश्बू के पुष्प् - अनिल मानव

92-114.  अर्चना जायसवाल ‘सरताज’ की रचनाएं

परिशिष्ट-3: जगदीश कौर

115. जगदीश कौर का परिचय

116-117. समाज को बेहतर करने की छटपटाहट- डॉ. मधुबाला सिन्हा

118- पाठक के दिल को प्रभावित करती कविताएं - शैलेंद्र जय

119-120. देश और समाज को समर्पित कविताएं - शगुफ्ता रहमान

121-144. जगदीश कौर की कविताएं


शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

अम्न और भाईचारे के फूलों का गुलदस्ता


                                           -अजीत शर्मा ‘आकाश’


                                             

  पत्रकार, साहित्यकार एवं शायर इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की पुस्तक ‘फूल मुख़ातिब हैं’ में उन्होंने फूल विषय पर 300 शे’र कहे है। अधिकतर शे’र प्रेम एवं श्रृंगार विषय पर केंद्रित हैं, जिनके माध्यम से अपने महबूब की तारीफ़, मान-मनुहार एवं इश्क़ का इज़हार किया गया है। शायरों एवं कवियों के लिए फूल प्रारम्भ से ही प्रेम के प्रतीक रहे हैं। अपने महबूब की तारीफ़ करनी हो, या अपनी मुहब्बत का इज़हार करना हो तो इनसे अच्छा माध्यम कोई नहीं है। “फूल नाज़ुक है मानता हूं मैं/ तेरे लब से मगर ज़रा कम है।“, “फूल ख़ुद को हसीन कहते थे/ तुमको देखा तो भरम टूट गया।“, “पास जब भी तुम इनके होते हो/ फूल दिलकश हसीन लगते हैं।“ इसके अतिरिक्त फूल के बहाने इन शेरों में प्रेम, मुहब्बत, भाईचारे, पारस्परिक सौहार्द और विश्व बंधुत्व का संदेश देने का प्रयास किया है। जिस प्रकार जीवन के अनेक रंग होते हैं, उसी प्रकार फूल भी अनगिनत रंगों के होते हैं। ये सबके लिए ख़ुश्बू लुटाते हैं, जिनसे संसार महकता है। शायर की तमन्ना है कि फूलों की ख़ुश्बू निरंतर फैलती रहे। फूल हमें ख़ुशबू का एहसास कराते रहें और जीना सिखाते रहें। मोहब्बत का पैग़ाम इस तरह दिया गया हैः- “दुश्मनों को भी फूल भेजो तुम/ एक दिन दुश्मनी भुला देंगे।“

  फूल सदैव सकारात्मकता के प्रतीक होते हैं। ये फूल हर किसी को जीने का हौसला देते हैं। ये हमें ज़िन्दगी की हक़ीक़त से रूबरू कराते हैं, मानो कह रहे हों कि ज़िन्दगी कितनी ख़ूबसूरत हैः-“फूल देखो और फिर बोलो/ कितनी प्यारी ये ज़िंदगानी है।“ देखा जाए तो फूल हमें जीवन-संघर्ष की प्रेरणा भी देते हैं। आंधी, तूफ़ान, बरसात, गर्मी, सर्दी सब झेलते हुए हर हाल में मुस्कुराते और खिलखिलाते रहकर फूल एक अनमोल सन्देश देते हैं। फूल हमारे साथ कभी मुस्कुराते हैं कभी खिलखिलाते हैं, तो कभी उदास होते हैं। हमारे हंसने पर फूल हंसते हैं, हम दुखी होते हैं, तो फूल भी उदास होते हैं, ऐसा शायर का मानना हैः-“फूल फिर है उदास ऐ ग़ाज़ी/आज तुम फिर से मुस्कुरा देना।“ दार्शनिक अन्दाज़ में कहे गये कुछ शे’र अपने अंदर गूढ़ अर्थ समेटे हुए हैं। पुस्तक में अलग-अलग अन्दाज़ के अशआर हैं, जिनके बहुआयामी अर्थ निकलते हैं-“फूलों के संसार में तरह-तरह के रंग/कुछ में तेरा रंग है, कुछ में मेरा रंग।“ आज निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए लोग कुछ भी कर डालते हैं तथा दूसरों की भावनाओं एवं उनके हित-अनहित से इन्हें कोई लेना देना नहीं होता। इसी पीड़ा को इस शे’र में अभिव्यक्ति दी गयी हैः-“फूल की ज़िन्दगी के लिए/ मुझको कांटा बनाया गया।“ यह पुस्तक एक प्रकार से अम्न और भाईचारे के फूलों का गुलदस्ता है। शे’र कहने का शायर का अन्दाज़ लुभावना है। सादा ज़बान, आम लहज़े एवं आमफ़हम भाषा में बात कही गयी है। कठिन एवं बोझिल शब्दों से बचा गया है। गुड मार्निंग, प्रोफ़ाइल, प्रॉमिस, वेलेंटाइन, आई लव यू, ब्रेकअप, लबबैक जैसी भाषा एवं शब्दों का प्रयोग कर शायरी को एक नया एवं आधुनिक अन्दाज़ देने का प्रयास किया गया है। कुल मिलाकर फूल को प्रतीक मानकर, फूल लफ़्ज़ एवं विषय पर सकारात्मक सोच के 300 शेरों की ‘फूल मुख़ातिब हैं’ पुस्तक पठनीय एवं सराहनीय है। 80 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 130/ -रूपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है।

श्रेष्ठ गीतों का संकलन



 छंद विहीन नयी कविता के इस दौर में अधिकतर रचनाकार स्वयं को कवि कहलाने के लिए कुछ पंक्तियों को जोड़-तोड़कर एक रचना कर डालते हैं, जिसे वह कविता का नाम दे देते हैं। इससे कविता की छन्दबद्धता में एक प्रकार का प्रदूषण-सा फैलता हुआ दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार की रचनाओं में लयात्मकता एवं गेयता के लिए कोई स्थान नहीं होता है। इसका सीधा-सा कारण है कि इस प्रकार के रचनाकार छन्दानुशासन से नितान्त अनभिज्ञ होते हैं तथा छन्दानुशासन सीखना ही नहीं चाहते। ऐसे में छंदबद्ध लयात्मक गीतों के संग्रह से रूबरू होना एक सुकून सा प्रदान करता है। ‘मैं भी सूरज होता’ कवि अशोक कुमार स्नेही के 20 गीतों एवं मुक्तकों की लघु पुस्तक है। इस पुस्तक में उनके कुछ विशिष्ट गीत एवं मुक्तक संकलित किये गये हैं। गीतों में छन्दबद्धता, लयात्मकता एवं गेयता की ओर पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है तथा तुकान्तता का भलीभाँति निर्वाह किया गया है। सभी रचनाएँ भाव प्रवण हैं। गीतों की भाषा में समरसता परिलक्षित होती है। शब्द चयन भी सराहनीय है, जिसके अन्तर्गत सामान्य बोलचाल के शब्दों से लेकर साहित्यिक एवं परिमार्जित एवं संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग भी किया गया है। पुस्तक में संकलित अधिकतर गीत संयोग एवं वियोग श्रृंगार रस प्रधान हैं तथा हृदय को आह्लादित करते हैं। कुछ रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों का चित्रण भी किया गया है।

 पुस्तक के शीर्षक गीत ‘मैं भी सूरज होता’ में कवि कहता हैः- अब तक जितना चला डगर मैं, मेरे साथ चला अँधियारा/ जाने इस सूरज को मेरी क्यों कोई परवाह नहीं है। ‘मेरा दीप रात भर रोया’ शीर्षक रचना में आज के समाज में फैली हुई आर्थिक असमानता एवं विषमता का यथार्थ चित्रण किया गया हैः- उनके आँगन फसल ज्योति की/ मेरे द्वार अँधेरा बोया/ उनके दीपक हँसे रात भर/ मेरा दीप रात भर रोया। ‘ओ अशरीरी मेघ’ कालिदास के मेघदूतम् से अनुप्रेरित एक भाव प्रवण एवं सुन्दर गीत-रचना है। ‘तुम नहीं जब’ गीत में वियोग श्रृंगार का अच्छा चित्रण किया गया है। ‘देश के वास्ते’ एक देशभक्ति पूर्ण रचना है। मुक्तक रचनाएँ भी अच्छी बन पड़ी हैं। आँसुओं के घरौंदे गिराये गये/ बेगुनाहों पे फिर जुल्म ढाये गये/ हार रानी का लेकर के कागा उड़ा/ नौकरानी को कोड़े लगाये गये। इस मुक्तक में आज के आम आदमी की दशा-दुर्दशा का यथार्थ चित्रण करने का प्रयास किया गया है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य रचनाओं के उल्लेखनीय अंश इस प्रकार हैं रू- आओ कुछ फूल चुने ऐसे/ शूल जिन्हे सपने मे देख डरे (आओ कुछ बात करे)। ऐसे सम्बन्घ हम जिये/ शब्दों के अर्थ खो गये (बासी सकल्पो का गीत)। पुस्तक में प्रूफ़ सम्बन्धी एवं वर्तनीगत अशुद्धियों को दूर नहीं किया गया है। इसके बावजूद छन्दबद्ध रचनाओं के प्रेमी पाठकों के लिए यह संग्रह पठनीय एवं सराहनीय है। 52 पृष्ठों के इस गीत संग्रह का मूल्य 100 रूपये है, जिसे अलका प्रकाशन, ममफोर्डगंज, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है।


मनोभावों को अभिव्यक्ति करती कविताएं



 ‘गुफ़्तगू प्रकाशन’ की पुस्तक ‘दहलीज़’ कवयित्री डॉ. मधुबाला सिन्हा की 58 कविताओं का संग्रह है। कहा गया है कि कविताएं मन के समस्त भावों को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम हैं। इन्हीं मनोभावों को कवयित्री ने अपने काव्य-संग्रह में अभिव्यक्त करने की चेष्टा की है। अपने कविता-लेखन के संबंध में कवयित्री का कथन है कि वह छंदमुक्त एवं नई कविताओं की रचना करती रही हैं, किन्तु इस काव्य-संग्रह में उन्होंने गीत लिखने का प्रयास किया है। काव्य सृजन की कोई विधा हो, उसमें अनुशासन अत्यावश्यक है। गीत एक छन्दबद्ध कविता होती है, जिसका एक शिल्प विधान हैं और उसका पालन किया जाना अनिवार्य होता है, तभी वह रचना गीत कहलाती है। कवयित्री के इस संग्रह की रचनाएं गीत के शिल्प की कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती हैं। पुस्तक में संग्रहीत कविताओं के कथ्य को दृष्टिगत रखते हुए कहा जा सकता है कि लेखन में सरलता और सहजता है, लेकिन कवयित्री का भाषा और अभिव्यक्ति पर अधिकार प्रतीत नहीं होता है। संग्रह की कविताएं सामान्य स्तर की हैं। वर्ण्य विषय की दृष्टि से संग्रह की रचनाओं में श्रृंगार एवं प्रणय, वर्तमान समाज का चित्रण, जीवन की अनुभूतियां तथा संवेदनाएं, जीवन का यथार्थ, सामाजिक सरोकार, स्त्री की हृदयगत कोमल भावनाएं, आम आदमी की व्यथा आदि पहलुओं को स्पर्श करते हुए अपने एवं ज़माने के दुख-दर्द को भी रचनाओं में अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है। कविताओं में जीवन में व्याप्त संत्रास, घुटन, वेदनाओं एवं अनुभूतियों को शब्द प्रदान किये गये हैं। रचनाओं में यत्र-तत्र जीवन के अन्य अनेक रंग भी सामने आते हैं। संग्रह की अधिकतर रचनाएं संयोग एवं वियोग श्रृंगार विषयक हैं। इस प्रकार की कविताएं प्रेम के विभिन्न पक्षों, संबंधों, विसंगतियों, अनुभूतियों तथा व्यक्त और अव्यक्त प्रेम की अभिव्यक्तियों का चित्रण करती प्रतीत होती हैं। 

 पुस्तक की कुछ कविताओं के उल्लेखनीय अंश इस प्रकार हैः- जब भी दो पल मिले प्रिये तुम/पास मेरे यूं ही चले आना (‘जब भी दो पल मिले’)। चपल चांदनी चंचल चितवन/छिटक रही आकाश है/धवल नवल जग की शीतलता/प्रकाश का आभास है (‘चपल चांदनी चंचल चितवन’)। चलो दिया से दिया जलाएं/जहां बिखरा हो राग-द्वेष/प्यार का कोई फूल खिलाएं (‘चलो दिया से दिया जलाएं’)। एक दिवस मिलने आऊंगी/अपने द्वार खड़े तुम मिलना (‘एक दिवस मिलने आऊंगी’)। बिखर गए संगी और साथी/बिछड़ गया है प्यार/बहुत अब रोता है मन (‘बहुत अब रोता है मन’)। अपने मनोभावों को कविताओं के रूप में अभिव्यक्त करने की कवयित्री ने अपनी ओर से भरपूर चेष्टा की है। संग्रह के सृजन का प्रयास सराहनीय कहा जा सकता है। गीत-लेखन का कवयित्री का यह प्रयास निश्चित रूप से सफल कहा जाता, यदि छन्दशास्त्र की ओर विशेष ध्यान दिया गया होता। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कविता लेखन के क्षेत्र में यह एक सार्थक एवं सराहनीय लेखन है, जो सृजनात्मकता का द्योतक है। पुस्तक का मुद्रण एवं तकनीकी पक्ष सराहनीय है। 96 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 150 रूपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है।


कोरोना काल की अनुभूतियों की अनूठी कहानियां



 डॉ. अमिता दुबे ने कहानियां, उपन्यास, काव्य, बाल साहित्य, समीक्षा एवं समालोचना आदि साहित्य की अनेक विधाओं में अपना उल्लेखनीय रचनात्मक योगदान किया है, जिसके फलस्वरूप अनेक संस्थाओं द्वारा इन्हें पुरस्कृत एवं सम्मानित किया गया है। ‘धनुक के रंग’ इनका कहानी संग्रह है, जिसमें संकलित कहानियों को कोविड-19 महामारी की विभीषिका के भयावह पक्ष को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कोरोना काल के दौरान समाज के लोगों की मानसिक, शारीरिक, आर्थिक स्थितियों एवं जीवन-संघर्ष का मनोवैज्ञानिक चित्रण करने की सफल चेष्टा की गयी है। कथावस्तु, कथोपकथन, पात्र, देशकाल-वातावरण जैसे कहानी के तत्वों के आधार पर संग्रह की कहानियां खरी उतरती हैं। कहानियों की विषयवस्तु समसायिक है। सभी कहानियों की भाषा एवं शैली सधी हुई, सरल, सहज एवं बोधगम्य है तथा इनका उद्देश्य समाज को एक अच्छा सन्देश प्रदान करना है। सहज एवं स्पष्ट संवाद, घटनाओं का सजीव चित्रण तथा पाठकों के मन में रोचकता बनाये रखना इन कहानियों में मुख्य रूप से परिलक्षित होता है। संग्रह में कहानीकार ने अपनी पैनी तथा सूक्ष्म दृष्टि से परिस्थितियों का गहन अवलोकन करते हुए एवं समाधान की दिशा बताते हुए अपनी रचनात्मकता को उच्च आयाम दिए हैं। कहानियों की कथावस्तु के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को सामने लाने का प्रयास किया गया है। प्रत्येक साहित्यिक रचना अपने समय का दस्तावेज़ होती है। ‘धनुक के रंग’ कहानी संग्रह भी कोरोना काल के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की भांति प्रतीत होता है। अपनी इच्छाओं के अनुरूप कुछ वर्ष जीने की आकांक्षा करती हुई “अब तो लौट आओ” अवनि की कहानी है, जो अपने घर-परिवार को त्यागकर जीवन के कुछ अनुत्तरित प्रश्नों को लेकर आश्रम में चली जाती है। कहानी में दर्शाया गया है कि जिंदगी में बहुत सारे सवालों के जवाब हमें मिलते ही नहीं। “मन न भए दस बीस”  प्रेमविवाह के उपरांत उत्पन्न पारिवारिक, सामाजिक स्थितियों-परिस्थितियों एवं अंतर्द्वंद्व का चित्रण करती है। कोरोना काल के समय अनेक बार ऐसी भी परिस्थितियां सम्मुख आयीं, जब संकट की घड़ी में लोगों के असली चेहरे देखने को मिले। संक्रमण काल में कहीं स्वार्थ-लोलुपता दिखी, तो कहीं लोगों ने एक-दूसरे की बढ़-चढ़ कर मदद भी की। ‘धनुक के रंग’ कहानी संग्रह में धनुक अर्थात् इन्द्रधनुष के सात रंगों की भांति जीवन के रंगों को प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। धनुक के सभी फीके रंग मिट जाएं और चटक रंग अपनी आभा बिखेरें, इन कहानियों माध्यम से यही सन्देश प्रदान करने की चेष्टा की गई है। इस संकलन की कहानियों में लेखिका का सामाजिक सरोकार स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। 120 पृष्ठों के इस कहानी संग्रह को नमन प्रकाशन, लखनऊ ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य मूल्य 150 रुपये है।


 शब्दों की हथौड़ियों से विसंगतियों पर करारी चोट

 पुस्तक ‘हथौड़ियों की चोट’ कवि केदारनाथ ‘सविता‘ की कविताओं का संग्रह है। इन कविताओं में सामाजिक, पारिवारिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक आदि जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श किया गया है, जिसके अन्तर्गत जीवन की अनुभूति, मानव संवेदना, प्रकृति-चित्रण, आज के युग की विडम्बनाएँ आदि सम्मिलित हैं। कविताओं में आज के जीवन में व्याप्त संत्रास, घुटन, वेदनाओं एवं अनुभूतियों को चुटीले एवं मारक शब्द प्रदान किए गए हैं। पुस्तक की मुख्य विधा हास्य-व्यंग्य है, जिसके माध्यम से सामाजिक एवं राजनीतिक विसंगतियों पर प्रहार किया गया है। वर्तमान दौर में आम आदमी जीवन की जटिल समस्याओं, विद्रूपताओं एवं अनेक विसंगतियों से जूझ रहा है तथा जीने के लिए भरपूर संघर्ष कर रहा है। राजनेता अपने-अपने स्वार्थों में लिप्त हैं। महंगाई चरम पर है और दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। अनेक कठिनाइयाँ मनुष्य की प्रगति की राह रोके खड़ी हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों पर रचनाकार ने शब्दों की हथौड़ियों की गहरी चोट कर समाज को जाग्रत करने की चेष्टा की है। विसंगतियों का यथार्थ चित्रण, आज के राजनेताओं की नीयत, आम आदमी की व्यथा-कथा, वर्तमान दौर की विडम्बनाएँ, सामाजिक विसंगतियाँ, आज के समय का सच, आपसी सद्भाव और भाईचारा, ज़िन्दगी, आशावाद आदि पुस्तक की रचनाओं के वर्ण्य-विषय हैं, जिनमें पाठक को विविधता परिलक्षित होती है। कविताओं में वर्तमान परिवेश की अनेक अनुभूतियों को रोचक ढंग से सामान्य बोलचाल की भाषा में समाहित करने की चेष्टा की गयी है। संग्रह में सम्मिलित कुछ कविताएँ इस प्रकार हैं- महंगाई ने/ रोटी का आकार/ जितना छोटा कर दिया है/ आदमी ने उसे/ उतने ही बड़े तराजू में/ ईमान के साथ/ तौल दिया है (रोटी)। आज के दौर के राजनेताओं पर करारा कटाक्ष इस प्रकार किया गया हैः- आम का बाग है/ मेरा देश/ लूट लो/ जितना लूट सको/ तोड़ लो सारे फल/ कच्चे हों या पक्के/ तुम नेता हो/ इस देश के (मेरा देश)। तपती सड़क पर फ़्लैट में पंखा/ पंखे के नीचे अफसर/ अफसर के नीचे कुर्सी/ कुर्सी के नीचे/ जनता की मातमपुरसी/ सब क्रमबद्ध ही तो है (क्रमबद्ध)। इनके अतिरिक्त ‘हम आज़ाद हैं’, ‘जीने के लिए’ ‘नमक’ ‘जीवन’ आदि अन्य रचनाएँ भी सराहनीय हैं। पुस्तक का तकनीकी पक्ष आकर्षक है। समसामयिक विषयों पर हास्य-व्यंग्य शैली में लिखी गयी तथा आम पाठक को जल्दी समझ में आने वाली छोटी-छोटी चुटीली एवं मारक कविताएं समेटे हुए हथौड़ियों की चोट कवि केदारनाथ ‘सविता’ का पठनीय एवं सराहनीय कविता संग्रह है। 120 पृष्ठों की इस सजिल्द पुस्तक का मूल्य  350 रुपये है, जिसे हिन्दी श्री पब्लिकेशन, संत रविदास नगर, उ0प्र0 ने प्रकाशित किया है।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में प्रकाशित )

शनिवार, 10 सितंबर 2022

यूपी एसटीएफ के संस्थापक सदस्य राजेश पांडेय

                                        

राजेश पांडेय

             

                                                                           -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

      प्रयागराज निवासी आईपीएस राजेश पांडेय यूपी एसटीएफ और एटीएस के संस्थापक सदस्य हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने जब श्रीप्रकाश शुक्ला को पकड़ने के लिए एसटीएफ की स्थापना किया था, तब बनी इस टीम में राजेश पांडेय भी शामिल थे। मुख्यमंत्री की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हुए राजेश पांडेय की अगुवाई में यूपी एसटीएफ की टीम ने ग़ाज़ियाबाद में श्रीप्रकाश शुक्ला को एनकाउंटर किया था। 15 जून 1961 को जन्मे राजेश पांडेय के पिता स्वर्गीय श्री सीपी पांडेय इलाहाबाद हाईकोर्ट में डिप्टी रजिस्टार थे। राजेश जी ने इलाहाबाद जीआईसी से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण किया था। 1980 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीएससी और 1982 में इसी यूनिवर्सिटी से वनस्पति विज्ञान से एएससी किया। इसके बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ही यूजीसी नेट और जेआरएफ किया। वर्ष 2003 में एसपीएस में चयनित होकर पुलिस सेवा से जुड़ गए। इनकी पहली नियुक्ति सोनभद्र जिले में डिप्टी एसपी के पद पर हुई, इसके बाद इसी पद पर जौनपुर, आज़मगढ़ और लखनऊ में कार्यरत रहे।

 17 मई 1998 को एसटीएफ की स्थापना के साथ ही इन्हें इसी डिपार्टमेंट में भेज दिया गया। 08 जनवरी 2000 को इसी विभाग में एडीशनल एसपी बना दिए गए। 10 मार्च 2000 से 23 जुलाई 2002 तक लखनऊ के एसपी सिटी रहे, 03 नवंबर 2002 से 15 फरवरी 2003 तक एसपी सिटी ग़ाज़ियाबाद और 26 सितंबर 2003 से 12 फरवरी 2005 तक बाराबंकी और 02 जून 2007 से 10 दिसंबर 2007 तक मेरठ के एसपी सिटी रहे। 05 जुलाई 2005 को अयोध्या और 07 मार्च 2006 को वाराणसी में हुई आतंकी घटनाओं के बाद आपको इन घटनाओं की जांच की जिम्मेदारी दी गई थी, जिसका आपने सफलता पूर्वक निर्वहन किया। दिसंबर 2012 में आप आईपीएस हो गए, जिसके बाद  आपकी पहली नियुक्ति रायबेरली एसपी के रूप में हुई, जहां 08 जून 2014 तक कार्यरत रहे। इसके बाद एसएसपी सहारनपुर, एसपी गोंडा, एसएसपी लखनऊ, एसएसपी अलीगढ़ और एसएसपी मेरठ के रूप मे कार्य किया, फिर आपको डीआईजी बरेली बनाया गया। 01 जनवरी 2021 को प्रोन्नत कर आप आईजी हो गए। 30 जून 2021 को सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको यूपी एक्सप्रेस-वे इंडस्टीयल डेवलेपमेंट अथॉरिटी का नोडल अधिकारी बना दिया है, जहंा वर्तमान में कार्यरत हैं।

 आपको अब तक विभिन्न एवार्ड्स से नवाजा जा चुका है। जिनमें 1999, 2000. 2007 और 2006 में इंडियन पुलिस सेवा मेडल, 2005 में राष्टपति के हाथों मेडल, 2008 में यूनाइटेड नेशन मेडल, 2018 में डीजीपी के हाथों सिल्वर कॉमेंडेशन डिस्क, 2020 में डीजीपी के हाथों गोल्ड कॉमेंडेशन डिस्क, और 2021 में डीजीपी के हाथों प्लेटिनम कॉमेंडेशन डिस्क सम्मान शामिल है। साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू द्वारा इन्हें वर्ष 2022 को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान किया गया है। 


(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में प्रकाशित )


मंगलवार, 30 अगस्त 2022

मानवतावाद में यक़ीन रखते थे फ़िराक़ गोरखपुूरी: बादल चटर्जी

‘फ़िराक़ गोरखपुरी जन्मोत्सव’ पर ‘आधुनिक भारत के ग़ज़लकार’ का विमोचन 

देशभर से जुटे शायरों ने पेश किया कलाम, मिला फ़ि़राक़ गोरखपुरी सम्मान



प्रयागराज। फ़िराक़ गोरखपुरी मानवतावाद में यक़ीन करने वाले शायर थे। उन्होंने अपनी शायरी में हर वर्ग, हर धर्म और हर समाज की अच्छी बातें का वर्णन किया है। यहां तक द्वितीय विश्व को रेखांकित करते हुए ‘आधी रात’ नामक नज़्म लिखा है, जो उस दौर में बहुत ही मशहूर हुई थी। वे स्वतंत्र विचार वाले शायर थे, जहां कहीं भी अच्छी चीज़़े दिखती थी, उसे अपना लेते थे। गुफ़्तगू की ओर से कार्यक्रम आयोजित करके उनको याद करना बहुत ज़रूरी कदम है। ऐसे शायर की शायरी और जिन्दगी पर बात होती रहनी चाहिए। यह बात 28 august को गुफ़्तगू की ओर से हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘फ़िराक़ गोरखपुरी जन्मोत्सव’ के दौरान पूर्व कमिश्नर बादल चटर्जी ने कही। कार्यक्रम के दौरान इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की संपादित पुस्तक ‘आधुनिक भारत के ग़ज़लकार’ का विमोचन किया। इस किताब में शामिल सभी 110 शायरों को ‘फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान’ प्रदान किया गया।

 अध्यक्षता कर रहे अली अहमद फ़ातमी ने कहा कि 1972 से 1982 मेरा फ़िराक़ साहब से साथ साबका रहा है। उनको, जानने, समझने और पढ़ने का खूब अवसर मिला है। वे बहुत दूरन्दाज शायर थे। उनकी शायरी में इंसानियत, मोहब्बत, देशभक्ति और समाज को बेहतर बनाने का जज़्बा दिखाई देता है। जिस ज़माने में फ़िराक़ साहब शायरी के मैदार में आए थे, उस समय फ़ैज़, जिगर मुरादाबादी, साहिर लुधियावनी और अली सरदार जाफरी जैसे शायर थे। मगर, इनके बीच भी फ़िराक़ ने अपनी अलग पहचान बनाई। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि हमलोग प्रत्येक वर्ष एक शायर का जन्मदिवस मानते हैं। इससे पहले कैफी आज़मी, निराला, महादेवी, अकबर इलाहाबादी और साहिर लुधियानवी का जन्म दिवस मनाया था। इस वर्ष हमलोग फ़िराक़ साहब को याद कर रहे हैं। वाराणसी के सहायक डाक अधीक्षक मासूम रज़ा राशदी ने कहा कि फ़िराक़ साहब का चयन सिविल सर्विस में हो गया था, लेकिन उन्हें यह नौकरी पसंद नहीं आयी, उन्हें पढ़ना और पढ़ाना ही पसंद थी, इसलिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अध्यापक बनकर आ गए। डॉ. हसीन जिलानी ने फ़िराक़ गोरखपुरी द्वारा लिखे गए लेख पर शोध-पत्र पढ़ा। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। गुफ़्तगू के सचिव नरेश महरानी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। अनिल मानव, रेशादुल इस्लाम, अफसर जमाल, अर्चना जायसवाल, शैलेंद्र जय, डॉ. इश्क़ सुल्तानपुरी, राज जौनपुरी, नीना मोहन श्रीवास्तव, शिवाजी यादव, डॉ. पंकज कर्ण, धर्मेंद सिंह धरम, चांदनी समर, इकबाल आज़र, डा. इम्तियाज़ समर,,अर्शी  बस्तवी, विजय लक्ष्मी विभा, संजय सागर, अनीता सिंन्हा, फरमूद इलाहाबादी, शाहिद सफ़र, निशा सिम्मी, सेलाल इलाहाबादी, अतिया नूर, मधुकर वनमाली, ए.आर. साहिल, रश्मि रौशन, सगीर अहमद सिद्दीक़ी, वीणा खरे, सुशील वैभव,्र खरे, वर्तिका अग्रवाल, सरफ़राज अशरह, असद ग़ाज़ीपुरी, अज़हर रसूल, केदारनाथ सविता, कामिनी भारद्वाज, तलत सरोहा, सय्यदा तबस्सुम, नरेंद्र भूषण, रमेश चंद्र श्रीवास्तव आदि ने कलाम पेश किया। 

 



 

शनिवार, 20 अगस्त 2022

प्रेम का शानदार वर्णन करती हैं मधुबाला: अज़ीज़ुर्रहमान

डॉ. मधुबाला सिन्हा की पुस्तक ‘दहलीज’ का विमोचन 

मुशायरे में पहले स्थान पर फ़रमूद, दूसरे पर शरत और असलम रहे



प्रयागराज। काव्य का सृजन करना अपने-आप में बहुत ही मेहनत और दूरदर्शिता का काम है। कवि समाज, देश और प्रेम का वर्णन अपने अनुभवों से करता है। डॉ. मधुबाला सिन्हा की कविताएं इस परिदृश्य में बेहद ख़ास और महत्वपूर्ण हैं। इन्होंने अपने नज़रिए को बेहतर तरीके से वर्णित किया है। आज ऐसी ही कविताओं की ज़रूरत है। यह बात गुफ़्तगू की ओर से 14 अगस्त को करैली स्थित अदब घर में डॉ. मधुबाला सिन्हा की पुस्तक ‘दहलीज़’ के विमोचन के अवसर पर मुख्य अतिथि पूर्व जिलाजज अज़ीज़ुर्रहमान ने कही। 

गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि कविता का सृजन हर दौर में ख़ास रहा है, डॉ. मधुबाला सिन्हा की कविताएं इसी मायने में बेहद ख़ास हैं। इन्होंने प्रेम का वर्णन बहुत ही मार्मिक ढंग से किया है। इनका प्रेम अलौलिक रूप में इनकी कविताओं में दिखाई देता है। डॉ. मधुबाला सिन्हा ने कहा कि मेरी यह किताब आपके सामने हैं, मैंने एक अर्से के बाद गीत लिखना शुरू किया है, अब आपको मेरी गीतों के बारे में राय व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। प्रभाशंकर शर्मा ने कहा कि डॉ. मधुबाला की कवितओं में बहुत गहराई है, जिसकी वजह से बेहद पढ़नीय हो जाती हैं। इनके सृजन में समाज और देश के साथ-साथ प्रेम का वर्णन बहुत ही शानदार तरीके दिखता है। इनका प्रेम मनुष्यों से होकर अलौलिक होता हुआ दिखाई देता है। पुस्तक में शामिल ‘काशी’ कविता सबसे अलग और शानदार है।

 कार्यक्रम का संचालन कर रहे शैलेंद्र जय ने कहा कि डॉ. मधुबाला को पढ़ने के बाद स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि इन्होंने छंदमुक्त कविताओं को गीत बनाने का प्रयास किया है। कथन के मुताबिक कविताएं बेहद मार्मिक और उल्लेखनीय हैं। इनके अंदर एक बहुत संवेदनशील स्त्री बैठी है, जो हर पहलु को बेहतर ढंग से उल्लेखित करते हुए वर्णित करती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. वीरेंद्र तिवारी ने कहा डॉ. मधुबाला सिन्हा ने मात्र दो वर्ष पहले ही गीत लिखना शुरू किया है, जबकि एक अर्से से वे छंदमुक्त कविताएं लिखती आ रही हैं। इसलिए इस पुस्तक को मात्र दो वर्ष की कवयित्री के सृजन के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके बावजूद इनकी कवतिाओं का बिंब बहुत मार्मिक और उल्लेखनीय है।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। अतिथियों के मूल्याकंन के आधार पर इस प्रथम स्थान फ़रमूद इलाहाबादी को, द्वितीय स्थान पर शरत चंद्र श्रीवास्तव और असलम निजामी रहे। तीसरे स्थान पर वाक़िफ़ अंसारी और अनिल मानव थे। रेशादुल इस्लाम, अफ़सर जमाल, प्रकाश सिंह अर्श, अजीत शर्मा ‘आकाश’ वाक़िफ़ अंसारी, डॉ नईम साहिल, सेलाल इलाहाबादी, शुएब इलाहाबादी, शाहिद सफ़र, सत्य प्रकाश श्रीवास्तव आदि शायरों ने कलाम पेश किया 


शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

पहले एक उपन्यास नया कानून बनवा देता था: नासिरा शर्मा

 


                                                                   

नासिरा शर्मा से बात करते डॉ. गणेश शंकर श्रीवास्तव

            

 नासिरा शर्मा हिन्दी कथा जगत की जानी-मानी लेखिका हैं। अपने विविध किरदारों के चलते वे एशिया की राइटर मानी जाती हैं। यह कहना भी समीचीन होगा कि वे एक ग्लोबल लेखिका हैं, जिनके लेखन को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समान रूप से स्वीकार्यता मिली है। उनका जन्म 22 अगस्त 1948 को इलाहाबाद में एक संपन्न मुस्लिम परिवार में हुआ। प्रगतिशील विचारों के धनी उनके पिता प्रोफेसर जामीन अली उर्दू के प्रोफेसर थे। माता नाज़मीन बेगम सफल गृहणी रहीं। नासिरा जी के भाई-बहन भी साहित्य और लेखन से जुड़े रहे हैं। नासिरा जी का विवाह डॉ. रामचन्द्र शर्मा जी से हुआ जो कि भूगोल विषय में अध्यापन कार्य कर रहे थे। चर्चित उपन्यास ’पारिजात’ के लिए नासिरा जी को वर्ष 2016 का साहित्य अकेडमी अवार्ड भी मिला है। पत्थर गली’, संगसार, इब्ने मरियम, शामी कागज, सबीना के चालीस चोर, खुदा की वापसी, इंसानी नस्ल, शीर्ष कहानियां और दूसरा ताज महल आदि उनके प्रकाशित कहानी संग्रह हैं। शाल्मली, ठीकरे की मंगनी, जिंदा मुहावरे, सात नदियां एक समुंदर, अक्षयवट, कुईयांजान, पारिजात, शब्द पखेरू आदि उनके चर्चित उपन्यास हैं। उन्होंने संपादन एवं अनुवाद कार्य भी किया है, साथ ही बच्चों के लिए भी बहुत कुछ लिखा-पढ़ा है। युवा साहित्यकार डॉ. गणेश शंकर श्रीवास्तव और प्रियंका प्रिया ने उनसे बातचीत की।          

सवाल: आपने ढेर सारी कहानियां और उपन्यास लिखे हैं। उपन्यास एवं कहानी के आपसी संबंधों के बारे में आप क्या समझ्ाती हैं ?

जवाब: कहानी एक जज़्बा है, एक शिद्दत है जिसे आप उठाते हैं। चाहे वह लंबी कहानी हो या लघु कहानी, आप का जज़्बा उसमें निकल आता है। लेकिन उपन्यास में आपको पूरी बस्ती पूरा मोहल्ला बसाना पड़ता है। उसमें कभी अपना शहर तो कभी विदेश भी उपस्थित रहता है। इसलिए उपन्यास में बहुत धैर्य और समय की ज़रूरत है। उपन्यास में हर किरदार के तर्क और तथ्य को इस प्रकार साधना होता है कि उपन्यास की प्रामाणिकता और विश्वास बना रहे और पाठक को उपन्यास में आए चरित्र प्रभावित कर सकें और सच्चे लगें। इसलिए उपन्यासकारों का एक मुकाम भी होता है।

सवाल: साहित्य और पत्रकारिता का गहरा अंतर्संबंध रहा है, किंतु आजकल पत्रकारिता में साहित्य हाशिए पर चला गया है, इस पर आपके क्या विचार हैं ?

जवाब: देखिए एडिटर क्या प्रकाशित करना चाहता है क्या नहीं यह सब एडिटर के मिज़ाज़ पर निर्भर करता है। पहले साहित्यकार और पत्रकारों मैं बैलेंस था। अब पत्रकारों ने साहित्यकारों से एक दूरी बना ली है और स्वयं को रिपोर्टिंग तक सीमित कर लिया है। अब पत्रकारों को साहित्य की दुनिया की इतनी जानकारी नहीं होती या शायद उनकी साहित्यकारों में दिलचस्पी नहीं होती। एक और महत्वपूर्ण बात मैं कहना चाहती हूं कि जो पत्रकारिता की ज़रूरत होती है वह कहानी की नहीं होती है। हर घटना पर आप कहानी नहीं लिख सकते और हर घटना सूचना नहीं हो सकती। यह सबसे बड़ा फ़र्क़ है। जिनके पास यह समझ्ा है और जो इन दोनों की सीमाएं जानते हैं, वे एक साथ पत्रकार और साहित्यकार दोनों हो जाते हैं।

सवाल:  आपकी राय में क्या आज भी समाज और राजनीति के परिष्करण में साहित्य की सक्रिय भूमिका है ?

जवाब:  फिलहाल साहित्य कुछ बदल तो पा नहीं रहा, यहां तक कि किसी देश की व्यवस्था तो बदल नहीं पा रहा। पहले एक उपन्यास नया कानून बनवा देता था। कहा जाता है कि मिस्र के एक राष्ट्रपति थे उनकी पूरी सोच एक नोबेल से बदली। इंग्लैंड के एक उपन्यास का प्रभाव रहा कि बच्चों के पक्ष में एक पूरा कानून बना। कमी लेखकों में नहीं है, मुझ्ो लगता है कि लेखकों की राय कोई लेना नहीं चाह रहा। ऐसा माहौल 1947 के बाद धीरे-धीरे बनता चला गया। दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि पाठक अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझ्ाते हैं। पाठक लेखक के विचार को आगे नहीं ले जाते। लेकिन एक तीसरा बहुत दिलचस्प दृश्य दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है कि पाठक कम होते जा रहे हैं, लेखक बढ़ते जा रहे हैं। आजकल लेखक की चाहे एक ही किताब हो, लेकिन उसकी इतनी ज्यादा प्रायोजित चर्चा होती है कि अच्छे लेखक ठगे से रह जाते हैं। मीडिया और सोशल मीडिया की वजह से आईं तब्दीलियां आज का परिदृश्य तय कर रही हैं। इनकी वजह से सतही चीज़ों का बहुत ज्यादा शोर हो गया है। क्योंकि साहित्य बहुत धीरे-धीरे असर करता है, पत्रकारिता फौरन असर करती है। एक ख़बर मेरा किरदार बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है क्योंकि मैं ख़बर को लेकर रिएक्शनरी भी तो हो सकती हूं। पत्रकारिता रोज घटने वाली घटनाओं के प्रति एक्टिव बनाती है, जबकि साहित्य चरित्र का निर्माण करता है, आपको अच्छे-बुरे की समझ्ा देता है। साहित्य आपका परिचय उस समाज से भी करवाता है जिस तक आप पहुंच नहीं पाते।

सवाल:  मैं यह मानता हूं और यक़ीनन और भी कई लोग जो यह मानते होंगे कि नासिरा शर्मा की न सिर्फ़ शक्ल-औ-सूरत अंतरराष्ट्रीय है बल्कि वे अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं या मुद्दों की लेखिका भी हैं। स्वयं की इस छवि को आप किस प्रकार देखती हैं ?

जवाब: मैं इस छवि से खुश हूं। मेरी इस सोच को लोगों ने बहुत पसंद किया है। मेरे बुद्धिजीवी पाठकों ने मुझ्ो बहुत सम्मान दिया है। मैं आपको बताऊं एक वक़्त तक मेरे लेखन को लेकर चंद लोगों की नकारात्मक बातें मुझ्ो झ्ोलनी पड़ी, जिससे मैं अपसेट भी होती थी, लेकिन मैंने इन सब से भी प्रेरणा ली। ऐसे कमअक्ल लोग अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कलम उठाने को जासूसी समझ्ाते थे। उनकी समस्या थी कि वे संबंधों को संकीर्ण नज़र से देखते थे। उनकी बातों से थोड़ी देर के लिए मन कसैला ज़रूर होता था फिर लगता था कि मेरा जुड़ाव किन्हीं और ऊंचाइयों से है। लेकिन मुझ्ो खुशी है कि जिन लोगों ने मुझ्ो पसंद कियाए भरपूर किया। मुझ्ो किसी से शिकायत नहीं है।

सवाल:  पारिजात के लिए आपको साहित्य अकेडमी अवॉर्ड मिला, कुछ लोग मानते हैं कि यह अवार्ड आपको देर से मिलाए इस बारे में आपका क्या कहना है ?

जवाब:  हां, कुछ लोग मानते हैं कि शाल्मली के लिए ही मुझ्ो साहित्य अकादेमी अवार्ड मिल जाना चाहिए था। लेकिन कोई बात नहीं। उस वक़्त राइटर और भी बहुत अच्छे-अच्छे थे, शायद इसीलिए उन्हें पहले दिया गया। मैं यह तो नहीं कहूंगी कि मुझ्ो यह देर से मिला लेकिन जब मिला तो भी मेरी ज़िंदगी में क्या फर्क पड़ा, मेरे सामने दो सवाल हैं कि अगर अभी भी ना मिलता तो, और जब मिला तो किसी ने कम से कम यह तो नहीं कहा कि यह बैकडोर एंट्री है या खुशामद का नतीज़ा है। मुझ्ो इस बात का शुक्र है कि मुझ्ो अवॉर्ड उस वक़्त मिला जब लोगों ने यह शिद्दत से महसूस किया कि अब नासिरा शर्मा को साहित्य अकेडमी अवॉर्ड मिल जाना चाहिए।

सवाल: आपकी दृष्टि में óी विमर्श क्या है ?

जवाब:  óी एक ज़िंदगी है। उसे एक आंदोलन की तरह लोग इस्तेमाल करते हैं। लेकिन मुझ्ो óी विमर्श के खाते में डाला जाए, ऐसा मेरे समझ्ा के परे है। óी विमर्श नाम तो अभी दे दिया गया है, लेकिन साहित्यकार तो पहले से ही बिना किसी óी विमर्श आंदोलन के óियों के शोषित चरित्र को बड़ी खूबसूरती से उठाते रहे हैं। दुनिया में जितने बड़े लेखक हैं, उन्होंने जो एक से एक शानदार óियों के किरदार दिए हैं, उसमें महिला लेखिकाएं भी शामिल हैं। औरतों की तादात कम ज़रूर थी लेकिन शानदार थी। देखिए जब किसी चीज़ को आंदोलन का रूप दे दिया जाता है तो सब कुछ होने के बावजूद भी वह वक़्त के साथ ख़त्म हो जाता है। óी विमर्श एक ख़ास अंदाज़ से शुरू हुआ। उससे पहले भी न जाने कितने किरदारों में óियों के सरोकार बिना किसी óी विमर्श के भरे पड़े हैं। मुझ्ो लगता है óी विमर्श सामाजिक दृष्टि से ज़रूरी है।  कहानियों में कला को बर्बाद नहीं करना चाहिए वह किसी नारे की मोहताज़ नहीं होनी चाहिए। ऐसी स्थिति में कहानी का पूरा का पूरा ढांचा चरमरा जाता है। अतः हमें देखना पड़ेगा कि उस óी विमर्श में लेख और बातचीत के जरिए किस तरह से जागरूकता लाएं। मैं यह नहीं कहती कि ‘कला कला के लिए’ हो, लेकिन किरदार ऐसा होना चाहिए जो लेखक की सोच से प्रभावित होकर उसकी मर्जी से ना चलेए बल्कि खुद वह लेखक को यह बताएं कि वह किरदार किस ग्राफ का है। मैं मानती हूं कि लेखक को किसी भी तरह के विमर्श को अपनी कहानियों में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। ऐसे विमर्श उसे लेखों वक्तव्यों और समाज सेवा में प्रस्तुत करना चाहिए। हां, जो आंदोलनकारी हैं वह कहानीकार की कहानियों का इस्तेमाल अपने आंदोलन में कर सकते हैं।


सवाल:  क्या óी की बुनियादी और जज़्बाती ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आज का साहित्य कारगर है ? 

जवाब: कारगर इस तरह से है कि हर कोई कलम लेकर अपनी बात कह रहा है। यह एक अच्छा शगुन है। औरतों ने बोलना सीखा है और लिख रही हैं। यह बहुत अच्छी बात है कि औरतों को जुबान मिल गई है और उसको लोग सुनते हैं।

सवाल:  आपकी दृष्टि में क्या आज ऐसा साहित्य रचा जा रहा है जो पुरुषों को झ्ाकझ्ाोर कर óियों के प्रति अच्छे बर्ताव के लिए प्रेरित करे ?

जवाब: साम्यवाद के असर से मर्द-समाज में सामाजिक चेतना आनी शुरू हुई। हमारे यहां जब 1947 के बाद जमीदारी खत्म हुई, बड़े स्तर पर शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ तो मर्दो को भी एक नज़रिया मिला। देखिए सवाल उठता है कि समाज यूं ही नहीं खुलता गया होगा। इतिहास में जाकर हमें देखना होगा कि मर्द कहां तक हमारे समाज को कंट्रीब्यूटर कर रहे हैं  और यह सिलसिला कहां से शुरू होता है। हम देखते हैं कि मुस्लिम समाज के सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की नींव रखी। इस संस्थान ने मुस्लिमों के विश्वास को बढ़ाया। यह यूनिवर्सिटी हिंदू-मुस्लिमों का खेमा नहीं था। यहां से सबसे पहले एम.ए. करने वाले छात्र प्रसिद्ध इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद थे। उस यूनिवर्सिटी में भाई बहनों ने साथ-साथ पढ़ना शुरू किया। इस बात को समझ्ािए कि उस समय óी विमर्श नहीं था, बल्कि समाज ने करवट बदली। राजा राममोहन राय के सती प्रथा के खिलाफ किए गए प्रयासों को कैसे भुलाया जा सकता है। यह तो संकुचित सोच है कि óी विमर्श आज का मुहावरा है। औरत जो कुछ लिख रही है उससे ज़रूर संकुचित मर्दों की चेतना में बदलाव आया होगा। वैसे तो असमानता और एक दूसरे के शोषण का सिलसिला बहुत पुराना है और इस शोषण के खिलाफ मर्द के विरोध का सिलसिला भी बहुत पुराना है।

सवाल:  आपको अपना सबसे प्रिय उपन्यास कौन सा लगता है ? 

जवाब: जब मैं एक उपन्यास लिख रही हूं तो वह मुझ्ो प्यारा लगता है। उसका किरदार मुझ्ो अवसाद और परेशानी में भी डालता है, लेकिन जब वह मार्केट से होते हुए पाठकों के हाथों में पहुंच जाता है तो वह मेरा नहीं रहता। मेरा संबंध तो उससे बना रहता है लेकिन मेरी शिद्दत दूसरे उपन्यास में चली जाती है।

सवाल:  आपने बच्चों के लिए भी लिखा है, बाल साहित्य लिखते समय क्या सावधानियां रखनी होती हैं ? क्या लेखन शैली में किसी विशेष तकनीक का इस्तेमाल अपेक्षित होता है ? 

जवाब: मेरे लेखन को विधाओं में आप बांट दें, यह आपकी मर्जी, लेकिन एक लेखक के दिल में जो भी आया वो उसने लिखा। कुछ लोग बड़े और बच्चे दोनों के लिए अलग-अलग तरह से लिखते हैं। मैं कोई खास सचेत होकर नहीं लिखती कि मैं किसके लिए लिख रही हूं।  आपके अंदर का रस कोई भी रंग पकड़ सकता है। मैं बड़ों के लिए लिखूं या बच्चों के लिए, मनोविज्ञान को सामने रखकर नहीं लिखती बल्कि ज़िंदगी को सामने रखती हूं कि ज़िंदगी कैसे इंसान को मोड़ती है।

सवाल:  हिंदी और उर्दू के आपसी संबंधों को आप किस प्रकार देखती हैं ?

जवाब: हिंदी-उर्दू एक ही मां से पैदा हुई दो बहनें हैं। हिंदुस्तान की बेटियां हैं। स्क्रिप्ट का फर्क ज़रूर है। उर्दू की पैदाइश तो यहीं से हुई। उसकी हिस्ट्री चाहे जहां से पकड़ लो। उर्दू की स्क्रिप्ट अरबी और फारसी के करीब हो गई। हिंदी का झ्ाुकाव संस्कृत की तरफ हो गया। मजे की बात है कि संस्कृत और फारसी को कुछ लोग जुड़वा बहनें कहते हैं। कुछ लोगों ने इस पर काम भी किया है। अभी मैंने अपने एक लेख में लिखा है कि हिंदी और उर्दू के बहुत से शब्द दरअसल फारसी के शब्द हैं।  जिसे दोनों भाषाओं ने अपना लिया हैए क्योंकि भाषा किसी की मोहताज नहीं रहेगी और न किसी सीमा में रहेगी। उसकी ग्रोथ तो बराबर होती रहती है। नामवर सिंह ने एक लेख लिखा था ‘बासी भात में खुदा का साझ्ाा’ जिसके कारण उन्हें प्रगतिशीलों की आलोचना भी झ्ोलनी पड़ी। भाषाओं के साथ कैसी नफ़रत, उर्दू केवल मुसलमानों की जुबान नहीं है।

सवाल:  राजभाषा की दृष्टि से आप हिंदी की स्थिति को कैसा पाती हैं ?

जवाब: किसी भी देश का एक झ्ांडा और एक भाषा तो होनी ही चाहिए। जब हम अखंडता की बात करते हैं और सारे प्रांतों की बोलियों और भाषाओं के लोगों को एकजुट करना चाहेंगे तो यह प्रश्न उठेगा कि हिंदी ही क्यों, दूसरी भारतीय भाषाएं भी तो लिटरेचर की वजह से काफी रिच हैं। यह भी एक सवाल हो सकता है कि सिर्फ़ हिन्दी क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा को ही आगे क्यों बढ़ाया जा रहा है। ऐसे सवाल वक़्त के साथ बढ़ रहे हैं, क्योंकि यह तो तय है कि उर्दू-हिंदी मिश्रित भाषा यानी ‘हिंदुस्तानी’, जिसमें अब दूसरी भाषाओं के शब्द भी आने लगे हैं। एक कनेकिं्टग भाषा तो है ही। अतः हिंदी को अलग रखते हुए उर्दू को अन्य भारतीय भाषाओं में शामिल कर लीजिए और ‘हिंदुस्तानी’ भाषा जो मिली जुली भाषा है, उसे राष्ट्रीय भाषा मान लीजिए। उसमें एकता भी है, अखंडता भी है, सहकारिता भी है और एक दूसरे को साथ लेकर चलने की भावना भी है। इस तरह हिंदी और उर्दू के प्रति लोगों की परस्पर नफ़रत भी खत्म हो जाएगी।

सवाल:  आपने अंतरधर्मीय विवाह किया है। क्या इस विवाह से सामाजिक रूप से आपको कोई विरोध झ्ोलना पड़ा  ? या जीवन में किसी नकारात्मक प्रभाव का सामना करना पड़ा  ?

जवाब: शादी को लेकर तो ऐसा कोई विरोध नहीं हुआ जिसे दुर्घटना का नाम दिया जाए। यह बात अलग है कि लोगों ने हिन्दू-मुसलमान का नाम देकर हम दोनों को प्रोफेशनली नुकसान पहुंचाने की कोशिश ज़रूर की थी। लेकिन यह भी सच है कि ढ़ेरों लोग कहते रहे इतना खूबसूरत नाम है कि मेरे जहन में जम गया। 

सवाल:  नासिरा शर्मा आज के समाज में किन चुनौतियों को गंभीर मानती हैं ?

जवाब:  सबसे गंभीर बात है कि परस्पर नफ़रत बहुत बढ़ रही है। ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ़ हिंदू-मुसलमान तक सीमित है। यह मुसलमानों में कई वर्गों में है, हिंदुओं में जाति-पाति के रूप में मौजूद है। दलित अभी तक इंसान के रूप में स्वीकारा नहीं गया है। दूसरी तकलीफ़ यह होती है कि हमारे पास इतना कुछ है लेकिन हम कॉमन आदमी की परेशानियां दूर नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि आजादी के 70 सालों से ज्यादा वक़्त गुजरने के बाद भी कॉमन आदमी को साफ़ पानीए छोटा सा घर, छोटी सी जॉब तक नहीं मिल रही है। मैं जिन देशों में गई हूं वहां फकीर और फुटपाथों में सोते हुए लोग नहीं दिखते, और सबसे बड़ी बात खेतिह, देश में किसानों के हाल मुझ्ो बेचैन करते हैं।

सवाल:  आजकल आप के अध्ययन कक्ष में क्या चल रहा है ?

जवाब:  कुछ नया तो मैंने शुरू नहीं किया है। अभी हाल ही में मेरे ‘शब्द पखेरू’ और ‘दूसरी जन्नत’ लघु उपन्यास आए हैं। इधर 6 खंडों में मेरे अनुवाद की एक किताबें आई थीं। 

सवाल:  आपके अनुसार नए युवा कहानीकार और उपन्यासकार जो अच्छा लिख रहे हैं  ?

जवाब:  कुछ युवा लेखक बहुत खूबसूरत लिख रहे हैं। उनकी कुछ कहानियों को हिंदी की बेहतरीन कहानियों के साथ रखा जा सकता है, क्योंकि जो लेखक संजीदगी से अपने लेखन को लेता है और जमीन से चीजों को उठाता है उसमें बनावटीपन नहीं होता। वह सीधे आपके दिल पर असर करता है।

सवाल:  नए रचनाकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी ?

जवाब:  मुझ्ो लगता है कि नई आने वाली कलम को आलोचना की परवाह नहीं होनी चाहिए और ना ही सस्ती शोहरत पर यक़ीन करना चाहिए। उसका ख़जाना उसके पाठक होते हैं जो उसे सही पहचान देते हैं। कुछ किताबों को जबरदस्ती बेस्टसेलर कहा गया लेकिन वे राइटर अब नज़र नहीं आते।


( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2019 अंक में प्रकाशित )


बुधवार, 10 अगस्त 2022

गांधीजी के निजी स्वयंसेवक थे श्रीकृष्ण राय हृदयेश

                

                               

श्रीकृष्ण राय हृदयेश

                  

                                                                            - अमरनाथ तिवारी ‘अमर’

      श्रीकृष्ण राय हृदयेश का जन्म ग़ाज़ीपुर जनपद के कठउत गांव में सन 1909 में हुआ। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हृदयेश जी साहित्य सृजन, पत्रकारिता, स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन, सहकारिता आंदोलन सहित साहित्यिक, सामाजिक गतिविधियों में आजीवन सक्रिय रहे। ग़ाज़ीपुर में एक स्वस्थ साहित्यिक वातावरण के सृजन, कवि सम्मेलनों और साहित्यिक गोष्ठियों के निरंतर आयोजन एवं नवोदित रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

 गंाधीवादी विचारधारा और राष्टीय चेतना से ओत-प्रोत हृदयेश जी गांधी जी के ग़ाज़ीपुर आगमन पर उनके निजी स्वयंसेवक के रूप में कार्य किए थे और अपने विद्यार्थी जीवन में ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर जेल यात्रा किया। हिंदी के साथ संस्कृत, अंग्रेज़ी, भोजपुरी एंव बंग्ला भाषा के जानकार हृदयेश जी टाइम्स ऑफ इंडिया, नेशनल हेराल्ड सहित देश के कई पत्रों में लेखन करते रहे। उस समय के लोकप्रिय हिंदी दैनिक ‘आज’ के वे काफी अवधि तक ग़ाज़ीपुर के प्रतिनिधि रहे। सन 1949 में उन्होंने ग़ाज़ीपुर से ‘लोकसेवक नायक’ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया था।

हदेयष जी का रचना संसार भी विस्तृत है। उनका पहला काव्य संग्रह ‘युवक से’ 1935 में प्रकाशित हुआ। इस काव्य संग्रह से मानवीयता और राष्टीयता का जो उनका स्वर उभरा वह हिमांशु (1940) से लेकर पथदीप (1950) तक बना रहा। इसके बाद तीन दशकों तक उनका सामाजिक, राजनैतिक और पत्रकारिता वाला व्यक्तित्व प्रभावी रहा। सन 1980 में प्रकाशित ‘सत्यासत्य’ महाकाव्य उनकी साहित्यिक यात्रा में मील का पत्थर साबित हुआ। इसके बाद उनकी लगभग दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुईं। अश्वघोष के बुद्धचरितम पर आधारित भवानुवाद ‘महाप्रकाश’ प्रबंध काव्य है। ‘नवदीप’ महाकाव्य एवं ‘लहर-लहर लहराए गंगा’ खंडकाव्य है। इन्होंने गिरिराज शाह की अंग्रेज़ी भाषा में लिखी पुस्तक ‘वैली ऑफ फ्लवार्स’ का काव्य अनुवाद ’फूलों की घाटी’ नाम से किया। गंगा मुझे पुकारे (1989) एवं मेघदूत (1990) में भी काव्यनुवाद है। इसके बाद उनकी ग़ज़लों का संग्रह ‘बदगुमानी का मौसम’ नाम से आया। ‘सत्यासत्य’ के बाद उनका सर्वाधिक चर्चित महाकाव्य ‘शंखपुष’(1996) है। वेदकालीन राज्य व्यवस्था की पृष्ठभूमि पर केंद्रित इस महाकाव्य का सृजन अत्यंत गंभीर है। इसमें महेंद्र, रुद्र, अग्नि, सरस्वती आदि को पात्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भोजपुरी भाषा में ‘हृदेयश सतसई’ अप्रतिम पुस्तक है। हृदयेश जी लगभग दो दर्जन अप्रकाशित पुस्तकों में प्रमुख हैं- ग़ाज़ीपुर का इतिहास, दोहों का संग्रह, संजय बतीसी, कसौरी (ललित निबंध)।

 श्रीकृष्ण राय हृदयेश का पार्थिव शरीर 13 जून 1999 को पंचतत्व में विलीन हो गया। ग़ाज़ीपुर की साहित्यिक, राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेश में उनके योगदान का स्मरण सदैव किया जाएगा।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में प्रकाशित )