बुधवार, 2 जून 2021

बतख़ मियां अंसारी और अक़ील रिज़वी

                                                                  - डाॅ. हसीन जीलानी

                                          


 एम. डब्ल्यू. अंसारी की मुरत्तिब की हुई किताब ‘बतख मियां अंसारी की अनोखी कहानी’ एक ऐसे मुजाहिद-ए-आज़ादी की कहानी है, जिन्होंने बिहार के चम्पारन में अंग्रेज़ अफसर के घर में गांधी जी की जान बचाने में अहम किरदार अदा किया था। आज जबकि गांधी जी के क़ातिल नाथूराम गोड़से के चाहने वाले और मानने वालों का एक गिरोह मुल्क की गंगा-जमुनी तहज़ीब को तबाह व बर्बाद करने और फ़िरक़ापरस्ती को हवा देने में सरगर्म-ए-अमल हैं। ऐसे में इस किताब की अहमियत बढ़ जाती है। यह किताब मुजाहिदीन-ए-आज़ादी की हयात व खिदमात और उनके कारनामों से नयी नस्ल को मुतआर्रिफ़ कराने और उनकी ज़ेहनी तर्बियत में यक़ीनन मददगार साबित होगी।

 बतख मियां अंसारी हमारी क़ौमी हम-आहंगी और मुश्तरका तहज़ीब की अलामत हैं। लेकिन आज़ादी के बाद बिहार में कांग्रेस, जनता दल और राजद जैसी सियासी पार्टियों के हुकूमत में रहने के बावजूद किसी ने भी बतख मियां अंसारी की जानिब ख़ातिर ख़्वाह तवज्जुह नहीं की। ऐसे में एम. डब्ल्यू. अंसारी का बतख मियां अंसारी के तअल्लुक से ज़्यादा से ज़्यादा मज़ामीन इकट्ठा करके किताबी शक्ल में शाया कर देना क़ाबिल-ए-तारीफ़ व मुबारकबाद अमल है। किताब में बखत मियां अंसारी के अहद के लिए क़ाबिल-ए-ज़िक्र क़लमकार, अदीब व शायरों की निगारिशात के साथ-साथ उन पर कही गयी बाज़ नज़्में भी शामिल हैं। आज जबकि हमारे भाई चारा और खुलूस व मुहब्बत में रोज़ ब रोज़ कमी आती जा रही है, बतख़ मियां की क़ुर्बानियों को याद किया जाना बेहद ज़रूरी है। 175 सफ़हात पर मुश्तमिल इस किताब की कीमत 250 रुपये है। पेपर बैक पर शाया इस किताब का कवर दिलकश है, जिसे अहमर हुसैन की जानिब से शाया किया गया है।



 प्रोफ़ेसर अली अहमद फ़ातमी की ताज़ा-तरीन किताब ‘प्रोफ़ेसर सय्यद मोहम्मद अक़ील उस्ताद और नक़्क़ाद’ हाल ही मेें शाया हुई है। तरक्की पसंद तन्क़ीद निगारों में प्रो. अक़ील का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। उनका शुमार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अहम असातज़ा में होता है। उन्होंने तक़रीबन चालीस बरस तक शोब-ए-उर्दू के तद्रीसी खिदमात अंजाम दी। 32 तलबा ने उनकी निगरानी में डी.फिल की डिग्री हासिल की। दो दर्जन से ज़्यादा किताबें लिखीं। मुतअद्दि एज़ाज़ व इकराम से भी उन्हें नवाज़ा गया। उनके इन्तिक़ाल के कुछ माह गुजरने के बाद उनके शार्गिद प्रो. अली अहमद फ़ातमी की जानिब से नज़रान-ए-अक़ीदत के तौर पर इस किताब का शाया होना एक मस्तहसन अमल है। आज जबकि उस्ताद और शार्गिद के रिश्ते रोज़ ब रोज़ टूटते जा रहे हैं, ऐसे में किसी शार्गिद का अपने उस्ताद के लिए इससे बेहतर नज़रान-ए-अक़ीदत और क्या हो सकता है। किताब के शुरू में प्रो. फ़ातमी लिखते हैं-‘उस्ताद-ए-मोहतरम सय्यद अक़ील पर लिखे गए चंद मज़ामीन, तब्सरे, इंटरव्यू जो अब बाद-ए-वफ़ात किताबी शक्ल में मज़र-ए-आम पर आ रहे हैं। ये सिर्फ़ और सिर्फ़ नज़रान-ए-अक़ीदत हैं, इसके अलावा कुछ भी नहीं।’ 

 इस किताब में कुल आठ मज़ामीन और दो इंटरव्यू शामिल हैं। जिनमें प्रोफेसर अक़ील की शख़्सियत और उनके अदबी कारनामों पर सरे हासिल गुफ़्तगू की गयी है। साथ ही उनकी कुछ अहम किताबों पर तब्सरे भी किये गए हैं। किताब के आखि़र में कुछ यादगार तस्वीर इस किताब को मज़ीद दीदा-ज़ेब बनाती है। प्रो. फ़ातमी की यह किताब इन मानों में अहम है कि उन्हें अक़ील साहब के ऐसे ख़ास शार्गिद होने का शरफ़ हासिल रहा है जो सफ़र व हज़र में अक्सर उनके साथ-साथ रहे हैं। अक़ील साहब की शख़्सियत को जितने करीब से फ़ातमी साहब ने देखा और समझा है शायद वो मौका अक़ील साहब के दूसरे शार्गिदों को कम ही मयस्सर हुआ हो। लिहाजा यह किताब अक़ील साहब के फिक्री और फ़न्नी कारनामों को समझने में नयी नस्ल के तालिबइल्मों के लिए यक़ीनन बेहद मुफ़ीद और कारआमद साबित होगी। 200 पेज की इस किताब का कवर निहायत दिलकश है। किताब की क़ीमत 250 रुपये है। प्रकाशक खुद प्रो. अली अहमद फ़ातमी हैं।

( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित )