बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

काव्य व्याकरण, सपनों का सम्मान, सहरा के फूल और मुनिसुतायन

- अजीत शर्मा आकाश



आजकल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़ल और कविता के नाम पर अनेक त्रुटिपूर्ण रचनाएं प्रकाशित हो रही हैं। इन रचनाओं में क्या और किस प्रकार के दोष हैं, इसकी जानकारी न तो रचनाकार को होती है, न ही सम्पादक को। जिसके अभाव में अच्छे साहित्य के पाठक एवं सीखने के इच्छुक नवांकुर अच्छी एवं मानक रचनाओं से वंचित रह जाते हैं। सोशल मीडिया के अंतर्गत फेसबुक एवं व्हाट्स एप ग्रुपों में तो कचरा ही कचरा भरा रहता है। यह स्थिति काव्य-लेखन की समुचित जानकारी के अभाव के कारण उत्पन्न हुई है। कुछ प्रकाशनों एवं लेखकों ने इस दिशा में सराहनीय कदम उठाये हैं। गुफ्तगू पब्लिकेशन की पुस्तक ‘काव्य व्याकरणं’ ऐसा ही एक अच्छा कार्य है। यह पुस्तक वर्ष 2017 में छपकर आयी थी, जिसका प्रथम संस्करण समाप्त हो चुका है। अतः पाठकों एवं सीखने के इच्छुक रचनाकारों की आवश्यकता को देखते हुए पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित किया गया है, जो एक सराहनीय प्रयास है। पुस्तक के प्रारम्भ में गजल से सम्बन्धित विस्तृत, विवेचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक दो लम्बे आलेख हैं। इनके अंतर्गत शम्सुर्रहमान फारूकी के ‘क्लासिकी ग़ज़ल की शेरीआत’ नामक आलेख में शास्त्रीय ग़ज़ल के काव्यशात्र पर गंभीर चर्चा करते हुए विभिन्न अशआर के उद्धरण के साथ ग़ज़ल के शास्त्रीय स्वरूप के विषय में जानकारी दी गई है। इसी प्रकार अली अहमद फ़ातमी के ‘नए इकदार और नई उर्दू ग़ज़ल’ में आधुनिक ग़ज़लगोई एवं ग़ज़ल के आधुनिक कथ्यात्मक स्वरूप के विषय में सविस्तार चर्चा की गई है। दोनों आलेख ग़ज़ल साहित्य की विस्तृत व्याख्या करते हैं एवं ग़ज़ल के कई ऐसे पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं, जिनके विषय में कम पाठकों को ही पता होगा। डा. नईम ‘साहिल’  के ‘ग़ज़ल लेखन का व्यावहारिक ज्ञान’ नामक लेख में ग़ज़लकारों के लिए अच्छी जानकारी उपलब्ध कराई गई है। ग़ज़ल की विशेषताओं एवं उसमें आने वाले दोषों के विषय में जानकारी प्राप्त कर श्रेष्ठ ग़ज़लों की रचना की जा सकती है। अवधेश कुमार के ‘हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा’ में ग़ज़ल की शुरूआत के विषय में एवं हिन्दी में ग़ज़ल-लेखन के जनक दुष्यन्त कुमार के योगदान पर प्रमुख रूप से चर्चा की गई है। आर.पी.शर्मा ‘महर्षि’ के ‘बह्र-विज्ञान के बारे में’ पुस्तकाकार आलेख बह्रों की जानकारी से भरा पड़ा है एवं सीखने के इच्छुक ग़ज़लकारों के लिए स्वर्णिम जानकारी की तरह है। बह्र की समुचित जानकारी के बिना शायरी, विशेष रूप से ग़ज़ल-लेखन का कोई अर्थ नहीं है। इस दुष्टि से ग़ज़ल लेखकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सामग्री इस आलेख में समाहित की गयी है।
 ग़ज़ल के अतिरिक्त उर्दू शायरी की अन्य विधाओं के छन्द एवं उसके इतिहास पर भी पुस्तक में प्रकाश डाला गया है। इनमें रूबाई, मुनाजात, हम्द, नात, मर्सिया, आदि विधाएं शामिल हैं। इनमें अख़्तर अज़ीज़ का आलेख ‘हम्द, मुनाजात और नात’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। डाॅ. फरीद परबती ने रूबाई विधा का विशेष परिचय प्रदान किया है। नायाब बलियावी ने मर्सिया के विषय में बताया है। हिन्दी में काव्य-रचना करने वालों के लिए भी उपयोगी सामग्री पुस्तक में उपलब्ध है। हिन्दी कविता की प्रमुख विधाओं में से डा. बुद्धिनाथ मिश्र ने गीत विधा के इतिहास एवं उसकी वर्तमान दशा-दुर्दशा पर चर्चा की है। हिन्दी के शास़्त्रीय छन्द दोहा की रचना करने के लिए रघुविन्द्र यादव ने अपने आलेख सही दोहे लिखने के लिए क्या करें सविस्तार बताया है। हिन्दी में हाइकू नयी विधा का काव्य है, जो जापानी काव्यशास्त्र से आया हुआ है। हिन्दी के सन्दर्भ में इसकी रचना एवं प्रस्तुति को कमलेश भट्ट कमल के आलेख के माध्यम से अच्छे एवं रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इनके अतिरिक्त माहिया और जनक छन्दों की जानकारी प्रदान करते हुए आलेख भी पुस्तक के अन्तर्गत हैं। फिल्मी गीतकार एवं शायर इब्राहीम ‘अश्क’ ने फिल्मी गीतों के विभिन्न प्रकार एवं फिल्मों में उनकी अपरिहार्यता पर ‘फिल्मी गीत की परिभाषा’ आलेख के माध्यम से इस विषय में पर्याप्त प्रकाश डाला है। अच्छे एवं उपयोगी प्रकाशन के लिए संपादक इम्तियाज अहमद गाजी धन्यवाद के पात्र हैं। इम्तियाज अहमद गाजी द्वारा सम्पादित 164 पृष्ठों की इस सजिल्द पुस्तक को गुफ्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य 400 रुपये है।
 


ग़ज़ल साहित्य की एक लोकप्रिय विधा है। रामचंद्र ‘राजा‘ की 59 ग़ज़लों का संकलन ‘सपनों का सम्मान’ प्रकाशित हुआ है। इस पुस्तक में वर्तमान समाज एवं जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करने का प्रयास किया गया है। सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक आदि जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श किया गया है, जिसके अंतर्गत जीवन की अनुभूति, मानव संवेदना, आज के युग की विडम्बनाएं आदि प्रमुख विषयों को इंगित किया गया हैं। संग्रह में ग़ज़लों के कुछ उल्लेखनीय अशआर इस प्रकार हैं- ‘देश को जो खोखला करते रहे/एकता के गीत गाने आ गये।’ एवं ‘है हवा के इशारे पे उसका सफर/वो जिधर चाहे खुशबू उधर जायेगी।’ ये शेर देश के वर्तमान अधिनायकों का चरित्र उजागर करते हैं। आज की राजनीति पर व्यंग्य- ‘अब दिल से दिल को जोड़ना आसां नहीं रहा/नफ़रत का ज़ह्र शह्र में फैला दिया गया।’ समाज एवं देश के कल्याण की चाह इन पंक्तियों में परिलक्षित होती है- ‘हम चाहते हैं कोई भी ठोकर न खाये अब/फूलों से सबकी राह सजाया करेंगे हम।’ एवं ‘सूरज बनूंगा मैं भी कभी आसमान का/रोशन करूंगा कोना-कोना मैं जहान का।’ आज के दौर की स्वार्थपरता का चित्रण- ‘गायब हुआ कुछ ऐसे वो मतलब निकाल के/मुद्दत गुजर गई वो दुबारा कहां मिला।’ एवं ‘जो शजर अपने पत्तों से महरूम है/छोड़कर उनको पक्षी भी जाने लगे।’ रचनाकार ने बाजारवाद पर इस शेर के माध्यम से सटीक व्यंग्य किया है- ‘व्यापार कितना गिर के है करता ये आदमी/औरत की फोटो छापता है इश्तहार में।’ गांवों से शहरों की ओर पलायन- ‘वो लहलहाता प्यार का मंजर नहीं मिला/गांवों के जैसा शहर में आदर नहीं मिला।’ सर्वहारा के जीवन का चित्रण देखें- ‘मुफलिसी के दौर में दिन रात हम/क्या बताएं किस तरह पलते रहे।’
ग़ज़लकार ने अच्छी ग़ज़लें कहने की भरसक कोशिश की है, लेकिन ग़ज़ल की विधा पर बहुत अच्छी पकड़ न होने के कारण कहीं-कहीं अधकचरापन झलकता है। हालांकि ग़ज़लकार स्वयं मानता है कि- ‘लिखना कलाम सीख ले तो फिर उसे तू पढ़/ख़ामी हो जिसमें ऐसी कभी शायरी न कर।’ लेकिन इसके बावजूद ग़ज़ल संग्रह में ख़ामियां  दृष्टिगत होती हैं। व्याकरण की दृष्टि से ऐबे तनाफुर, तकाबुले रदीफ़, मिस्रों का कहीं-कहीं बे-बह्र होना जैसे दोष भी कुछ गजलों में हैं। 72 पेज की इस पुस्तक की कीमत 100 रुपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।
 


हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल की लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही जा रही है। इसी का परिणाम है कि प्रायः सभी रचनाकार, जो इस विधा से जरा-सा भी वाक़िफ़ हैं, इसे अपना रहे हैं और अपनी लेखनी का जोर आजमा रहे हैं। ऐसी ही जोर आजमाइश के परिणामस्वरूप मोहन बेगोवाल का ‘सहरा के फूल’ नामक गजल संग्रह प्रकाशित होकर आया है। इस संग्रह में रचनाकार ने अपनी 100 गजलें प्रस्तुत की हैं। कथ्य की दृष्टि से इसमें अनेक सामाजिक विद्रूपताओं एवं जीवन की विसंगतियों को स्पर्श किया गया है। कुछ ग़ज़लों के अश्आर सराहनीय हैं, जिनका उल्लेख निम्नवत् है-‘जुल्म का पुतला अगर जल जायेगा/साथ नफ़रत का किला भी ढायेगा।’ ‘जिस ने चाहा वो ही कीमत लगा गया/क्या दौर हम बाजार का सामान बन गए।’, ‘तू अभी जाग क्यूँ नहीं जाता/देख पानी जा रहा है सर से।’, ‘सोच जब आसमान तक पहुंची/तब ये कोशिश उड़ान तक पहुंची।’ लेकिन, इस रचनात्मकता के साथ ग़ज़ल-लेखन के प्रति लापरवाही इस संग्रह में सबसे अधिक खटकने वाली बात है। यह सर्वविदित है कि प्रत्येक विधा की भाँति गजल के भी अपने कुछ नियम, शर्तें एवं बंधन हैं, जिनका पालन अनिवार्यतः करना होता है। ग़ज़ल की ऊपरी बनावट को देखकर ही लिखने से वह एक अधकचरेपन का शिकार होते हुए ग़ज़ल न होकर ग़ज़लनुमा रचना के रूप में हमारे सम्मुख आती हैं। ‘सहरा के फूल’ इसी प्रकार का ग़ज़ल संग्रह है। शिल्प विधान अपरिपक्व होने के कारण रचनाओं में रब्त और रवानी का अभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है एवं भावों की अस्पष्टता कथ्य को दुरूह बना देती है। उदाहरणार्थ, आंसू उछल तो सकती हैं, खुद मुझे उस बचा हो गया, तुम जलाने मेरी खता लाया, मेरे से दिल्ल्गी न हो जाए, जब मैं नजदीक से पढ़ा, जिस लुटा के घर रहा हूं, तदबीर हम बनाई है, बात हर पे मेरी, तू रूलाया, तेरे से, करी जो बात, घर मिरे के, जिस मिलाया था, जैसे अशुद्ध एवं अनर्गल वाक्यांशों का प्रयोग खड़ी बोली की ग़ज़ल में नितान्त अग्राह्य है। यही नहीं, अन्य शायरों की कुछ पंक्तियां इस ग़ज़ल संग्रह में ज्यों की त्यों प्रयोग की गयी हैं, जो नितान्त आपत्तिजनक होने के साथ ही ग़ज़लकार की रचनाधर्मिता पर प्रश्नचिह्न लगा जाती हैं। उदाहरणार्थ, पानी पानी हुआ जाता है समन्दर देखो-एहतराम इस्लाम (पृष्ठ-12), हर नए गम से खुशी होने लगी- साहिर होशियारपुरी (पृष्ठ-16), अभी कुछ और करिश्मे गजल के देखते हैं-अहमद फराज (पृष्ठ-29), इसको हंसा के मारा, उसको रुला के मारा-अकबर इलाहाबादी (पृष्ठ-41)। बहरहाल, ग़ज़लकार को इस प्रकार की भूलों से बचना चाहिए था। लेकिन, ग़ज़ल लेखन के लेखक के इस प्रयास को पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता। ‘सहरा के फूल’ की ग़ज़लों के माध्यम से अपनी बात पाठक तक पंहुंचाने की भरपूर चेष्टा की गयी है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। रचनाकार को इस प्रयास के लिए साधुवाद एवं आशा की जाएगी, कि अगला संग्रह एक अच्छे रूप में पाठकों के सम्मुख आएगा। कुल 108 पृष्ठों की इस सजिल्द पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य रुपये 200 मात्र है।
 



 कवयित्री डाॅ. शैलकुमारी तिवारी द्वारा रचित ‘मुनिसुतायन‘ तीन भागों में विभक्त 704 पद्यों की प्रबंध कविता है। प्रबंध काव्य में कोई प्रमुख कथा काव्य के आदि से अंत तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। समीक्ष्य कृति में कवयित्री ने शकुन्तला के जीवन की सम्पूर्ण कथा कही है। महाकवि कालिदास के संस्कृत नाटक ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्‘ से कथानक ग्रहण करके ‘मुनिसुतायन‘ कृति का प्रणयन किया गया है, जो खड़ी बोली हिन्दी में पद्य रूपांतरण के स्वरूप में है। इस रचना में 30 मात्राओं वाले ‘पद-पादाकुलक‘ छन्द का प्रयोग किया गया है। इसके साथ ही इससे मिलते-जुलते ‘वीर‘ या ‘आल्हा‘ छन्द का भी प्रयोग किया गया है। कथा के प्रथम भाग में ऋषि विश्वामित्र एवं अप्सरा मेनका के गर्भ से उत्पन्न अद्भुत सौन्दर्य-पुंज कन्या के जन्म का वृत्तान्त वर्णित है, जिसे उसकी जन्मदात्री ने प्रसव के तत्काल बाद ही त्याग दिया। कण्व ऋषि के आश्रम में उनकी धर्मभगिनी गौतमी द्वारा उस कन्या पालन-पोषण किया गया। कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात् राजा दुष्यन्त द्वारा शकुन्तला के प्रति आकृष्ट होकर गान्धर्व विवाह किये जाने एवं शकुन्तला-दुष्यन्त का प्रणय-प्रसंग है। द्वितीय भाग में दुष्यन्त की स्मृतियों में खोयी हुई शकुंतला को दुर्वासा ऋषि द्वारा शाप दिया जाना, महर्षि कण्व द्वारा शकुन्तला की विदाई करके नृप दुष्यन्त के पास भेजना तथा दुष्यंत द्वारा उसे अस्वीकार किये जाने के पश्चात् उसकी जननी मेनका द्वारा उसे मारीचाश्रम में ले जाना वर्णित है। तृतीय भाग में नृप दुष्यन्त की स्मृति का जागृत होना, मारीचाश्रम में पहुंचने पर शकुन्तला एवं उसके गर्भ से उत्पन्न अपने पुत्र की प्राप्ति के साथ ही कथा सम्पन्न होती है। कवयित्री के अनुसार वर्तमान समाज में व्याप्त विषमता को दूर करने एवं समरसता का अभिवर्द्धन, निरन्तर घटित हो रही आत्महत्याएँ, कन्याओं की भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, अशिक्षा आदि कुरीतियों के प्रति सहज संवेदना जगाने के साथ ही स्वावलम्बन की शिक्षा भी कथा के बीच-बीच में प्रदान की गयी है। अपनी सन्तान के प्रति कर्तव्यहीन मेनका की भी कवयित्री ने निन्दा की है। काव्य की भाषा परिमार्जित, परिष्कृत एवं संस्कृतनिष्ठ हिन्दी है तथा कहीं-कहीं सामान्य बोलचाल के शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। कायल, मुश्किल, दिल जैसे अन्य भाषाओं के शब्द भी कहीं-कहीं हैं। शैली अत्यन्त रोचक एवं प्रवाहमय है, यद्यपि प्रवाह किन्हीं-किन्हीं छन्दों में बाधित-सा भी प्रतीत होता है। पुस्तक के कुछ उल्लेखनीय अंश प्रस्तुत हैं। शकुन्तला का परिचय ‘मुनिसुतायन‘ में कुछ इस प्रकार प्रदान किया गया है-’यह वात्सल्य-भाव की भूखी पिता विश्वसख तप आसक्त/देवराज प्रेषित मेनका ही माता इसकी भगिनी हंत।।030!!’ शकुन्तला की प्रेम-व्यंजना दृष्टव्य है-‘कण्व सुता का कोमल अन्तस नृप-नयनों से था घायल/ बसे हुए थे नृप नेत्रों में चित्त उन्हीं का था कायल।।122।।’ राजा का कर्तव्य-‘प्रजा सदा राजा की संतति होती नृप की दृष्टि अभेद/ भारतीय संस्कृति में प्राणी सम होते हैं नहीं विभेद।।067।।’ वर्तमान समाज में व्याप्त विषमता के प्रति कवयित्री का दृष्टिकोण कुछ इस प्रकार परिलक्षित होता है-‘जीवन का अधिकार सभी का और स्वास्थ्यप्रद भोजन का/ सबको मिले समान ही शिक्षा कोई पात्र न शोषण का।।014।।’ काव्य-रचना के पद्यों में तुकांतता सम्बन्धी अशुद्धियां किन्हीं स्थानों पर परिलक्षित होती हैं, यथा-आसक्त-हंत, जल-कण, अक्षय-धन्य, अब से-वश में। कहीं-कहीं ‘‘होए नहीं उदास” जैसी भाषा भी प्रयोग की गयी है। पुस्तक के विषय में कहा जा सकता है, कि प्राचीन कथा में आधुनिक सन्दर्भों का समावेश करते हुए अच्छी प्रबन्ध कविता का सृजन किया गया है। मुख्य रूप से शकुन्तला-दुष्यन्त की प्रणय-कथा का यह पद्य रूपान्तरण इस अभिरूचि के पाठकों को रोचक एवं पठनीय प्रतीत होगा। कवयित्री डाॅ. शैलकुमारी तिवारी इस पुस्तक के प्रणयन हेतु बधाई की पात्र हैं। देववाणी परिषद, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 96 पृष्ठीय इस पुस्तक का मूल्य  200 रुपये मात्र है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)


सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

धीरज ने समाज के सभी पहलुओं को उजागर किया



‘जमादार धीरज विशेषांक’ के विमोचन के अवसर पर बोलीं सुमय्या राना

प्रयागराज। इलाहाबाद साहित्य का गढ़ रहा है, यहां बड़े-बड़े शायर, कवि और अदीब पैदा हुए हैं। इसी सिलसिले के कवि रहे हैं जमादार धीरज। इन्होंने अपने गीत के माध्यम से समाज के सभी पहलुओं को उजागर किया है, जहां भी विडंबना देखी, उस पर कलम चलाया। लोगों के दुख-दर्द का समझा और सही राह चलने की सीख दी। ऐसे कवि पर विशेषांक निकाल कर गुफ़्तगू ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह बात 07 फरवरी को ‘गुफ़्तगू’ की ओर से राजरूपपुर स्थित डाॅ. अंबेडकर मार्ग पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान के सुमय्या राना ने कही। इस मौके पर गुफ़्तगू के ‘जमादार धीरज’ विशेषांक का विमोचन किया गया।

गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि जमादार धीरज की बेटी मधुबाला धीरज की पहल पर इस विशेषांक का प्रकाशन किया गया है। अब प्रत्येक वर्ष अक्तूबर के महीने में जमादार धीरज के जन्म दिन पर कार्यक्रम होगा, जिसमें पांच कवियों को ‘जमादार धीरज सम्मान’ का प्रदान किया जाएगा, इसी वर्ष से इसकी शुरूआत की जाएगी।

 मधुबाला धीरज ने कहा कि पापा के देहांत के बाद हर किसी ने अपना दर्द बयान किया, जो भी उनके निधन की खबर सुनता उसी तरह दुखी हो जाता, जिस तरह कि हम हुए। उनके जैसा पिता होना मेरे लिए बड़े गर्व की बात है। ग़ाज़ीपुर से आए शायर मासूम रज़ा राशदी ने कहा कि जमादार धीजर ने गुलो-बुलबुल वाली शायरी कभी नहीं की, उन्होंने समाज के वंचित लोगों के दर्द को अपनी कविता में उकेरा, लोगों का सही मार्गदर्शन किया। आज ऐसी ही शायरी की आवश्यकता है। दूरदर्शन केंद्र के पूर्व निदेशक श्याम विद्यार्थी ने कहा कि जमादार धीरज बेहद जीवन्त इंसान और कवि थे, उनसे मिलने के बाद कभी भी निराशा नहीं हो सकती थी, उनके निधन से प्रयागराज ने एक महत्वपूर्ण कवि को खो दिया है। डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, तलब जौनपुरी, सागर होशियारपुरी, डाॅ. सुरेश वंद्र द्विवेदी, अशोक कुमर धीरज, नीलम चंद्र धीरज, शीला सरन, उर्मिला सिंह, आर  जी सिंह, सीमा मोहन, ब्रजेश मोहन, अंजनी कुमार, आसिफ उस्मानी, आदि ने भी विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता गोण्डा के कवि सतीश आर्या और संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। मीठी मोहन, नरेश महरानी, अनिल मानव, शैलेंद्र जय, नीना मोहन श्रीवास्तव, डाॅ.नीलिमा मिश्रा, प्रभाशंकर शर्मा, संजय सक्सेना, रेशादुल इस्लाम, अना इलाहाबादी, केशव प्रसाद सक्सेना, अशोक कुमार स्नेही, रचना सक्सेना, सुजाता सिंह, शाहीन खुश्बू आदि ने कलाम पेश किया। 


गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

श्रोता के तौर पर आसिफ़ उस्मानी की है ख़ास पहचान

                                                             

 आसिफ़ उस्मानी

                                                           -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

  मुशायरों का जिक्र होता है तो सबसे पहले यही बात होती है कि कौन-कौन शायर आए हैं या आ रहे हैं, या फिर किन शायरों ने अच्छे कलाम पेश किए, वगैरह..वगैरह। मगर, इन सबके साथ-साथ प्रयागराज में जब भी कहीं कोई मुशायरा होता है तो श्रोता के तौर पर एक नाम सबसे पहले याद किया जाता है। इनकी मौजूदगी में मुशायरा काफी दिलचस्प हो जाता है, क्योंकि शायरों के कलाम पेश करते ही ये साहब कोई न कोई दिलचस्प कमेंट कर देते हैं, जो सुनने वालों को भी काफी पसंद आता है। वह शख़्स हैं आसिफ़ उस्मानी। इनकी ख़ासियत यह है कि प्रयागराज में होने वाले लगभग हर मुशायरे में श्रोता के रूप में मौजूद रहते हैं और शुरू से आख़ीर तक मुशायरे का लुत्फ़ अपने ख़ास अंदाज़ में लेते हैं। आसिफ उस्मानी को इतना अधिक शौक़ है कि ये दूसरे शहरों में भी मुशायरा सुनने के लिए पहुंच जाते हैं। एक बार ये अलीगढ़ के मुशायरा में पहुंच गए थे, डाॅ. राहत इंदौरी की शायरी पर कमेंट करते ही राहत साहब ने इनको पहचान लिया और फिर बोले-‘आसिफ़ साहब जरा खड़े हो जाइए।’ उनके खड़े होने पर राहत इंदौरी से पूरे मजमे से तआरुफ़ कराते हुए इनके बारे में बताया, कहा कि जैसे मैं आल इंडिया मुशायरों का शायर हूं, उसी तरह आसिफ़ उस्मानी आल इंडिया मुशायरों के ‘हूटर’ हैं। मुनव्वर राना ने तो आसिफ उस्मानी पर एक ख़ास मज़मून ही लिख दिया है।

 आसिफ़ उस्मानी का जन्म 03 सितंबर 1955 को इलाहाबाद में हुआ। इनके पिता स्वर्गीय हाजी मोहम्मद उस्मानी गर्वमेंट इंटरमीडिएट काॅलेज में प्रधानाचार्य रहे हैं, मां स्वर्गीय कुलसुम बीवी कुशल गृहणिी थीं। आप दो भाई और चार बहने हैं। आपने कक्षा छह से नौ तक की पढ़ाई जीआईसी में की थी। कक्षा 10 से इंटरमीडिएट की पढ़ाई मजीदिया इस्लामिया इंटर काॅलेज से करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक किया, यहीं से लाॅ की पढ़ाई पूरी की। 1982 में रेलवे विभाग में आप अलीगढ़ में असिस्टेंट स्टेशन मास्टर हो गए। 1986 में इलाहाबाद डीआरएम आफिस में आ गए, यहीं से आप बतौर चीफ आफिस सुप्रीटेंडेंट सेवानिवृत्त हुए।

 आसिफ उस्मानी के पिता हाजी मोहम्मद उस्मानी उस्ताद शायर थे। जिसकी वजह से इनके घर जिगर मुरादाबादी, बलवंत सिंह, उपेंद्र नाथ अश्क, काजी अब्दुल सत्तार जैसे लोगों का आना-जाना रहा है। बचपन से ही इन लोगों की खिदमतगारी का मौका आसिफ उस्मानी को मिलता रहा है, जिसकी वजह से शायरी की समझ इनके अंदर भर गई थी। मुशायरा सुनने के शौक़ के बारे में इनका कहना है कि-‘शायर हमेशा अपनी शायरी में मौजूदा दौर की बात बड़े सलीक़े से करता है, जिन चीज़ों पर आम लोगों की नज़र नहीं होती उसका जिक्र अक्सर शायरी में मिल जाती है, इसलिए मुशायरा सुनना और समझना अच्छा लगता है।’ उनका कहना है कि शायरों के कलाम पर फौरन ही जवाब देने की वजह से लोगों और शायरों के बीच उनकी पहचान बन गई है। 

 कई बार तो मुशायरों में पहुंचने पर शायर यह पता लगाते हैं कि आज आसिफ़ उस्मानी आए हैं या नहीं। उनको इस बात की फिक्र रहती है कि कुछ गड़बड़ पढ़ने पर आसिफ़ ख़ामोश नहीं बैठेगा। आसिफ़ उस्मानी को तमाम शायरों के कई हजार अशआर याद है। किसी भी शायर का नाम लेते ही फौरन उसका कोई न कोई शेर पढ़कर सुना देत हैं। ‘खुद शायरी क्यों नहीं करते ?’ इस सवाल पर उनका कहना है कि मैं थोड़ी बहुत शायरी कर लेता हूं लेकिन स्टैंडर्ड शायरी नहीं कर पाता इसलिए अपने अंदर के शायर को बाहर लाने की कोशिश ही नहीं की, मुझे दूसरों को सुनने ही अच्छा लगता है। उनका कहना है कि उर्दू की तरक्की के लिए जावेद अख़्तर ने काफी काम किया है, पूरी दुनिया में अपनी शायरी के जरिए उर्दू की तर्जुमानी कर रहे हैं।

 (गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित )


शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च: 2021 अंक में

3. फोटो फीचर-(इन लोगों के हाथ में पहुंची गुफ़्तगू) 

4. संपादकीय (समाज के प्रति जागरूक होकर करें सृजन ) 

5-18. (ख़ास पेशकश) क्लासिकी ग़ज़ल की शेरिआत- शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी 

19-31. (ग़ज़लें) बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, मंज़र भोपाली, विज्ञान व्रत तलब जौनपुरी, देवी नागरानी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, अखिलेश निगम अखिल, डाॅ. राकेश तूफ़ान, नमिता राकेश, अरविंद असर, फ़रमूद इलाहाबादी, डाॅ. इम्तियाज़ समर, विजय प्रताप सिंह, सुमन ढींगरा, मूसा अशांत बाराबंकवी, चांद अकबराबादी, अशरफ़ अली, अना इलाहाबादी, डाॅ. अंजना सिंह सेंगर, डाॅ. सादिक़ देवबंदी, प्रकाश प्रियम, सीमा गर्ग मंजरी, बहर बनारसी, अंजलि सिफर

32-44. (कविताएं) कैलाश गौतम, सोम ठाकुर, यश मालवीय, अज़ीज़ जौहरी, शिशिर सोमवंशी, वंदना शर्मा, शिव कुमार, रीना मिश्रा, उषा लाल, अंजु कुमारी दास, रानी सिंह, सम्पदा मिश्रा, रचना सक्सेना, प्रदीप बहराइची, पूजा कुमारी रूही, नीना मोहन श्रीवास्तव, सोनल ओमर, डाॅ. पुनीत कुमार, कुंअर नाजुक, सुजाता सिंह, जक़ी तारिक बाराबंकवी 

45-50.(इंटरव्यू )आफ़ताब अजमेरी से अनिल मानव 

51-54. (चौपाल) आज का साहित्यकार अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहा है ? 

55-56. (खि़राज़-ए-अक़ीदत) शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी 

57-60. (तब्सेरा) लाॅकडाउन के 55 दिन, दिल्ली की सात कवयित्रियां, गुंचे, ग़ज़ल का सफ़र - अजीत शर्मा आकाश 
 
61-62. (उर्दू अदब) बतख़ मियां अंसारी, अक़ील रिज़वी- डाॅ. हसीन जीलानी 

63-64. (गुलशन-ए-इलाहाबाद) दुकान जी 

65-66. (रंगमंच) डाॅ. विधु खरे ने रंगमंच को ही बना लिया कैरियर- ऋतंधरा मिश्रा 

67-68. (ग़ाज़ीपुर के वीर) भोजपुरी के अमर गीतकार थे भोलानाथ गहमरी - शहाब खान गोड़सरवी 

69-72. अदबी ख़बरें 

73¬-104. परिशिष्ट-1: शहनाज़ फ़ातमी 

73. शहनाज़ फ़ातमी का परिचय

 74-75. स्त्री पीड़ा को विभक्त करने में माहिर- पद्मश्री उषा किरण खान

 76-78. डाॅ. शहनाज़ फ़ातमी का एक मुख़तसर ख़ाक़ा- शाइस्ता अंजुम 

79-81. शहनाज़ फ़ातमी का सृजन उल्लेखनीय- डाॅ. मीरा मिश्रा 

82-84. अतीत, वर्तमान और भविष्य पर नज़र - डाॅ. अमर कुमार सिंह 

85-104. शहनाज़ फ़ातमी के कलाम 

105-136. परिशिष्ट- 2: शगुफ़्ता रहमान ‘सोना’

 105. शगुफ़्ता रहमान ‘सोना’ का परिचय 

106-108. नारी अस्मिता के संघर्ष का साक्ष्य बनती कविताएं- प्रो. सुरेश चंद्र द्विवेदी 

109. गहन भावबोध की अभिव्यक्ति हैं शगुफ़्ता की कविताएं- डाॅ. शैलेष गुप्त वीर 

110. विभिन्न आयाम से रुबरु कराती हैं शगुफ़्ता- प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम्’ 

111-112. समाज की सच्चाई बयान करती कविताएं - शिवाजी यादव 

113-136. शगुफ़्ता रहमान ‘सोना’ की रचनाएं

मंगलवार, 26 जनवरी 2021

सरकारी-प्रशासनिक सेवा और रचनाकर्म

                                                

                                                                                                                                                                                   

रविनन्दन सिंह

                                                                         

   कविता मनुष्य का आदिम राग है। यह एक विशेष भावभूमि की मांग करती है। इसमें बुद्धि के आग्रह के स्थान पर हृदय की मुक्तावस्था की अपेक्षा अधिक होती है। आचार्य शुक्ल के अनुसार ‘कविता ही हृदय को प्रकृत दशा में लाती है और उसे मनुष्यत्व की उच्चभूमि पर ले जाती है।’ शुक्लजी इसे भावयोग की संज्ञा देते हैं और कहते हैं कि ‘भावयोग की सबसे उच्च कक्षा में पहुंचे हुए मनुष्य का जगत के साथ पूर्ण तादात्म्य हो जाता है, उसकी अलग भावसत्ता नहीं रह जाती, उसका हृदय विश्व-हृदय हो जाता है।’ अर्थात कविता मनुष्य को होने से बचाती है और उसके जमीर को ऊपर उठा देती है। ऐसा मन जो बुद्धि के सांसारिक प्रपंचो में उलझा हुआ है, प्रायः काव्य रचना की भावभूमि पर नहीं उतर पाता है। इसीलिए कवि प्रायः मस्तमौला किस्म के लोग होते हैं। उनकी बुद्धि सांसारिक अनुशासन को तोड़ती रहती है। ये अक्सर संसार के प्रति लापरवाह जीव होते हैं। इनकी दुनिया दीवानों और मस्तानों की दुनिया होती है। कबीर इस संबंध में कहते हैं कि-‘हमन हैं इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या। रहैं आजाद या जग में, हमन दुनिया से यारी क्या।’ अर्थात जो कवि होगा वह इश्क़ का मस्ताना होगा, होशियारी से दूर होगा, अनाड़ी किस्म का एक आज़ाद ख़्याल व्यक्ति होगा। भगवतीचरण वर्मा भी इसी दीवानेपन की ओर संकेत करते हैं कि-‘हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहां कल वहां चले। मस्ती का आलम साथ चला हम धूल उड़ाते जहां चले।’ कवियों-शायरों के इस दीवानेपन की चर्चा दुनिया की प्रत्येक भाषा-साहित्य में मौजूद है। यूनान का मशहूर दार्शनिक प्लेटो कवियों के बारे में कहता है कि वे सामान्य मनुष्य से अलग अजीब और अनोखे जीव होते हैं जो सामान्य अवस्था में न रहकर अक्सर भावातिरेक में रहते हैं। कवियों की असामान्यता के कारण वह कवियों को नगर-राज्य के बाहर रखना चाहता है। उसके अनुसार कवि की शक्ति अदृश्य प्रेरणा होती है और वह उसी प्रेरणा के वशीभूत होकर लिखते हैं। वह यह भी कहता है कि जो कवि भावानाओं के आवेग में नहीं बहता वह शक्तिहीन होता है। संस्कृत के आचार्य राजशेखर द्वारा की गई कवियों की तीन कोटियों-सारस्वत, अभ्यासिक तथा औपदेशिक-में सारस्वत कवि वही शक्तिशाली कवि होते हैं, जिनकी ओर प्लेटो ने संकेत किया है।

   भावयोग में अर्थात हृदय की मुक्तावस्था में रहने वाला कवि एक सामान्य मनुष्य से भावनाओं के स्तर पर अलग होता है, अलग तरह से सोचता है और उसकी भाषा भी अलग होती है। सरकारी अथवा प्रशासनिक सेवा एक बौद्धिक कर्म है, वहां भावयोग का अवकाश नहीं होता। भावयोग की प्रबलता में सरकारी सेवक कभी कभी अनर्थ कर देता है। एक ऐसे ही अनर्थ की एकाध बानगी यहां प्रस्तुत करना प्रासंगिक होगा। गुरु नानक प्रसिद्ध निर्गुण कवि हैं। ये भी सिकंदर लोदी के राज्यकाल में सरहिंद के सूबेदार बुलार पठान के यहां नौकरी शुरू की थी। किन्तु भावयोग के कारण सरकारी सेवा में मन नहीं लगा और छोड़ दिया। इनके पिता ने व्यवसाय के लिए कुछ धन दिया था, जिसे इन्होंने साधुओं की सेवा में लगा दिया और विरक्त हो गए। इसी तरह हिन्दी सहित्य के भक्तिकाल में सूरदास मदनमोहन नाम के एक प्रसिद्ध भक्त-कवि हुए हैं, जो संतकवि सूरदास से अलग थे, किन्तु भूलवश लोग इन्हें संतकवि सूरदास से जोड़ देते हैं। ये बादशाह अकबर के समय संडीला तहसील के अमीन थे। एक बार तहसील की मालगुजारी के कई लाख रुपये सरकारी खजाने में आए थे। इन्होंने सारा धन साधु-संतों की सेवा में खर्च कर दिया और शाही खजाने में कंकड़-पत्थरों से भरा संदूक भेज दिया और आधी रात को ही भाग गए। संदूक में एक कागज पर ये पंक्तियां लिखकर रख दिया-

                तेरह लाख संडीले आए, सब साधुन मिल गटके।

                सूरदास मदनमोहन अब आधी रात को सटके।

 बाद में बादशाह ने इन्हें क्षमा कर दिया था, किन्तु ये स्वयं विरक्त होकर वृंदावन चले गए। इनके अनेक पद गलती से संतकवि सूरदास के ग्रंथ ‘सूरसागर’ में मिल गए, जिन्हें बड़े प्रयास के बाद अब अलग किया जा सका है। इसी तरह रीतिकाल के प्रसिद्ध रीतिमुक्त कवि घनानंद बादशाह मुहम्मदशाह के दरबार में मीर मुंशी थे। एक बार दरबार में अपनी प्रेमिका सुजान को देखकर भावनाओं में बह गए। जब बादशाह के कहने पर अपना गान सुनाया तो उनकी पीठ बादशाह की ओर थी और मुंह सुजान की ओर था। इस बेअदबी से बादशाह नाराज हो गया और दरबार से निकाल दिया। ये मथुरा चले गए। जब नादिरशाह की सेना ने मथुरा पर आक्रमण किया तब कभी बादशाह का मीर मुंशी रहने के कारण सैनिकों ने इनका हाथ काट दिया। कुछ दिन दर्द सहते हुए इनकी मृत्यु हो गयी। खोजने पर इसी तरह के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जब भावयोग की दशा में सरकारी सेवकों ने अपना काम खुद बिगाड़ दिया।

  सरकारी कार्य भावना की जगह बौद्धिकता को महत्व देता है। वहां तर्क, बुद्धि और तथ्य की अपेक्षा होती है। वहां कल्पना की उड़ान के लिए कोई जगह नहीं है। वहां यथार्थ और वास्तविकता की दरकार है। सरकारी जगत के बौद्धिक एवं मानसिक अनुशासन में काल्पनिक उड़ान भरने वालों के पर कतर दिए जाते हैं और उसे एक विशेष जीवनशैली में ढाल दिया जाता है। सरकारी सेवा में जाने वाला एक संवेदनशील युवा धीरे-धीरे संवेदनहीनता की तरफ बढ़ने लगता है। समय के साथ धीरे धीरे उसके अंदर का फूल मुरझाने लगता है और उसकी जगह पत्थर अंकुरित होने लगतें है। समय के साथ उसके हृदय में फूल कम कंकड़ पत्थर अधिक एकत्र हो जाते हैं। अब वह जीवन भर इन पत्थरों का बोझ ढोने के लिए अभिशप्त हो जाता है। उसके अंदर धड़कने वाली संवेदना की मशाल धीरे-धीरे बुझती जाती है और उसे इसका पता भी नहीं चलता है। जो अपने प्रति बहुत संवेदनशील और जागरूक होते हैं, वही अपने अंदर होने वाले इस बदलाव को महसूस कर पाते हैं और खुद को बचा पाते हैं। अधिकांश युवा अपने अंदर धीरे-धीरे घटित होने वाले इस बदलाव से बेख़बर ही रहते हैं तथा कोल्हू के बैल की ज़िन्दगी जीने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं। उनकी मानसिक संरचना भी इस तरह की हो जाती है कि वो अपनी इस संवेदनहीनता को ही अपनी सफलता मान लेते हैं।

 वस्तुतः इस अनुशासित संवेदनहीनता और कविता के बीच बहुत बड़ा विरोधाभास है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि सरकारी सेवा में कविता के लिए न कोई जगह है और न ही उसका कोई महत्व है। जिस सेवा में अनुशासन का अनुपात जितना अधिक होता है, वहां कविता की संभावना उतनी ही कम होती है। इसी कारण सबसे अनुशासित रहने वाले रक्षा क्षेत्र या सैनिक-सेवा में कविता को पनपने के लिए कोई स्थान नहीं मिल पाता है। यही हाल पुलिस-सेवा का है, यद्यपि वहां अनुपातिक रूप में सेना से कम अनुशासन होता है, इसलिए पुलिस सेवा में कविता के लिए थोड़ा बहुत अवकाश मिल जाता है। अतः पुलिस सेवा में कुछ गिने चुने कवि मिल जाते है। उसमें भी वही सफल हो पाते हैं जो सेवा में रहते हुए अपने ज़मीर को बचा पाते हैं। सरकारी सेवा में रहते हुए जो व्यक्ति अपनी संवेदना को जीवित रख पाने में जितना सफल रहता है, उसमें कविता की संभावना उतनी ही अधिक होती है। साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां सरकारी सेवा में रहते हुए भी लोंगों ने बड़ा काव्य सृजन किया है और रचनाधर्मिता की बड़ी लकीर खींची है। ऐसे उदाहरण हर भाषा के साहित्य में मौजूद हैं। हिन्दी-उर्दू से ऐसे कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत करना प्रासंगिक होगा।

 एक ऐसा ही उदाहरण अमीर खुसरो का है। उन्हें खड़ी बोली हिन्दी और उर्दू का प्रस्थान बिन्दु माना जाता है। अमीर खुसरो ने बलबन से लेकर मुहम्मद तुगलक तक सात सुल्तानों के दरबार में विभिन्न भूमिकाओं में काम किया था। सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने उन्हें मुसहफदार ( पुस्तकालयाध्यक्ष और कुरान की शाही प्रति का रक्षक) नियुक्त किया तथा उनका वेतन 1200 टंका नियत किया था। सुल्तान गियासुद्दीन तुगलक के काल मे जब शाहजादा जूना खां ( बाद में मुहम्मद तुगलक) दक्षिण विजय पर गया तब अमीर खुसरो भी उसके साथ देवगिरि, वारंगल, राजमुंदरी तथा मदुरै की लड़ाइयों में शामिल थे। सुल्तान गियासुद्दीन तुगलक जब लखनौती के अभियान पर बंगाल गया, तब भी अमीर खुसरो उस अभियान में शामिल रहे। वे सुल्तानों की प्रशंसा में खूब कसीदे भी पढ़ा करते थे। किंतु आखिर में खुसरो झूठी कसीदागोई से ऊब गए थे। जबकि वास्तविकता यह है कि अमीर खुसरो सरकारी मुलाजमत से ऊब चुके थे। सरकारी सेवा में समझौता करते-करते उनका मन उचाट हो गया था। उनके अंतर्मन की व्यथा का अनुमान उनके इन शब्दों से लगाया जा सकता है - ‘मुझ जैसा ‘मिस्की’ (दीनहीन), हाजतमंद (दूसरों से अपेक्षा रखने वाला), बे सरो-सामान शख्स खौलती हुई देग के सामान तप रहा है। रात से सुबह तक, सुबह से शाम तक कुंठाओं और पीड़ाओं से घिरा होने के कारण चैन नहीं पाता। स्वार्थ के हाथों यह जिल्लत (तिरस्कार) उठाता हूं कि अपने जैसे एक आदमी के सामने अदब से खड़ा रहना पड़ता है, जब तक कि पाँव से सिर को खून नहीं चढ़ जाता। किसी के पारिश्रमिक से मेरा हाथ तर नहीं होता।‘ (खुसरो शनासी: तरक्की-ए-उर्दू बोर्ड, पृ.-25)। इसके बावजूद सरकारी नौकरी अमीर खुसरो की मजबूरी थी, आजीविका थी तथा आर्थिक सुरक्षा थी। सुल्तानों की सेवा में रहते हुए भी उन्होंने बहुत काव्य सृजन किया। उन्होंने रचनाधर्मिता की इतनी बड़ी लकीर खींची कि वह साहित्य के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया। अल्लामा शिबली नुमानी कहते हैं कि -‘आज तक इस दर्जे का जामे-कमालात (उत्कृष्टता वाला) पैदा नहीं हुआ।.....फिरदौसी, सादी, अनवरी, अर्फी, नजीरी बेशुबहा अकलीमी सुखन के बादशाह हैं लेकिन उनकी सीमा एक अकलाम से आगे नहीं बढ़ती। फिरदौसी मसनवी से आगे नहीं बढ़ सकते, सादी कसीदे को हाथ नहीं लगा सकते, अनवरी मसनवी और ग़ज़ल को छू नहीं सकते। हाफ़िज़, उर्फी, नज़ीरी ग़ज़ल के दायरे से बाहर नहीं निकलते। लेकिन अमीर खुसरो की साहित्यिक सत्ता में ग़ज़ल, रुबाई, कसीदा और मसनवी सब कुछ दाखिल है।’ जामी के अनुसार उन्होंने लगभग 99 कृतियों की रचना की है, अमीर राजी यह संख्या 199 बताते हैं। उनका समकालीन इतिहासकार बरनी अपने ‘तारीख-ए-फिरोजशाहीश् नामक ग्रंथ में कहता है कि खुसरो की इतनी रचनाएं हैं कि एक पुस्तकालय बन जाए। इनमें से अभी केवल 45 पुस्तकें ही प्राप्त हो सकीं हैं। वे स्वयं कहते हैं कि जितना उन्होंने फारसी में लिखा है उतना ही हिन्दवी में लिखा। इनमें तुगलकनाम, नुह-सिपहर, हालात-के-कन्हैया, तराना-ए-हिन्दी, मजनू लैला, हस्त बहिश्त आदि महत्वपूर्ण फारसी रचनाओं के साथ हिंदवी में अनेक गीत, गजल, मुकरियां, पहेलियाँ, लोक गीत आदि मौजूद हैं।’

  इसी तरह सरकारी सेवा करते हुए अब्दुर्रहीम खानखाना अथवा रहीमदास ने बहुत काव्य सृजन किया। वे बादशाह अकबर के नवरत्न तथा प्रमुख सेनापति थे। उन्होंने अनेक युद्धों में सेनापति के रूप में वीरता का प्रदर्शन करते हुए मुगल सेना को विजय दिलाया था। गुजरात में मुजफ्फर खां के विद्रोह को दबाकर पुनः गुजरात विजय करने के लिए ही बादशाह अकबर ने उन्हें ‘खानखाना8 की उपाधि प्रदान की थी। बादशाह ने विभिन्न अवधियों के लिए उन्हें गुजरात, जौनपुर, रणथंभौर, मुल्तान आदि सूबों की सूबेदारी भी प्रदान की थी। जितनी धारदार उनकी तलवार थी, उतनी ही धारदार उनकी कलम थी। मुगल दरबार में बड़े प्रशासनिक पदों पर रहते हुए उन्होंने अनेक कृतियों का सृजन किया है, जिसमें दोहे, सोरठा, बरवै, नायिका भेद, मदनाष्टक, रासपंचाध्यायी, नगर शोभा आदि प्रमुख हैं। विशेष रूप से दोहा के क्षेत्र में उन्हें अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

  कालांतर में हिंदी साहित्य में शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ (स्कूल इंस्पेक्टर), राजा लक्ष्मण सिंह (तहसीलदार), राधाचरण गोस्वामी (म्युनिसिपल कमिश्नर), जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ (अबागढ़ स्टेट में कोषाधिकारी), सरदार पूर्णसिंह (ब्रिटिश फारेस्ट इंस्टीट्यूट में केमिस्ट), आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (रेलवे तार-इंस्पेक्टर), लाला सीताराम ‘भूप’ (डिप्टी कलेक्टर), मुंशी प्रेमचंद (स्कूल सब इंस्पेक्टर) बाबू गुलाबराय (छतरपुर राज्य में दीवान, मुख्य न्यायाधीश), पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी (शिक्षा विभाग में विशेष कार्याधिकारी), गिरिजाकुमार माथुर (आकाशवाणी में उप निदेशक आगे उप महानिदेशक), धूमिल (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में अनुदेशक, पर्यवेक्षक) आदि अनेक रचनाकार हैं, जो अपने समय में सरकारी दायित्वों का निर्वाह करते हुए साहित्य-सेवा में रत रहे।

  उर्दू साहित्य में जिन रचनाकारों ने विभिन्न विभागों में भिन्न भिन्न पदों पर कार्य किया उनमें सैयद अहमद खान ( ईस्ट इंडिया कम्पनी में लिपिक से उप न्यायाधीश तक), अकबर इलाहाबादी (आरम्भ में रेलवे में नौकरी, फिर मुख्तार, नायब तहसीलदार, मुंसिफ एवं जिला न्यायाधीश), अल्लामा शिबली नुमानी (दीवानी में अमीन), अब्दुल हलीम ‘शरर’ (शिक्षा विभाग, हैदराबाद में डिप्टी कंट्रोलर), मिर्जा मुहम्मद हादी ‘रुसवा’ (रेलवे में ओवरसियर), सफी लखनवी (दीवानी में पेशकार), फ़ैज़ अहमद ‘फै़ज़’ (सेना के सूचना विभाग में पांच वर्ष तक नौकरी), राजेंद्र सिंह बेदी (पोस्ट ऑफिस में फिर आकशवाणी में विभिन्न पदों पर, रेडियो कश्मीर के डायरेक्टर पद से अवकाश) आदि रचनाकार विशेष उल्लेखनीय हैं।

  हिन्दी तथा उर्दू साहित्य में इसके बाद भी अनेक रचनाकारों ने अपनी लेखनी से अपनी पहचान बनायी है। कई तो ज्ञानपीठ सम्मान से भी सम्मानित हुए हैं। ऐसे रचनाकारों की संख्या कम नहीं है किन्तु उनका नाम गिनाने का अवकाश नहीं है। वर्तमान में अनेक रचनाकार सरकारी सेवा में रहते हुए विभिन्न शैलियों में लिख-पढ़ रहे हैं। सरकारी सेवा में रहते हुए साहित्य सृजन करना आसान कार्य नहीं है। यह दूधारी तलवार चलाने जैसा है, जिसमें स्वयं घायल होने का खतरा है। ‘गुफ्तगू पत्रिका’ का यह अंक ऐसे ही रचनाकारों को समर्पित है, जो सरकारी-प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए शायरी में भी बड़ी लकीर खींच रहे हैं। इन्हें सहेजने और प्रकाशित करने का कार्य करके गुफ़्तगू परिवार ने गुरुतर दायित्व का निर्वाह किया है। इसके लिए चयनित रचनाकारों तथा पूरे गुफ़्तगू परिवार को हार्दिक बधाई ज्ञापित करता हूं।

( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2020 अंक में प्रकाशित )                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    


मंगलवार, 19 जनवरी 2021

उर्दू पत्रकारिता के नामवर सहाफी थे हारुन रशीद

                                                     

हारुन रशीद

                                                            - शहाब खान गोड़सरावी                                       

 सहाफ़त की दुनिया के सुप्रसिद्ध पत्रकार हारुन रशीद अलीग का जन्म 31 मई सन. 1942 ई. को मुंबई में हुआ। इनका पैतृक गांव उसिया है। इनके पिता इस्माईल खान मुंबई में टैक्सी ड्राइवर थे, माता हिफाजत बीबी जो नेक घरेलू खातून थी। हारून रशीद का गांव की तुलना में मुंबई में ज्यादा रहना हुआ। हारून रशीद श्अलीगश् के पिता समाजसेवी ईस्माईल खां ने क्षेत्रिय बच्चों की शिक्षा के लिए श्कमसार हॉस्टलश् के रूप में सन.1962 ई० को दिलदारनगर मे श्हाजी लॉजश् का निर्माण कराया। लम्बे ऊंचे कद के गोल मुखड़े में साधारण सा दिखने वाले हारुन रशीद को बचपन से नेक स्वभाव से जाना जाता था। जैनुल आबेदीन के मुताबिक  1960 ई. में हारून रशीद कक्षा चार की पढ़ाई गिरगांव, मुंबई के चैपाटी म्युनिसिपल स्कूल से पूरा करने के बाद पांचवीं की पढ़ाई के लिए मुंबई के अंजुमन इस्लाम बॉयज वींटी. हाईस्कूल में दाखिले के लिए गए तो उस स्कूल के प्रिंसिपल ने उनका दाखिला करना से मना कर दिया, उन्होंने कहा कि आपके पिता इस कॉलेज की फीस नहीं दे पाएंगे। वे रोते हुए वीटी काॅलेज से चरनी रोड के रास्ते घर वापस लौट रहे थे, तभी एक अजनबी की नज़र उन पर पड़ी। उस अजनबी ने बच्चे को रोते हुए देखकर रोने की वजह पूछी, और फिर अपनी कार मंे उन्हे बिठा उस स्कूल के रजिस्टार के दफ्तर पहुंचे, और उनका दाखिला कराया। 

 वीटी कॉलेज से मैट्रीक करने के बाद सन.1964 ई. मे कक्षा-11 वीं के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मे प्रवेश लिया। वहां से इंटरमीडिएट और ग्रेजुएशन के बाद उर्दू से एम.फिल. की डिग्री हासिल की। हारुन रशीद की समाज सेवा, लेखन के साथ-साथ खेलकूद में खास दिलचस्पी थी। वो अक्सर फ्री समय में क्रिकेट खेलना पसंद करते थे। इंडो-पाक के क्रिकेट मैच में उनकी खासी दिलचस्पी थी। अलीगढ़ पढ़ाई के दरमियान ही हारून रशीद अलीग को सन. 1964-70 ई. तक हर वर्ष बेहतरीन तकरीर के लिए पुरस्कृत किया गया था। पढ़ाई के दरम्यान उनकी शादी अंजुमन इस्लाह मुस्लिम राजपूत कमसारोबार एवं गंगापार कमेटी के संस्थापक खान बहादुर मंसूर अली के परिवार में हाजी मसिहुजम्मा उर्फ जंगा खां की छोटी लड़की रिफत जहां से हुई। पढ़ाई पूरी करने के बाद हारून रशीद रोजी रोटी की तलाश में लग गए। मुंबई में कई छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरियां की, लेकिन कहीं मन नहीं लगा, आखिर में उनका लिखने पढ़ने का हुनर काम आया और वो 1965-70 के बीच छोटे बड़े पत्र पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया। उनके मज़ामीन उर्दू टाइम्स, अखबारे-नौ, उर्दू ब्लिट्ज और उर्दू इंक़लाब में छपे, जिन्हें कई संपादको के द्वारा सराहा गया। उर्दू ज़बान-व-अदब पर उन्होंने ऐसी महारत हासिल की थी कि देखते ही देखते उन्हें मुंबई के साथ-साथ हैदराबाद, लखनऊ जैसे बड़े शहरों के उर्दू अख़बार और रसालों मे भी उनके मज़ामीन छपने लगे। उन्होंने अपने मज़ामीन के जरिए एक आज़ाद सहाफी के रूप मे समाज के बीच एक अच्छी पहचान बनाई। इनकी स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए महाराष्ट्र उर्दू-अकादमी द्वारा सन् 1980 ई० में पुरस्कृत हुए। सन् 1977 ई. मे मशहूर शायर हसन कमाल से इनकी पहली मुलाकात हुई और उर्दू बिल्टज मे बतौर सहाफी काम करना शुरू किया और 1979 ई. मे हारून रशीद अलीग साप्ताहिक उर्दू बिल्टज के संपादक बनाए गए। सन् 1995 के बाद उन्होने रोजनामा इन्क़लाब मे ‘खेल की दुनिया’ और ‘आलम-ए-इस्लाम’ व ‘कलम पे वॉर’ नामक बेहतरीन कालम लिखतेे और अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत इन्क़लाब के शुरुआती दौर में ही अव्वल दर्जे का उर्दू अख़बार बना दिया। इनकी स्पोर्ट्स कॉलम करंजिया हॉउस मुंबई से ब्लिट्ज, इन्क़लाब के उर्दू, हिंदी, इंग्लिश तीनों अख़बारों में छपती। जिसे देखते हुए करंजिया ग्रुप ऑफ न्यूज पेपर के संस्थापक आरक करंजिया हारुन रशीद से काफी प्रसन्न थे, उन्हें अपने बेटे की तरह मानते थे। जिसकी वजह से पांच वर्षो तक बतौर रोजनामा इन्क़लाब मे संपादक बने रहे।

 हारून रशीद अक्सर कमसार-व-बार इलाके के अंजुमन इस्लाहिया कमेटी के प्रोग्राम में शिरकत कर बतौर निजामत करते। सन् 1993 ई. मे बाबरी मस्जिद केस के दरमियान हिंदू-मुस्लिम भाईचारा को बनाये रखने के लिए वो सामने आए, जिसका नतीजा ये हुआ कि मुंबई ठाकुरद्वार स्थित मकान को दंगे मे जला दिया गया। सैकड़ों किताबों से भरी जिं़दगी की सारी मेहनत-मशकत की कमाई को पूरी लाइब्रेरी जलकर खाक हो गई। उनकी जब तक सांसे चली तब तक कौमी एकता के लिए काम किये और वो भी दिन आया जो अपनी तीन बच्चियों और एक बच्चे को छोड़कर 4 मार्च सन. 2000 ई. को दुनिया को अलविदा कह गये। उनकी मिट्टी उनके कहे के मुताबिक पैतृक गांव उसिया सतहवा मोहल्ला कब्रिस्तान में दफन की गई। गौरतलब हो कि हारुन रशीद की बेटी पत्रकार हुमा हारून जो ‘बीबीसी’ लंदन में बतौर एंकर रह चुकी है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित) 


सोमवार, 11 जनवरी 2021

गुफ़्तगू पत्रिका से ज्यादा आंदोलन है : पवन कुमार

पवन कुमार

    पवन कुमार का जन्म मैनपुरी में हुआ। आरंभिक पढ़ाई कई शहरों में हुई। पिता जी पुलिस सेवा में थे, तो लगातार तबादलों के दरमियां कभी इस शहर, कभी उस शहर कयाम बदलता रहा। कभी इस कस्बे की आबो-हवा से रब्तगी की, तब तक अगली पोस्टिंग का फरमान आ गया गया। लेकिन इन्होंने तबादलों को इन तब्दीलियों से बहुत कुछ सीखा। लोगों से समन्वय, संवाद, संबंध स्थापित करने में यह काफी सहायक साबित हुआ। साइंस से ग्रेजुएट करने के बाद लॉ किया। पहले ही प्रयास में प्रांतीय सिविल सेवा में चयन हो गया। कुछ साल प्रांतीय सिविल सेवा में बिताने के पश्चात भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रयास किया और वहां भी सिलेक्शन हो गया। वर्तमान में उत्तर प्रदेश संवर्ग में हैं। अनिल मानव से उनसे बातचीत की, प्रस्तुत उसके प्रमुख भाग।

सवाल: वर्तमान समय में ग़ज़ल का क्या भविष्य है ?

जवाब: साहित्य जिन्दा है और हमेशा जिन्दा रहेगा। साहित्य आदमी को सोचने का तरीका देता है। सोचने का एक जरिया है। और इसी साहित्य की एक विधा ग़ज़ल भी है। आप देखेंगे, कि आज से तकरीबन सात-आठ सौ साल पहले अमीर खुसरो से ग़ज़ल शुरू हुई और दुनिया के अलग-अलग भाषाओं और मुल्कों में ग़ज़ल की शायरी हो रही है। इन 700 सालों में जो ग़ज़ल का मेयार है, वो मीर से, ग़ालिब से, शौक से और बाद में जो प्रोग्रेसिव राइटर्स मजाज, साहिर लुधियानवी लुधियानवी, फ़िराक़ गोरखपुरी, बशीर बद्र साहब, कृष्ण बिहारी नूर और इसके बाद भी जो हमारी नयी पौध है, वहां तक इसका पूरा जलवा बरकरार है। और मैं समझता हूं कि आने वाले समय में ग़ज़ल की जो खूबसूरती है, उसकी गेयता के कारण, उसकी छंदबद्धता के कारण, उसकी लयबद्धता के कारण, हमेशा-हमेशा बनी रहेगी।


सवाल: साहित्य में आपका रुझान कब, क्यों और कैसे हुआ?

जवाब: साहित्य की तरफ रुझान बचपन से ही था। हमारे खानदान में हालांकि कोई लेखक तो नहीं था, लेकिन अध्ययन का माहौल था। धार्मिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, वैचारिक पुस्तकें पढ़ने का माहौल था। विशेषतया ननिहाल पक्ष से मुझे इस तरह की किताबों को पढ़ने और बौद्धिक चर्चाओं से जुड़ने का अवसर प्राप्त होता रहा। कॉलेज के दिनों में लेखन की ओर मुड़ा। अख़बारों और पत्रिकाओं में लेख वगैरह प्रकाशित होने शुरू हुए। यह सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक कि मैं नौकरी में नहीं आ गया। नौकरी में आने के बाद लेख वगैरह लिखने कम हो गए। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और साहित्यिक विषयों पर लेखन कार्य फिर भी चलता रहा। बाद में कविताओं की ओर विशेषतया उर्दू शायरी से जुड़ाव हुआ। बरेली की पोस्टिंग के दौरान कई अदीबों और शायरों से मिलना-जुलना हुआ। वसीम बरेलवी, कमलेश भट्ट कमल, अकील नोमानी, वीरेन डंगवाल, सुधीर विद्यार्थी, गोपाल द्विवेदी, बी.आर. विप्लवी जैसे अदीबों से उठना-बैठना होता था। इनकी सोहबत का असर यह हुआ, कि ग़ज़ल की तरफ मेरे कदम बढ़ते गए। बाद में अक़ील नोमानी से ग़ज़ल की बारीकियां सीखीं। मैं बाद में जब बदायूं में जिलाधिकारी के पद पर तैनात हुआ, तो मुंतखब अहमद जिन्हें नूर ककरालवी के नाम से जाना जाता है, उनसे भी बहुत कुछ सीखने का मौका मिला।

सवाल: प्रशासनिक सेवा में रहते हुए, आप अदब के लिए समय कैसे निकालते हैं?

जवाब: हालांकि प्रशासन में रहते हुए अदब के लिए समय निकालना थोड़ा मुश्किल होता है, किंतु एक संवेदनशील आदमी उठते-बैठते, चलते-फिरते जो देखता है, समझता है उस पर विचार करता है। यही विचार जब कागज़ पर उतरते हैं, तो वह शेर, ग़ज़ल, कविता, लेख आदि का रूप इख़्तियार कर लेते हैं। यही मेरे साथ भी होता है। प्रशासन है क्या, इंसानी जज़्बातों को समझने, उनकी फिक्र से जुड़ने का जरिया ही तो है, मैं इसे इसी तरह लेता हूं। इन्हीं का इज्हार ही मेरा लेखन है।

सवाल: साहित्य प्रशासन के लिए किस-प्रकार मददगार साबित हो सकता है ?

जवाब: बड़ा ही महत्वपूर्ण सवाल आपने पूछ है। प्रशासन और साहित्य का रिश्ता बहुत अहम है। दरअस्ल प्रशासक किसी भी ओहदे पे हो पहले तो वो इंसान ही है। इंसानी एहसास और इंसानी तकाज़ों की समझ अगर प्रशासक को हो तो वेलफेयर स्टेट की अवधारणा खुद ही मआनीखेज हो जाती है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो साहित्यकार भी रहे और प्रशासन में भी रहे, और दोनों सिम्त उनकी शख़्सियत कमाल रही। मेरा सुझाव यही है कि प्रशासनिक ही क्या अन्य सेवाओं से जुड़े हुए लोग भी अच्छा सृजन कर रहे हैं।

सवाल: वर्तमान समय के सबसे महत्वपूर्ण शायर आप किन्हें मानते हैं?

जवाब: देखिए, इतनी बड़ी लिस्ट है और ग़ज़ल को होते-होते सात सौ साल गुजर गए हैं, तो जाहिर है, कि कभी कोई शेर पसंद आता है, तो कभी शायर पसंद आता है। ग़ज़ल का जो दयार है, दरबार है, यह इतना समृद्ध है, कि किसी एक का नाम लेना तो मुश्किल है, लेकिन फिर भी यदि क्लासिकल शायरों की बात की जाये, तो मीर, ग़ालिब, जा़ैक़, फ़िराक़ आदि वो शायर हैं, जिनको पढ़कर आप समझ सकते हैं, कि हमारी शायरी कितनी समृद्ध है।

सवाल: गुफ़्तगू पत्रिका को तकरीबन आप शुरू से देख रहे हैं, क्या कहना चाहेंगे इसके बारे में ?

जवाब: गुफ़्तगू एक पत्रिका से ज्यादा आंदोलन है। मौजूद वक़्त में जब ज्यादातर मैगजीन्स बन्द हो रही हैं, आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं, ऐसे में गुफ़्तगू एक आंदोलन के रूप में बढ़ती चली जा रही है। मेयार को बरकरार रखते हुए मुसलसल छपते रहने की चुनौती का कामयाबी के साथ सामना करने के लिए गुफ़्तगू परिवार मुबारकबाद का मुस्तहक है। ग़ाज़ी साहब और उनकी पूरी टीम को दिली मुबारकबाद!

सवाल: नई पीढ़ी तो कविता या शेर को सोशल मीडिया पर पब्लिश करके वाह-वाही पा लेने को ही कामयाबी मानती है, आप इसे किस रूप में देखते हैं?

जवाब: निश्चित रूप से सोशल मीडिया ने नये लेखकों को एक आसान प्लेटफार्म उपलब्ध कराया है, जहां वे खुलकर अपने आपको और अपनी रचनाओं को प्रस्तुत कर सकते हैं। किसी गॉडफादर की ज़रूरत नहीं। किसी बैकग्राउंड की आवश्यकता नहीं। लेकिन इसका नुकसान भी बहुत हुआ है, जल्दबाजी के चक्कर मे बहुत कुछ अधपका और अधकचरा परोसा जा रहा है। लोग कुछ भी लिखकर पोस्ट कर रहे हैं जो कई बार अदब की बुनियादी चीज़ों से भी बहुत दूर होते हैं। विधाओं की टेक्निक समझे बगैर सिर्फ़ लिखना और पोस्ट कर देना ही उनकी प्राथमिकता हो जाती है। प्रशंसकों के लाइक्स भी मिल जाते हैं। मेरी राय यह है कि सोशल मीडिया के दोनों पक्ष हैं, जिन्हें समझने की ज़रूरत है।

सवाल: आजकल आपका कौन-सा सृजन-कार्य और अध्ययन चल रहा है?

जवाब: मेरा लिखना पढ़ना तो लगातार चलता ही रहता है। आजकल जो लॉकडाउन का पीरियड था, इसमें ऑफिस के अलावा जब टाइम मिलता है, तो आप अपने शौक पूरे करते हैं। बीते दिनों में मैंने बहुत सारी नोबेल अपनी खत्म की हैं। कई ऐसी नई चीजें भी सामने आई हैं, जिन्हें पढ़ने का मौका मिला है। इधर कई नये-नये शायरों की बहुत खूबसूरत-सी किताबें छपी हैं जैसे-महेंद्र कुमार ‘फानी’, अभिषेक शुक्ला आदि ऐसे कई शायर हैं, जो हम तक पहुंचे हैं और हम उसे पढ़ रहे हैं, आनंद उठा रहे हैं और देख रहे हैं कि किस प्रकार की तब्दीलियां शायरी शायरी और साहित्य में आती हैं।

सवाल: शायरी के लिए उस्ताद का होना, कितना जरूरी मानते हैं आप?

जवाब: शायरी एक ऐसा फन है, जो बिना उस्ताद के मुकम्मल होना बड़ा मुश्किल होता है। उस्ताद और शागिर्द की जो उर्दू ग़ज़ल की परंपरा है, ये बहुत ही खूबसूरत चीज़ है। मुझे याद आता है, कि चकबस्त ब्रजनारायण साहब जो बड़े शायर हैं, उन्होंने कहा है-

अदब ताश्लीम का जौहर है जेवर है जवानी का

वही शागिर्द हैं जो खि़दमत-ए-उस्ताद करते हैं।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2020 अंक में प्रकाशित )