बुधवार, 15 सितंबर 2021

हिन्दी भाषा के लिए अतुलनीय प्रयास

                                        - अजीत शर्मा ’आकाश’


   

माननीय उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कीर्तिशेष न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी ने अपने न्यायिक कार्यकाल में लगभग 5,000 निर्णय एवं आदेश हिन्दी भाषा में दिये, जो आज एक कीर्तिमान बन गया है। ‘पावन स्मृतियां’ शीर्षक पुस्तक उन्हीं के सुपुत्र माननीय न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने उनके 90 वें जन्म दिवस 30 सितम्बर, 2020 के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत की है। पुस्तक में प्राक्कथन के अंतर्गत लेखक ने न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी के जीवन, शिक्षा एवं न्यायिक क्षेत्र में उनके द्वारा मातृभाषा हिन्दी को प्रतिष्ठित किये जाने एवं गरिमापूर्ण स्थान दिलाये जाने के विषय में सविस्तार प्रकाश डाला है। पुस्तक में बताया गया है कि वकालत से न्यायिक सेवा प्रारम्भ करने वाले उनके पिताश्री ने अपीलीय ट्राइल एवं वादों में अपना पक्ष हिन्दी भाषा में रखा, जिससे वादकारी यह जान सके कि उसके अधिवक्ता द्वारा उसके वाद को ठीक से प्रस्तुत किया गया है। न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी मानते थे कि जनता को न्याय जनभाषा में नहीं मिलता है। आज भी उच्च न्यायालय में अंग्रेजी का बोलबाला है और इस कारण समाज में वर्गभेद स्थापित हो रहा है। अत : वे मातृभाषा हिन्दी में ही बहस की अनुमति लेकर न्यायिक कार्य सम्पन्न करते थे। मातृभाषा हिन्दी के प्रति उनका यह अगाध प्रेम 1992 में उनकी सेवानिवृत्ति और उसके पश्चात् भी जीवन भर बना रहा। वर्ष 1993 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा उन्हें ‘हिन्दी गौरव’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं की अभिवृद्धि के लिए उन्होंने वर्ष 1993 में ‘इटावा हिन्दी सेवा निधि’ संस्था स्थापित की। 

  इस पुस्तक के लेखक विद्वान् न्यायमूर्ति अशोक कुमार को भी हिन्दी के प्रति निष्ठा अपने पिताश्री से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुई। इसी का परिणाम रहा कि उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश का पदभार ग्रहण कर अपना प्रथम निर्णय हिन्दी में लिखवाकर एवं अपने कार्यकाल का अन्तिम आदेश भी हिन्दी में पारित कर अपने पिताश्री को श्रद्धांजलि अर्पित की। मात्र यही नहीं, अपने कार्यकाल में जब भी सम्भव हो सका तब उन्होंने हिन्दी में निर्णय एवं आदेश पारित किये। पुस्तक को दो खंडों में विभक्त किया गया है। प्रथम खंड में लेखक द्वारा अपने कार्यकाल में दिये गये लगभग 32 न्यायिक निर्णय एवं द्वितीय खंड में लगभग 26 न्यायिक आदेशों का संकलन है। न्यायिक कार्यों में हिन्दी का प्रयोग करके अपनी मातृभाषा की सेवा के साथ ही जन-जन तक न्याय पहुंचाने की दिशा में किया गया उनका यह अभिनव प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय एवं स्वागतयोग्य है। पुस्तक के अन्त में कीर्तिशेष न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी की स्मृतियां संजोए हुए कुछ छायाचित्र एवं लेखक के न्यायिक कार्यकाल की स्मृतियाँ एवं कुछ पारिवारिक छायाचित्र भी संकलित हैं। पुस्तक का मुद्रण एवं प्रकाशन उच्च कोटि का है। 202 पेज की इस पुस्तक को माडर्न लॉ हाउस प्रा.लि. इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है, 

 

 देशप्रेम का रंग लिए अच्छी बाल-कविताएं


  

अच्छा बाल-साहित्य बच्चों के मानसिक विकास के लिए नितान्त आवश्यक है। यह बच्चों से सीधा संवाद स्थापित करने की विधा है। साधारणतः यह धारणा है कि बच्चों के लिए लिखना सहज कार्य है। लेकिन ऐसा नहीं है। इसके लिए स्वयं को बच्चों के मानसिक स्तर पर लाना होता है, तभी यह सृजन नन्हें बालकों को प्रेरित करता है। वरिष्ठ कवयित्री विजयलक्ष्मी ‘विभा‘ अपनी अन्य विधाओं की अपनी कृतियों के साथ ही बाल साहित्य के सृजन में भी उतनी ही सक्रिय हैं। अपने बालगीत संग्रह ‘हम हैं देश के पहरेदार’ के माध्यम से उन्होंने बच्चों को उनके परिवेश, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, संस्कारों, जीवन मूल्यों, आचार-विचार एवं व्यवहार के प्रति सतत् चेतन बनाने का प्रयास किया है। प्रस्तुत संग्रह में 32 बाल कविताएं संकलित हैं। प्रायः सभी रचनाएं देशभक्ति का स्वर लिए हुए हैं, साथ ही विविध मानवीय मूल्यों से युक्त भी हैं। इनमें रोचकता एवं मनोरंजकता का भी ध्यान रखा गया है, जिससे रचनाएं बोझिल न होने पायें। प्रस्तुत हैं इस बाल गीत संग्रह की कुछ रचनाओं के उल्लेखनीय अंशः- संग्रह की पहली रचना ‘भारत सबसे प्यारा है’ देशप्रेम की अच्छी कविता है एवं बच्चों के मन में देशभक्ति का भाव जाग्रत करने में सक्षम है- नील गगन के तारों में/सबसे उज्ज्वल ध्रुवतारा है/धरती के तारों में अपना/भारत सबसे प्यारा है।’ इस कविता में सम्पूर्ण मानवजाति के कल्याण की कामना की गयी है-‘सुख, शांति और खुशहाली हो/हर मुख पर मुखरित लाली हो।’ इनके अतिरिक्त हरदम हैं तैयार, तसवीर बनायें, मणि मुक्ता सा मन है, चांद सूरज वाला, इंसाफ कर, हम हैं अपने स्वयं प्रणेता आदि कविताएं भी उल्लेखनीय हैं। संग्रह की रचनाएं छन्दबद्ध, गेय एवं बाल-पाठकों को देशभक्ति के रंग में रंगने में सक्षम हैं। यह कविताएं बच्चों में अपनी जन्मभूमि, अपने देश, प्रकृति व पर्यावरण के प्रति रुचि जाग्रत करती हैं। कुल मिलाकर श्रेष्ठ बाल-कविताओं का संग्रह ‘हम हैं देश के पहरेदार’ बच्चों के लिए उपादेय होगा एवं बाल-मन को भायेगा, ऐसी आशा है। बाल-साहित्य के सृजन में कवयित्री का यह योगदान सराहनीय है। इस पुस्तक को गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 50 रुपये है।


 ग़ज़ल लेखन का सराहनीय प्रयास


 

ग़ज़ल आज हिन्दी साहित्य में भी एक लोकप्रिय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। इसका शिल्प एवं इसके व्याकरण की समझ रखने वाले कुछ ग़ज़लकार इस विधा को और ऊंचाइयां प्रदान कर रहे हैं। लेकिन, ध्यातव्य है कि ग़ज़ल का एक विशेष अनुशासन एवं व्याकरण है, जिसका पालन किया जाना गजल-लेखन के लिए अनिवार्य होता है। रामावतार सागर का ग़ज़ल संग्रह ‘निगाहों में बसा सावन’ अपनी कुछ खूबियों के साथ ही कुछ कमियां भी समेटे हुए है। ग़ज़ल संग्रह से चयनित किये गये अशआर इसके साक्षी है। उदाहरणार्थ-आज के नेताओं की सियासत बयान करते हुए ये अश्आर- ‘वोट देकर जिताया था हमने जिसे/वो भी निकला नहीं है खरा आदमी। तुझे बस काम है वोटों से मेरे/तेरा वादा तो हर झूठा रहा है।’ आम आदमी की पीड़ा का चित्रण- ‘होगा गुजारा कैसे ये सोचना हमारा/राशन ख़त्म है सारा और इक माह बिताना। रोटियां फाकाकशों से दूर हैं/ अब ये दिन कैसे गुजारे जाएंगे।’ संग्रह की कई ग़ज़लें बे-बह्र हैं। स्थान-स्थान पर शे‘रों में रवानी की कमी खटकती है। अधिकतर शे‘र शब्दों के गठजोड़ के रूप में सामने आते हैं। ग़ज़लकार ने अच्छी ग़ज़लें कहने की भरसक कोशिश की है। इसके अतिरिक्त ख़्यालों, तर्जुबे, फिकर, रोड़, होंसले, जैसे अशुद्ध शब्दों का प्रयोग ग़ज़ल के सौन्दर्य एवं कथ्य को बाधित करता है। मात्रा पूर्ति के लिए ‘न’ के स्थान पर ‘ना’ का प्रयोग उचित नहीं। फिर भी, ग़ज़ल-लेखन के क्षेत्र में इसे रचनाकार का एक सराहनीय प्रयास कहा जा सकता है। आशा है कि गजलकार का अगला संग्रह ग़ज़ल के शिल्प एवं व्याकरण को दृष्टिगत रखते हुए और बेहतर होगा। 80 पेज की इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 100 रुपये है।


 मनोभावों की सहज अभिव्यक्त करतीं कविताएं



 देश भर की महिला रचनाकारों की सोच, उनके मनोभाव एवं उद्गारों को व्यक्त करता हुआ देश की 11 कवयित्रियां काव्य संकलन का प्रकाशन एक सार्थक एवं सराहनीय प्रयास है। अधिकतर रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों एवं अनर्गल परम्पराओं के विरूद्ध संघर्ष छेड़ते हुए समाज को एक नई दिशा देने का प्रयास किया है।  राजकांता राज की महिला सशक्तीकरण की रचना- ‘मत समझो मैं बेचारी हूं/मैं नारी हूं (’मैं नारी हूं’)। बेटी शक्ति थी बेटी शक्ति है/और बेटी हमेशा शक्ति ही रहेगी (’बेटी’)। ममता बाजपेयी ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से अपने मनोभाव व्यक्त किये हैं -‘चांदनी भी तो एक धोखा है/ये उजाले उधार वाले हैं। ममता कालड़ा की ’अधूरी  आस’ कविता में समाज को जागृत करने का प्रयास किया गया है। प्रीति शर्मा ‘असीम‘ की कविताएं भी प्रभावित करती हैं। डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई की कविताओं में वर्तमान सामाजिक यथार्थ का विशेष रूप से चित्रण है -‘सब रिश्ते बाजार हुए अब/अब रिश्तों में जान कहां है। (’कहां है’) ओढ़े रहो आवरण चाहे जितने/तुम्हारा सच हमें दिखने लगा है।’ डॉ. रेणु अग्रवाल की कविताएं पाठकों को आशान्वित करती हैं। करूणा झा की ’जवानी’ कविता में आज के राजनीतिक यथार्थ का चित्रण हैः-‘उठाओ, मारो, काटो, खत्म कर दो/ये कैसी हुक्मरानी आ गई है।’ कुल मिलाकर महिला रचनाकारों की काव्य-यात्रा में सहभागिता की ओर ध्यानाकर्षण करता है ‘देश की 11 कवयित्रियां‘ काव्य संकलन। 200 पेज के इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 300 रुपये है।

रचनाधर्मिता को रेखांकित करने का प्रयास


 

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के संपादन में प्रकाशित हुई पुस्तक ‘उत्तर प्रदेश की सात कवयित्रियां’  की कवयित्रियां अपने मनोभावों को व्यक्त करने में काफी हद तक सफल रही हैं। अतिया नूर का काव्य सृजन उनकी रचनाधर्मिता एवं उनकी सृजनात्मकता को उजागर करता है। कई रचनाएं अच्छी बन पड़ी हैं। शिल्प विधान की दृष्टि से भी कविताएं आकर्षित करती हैं। ‘उर्दू की कहानी’ कविता के माध्यम से संक्षेप में उर्दू भाषा का पूरा इतिहास बता दिया है। ‘तख़्त पे कातिल बिठाया जाएगा’ कविता में तुच्छ राजनीति पर प्रहार करने का प्रयास किया गया है। डॉ. मंजरी पांडेय की कविताएं सार्थक सृजन की पहचान हैं, समाज को सन्देश देती हैं। ‘सरसों खेत में फूल रही है’ कविता प्रकृति प्रेम को दर्शाती है। डॉ. नीलम रावत की ग़ज़लें कथ्यात्मक दृष्टि से अच्छी हैं, लेकिन शिल्प की दृष्टि से कहीं-कहीं कुछ कमियां हैं। कुछ उल्लेखनीय अश्आर-‘रेत पर घर फिर बनाना है तुझे/पीर में भी मुस्कुराना है तुझे।’ डॉ. नसीमा निशा की ग़ज़लें राजनीति, सामाजिक सरोकार एवं स्त्री विमर्श की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं एवं अच्छी बन पड़ी हैं। शिल्प विधान की ओर अधिक ध्यान दिया जाता, तो और अच्छा होतां। ममता देवी की काव्य रचनाएं यथार्थ के धरातल पर हैं एवं कवयित्री के मनोभावों को स्पष्ट रूप से प्रकट करती हैं। शबीहा खातून की रचनाओं का शिल्प पक्ष अपेक्षाकृत ठीक है। इनकी ‘उल्फत भरे लमहात’, ‘चूड़ियों की सदा’ उल्लेखनीय हैं। शगुफ़्ता रहमान की रचनाएं भी मनोभावों और उद्वेगों की अभिव्यक्ति करने में सफल हैं। ‘मेरा भी वतन तेरा भी वतन’ देशप्रेम, भाईचारे और आपसी सद्भाव की कविता है। कुल मिलाकर काव्य-संकलन महिला रचनाकारों की रचनाधर्मिता एवं उनकी सृजनात्मकता को उजागर करता है। 128 पेज के इस संकलन को गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 200 रुपये है।


  विसंगतियों को रेखांकित करती कहानियां 



 जया मोहन के कहानी-संग्रह ‘परसी थाली’ में सामाजिक विषयों को लेकर लिखी गयी  कहानियां संकलित हैं। जिनके माध्यम से समाज को रचनाधर्मी सन्देश दिए गए है। कहानियों की विषयवस्तु में सामाजिक कुरीतियों, गिरते हुए मानव मूल्यों एवं बिगड़ते हुए वर्तमान परिवेश पर प्रहार किया गया है। संग्रह की कहानियां मार्मिक, हृदयग्राही, प्रभावशाली एवं विविध मनोभाव लिए हुए हैं, जिनमें मानवीय संवेदनाओं एवं भावनाओं को सफलतापूर्वक उकेरने का प्रयास किया गया है। संग्रह की प्रथम कहानी ‘हॉर्न’ एक विधवा स्त्री की मानसिक पीड़ा को व्यक्त करती है, जो न चाहते हुए भी परिस्थिति जन्य कारणों से पतन के दलदल में फंस जाती है। उसकी पीड़ा वास्तविक रूप से समाज की पीड़ा ही है। ‘ऐ री मैं तो’ एक प्रेमकथा है, जिसमें सामाजिक रूढ़ियां एवं जाति-पाँति आड़े आती है। बाद में विधवा होने पर ऊंच-नीच का भेदभाव दूर कर प्रेमी और प्रेमिका विवाह करा दिया जाता है। ‘जाति-पाँति नहीं, मानवता महत्व रखती है’, इस कहानी का मूल सन्देश है। ‘बाजूबंद’ आभूषण-मोह के कारण माँ और बेटियों के रिश्तों के बीच आयी खटास की कहानी है। इस कारण माँ विक्षिप्त हो जाती है और प्यार के रिश्तों में दरार पैदा हो जाती है। इस कहानी में भी जाति-पाँति प्रथा के खण्डन की बात की गयी है। ,

‘गुनाहगार कौन’ शक में बिखर जाने वाले एक परिवार की कहानी है। पति का अत्याचार सहन करती हुई प्रताड़ित नारी का चित्रण इसमें किया गया है। संस्कारों की जीवित रखने की बात भी कही गयी है। इसी तरह अन्य कहानियों के परिदृश्य हैं, जो पाठक को अपनी ओर खींचती हैं। प्रूफ एवं मुद्रण-त्रुटियों के कारण व्याकरण एवं वर्तनी सम्बन्धी अनेक अशुद्धियाँ पुस्तक में यत्र-तत्र दृष्टिगत होती हैं। अनुस्वार सम्बन्धी अशुद्धियों की भरमार है। इसके अतिरिक्त ध-घ, भ-म, व-ब की भी अशुद्धिया हैं। कहानियों के संवादों में उद्धरण-चिह्न (“ “) प्रयुक्त न किये जाने के कारण कथावस्तु एवं संवाद एक दूसरे में मिल गये हैं, जिससे पाठक को बोधगम्यता में असुविधा होती है। कहानियों की भाषा सहज एवं सरल है, किन्तु जायजाद, ववंडर, आवाक, अभीभूत, अक्ष्मय, गर्भजोशी, अवरूध, पंड़ित जैसे अशुद्ध शब्दों का प्रयोग संग्रह की स्तरीयता को कम करता है। इन सबके बावजूद नारी विमर्श एवं अन्य सामाजिक विषयों को उठाने के लिए लेखिका साधुवाद की पात्र हैं। रवीना प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 114 पृष्ठ के इस कहानी-संग्रह का मूल्य 250 रुपये है।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2021 अंक में प्रकाशित )


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