गुरुवार, 20 जनवरी 2022

फिल्मी गीत और अदब के स्तंभ रहे इब्राहीम अश्क

                                              

इब्राहीम अश्क


                                                                              - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 

 16 जनवरी की शाम इस दुनिया से रुखसत हो जाने वाले शायर इब्राहीम अश्क फिल्मी दुनिया और उर्दू शायरी के बीच एक पुल का काम करने वाले अलग किस्म के शायर थे। एक तरफ जहां उन्होंने ‘कहो न प्यार है’, ‘कोई मिल गया’, ‘जानशीन’, ‘ऐतबार’, ‘बहार आने तक’ और ‘कोई मेरे दिल से पूछे’ ढेर सारी फिल्मों के लिए गीत लिखे, तो दूसरी तरफ उर्दू शायरी के व्याकरण पर काफी काम किया है, ग़ज़लों की नई बह्रो का खोज किया, उनकी शायरी पर अब तक पांच लोग शोधकार्य कर चुके हैं। इनके अलावा तरकीबन 700 एलमब के लिए गीत लिखे हैं। ‘इलहाम आगही’, ‘करबला’, ‘अलाव’, ‘अंदाज़े बयां’ और ‘तनक़ीदी शऊर’ नामक इनकी किताबें आ चुकी हैं। ‘रूबाई’ पर विशेष कार्य कर रहे थे, जल्द ही रूबाइयों की एक किताब लाने वाले थे। 

 पिछले और एक और दो जनवरी को वे हमारे आमंत्रण पर प्रयागराज में थे।, उन्होंने ही ‘तलब जौनपुरी के सौ शेर’ नामक किताब का विमोचन किया था। इब्राहीम अश्क का जन्म 20 जुलाई 1951 को मध्य प्रदेश के मंदसौर में हुआ था। उन्होंने अपनी कैरियर की शुरूआत पत्रकारिता से की थी। 12 वर्षों तक दिल्ली में रहे, यहीं इन्होंने ‘शमा’, ‘सुषमा’ और ‘सरिता’ पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग में काम किया था, इससे पहले ‘इंदौर समाचार’ में फीचर संपादक रहे थे। इसके बाद मुंबई चले आए, और यहीं से फिल्मों के लिए गीत लिखने का सिलसिला शुरू हो गया। ‘आओ सुनाएं प्यार की एक कहानी’ (कोई मिल गया), मुहब्बत इनायत करम देखते हैं (बहार आने तक), होठे रसीले तेरे होठ रसीले (वेलकम) जैसे गीत लिखकर इन्होंने फिल्मी दुनिया में अपनी मजबूत पकड़ और पहचान बना लिया था। 

  मुशायरों के सिलसिले में भी वो देशभर के अलग-अलग शहरों में जाते रहे हैं। पहली बार इलाहाबाद में वर्ष 2012 में आए थे, यहां के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज के एक मुशायरे में मेरे आमंत्रण आए थे। इन्होंने मेरी पुस्तक ‘फूल मुख़ातिब हैं’ की भूमिका में लिखी है-‘इम्तियाज़ ग़ाज़ी को मैं बरसों से जानता हूं। इलाहाबाद मैंने उनकी वजह से ही देखा है। उन्होंने एक ख़ास मुशायरा वहां के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में किया था। जिसमें मुझे ख़ासतौर पर बुलाया था। उससे पहले वो मेरी ग़ज़लें अपनी मैगज़ीन गुफ़्तगू में बदस्तूर शाया करते रहे हैं और मुझपर मज़ामीन और मेरा इंटरव्यू वहां के मशहूर अख़बारों में छापते थे। मुझे अच्छा लगता था कि मीलों दूर बैठा एक पत्रकार मुझसे इतना मुतअस्सिर है और मेरी इल्मी-अदबी कोशिशों को सराहता है। फिर ये हुआ कि उनसे मुशायरे के दौरान मुलाक़ात हुई तो जाना कि वो इलाहाबाद के इल्मी अदबी हल्के में काफ़ी मक़बूल हैं।’ 

 वो मुशायरे में जाते ज़रूर थे, लेकिन मुशायरेबाज शायरों की तरह सौदा नहीं करते थे, पिछली बार जब मैंने उन्हें बुलाया और पारिश्रमिक के बारे में पूछा तो उन्होने कहा कि ’बस इतना कर देना कि मेरे जेब से कोई खर्च न हो।’ वर्ना आजकल शायरों और कवियों से बात करिए तो वे बाकायदा सौदा करते हैं, लोग एक मुशायरे के 50 हजार से लेकर डेढ़ लाख तक की मांग करते हैं। इनसे बात करिए तो कहते हैं कि साहित्य की सेवा कर रहे हैं।

 हमारे बीच से इब्राहीम अश्क का जाना, उर्दू अदब के साथ ही फिल्मी दुनिया का भी जबरदस्त नुकसान है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। इब्राहीम अश्क जितने अच्छे शायर थे, उतने ही बेहतरीन इंसान थे, अल्लाह उन्हें जन्नत में जगह दे। आमीन।

 

  



गुरुवार, 13 जनवरी 2022

‘तलब की शायरी में है अदब की सच्ची विरासत’

‘तलब जौनपुरी के सौ शेर’ के विमोचन पर बोले इब्राहीम अश्क



प्रयागराज। तलब जौनपुरी की शायरी में अदब की विरासत सही रूप में दिखाई देती है। तलब जौनपुरी बह्र, ज़बान और बयान, ख़्यालो-फिक्र, मजमूनबंदी और आफ़रीनी के हुनर से बखूबी वाकिफ़ ही नहीं बल्कि उनको बरतने का सलीक़ा भी जानते हैं। इनकी शायरी में देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब रच बस कर उजागर होती दिखाई देती है, जो उर्दू और हिन्दी भाषा और साहित्य को एक दूसरे के करीब लाती है, और देश की एकता और अखंडता को मजबूत बनाने का फ़र्ज़ अदा करने में अहम भूमिका अदा करती है। यह बात कार्यक्रम के मुख्य अतिथि फिल्म गीतकार इब्राहीम अश्क ने 02 जनवरी 2021 को गुफ़्तगू की ओर से अदब घर में ‘तलब जौनपुरी के सौ शेर’ के विमोचन अवसर पर कही।

 गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि तलब जौनपुरी ने पूरी ज़िन्दगी उर्दू शायरी को फरोग देने का काम किया। ग़ज़ल के सिन्फ को समझने के लिए न सिर्फ़ बह्रो, रदीफ़-क़ाफ़िया को आत्मसात किया, बल्कि उर्दू सीखा और इसके लिए उर्दू में डिप्लोमा भी किया, इसलिए उनकी शायरी में परिपक्वता है। उर्दू आलोचक प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने कहा कि नई नस्ल की शायरी में ज़बान का शउर बहुत कम हो गया है, लेकिन तलब साहब की शायरी में ज़बार का शउर बहुत अच्छे ढंग से प्रदर्शित होता दिखाई देता है। इनकी शायरी में आत्म सम्मान और देशभक्ति की भावना जगह-जगह दिखाई देती है, जिसकी वजह से वे आज के दौर के एक महत्वपूर्ण शायर हैं।

विशिष्ट अतिथि मोहम्मद नौशाद खान ने कहा कि आज के दौर में उर्दू शायरी करना बड़ा काम है, क्योंकि भाषा को भी मज़हब के खानों में बांटने प्रयास किया जा रहा है, ऐसे में श्रीराम मिश्र उर्फ़ तलब जौनपुरी की उर्दू शायरी बेहद ख़ास है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रविनंदन सिंह ने आज के दौर में तलब जौनपुरी शायरी अलग से रेखांकित किए जाने लायक है, इनकी शायरी में समाज के प्रति फिक्र और मार्गदर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। इश्क़ सुल्तानपुरी, अनिल मानव, शैलेंद्र जय, नरेश महरानी, अना इलाहाबादी, राजीव नसीब, नीना मोहन श्रीवास्तव, सौरभ श्रीवास्तव, महक जौनपुरी, योगेंद्र कुमार मिश्र, फ़रमूद इलाहाबादी, रचना सक्सेना, संजय सक्सेना, विजय लक्ष्मी विभा, नीलिमा मिश्रा, प्रदीप चित्रांश, केपी गिरी, वीरेंद्र तिवारी, केशव सक्सेना, एसपी श्रीवास्तव, असद ग़ाज़ीपुरी, सेलाल इलाहाबादी, प्रकाश सिंह अश्क, पीयूष मिश्र पीयूष, परवेज अख़्तर, परवेज अख़्तर, फ़ैज़ इलाहाबादी, जीशान फतेहपुरी, असलम निजामी, शाहिद इलाहाबादी, शरीफ़ इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया।



मंगलवार, 4 जनवरी 2022

सिर्फ़ मीर ही हैं खुदा-ए-सुखन: प्रो. महफ़ूज

‘यादे मीर तक़ी मीर’, सम्मान समारोह और मुशायरे का हुआ आयोजन

 सय्यद अतहर सग़ीर ज़ैदी ‘तूरज ज़ैदी’

प्रयागराज। उर्दू शायरी में सिर्फ़ मीर तक़ी मीर ही ऐसे शायर हैं, जिन्हें खुदा-ए-सुखन कहा जाता है। मीर को यह लक़ब दिए जाने पर किसी को ऐतराज भी नहीं है। यानि ग़ज़ल की शायरी में मीर से बड़ा शायर कोई नहीं है। आज उनकी 300वीं जयंती पर यह कार्यक्रम आयोजित करके मीर को शानदार श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। इसके लिए ‘फखरुद्दीन अली अहमद कमेटी’ और गुफ़्तगू मुबारकबाद के हक़दार हैं। यह बात जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रो. अहमद महफ़ूज ने 01 जनवरी को हिन्दुस्तानी एकेडेमी में ‘फखरुद्दीन अली अहमद कमेटी’ के तत्वावधान और गुफ़्तगू के संयोजन में आयोजित ‘यादे मीर तक़ी मीर’ के दौरान कही।

अली अहमद फ़ातमी


प्रो. अहमद महफ़ूज

 ‘फखरुद्दीन अली अहमद कमेटी’ के अध्यक्ष सय्यद अतहर सग़ीर ज़ैदी ‘तूरज ज़ैदी’ ने कहा कि फखरुद्दीन अली अहमद कमेटी सिर्फ़ किताबों का प्रकाशन ही नहीं करती बल्कि उर्दू के लिए काम करने वालों को हर तरह से प्रोत्साहन करती है, जो बच्चे अपने स्कूल में उर्दू में टॉप करते हैं, उन्हें वजीफ़ा देती है, जो लोग उर्दू में पीएचडी करते हैं उन्हें फैज़याब करती है और विभिन्न शायरों की याद में कार्यक्रम करती है। इसी चैप्टर का हिस्सा है आज का कार्यक्रम। मुझे कमेटी ज्वाइन किए हुए अभी मात्र 101 दिन हुए और आज ये 23वां कार्यक्रम हो रहा है। विशिष्ट अतिथि प्रो. जहां आरा ने कहा कि उर्दू सबसे प्यारी ज़बान है, लेकिन यह धीरे-धीरे कम होती जा रही है, इस पर अब गंभीरता से काम करने की ज़रूरत है

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


प्रो. जहां आरा

 कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने कहा कि मीर की शायरी पर थोड़े से समय में पूरी चर्चा नहीं की जा सकती है, उनकी शायरी का मेयार जहां खड़ा है, वहां आससपास तक भी कोई नहीं पहुंच सका है। ग़ालिब ने भी मीर की तारीफ़ में बहुत सारे अशआर कहे हैं। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कि नए साल के साथ ही गुफ़्तगू का कारवां 19वें वर्ष में प्रवेश गया है, साल के पहले ही दिन हम मीर जैसे शायर को याद कर रहे हैं, आगे भी कार्यक्रम होते रहेंगे। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।


‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करते इब्राहीम अश्क


‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करते अली अहमद फ़ातमी

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। इब्राहीम अश्क, बुद्धिसेन शर्मा, विजय प्रताप सिंह, रईस बहराइची, ताजवर सुल्ताना, शगुफ़्ता रहमान, प्रिया श्रीवास्तव ‘’दिव्यम्’, तलब जौनपुरी, नायाब बलियावी, फ़रमूद इलाहाबादी, डॉ. नीलिमा मिश्रा, अनिल मानव, इश्क़ सुल्तानपुरी, शैलेंद्र जय, नीना मोहन श्रीवास्तव, नरेश महरानी, शिबली सना, शिवाजी यादव, रचना सक्सेना और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कलाम पेश किया।

‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करते प्रो. अहमद महफ़ूज


‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करते नायाब बलियावी

 

इन्हें मिला मीर तक़ी मीर सम्मान

इब्राहीम अश्क, प्रो. अली अहमद फ़ातमी, प्रो. आफ़ाक अहमद आफ़ाक़ी. प्रो. अहमद महफूज, नायाब बलियावी और ताजवर सुल्ताना  


‘मीर तक़ी मीर एवार्ड’ प्राप्त करती ताजवर सुल्ताना

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

कुशल राजनीतिज्ञ और साहित्यकार हैं पं. केशरीनाथ

                               

पं. केशरीनाथ त्रिपाठी 


                                                                      -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

                                       

पं. केशरीनाथ त्रिपाठी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे भारत की राजनीति और देश के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में विख़्यात अधिवक्ता, वरिष्ठ राजनीतिज्ञ, संवेदनशील कवि, पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल, बिहार, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा प्रदेश के पूर्व अतिरिक्त प्रभारी राज्यपाल, उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री, विधान सभा के तीन बार निर्विरोध निर्वाचित अध्यक्ष और कुल मिलाकर छह बार विधान सभा के सदस्य रहे साथ ही उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। आपका जन्म 10 नवंबर 1934 को मोहत्सिमगंज नामक मुहल्ले में हुआ था। इनके पिता स्वर्गीय हरिशचंद्र त्रिपाठी हाईकोर्ट में कार्यरत थे। तीन भाई और चार बहनों में आप सबसे छोटे हैं। श्री त्रिपाठी का विवाह 1958 में वाराणसी के प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. सत्य नारायण मिश्र की पुत्री सुधा से हुआ, पत्नी का एक फरवरी 2016 को निधन हो गया। आपकी दो पुत्रियां और एक पुत्र नीरज त्रिपाठी हैं। पुत्र नीरज इलाहाबाद हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। पुत्री निधि ओझा नई दिल्ली में आर्म्ड फोसर्स हेडक्वार्टर्स सर्विस में उच्च अधिकारी हैं। दूसरी पुत्री नमिता त्रिपाठी प्रयागराज में ही रहती हैं।

 पं. केशरीनाथ त्रिपाठी की कक्षा एक तक प्रारंभिक शिक्षा सम्मेलन मार्ग स्थित दो कमरों में संचालित सेन्टल हिन्दू स्कूल में हुई। कक्षा दो से आठ तक की पढ़ाई जीरो रोड स्थित सरयूपारीण स्कूल से हुई। 1949 में अग्रवाल अग्रवाल इंटर कॉलेज से हाईस्कूल और 1951 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। 1953 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और 1955 में एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। 31 जुलाई 1956 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में पंजीकरण के बाद वकालत शुरू किया। वर्ष 1987-88 और 1988-89 में इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 1989 में इन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की मान्यता प्रदान की गई।

 आपकी विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति में रुचि रही है। छात्र जीवन में आप ‘डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन’ के अध्यक्ष रहे। 1946-47 में आरएसएस के स्वयंसेवक बने, जनसंध की विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय रहे। 18 जुलाई 2004 से 2007 तक भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष रहे। आप 24 जुलाई 2014 से 29 जुलाई 2019 तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे। इसके अतिरिक्त इन्होंने 27 नवंबर 2014 से 15 अगस्त 2015 तक और 22 जून 2017 से 03 अक्तूबर 2017 तक बिहार, 06 जनवरी 2015 से 19 मई 2015 तक मेघालय, 04 अप्रैल 2015 से 25 मई 2015 तक मिजोरम और 30 सितंबर 2015 से 31 अक्तूबर 2015 तक तथा 15 जून 2018 से 16 जुलाई 2018 तक त्रिपुरा के अतिरिक्त प्रभार के राज्यपाल रहे।

 केशरी नाथ त्रिपाठी उत्तर प्रदेष विधान सभा के सदस्य के रूप में कुल मिलाकर छह बार निर्वाचित हुए। जनता पार्टी में भारतीय जनसंध के विलय के बाद 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर आप प्रथम बार इलाहाबाद के झूंसी विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और राम नरेश यादव मंत्रिमंडल में संस्थागत वित्त एवं बिक्रीकर मंत्री के रूप में 04 जुलाई 1977 से 11 फरवरी 1979 तक प्रदेश की सेवा की। 1977 में झूंसी विधानसभा क्षेत्र और उसके बाद 1989, 1991, 1993, 1996 और 2002 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर इलाहाबाद शहर दक्षिणी विधान सभा क्षेत्र से आप लगातार विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। आप 30 जुलाई 1991 को उत्तर प्रदेश की 11वीं विधानसभा के सभाध्यक्ष चुने गए थे और इस पद पर 15 दिसंबर 1993 तक रहे। 23 मार्च 1997 को दूसरी बार और 14 मई 2002 को तीसरी बार प्रदेश की 14वीं विधानसभा के भी अध्यक्ष निर्विरोध रूप से निर्वाचित हुए। 19 मई 2004 को इस पद से त्यागपत्र दे दिया। जुलाई 1991 से दिसंबर 1993 तक आप कामनवेल्थ पार्लियामेंटरी एसोसिएशन की उत्तर प्रदेश शाखा क अध्यक्ष रहे तथा मार्च 1997 से 19 मई 2004 तक इस पद पर रहे। श्री त्रिपाठी के प्रयास से ही इस एसोसिएशन की उत्तर प्रदेश शाखा द्वारा प्रतिवर्ष विदेश में विधायकों के भ्रमण का कार्यक्रम 1998 से शुरू हुआ जो कुछ वर्ष पूर्व तक नियमित रूप से चला।

 केशरी नाथ त्रिपाठी हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में हिन्दी के प्रबल समर्थक और एक संवेदनशील कवि के रूप में विख्यात हैं। इनके हिन्दी में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘मनोनुकृति’, ‘आयुपंख’, ‘चिरन्तन’, ‘उन्मुक्त’, ‘मौन और शून्य’ और ‘निर्मल दोहे’ हैं। उर्दू में ‘ख़्यालों का सफ़र’, ‘ज़ख़्मों पर शबाब’ और अंग्रेज़ी में ‘आई एम द लव’ और ‘फ्राम नोव्हेयर’ नामक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इनकी रचनाओं का अनुवाद बांग्ला, कश्मीरी, राजस्थानी, उडिया, संस्कृत, जापानी आदि भाषाओं में हुआ है। साहिल्य सृजन के लिए इन्हें विभिन्न सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है। 

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2021 अंक में प्रकाशित )



मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

गहमरी जी ने संसद में पेश किया गरीबी का चित्रण

                                                       

विश्वनाथ सिंह गहमरी

                                

                                                                         शहाब खान गोड़सरावी

     स्वतंत्रता आंदोलन में 1939-42 तक जेल अंग्रेज़ों में रहने वाले विश्नाथ सिंह ने तीसरी लोकसभा (1962-1967) में गाजीपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 1962 में लोकसभा में गहमरी ने संसद को बताया कि ग़ाज़ीपुर में गरीबी यह हाल है कि वहां के लोग जानवरों के गोबर से निकलने वाले अनाज  से रोटी बनाते हैं और उसी से अपना पेट मिटाते है। इस अभिभाषण के बाद प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु के आदेश पर बी.पी. पटेल की अध्यक्षता में फौरन पटेल आयोग का गठन किया गया। पटेल आयोग के जिम्मे चार जनपदों गाजीपुर, जौनपुर, आजमगढ़ और देवरिया थे। आयोग की रिपोर्ट के बाद गाजीपुर को व्यावसायिक केंद्र बनाने के लिहाज से गाजीपुर मुख्यालय के पास गंगा नदी पर रेल तथा सड़क पुल का निर्माण, फल संरक्षण, कैनिंग इंडस्ट्रीज, चर्म उद्योग, हैंडलूम उद्योग, प्लास्टिक खिलौना उद्योग की स्थापना तथा कृषि के लिए सिंचाई संसाधन बढ़ाने की संस्तुति की गई। संस्तुति के आधार पर सड़क पुल का निर्माण तो हो गया लेकिन रेल पुल (जो दिलदारनगर-ताड़ीघाट से गाजीपुर को जोड़ता) व अन्य संस्तुतियां थी जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1962 में पूर्वांचल के लोगों द्वारा बार-बार भेजे गए पत्र के बावजूद शीर्ष नेतृत्व की अनदेखी की शिकार है। 

  विश्वनाथ सिंह का जन्म 6 सितंबर 1901 को गाजीपुर जिले के गहमर गांव के परमा रॉय पट्टी में महाराज सिंह के घर हुआ था। गहमरी का प्राम्भिक पढ़ाई पैतृक गांव के मिडिल स्कूल से कक्षा आठ तक हुई। मैट्रिक की पढ़ाई गाजीपुर के विसेसरगंज में किया। उसके बाद इंटरमीडिएट की पढ़ाई बिहार के डुमरांव स्थित डुमरांव महाराज के कॉलेज से अपने चचेरे बड़े भाई  केदारनाथ सिंह (तहसीलदार) के यहां पूरी की। 1920 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में वकालत करने के लिए दाखिला लिया। सन 1930 में असहयोग आंदोलन के नेतृत्व तत्पश्चात विश्वनाथ सिंह गहमरी का पहला विवाह बिहार के हाजीपुर स्थित महानार गांव में हुआ। पहली धर्मपत्नी से केवल एक संतान स्व. गणेश सिंह जो उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर थे। पहली धर्मपत्नी के मृत्यु तत्पश्चात सन.1945 में उनका दूसरा विवाह बिहार के मोकामा में बद्दूपुर में गृहणी  अभिराज देवी से हुआ। उनसे तीन लड़के और दो बेटियां थी। उनके तीन बेटों अजय सिंह (साहित्यिक समाजसेवी), विजय कुमार सिंह (अधिकारी मर्चेंट नेवी, मुम्बई), अरुण कुमार सिंह (किसान, गहमर) है। उनकी दो बेटियों मुनेस्वरी व भुनेस्वरी देवी है। बनारस से वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो छात्र जीवन में रहते महामना राजनेता काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रणेता पंडित मदन मोहन मालवीय के सानिध्य में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े रहे। सन.1967 में लोकसभा चुनाव के दौरान विश्वनाथ गहमरी तीन हजार वोटों से कॉमरेड सरजू पांडेय से हार गये थे। सन.1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत बाद कांग्रेस पार्टी की कमजोरी गहमरी जी के हार का कारण बना। सांसदीय चुनाव हारने के बाद वो फिर चुनावी मैदान में नहीं उतरे। उनका आखिरी वक्त बीमारी में गुजरा और आखिरकार 4 जुलाई 1976 ई. को काशी में उनका निधन हो गया। 

 गहमरी जी का राजनैतिक सफ़र आचार्या नरेंद्र देव से प्रभावित होकर मुख्य रूप से समाजवादी विचारधारा से शुरू हुआ था। 1942 में स्वतंत्रता संग्राम के दरम्यान कांग्रेस पार्टी के गरम दल के नेताओं से खासकर प्रभावित होकर ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के संस्थापक सुभाष चंद्र बोश नेताजी के युवा संगठना ऑल इंडिया यूथ लिंग में शामिल हो गए। सन.1943-44 के दरम्यान नेताजी सुभाष चंद्र बोश के साथ विश्वनाथ सिंह गहमरी जी की करीबी इस कदर थी कि उनके बेटे संजय सिंह के मुताबिक सुभाष जी अपने आखिर वक़्त में एक बार रात्री विश्वनाथ जी के घर गाजीपुर में आये और तकरीबन चार घंटे मेरे घर रुके रहे। प्रधानमंत्री पंडित लाल बहादुर शास्त्री जी से गहमरी जी का काफी घनिष्ट मित्रता थी। अक्सर लाल जी उनके घर गाजीपुर को आया करते और जब गहमरी दिल्ली जाते अक्सर उनके आवास में ठहरा करते थे। दिलदारनगर के रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं हिंदी कवि धीरेंद्र नाथ श्रीवास्तव बताते हैं कि गहमरी जी का लगाव दलित और मुस्लिमों से रहा। यही मुख्य वजह थी जो गाजीपुर के पहला जमीनी राजनेता व लोकप्रिय हिन्दू सांसद रहे। गहमरी जी के स्मृति में गाजीपुर स्थित विसेसरगंज से पहाड़पुर का पोखरा वाली रोड़ का नामकरण और पैतृक गांव गहमर में उनके नाम पर पार्क और प्रतिमा है। स्टेडियम और गाजीपुर से बिहार को जोड़ने वाली टीबी रोड़ का नामकरण करने हेतु वर्तमान जमानिया विधायिका सुनीता सिंह ने उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री को ज्ञापन देकर पहल की है।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2021 अंक में प्रकाशित )

 


गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

भाषाएं आपसी सौहार्द लाने में अपना रोल अदा करती आयी हैं : जावेद

17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में जन्मे जावेद अख़्तर का असली नाम जादू है। उनके पिता जांनिसार अख़्तर की कविता में ‘जादू’ शब्द आने के बाद उनका पड़ा। पिता प्रगतिशील शायर और लेखक थे, जबकि मां सफिया अख़्तर उर्दू की लेखिका और शिक्षिका थीं। जावेद के दादा मुज्तर खै़राबादी भी अपने समय के मशहूर शायर थे, और उनके मामा असरार-उल-हक़ मज़ाज भी मशहूर प्रगतिशील शायर थे। मां के इंतिकाल के बाद ये अपने नाना-नानी के यहां लखनऊ आ गए। प्रारंभिक शिक्षा के बाद यहां से उन्हें उनके खाला के घर अलीगढ़ भेज दिया गया। यहीं से इनके आगे की पढ़ाई हुई। 04 अक्तूबर 1964 को जावेद अख़्तर मुंबई आए थे। उस वक़्त उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे। उन्होंने कई रातें सड़कों पर खुले आसमान के नीचे बिताई। बाद में कमाल अमरोही के स्टूडियो में उन्हेंन ठिकाना मिला। इनके फिल्मी कैरियर की शुरूआत ‘सहरदी लुटेरा’ से हुई थी, इस फिल्म में जावेद ने क्लैपर ब्वॉय के रूप में काम किया। इसी फिल्म के सेट पर उनकी मुलाकात सलीम से हुई। दोनों की दोस्ती हो गई। सलीम-जावेद की जोड़ी ने हिन्दी फिल्मों की दुनिया में तहलका मचा दिया। ‘शोले’, ‘शक्ति’, ‘शान’, ‘सागर’ समेत 24 फिल्मों के लिए इस जोड़ी ने संवाद लिखे, जिनमें से 20 फिल्में बॉक्स-आफिस पर ब्लाक-बस्टर हिट साबित हुईं। 1987 में बनी फिल्म मिस्टर इंडिया के बाद सलीम और जावेद अलग हो गए। इसके बाद भी जावेद अख़्तर ने फिल्मों के लिए गीत और संवाद लिखना जारी रखा है, आज वे एक बेहद कामयाब गीतकार और सवांद लेखक हैं। उन्हें 14 बार फिल्म फेयर एवार्ड मिला, इनमें सात बार उन्हें बेस्ट स्क्रिप्ट के लिए और सात बार लिरिक्स के लिए एवार्ड से नवाजा गया। पांच बार इन्हें नेशनल एवार्ड भी मिल चुके हैं। 1999 में पद्मश्री और 2007 में उन्हें पद्मविभूषण से नवाज़ा जा चुका है। इनकी दो पुस्तकें ‘तरकश’ और ‘लावा’ छप चुकी हैं। जावेद अख़्तर के दो बच्चे हैं, फरहान अख़्तर और ज़ोया अख़्तर, दोनों ही हिन्दी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता, निर्देशक-निर्माता हैं। रिंकल शर्मा ने उनसे विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है उस बातचीत के महत्वपूर्ण भाग। 

सवाल: आपकी शिक्षा की शुरूआत लखनऊ से हुई है, इस ज़माने के एजुकेशन के बारे में बताइए ?
जवाब: मेरा दाखिला लखनऊ के मशहूर स्कूल कॉल्विन तअल्लुकेदार कॉलेज में छठी क्लास में करा दिया गया। पहले वहां सिर्फ़ तअल्लुकेदार के बेटे पढ़ सकते थे, बाद में मेरे जैसे कमजोर परिवार के लोगों को भी दाखिला मिल गया। उस समय वह बहुत महंगा स्कूल था। मेरी फीस 17 रुपये महीना थी। मेरी क्लास में कई बच्चे घड़ी बांधते थे। वो सब बहुत अमीर घरों से थे। तो मैंने भी फैसला लिया था कि बड़ा होकर अमीर बनूंगा।

सवाल: आपने फिल्मों में पटकथा लिखने से शुरूआत की थी। गीत लिखने का सिलसिला कैसे शुरू हुआ ?
जवाब: लता मंगेशकर की सलाह पर यश चोपड़ा ने मुझे सिलसिला फिल्म के लिए गीत लिखने को कहा, इसके लिए मेरी बहुत ही अनुचित शर्तों को भी स्वीकार कर लिया। मैंने उनसे कहा कि अगर सबसे अधिक भुगतान गीतकार को ‘एक्स’ राशि मिलती है, तो मुझे ‘एक्स$वाई’ चाहिए। मैंने उनसे कहा कि मैं गाने की रिकॉर्डिंग खत्म होने तक राशि का इंतज़ार नहीं करूंगा और वह मुझे पहले ही राशि भेज दें। ऐसा करके मैं इस समझौते को तोड़ना चाहता था। हालांकि जब मैं उनके घर जा रहा था, तो मैंने सोचा कि मैंने इस तरह का व्यवहार किया है, ज़रूर अब वो गीत नहीं लिखवाएंगे। लेकिन उन्होंने मेरे द्वारा बताई गई फीस को स्वीकार कर लिया और राशि सौंप दी। मैं करीब 10ः30 बजे उनके घर पहुंचा। शाम तक मैंने एक गीत लिखा था। संगीत संगीतकार शिव-हरि ने धुन बनाई और मैंने लिखा था-‘देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए।’ यह मेरे जीवन का पहला गाना था। 

सवाल: आपको शायरी एक तरह से विरासत में मिली है। अपने बच्चों में यह हुनर देखते हैं, या उन्हें इसके लिए प्रेरित करते हैं ?
जवाब: मैं अपने विचारों को अपनाने के लिए अपने बच्चों पर दबाव नहीं डाल सकता। हां मुझे आश्चर्य है कि अगर वे उस विरासत को स्वीकार करेंगे। अख़्तरों में प्रत्येक अख़्तर अत्यधिक स्वतंत्र दिमाग़ वाला है। परिवार में जो कुछ भी चलता है वह व्यक्तिवाद नहीं बल्कि मौलिकता है। हम में एकमात्र प्रभाव यह है कि हम प्रभावित नहीं होते हैं। हालांकि मेरे बच्चे मेरी फिल्म देखते हुए बड़े हुए हैं, जब वे अपनी फिल्म बनाते हैं, तो उन्हें मेरी फिल्मों से कोई लेना-देना नहीं होता। इसी तरह, मैं अपने पिता और चाचा की कविता से प्यार और सम्मान करता हूं, लेकिन जब मैं लिखता हूं, तो यह उनके जैसा नहीं होता। हम में से हर एक अलग है। मैं कहूंगा कि हम अपने पूर्वजों की प्रतिध्वनियां नहीं हैं, लेकिन मूल आवाज़ें हैं। हमारे बीच जो आम बात है वह है एक न्यायपूर्ण और निष्पक्ष समाज, चुनाव की स्वतंत्रता, अंधविश्वास की कुल अस्वीकृति और किसी भी प्रकार की संकीर्ण, क्षेत्रीय या भाषाई पूर्वाग्रह, कोई लैंगिक पक्षपात नहीं, और देश के लिए प्यार-जिगिस्टिक तरीके से नहीं, बल्कि लोगों के लिए वास्तविक चिंता और सम्मान, न केवल शक्तिशाली के लिए बल्कि सभी केे लिए। यह हमारी सामूहिक पहचान है। मेरे पिता ने फिल्मों के लिए बहुत मुश्किल से लिखा, इसलिए नहीं कि उन्हें पता था कि खुद को फिल्म उद्योग को कैसे बेचना है ? मेरे पिता पुराने स्कूल के थे। उन्होंने अपनी कविता को निर्माताओं के सामने रखने में विश्वास नहीं किया। शायद अगर वह आज जीवित होते तो हम उन्हें एक व्यवसाय प्रबंधक रखने के लिए राजी कर लेते। हालांकि शुरूआत में मेरे पिता के साथ मेरा रिश्ता बहुत परेशान समय से गुजरा। वह कम्युनिस्ट विचारधारा के थे। उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया था और मेरे पिता मुंबई में भूमिगत हो गए थे, जबकि मेरी मां दो बहुत छोटे बच्चों की देखभाल करने के लिए पीछे रह गई थीं। लेकिन जब मैं 18 साल का था, तब उन्होंने मुझमें शायर को पहचान लिया और मुझे लिखने के लिए प्रोत्साहित किया।

जावेद अख़्तर से बात करतीं रिंकल शर्मा


सवाल: वर्तमान समय में उर्दू भाषा में बदलाव आ रहा है। इस बदलाव को किस तरह आप देखते हैं ?
जवाब: देखिए बिल्कुल बदलावा आया है। समाज में बदलाव आया है और भाषा में भी बदलाव है। और मैं समझता हूं कि आना भी चाहिए। हम भाषा के महत्व को कम आंकते हैं। मुझे लगता कि भाषा धर्म से ज़्यादा मज़बूत है। हमारी परंपरा, संस्कृति और कला सभी भाषा से संबंधित है। जिस क्षण आप इसे खो देते है, आप अपनी जड़ें खो देते हैं। और देखिए मैं समझता हूं कि उर्दू ज़बान तो बनी ही ऐसी है वो नए अल्फ़ाज़ को, नए अंदाज़ को, नए परिवर्तन को बहुत जल्द अपनाती है। अभी मान लीजिए कि आप किसी ऐसे से, जो उस जगह का न हो, जहां उर्दू बोली जाती है तो आप अपनी ज़बान में परिवर्तन लाएंगे ताकि वो आपकी बात समझ सके। तो वक़्त के साथ ज़बानों में परिवर्तन होते हैं और उर्दू भाषा में भी हुए हैं। उर्दू के शिल्प में भी जो परिवर्तन हो रहे हैं वो होने चाहिए। ये अच्छी बात है कि भाषा में नए-नए शब्द आ रहे हैं। भाषा का दरवाज़ा कभी बंद नहीं होना चाहिए, नए शब्द के लिए। अब देखिए कि ऑक्सफोर्ड की डिक्शनरी में आप पढ़ेंगे कि 50 नए शब्द आए हैं तो कभी 100 या 200 नए शब्द आए हैं, तो वो उनको स्वीकार करते हैं। जबकि हमारे यहां उल्टा है। हमारे यहां कहते हैं कि ये शब्द निकाल दो, वो शब्द निकाल दो, ठीक नहीं है। ये सही नहीं है। नए शब्दों से भाषा का विकास होता है और मैं समझता हूं कि उर्दू भाषा या नज़्म में शब्द आ रहे हैं जो कि बहुत खूबसूरत है। और मैं बस इतना कहूंगा कि उर्दू कविता न केवल उन लोगों के बीच लोकप्रिय है जो उर्दू पढ़ते हैं और लिखते है, बल्कि वे भी सौंदर्यशास्त्र रखते हैं और जिनकी रुचि है सीखना। यह लोगों की भाषा है। यह तब तक है जब तक लोग भाषा को नहीं समझते, यह उनके लिए हिन्दी है, जब वे इसे पसंद करेंगे तो यह उर्दू होगी।
सवाल: भारतीय भाषाएं रोजगार की भाषा नहीं बन पाई हैं, ऐसा क्यों ?
जवाब: आप बिल्कुल सही कह रही हैं। ये वाकई एक बड़ी समस्या है। अब ज़बाने सिर्फ़ साहित्य पर जिन्दा नहीं रह सकती हैं। आर्थिक तौर पर भी उनको विकसित करना होगा। अब इस बारे में क्या किया जा सकता है, ये तो मैं नहीं जानता। लेकिन हां, एक बात है कि इसको कम्प्यूटर की भाषा बनाया जाए। और हम सभी ये चाहते हैं कि हमारे बच्चे अंग्रेज़ी सीखें लेकिन हमें आने वाले बच्चों को साथ ही साथ अपनी भाषा भी सिखानी चाहिए। अगर हमारे बच्चे को अंग्रेज़ी आती है तो अपनी मातृभाषा भी आनी चाहिए। हम अपने स्कूलों, कॉलेजों और समाजों में और यहां तक कि घर पर भी भाषाओं को उचित महत्व नहीं देते हैं। बच्चे साहित्य या कविता के संपर्क में नहीं हैं। जाहिर है, यह पिछले 30-40 वर्षों से हो रहा है और आप गवाह हैं। परिणाम, अपने आप है, तो जाहिर है कि शब्दावली सभी संचार में टीवी, गीत, भाषण और संवादों में भी सिकुड़ जाएगी।

जावेद अख़्तर के साथ रिंकल शर्मा


सवाल: भाषा की गिरावट के लिए आप फिल्मों को जिम्मेदार मानते हैं?
जवाब: सिनेमा में ऐसा नहीं है कि उर्दू को निकालकर, हिन्दी को डाल दिया हो। लेकिन अब भाषा ही कमजोर हो गई है। और आज सिनेमा की मजबूरी है कि वह वही दिखा रहा है जो लोग देखना चाहते हैं। अब फिल्में कमाई का जरिया बन गई हैं। एक व्यावसायिक सिनेमा के लिए ‘चाहिए’ जैसा कुछ नहीं है। वे अधिक से अधिक से लोगों तक पहुंचना चाहते हैं, अधिक से अधिक दिल जीतना चाहते और सिर्फ़ नेत्र गेंदों को पकड़ते हैं, जो भी उन्हें यह मिलेगा, वे ऐसा करेंगे। लेकिन हां, यह एक सच्चाई कि भाषा हमारे समाज में सिकुड़ती जा रही है और मांग बड़ी होती जा रही है। आप इस समस्या को समाज के एक हिस्से से ठीक नहीं कर सकते हैं।
सवाल: भारतीय भाषाओं में आपस में भी बहुत विवाद है?
जवाब: बिल्कुल है। आप हमारे हिन्दी के कवियों को देखिए या उर्दू के बड़े-बड़े शायरों को देखिए। वो बड़े ही प्यार से दोनों ही भाषाओं को ंमंच पर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ये जो सियासी दीवारे हैं ये बहुत मोटी हैं। ये वोट के लिए परस्पर सौहार्द पनपने दे ही नहीं रही हैं। जबकि भाषाएं आपसी सौहार्द लाने में अपना रोल अदा करती आयी हैं और कर रही हैं।

जावेद अख़्तर के साथ इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 


 सवाल: समाज में महिलाओं के खिलाफ बहुत अपराध हो रहे हैं, इसे आप किस रूप में देखते हैं ?

जवाब: ये हालात सचमुच दुखदायी हैं। महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध वाकई सोचने पर मजबूर करते हैं। मैं समझता हूं कि सबसे पहले तो जो आरोपी हैं, अगर वो कहीं कार्यरत हैं तो आरोप लगते ही उसको तुरंत सस्पेंड करना चाहिए। ऐसा नहीं कि एक महीने गया और फिर वापस आ गया। दूसरा, मामले की तुरंत जांच और फैसले के लिए फास्ट ट़ैक कोर्ट होनी चाहिए। मतलब ज़्यादा से ज़्यादा एक महीना या डेढ़ महीना या दो महीना। जल्द से जल्द सजा देनी चाहिए। और सबसे अहम बात कि लड़कों को घर और स्कूल में सीखना चाहिए कि औरतों की इज़्ज़त करो। अब जो लड़का घर में अपनी मां की बेइज़्ज़ती करे वो बाहर भला दूसरी औरतों की क्या इज़्ज़त करेगा। तो सबसे पहले घर से ही उसको औरतों की इज़्ज़त करने का पाठ पढ़ाना चाहिए।

सवाल: नए लोगों को क्या सलाह देंगे ?

जवाब: नए लोगों को भला मैं क्या संदेश दूंगा। आज जो नए लोग हैं वो बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं। नई पीढ़ी बहुत ही हुनरमंद है। नए उत्साह, अंदाज़ और हुनर के साथ काम काम कर रही है। मैं सिर्फ तो बस इतना कह सकता हूं कि यदि आप लिखना चाहते हो तो पहले खूब पढ़ना सीखो। लिखने से पहले पढ़ना बहुत ज़रूरी है, बहुत पढ़ो, पढ़ते रहो। लिखना शुरू करने से पहले तुम्हें अच्छी तरह से पढ़ना आना चाहिए। अगर आप शायर बनना चाहते हैं तो जितना हो सक दिल से शायरी सीखिए।

( गुफ़्तगू के जून-अप्रैल 2021 अंक में प्रकाशित )


रविवार, 28 नवंबर 2021

गुफ़्तगू ने किया गंभीर और वास्तविक कार्य : केशरीनाथ त्रिपाठी

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, केशरी नाथ त्रिपाठी, सर्वश्रेष्ठ त्रिपाठी और क़मरुल हसन सिद्दीक़ीकेशरी नाथ त्रिपाठी




कुवैत की नाज़नीज समेत सात को मिला सुभद्रा चौहान सम्मान
‘गुफ़्तगू साहित्य समारोह-2021’ और मुशायरे का हुआ आयोजन 
 केशरीनाथ त्रिपाठी

प्रयागराज। हमारा राष्टीय और सामाजिक दायित्व है कि दबी हुई भावनाओं को उजागर कर लोगों के सामने लाया जाए, ताकि साहित्य का वास्तविक काम होता रहा है। यही काम सााहित्यक संस्था गुफ़्तगू पिछले 18 वर्षों से कर रही है, आज के दौर में साहित्य का इतना गंभीर और वास्तविक काम करना बहुत बड़ी बात है। गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अपने नेतृत्व में यह काम बखूबी ढंग से किया है, प्रयागराज इनके इस कार्य को कभी भूला नहीं सकता है। देशभर के जिन लोगों को विभिन्न सम्मान दिया गया है, वे वास्तविक रूप में इसके हकदार है, गुफ़्तगू द्वारा सम्मान के लिए हमेशा महत्वपूर्ण लोगों को चुना जाता है। ‘कैलाश गौतम सम्मान’, ‘सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान’, ‘कुलदीप नैयर सम्मान’, ‘सीमा अपराजिता सम्मान’ आज दिया गया है, जिनके नाम से ये सम्मान दिए गए हैं, इनमें कोई भी अनजान नाम नहीं है, सभी ने महत्वूपर्ण काम किए हैं। यह बात 21 नवंबर को गुफ़्तगू द्वारा हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘गुफ़्तगू साहित्य समारोह-2021’ के दौरान पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने कही। उन्होंने कहा कि साहित्यकार अच्छे समाज का निर्माण करने के लिए रचना का सृजन करता है, वह नकारात्मक चीजों की ओर नहीं जाता है। लेकिन समाज की गलत चीजों को सामने लाना उसका मूल कर्तव्य भी है। 

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि गुफ़्तगू द्वारा उन रचनाकारों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है, जो वाकई इसके हक़दार हैं। रचनाकार अपनी दृष्टि से समाज को देखता है और उसकी विसंगतियों को रेखांकित करता है, ताकि एक अच्छे  समाज का निर्माण हो। उसके इसी कार्य को देखते हुए गुफ़्तगू द्वारा विभिन्न अवसरों पर उन्हें प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाता है।


सर्वश्रेष्ठ त्रिपाठी


मुख्य अतिथि प्रयागराज परिक्षेत्र के डीआईजी सर्वश्रेष्ठ त्रिपाठी ने कहा कि रचनाकार का मुख्य उद्देश्य मानवता की सेवा के लिए रचना का सृजन करना होता है। गुफ़्तगू के इस आयोजन से यह साबित हो रहा है कि अच्छा लेखन करने वालों को प्रोत्साहित किया जाता है। गुफ़्तगू न सिर्फ़ सामाजिक स्तर पर बल्कि पर्यावरण को लेकर भी चिंतित है, यही वजह है कि कार्यक्रम की शुरूआत पौधों को पानी को देकर किया है, यह बहुत अच्छी परंपरा है। ग़ाज़ीपुर के सहायक डाक अधीक्षक मासूम रज़ा राशदी ने कहा कि समाज की विकृति को दूर करना ही साहित्यकार का मुख्य कार्य है, और ऐसो लोगों को सम्मानित करना बेहद ख़ास है। गुफ़्तगू के सचिव नरेश महरानी और जालौन की कवयित्री प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम्’ ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। इक़बाल दानिश को अकबर इलाहाबादी सम्मान दिया गया। इस अवसर पर गुफ़्तगू के नए का अंक का विमोचन भी किया गया।


गुफ़्तगू पत्रिका का विमोचन


 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया। प्रभाशंकर शर्मा, अनिल मानव, संजय सक्सेना, अफसर जमाल, रेशादुल इस्लाम, संजय सागर, परवेज अख़्तर, रचना सक्सेना, सम्पदा मिश्रा,  ममता देवी सिंह, विजय त्रिपाठी, नूर शम्स, शाहिद सफ़र, मोहम्मद इस्लाम आदि ने कलाम पेश किया।


इन्हें मिला सम्मान

सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान प्राप्त करतीं कुवैत की नाज़नीन अली नाज़


सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान प्राप्त करतीं नीना मोहन श्रीवास्तव

सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान प्राप्त करतीं जया मोहऩ

सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान प्राप्त करतीं सय्यदा नौशाद बेगम


सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान प्राप्त करतीं उपासना दीक्षित

सुभद्रा कुमार चौहान सम्मान 

नाज़नीन अली ‘नाज़’ (कुवैत), सय्यदा नौशाद बेगम (ठाणे), डॉ. उपासना दीक्षित (ग़ाज़ियाबाद), रूपा व्यास (उदयपुर), डॉ. दलजीत कौर (चंडीगढ़), नीना मोहन श्रीवास्तव (प्रयागराज) और जया मोहन (प्रयागराज)   


कुलदीप नैयर सम्मान 

कुलदीप नैयर सम्मान प्राप्त करते आशुतोष पांडेय


कुलदीप नैयर सम्मान प्राप्त करते शिवपूजन सिंह


आशुतोष पांडेय (अमर उजाला-वाराणसी), मानवेंद्र प्रताप सिंह(नेशन न्यूज़), गुफरान अहमद (ज़ी न्यूज़), आलोक सिंह (एपीएन न्यूज), शिवपूजन सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)


कैलाश गौतम सम्मान  

सुहैल खान (ग़ाज़ीपुर), सुशील वैभव खरे (पन्ना, मध्य प्रदेश), आशुतोष मिश्र (दरभंगा) और रामशंकर वर्मा (लखनउ) 

 

कैलाश गौतम सम्मान प्राप्त करते सुहैल खान

सीमा अपराजिता सम्मान

दीप्ति दीप (कासगंज), प्रीति कुमारी (नई दिल्ली), कीर्ति चौधरी (ग़ाज़ीपुर), अर्चना जायसवाल(प्रयागराज) और जगदीश कौर (प्रयागराज) 

सीमा अपराजिता सम्मान प्राप्त करतीं अर्चना जायसवाल


 


गुरुवार, 4 नवंबर 2021

गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2021 अंक में



2. फोटो फीचर

3. संपादकीय: विश्वास खोता जा रहा है साहित्यकार

5-7. फिल्मी गीत की परिभाषा - इब्राहीम अश्क

8-22. ग़ज़लें (इब्राहीम अश्क, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, डॉ. अहमद अली बर्की आज़मी, राजेंद्र वर्मा, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, इश्क़ सुल्तानपुरी, डॉ. राकेश तूफ़ान, मासूम रज़ा राशदी, शमा फिरोज, विजय प्रताप सिंह, बसंत कुमार शर्मा, समीर भृगुवंशी, फ़रमूद इलाहाबादी, रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे, बबिता अग्रवाल कंवल, डॉ. इम्तियाज़ समर, अतिया नूर, इरशाद आतिफ़, कुंवर नाजुक, राज जौनपुरी, विवेक चतुर्वेदी, वीरेंद्र खरे अकेला, साबिर जौहरी, साजिद अली सतरंगी, रमेश चंद्र श्रीवास्तव, प्रदीप बहराइची, सुषमा दीक्षित शुक्ला, डॉ. लक्ष्मी नारायण बुनकर, मो. बेलाल सारनी, मनीषा श्रीवास्तव ज़िन्दगी)

23-28. कविताएं (यश मालवीय, डॉ. सुनीता शर्मा, शांतिभूषण, जितेंद्र कुमार दुबे, डॉ. मधुबाला सिन्हा, नीना मोहन श्रीवास्तव, डॉ. उपासना दीक्षित, प्रिया भारती, निर्मला कर्ण )

29-35. इंटरव्यू  (सीरियल लिटरेचर हमेशा पॉपुलर लिटरेचर से आगे होगा: असग़र वजाहत)

36-39. चौपाल ; शायरी से आम जनता दूर क्यों होती जा रही है

40-47. तब्सेरा (बतख मियां अंसारी की अनोखी कहानी, देश के 21 ग़ज़लकार, कितने इतने रंग भरे, मैं और मेरा परिवेश, बात अभी बाक़ी है, तस्वीर लिख रहा हूं, देख इधर भी जरा ज़िन्दगी, यादों के उजाले, किसलय )

48. उर्दू अदब: जदीदियल के अमलबरदार शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी

49-50. गुलशन-ए-इलाहाबाद: कुशल राजनीतिज्ञ और साहित्यकार हैं केशरीनाथ त्रिपाठी

51. रंगमंच: इलाहाबाद में अभिनय सीखकर टीवी सीरियलों में बनाया ख़ास मकाम

52-53. गहमरी जी ने संसद में पेश किया गरीबी का चित्रण

54-61. अदबी ख़बरें

परिशिष्ट-1: प्रदीप कुमार सिंह ‘तन्हा’

62. प्रदीप कुमार सिंह ‘तन्हा’ का परिचय

63-65. प्रदीप कुमार सिंह ‘तन्हा’ का व्यक्तित्व एवं कृतित्व- शमा फिरोज

66-67. समाज को मानवता का आइना दिखाती ग़ज़लें - शगुफ़्ता रहमान

68-69. संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी हैं प्रदीप कुमार सिंह- रचना सक्सेना

70-91. प्रदीप कुमार सिंह ‘तन्हा’ की ग़ज़लें

परिशिष्ट-2: ए. आर. साहिल अलीग

92. ए. आर. साहिल अलीग का परिचय

93-94. सच्चे शायर ए. आर. साहिल अलीग- वीना श्रीवास्तव

95. इश्क़ और दुनियादारी के बीच की विद्रूपताएं - डॉ. शलेष गुप्त वीर

96-97. महसूस कर लिखने वाले शायर हैं साहिल- प्रदीप बहराइची

98-120. ए. आर. साहिल ‘अलीग’ की ग़ज़लें


गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

धीरज की रचनाओं पर गंभीरता से काम करना चाहिए

गुफ़्तगू की ओर से ‘धीरज जन्मोत्सव-2021’ का आयोजन



प्रयागराज। जमादार धीरज हमारे समय के ऐसे कवि रहे हैं, जिनकी रचनाएं बेहद गंभीर, प्रासंगिक और समय से वार्तालाप करते हुए हैं, इन रचनाओं का गंभीरता से अध्ययन करते हुए काम किया जाना चाहिए। समय के अनुसार पर इनकी कविताओं पर विश्वविद्यालयों के माध्यम से शोध कराया जाना चाहिए। यह बात इलाहाबाद दूरदर्शन केंद्र्र के पूर्व निदेशक वरिष्ठ साहित्यकार श्याम विद्यार्थी ने 20 अक्तूबर को राजरूपपुर स्थित डॉ. अंबेडकर मार्ग पर गुफ़्तगू की ओर से आयोजित ‘जमादार धीरज जन्मोत्सव-2021’ में कही। 
‘धीरज सम्मान-2021’ प्राप्त करते मासूम रज़ा राशदी


 कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री विद्यार्थी ने कहा कि धीरज जी ने अपने बच्चों में ऐसा संस्कार दिया है कि उनके निधन के बाद भी उनकी रचनाओं को कालजयी बनाने, स्थापित कराने और उन्हें उनके जन्मदिन पर याद करने का वीणा है उठाया है, यह एक ऐसा आदर्श जिसे स्थापित करना बेहद ज़रूरी है।
‘धीरज सम्मान-2021’ प्राप्त करते विजय लक्ष्मी विभा 


गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि जमादार धीरज की रचनाएं बेहद खास और हमारे के समय लिए प्रासंगिक है, इनकी कविताओं को पाठ्यक्रम में शामिल कराने का प्रयास करना चाहिए, इसके लिए हमलोग अपने स्तर प्रयास करेंगे।
‘धीरज सम्मान-2021’ प्राप्त करते गोपीकृष्ण श्रीवास्तव


 मुख्य अतिथि पूर्व अपर महाधिवक्ता क़मरुल हसन सिद्दीक़ी ने कहा कि आज के दौर में जिस तरह से जमादार धीरज को याद किया जा रहा है, यह बहुत बड़ी बात है। वर्ना इसी इलाहाबाद से बड़े-बड़े शायरों का निधन हो गया, आज उनके परिवार के लोग भी उन्हें याद तक नहीं करते। इसलिए इस आयोजन के लिए टीम गुफ़्तगू के साथ जमादार धीरज परिवार बहुत ही बधाई का पात्र है। रांची की कवयित्री अंकिता सिन्हा ने कहा निराला, फ़िराक़, महादेवी, पंत और अकबर इलाहाबादी की सरजमीन पर आकर आज बेहद फख्र महसूस कर रही हूं। जिस तरह से जमादार धीरज को याद किया जा रहा है, वह इलाहाबाद जैसे साहित्यिक नगरी में ही हो सकता है। लाल सरन, गोपाल सिंह, तलब जौनपुरी, मधुबाला गौतम, अशोक कुमार, शीला सरन, अंजनी कुमार आदि ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

‘धीरज सम्मान-2021’ प्राप्त करते प्रभाशंकर शर्मा


 दूसरे दौर में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। अनिल मानव, फ़रमूद इलाहाबादी, शिवाजी यादव, श्रीराम तिवारी सहज, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, अना इलाहाबादी, अजीत शर्मा आकाश, केशव सक्सेना, अर्चना जायसवाल, मीठी मोहन, प्रीता बाजपेयी, अन्वेशा सिंह और शाहिद इलाहाबादी ने कलाम पेश किया। 

इन्हें मिला धीरज सम्मान

नज़र कानपुरी का सम्मान प्राप्त करते शिवाजी यादव


नज़र कानपुरी (लखनऊ), मासूम रज़ा राशदी (ग़ाजीपुर), गोपीकृष्ण श्रीवास्तव (प्रयागराज), विजय लक्ष्मी विभा (प्रयागराज) और प्रभाशंकर शर्मा (प्रयागराज) 

बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

‘कामयाबी सिर्फ़ छह कदम पर’

                          

                                                                                       - डॉ. हसीन जीलानी


                                         

 ‘कामयाबी सिर्फ़ छह कदम पर’ दिनेश बोहरा की मराठी ज़बान में लिखी गई किताब है, जिसका उर्दू में तर्जुमा मोहतरमा सैयद नौशाद बेगम ने किया है। मोहतरमा ने इससे क़ब्ल भी मुन्फरिद मौज़ूआत पर लिखी गई किताबों के उर्दू ज़बान में तर्जुमे किए हैं। खुदा ने इंसान को सबसे अशरफ़ मख़्लूक बनाकर दुनिया में भेजा है। इंसान अपनी ज़ेहानत से बड़े-बड़े मारके सर करता रहा है। लेकिन दुनिया में बहुत से ऐसे भी इंसान हैं जिनका कोई नसबुल-ऐन नहीं, बस ज़िन्दगी जिये जा रहे हैं। मीर तक़ी मीर का बहुत मशहूर शेर है-

            बारे दुनिया रहो ग़मज़दा या शाद रहो,

            ऐसा कुछ करके चलो यां कि बहुत याद रहो।

 बहुत याद रहने की चाह अगर हर इंसान के दिल में पैदा हो जाए तो हज़रत-ए-इंसान दुनिया में बड़ी से बड़ी कामयाबी हासिल कर सकता है। बहुत से इंसान दुनिया में बड़े-बड़े कारनामे अंजाम देने के ख़्वाब तो देखते हैं लेकिन इन ख़्वाबों को शर्मिन्द-ए-ताबीर करने के लिए जिस कूव्वत-ए-इरादी, हिम्मत, सब्र-ओ-इस्तेक़लाल और जां-फिशानी की ज़रूरत होती है वो उससे कोसो दूर होते हैं, और अक्सर अपनी नाकामी का ठीकरा अपनी तक़दीर के सिर फोड़ देते हैं। शायर ने क्या उम्दा बात कही है-‘तद्बीर के दस्त-ए-जर्री से तक़दीर दरख्शां होती हैै/कुदरत भी मदद फ़रमाती है, जब कोशिश-ए-यकसां होती है।’ ‘कामयाबी सिर्फ़ छह कदम दूर पर’ अपने मौजूआत और मवाद के लिहाज से एक मुन्फरिद किताब है। इस किताब का मुतालिआ बग़ौर बार-बार किया जाना चाहिए। कामयाबी की राह में पेश आने वाली दुश्वारियों का सामना करने में ये किताब सहायक साबित होगी। इस किताब को पढ़ने के बाद इसकी मदद से इंसान एक बा-मक़सद और बा-मानी ज़िन्दगी गुजार सकता है। बक़ौल दिनेश बोहरा-‘दोस्तों ! ये किताब उन अफ़राद के लिए जो अपने नसबुल-ऐन का तअय्युन करके अपनी ज़िन्दगी को ख़ास बनाने और रौशन मुस्तक़बिल की तरफ कदम बढ़ाने का इरादा रखते हों और जिन्होंने अपने क़ौल से आगे बढ़कर अमली दुनिया में पेश रफ्त की है, उन्हें राह दिखाने की एक दयानत दाराना काविश है।’  200 सफ्हात पर मुश्तमिल इस किताब का कवर दिलकश और दीदा जेब है, जिसकी कीमत सिर्फ़ 150 रुपये है। 


‘बिहार, बंगाल और उड़ीसा के क़लमकार’   


                               

 अहसन इमाम अहसन उर्दू ज़बान-ओ-अदब का एक जाना पहचाना नाम है, जो उर्दू की बेलौस खि़दमात अंजाम दे रहे हैं। वे मुलाज़मत के सिलसिले में भुवनेश्वर, उड़ीसा में कयाम पेज़ीर है जहां उर्दू ज़बान व अदब की तरवीज व तरक़्क़ी में रियासती हुकूमत की दिलचस्पी बिल्कुल नज़र नहीं आती। इसके बाजवूद अहसन इमाम मुसलसल न सिर्फ़ अदब का मुतालिआ कर रहे हैं, बल्कि उम्दा मज़ामीन भी तहरीर कर रहे हैं। आज जबकि हर इंसान नफ़ा व नुकसान को जे़हन में रखकर अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहा है, ऐसे में अहसन इमाम उर्दू के गुमनाम अदीबों व शायरों पर मजामीन लिख रहे हैं, वे गोशा-नशीन होकर अदब तख़्लीक कर रहे हैं। मुल्क के मुख़्तलिफ़ सूबों से वाबस्ता अदीबों व शायरों पर इन्होंने अपनी कीमती आरा पेश की हैं। जे़रे तब्सेरा किताब ‘बिहार, बंगाल और उड़ीसा के क़लमकार’ इनकी पांचवीं किताब है। इससे क़ब्ल इन्होंने महाराष्ट्र और झारखंड के क़लमकारों पर मज़ामीन लिखे हैं, जो किताबी शक्ल में शाया हो चुके हैं।

 अदबी तन्क़ीद रोज़ ब रोज़ कारोबार की शक्ल अख़्तियार करती जा रही है। अपने मोहसिनों और अपने चाहने वालों पर उर्दू के नाम-निहाद नक़्क़ादों ने ऐसे मज़ामीन तहरीर किए जो मुबालग़े से पुर हैं। बजाए खूबियों और ख़ामियों का जिक्र करने के उन्होंने तख़्लीककार के मन्सब और ओहदे को ज़ेहन में रखकर बाज़ ऐसी बातें लिख दी जो हक़ीक़त में उनमें थी ही नहीं। इसीलिए अब हर फनकार अपनी तख़्लीक के साथ-साथ अपनी तन्क़ीद का बोझ भी अपने सिर उठाने के लिए मज़बूर है। ये बात अहसन इमाम खूब अच्छी तरह से समझते हैं। इनकी इस किताब में बिहार के दस, बंगाल के आठ और उड़ीसा के 13 क़लमकारों पर मज़ामीन तहरीर किए गए हैं। इनमें शायर भी हैं और अफसाना निगार भी। साफ़ सुथरी ज़बान में लिखे गए ये मज़ामीन दिलचस्प और मालूमाती हैं। उम्मीद है अदबी हल्के में इस किताब की ख़ातिर-ख़्वाह पज़ीराई होगी। 192 सफ़्हात पर मुश्तमिल इस किताब की कीमत सिर्फ़ 200 रुपये है, जिसे एजुकेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली ने शाया किया है। किताब के कवर पर मुसन्निफ़ व नाशिर अहसन इमाम असहन की तस्वीर उनके बेटे अतहर इमाम ने बहुत उम्दा स्केच की है।


 ‘सैयद मोहम्मद अली शाह मयकश अकबराबादी’                                  


 

आगरा यानी अकबराबाद एक तारीख़ी शहर है। जो किसी ज़माने में अहल-ए-इल्म व अदब और आलिमों का मरकज़ हुआ करता था। नज़ीर अकबराबादी, सीमाब अकबराबादी, सबा अकबराबादी और दीगर अदबी शख़्सियतें इस शहर से वाबस्ता रही हैं। ज़ेरे तब्सेरा किताब दबिस्तान-ए-आगरा के मुमताज शायर व अदीब सैयद मोहम्मद अली शाह मयकश अकबराबादी के मुरत्तेबीन डॉ. नसरीन बेगम अलीग और सैयद फ़ैज़ अली शाह नियाज़ी ने इस किताब को शाया कर उर्दू अदब की गिरां क़द्र खि़दमत अंजाम दी है। किताब में खुद मयकश अकबराबादी के तीन अहम मज़ामीन और उर्दू के कई नामी गिरामी अदीबों व तन्कीदनिगारों मसलन आफ़ाक़ अहमद इरफानी, प्रो. मुग़ीसउद्दीन फ़रीदी, प्रो. ज़हीर अहमद सिद्दीक़ी, प्रो. उन्वान चिश्ती, प्रो. शमीम हन्फ़ी, प्रो. अली अहमद फ़ातमी, डॉ. सिराज अजमली वगैरह के मेयारी मज़ामीन यकजा कर दिए गए हैं। मयकश अकबराबादी का नाम तसव्वुफ के हवाले से एक मोतबर नाम है। वह एक अच्छे शायर ही नहीं अच्छे इंसान भी थे। उनकी शख़्सियत तसव्वुफ के रंग में रंगी हुई थी। वह एक इंसान दोस्त और रौशन ख़्याल शख़्स थे। शायरी और तसव्वुफ़ मयकश अकबराबादी को विरसे में मिले। और इन दोनों से फितरी मुनासबत के सबब इन्होंने बहुत कम उम्री में ही बग़ैर किसी उस्ताद की रहनुमाई के शेरगोई का आग़ाज़ कर दिया और तसव्वुफ़ के असरार रोमूज़ से वाक़फियत हासिल कर ली।

 प्रो. शमीम हन्फ़ी ने मयकश अकबराबादी के तअल्लुक से उम्दा बात कही है-‘मयकश साहब ने बुजुर्गों की मीरास को आज तक जिस जिस तरह से बचाए रखा, ये हिकायत भी कम अजीब नहीं। ये मीरास इल्मी और अदबी नवादिर से क़ता नज़र उन कद्रों, रिवायतों और जीने के उन करीनों से इबारत है जो सीना-ब-सीना मयकश साहब को मुन्तक़िल हुई।’ किताब का कवर पेज सादा लेकिन दिलकश है। जो ऐन मयकश अकबराबादी के रंग के मुताबिक है। 286 सफ्हात के इस किताब की कीमत महज 300 रुपये है। इसकी इशाअत लेथू आफ़सेट प्रिन्टर्स, अलीगढ़ से हुई है।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2021 अंक में प्रकाशित )


शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

बेहद जिन्दादिल थे कमेंटेटर इफ़्तेख़ार पापू


                                                  -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

इफ़्तेख़ार अहमद पापू 


 इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों की रेडियो पर आंखों देखा हाल यानी कमेंट्री की बात होती है तो प्रयागराज के इफ़्तेख़ार अहमद पापू का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अगर प्रयागराज से इंटरनेशनल मैचों की कमेंट्री करने वालों की बात की जाती है तो एक अकेला नाम पापू का ही सामने आता है। हालांकि पिछले 03 मई को उनका इंतिक़ाल हो गया, मगर उनके द्वारा किए गए काम को किसी भी कीमत पर भुलाया नहीं जा सकता। 19 मार्च को हुई मुलाकात के दौरान उन्होंने अपने कार्य के बारे में विस्तार से हमें बताया था, उनकी जिन्दादिली और आने वाले लोगों के स्वागत करने अंदाज़ पर फिदा हुए बिना नहीं रहा जा सकता था।

 पापू का जन्म 04 मई 1958 को इलाहाबाद में ही हुआ था। वालिद मरहूम फैयाज़ अहमद खुद का कारोबार करते थे, मां मरहूमा मोबीना बेग़म कामयाब गृहणि थीं। नौ भाई और चार बहन में आप पांचवें नंबर पर थे। शुरूआती पढ़ाई नगर के अटाला स्थित मजीदिया इस्लामिया  कॉलेज से किया था, इसके बाद स्नातक की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया। स्नातकोत्तर में दाखिला लिया था, लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। 1986 में रेलवे में क्लर्क ग्रेड-1 में नौकरी लग गई। बचपन से ही क्रिकेट खेलने का शौक़ रहा, गली-मुहल्लों में खूब खेलते थे। इसी दौरान कमेंट्री करने का शौक़ हुआ, 1970 के दशक में कमेंट्री करने के लिए मनीष देव का नाम काफी लोकप्रिय था, पापू इन्हीं की नकल करने की कोशिश करते थे। स्थानीय स्तर पर होने वाले क्रिकेट मुकाबलों की कमेंट्री करने लगे।


इफ़्तेख़ार अहमद पापू से बात करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी (फाइल फोटो)


 एक बार मजीदिया इस्लामिया इंटर कॉलेज के हो रहे क्रिकेट मुकाबले की कमेंट्री कर रहे थे, वहां आकाशवाणी इलाहाबाद की टीम भी आई थी, टीम के लोगों को पापू की आवाज़ और कमेंट्री करने का अंदाज़ बहुत पसंद आया। फिर मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में हो रहे मैच की कमेंट्री करने के लिए ट्रायल के तौर इन्हें आमंत्रित किया गया, इनकी कमेंट्री को रिकार्ड करके आकाशवाणी की टीम ले गई। फिर इन्हें आकाशवाणी इलाहाबाद की टीम ने अपने पैनल में शामिल कर लिया। 1978 में पहली आकाशवाणी के लिए कमेंट्री किया, तब इन्हें पहली बार पारिश्रमिक के तौर पर 75 रुपये का चेक मिला था। यहीं से सिलसिला शुरू हो गया। फिर इन्हें दिल्ली बुलाया गया, यहां जोनल क्रिकेट मैच की कमेंट्री कराई गई। 1983 में पहली बार भारत-ए और वेस्टइंडीज के मुकाबले की कमेंट्री का अवसर मिला। 1984 में श्रीलंका और भारत-ए के मुकाबले की कमेंट्री किया।  1987 में अहमदाबाद में भारत और वेस्टइंडीज के बीच इंटरनेशनल एक दिवसीय मैच हुआ तो इन्हें कमेंट्री करने का अवसर मिला, यह इनका पहला इंटरनेशनल मैच में कमेंट्री करने का अवसर था। 1987, 1996, 2007, 2011, 2015 और 2019 के वर्ल्ड कप क्रिकेट मुकाबलों में भी आपने कमेंट्री किया था। 1987 में बीबीसी के लिए भी कमेंट्री किया। टेस्ट मैच और वन-डे को मिलाकर लगभग 150 मुकाबलों की कमेंट्री कर चुके थे, कमेंट्री के लिए आपने पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश का भी दौरा किया था। आखिरी बार 13 से 17 फरवरी तक चेन्नई में भारत और इंग्लैंड के बीच हुए टेस्ट मैच की कमेंट्री पापू ने किया था।

 प्रयागराज के मिन्हाजपुर में इनका निवास स्थान है। इनकी एक बेटी और बेटा है, बेटी की शादी हो गयी है। पापू का कहना था कि टीवी प्रसारण के मुकाबले रेडियो पर कमेंट्री सुनते समय लोग टीवी पर देखने के मुकाबले ज्यादा सजग रहते हैं। टीवी पर मैच देख रहे लोगों से स्कोर वगैरह पूछ लिया जाए तो बता नहीं पाएंगे, याद नहीं होगा। लेकिन रेडियो पर कमेंट्री सुनने वाले से पूछ लीजिए तो उसको सब याद रहता है।

   (गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2021 अंक में प्रकाशित )


बुधवार, 22 सितंबर 2021

‘अकबर की शायरी में अपने समय का बेहतरीन चित्रण’

‘अकबर इलाहाबादी के सौ साल बाद’ कार्यक्रम में बोले जस्टिस अशोक कुमार

तीन पुस्तकों का विमोचन, सात लोगों को मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान

न्यायमूर्ति अशोक कुमार 

प्रयागराज। यह वर्ष जहां अकबर इलाहाबादी के निधन का 100वां साल है, वहीं उनके जन्म का भी 175वां वर्ष है। ऐसे मौके पर अकबर इलाहाबादी को याद करना बेहद ज़रूरी था। अकबर ने अपनी शायरी में अपने समय की बेहतरीन चित्रण किया है। उस समय अंग्रेज़ों का देश पर कब्जा था, पूरा देश उनकी जुल्म से परेशान था, ऐसे अकबर ने बिना डरे हुए शायरी की और अंग्रेजों का मुकाबला अपनी शायरी के जरिए किया। यह बात राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने 19 सितंबर 2021 को गुफ़्तगू की ओर से हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘अकबर इलाहाबादी के सौ साल बाद’ कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि कही। उन्होंने कहा कि अकबर इलाहाबादी की शायरी से इलाहाबाद की ख़ास पहचान भी हैं, हमें ऐसे शायर को ठीक से पढ़ना भी चाहिए। कार्यक्रम के दौरान सात लोगों को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ दिया गया। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की संपादित पुस्तक ‘सदी के मशहूर ग़ज़लकार’, विजय लक्ष्मी विभा की पुस्तक ‘हम हैं देश के पहरेदार’ और जया मोहन की पुस्तक ‘रूठा बसंत’ का विमोचन किया गया।



गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि अबकर इलाहाबादी की शायरी की मक़बूलियत इतनी अधिक है कि उनकी शायरी को बडे़-बड़े गायकों ने अपनी आवाज़ दी है, पाकिस्तान से लेकर पूरे एशिया में उनके लिखे नग़में गाए जाते हैं। साहित्यकार रविनंदन सिंह ने कहा कि अकबर की शायरी में अनेक पर्तें हैं, अपने समय के तमाम पात्रों को अकबर ने उल्लेखित किया है। उन पर आरोप लगता है कि वे अंग्रेज़ी के खिलाफ थे, लेकिन हक़ीक़त यह है कि वो अंग्रेज़ी के खिलाफ नहीं थे, बल्कि अंग्रेजियत के खिलाफ थे। अंग्रेजियत की वजह से भारतीय संस्कृति नष्ट हो रही थी, जिस पर अकबर ने शायरी की। 

डॉ. ताहिरा परवीन ने कहा कि अकबर के ज़माने में दो संस्कृतियों में टकराव थी। अंग्रेजियत और हिन्दुस्तानियत के टकराव की वजह से उन्होंने इस विषय पर काफी शायरी है। उनका खिला नज्म ‘गांधीनामा’ बहुत ही मशहूर है, जिसमें उन्होंने उस समय भारत में गांधी जी के काम को शानदार ढंग से रेखांकित किया है। डॉ. मोहम्मद शाहिद ख़ान ने कहा कि अकबर की शायरी हमारे लिए एक नज़ीर है कि वक्त के साथ कैसे शायरी की जाती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. असलम इलाहाबादी ने किया। 

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। नरेश महरानी, प्रभाशंकर शर्मा, अर्चना जायसवाल, इश्क़ सुल्तानपुरी, डॉ. नीलिमा मिश्रा, शिवाजी यादव, विजय प्रताप सिंह, डॉ. राकेश तूफ़ान, नीना मोहन श्रीवास्तव, संजय सक्सेना, अफसर जमाल, शिवपूजन सिंह, संजय सागर, सरिता जायसवाल, डॉ. मधुबाला सिन्हा, सुजाता सिंह, नाज़ खान, हकीम रेशादुल इस्लाम, शैलेंद्र जय, विजय लक्ष्मी विभा, शिबली सना, अर्शी बस्तवी, उस्मान उतरौलवी, साजिद अली सतरंगी, बहर बनारसी, बसंत कुमार शर्मा, सागर होशियारपुरी, अंदाज़ अमरोहवी, रईस सिद्दीक़ी, राज जौनपुरी, अतिया नूर, रजिया सुल्ताना आदि ने कलाम ने पेश किया।


इन्हें मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान

इफ्तेख़ार अहमद पापू (मरणोपरांत), सरदार जोगिंदर सिंह (मरणोपरांत), नीलकांत, राजेंद्र कुमार तिवारी उर्फ दुकान जी, अतुल यदुवंशी, डॉ. सविता दीक्षित, डॉ. सोनिया सिंह 



बुधवार, 15 सितंबर 2021

हिन्दी भाषा के लिए अतुलनीय प्रयास

                                        - अजीत शर्मा ’आकाश’


   

माननीय उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कीर्तिशेष न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी ने अपने न्यायिक कार्यकाल में लगभग 5,000 निर्णय एवं आदेश हिन्दी भाषा में दिये, जो आज एक कीर्तिमान बन गया है। ‘पावन स्मृतियां’ शीर्षक पुस्तक उन्हीं के सुपुत्र माननीय न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने उनके 90 वें जन्म दिवस 30 सितम्बर, 2020 के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत की है। पुस्तक में प्राक्कथन के अंतर्गत लेखक ने न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी के जीवन, शिक्षा एवं न्यायिक क्षेत्र में उनके द्वारा मातृभाषा हिन्दी को प्रतिष्ठित किये जाने एवं गरिमापूर्ण स्थान दिलाये जाने के विषय में सविस्तार प्रकाश डाला है। पुस्तक में बताया गया है कि वकालत से न्यायिक सेवा प्रारम्भ करने वाले उनके पिताश्री ने अपीलीय ट्राइल एवं वादों में अपना पक्ष हिन्दी भाषा में रखा, जिससे वादकारी यह जान सके कि उसके अधिवक्ता द्वारा उसके वाद को ठीक से प्रस्तुत किया गया है। न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी मानते थे कि जनता को न्याय जनभाषा में नहीं मिलता है। आज भी उच्च न्यायालय में अंग्रेजी का बोलबाला है और इस कारण समाज में वर्गभेद स्थापित हो रहा है। अत : वे मातृभाषा हिन्दी में ही बहस की अनुमति लेकर न्यायिक कार्य सम्पन्न करते थे। मातृभाषा हिन्दी के प्रति उनका यह अगाध प्रेम 1992 में उनकी सेवानिवृत्ति और उसके पश्चात् भी जीवन भर बना रहा। वर्ष 1993 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा उन्हें ‘हिन्दी गौरव’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं की अभिवृद्धि के लिए उन्होंने वर्ष 1993 में ‘इटावा हिन्दी सेवा निधि’ संस्था स्थापित की। 

  इस पुस्तक के लेखक विद्वान् न्यायमूर्ति अशोक कुमार को भी हिन्दी के प्रति निष्ठा अपने पिताश्री से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुई। इसी का परिणाम रहा कि उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश का पदभार ग्रहण कर अपना प्रथम निर्णय हिन्दी में लिखवाकर एवं अपने कार्यकाल का अन्तिम आदेश भी हिन्दी में पारित कर अपने पिताश्री को श्रद्धांजलि अर्पित की। मात्र यही नहीं, अपने कार्यकाल में जब भी सम्भव हो सका तब उन्होंने हिन्दी में निर्णय एवं आदेश पारित किये। पुस्तक को दो खंडों में विभक्त किया गया है। प्रथम खंड में लेखक द्वारा अपने कार्यकाल में दिये गये लगभग 32 न्यायिक निर्णय एवं द्वितीय खंड में लगभग 26 न्यायिक आदेशों का संकलन है। न्यायिक कार्यों में हिन्दी का प्रयोग करके अपनी मातृभाषा की सेवा के साथ ही जन-जन तक न्याय पहुंचाने की दिशा में किया गया उनका यह अभिनव प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय एवं स्वागतयोग्य है। पुस्तक के अन्त में कीर्तिशेष न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी की स्मृतियां संजोए हुए कुछ छायाचित्र एवं लेखक के न्यायिक कार्यकाल की स्मृतियाँ एवं कुछ पारिवारिक छायाचित्र भी संकलित हैं। पुस्तक का मुद्रण एवं प्रकाशन उच्च कोटि का है। 202 पेज की इस पुस्तक को माडर्न लॉ हाउस प्रा.लि. इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है, 

 

 देशप्रेम का रंग लिए अच्छी बाल-कविताएं


  

अच्छा बाल-साहित्य बच्चों के मानसिक विकास के लिए नितान्त आवश्यक है। यह बच्चों से सीधा संवाद स्थापित करने की विधा है। साधारणतः यह धारणा है कि बच्चों के लिए लिखना सहज कार्य है। लेकिन ऐसा नहीं है। इसके लिए स्वयं को बच्चों के मानसिक स्तर पर लाना होता है, तभी यह सृजन नन्हें बालकों को प्रेरित करता है। वरिष्ठ कवयित्री विजयलक्ष्मी ‘विभा‘ अपनी अन्य विधाओं की अपनी कृतियों के साथ ही बाल साहित्य के सृजन में भी उतनी ही सक्रिय हैं। अपने बालगीत संग्रह ‘हम हैं देश के पहरेदार’ के माध्यम से उन्होंने बच्चों को उनके परिवेश, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, संस्कारों, जीवन मूल्यों, आचार-विचार एवं व्यवहार के प्रति सतत् चेतन बनाने का प्रयास किया है। प्रस्तुत संग्रह में 32 बाल कविताएं संकलित हैं। प्रायः सभी रचनाएं देशभक्ति का स्वर लिए हुए हैं, साथ ही विविध मानवीय मूल्यों से युक्त भी हैं। इनमें रोचकता एवं मनोरंजकता का भी ध्यान रखा गया है, जिससे रचनाएं बोझिल न होने पायें। प्रस्तुत हैं इस बाल गीत संग्रह की कुछ रचनाओं के उल्लेखनीय अंशः- संग्रह की पहली रचना ‘भारत सबसे प्यारा है’ देशप्रेम की अच्छी कविता है एवं बच्चों के मन में देशभक्ति का भाव जाग्रत करने में सक्षम है- नील गगन के तारों में/सबसे उज्ज्वल ध्रुवतारा है/धरती के तारों में अपना/भारत सबसे प्यारा है।’ इस कविता में सम्पूर्ण मानवजाति के कल्याण की कामना की गयी है-‘सुख, शांति और खुशहाली हो/हर मुख पर मुखरित लाली हो।’ इनके अतिरिक्त हरदम हैं तैयार, तसवीर बनायें, मणि मुक्ता सा मन है, चांद सूरज वाला, इंसाफ कर, हम हैं अपने स्वयं प्रणेता आदि कविताएं भी उल्लेखनीय हैं। संग्रह की रचनाएं छन्दबद्ध, गेय एवं बाल-पाठकों को देशभक्ति के रंग में रंगने में सक्षम हैं। यह कविताएं बच्चों में अपनी जन्मभूमि, अपने देश, प्रकृति व पर्यावरण के प्रति रुचि जाग्रत करती हैं। कुल मिलाकर श्रेष्ठ बाल-कविताओं का संग्रह ‘हम हैं देश के पहरेदार’ बच्चों के लिए उपादेय होगा एवं बाल-मन को भायेगा, ऐसी आशा है। बाल-साहित्य के सृजन में कवयित्री का यह योगदान सराहनीय है। इस पुस्तक को गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 50 रुपये है।


 ग़ज़ल लेखन का सराहनीय प्रयास


 

ग़ज़ल आज हिन्दी साहित्य में भी एक लोकप्रिय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। इसका शिल्प एवं इसके व्याकरण की समझ रखने वाले कुछ ग़ज़लकार इस विधा को और ऊंचाइयां प्रदान कर रहे हैं। लेकिन, ध्यातव्य है कि ग़ज़ल का एक विशेष अनुशासन एवं व्याकरण है, जिसका पालन किया जाना गजल-लेखन के लिए अनिवार्य होता है। रामावतार सागर का ग़ज़ल संग्रह ‘निगाहों में बसा सावन’ अपनी कुछ खूबियों के साथ ही कुछ कमियां भी समेटे हुए है। ग़ज़ल संग्रह से चयनित किये गये अशआर इसके साक्षी है। उदाहरणार्थ-आज के नेताओं की सियासत बयान करते हुए ये अश्आर- ‘वोट देकर जिताया था हमने जिसे/वो भी निकला नहीं है खरा आदमी। तुझे बस काम है वोटों से मेरे/तेरा वादा तो हर झूठा रहा है।’ आम आदमी की पीड़ा का चित्रण- ‘होगा गुजारा कैसे ये सोचना हमारा/राशन ख़त्म है सारा और इक माह बिताना। रोटियां फाकाकशों से दूर हैं/ अब ये दिन कैसे गुजारे जाएंगे।’ संग्रह की कई ग़ज़लें बे-बह्र हैं। स्थान-स्थान पर शे‘रों में रवानी की कमी खटकती है। अधिकतर शे‘र शब्दों के गठजोड़ के रूप में सामने आते हैं। ग़ज़लकार ने अच्छी ग़ज़लें कहने की भरसक कोशिश की है। इसके अतिरिक्त ख़्यालों, तर्जुबे, फिकर, रोड़, होंसले, जैसे अशुद्ध शब्दों का प्रयोग ग़ज़ल के सौन्दर्य एवं कथ्य को बाधित करता है। मात्रा पूर्ति के लिए ‘न’ के स्थान पर ‘ना’ का प्रयोग उचित नहीं। फिर भी, ग़ज़ल-लेखन के क्षेत्र में इसे रचनाकार का एक सराहनीय प्रयास कहा जा सकता है। आशा है कि गजलकार का अगला संग्रह ग़ज़ल के शिल्प एवं व्याकरण को दृष्टिगत रखते हुए और बेहतर होगा। 80 पेज की इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 100 रुपये है।


 मनोभावों की सहज अभिव्यक्त करतीं कविताएं



 देश भर की महिला रचनाकारों की सोच, उनके मनोभाव एवं उद्गारों को व्यक्त करता हुआ देश की 11 कवयित्रियां काव्य संकलन का प्रकाशन एक सार्थक एवं सराहनीय प्रयास है। अधिकतर रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों एवं अनर्गल परम्पराओं के विरूद्ध संघर्ष छेड़ते हुए समाज को एक नई दिशा देने का प्रयास किया है।  राजकांता राज की महिला सशक्तीकरण की रचना- ‘मत समझो मैं बेचारी हूं/मैं नारी हूं (’मैं नारी हूं’)। बेटी शक्ति थी बेटी शक्ति है/और बेटी हमेशा शक्ति ही रहेगी (’बेटी’)। ममता बाजपेयी ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से अपने मनोभाव व्यक्त किये हैं -‘चांदनी भी तो एक धोखा है/ये उजाले उधार वाले हैं। ममता कालड़ा की ’अधूरी  आस’ कविता में समाज को जागृत करने का प्रयास किया गया है। प्रीति शर्मा ‘असीम‘ की कविताएं भी प्रभावित करती हैं। डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई की कविताओं में वर्तमान सामाजिक यथार्थ का विशेष रूप से चित्रण है -‘सब रिश्ते बाजार हुए अब/अब रिश्तों में जान कहां है। (’कहां है’) ओढ़े रहो आवरण चाहे जितने/तुम्हारा सच हमें दिखने लगा है।’ डॉ. रेणु अग्रवाल की कविताएं पाठकों को आशान्वित करती हैं। करूणा झा की ’जवानी’ कविता में आज के राजनीतिक यथार्थ का चित्रण हैः-‘उठाओ, मारो, काटो, खत्म कर दो/ये कैसी हुक्मरानी आ गई है।’ कुल मिलाकर महिला रचनाकारों की काव्य-यात्रा में सहभागिता की ओर ध्यानाकर्षण करता है ‘देश की 11 कवयित्रियां‘ काव्य संकलन। 200 पेज के इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 300 रुपये है।

रचनाधर्मिता को रेखांकित करने का प्रयास


 

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के संपादन में प्रकाशित हुई पुस्तक ‘उत्तर प्रदेश की सात कवयित्रियां’  की कवयित्रियां अपने मनोभावों को व्यक्त करने में काफी हद तक सफल रही हैं। अतिया नूर का काव्य सृजन उनकी रचनाधर्मिता एवं उनकी सृजनात्मकता को उजागर करता है। कई रचनाएं अच्छी बन पड़ी हैं। शिल्प विधान की दृष्टि से भी कविताएं आकर्षित करती हैं। ‘उर्दू की कहानी’ कविता के माध्यम से संक्षेप में उर्दू भाषा का पूरा इतिहास बता दिया है। ‘तख़्त पे कातिल बिठाया जाएगा’ कविता में तुच्छ राजनीति पर प्रहार करने का प्रयास किया गया है। डॉ. मंजरी पांडेय की कविताएं सार्थक सृजन की पहचान हैं, समाज को सन्देश देती हैं। ‘सरसों खेत में फूल रही है’ कविता प्रकृति प्रेम को दर्शाती है। डॉ. नीलम रावत की ग़ज़लें कथ्यात्मक दृष्टि से अच्छी हैं, लेकिन शिल्प की दृष्टि से कहीं-कहीं कुछ कमियां हैं। कुछ उल्लेखनीय अश्आर-‘रेत पर घर फिर बनाना है तुझे/पीर में भी मुस्कुराना है तुझे।’ डॉ. नसीमा निशा की ग़ज़लें राजनीति, सामाजिक सरोकार एवं स्त्री विमर्श की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं एवं अच्छी बन पड़ी हैं। शिल्प विधान की ओर अधिक ध्यान दिया जाता, तो और अच्छा होतां। ममता देवी की काव्य रचनाएं यथार्थ के धरातल पर हैं एवं कवयित्री के मनोभावों को स्पष्ट रूप से प्रकट करती हैं। शबीहा खातून की रचनाओं का शिल्प पक्ष अपेक्षाकृत ठीक है। इनकी ‘उल्फत भरे लमहात’, ‘चूड़ियों की सदा’ उल्लेखनीय हैं। शगुफ़्ता रहमान की रचनाएं भी मनोभावों और उद्वेगों की अभिव्यक्ति करने में सफल हैं। ‘मेरा भी वतन तेरा भी वतन’ देशप्रेम, भाईचारे और आपसी सद्भाव की कविता है। कुल मिलाकर काव्य-संकलन महिला रचनाकारों की रचनाधर्मिता एवं उनकी सृजनात्मकता को उजागर करता है। 128 पेज के इस संकलन को गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 200 रुपये है।


  विसंगतियों को रेखांकित करती कहानियां 



 जया मोहन के कहानी-संग्रह ‘परसी थाली’ में सामाजिक विषयों को लेकर लिखी गयी  कहानियां संकलित हैं। जिनके माध्यम से समाज को रचनाधर्मी सन्देश दिए गए है। कहानियों की विषयवस्तु में सामाजिक कुरीतियों, गिरते हुए मानव मूल्यों एवं बिगड़ते हुए वर्तमान परिवेश पर प्रहार किया गया है। संग्रह की कहानियां मार्मिक, हृदयग्राही, प्रभावशाली एवं विविध मनोभाव लिए हुए हैं, जिनमें मानवीय संवेदनाओं एवं भावनाओं को सफलतापूर्वक उकेरने का प्रयास किया गया है। संग्रह की प्रथम कहानी ‘हॉर्न’ एक विधवा स्त्री की मानसिक पीड़ा को व्यक्त करती है, जो न चाहते हुए भी परिस्थिति जन्य कारणों से पतन के दलदल में फंस जाती है। उसकी पीड़ा वास्तविक रूप से समाज की पीड़ा ही है। ‘ऐ री मैं तो’ एक प्रेमकथा है, जिसमें सामाजिक रूढ़ियां एवं जाति-पाँति आड़े आती है। बाद में विधवा होने पर ऊंच-नीच का भेदभाव दूर कर प्रेमी और प्रेमिका विवाह करा दिया जाता है। ‘जाति-पाँति नहीं, मानवता महत्व रखती है’, इस कहानी का मूल सन्देश है। ‘बाजूबंद’ आभूषण-मोह के कारण माँ और बेटियों के रिश्तों के बीच आयी खटास की कहानी है। इस कारण माँ विक्षिप्त हो जाती है और प्यार के रिश्तों में दरार पैदा हो जाती है। इस कहानी में भी जाति-पाँति प्रथा के खण्डन की बात की गयी है। ,

‘गुनाहगार कौन’ शक में बिखर जाने वाले एक परिवार की कहानी है। पति का अत्याचार सहन करती हुई प्रताड़ित नारी का चित्रण इसमें किया गया है। संस्कारों की जीवित रखने की बात भी कही गयी है। इसी तरह अन्य कहानियों के परिदृश्य हैं, जो पाठक को अपनी ओर खींचती हैं। प्रूफ एवं मुद्रण-त्रुटियों के कारण व्याकरण एवं वर्तनी सम्बन्धी अनेक अशुद्धियाँ पुस्तक में यत्र-तत्र दृष्टिगत होती हैं। अनुस्वार सम्बन्धी अशुद्धियों की भरमार है। इसके अतिरिक्त ध-घ, भ-म, व-ब की भी अशुद्धिया हैं। कहानियों के संवादों में उद्धरण-चिह्न (“ “) प्रयुक्त न किये जाने के कारण कथावस्तु एवं संवाद एक दूसरे में मिल गये हैं, जिससे पाठक को बोधगम्यता में असुविधा होती है। कहानियों की भाषा सहज एवं सरल है, किन्तु जायजाद, ववंडर, आवाक, अभीभूत, अक्ष्मय, गर्भजोशी, अवरूध, पंड़ित जैसे अशुद्ध शब्दों का प्रयोग संग्रह की स्तरीयता को कम करता है। इन सबके बावजूद नारी विमर्श एवं अन्य सामाजिक विषयों को उठाने के लिए लेखिका साधुवाद की पात्र हैं। रवीना प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 114 पृष्ठ के इस कहानी-संग्रह का मूल्य 250 रुपये है।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2021 अंक में प्रकाशित )