सोमवार, 26 सितंबर 2022

गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2022 अंक में



4. संपादकीय:  भड़ैती में एक्सपर्ट हो चुके हैं मंचीय कवि

5-9. 1857 की बग़ावत में उर्दू अख़बारात का किरदार - डॉ. आमिर हमजा

10-11. निराला के बहाने हो रही कविता की दुर्गति - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 

12-24. ग़ज़लें:(डॉ. बशीर बद्र, मुनव्वर राना, देवी नागरानी, विश्वास लखनवी, पवन कुमार, डॉ. तारिक़ क़मर, विज्ञान व्रत, मासूम रज़ा राशदी, डॉ. राकेश तूफ़ान, अरविंन्द असर, डॉ.  नसीमा निशा, बहर बनारसी, सरफ़राज़ अशहर, विवके चतुर्वेदी, ए.एफ. नज़र, पदम प्रतीक, चाधैरी मुजाहिद,  अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’, डॉ. कविता नंदन, अरविंद अवस्थी, राज जौनपुरी, राकेश नामित, अतिया नूर, शगुफ्ता रहमान ‘सोना’,  मधुकर वनमाली, डॉ. रामावतार सागर )

25-31. कविताएं: ( यश मालवीय, डॉ. प्रकाश खेतान, जितेंद्र कुमार दुबे, ज्योति किरण, नीना मोहन श्रीवास्तव, रचना सक्सेना, पूजा सिंह, केदारनाथ सविता, मंजुला शरण )

32-35. इंटरव्यू: वेबसाइट पर उर्दू अकादमी की सारी जानकारियां - चौधरी कैफुल वरा

36-38. चौपाल:  गुफ़्तगू के सफ़र को किस नज़र से देखते हैं

39-41. तब्सेरा: ( ठोकर से ठहरो नहीं, अंतर्नाद, आईना-ए-हयात, पहली बंूद)

42-45. उर्दू अदब: ( फूल मुख़ातिब हैं, ख़्वाबों का जज़़ीरह, एहसास-ए-मुजाहिद, पिकनिक, देखो तो ज़रा )

46-47. गुलशन-ए-इलाहाबाद: बादल चटर्जी का बस नाम ही काफी है

48. ग़ाज़ीपुर के वीर: डॉ. विवेकी राय

49- 53. अदबी ख़बरे

परिशिष्ट-1: शमा फ़िरोज़

54. शमा फ़िरोज़ का परिचय

55-56. सीधे दिल पर असर करने वाली शायरी- सरफ़राज़ आसी

57-58. प्रेम की विविध अनुभूतियों का शानदार वर्णन - डॉ. शैलेष गुप्त वीर

59-60. विविध विषयों को रेखांकित करती ग़ज़लें - रचना सक्सेना

61-84. शमा फ़िरोज़ के कलाम


परिशिष्ट-2: अर्चना जायसवाल ‘सरताज’

85. अर्चना जायसवाल ‘सरताज’ का परिचय

86-87. बहुतेरी विधाओं की कवयित्री अर्चना सरताज- सीपी सुमन युसुफपुरी

88-89. विभिन्न रंग और खुश्बू के पुष्प् - अनिल मानव

92-114.  अर्चना जायसवाल ‘सरताज’ की रचनाएं

परिशिष्ट-3: जगदीश कौर

115. जगदीश कौर का परिचय

116-117. समाज को बेहतर करने की छटपटाहट- डॉ. मधुबाला सिन्हा

118- पाठक के दिल को प्रभावित करती कविताएं - शैलेंद्र जय

119-120. देश और समाज को समर्पित कविताएं - शगुफ्ता रहमान

121-144. जगदीश कौर की कविताएं


शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

अम्न और भाईचारे के फूलों का गुलदस्ता


                                           -अजीत शर्मा ‘आकाश’


                                             

  पत्रकार, साहित्यकार एवं शायर इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की पुस्तक ‘फूल मुख़ातिब हैं’ में उन्होंने फूल विषय पर 300 शे’र कहे है। अधिकतर शे’र प्रेम एवं श्रृंगार विषय पर केंद्रित हैं, जिनके माध्यम से अपने महबूब की तारीफ़, मान-मनुहार एवं इश्क़ का इज़हार किया गया है। शायरों एवं कवियों के लिए फूल प्रारम्भ से ही प्रेम के प्रतीक रहे हैं। अपने महबूब की तारीफ़ करनी हो, या अपनी मुहब्बत का इज़हार करना हो तो इनसे अच्छा माध्यम कोई नहीं है। “फूल नाज़ुक है मानता हूं मैं/ तेरे लब से मगर ज़रा कम है।“, “फूल ख़ुद को हसीन कहते थे/ तुमको देखा तो भरम टूट गया।“, “पास जब भी तुम इनके होते हो/ फूल दिलकश हसीन लगते हैं।“ इसके अतिरिक्त फूल के बहाने इन शेरों में प्रेम, मुहब्बत, भाईचारे, पारस्परिक सौहार्द और विश्व बंधुत्व का संदेश देने का प्रयास किया है। जिस प्रकार जीवन के अनेक रंग होते हैं, उसी प्रकार फूल भी अनगिनत रंगों के होते हैं। ये सबके लिए ख़ुश्बू लुटाते हैं, जिनसे संसार महकता है। शायर की तमन्ना है कि फूलों की ख़ुश्बू निरंतर फैलती रहे। फूल हमें ख़ुशबू का एहसास कराते रहें और जीना सिखाते रहें। मोहब्बत का पैग़ाम इस तरह दिया गया हैः- “दुश्मनों को भी फूल भेजो तुम/ एक दिन दुश्मनी भुला देंगे।“

  फूल सदैव सकारात्मकता के प्रतीक होते हैं। ये फूल हर किसी को जीने का हौसला देते हैं। ये हमें ज़िन्दगी की हक़ीक़त से रूबरू कराते हैं, मानो कह रहे हों कि ज़िन्दगी कितनी ख़ूबसूरत हैः-“फूल देखो और फिर बोलो/ कितनी प्यारी ये ज़िंदगानी है।“ देखा जाए तो फूल हमें जीवन-संघर्ष की प्रेरणा भी देते हैं। आंधी, तूफ़ान, बरसात, गर्मी, सर्दी सब झेलते हुए हर हाल में मुस्कुराते और खिलखिलाते रहकर फूल एक अनमोल सन्देश देते हैं। फूल हमारे साथ कभी मुस्कुराते हैं कभी खिलखिलाते हैं, तो कभी उदास होते हैं। हमारे हंसने पर फूल हंसते हैं, हम दुखी होते हैं, तो फूल भी उदास होते हैं, ऐसा शायर का मानना हैः-“फूल फिर है उदास ऐ ग़ाज़ी/आज तुम फिर से मुस्कुरा देना।“ दार्शनिक अन्दाज़ में कहे गये कुछ शे’र अपने अंदर गूढ़ अर्थ समेटे हुए हैं। पुस्तक में अलग-अलग अन्दाज़ के अशआर हैं, जिनके बहुआयामी अर्थ निकलते हैं-“फूलों के संसार में तरह-तरह के रंग/कुछ में तेरा रंग है, कुछ में मेरा रंग।“ आज निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए लोग कुछ भी कर डालते हैं तथा दूसरों की भावनाओं एवं उनके हित-अनहित से इन्हें कोई लेना देना नहीं होता। इसी पीड़ा को इस शे’र में अभिव्यक्ति दी गयी हैः-“फूल की ज़िन्दगी के लिए/ मुझको कांटा बनाया गया।“ यह पुस्तक एक प्रकार से अम्न और भाईचारे के फूलों का गुलदस्ता है। शे’र कहने का शायर का अन्दाज़ लुभावना है। सादा ज़बान, आम लहज़े एवं आमफ़हम भाषा में बात कही गयी है। कठिन एवं बोझिल शब्दों से बचा गया है। गुड मार्निंग, प्रोफ़ाइल, प्रॉमिस, वेलेंटाइन, आई लव यू, ब्रेकअप, लबबैक जैसी भाषा एवं शब्दों का प्रयोग कर शायरी को एक नया एवं आधुनिक अन्दाज़ देने का प्रयास किया गया है। कुल मिलाकर फूल को प्रतीक मानकर, फूल लफ़्ज़ एवं विषय पर सकारात्मक सोच के 300 शेरों की ‘फूल मुख़ातिब हैं’ पुस्तक पठनीय एवं सराहनीय है। 80 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 130/ -रूपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है।

श्रेष्ठ गीतों का संकलन



 छंद विहीन नयी कविता के इस दौर में अधिकतर रचनाकार स्वयं को कवि कहलाने के लिए कुछ पंक्तियों को जोड़-तोड़कर एक रचना कर डालते हैं, जिसे वह कविता का नाम दे देते हैं। इससे कविता की छन्दबद्धता में एक प्रकार का प्रदूषण-सा फैलता हुआ दृष्टिगोचर होता है। इस प्रकार की रचनाओं में लयात्मकता एवं गेयता के लिए कोई स्थान नहीं होता है। इसका सीधा-सा कारण है कि इस प्रकार के रचनाकार छन्दानुशासन से नितान्त अनभिज्ञ होते हैं तथा छन्दानुशासन सीखना ही नहीं चाहते। ऐसे में छंदबद्ध लयात्मक गीतों के संग्रह से रूबरू होना एक सुकून सा प्रदान करता है। ‘मैं भी सूरज होता’ कवि अशोक कुमार स्नेही के 20 गीतों एवं मुक्तकों की लघु पुस्तक है। इस पुस्तक में उनके कुछ विशिष्ट गीत एवं मुक्तक संकलित किये गये हैं। गीतों में छन्दबद्धता, लयात्मकता एवं गेयता की ओर पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है तथा तुकान्तता का भलीभाँति निर्वाह किया गया है। सभी रचनाएँ भाव प्रवण हैं। गीतों की भाषा में समरसता परिलक्षित होती है। शब्द चयन भी सराहनीय है, जिसके अन्तर्गत सामान्य बोलचाल के शब्दों से लेकर साहित्यिक एवं परिमार्जित एवं संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग भी किया गया है। पुस्तक में संकलित अधिकतर गीत संयोग एवं वियोग श्रृंगार रस प्रधान हैं तथा हृदय को आह्लादित करते हैं। कुछ रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों का चित्रण भी किया गया है।

 पुस्तक के शीर्षक गीत ‘मैं भी सूरज होता’ में कवि कहता हैः- अब तक जितना चला डगर मैं, मेरे साथ चला अँधियारा/ जाने इस सूरज को मेरी क्यों कोई परवाह नहीं है। ‘मेरा दीप रात भर रोया’ शीर्षक रचना में आज के समाज में फैली हुई आर्थिक असमानता एवं विषमता का यथार्थ चित्रण किया गया हैः- उनके आँगन फसल ज्योति की/ मेरे द्वार अँधेरा बोया/ उनके दीपक हँसे रात भर/ मेरा दीप रात भर रोया। ‘ओ अशरीरी मेघ’ कालिदास के मेघदूतम् से अनुप्रेरित एक भाव प्रवण एवं सुन्दर गीत-रचना है। ‘तुम नहीं जब’ गीत में वियोग श्रृंगार का अच्छा चित्रण किया गया है। ‘देश के वास्ते’ एक देशभक्ति पूर्ण रचना है। मुक्तक रचनाएँ भी अच्छी बन पड़ी हैं। आँसुओं के घरौंदे गिराये गये/ बेगुनाहों पे फिर जुल्म ढाये गये/ हार रानी का लेकर के कागा उड़ा/ नौकरानी को कोड़े लगाये गये। इस मुक्तक में आज के आम आदमी की दशा-दुर्दशा का यथार्थ चित्रण करने का प्रयास किया गया है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य रचनाओं के उल्लेखनीय अंश इस प्रकार हैं रू- आओ कुछ फूल चुने ऐसे/ शूल जिन्हे सपने मे देख डरे (आओ कुछ बात करे)। ऐसे सम्बन्घ हम जिये/ शब्दों के अर्थ खो गये (बासी सकल्पो का गीत)। पुस्तक में प्रूफ़ सम्बन्धी एवं वर्तनीगत अशुद्धियों को दूर नहीं किया गया है। इसके बावजूद छन्दबद्ध रचनाओं के प्रेमी पाठकों के लिए यह संग्रह पठनीय एवं सराहनीय है। 52 पृष्ठों के इस गीत संग्रह का मूल्य 100 रूपये है, जिसे अलका प्रकाशन, ममफोर्डगंज, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है।


मनोभावों को अभिव्यक्ति करती कविताएं



 ‘गुफ़्तगू प्रकाशन’ की पुस्तक ‘दहलीज़’ कवयित्री डॉ. मधुबाला सिन्हा की 58 कविताओं का संग्रह है। कहा गया है कि कविताएं मन के समस्त भावों को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम हैं। इन्हीं मनोभावों को कवयित्री ने अपने काव्य-संग्रह में अभिव्यक्त करने की चेष्टा की है। अपने कविता-लेखन के संबंध में कवयित्री का कथन है कि वह छंदमुक्त एवं नई कविताओं की रचना करती रही हैं, किन्तु इस काव्य-संग्रह में उन्होंने गीत लिखने का प्रयास किया है। काव्य सृजन की कोई विधा हो, उसमें अनुशासन अत्यावश्यक है। गीत एक छन्दबद्ध कविता होती है, जिसका एक शिल्प विधान हैं और उसका पालन किया जाना अनिवार्य होता है, तभी वह रचना गीत कहलाती है। कवयित्री के इस संग्रह की रचनाएं गीत के शिल्प की कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती हैं। पुस्तक में संग्रहीत कविताओं के कथ्य को दृष्टिगत रखते हुए कहा जा सकता है कि लेखन में सरलता और सहजता है, लेकिन कवयित्री का भाषा और अभिव्यक्ति पर अधिकार प्रतीत नहीं होता है। संग्रह की कविताएं सामान्य स्तर की हैं। वर्ण्य विषय की दृष्टि से संग्रह की रचनाओं में श्रृंगार एवं प्रणय, वर्तमान समाज का चित्रण, जीवन की अनुभूतियां तथा संवेदनाएं, जीवन का यथार्थ, सामाजिक सरोकार, स्त्री की हृदयगत कोमल भावनाएं, आम आदमी की व्यथा आदि पहलुओं को स्पर्श करते हुए अपने एवं ज़माने के दुख-दर्द को भी रचनाओं में अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है। कविताओं में जीवन में व्याप्त संत्रास, घुटन, वेदनाओं एवं अनुभूतियों को शब्द प्रदान किये गये हैं। रचनाओं में यत्र-तत्र जीवन के अन्य अनेक रंग भी सामने आते हैं। संग्रह की अधिकतर रचनाएं संयोग एवं वियोग श्रृंगार विषयक हैं। इस प्रकार की कविताएं प्रेम के विभिन्न पक्षों, संबंधों, विसंगतियों, अनुभूतियों तथा व्यक्त और अव्यक्त प्रेम की अभिव्यक्तियों का चित्रण करती प्रतीत होती हैं। 

 पुस्तक की कुछ कविताओं के उल्लेखनीय अंश इस प्रकार हैः- जब भी दो पल मिले प्रिये तुम/पास मेरे यूं ही चले आना (‘जब भी दो पल मिले’)। चपल चांदनी चंचल चितवन/छिटक रही आकाश है/धवल नवल जग की शीतलता/प्रकाश का आभास है (‘चपल चांदनी चंचल चितवन’)। चलो दिया से दिया जलाएं/जहां बिखरा हो राग-द्वेष/प्यार का कोई फूल खिलाएं (‘चलो दिया से दिया जलाएं’)। एक दिवस मिलने आऊंगी/अपने द्वार खड़े तुम मिलना (‘एक दिवस मिलने आऊंगी’)। बिखर गए संगी और साथी/बिछड़ गया है प्यार/बहुत अब रोता है मन (‘बहुत अब रोता है मन’)। अपने मनोभावों को कविताओं के रूप में अभिव्यक्त करने की कवयित्री ने अपनी ओर से भरपूर चेष्टा की है। संग्रह के सृजन का प्रयास सराहनीय कहा जा सकता है। गीत-लेखन का कवयित्री का यह प्रयास निश्चित रूप से सफल कहा जाता, यदि छन्दशास्त्र की ओर विशेष ध्यान दिया गया होता। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कविता लेखन के क्षेत्र में यह एक सार्थक एवं सराहनीय लेखन है, जो सृजनात्मकता का द्योतक है। पुस्तक का मुद्रण एवं तकनीकी पक्ष सराहनीय है। 96 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 150 रूपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है।


कोरोना काल की अनुभूतियों की अनूठी कहानियां



 डॉ. अमिता दुबे ने कहानियां, उपन्यास, काव्य, बाल साहित्य, समीक्षा एवं समालोचना आदि साहित्य की अनेक विधाओं में अपना उल्लेखनीय रचनात्मक योगदान किया है, जिसके फलस्वरूप अनेक संस्थाओं द्वारा इन्हें पुरस्कृत एवं सम्मानित किया गया है। ‘धनुक के रंग’ इनका कहानी संग्रह है, जिसमें संकलित कहानियों को कोविड-19 महामारी की विभीषिका के भयावह पक्ष को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कोरोना काल के दौरान समाज के लोगों की मानसिक, शारीरिक, आर्थिक स्थितियों एवं जीवन-संघर्ष का मनोवैज्ञानिक चित्रण करने की सफल चेष्टा की गयी है। कथावस्तु, कथोपकथन, पात्र, देशकाल-वातावरण जैसे कहानी के तत्वों के आधार पर संग्रह की कहानियां खरी उतरती हैं। कहानियों की विषयवस्तु समसायिक है। सभी कहानियों की भाषा एवं शैली सधी हुई, सरल, सहज एवं बोधगम्य है तथा इनका उद्देश्य समाज को एक अच्छा सन्देश प्रदान करना है। सहज एवं स्पष्ट संवाद, घटनाओं का सजीव चित्रण तथा पाठकों के मन में रोचकता बनाये रखना इन कहानियों में मुख्य रूप से परिलक्षित होता है। संग्रह में कहानीकार ने अपनी पैनी तथा सूक्ष्म दृष्टि से परिस्थितियों का गहन अवलोकन करते हुए एवं समाधान की दिशा बताते हुए अपनी रचनात्मकता को उच्च आयाम दिए हैं। कहानियों की कथावस्तु के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को सामने लाने का प्रयास किया गया है। प्रत्येक साहित्यिक रचना अपने समय का दस्तावेज़ होती है। ‘धनुक के रंग’ कहानी संग्रह भी कोरोना काल के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की भांति प्रतीत होता है। अपनी इच्छाओं के अनुरूप कुछ वर्ष जीने की आकांक्षा करती हुई “अब तो लौट आओ” अवनि की कहानी है, जो अपने घर-परिवार को त्यागकर जीवन के कुछ अनुत्तरित प्रश्नों को लेकर आश्रम में चली जाती है। कहानी में दर्शाया गया है कि जिंदगी में बहुत सारे सवालों के जवाब हमें मिलते ही नहीं। “मन न भए दस बीस”  प्रेमविवाह के उपरांत उत्पन्न पारिवारिक, सामाजिक स्थितियों-परिस्थितियों एवं अंतर्द्वंद्व का चित्रण करती है। कोरोना काल के समय अनेक बार ऐसी भी परिस्थितियां सम्मुख आयीं, जब संकट की घड़ी में लोगों के असली चेहरे देखने को मिले। संक्रमण काल में कहीं स्वार्थ-लोलुपता दिखी, तो कहीं लोगों ने एक-दूसरे की बढ़-चढ़ कर मदद भी की। ‘धनुक के रंग’ कहानी संग्रह में धनुक अर्थात् इन्द्रधनुष के सात रंगों की भांति जीवन के रंगों को प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। धनुक के सभी फीके रंग मिट जाएं और चटक रंग अपनी आभा बिखेरें, इन कहानियों माध्यम से यही सन्देश प्रदान करने की चेष्टा की गई है। इस संकलन की कहानियों में लेखिका का सामाजिक सरोकार स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। 120 पृष्ठों के इस कहानी संग्रह को नमन प्रकाशन, लखनऊ ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य मूल्य 150 रुपये है।


 शब्दों की हथौड़ियों से विसंगतियों पर करारी चोट

 पुस्तक ‘हथौड़ियों की चोट’ कवि केदारनाथ ‘सविता‘ की कविताओं का संग्रह है। इन कविताओं में सामाजिक, पारिवारिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक आदि जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श किया गया है, जिसके अन्तर्गत जीवन की अनुभूति, मानव संवेदना, प्रकृति-चित्रण, आज के युग की विडम्बनाएँ आदि सम्मिलित हैं। कविताओं में आज के जीवन में व्याप्त संत्रास, घुटन, वेदनाओं एवं अनुभूतियों को चुटीले एवं मारक शब्द प्रदान किए गए हैं। पुस्तक की मुख्य विधा हास्य-व्यंग्य है, जिसके माध्यम से सामाजिक एवं राजनीतिक विसंगतियों पर प्रहार किया गया है। वर्तमान दौर में आम आदमी जीवन की जटिल समस्याओं, विद्रूपताओं एवं अनेक विसंगतियों से जूझ रहा है तथा जीने के लिए भरपूर संघर्ष कर रहा है। राजनेता अपने-अपने स्वार्थों में लिप्त हैं। महंगाई चरम पर है और दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। अनेक कठिनाइयाँ मनुष्य की प्रगति की राह रोके खड़ी हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों पर रचनाकार ने शब्दों की हथौड़ियों की गहरी चोट कर समाज को जाग्रत करने की चेष्टा की है। विसंगतियों का यथार्थ चित्रण, आज के राजनेताओं की नीयत, आम आदमी की व्यथा-कथा, वर्तमान दौर की विडम्बनाएँ, सामाजिक विसंगतियाँ, आज के समय का सच, आपसी सद्भाव और भाईचारा, ज़िन्दगी, आशावाद आदि पुस्तक की रचनाओं के वर्ण्य-विषय हैं, जिनमें पाठक को विविधता परिलक्षित होती है। कविताओं में वर्तमान परिवेश की अनेक अनुभूतियों को रोचक ढंग से सामान्य बोलचाल की भाषा में समाहित करने की चेष्टा की गयी है। संग्रह में सम्मिलित कुछ कविताएँ इस प्रकार हैं- महंगाई ने/ रोटी का आकार/ जितना छोटा कर दिया है/ आदमी ने उसे/ उतने ही बड़े तराजू में/ ईमान के साथ/ तौल दिया है (रोटी)। आज के दौर के राजनेताओं पर करारा कटाक्ष इस प्रकार किया गया हैः- आम का बाग है/ मेरा देश/ लूट लो/ जितना लूट सको/ तोड़ लो सारे फल/ कच्चे हों या पक्के/ तुम नेता हो/ इस देश के (मेरा देश)। तपती सड़क पर फ़्लैट में पंखा/ पंखे के नीचे अफसर/ अफसर के नीचे कुर्सी/ कुर्सी के नीचे/ जनता की मातमपुरसी/ सब क्रमबद्ध ही तो है (क्रमबद्ध)। इनके अतिरिक्त ‘हम आज़ाद हैं’, ‘जीने के लिए’ ‘नमक’ ‘जीवन’ आदि अन्य रचनाएँ भी सराहनीय हैं। पुस्तक का तकनीकी पक्ष आकर्षक है। समसामयिक विषयों पर हास्य-व्यंग्य शैली में लिखी गयी तथा आम पाठक को जल्दी समझ में आने वाली छोटी-छोटी चुटीली एवं मारक कविताएं समेटे हुए हथौड़ियों की चोट कवि केदारनाथ ‘सविता’ का पठनीय एवं सराहनीय कविता संग्रह है। 120 पृष्ठों की इस सजिल्द पुस्तक का मूल्य  350 रुपये है, जिसे हिन्दी श्री पब्लिकेशन, संत रविदास नगर, उ0प्र0 ने प्रकाशित किया है।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में प्रकाशित )

शनिवार, 10 सितंबर 2022

यूपी एसटीएफ के संस्थापक सदस्य राजेश पांडेय

                                        

राजेश पांडेय

             

                                                                           -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

      प्रयागराज निवासी आईपीएस राजेश पांडेय यूपी एसटीएफ और एटीएस के संस्थापक सदस्य हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने जब श्रीप्रकाश शुक्ला को पकड़ने के लिए एसटीएफ की स्थापना किया था, तब बनी इस टीम में राजेश पांडेय भी शामिल थे। मुख्यमंत्री की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हुए राजेश पांडेय की अगुवाई में यूपी एसटीएफ की टीम ने ग़ाज़ियाबाद में श्रीप्रकाश शुक्ला को एनकाउंटर किया था। 15 जून 1961 को जन्मे राजेश पांडेय के पिता स्वर्गीय श्री सीपी पांडेय इलाहाबाद हाईकोर्ट में डिप्टी रजिस्टार थे। राजेश जी ने इलाहाबाद जीआईसी से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण किया था। 1980 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीएससी और 1982 में इसी यूनिवर्सिटी से वनस्पति विज्ञान से एएससी किया। इसके बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ही यूजीसी नेट और जेआरएफ किया। वर्ष 2003 में एसपीएस में चयनित होकर पुलिस सेवा से जुड़ गए। इनकी पहली नियुक्ति सोनभद्र जिले में डिप्टी एसपी के पद पर हुई, इसके बाद इसी पद पर जौनपुर, आज़मगढ़ और लखनऊ में कार्यरत रहे।

 17 मई 1998 को एसटीएफ की स्थापना के साथ ही इन्हें इसी डिपार्टमेंट में भेज दिया गया। 08 जनवरी 2000 को इसी विभाग में एडीशनल एसपी बना दिए गए। 10 मार्च 2000 से 23 जुलाई 2002 तक लखनऊ के एसपी सिटी रहे, 03 नवंबर 2002 से 15 फरवरी 2003 तक एसपी सिटी ग़ाज़ियाबाद और 26 सितंबर 2003 से 12 फरवरी 2005 तक बाराबंकी और 02 जून 2007 से 10 दिसंबर 2007 तक मेरठ के एसपी सिटी रहे। 05 जुलाई 2005 को अयोध्या और 07 मार्च 2006 को वाराणसी में हुई आतंकी घटनाओं के बाद आपको इन घटनाओं की जांच की जिम्मेदारी दी गई थी, जिसका आपने सफलता पूर्वक निर्वहन किया। दिसंबर 2012 में आप आईपीएस हो गए, जिसके बाद  आपकी पहली नियुक्ति रायबेरली एसपी के रूप में हुई, जहां 08 जून 2014 तक कार्यरत रहे। इसके बाद एसएसपी सहारनपुर, एसपी गोंडा, एसएसपी लखनऊ, एसएसपी अलीगढ़ और एसएसपी मेरठ के रूप मे कार्य किया, फिर आपको डीआईजी बरेली बनाया गया। 01 जनवरी 2021 को प्रोन्नत कर आप आईजी हो गए। 30 जून 2021 को सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको यूपी एक्सप्रेस-वे इंडस्टीयल डेवलेपमेंट अथॉरिटी का नोडल अधिकारी बना दिया है, जहंा वर्तमान में कार्यरत हैं।

 आपको अब तक विभिन्न एवार्ड्स से नवाजा जा चुका है। जिनमें 1999, 2000. 2007 और 2006 में इंडियन पुलिस सेवा मेडल, 2005 में राष्टपति के हाथों मेडल, 2008 में यूनाइटेड नेशन मेडल, 2018 में डीजीपी के हाथों सिल्वर कॉमेंडेशन डिस्क, 2020 में डीजीपी के हाथों गोल्ड कॉमेंडेशन डिस्क, और 2021 में डीजीपी के हाथों प्लेटिनम कॉमेंडेशन डिस्क सम्मान शामिल है। साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू द्वारा इन्हें वर्ष 2022 को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान किया गया है। 


(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में प्रकाशित )


मंगलवार, 30 अगस्त 2022

मानवतावाद में यक़ीन रखते थे फ़िराक़ गोरखपुूरी: बादल चटर्जी

‘फ़िराक़ गोरखपुरी जन्मोत्सव’ पर ‘आधुनिक भारत के ग़ज़लकार’ का विमोचन 

देशभर से जुटे शायरों ने पेश किया कलाम, मिला फ़ि़राक़ गोरखपुरी सम्मान



प्रयागराज। फ़िराक़ गोरखपुरी मानवतावाद में यक़ीन करने वाले शायर थे। उन्होंने अपनी शायरी में हर वर्ग, हर धर्म और हर समाज की अच्छी बातें का वर्णन किया है। यहां तक द्वितीय विश्व को रेखांकित करते हुए ‘आधी रात’ नामक नज़्म लिखा है, जो उस दौर में बहुत ही मशहूर हुई थी। वे स्वतंत्र विचार वाले शायर थे, जहां कहीं भी अच्छी चीज़़े दिखती थी, उसे अपना लेते थे। गुफ़्तगू की ओर से कार्यक्रम आयोजित करके उनको याद करना बहुत ज़रूरी कदम है। ऐसे शायर की शायरी और जिन्दगी पर बात होती रहनी चाहिए। यह बात 28 august को गुफ़्तगू की ओर से हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘फ़िराक़ गोरखपुरी जन्मोत्सव’ के दौरान पूर्व कमिश्नर बादल चटर्जी ने कही। कार्यक्रम के दौरान इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की संपादित पुस्तक ‘आधुनिक भारत के ग़ज़लकार’ का विमोचन किया। इस किताब में शामिल सभी 110 शायरों को ‘फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान’ प्रदान किया गया।

 अध्यक्षता कर रहे अली अहमद फ़ातमी ने कहा कि 1972 से 1982 मेरा फ़िराक़ साहब से साथ साबका रहा है। उनको, जानने, समझने और पढ़ने का खूब अवसर मिला है। वे बहुत दूरन्दाज शायर थे। उनकी शायरी में इंसानियत, मोहब्बत, देशभक्ति और समाज को बेहतर बनाने का जज़्बा दिखाई देता है। जिस ज़माने में फ़िराक़ साहब शायरी के मैदार में आए थे, उस समय फ़ैज़, जिगर मुरादाबादी, साहिर लुधियावनी और अली सरदार जाफरी जैसे शायर थे। मगर, इनके बीच भी फ़िराक़ ने अपनी अलग पहचान बनाई। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि हमलोग प्रत्येक वर्ष एक शायर का जन्मदिवस मानते हैं। इससे पहले कैफी आज़मी, निराला, महादेवी, अकबर इलाहाबादी और साहिर लुधियानवी का जन्म दिवस मनाया था। इस वर्ष हमलोग फ़िराक़ साहब को याद कर रहे हैं। वाराणसी के सहायक डाक अधीक्षक मासूम रज़ा राशदी ने कहा कि फ़िराक़ साहब का चयन सिविल सर्विस में हो गया था, लेकिन उन्हें यह नौकरी पसंद नहीं आयी, उन्हें पढ़ना और पढ़ाना ही पसंद थी, इसलिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अध्यापक बनकर आ गए। डॉ. हसीन जिलानी ने फ़िराक़ गोरखपुरी द्वारा लिखे गए लेख पर शोध-पत्र पढ़ा। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। गुफ़्तगू के सचिव नरेश महरानी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। अनिल मानव, रेशादुल इस्लाम, अफसर जमाल, अर्चना जायसवाल, शैलेंद्र जय, डॉ. इश्क़ सुल्तानपुरी, राज जौनपुरी, नीना मोहन श्रीवास्तव, शिवाजी यादव, डॉ. पंकज कर्ण, धर्मेंद सिंह धरम, चांदनी समर, इकबाल आज़र, डा. इम्तियाज़ समर,,अर्शी  बस्तवी, विजय लक्ष्मी विभा, संजय सागर, अनीता सिंन्हा, फरमूद इलाहाबादी, शाहिद सफ़र, निशा सिम्मी, सेलाल इलाहाबादी, अतिया नूर, मधुकर वनमाली, ए.आर. साहिल, रश्मि रौशन, सगीर अहमद सिद्दीक़ी, वीणा खरे, सुशील वैभव,्र खरे, वर्तिका अग्रवाल, सरफ़राज अशरह, असद ग़ाज़ीपुरी, अज़हर रसूल, केदारनाथ सविता, कामिनी भारद्वाज, तलत सरोहा, सय्यदा तबस्सुम, नरेंद्र भूषण, रमेश चंद्र श्रीवास्तव आदि ने कलाम पेश किया। 

 



 

शनिवार, 20 अगस्त 2022

प्रेम का शानदार वर्णन करती हैं मधुबाला: अज़ीज़ुर्रहमान

डॉ. मधुबाला सिन्हा की पुस्तक ‘दहलीज’ का विमोचन 

मुशायरे में पहले स्थान पर फ़रमूद, दूसरे पर शरत और असलम रहे



प्रयागराज। काव्य का सृजन करना अपने-आप में बहुत ही मेहनत और दूरदर्शिता का काम है। कवि समाज, देश और प्रेम का वर्णन अपने अनुभवों से करता है। डॉ. मधुबाला सिन्हा की कविताएं इस परिदृश्य में बेहद ख़ास और महत्वपूर्ण हैं। इन्होंने अपने नज़रिए को बेहतर तरीके से वर्णित किया है। आज ऐसी ही कविताओं की ज़रूरत है। यह बात गुफ़्तगू की ओर से 14 अगस्त को करैली स्थित अदब घर में डॉ. मधुबाला सिन्हा की पुस्तक ‘दहलीज़’ के विमोचन के अवसर पर मुख्य अतिथि पूर्व जिलाजज अज़ीज़ुर्रहमान ने कही। 

गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि कविता का सृजन हर दौर में ख़ास रहा है, डॉ. मधुबाला सिन्हा की कविताएं इसी मायने में बेहद ख़ास हैं। इन्होंने प्रेम का वर्णन बहुत ही मार्मिक ढंग से किया है। इनका प्रेम अलौलिक रूप में इनकी कविताओं में दिखाई देता है। डॉ. मधुबाला सिन्हा ने कहा कि मेरी यह किताब आपके सामने हैं, मैंने एक अर्से के बाद गीत लिखना शुरू किया है, अब आपको मेरी गीतों के बारे में राय व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। प्रभाशंकर शर्मा ने कहा कि डॉ. मधुबाला की कवितओं में बहुत गहराई है, जिसकी वजह से बेहद पढ़नीय हो जाती हैं। इनके सृजन में समाज और देश के साथ-साथ प्रेम का वर्णन बहुत ही शानदार तरीके दिखता है। इनका प्रेम मनुष्यों से होकर अलौलिक होता हुआ दिखाई देता है। पुस्तक में शामिल ‘काशी’ कविता सबसे अलग और शानदार है।

 कार्यक्रम का संचालन कर रहे शैलेंद्र जय ने कहा कि डॉ. मधुबाला को पढ़ने के बाद स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि इन्होंने छंदमुक्त कविताओं को गीत बनाने का प्रयास किया है। कथन के मुताबिक कविताएं बेहद मार्मिक और उल्लेखनीय हैं। इनके अंदर एक बहुत संवेदनशील स्त्री बैठी है, जो हर पहलु को बेहतर ढंग से उल्लेखित करते हुए वर्णित करती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. वीरेंद्र तिवारी ने कहा डॉ. मधुबाला सिन्हा ने मात्र दो वर्ष पहले ही गीत लिखना शुरू किया है, जबकि एक अर्से से वे छंदमुक्त कविताएं लिखती आ रही हैं। इसलिए इस पुस्तक को मात्र दो वर्ष की कवयित्री के सृजन के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके बावजूद इनकी कवतिाओं का बिंब बहुत मार्मिक और उल्लेखनीय है।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। अतिथियों के मूल्याकंन के आधार पर इस प्रथम स्थान फ़रमूद इलाहाबादी को, द्वितीय स्थान पर शरत चंद्र श्रीवास्तव और असलम निजामी रहे। तीसरे स्थान पर वाक़िफ़ अंसारी और अनिल मानव थे। रेशादुल इस्लाम, अफ़सर जमाल, प्रकाश सिंह अर्श, अजीत शर्मा ‘आकाश’ वाक़िफ़ अंसारी, डॉ नईम साहिल, सेलाल इलाहाबादी, शुएब इलाहाबादी, शाहिद सफ़र, सत्य प्रकाश श्रीवास्तव आदि शायरों ने कलाम पेश किया 


शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

पहले एक उपन्यास नया कानून बनवा देता था: नासिरा शर्मा

 


                                                                   

नासिरा शर्मा से बात करते डॉ. गणेश शंकर श्रीवास्तव

            

 नासिरा शर्मा हिन्दी कथा जगत की जानी-मानी लेखिका हैं। अपने विविध किरदारों के चलते वे एशिया की राइटर मानी जाती हैं। यह कहना भी समीचीन होगा कि वे एक ग्लोबल लेखिका हैं, जिनके लेखन को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समान रूप से स्वीकार्यता मिली है। उनका जन्म 22 अगस्त 1948 को इलाहाबाद में एक संपन्न मुस्लिम परिवार में हुआ। प्रगतिशील विचारों के धनी उनके पिता प्रोफेसर जामीन अली उर्दू के प्रोफेसर थे। माता नाज़मीन बेगम सफल गृहणी रहीं। नासिरा जी के भाई-बहन भी साहित्य और लेखन से जुड़े रहे हैं। नासिरा जी का विवाह डॉ. रामचन्द्र शर्मा जी से हुआ जो कि भूगोल विषय में अध्यापन कार्य कर रहे थे। चर्चित उपन्यास ’पारिजात’ के लिए नासिरा जी को वर्ष 2016 का साहित्य अकेडमी अवार्ड भी मिला है। पत्थर गली’, संगसार, इब्ने मरियम, शामी कागज, सबीना के चालीस चोर, खुदा की वापसी, इंसानी नस्ल, शीर्ष कहानियां और दूसरा ताज महल आदि उनके प्रकाशित कहानी संग्रह हैं। शाल्मली, ठीकरे की मंगनी, जिंदा मुहावरे, सात नदियां एक समुंदर, अक्षयवट, कुईयांजान, पारिजात, शब्द पखेरू आदि उनके चर्चित उपन्यास हैं। उन्होंने संपादन एवं अनुवाद कार्य भी किया है, साथ ही बच्चों के लिए भी बहुत कुछ लिखा-पढ़ा है। युवा साहित्यकार डॉ. गणेश शंकर श्रीवास्तव और प्रियंका प्रिया ने उनसे बातचीत की।          

सवाल: आपने ढेर सारी कहानियां और उपन्यास लिखे हैं। उपन्यास एवं कहानी के आपसी संबंधों के बारे में आप क्या समझ्ाती हैं ?

जवाब: कहानी एक जज़्बा है, एक शिद्दत है जिसे आप उठाते हैं। चाहे वह लंबी कहानी हो या लघु कहानी, आप का जज़्बा उसमें निकल आता है। लेकिन उपन्यास में आपको पूरी बस्ती पूरा मोहल्ला बसाना पड़ता है। उसमें कभी अपना शहर तो कभी विदेश भी उपस्थित रहता है। इसलिए उपन्यास में बहुत धैर्य और समय की ज़रूरत है। उपन्यास में हर किरदार के तर्क और तथ्य को इस प्रकार साधना होता है कि उपन्यास की प्रामाणिकता और विश्वास बना रहे और पाठक को उपन्यास में आए चरित्र प्रभावित कर सकें और सच्चे लगें। इसलिए उपन्यासकारों का एक मुकाम भी होता है।

सवाल: साहित्य और पत्रकारिता का गहरा अंतर्संबंध रहा है, किंतु आजकल पत्रकारिता में साहित्य हाशिए पर चला गया है, इस पर आपके क्या विचार हैं ?

जवाब: देखिए एडिटर क्या प्रकाशित करना चाहता है क्या नहीं यह सब एडिटर के मिज़ाज़ पर निर्भर करता है। पहले साहित्यकार और पत्रकारों मैं बैलेंस था। अब पत्रकारों ने साहित्यकारों से एक दूरी बना ली है और स्वयं को रिपोर्टिंग तक सीमित कर लिया है। अब पत्रकारों को साहित्य की दुनिया की इतनी जानकारी नहीं होती या शायद उनकी साहित्यकारों में दिलचस्पी नहीं होती। एक और महत्वपूर्ण बात मैं कहना चाहती हूं कि जो पत्रकारिता की ज़रूरत होती है वह कहानी की नहीं होती है। हर घटना पर आप कहानी नहीं लिख सकते और हर घटना सूचना नहीं हो सकती। यह सबसे बड़ा फ़र्क़ है। जिनके पास यह समझ्ा है और जो इन दोनों की सीमाएं जानते हैं, वे एक साथ पत्रकार और साहित्यकार दोनों हो जाते हैं।

सवाल:  आपकी राय में क्या आज भी समाज और राजनीति के परिष्करण में साहित्य की सक्रिय भूमिका है ?

जवाब:  फिलहाल साहित्य कुछ बदल तो पा नहीं रहा, यहां तक कि किसी देश की व्यवस्था तो बदल नहीं पा रहा। पहले एक उपन्यास नया कानून बनवा देता था। कहा जाता है कि मिस्र के एक राष्ट्रपति थे उनकी पूरी सोच एक नोबेल से बदली। इंग्लैंड के एक उपन्यास का प्रभाव रहा कि बच्चों के पक्ष में एक पूरा कानून बना। कमी लेखकों में नहीं है, मुझ्ो लगता है कि लेखकों की राय कोई लेना नहीं चाह रहा। ऐसा माहौल 1947 के बाद धीरे-धीरे बनता चला गया। दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि पाठक अपनी जिम्मेदारी को नहीं समझ्ाते हैं। पाठक लेखक के विचार को आगे नहीं ले जाते। लेकिन एक तीसरा बहुत दिलचस्प दृश्य दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है कि पाठक कम होते जा रहे हैं, लेखक बढ़ते जा रहे हैं। आजकल लेखक की चाहे एक ही किताब हो, लेकिन उसकी इतनी ज्यादा प्रायोजित चर्चा होती है कि अच्छे लेखक ठगे से रह जाते हैं। मीडिया और सोशल मीडिया की वजह से आईं तब्दीलियां आज का परिदृश्य तय कर रही हैं। इनकी वजह से सतही चीज़ों का बहुत ज्यादा शोर हो गया है। क्योंकि साहित्य बहुत धीरे-धीरे असर करता है, पत्रकारिता फौरन असर करती है। एक ख़बर मेरा किरदार बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है क्योंकि मैं ख़बर को लेकर रिएक्शनरी भी तो हो सकती हूं। पत्रकारिता रोज घटने वाली घटनाओं के प्रति एक्टिव बनाती है, जबकि साहित्य चरित्र का निर्माण करता है, आपको अच्छे-बुरे की समझ्ा देता है। साहित्य आपका परिचय उस समाज से भी करवाता है जिस तक आप पहुंच नहीं पाते।

सवाल:  मैं यह मानता हूं और यक़ीनन और भी कई लोग जो यह मानते होंगे कि नासिरा शर्मा की न सिर्फ़ शक्ल-औ-सूरत अंतरराष्ट्रीय है बल्कि वे अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं या मुद्दों की लेखिका भी हैं। स्वयं की इस छवि को आप किस प्रकार देखती हैं ?

जवाब: मैं इस छवि से खुश हूं। मेरी इस सोच को लोगों ने बहुत पसंद किया है। मेरे बुद्धिजीवी पाठकों ने मुझ्ो बहुत सम्मान दिया है। मैं आपको बताऊं एक वक़्त तक मेरे लेखन को लेकर चंद लोगों की नकारात्मक बातें मुझ्ो झ्ोलनी पड़ी, जिससे मैं अपसेट भी होती थी, लेकिन मैंने इन सब से भी प्रेरणा ली। ऐसे कमअक्ल लोग अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कलम उठाने को जासूसी समझ्ाते थे। उनकी समस्या थी कि वे संबंधों को संकीर्ण नज़र से देखते थे। उनकी बातों से थोड़ी देर के लिए मन कसैला ज़रूर होता था फिर लगता था कि मेरा जुड़ाव किन्हीं और ऊंचाइयों से है। लेकिन मुझ्ो खुशी है कि जिन लोगों ने मुझ्ो पसंद कियाए भरपूर किया। मुझ्ो किसी से शिकायत नहीं है।

सवाल:  पारिजात के लिए आपको साहित्य अकेडमी अवॉर्ड मिला, कुछ लोग मानते हैं कि यह अवार्ड आपको देर से मिलाए इस बारे में आपका क्या कहना है ?

जवाब:  हां, कुछ लोग मानते हैं कि शाल्मली के लिए ही मुझ्ो साहित्य अकादेमी अवार्ड मिल जाना चाहिए था। लेकिन कोई बात नहीं। उस वक़्त राइटर और भी बहुत अच्छे-अच्छे थे, शायद इसीलिए उन्हें पहले दिया गया। मैं यह तो नहीं कहूंगी कि मुझ्ो यह देर से मिला लेकिन जब मिला तो भी मेरी ज़िंदगी में क्या फर्क पड़ा, मेरे सामने दो सवाल हैं कि अगर अभी भी ना मिलता तो, और जब मिला तो किसी ने कम से कम यह तो नहीं कहा कि यह बैकडोर एंट्री है या खुशामद का नतीज़ा है। मुझ्ो इस बात का शुक्र है कि मुझ्ो अवॉर्ड उस वक़्त मिला जब लोगों ने यह शिद्दत से महसूस किया कि अब नासिरा शर्मा को साहित्य अकेडमी अवॉर्ड मिल जाना चाहिए।

सवाल: आपकी दृष्टि में óी विमर्श क्या है ?

जवाब:  óी एक ज़िंदगी है। उसे एक आंदोलन की तरह लोग इस्तेमाल करते हैं। लेकिन मुझ्ो óी विमर्श के खाते में डाला जाए, ऐसा मेरे समझ्ा के परे है। óी विमर्श नाम तो अभी दे दिया गया है, लेकिन साहित्यकार तो पहले से ही बिना किसी óी विमर्श आंदोलन के óियों के शोषित चरित्र को बड़ी खूबसूरती से उठाते रहे हैं। दुनिया में जितने बड़े लेखक हैं, उन्होंने जो एक से एक शानदार óियों के किरदार दिए हैं, उसमें महिला लेखिकाएं भी शामिल हैं। औरतों की तादात कम ज़रूर थी लेकिन शानदार थी। देखिए जब किसी चीज़ को आंदोलन का रूप दे दिया जाता है तो सब कुछ होने के बावजूद भी वह वक़्त के साथ ख़त्म हो जाता है। óी विमर्श एक ख़ास अंदाज़ से शुरू हुआ। उससे पहले भी न जाने कितने किरदारों में óियों के सरोकार बिना किसी óी विमर्श के भरे पड़े हैं। मुझ्ो लगता है óी विमर्श सामाजिक दृष्टि से ज़रूरी है।  कहानियों में कला को बर्बाद नहीं करना चाहिए वह किसी नारे की मोहताज़ नहीं होनी चाहिए। ऐसी स्थिति में कहानी का पूरा का पूरा ढांचा चरमरा जाता है। अतः हमें देखना पड़ेगा कि उस óी विमर्श में लेख और बातचीत के जरिए किस तरह से जागरूकता लाएं। मैं यह नहीं कहती कि ‘कला कला के लिए’ हो, लेकिन किरदार ऐसा होना चाहिए जो लेखक की सोच से प्रभावित होकर उसकी मर्जी से ना चलेए बल्कि खुद वह लेखक को यह बताएं कि वह किरदार किस ग्राफ का है। मैं मानती हूं कि लेखक को किसी भी तरह के विमर्श को अपनी कहानियों में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। ऐसे विमर्श उसे लेखों वक्तव्यों और समाज सेवा में प्रस्तुत करना चाहिए। हां, जो आंदोलनकारी हैं वह कहानीकार की कहानियों का इस्तेमाल अपने आंदोलन में कर सकते हैं।


सवाल:  क्या óी की बुनियादी और जज़्बाती ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आज का साहित्य कारगर है ? 

जवाब: कारगर इस तरह से है कि हर कोई कलम लेकर अपनी बात कह रहा है। यह एक अच्छा शगुन है। औरतों ने बोलना सीखा है और लिख रही हैं। यह बहुत अच्छी बात है कि औरतों को जुबान मिल गई है और उसको लोग सुनते हैं।

सवाल:  आपकी दृष्टि में क्या आज ऐसा साहित्य रचा जा रहा है जो पुरुषों को झ्ाकझ्ाोर कर óियों के प्रति अच्छे बर्ताव के लिए प्रेरित करे ?

जवाब: साम्यवाद के असर से मर्द-समाज में सामाजिक चेतना आनी शुरू हुई। हमारे यहां जब 1947 के बाद जमीदारी खत्म हुई, बड़े स्तर पर शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ तो मर्दो को भी एक नज़रिया मिला। देखिए सवाल उठता है कि समाज यूं ही नहीं खुलता गया होगा। इतिहास में जाकर हमें देखना होगा कि मर्द कहां तक हमारे समाज को कंट्रीब्यूटर कर रहे हैं  और यह सिलसिला कहां से शुरू होता है। हम देखते हैं कि मुस्लिम समाज के सर सैयद अहमद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की नींव रखी। इस संस्थान ने मुस्लिमों के विश्वास को बढ़ाया। यह यूनिवर्सिटी हिंदू-मुस्लिमों का खेमा नहीं था। यहां से सबसे पहले एम.ए. करने वाले छात्र प्रसिद्ध इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद थे। उस यूनिवर्सिटी में भाई बहनों ने साथ-साथ पढ़ना शुरू किया। इस बात को समझ्ािए कि उस समय óी विमर्श नहीं था, बल्कि समाज ने करवट बदली। राजा राममोहन राय के सती प्रथा के खिलाफ किए गए प्रयासों को कैसे भुलाया जा सकता है। यह तो संकुचित सोच है कि óी विमर्श आज का मुहावरा है। औरत जो कुछ लिख रही है उससे ज़रूर संकुचित मर्दों की चेतना में बदलाव आया होगा। वैसे तो असमानता और एक दूसरे के शोषण का सिलसिला बहुत पुराना है और इस शोषण के खिलाफ मर्द के विरोध का सिलसिला भी बहुत पुराना है।

सवाल:  आपको अपना सबसे प्रिय उपन्यास कौन सा लगता है ? 

जवाब: जब मैं एक उपन्यास लिख रही हूं तो वह मुझ्ो प्यारा लगता है। उसका किरदार मुझ्ो अवसाद और परेशानी में भी डालता है, लेकिन जब वह मार्केट से होते हुए पाठकों के हाथों में पहुंच जाता है तो वह मेरा नहीं रहता। मेरा संबंध तो उससे बना रहता है लेकिन मेरी शिद्दत दूसरे उपन्यास में चली जाती है।

सवाल:  आपने बच्चों के लिए भी लिखा है, बाल साहित्य लिखते समय क्या सावधानियां रखनी होती हैं ? क्या लेखन शैली में किसी विशेष तकनीक का इस्तेमाल अपेक्षित होता है ? 

जवाब: मेरे लेखन को विधाओं में आप बांट दें, यह आपकी मर्जी, लेकिन एक लेखक के दिल में जो भी आया वो उसने लिखा। कुछ लोग बड़े और बच्चे दोनों के लिए अलग-अलग तरह से लिखते हैं। मैं कोई खास सचेत होकर नहीं लिखती कि मैं किसके लिए लिख रही हूं।  आपके अंदर का रस कोई भी रंग पकड़ सकता है। मैं बड़ों के लिए लिखूं या बच्चों के लिए, मनोविज्ञान को सामने रखकर नहीं लिखती बल्कि ज़िंदगी को सामने रखती हूं कि ज़िंदगी कैसे इंसान को मोड़ती है।

सवाल:  हिंदी और उर्दू के आपसी संबंधों को आप किस प्रकार देखती हैं ?

जवाब: हिंदी-उर्दू एक ही मां से पैदा हुई दो बहनें हैं। हिंदुस्तान की बेटियां हैं। स्क्रिप्ट का फर्क ज़रूर है। उर्दू की पैदाइश तो यहीं से हुई। उसकी हिस्ट्री चाहे जहां से पकड़ लो। उर्दू की स्क्रिप्ट अरबी और फारसी के करीब हो गई। हिंदी का झ्ाुकाव संस्कृत की तरफ हो गया। मजे की बात है कि संस्कृत और फारसी को कुछ लोग जुड़वा बहनें कहते हैं। कुछ लोगों ने इस पर काम भी किया है। अभी मैंने अपने एक लेख में लिखा है कि हिंदी और उर्दू के बहुत से शब्द दरअसल फारसी के शब्द हैं।  जिसे दोनों भाषाओं ने अपना लिया हैए क्योंकि भाषा किसी की मोहताज नहीं रहेगी और न किसी सीमा में रहेगी। उसकी ग्रोथ तो बराबर होती रहती है। नामवर सिंह ने एक लेख लिखा था ‘बासी भात में खुदा का साझ्ाा’ जिसके कारण उन्हें प्रगतिशीलों की आलोचना भी झ्ोलनी पड़ी। भाषाओं के साथ कैसी नफ़रत, उर्दू केवल मुसलमानों की जुबान नहीं है।

सवाल:  राजभाषा की दृष्टि से आप हिंदी की स्थिति को कैसा पाती हैं ?

जवाब: किसी भी देश का एक झ्ांडा और एक भाषा तो होनी ही चाहिए। जब हम अखंडता की बात करते हैं और सारे प्रांतों की बोलियों और भाषाओं के लोगों को एकजुट करना चाहेंगे तो यह प्रश्न उठेगा कि हिंदी ही क्यों, दूसरी भारतीय भाषाएं भी तो लिटरेचर की वजह से काफी रिच हैं। यह भी एक सवाल हो सकता है कि सिर्फ़ हिन्दी क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा को ही आगे क्यों बढ़ाया जा रहा है। ऐसे सवाल वक़्त के साथ बढ़ रहे हैं, क्योंकि यह तो तय है कि उर्दू-हिंदी मिश्रित भाषा यानी ‘हिंदुस्तानी’, जिसमें अब दूसरी भाषाओं के शब्द भी आने लगे हैं। एक कनेकिं्टग भाषा तो है ही। अतः हिंदी को अलग रखते हुए उर्दू को अन्य भारतीय भाषाओं में शामिल कर लीजिए और ‘हिंदुस्तानी’ भाषा जो मिली जुली भाषा है, उसे राष्ट्रीय भाषा मान लीजिए। उसमें एकता भी है, अखंडता भी है, सहकारिता भी है और एक दूसरे को साथ लेकर चलने की भावना भी है। इस तरह हिंदी और उर्दू के प्रति लोगों की परस्पर नफ़रत भी खत्म हो जाएगी।

सवाल:  आपने अंतरधर्मीय विवाह किया है। क्या इस विवाह से सामाजिक रूप से आपको कोई विरोध झ्ोलना पड़ा  ? या जीवन में किसी नकारात्मक प्रभाव का सामना करना पड़ा  ?

जवाब: शादी को लेकर तो ऐसा कोई विरोध नहीं हुआ जिसे दुर्घटना का नाम दिया जाए। यह बात अलग है कि लोगों ने हिन्दू-मुसलमान का नाम देकर हम दोनों को प्रोफेशनली नुकसान पहुंचाने की कोशिश ज़रूर की थी। लेकिन यह भी सच है कि ढ़ेरों लोग कहते रहे इतना खूबसूरत नाम है कि मेरे जहन में जम गया। 

सवाल:  नासिरा शर्मा आज के समाज में किन चुनौतियों को गंभीर मानती हैं ?

जवाब:  सबसे गंभीर बात है कि परस्पर नफ़रत बहुत बढ़ रही है। ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ़ हिंदू-मुसलमान तक सीमित है। यह मुसलमानों में कई वर्गों में है, हिंदुओं में जाति-पाति के रूप में मौजूद है। दलित अभी तक इंसान के रूप में स्वीकारा नहीं गया है। दूसरी तकलीफ़ यह होती है कि हमारे पास इतना कुछ है लेकिन हम कॉमन आदमी की परेशानियां दूर नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि आजादी के 70 सालों से ज्यादा वक़्त गुजरने के बाद भी कॉमन आदमी को साफ़ पानीए छोटा सा घर, छोटी सी जॉब तक नहीं मिल रही है। मैं जिन देशों में गई हूं वहां फकीर और फुटपाथों में सोते हुए लोग नहीं दिखते, और सबसे बड़ी बात खेतिह, देश में किसानों के हाल मुझ्ो बेचैन करते हैं।

सवाल:  आजकल आप के अध्ययन कक्ष में क्या चल रहा है ?

जवाब:  कुछ नया तो मैंने शुरू नहीं किया है। अभी हाल ही में मेरे ‘शब्द पखेरू’ और ‘दूसरी जन्नत’ लघु उपन्यास आए हैं। इधर 6 खंडों में मेरे अनुवाद की एक किताबें आई थीं। 

सवाल:  आपके अनुसार नए युवा कहानीकार और उपन्यासकार जो अच्छा लिख रहे हैं  ?

जवाब:  कुछ युवा लेखक बहुत खूबसूरत लिख रहे हैं। उनकी कुछ कहानियों को हिंदी की बेहतरीन कहानियों के साथ रखा जा सकता है, क्योंकि जो लेखक संजीदगी से अपने लेखन को लेता है और जमीन से चीजों को उठाता है उसमें बनावटीपन नहीं होता। वह सीधे आपके दिल पर असर करता है।

सवाल:  नए रचनाकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी ?

जवाब:  मुझ्ो लगता है कि नई आने वाली कलम को आलोचना की परवाह नहीं होनी चाहिए और ना ही सस्ती शोहरत पर यक़ीन करना चाहिए। उसका ख़जाना उसके पाठक होते हैं जो उसे सही पहचान देते हैं। कुछ किताबों को जबरदस्ती बेस्टसेलर कहा गया लेकिन वे राइटर अब नज़र नहीं आते।


( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2019 अंक में प्रकाशित )


बुधवार, 10 अगस्त 2022

गांधीजी के निजी स्वयंसेवक थे श्रीकृष्ण राय हृदयेश

                

                               

श्रीकृष्ण राय हृदयेश

                  

                                                                            - अमरनाथ तिवारी ‘अमर’

      श्रीकृष्ण राय हृदयेश का जन्म ग़ाज़ीपुर जनपद के कठउत गांव में सन 1909 में हुआ। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हृदयेश जी साहित्य सृजन, पत्रकारिता, स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन, सहकारिता आंदोलन सहित साहित्यिक, सामाजिक गतिविधियों में आजीवन सक्रिय रहे। ग़ाज़ीपुर में एक स्वस्थ साहित्यिक वातावरण के सृजन, कवि सम्मेलनों और साहित्यिक गोष्ठियों के निरंतर आयोजन एवं नवोदित रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

 गंाधीवादी विचारधारा और राष्टीय चेतना से ओत-प्रोत हृदयेश जी गांधी जी के ग़ाज़ीपुर आगमन पर उनके निजी स्वयंसेवक के रूप में कार्य किए थे और अपने विद्यार्थी जीवन में ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर जेल यात्रा किया। हिंदी के साथ संस्कृत, अंग्रेज़ी, भोजपुरी एंव बंग्ला भाषा के जानकार हृदयेश जी टाइम्स ऑफ इंडिया, नेशनल हेराल्ड सहित देश के कई पत्रों में लेखन करते रहे। उस समय के लोकप्रिय हिंदी दैनिक ‘आज’ के वे काफी अवधि तक ग़ाज़ीपुर के प्रतिनिधि रहे। सन 1949 में उन्होंने ग़ाज़ीपुर से ‘लोकसेवक नायक’ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया था।

हदेयष जी का रचना संसार भी विस्तृत है। उनका पहला काव्य संग्रह ‘युवक से’ 1935 में प्रकाशित हुआ। इस काव्य संग्रह से मानवीयता और राष्टीयता का जो उनका स्वर उभरा वह हिमांशु (1940) से लेकर पथदीप (1950) तक बना रहा। इसके बाद तीन दशकों तक उनका सामाजिक, राजनैतिक और पत्रकारिता वाला व्यक्तित्व प्रभावी रहा। सन 1980 में प्रकाशित ‘सत्यासत्य’ महाकाव्य उनकी साहित्यिक यात्रा में मील का पत्थर साबित हुआ। इसके बाद उनकी लगभग दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुईं। अश्वघोष के बुद्धचरितम पर आधारित भवानुवाद ‘महाप्रकाश’ प्रबंध काव्य है। ‘नवदीप’ महाकाव्य एवं ‘लहर-लहर लहराए गंगा’ खंडकाव्य है। इन्होंने गिरिराज शाह की अंग्रेज़ी भाषा में लिखी पुस्तक ‘वैली ऑफ फ्लवार्स’ का काव्य अनुवाद ’फूलों की घाटी’ नाम से किया। गंगा मुझे पुकारे (1989) एवं मेघदूत (1990) में भी काव्यनुवाद है। इसके बाद उनकी ग़ज़लों का संग्रह ‘बदगुमानी का मौसम’ नाम से आया। ‘सत्यासत्य’ के बाद उनका सर्वाधिक चर्चित महाकाव्य ‘शंखपुष’(1996) है। वेदकालीन राज्य व्यवस्था की पृष्ठभूमि पर केंद्रित इस महाकाव्य का सृजन अत्यंत गंभीर है। इसमें महेंद्र, रुद्र, अग्नि, सरस्वती आदि को पात्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भोजपुरी भाषा में ‘हृदेयश सतसई’ अप्रतिम पुस्तक है। हृदयेश जी लगभग दो दर्जन अप्रकाशित पुस्तकों में प्रमुख हैं- ग़ाज़ीपुर का इतिहास, दोहों का संग्रह, संजय बतीसी, कसौरी (ललित निबंध)।

 श्रीकृष्ण राय हृदयेश का पार्थिव शरीर 13 जून 1999 को पंचतत्व में विलीन हो गया। ग़ाज़ीपुर की साहित्यिक, राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेश में उनके योगदान का स्मरण सदैव किया जाएगा।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में प्रकाशित )




बुधवार, 27 जुलाई 2022

विभा की शायरी में पूरे समाज का चित्रण: शिवम शर्मा

गुफ़्तगू के ‘विजय लक्ष्मी विभा विशेषांक’ का विमोचन



प्रयागराज। विजय लक्ष्मी विभा प्रयागराज की वरिष्ठ शायरा हैं, जिन्होंने लगभग हर विधा में लेखनी की है। इनकी शायरी में वास्तविक समाज का चित्रण है। गुफ़्तगू ने इनके उपर विशेषांक निकालकार बहुत ही सराहनीय कार्य किया है। आज के दौर में गुफ़्तगू ऐसी पत्रिका है जो सच्चे मायने में गंगा-जमुनी तहज़ीब को कायम रखने में ख़ास भूमिका अदा रही है। इस समय प्रयागराज और पूरे देश को ऐसी पत्रिका की जरूरत है। यह बात उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. शिवम शर्मा ने 24 जुलाई को गुफ़्तगू की ओर से करैली स्थित अदब घर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कही। मुख्य अतिथि डॉ. शर्मा ने कहा कि यह गुफ़्तगू का यह अंक बहुत ही ख़ास है। इस दौरान गुफ्तगू के विजय लक्ष्मी विभा विशेषां का विमोचन किया गया।

गु्फ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि विजय लक्ष्मी विभा देश की उन चुनिंदा महिलाओं में से हैं, जो ग़ज़ल के सही पैरामीटर पर ग़ज़लें लिखती हैं। वर्ना आज के समय में ग़ज़ल लेखन के नाम पर इसके मूल स्वरूप से ही खिलवाड़ किया जा रहा है। प्रभाशंकर शर्मा ने कहा कि विभा जी को शायरी विरासत में मिली है। इनके पिता भी कवि थे, जिनकी तीन दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हुई थी। गुफ़्तगू के इसी अंक में विभा जी की प्रकाशित कहानी में कई नए बिम्ब और परिदृश्य दिखाए देते हैं, उनकी रचनाशीलता का बेहतरीन वर्णन इन्होंने अपनी कहानी में किया है। 

नरेश महरानी ने कहा कि विजय लक्ष्मी विभा हमारे दौर की बहुत ही ख़ास कलमकार हैं, इन्होंने कई बिम्बों को अपनी रचनाओं में बेहतरीन ढंग से उल्लेखित किया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे तलब जौनपुरी ने कहा कि विजय लक्ष्मी विभा की शायरी बहुत ही अलग और ख़ास है। समाज की वास्तविक हालात का वर्णन इनकी शायरी में मिलते हैं। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। मुशायरे के दौरान अतिथियों और कुछ श्रोताओं द्वारा दिए गए अंक के आधार पर पहले स्थान असलम निज़ामी, दूसरे स्थान पर संयुक्त रूप से फ़रमूद इलाहाबादी और अजीत शर्मा ‘आकाश’, तीसरे स्थान पर शरत चंद्र श्रीवास्तव    और चौथे स्थान पर शाहिद इलाहाबादी रहे। इनको विशेष सम्मान पत्र प्रदान किया गया।

 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें शिवाजी यादव, अर्चन जायसवाल,  शैलेंद्र जय, रेशादुल इस्लाम, फरमूद इलाहाबादी, अजीत शर्मा आकाश, नाज़ खान, शाहीन खुश्बू, सम्पदा मिश्रा, असलम निज़ामी, सेलाल इलाहाबादी, रुखसार अहमद आदि ने कलाम पेश किया।


बुधवार, 20 जुलाई 2022

गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में



4. संपादकीय: साहित्य को समर्पित विजय लक्ष्मी विभा

5-12. आत्मकथ्य: विजय लक्ष्मी विभा

13-15. मां की साहित्य यात्रा का साक्षी मैं- अनमोल खरे

16-18. काव्य शिरोमणि विजय लक्ष्मी विभा - जगदीश किंजल्क

19-22. गीत के अस्तित्व की पहचान - डॉ. हुकुमपाल सिंह विकल

23-24. विभा जी के गीत स्वयं बोलते एवं बतियाते- मयंक श्रीवास्तव

25-27. विभाजी का छायावादी वाम चिंतन - राघवेंद्र तिवारी

28-30. जग में मेरे होने पर- दिवाकर वर्मा

31-32. विभा जी साहित्य में महादेवी सी - श्याम बिहारी सक्सेना

33-36. जागतिक दार्शनिक सरस गीतों की प्रत्यंचा- डॉ. दया दीक्षित

37-38. कवि स्वयं का नहीं सम्पूर्ण सृष्टि का होता है - प्रियदर्शी खैरा

39-42. अखियां पानी-पानी में दर्शन का स्वरूप  -  नलिनी शर्मा

43-44. अदब के गुुलशन में ताज़ा हवा के झोंके - मनमोहन सिंह तन्हा

45-46.  मन को छूती लेखनी की धार - नीना मोहन श्रीवास्तव

47-48. विभा की ग़ज़लों के कई रंग - अर्चना जायसवाल ‘सरताज’

49-53. कहानी: अपनी-अपनी भूल - विजय लक्ष्मी विभा

54-60. विजय लक्ष्मी विभा के पद

61-77. विजय लक्ष्मी विभा की कविताएं

78-95. विजय लक्ष्मी विभा की ग़ज़लें

96-99. विजय लक्ष्मी विभा का परिचय

100-103. इंटरव्यू: केशरीनाथ त्रिपाठी

104-105 . गुलशन-ए-इलाहाबाद: राजेश पांडेय

106. ग़ाज़ीपुर के वीर- 18 

107-111. तब्सेरा

112-114.  उर्दू अदब

115-119.  अदबी ख़बरें


रविवार, 10 जुलाई 2022

मुग़ल खानदान की शायरा जे़बुन्निसा मख़्फ़ी

                                                                       

- ’डॉ. राकेश तूफ़ान’ 


                                  दर सुख़न पिन्हा शुदम मानिन्द बू दर-बर्गेग़ुल,

                                 हर कि दीदन मैल दारद दर सुख़न बीनद मरा।

(जैसे ख़ुशबू फूल की पंखुड़ियों में छुपी है, वैसे ही मैं अपनी कविता में व्याप्त हूं। जो मुझसे मिलने का इच्छुक हो, मेरे काव्य में मुझे पा ले)

 ज़ेबुन्निसा की उपरोक्त पंक्तियां इतिहास के पन्नों में उनके खो जाने का स्वयं ही अहसास कराती हैं। उनकी ग़ज़लों में मुहब्बत के रूहानी अहसासात की हर जगह हिफ़ाज़त हुई है, लेकिन अदीबों और इतिहासविदों ने इस प्रतिभाशाली शहज़ादी पर उतना नहीं लिखा है, जितने की वो हक़दार है। उनके अशआर की कशिश ने मुझे उन पर क़लम उठाने को मजबूर किया। ज़ेबुन्निसा अंतिम सशक्त मुग़ल बादशाह औरंग़जेब की सबसे बड़ी पुत्री थीं। बादशाह की पहली बेग़म दिलरास बानो को उनकी मां होने का गौरव प्राप्त है। शहज़ादी की पैदाइश बादशाह शाहजहां के शासनकाल में 1631 में दक्कन में हुई, लेकिन परवरिश हुई आगरा और दिल्ली में। तारीख़ में शहज़ादी को एक फ़ारसी कवयित्री और सूफ़ी के तौर पे याद किया जाता है। 

 वास्तव में ज़ेबुन्निसा, जिन्हें इतिहासकारों के बीच ‘ज़ेबिन्दा बेग़म’ के नाम से भी जाना जाता है, सत्रहवीं शताब्दी की सबसे प्रतिभाशाली महिलाओं में से एक थीं। वे फ़ारसी, अरबी और उर्दू जैसी ज़बानों में तो प्रवीण थीं ही, स्थापत्य एवं ख़ुशकत (श्रुतिलेख) में भी उनकी गहरी रुचि थी। इस दृष्टि से वे बहुआयामी शख़्सियत की मालकिन थीं। ज़ेबुन्निसा ने फ़ारसी विद्वान मोहम्मद सईद अशरफ़ मंज़धारानी से समय का विज्ञान भी सीखा था। शहज़ादी ने दर्शन, गणित, खगोल विज्ञान तथा साहित्य की अन्य विधाओं में भी महारत हासिल की। ज़ेबुन्निसा की लाइब्रेरी बादशाह अकबर के संग्रह की भांति थी, जिसमें क़ुरआन से लेकर हिन्दू व जैन ग्रंथों सहित यूनानी पौराणिक कथाएं, बाइबिल का तर्जुमा तथा मुग़लों का समकालीन लेखन शामिल था।


जे़बुन्निसा मख़्फ़ी


 व्युत्पत्ति की दृष्टि से फ़ारसी में ‘ज़ेबुन्निसा’ का अर्थ है-‘सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत स्त्री या नारी जगत का आभूषण’। शहज़ादी सचमुच अपने इस नाम को चरितार्थ करते हुए दिखाई देती हैं। चौदह साल की उम्र से ही उन्होंने कविताएं लिखना आरम्भ कर दिया था। उस्ताद बयाज़ साहब ने सदैव उन्हें सृजनात्मक लेखन के लिए प्रेरित किया। जब औरंग़जेब बादशाह बना तब ज़ेबुन्निसा इक्कीस वर्ष की हो चुकी थीं। बादशाह शहज़ादी की प्रतिभा एवं योग्यता से इतना अधिक प्रभावित था कि वह मुग़ल साम्रज्य के नीतिगत मुद्दों और सियासत पर उससे विमर्श करता था तथा उसके दृष्टिकोण को पर्याप्त महत्व देता था। मुग़लों में आमतौर से शहज़ादियों के निकाह की परंपरा नहीं थी, क्योंकि बादशाह की पुत्री के अनुरूप योग्य वर के रूप में किसी को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता था। अतः शहज़ादी आजीवन अविवाहित रहीं। हालांकि एक हिन्दू राजकुमार छत्रसाल से प्रणय के विषय में जानकारी मिलती है। यह भी कहा जाता है कि शहज़ादी एक अफ़ग़ान सिपाही को अपना दिल दे बैठीं, लेकिन बादशाह ने उसे मौत के घाट उतार दिया।

जेबुन्निसा मख़्फी की हस्तलिखित शायरी

औरंग़जेब पर रुढ़िवादी होने का आरोप लगाया जाता है, क्योंकि साहित्य, कला, संगीत आदि उसकी पसंद में शामिल नहीं थे। यही कारण था कि ज़ेबुन्निसा ने छुप- छुपाकर ही सृजनात्मक लेखन संबंधी कार्य किया। शहज़ादी ‘मख्फ़ी’ उपनाम से कविताएं लिखती थी, जिसका मानी ही  ‘गुप्त या छिपा हुआ’ है। मिसाल के तौर पर उनकी कविताओं के अंग्रेज़ी और हिंदी तर्जुमे के इस हिस्से से ये बात स्पष्ट भी होती है-

‘व्ी डंाीपिए पज पे जीम चंजी व िसवअम ंदक ंसवदम लवन उनेज हव.....’ या फिर-

           देवी अपने पुष्प-गीत को विस्मृत कर देगी,

           अगर वह मुझे उद्यान में विचरण करते देख ले।

           अगर ब्राह्मण मेरा दीदार कर ले,

           तो वह देव-मूर्ति को विस्मृत कर देगा।

           मैं अपने शब्दों में ही छुपी हूं,

           जैसे फूल की पंखुड़ियों में ख़ुशबू।

 मख्फ़ी उस ज़माने के अब्दुल क़ादिर बेदिल, कलीम कसानी, सायेब तबरीज़ी और ग़नी कश्मीरी जैसे अदीबों के बीच जलवाफ़रोश चराग़ के मानिन्द थीं। उनकी ग़ज़लों पर हमें हफ़ीज़ शिराजी का पर्याप्त प्रभाव दिखायी पड़ता है। दीवान-ए-मख्फ़ी उनके 5,000 अशआर का अद्भुत संकलन है। इसमें ज़्यादातर कविताएं ग़ज़लों के रूप में हैं, जिनमें मानव और ईश्वर के प्रति प्रेम की ज़बरदस्त अभिव्यक्ति हुई है। यह बात दीग़र है कि उनकी रचनाएं देवनागरी लिपि में प्रकाशित नहीं हुई हैं। उनकी रचनाएं पुस्तक के आकार में 1929 में दिल्ली से तथा 2001 में तेहरान से प्रकाशित हुईं। इसकी पांडुलिपियां नेशनल लाइब्रेरी पेरिस, ब्रिटिश संग्रहालय, ट्यूबिंगेन विश्वविद्यालय (जर्मनी) तथा मोटा पुस्तकालय (भारत) में आज भी सुरक्षित हैं। उनकी रचनाओं में आम तौर से अरबी और फ़ारसी की रवायत से आई हुई कविता के दर्शन होते हैं। मोनिस-उल-रोह, ज़ेबुलमोंशा और ज़ेब-उल-तफ़्सीर जैसी उनकी मशहूर रचनाओं में ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ़ रंग दिखायी पड़ते हैं। 

 ज़ेबुन्निसा की ख़ुशकत (श्रुतिलेख/ब्ंससपहतंचील) तथा स्थापत्य कला में भी गहरी अभिरुचि थी। शहज़ादी ने 1646 में लाहौर के मुल्तान रोड पर ‘चौबुर्ज़ी’ के रूप में एक शानदार और मनमोहक बाग़ की नींव रखी। यह इमारत नीले और हरे टाइल्स के ज़रिए ख़ूबसूरत जड़ावट का अद्भुत नमूना पेश करती है। इसके प्रवेश द्वार पर एक केंद्रीय गुम्बद के साथ चार मीनारें हैं, जिसकी दीवारों पर अरबी में क़ुरआन की आयतों को बड़ी ख़ूबसूरती से उकेरा गया है। मेहराब के ऊपर फ़ारसी में इसे ‘स्वर्ग उपवन’ तथा शहज़ादी को ‘युग की नारी’ के रूप में उद्धृत किया गया है। 

 ज़ेबुन्निसा ने 1701 में पुरानी दिल्ली के शाहजहांनाबाद इलाक़े में इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया। दिल्ली के काबुली दरवाज़े के बाहरी इलाक़े में ‘तीस हज़ार शजर के बाग़’ के नाम से शहज़ादी का मक़बरा तामीर हुआ। लेकिन दिल्ली में रेलवे लाइन बिछाये जाने के दौरान इसे सिकंदरा स्थित अकबर के मक़बरे के पास स्थानांतरित कर दिया गया। मखफ़ी की क़लम हमेशा के लिए ख़ामोश हो चुकी है, मगर ये खोयी हुई शहज़ादी अपने अशआर, अपनी कविताओं में आज भी ज़िंदा है। बक़ौल अख़्तर----

         मेरा हर शेर है अख़्तर मेरी ज़िन्दा तस्वीर,

         देखने वालों ने हर लफ़्ज़ में देखा है मुझे।


( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2022 अंक में प्रकाशित )


मंगलवार, 28 जून 2022

अपने करामात के लिए मशहूर हैं सूफी शम्सुद्दीन

                               

 सूफ़ी शम्सुद्दीन की मजार

                                         

                                                    - शहाब खान गोड़सरावी

                                             

  सूफी शम्सुद्दीन खान का जन्म 1910 ई. में ग़ाज़ीपुर जिले के रकसहा गांव में अबु सईद खान के घर हुआ था। उन्होंने इब्तेदाई दीनी तालीम अपने वालिद से हासिल किया, इसके बाद फारसी अरबी की पढ़ाई की। उन्हें दीनी तालीम लेने के बाद जो समय मिलता उसमें वो अक्सर बकरियों को चराते थे। पढ़ाई के दरमयान उनकी शादी सरैला गांव के ज़मींदार बहादुर खां की बेटी होतीयम बीबी से हुई। उनसे चार बेटे और चार बेटियां हुई। बेटों का नाम फ़ैयाज़ हुसैन, अयाज़ हुसैन, नियाज़ हुसैन, रियाज़ हुसैन है। शम्सुद्दीन खां के वालिद के इंतिक़ाल के बाद उन पर घर की ज़िम्मेदारियां थीं। कोलकाता पुलिस में गांव के कोडार मोहल्ले के बादशाह खान कार्यरत थे, उन्होंने सूफी शम्सुद्ीन को अपने साथ कोलकाता ले जाकर पुलिस में भर्ती करा दिया। पुलिस सेवा में आने के बाद भी वे दीनी कामों से जुड़े रहे। नौकरी के दौरान ही वो बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित सुरकाही शरीफ के पीर सरकार तेग अली शाह से मुरीद हो गए थे। 

   सन् 1960 में सूफी शम्सुद्दीन खान के नेतृत्व में मुस्लिम राजपूत इंटर कॉलेज यानी ‘एसकेबीएम’ दिलदारनगर के मैदान पर कमसारोबार इलाके का जलसा हुआ। दीनी इदारा कायम करने के लिए सूफी साहब ने यह जलसा मुनअक़िद किया था, इसमें बिरादरी के तमाम नामी-गरामी लोग मौजूद थे। जलसे के आखिर में मुबारकपुर से तशरीफ़ लाए बानिए मदरसा अल-ज़मीअतुल अशरफिया के बानी हाफिजे मिल्लत ने कहा कि इलाके में एक दीनी इदारा क़ायम करना है, इस पर मौजूद लोगों ने बुलंद आवाज में लब्बैक कहकर हाथ उठाया। इसकी जानकारी देवबंद सहारनपुर से फारिग कारी फ़ैयाज़ खां (देवैथवी) को हुई, वे उन दिनों इलाहाबाद के यूनानी मेडिकल कॉलेज में तिब्ब सीख रहे थे। वे तिब्ब की पढ़ाई छोड़कर इलाके में आ गए, और लोगों से राब्ता करके सन.1961 में दिलदारनगर स्थित हुसैनाबाद में ‘जामिया अरबिया मख्जुनूल उलूम’ मदरसा कायम कर दिया। 

 सूफी शम्सुद्दीन खान को यह बात नागवार गुजरी, उन्होंने मसलकी मतभेद की वजह से उससे अपने को अलग कर लिया। उन्होंने खुद का मदरसा ‘मकतब’ की सूरत में रकसहां गांव स्थित अधवार मोहल्ले की छोटी मस्जिद में ‘मदरसा तेगिया अनवारुल उलूम’ के नाम से शुरू की। यह मकतब सन् 1964 से 1967 तक चलता रहा। 26 मार्च 1967 ई. में सूफी साहब का इंतिकाल हो गया। इसके बाद उनके द्वारा संचालित मकतब मदरसा मुकम्मल तरीके से बन्द हो गया। लेकिन वो अपनी जिंदगी में मदरसे के लिए तकरीबन एक बीघा ज़मीन को वक़्फ़ कर गए थे। इस जमीन पर सन् 1975 में उनके बेटों के नेतृत्व में मदरसा का काम शुरू हुआ। 1979 में मदरसा बनने के बाद मकतब ‘तेगीया अनवारुल उलूम’ का नाम मदरसा ‘तेगीया शम्सुल उलूम’ कर दिया गया। आज भी यह मदरसा अच्छे ढंग से चल रहा है।

सूफी साहब की तमाम करामात मशहूर हैं, जिनमें अपनी मौत के मुतअल्लिक तीन दिन पहले अपनी क़ब्र की निशानदेही करना भी शामिल था। इसके अलावा ड्यूटी के दौरान बंदूक का ग़ायब होना और अफसर के तलब करने पर अपनी पीठ पर हाथ फेरकर उसी बंदूक को सामने ला देना, आपके सामने आकर खूंखार सांड का अंधा होना, गांव के नामी पहलवान जगदेव यादव को कुश्ती में मात देना वगैरह। इन्ही बुजुर्गी व करामतों की वजह से उन्हें सूफ़ी शम्सुद्दीन अल मारूफ़ शम्सुल मशायख का लक़ब दिया गया।

(नोट - सूफी शम्सुद्दीन खां से जुड़ी जानकारी किताब ‘इरफाने औलिया’ से ली गई है, इसके लेखक सय्यद मौलाना शम्सुल होदा शम्सी हैं )


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2022 अंक में प्रकाशित)

शनिवार, 25 जून 2022

कथक में उर्मिला शर्मा का है ख़ास मुकाम


उर्मिला शर्मा


                                                               - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

   14 फरवरी 1963 को मुरादाबाद जिले के चन्दौसी कस्बे में जन्मी उर्मिला शर्मा अपने माता-पिता की आठवीं संतान हैं। चार वर्ष की आयु में ही इनमें कुछ अलग तरह के हाव-भाव प्रकट होने लगे जो रूढ़िवादी सोच वाले लोगों के लिए अचंभित करने वाला था, क्योंकि नृत्य को अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन अपनी जिद और लगन की वजह से इन्होंने अपने लक्ष्य को कभी नहीं छोड़ा। पं. बिरजू महाराज के निर्देशन में नृत्य की कला को स्टेप-बाई-स्पेट सीखा और इसे अपने अंदर आत्मसात कर लिया। शुरू के दिनों में अपने माता-पिता के छिपकर बड़ी बहन के साथ कथक सीखने के लिए जाया करती थीं, धीरे-धीरे जब इनकी कला को सराहना मिलने लगी, अख़बारों नाम और तस्वीरें छपने लगीं तो घर वालों को पता चला। फिर परिवार के लोगों का सभी सहयोग मिलने लगा। आठ वर्ष की उम्र में ही इन्होंने आल इंडिया कथक प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल करके अपने अंदर की प्रतिभा को दुनिया के सामने ला दिया। इन्होंने समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर करने के साथ कथक प्रवीण और कथक में नई दिल्ली से डिप्लोमा किया है। आज इनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि पूरे भारत के अलावा साउथ अफ्रीका, त्रिनिदाद, फिजी, हालैंड, गयाना आदि देशों में अपनी कला की बदौलत आमंत्रित की जाती हैं। इतना ही नहीं इन्होंने कथक नृत्य के नए प्रयोग किए हैं, तालों को पैरों द्वारा निकालने और प्रत्येक ताल तत्कार की नई रचनाएं इन्होंने इजाद किया है। तबला पखावज, हारमोनियम जैसे वाद्ययंत्रों में पारंगत गायन और पढ़न्त काक अद्भुत तालमेल प्रस्तुत करने की नई विधा का भी इन्होंने ही गठन किया है। अब तक नायिका भेद गत-भाव की 50 से ज्यादा बार प्रस्तुति कर चुकी हैं। तीन हजार से अधिक बार कथक नृत्य की मंच प्रस्तुति कर चुकी हैं। कथके माध्यम से टी-20 क्रिकेट प्रतियोगिताओं के द्वारा देश-विदेश मे ंप्रस्तुति दे चुकी हैं।

 प्रसार भारती द्वारा कथक नृत्य के लिए टॉप ग्रेड आर्टिस्ट, भारत सरकार के सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र द्वारा, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा अकादमी पुरस्कार, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद द्वारा सम्मान, भारतीय राज दूतावास-सूरीनाम द्वारा प्रशस्ति पत्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा सम्मान पत्र, उस्ताद अलाउद्दीन खान संगीत एवं कला अकादमी द्वारा पुरस्कार, सिंगारमणि-सर-सिंगार अकादमी मुंबई, पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज द्वारा सम्मान पत्र, नेशनल यूथ फॉर कल्चरल रिनेसेन्स देवरिया द्वारा पुरस्कार, राष्टीय ग्रामीण महिला संगीत शिक्षण समिति प्रयागराज द्वारा सम्मान, कथक केंद्र नई दिल्ली द्वारा प्रशस्ति पत्र, महादेवी वर्मा चेतना श्री-समन्वय द्वारा सम्मान, हंडिया माटी कथक महोत्सव में रत्न पुरस्कार, जवाहर नवोदय विद्यालय मेजा द्वारा सम्मान, मेजा उर्जा निगम लिमिटेड द्वारा सम्मान, सांस्कृतिक मंदिर महोत्सव उज्जैन द्वारा प्रशस्ति पत्र, कपिलवस्तु महोत्सव उज्जैन द्वारा प्रशस्ति पत्र, अंतरराष्टीय रामायण मेला चित्रकुट, कथक के इंद्रधनुषीय रंग-अंतरराष्टीय कथक व्याख्यान माला द्वारा, आज़ादी के अमृत महोत्सव में स्वाधीनता रंग फागुन के संग-नई दिल्ली में और पं. बिंदादीन महाराज स्मृति उत्सव-संगीत नाटक अकादमी लखनउ द्वारा इन्होंने सम्मानित किया जा चुका है।

 1989 में आईसीसीआर की ओर से दक्षिणी अमेरिका में तीन वर्ष तक प्रवास किया, इस दौरान अपनी कला का प्रदर्शन कर खूब वाहवाही बटोरी। 1998 में एक बार फिर दक्षिण अमेरिकी सरकार के निवेदन पर भारत की ओर से इन्हें स्वीडेन, स्विटजरलैंड, वेस्टइंडीज, गयाना, बार्बिडोज, त्रिनिडाड और यूरोप में नृत्य प्रस्तुति के लिए भेज गया, जहां इन्होंने सबको प्रभावित किया। वर्ष 2003 में इन्होंने कथक केंद्र का स्थापना किया है, जहां आज तमाम छात्र-छात्राएं इनसे कथक नृत्य कला सीख रहे हैं। इससे पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इन्होंने दो वर्ष तक विजिटिंग फैकेल्टी के पद पर काम किया है। दूरदर्शन समेत कई टीवी चैनलों पर इनकी प्रस्तुतियों का प्रसारण समय-समय पर होता रहा है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2022 अंक में प्रकाशित )


 

रविवार, 12 जून 2022

बड़ी शख़्सियत के मालिक हैं सलीम इक़बाल शेरवानी

                                                   -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 

सलीम इक़बाल शेरवानी 

सलीम इक़बाल शेरवानी की सहजता और हर किसी की मदद करने की भावना इन्हें अन्य लोगों से काफी अलग खड़ा करती है। बेहद विनम्र और समाजिक कार्यों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेने वाले व्यक्तित्व के रूप में जाने-पहचाने जाते हैं। 22 मार्च 1953 को इलाहाबाद में जन्में सलीम शेरवानी केंद्र सरकर में मंत्री रहे हैं। इससे पहले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्याल से पढ़ाई पूरी की है, यहां से ये इकोनॉमिक्स में गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं। छात्र जीवन में ही इन्होंने अपनी दक्षता का परिचय दे दिया था। इनके दादा स्वर्गीय एन.ए.के. शेरवानी पंडित जवाहर लाल नेहरू के काफी करीबी थे, आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश में बनी पहली सरकार में मंत्री थे। पिता स्वर्गीय एम.आर. शेरवानी तीन बार राज्य सभा के सदस्य रहे हैं। सलीम शेरवानी का पूरा परिवार लोगों की मदद और समाजिक कार्यों में बढ़कर चढ़कर हिस्सा वाला रहा है। विभिन्न सांस्कृतिक और समाजिक आयोजनों में भाग लेते रहे हैं। 

 बहुत कम उम्र में ही सलीम शेरवानी ने शेरवानी ग्रुप ऑफ कम्पनीज की जिम्मेदारी संभाल लिया था, जिसे बहुत ही कौशलपूर्ण क्षमता के साथ संचालित किया। बिजनेस के अलावा भारतीय राजनीति में भी आपकी सक्रिय भूमिका रही है। 1984 में 32 वर्ष की उम्र में आपको  कांग्रेस से लोकसभा के बदायूं निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए टिकट मिला था, इस चुनाव में जीत हासिल करके मात्र 32 वर्ष की उम्र में लोकसभा सदस्य बने गए थे। 1996 में फिर से लोकसभा के लिए चुने जाने बाद तत्कालीन भारत सरकार में आप स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री बनाए गए थे। एक वर्ष के बाद मई, 1997 में जिनिवा में हुए विश्व स्वास्थ्य संसद के अध्यक्ष चुने गए थे। फिर जून 1997 में भारत सरकार में विदेश राज्य मंत्री बनाए थे। इसके बाद सलीम शेरवानी ने 1998, 1999 और 2004 में भी बदायूं लोकसभा का चुनाव फतेह किया था। अक्तूबर 1985 में इन्हें इंडियन डेलिगशन के सदस्य के तौर पर यू.एन.ओ. भेजा गया था। इसके बाद यूएनओ में भारतीय प्रतिनिधि के तौर पर कई बार भेजा जा चुका है। 1990 में इन्हें ‘इंदिरा गांधी नेशनल यूनिटी एवार्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है। आप वर्तमान समय में विभिन्न संस्थाओं के संरक्षक, अध्यक्ष, ट्रस्टी और सदस्य हैं।

 इस समय सलीम शेरवानी शेरवानी इंडस्ट्रीयल सिंडिकेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक, फारको फूड्स प्राइवेट लिमिटेड, कैपून फूड स्पेशियलीटिज लिमिटेड, शेरवानी फूड प्राइवेट लिमिटेड और एएसई कार्गो प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं। आप कृषि इंटर कॉलेज और शेरवानी इंटर कॉलेज के अध्यक्ष हैं। इनके अलावा कानसुलेटिव कमेटी ऑफ एक्सटरनल अफेयर्स, स्टैडिंग कमेटी ऑफ एक्सटरनल अफेयर्स, मिनिस्ट्री ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री, रेलवे कनवेन्सन कमेटी और वक्फ बोर्ड के ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी के सदस्य रहे हैं।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2021 अंक में प्रकाशित )






मंगलवार, 31 मई 2022

मानवीय प्रेम का प्रतिबिंब है शायरी : डॉ. तिवारी

उस्मान उतरौलवी और रईस की किताबों का हुआ विमोचन

मुशायरा में शायरों ने अपने कलाम से दिया मोहब्बत का पैगाम

प्रयागराज। शायरी मानवीय प्रेम की प्रतिबिंब होती है, जिसके दिल में प्रेम का सागर होता है वही शायरी करता है। उस्मान उतरौलवी और रईस सिद्दीक़ी बहराइची भी ऐसे ही शायर हैें, जिनके दिल में प्यार का सागर उबाल मार रहा है। इन दोनों शायरों को पढ़ने के बाद बिना संकोच के यह कहा जा सकता है कि इनकी इस देश, समाज और वर्तमान परिदृश्य पर बारीक नज़र है, इसलिए लोगों की बेहतरी और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देने की बात इनकी शायरी में जगह-जगह दिखाई देती है। इनकी शायरी आज के समाज के लिए बेहद ज़रूरी है, जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। यह बात वरिष्ठ गीतकार डॉ. वीरेंद्र तिवारी ने 28 मई को करैली स्थित अदब में गुफ़्तगू की ओर से आयोजित विमोचन समारोह में कही। कार्यक्रम के दौरान किताबें ‘उस्मान उतरौलवी के सौ शेर’ और ‘रईस सिद्दीक़ी बहराइची के सौ शेर’ का विमोचन किया गया।

 गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि उस्मान और रईस आज के दौर के ऐसे शायर हैं, जिन्हें पढ़ा जाना बेहद ज़रूरी है, इन्होंने अपनी शायरी में समाज के मौजूदा हालात पर बेहतरीन बातें कहीं है, जो आज की ज़रूरत है। रईस सिद्दीक़ी ने कहा कि गुफ़्तगू प़िब्लकेशन ने हमारी शायरी का चयन करके प्रकाशित किया है, जो हमारे लिए बेहद ज़रूरी था। उस्मान उतरौलवी ने अपनी किताब के प्रकाशन के लिए गुफ़्तगू का शुक्रिया अदा किया।

 प्रभाशंकर शर्मा ने कहा कि शायरी ऐसी चीज़ है, जो युगांे-युगों तक दुनिया में कायम रहती है। उस्मान उतरौलवी भी ऐसी ही शायरी करते हैं, जो रहती दुनिया तक याद रखी जाएगी। नरेश महरानी ने कहा कि रईस सिद्दीक़ी की शायरी को पढ़ने के बाद बिना संकोच कहा जा सकता है कि उनकी पूरी दुनिया पर बारीक नज़र है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे तलब जौनपुरी ने कहा कि रईस और उस्मान की शायरी बेहद स्तरीय है, आज के समय में ऐसी ही शायरी की ज़रूरत है। इन दोनों की किताबें आज के समय के लिए बेहद ख़ास है, उम्मीद है कि अदब की दुनिया में इन्हें हाथों-हाथ लिया जाएगा। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन  सिह तन्हा ने किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। फ़रमूद इलाहाबादी, रेशादुल इस्लाम, अफसर जमाल, अजीत शर्मा आकाश, राकेश मालवीय, जीशान फतेहपुरी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, नरेश महरानी, शाहीन खुश्बू, प्रकाश सिंह अश्क, तलब जौनपुरी, डॉ. वीरेंद्र तिवारी, असलम  निजामी और आलम इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया।


गुरुवार, 19 मई 2022

गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2022 अंक में

 



4. संपादकीय: साहित्य के मूल उद्देश्य को ख़तरा

5-6. मुग़ल ख़ानदान की शायरा ज़ेबिन्नुनिशा मख़फ़ी- डॉ. राकेश तूफ़ान

7-8. कमाल अमरोही का अंदाज़ था सबसे जुदा - हकीम रेशादुल इस्लाम

9-21. ग़ज़लें: डॉ. बशीर बद्र, केके सिंह मयंक, सागर होशियारपुरी, इक़बाल आज़र, तलब जौनपुरी,, मनोज फगवाड़वी, राजीव राय, राजेंद्र वर्मा, अखिलेश निगम अखिल,  इश्क़ सुल्तानपुरी, डॉ. राकेश तूफ़ान, डॉ. श्रद्धा निकुंज ‘अश्क’, बसंत कुमार शर्मा, रईस सिद्दीक़ी बहराइची, डॉ. शमीम देवबंदी,  डॉ. नलिन, डॉ. अंजना सिंह सेंगर,  शहाबुद्दीन कन्नौजी, अरविंद असर, रश्मि लहर, केशपाल सिंह सच,  कुंवर नाजुक, राज जौनपुरी, प्रकाश प्रियम, विवेक चतुर्वेदी, शिव सिंह सागर

22-29. कविताएं: सोम ठाकुर, यश मालवीय, सरिता गर्ग सरि,  मंजुला शरण मनु, डॉ. मधुबाला सिन्हा, शिव कुमार राय, डॉ. निशा मौर्या, प्रिया शर्मा,  मनमोहन सिंह तन्हा,  केदारनाथ सविता, विभु सागर, सुरजीत मान जलैया सिंह, दीप्ति दीप, अर्शा हय्यूम

30-33. इंटरव्यू: ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

34-38. चौपाल: कविता के लिए छंद कितना ज़रूरी 

39-43. तब्सेरा: कविता के प्रमुख हस्ताक्षर, तिमिर से समर, अच्छे दिन का सोग, लोक-नाट्य नौटंकी,

44-47. उर्दू अदब: ज़गे आज़ादी में मुमताज शोअरा का हिस्सा, आवाज़, जर्बे-तब्बसुम,  फिक्रे पैकर, सआते-फिक्र, तोहफा-ए-रबीउल अव्वल,

48. शख़्सियत: कोरोना काल के मसीहा डॉ. तारिक़ महमूद- यश मालवीय

49-50. गुलशन-ए-इलाहाबाद: उर्मिला शर्मा

51. ग़ाजीपुर के वीर: सूफ़ी शम्सुद्दीन

52-56. अदबी ख़बरें

57-89. परिशिष्ट-1: डॉ. एम.डी. सिंहश्

57. डॉ. एम.डी. सिंह का परिचय

58. प्रतिभा स्फोट के सिद्ध साधक कवि - प्रो. शशिभूषण शीतांशु

59-60. एक जंगल मेरे भीतर - पद्मश्री रमेश चंद्र शाह

61-63. डॉ. एम.डी. सिंह की कविताई का जंगल - आनंद कुमार सिंह

64-89. डॉ. एम.डी. सिंह की कविताएं

90-121. परिशिष्ट-2: साबिर जौहरी

90. साबिर जौहरी का परिचय

91. अंधेरे के खिलाफ़ उजाले का सफ़र - विजय प्रताप सिंह

92-93. संजीदा और मोतबर शायर - शैलेंद्र जय

94-95. सच्चाई से सामना कराती साबिर की शायरी- नीना मोहन श्रीवास्तव

96-121. साबिर जौहरी की रचनाएं

122-152. परिशिष्ट-3: जितेंद्र कुमार दुबे

122. जितेंद्र कुमार दुबे का परिचय

123. हर व्यक्ति हो गया महेश है - यश मालवीय

124-126. अतीत की प्रतीति कराती कविताएं - इश्क़ सुल्तानपुरी

127-128. जनता का दर्द बयां करती कविताएं - शिवाजी यादव