बच्चों के साथ खूब खेलते थे राही मासूम रज़ा
चारपाई पर लेटकर पतंग उड़ाने का था ख़ास शौक़
तीन फिल्मों के संवाद लेखन के लिए मिला फिल्मफेयर
- डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
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| राही मासूम रज़ा |
राही मासूम रज़ा को टीवी सीरियल ‘महाभारत’ का संवाद लिखने के लिए सबसे ज़्यादा याद किया जाता है, हालांकि इन्होंने और भी बहुत सारे काम किए हैं। रविवार की सुबह नौ बजे जब यह सीरियल दूरदर्शन पर आता था, सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था, जैसे कफर््यू लगा हो। इस सीरियल के संवाद में इन्होंने ‘माताश्री’ और ‘पिताश्री’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया और हिन्दी भाषा को दो नये शब्द दिए। इसके पहले ये शब्द किसी ने सुना या पढ़ा नहीं था। टीवी सीरियल महाभारत के लिए लिखे गए उनके संवाद आज भी हमारे मन-मतिष्क में इस तरह से समाहित हैं कि इसके अलावा कोई अन्य संवाद स्वीकार हो ही नहीं सकता। फिल्म ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ (1979), तवायफ़ (1985) और लम्हे (1991) के लिए बेहतरीन संवाद लिखने पर उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ संवाद का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड प्रदान किया गया था।
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| अपनी पत्नी नैयर जहां के साथ राही मासूम रज़ा। |
राही मासूम रज़ा की भांजी डॉ. शबनम रिज़वी बताती हैं-‘बच्चों से उनको बहुत लगाव था। जब कभी ग़ाज़ीपुर आते, पूरे परिवार और मुहल्ले के कई बच्चों को एकत्र करके उनके साथ खेलते थे, उनको कहानियां सुनाते थे। उनके लिए नई-नई कहानियां गढ़ते भी थे। बच्चों से उनकी स्कूल की बातें भी खूब सुनते थे। हर बच्चे से पूछते कि आज स्कूल में क्या-क्या हुआ। ज़रूरत के मुताबिक बच्चों को सलाह देते थे कि-क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।’ पढ़ने-लिखने के अलावा उनको पतंग उड़ाने का भी बहुत शौक़ था। ख़ासियत यह थी कि छत पर रखी हुई चारपाई पर लेटकर पतंग उड़ाते थे। घंटों पतंगबाजी करते थे, ग़ाज़ीपुर में रहने के दौरान यह काम भी ज़रूर करते थे और खूब करते थे।
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| परिवार के बच्चों के साथ राही मासूम रज़ा। |
वे काफी लंबे समय तक बीमार रहे। उन्होंने अपनी बीमारी को भी खूब इंज्वाय किया। डॉ. शबनम रिज़वी के मुताबिक-‘वे कहते थे कि बीमार हो जाने का मतलब यह नहीं है कि ज़िन्दगी ख़त्म हो गई।‘ उनकी दो शादी हुई थी। पहली पत्नी से कोई औलाद नहीं थी। उसके निधन हो जाने पर उन्होंने नैयर जहां से शादी की। दूसरी पत्नी पहले से तलाक़शुदा थी, उसके पहले से ही तीन बच्चे थे, इन्हें भी राही मासूम रज़ा ने अपने बच्चों की तरह पाला था। विधवा से विवाह करने के कारण उन्हें बहुत मुख़ालफ़त का सामना करना पड़ा था। इसी मुख़ालफत की वजह से उन्होंने अलीगढ़ छोड़ दिया था, जबकि वे इसी यूनिवर्सिटी में अध्यापक थे। मासूम रज़ा की एक बेटी मरियम है, जो वर्तमान समय में अपने पति मजाल मूनिस के साथ अमेरिका में रहती है। उनका एक बेटा शेखू है, जो इस समय मुंबई में रहता है।
मासूम रज़ा राही का जन्म 01 सितंबर 1927 को ़उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने धार्मिक पुस्तकों का खूब अध्ययन किया। हिंदुस्तानी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने बाद उनकी रूझान साहित्य की तरफ हुई।
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| ग़ाज़ीपुर के गंगौली गांव में स्थित राही का घर। |
वर्ष 1967 में अलीगढ़ छोड़कर वे मुंबई चले गए। यहां आकर इन्होंने फिल्मों के लिए लेखन शुरू किया। इनका हिंदी फ़िल्मों में करियर ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित रोमांटिक ड्रामा फ़िल्म ‘मिली’ (1975) से शुरू हुआ। उनके संवाद की काफ़ी प्रशंसा हुई, इसी के साथ हिंदी फ़िल्म उद्योग में उनके सफल करियर की शुरुआत हुई। गोलमाल (1979), कर्ज़ (1980), जुदाई (1980) और डिस्को डांसर (1982) जैसी कई सफल फ़िल्मों में काम करने के बाद बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ‘तवायफ़’ (1985) के लिए भी संवाद लिखा। एक तवायफ़ के जीवन और उसकी दुविधाओं को दर्शाती इस फ़िल्म में उनके संवादों ने किरदारों को मानवीय बनाने और कहानी की भावनात्मक गहराई को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे फ़िल्म को आलोचकों की प्रशंसा मिली। इसके बाद राही मासूम रज़ा ने हनी ईरानी के साथ मिलकर यश चोपड़ा की संगीतमय रोमांटिक ड्रामा ‘लम्हे’ (1991) की पटकथा और संवाद लिखा। कुल मिलाकर उन्होंने फिल्म मिली (1975), अलाप (1977), मैं तुलसी तेरे आंगन की (1978), गोलमाल (1979), कर्ज़ (1980), जुदाई (1980), हम पांच (1980), तवायफ़ (1985), अनोखा रिश्ता (1986), बात बन जाए (1986), नाचे मयूरी (1986), आवाम (1987), लम्हे (1991), परम्परा (1992) और आइना (1993) के लिए संवाद लेखन किया।
उनकी प्रमुख किताबों में आधा गांव, दिल एक सादा कागज़, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद, कटरा बी आरज़ू, दृश्य संख्या-75, मौज-ए-ग़ुल मौज-ए-सबा (उर्दू), अजनबी शहर: अजनबी रास्ते (उर्दू), मैं एक फेरीवाला (हिन्दी), शीशे के मकान वाले (हिन्दी), छोटे आदमी की बड़ी कहानी और नीम का पेड़ आदि हैं। 15 मार्च 1992 को 62 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। शिक्षाविद् मूनिस रज़ा और विद्वान मेहंदी रज़ा के छोटे भाई थे मासूम रज़ा।
(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)























