शुक्रवार, 14 मई 2021

शकील ग़ाज़ीपुरी और फ़ज़्ले हसनैन का जाना बेहद दुखदायी

कोरोना से जूझ रहे शकील ग़ाज़ीपुरी का इंतिकाल

                                                                               -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी




प्रयागराज के कसारी-मसारी निवासी बुजुर्ग शायर शकील ग़ाज़ीपुरी का 05 मई को इंतिकाल हो गया। वे कोरोना से संक्रमित थे, उन्हें हृदय रोग भी था, जिसकी वजह से हार्ट लाइन में उनका इलाज चल रहा था। उनके परिवार में पत्नी, दो बेटे और एक बेटी है। एक सितंबर 1948 को ग़ाज़ीपुर जिले के वाजिदपुर में जन्में शकील ग़ाज़ीपुरी माध्यमिक परिषद विभाग में कार्य करते हुए सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी दो पुस्तकें ‘लम्हे-लम्हे ख़्वाब के’ और ‘अभिलाषा’ प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी उनकी ग़ज़लें समय-समय पर प्रकाशित होती रही हैं। उन्हें ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’, ‘प्रयाग गौरव सम्मान’, ‘प्रयाग पुष्पम् सम्मान’ और ‘सरदार अली जाफरी एवार्ड’ प्रदान किए गए थे। 


        हर घटना में व्यंग्य तलाश लेते थे फ़ज़्ले हसनैन

  


जाने-माने उर्दू अदीब, व्यंग्यकार और पत्रकार फ़़ज़्ले हसनैन का 24 अप्रैल को इंतिकाल हो गया, इसी के साथ एक ऐसे अध्याय का अंत हो गया, जिसकी पूर्ति कोई नहीं कर सकता। वे वे अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो हर छोटी-बड़ी घटना को व्यंग्य का रूप देने एक्सपर्ट थे। मुझे याद है, तकरीबन 17-18 साल पहले की बात है, मालिकाना झगड़े में उन दिनों ‘अमृत प्रभात’ के कर्मचारियों को तनख़्वाह कई महीने से नहीं मिल रहा था। ‘अमृत प्रभात’ के दफ़्तर में मैं कार्यकारी संपादक मुनेश्वर मिश्र जी के केबिन बैठा हुआ। उसी दिन कर्मचारियों को 200-200 रुपये दिए गए थे। अचानक फ़ज्ले हसनैन केबिन में दाखिल हुए, मुनेश्वर जी से मुख़ातिब होकर बोले-‘मिश्रा जी आज 200 रुपये मिल गए हैं, सोच रहा हूं कि इतनी बड़ी रकम कैसे लेकर जाउंगा, कहीं रास्ते में कोई छीन न ले। आप संपादक हैं, पुलिस से बात करके सुरक्षा के इंतज़ाम करा दीजिए।’ इसके बाद केबिन में बैठे सभी लोग जोर-जोर से हंसने लगे। यह उनके व्यंग्य का नमूना भर है। ऐसी बहुत से वाक़यात हैं।

 फ़ज़्ले हसनैन का जन्म 07 दिसंबर 1946 को प्रयागराज के लालगोपालगंज स्थित रावां नामक गांव में हुआ था। इंटरमीडिएट तक की परीक्षा लालगोपालगंज में ही उत्तीर्ण करने के बाद 1973 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से उर्दू विषय में स्नातकोत्तर किया था। प्र्रयागराज से प्रकाशित नार्दन इंडिया पत्रिका से पत्रकारिता की शुरूआत की थी, फिर अमृत प्रभात और स्वतंत्र भारत में भी सेवाएं दीं। व्यक्तिगत लेखन की शुरूआत हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में 1974 में किया था। ग़ालिब पर लिखी इनकी पुस्तक ‘ग़ालिब एक नज़र में’ को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया था। आपकी कहानियां, नाटक और व्यंग्य देश-विदेश की पत्रिकाओं और अख़बारों छपते रहे हैं। 1982 में इनका पहला व्यंग्य संग्रह ‘रुसवा सरे बाज़ार’ प्रकाशित हुआ था, इस पुस्तक पर उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया था। इनके तीन नाटक संग्रह ‘रोशनी और धूप’, ‘रेत के महल’, ‘रात ढलती रही’ छपे हैं। वर्ष 2001 में व्यंग्य रचना संग्रह ‘दू-ब-दू’ प्रकाशित हुआ। प्रयागराज के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का परिचय कराती आपकी एक पुस्तक ‘हुआ जिनसे शहर का नाम रौशन’ वर्ष 2004 में छपी थी, इस पुस्तक के तीन संस्करण प्रकाशित हुए हैं। इन्होंने कौमी उर्दू कौसिंल बराय फरोग उर्दू नई दिल्ली के अनुरोध पर मशहूर उपन्यासकार चाल्र्स डिकेंस के उपन्यास ‘डेविड कापर फील्ड’ का उर्दू में अनुवाद किया था। 

 वरिष्ठ पत्रकार एसएस खान उनके बारे में लिखते हैं- ‘फजले हसनैन उर्दू अदब में महारथ के साथ अंग्रेजी और हिंदी में भी वह बराबर का दखल रखते थे। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी व्यंग रचनाएं आज भी लोगों के जेह्न पर नक्श हैं। उनके साथ अमृत प्रभात में काम करते हुए बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। उनके लिखने और बोलने का अंदाज़ बिल्कुल जुदा था। रोजमर्रा की जिं़दगी में होने वाली बातों, छोटी बड़ी घटनाओं को जिस सहज तरीके से शब्दों में पीरोते वह अनायास ही एक श्रेष्ठ व्यंग्य रचना का शक्ल अख़्तियार कर लेता. आचार-व्यवहार सियासत-शिक्षा हो या फिर रीति रिवाज व धरम-करम. इन सब विषयों पर कटाक्ष करती उनकी कलम हर किसी को अपना मुरीद बना लेती। उनकी इसी काबिलियत व फनकारी को देखते हुए मैंने इलाहाबाद में अमर उजाला और दैनिक जागरण में कार्यकाल के दौरान उनकी सैकड़ों व्यंग्य रचना सिलसिलेवार तरीके से प्रकाशित की। उसी दौरान इलाहाबाद के 10 चोटी के साहित्यकारों के साहित्य लेखन और उनके जीवन के अनछुए पहलुओं पर भी उन्होंने कलम चलाई. उनका यह लेख न सिर्फ़ इलाहाबाद में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हुआ, यह लेख दैनिक जागरण के विशेष फीचर पेज पर प्रत्येक बुधवार को ‘हुआ जिससे शहर का नाम रोशन’ कालम के अंतर्गत प्रकाशित होता था। बाद में यही लेख किताब की शक्ल में इसी नाम से प्रकाशित हुआ।’


मंगलवार, 11 मई 2021

अभिव्यक्ति के ज़रिए अपनी बात कहते क़लमकार

                                                                            - अजीत शर्मा ‘आकाश‘ 



 वैश्विक कोरोना महामारी के कारण के अन्य देशों की भांति 25 मार्च 2020 से देशभर में लॉकडाउन लागू कर दिया गया। लॉकडाउन देश में पहली बार हुआ। सभी देशवासी एक अनिश्चित अवधि के लिए अपने-अपने घरों में एक प्रकार से नज़रबंद-से हो गये। रोज़ाना दिन भर के लिए काम पर निकलने वालों के सामने एक नयी और अनोखी समस्या उठ खड़ी हुई कि इस ख़ाली समय में क्या किया जाए। देश में एक ठहराव-सा आ गया। अपनी-अपनी तरह से सभी ने इस अवधि को किसी प्रकार व्यतीत किया, किन्तु ‘लॉकडाउन के 55 दिन’ पुस्तक का लेखन कार्य करके इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने ख़ाली समय का वास्तविक सदुपयोग किया है। पुस्तक-लेखन का यह रचनात्मक कार्य सीधे-सीधे साहित्यिक माहौल से जुड़ा है, जिसने अनुभवी रचनाकारों के साथ-साथ नवांकुरित रचनाकारों के लिए भी साहित्यिक वातावरण प्रस्तुत किया है। अतः लॉकडाउन के 55 दिन’ नामक यह पुस्तक एक सार्थक एवं सराहनीय उपलब्धि कही जा सकती है, जिसमें 25 मार्च से 18 मई, 2020 तक के 55 दिनों का दैनिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के लेखक ने समय का सदुपयोग विभिन्न पुस्तकों के अध्ययन के माध्यम से किया, जैसा कि पुस्तक में उल्लेखित है। इस अवधि में लेखक ने अनेक कवि, लेखक, शायरों एवं रचनाकारों की कृतियों का अध्ययन किया, जो समयाभाव के कारण पूर्व में नहीं हो सका था। इसके अतिरिक्त गुफ़्तगू प्रकाशन की प्रारम्भ से लेकर अब तक की प्रमुख घटनाओं एवं कार्यक्रमों का विवरण भी पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है।

 25 मार्च 2020 से प्रारम्भ करते हुए उत्तर प्रदेश सहित सम्पूर्ण देश की प्रत्येक दिन के कोरोना की स्थिति का संख्यात्मक विवरण एवं अन्य उल्लेखनीय घटनाओं का विवरण भी साथ में प्रदान किया गया है। इसके अंतर्गत देश-दुनिया में प्रतिदिन के कोरोना की स्थिति कोरोना संक्रमितों की संख्या, हालात और विस्तृत विवरण को भी रेखांकित किया गया है। इस दौरान जनता एवं कोरोना योद्धओं के समक्ष तमाम कठिनाइयाँ भी उपस्थित रहीं, यथा- मास्क की कमी, खाद्य एवं अन्य सामग्रियों के दामों में भारी किल्लत, पुलिस द्वारा आवश्यक कार्यों से बाहर निकले लोगों के प्रति व्यवहार आदि। लॉकडाउन के कारण बेरोजगार हुए मज़दूरों का सैकड़ों किलोमीटर की दूरी से अपने गांवों को पलायन एवं उनकी दुर्दशा का उल्लेख भी किया गया है। लॉकडाउन के दौरान शायरी और कविताओं पर परिचर्चा का आयोजन पुस्तक का सर्वाधिक उल्लेखनीय अंश है। इसका कारण बताते हुए सम्पादकीय में लिखा गया है कि रचनाकारों में अच्छा लिखने और शायरी को समझने और उस पर तार्किक ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त करने की क्षमता विकसित करने का प्रयास इस आयोजन के माध्यम से किया गया। इसी उद्देश्य के मद्देनज़र लॉकडाउन अवधि में काव्य परिचर्चा करायी गई, जिसके अन्तर्गत प्रत्येक दिन विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं एवं उनकी कृति पर विभिन्न लेखकों एवं रचनाकारों द्वारा समीक्षात्मक टिप्पणियां की गयीं, जिनके माध्यम से विभिन्न मन्तव्य व्यक्त किए गए। इस क्रम में जनकवि स्व. कैलाश गौतम, स्व. डॉ जमीर अहसन, विज्ञान व्रत, यश मालवीय जैसे स्थापित रचनाकारों के साथ ही नवांकुरित एवं अन्य रचनाकारों पर भी सामूहिक चर्चा की गयी। यह एक उल्लेखनीय एवं सराहनीय कार्य है। लॉकडाउन के 55 वें दिन ऑनलाइन मुशायरा एवं कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें वयोवृद्ध शायर सागर होशियारपुरी, सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार विज्ञान व्रत, इम्तियाज अहमद ग़ाज़ी सहित अनेक श्रेष्ठ कवियों एवं नवांकुरित प्रतिभाओं ने हिस्सेदारी की। पुस्तक का मुद्रण, प्रकाशन एवं तकनीकी पक्ष सराहनीय है। कवर पृष्ठ आकर्षक बन पड़ा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि लॉकडाउन के प्रारंभिक 55 दिनों के एक प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में यह पुस्तक हमारे समक्ष उपस्थित है। इस हेतु पुस्तक के लेखक इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी अत्यन्त सराहना एवं बधाई के पात्र हैं। 256 पेज के इस पेपर बैक संस्करण की कीमत 300 रुपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।

 



 ‘दिल्ली की सात कवयित्रियां’ महिला रचनाकारों की रचनाधर्मिता एवं उनकी सृजनात्मकता को उजागर करता है। कवयित्रियां मनोभावों को व्यक्त करने में काफी हद तक सफल रही हैं। सोनिया सूर्य प्रभा की कविताओं में अच्छे सृजन की झलक दिखायी देती है। समाज में महिला के योगदान और उसके महत्व को कवयित्री ने इस प्रकार रेखांकित किया हैः-मैं औरत हूं लिख लेती हूं/मैं औरत को लिख लेती हूं (मैं तो बस उसको जीती हूं)। डा. सरला सिंह ‘स्निग्धा‘ की ‘गरीबी’, ‘ये भूख है साहिब’, ‘भुखमरी’ कविताओं में आम आदमी की दशा का चित्रण है- तरह तरह के पेट यहां पर/कुछ का थोड़े से भर जाता है/कुछ में करोड़ों भी कम पड़ जाता है। रिंकल शर्मा ने कविताओं में मन के उद्गार कुशल ढंग से व्यक्त किये हैं। इनकी ‘प्रेम‘ शीर्षक कविता में प्रेम को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया गया है- प्रेम एक सागर है/जिसकी असीम गहराई है। ‘कोई ये माने, कोई वो माने‘ साम्प्रदायिक सद्भाव का सन्देश देती है। ‘घोटाला‘ कविता आज की राजनीति पर टिप्पणी करती है। डा. फौजिया नसीद शाद ने अपनी छोटी-छोटी रचनाओं के माध्यम से मनोभाव प्रकट किये हैं। ‘मानव-मानव का दुश्मन क्यों है‘ कविता में मानव की स्वार्थ लिप्सा को उजागर करने का प्रयास किया गया है।‘ संकलन में रीता सिवानी की 22 गजलों में से कुछ अच्छी बन पड़ी हैं। कुछ उल्लेखनीय पंक्तियां- अबला ही मत उसको समझो/दुर्गा-काली भी नारी है/लालच में ये होता है/जो है वो भी खोता है/सारी दुनिया जिसने जीती/खुद से कैसे हारा देखो। आम आदमी वर्तमान की दशा का यथार्थ वर्णन करती हैं। प्रभा दीपक शर्मा ने अपनी कविताओं में जिजीविषा, देशप्रेम एवं हृदय के उद्गार अच्छे ढंग से व्यक्त करने का प्रयास किया है। ‘अपंगता‘ रचना हौसलों को बुलन्द करने वाली एवं जीने का सन्देश देती है- देखो मेरी हिम्मत को/हार नहीं स्वीकार मुझे (अपंगता)। पर्यावरण प्रदूषण के प्रति सजग करती हुई रचना- आहत हूं आज बहुत मैं/अपने बच्चों की करनी पर (धरा की पुकार)। ‘हमारा प्यारा भारत‘, ‘देश की माटी‘ रचनाएँ देशप्रेम का भाव लिए हुए हैंरू- इस माटी पर जन्म लिया है, इस पर ही मर जाना है (देश की माटी)। ‘सावन, ‘पराया लगता है’, ‘आइना’ श्रृंगार की कविताएं हैं। आम आदमी की दशा का यथार्थ चित्रण कवयित्री ने इस प्रकार किया है- अथक परिश्रम करता रहता/पैसे चार कमाने को (मजदूर)। संकलन में सम्मिलित रोली शुक्ला की कविताएँ पाठकों को आशान्वित करती हैं। ‘वाणी का आधार’ कविता में शब्दों की महिमा बताने का प्रयास किया गया है। शहीदों की पत्नियों का दर्द मार्मिक रचना बन पड़ी है। 128 पेज के इस पेपर बैक संस्करण की कीमत 200 रुपये है, जिसे गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।



हिन्दी और उसकी क्षेत्रीय भाषाओं में भी ग़ज़ल कही और सराही जा रही है। लेकिन यह तथ्य ध्यातव्य है कि ग़ज़ल का एक विशेष अनुशासन एवं व्याकरण है और ग़ज़ल के लिए ज़रूरी बातों के प्रति उनकी ग़ज़लकार की सतर्कता की मांग करती है। जो रचनाकार इस तथ्य के प्रति सजग हैं, वह अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं। इसी क्रम में सुमन ढींगरा दुग्गल का ग़ज़ल संग्रह ‘गुंचे‘ सामने आया है। संग्रह की लगभग सभी ग़ज़लें शिल्प की कसौटी पर खरी उतरती हैं। शायरा ने बह्रों के बारे में पूरी सतर्कता और सावधानी का परिचय दिया है। हर एक मिसरे में रवानी है। शिल्प और बेमिसाल कथ्य का यह संगम ‘गुंचे‘ को श्रेष्ठ ग़ज़ल संग्रह बनाता है। शायरा का शब्द-भण्डार विपुल है। संग्रह की अधिकतर ग़ज़लें प्रेम, श्रृंगार एवं विरह की विविध अवस्थाओं के चित्रण से मन की कोमल भावनाएं स्वत: प्रकट होने लगती हैं। प्रेम के विविध आयाम के अशआर देखें - ‘आजकल खुद पे इख़्तियार नहीं/और क्या है अगर ये प्यार नहीं।’,‘ तेरे चेहरे से जो टपकता है/चांद में नूर वो कहां जानां।’,‘होश अपना है न दुनिया की ख़़बर/इश्क़ तेरा हमको ले आया कहां।’ विरह-वेदना की तीव्र अनुभूति के स्वर-‘धरती काटे अंबर काटे/तुम बिन हर इंक मंजर काटे।’,‘तुम गये सब चला गया दिल से/इक ख़लिश है वहीं नहीं जाती।’ कहा जा सकता है कि ग़ज़लकार मोहब्बत की शायरा हैं। इसके साथ ही वर्तमान समाज का चित्रण एवं जीवन के विविध पहलुओं को भी उजागर किया गया है। सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक आदि जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श करते हुए जीवन की अनुभूति, मानव संवेदना, आदि प्रमुख विषयों को भी ग़ज़ल के अशआर में इंगित किया गया हैं। ये अशआर सियासत की तल्ख़ हक़ीक़त बयान करते हैंः-‘वो लोग जिन्हें अपनी बुलंदी का नशा है/सब की निगाहों से उतर जाएंगे इक दिन।’ आज के युग की विडम्बना यही है-‘हर एक शहर सुलगता दिखाई देता है/उमीद क्या थी मगर क्या दिखाई देता है।’ शायरा की साफगोई का खुबसूरत अन्दाज देखें-‘मेरी अच्छाई की सनद ये है/मैं खुद को ख़राब लिखती हूं।’ इस शे’र में मुहावरे का कैसा सुन्दर प्रयोग किया गया है-‘हम तो दरिया में डाल देते हैं/नेकियां तुम संभालते हो क्या ?’ इन सब खूबियों के बीच ग़ज़ल-व्याकरण की दृष्टि से कुछ ग़ज़ल रचनाओं में ऐब (दोष) भी हैं, लेकिन ये नाम मात्र के लिए ही हैं। उदाहरणार्थ- बाब-अहबाब (क़ाफ़िया दोष), जाते जाते देख मुड़ कर आखि़री (रदीफ दोष), कई बाऱ रोज, बयाऩन, अब़ बेअसर, हऱरंग, बेबाक़ कर, मऱ रहा, सर ़रहे ऐबे तनाफुर (स्वरदोष)। तकाबुले रदीफ, ऐबे शुतुरगुर्बा भी किन्हीं-किन्हीं शेरों में हैं। वर्तनी दोष - रंज, राज, ऊंगली, जबान, यकीं, मिजाज, ताज, जिया (जिया)। हिन्दी में अच्छी ग़ज़लें कही जा रही हैं, सुमन ढींगरा दुग्गल का यह श्रेष्ठ संग्रह इस बात का साक्षात प्रमाण है। 112 पेज के इस संग्रह को उत्कर्ष प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 150 रुपये है।


 ‘ग़ज़ल का सफ़र’ मरहूम शायर वेद दीवाना की 80 ग़ज़लों का संग्रह है, जिसे उनके पुत्र राजीव दीवाना द्वारा प्रकाशित कराया गया है। पंजाब के ग़ज़लकारों में वेद दीवाना का नाम बहुत एहतराम से लिया जाता है। इस संग्रह में वेद दीवाना ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से कुछ दिल की, कुछ ज़िन्दगी की, कुछ संसार की और कुछ आज की बातें कही हैं। आपबीती के साथ ही जगबीती इन ग़ज़लों में साफ-साफ दिखायी देती है। इनमें दिल की धड़कनें सुनायी देती हैं, तो आम आदमी की आवाज़ को भी आसानी से महसूस किया जा सकता है। पुस्तक की कुछ ग़ज़लें रिवायती हैं, कुछ आधुनिक समाज का दर्पण भी हैं। ग़ज़लें अपनी परम्पराओं से जुड़ी हुई हैं, जो ग़ज़ल-विधा को निरन्तर आगे बढ़ाये जाते रहने के लिए निहायत ज़रूरी चीज है। वेद दीवाना की ग़ज़लों की भाषा मधुरता और सरसता लिए हुए आमफहम भाषा है, जिसे हर कोई आसानी से समझ सकता है। बोझिलता कहीं नहीं है। मुश्किल से मुश्किल बात को भी आसान लफ़्ज़ों में पिरो देना उन्हें आता है। बड़ी ही खूबसूरती और सलीके़ की शायरी है। हर तरह और हर मुद्दे पर अशआर कहे हैं। उनकी ग़ज़लें उनके अपने अनुभव से कही गयी हैं, जिनमें जीवन का निचोड़ झलकता है। मन के भावों की सफल प्रस्तुति हुई है। इनकी शायरी आम और ख़ास इंसान के हर एहसास को बयां करती है। वेद दीवाना के अपने रंग में रंगी हुई हैं उनकी ये ग़ज़लें। शिल्प की दृष्टि से ग़ज़लों की बुनावट ठीक है। कहीं-कहीं ग़ज़लों में तकाबुले रदीफ, ऐबे तनाफुर, ऐबे तख़ालुफ जैसे छोटे-मोटे दोष भी दिख जाते हैं। एक-आध मिसरे बे-बह्र भी हैं। प्रूफ रीडिंग सम्बन्घी दोष कहीं-कहीं रह गये हैं। ख़ोफ, पुछूंगा, बदगुमाना, पहली वार, ऐक, बरदात, ऐहले आदि जैसी वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियां संग्रह की साहित्यिकता की गरिमा के विपरीत हैं। लेकिन, इन सबके बावजूद ग़ज़ल का सफर संग्रह पठनीय एवं सराहनीय है। पुस्तक की ग़ज़लों के कुछ अशआर, जो बरबस ही ध्यान आकृष्ट कर लेते हैं, मुलाहिजा फरमायें- ‘खुद पर उसे ग़रूर अगर था तो इसलिए/सब कुछ था उसके घर में मगर आईना न था।’,‘मिजाज अपना भला बदलेगा सूरज/ये अंगारा है अंगारा रहेगा।’ अपना हाले-दिल शायर ने कुछ इस तरह बयान किया है-‘मैं बिखर जाऊं न सुखे हुए फूलों की तरह/मुझको इन तेज हवाओं से बचा कर ले जा।’,‘ एक तिनका हूं हवा मुझको झटक देगी कहीं/तू तो दरिया है मुझे साथ बहा कर ले जा।’, ‘क्या अजब मेरा भी तुमको जिक्र मिल जाए कहीं/तुम किताबे दिल के कुछ पन्ने उलट कर देखना।’ 80 पेज की पुस्तक को मन्नत पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 300 रुपये है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित )

शनिवार, 1 मई 2021

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की रगों में दौड़ती थी उर्दू


 

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

   25 दिसंबर की सुबह दिल्ली से प्रयागराज पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने दुनिया को अलविदा कह दिया। एक महीना से भी अधिक तक दिल्ली में इलाज करा रहे फारूकी साहब को जैसे अपने जन्मभूमि पहुंचने की ही प्रतीक्षा थी। पूरी दुनिया में उर्दू अदब की आलोचना जगत में उनका नाम सरे-फेहरिस्त है। पाकिस्तान के ‘निशान-ए-इम्तियाज’ एवार्ड से लेकर पद्मश्री तक सफर उन्होंने तय किया। उर्दू की सेवा के लिए अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, रूस, हालैंड, न्यूजीलैंड, थाईलैंड, बेल्जियम, कनाडा, तुर्की, पश्चिमी यूरोप,सउदी अरब और कतर आदि देशों का दौरा किया था। अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड के कई विश्वविद्यालयों में कई बार लेक्चर दिया था। 30 सितंबर 1935 को प्रतापगढ़ में पैदा होने वाले श्री फारूकी छह बहन और सात भाइयों में पांचवें नंबर पर थे। पिता मोहम्मद खलीकुर्रहमान फारूकी डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल थे। प्रतापगढ़ में प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद आप पढ़ाई के लिए इलाहाबाद आ गये। 1955 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। अपने बैच

में प्रथम स्थान हासिल किया, लेकिन लेक्चरशिप नहीं मिला। हताश नहीं हुए और सतीश चंद्र डिग्री कालेज बलिया में और इसके बाद शिब्ली नेशनल कालेज आजमगढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य करने लगे। 1958 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (एलाइड) के लिए आप चयनित हो गए। भारतीय डाक सेवा में कार्य करते हुए आपने विभिन्न राज्यों में अपनी सेवाएं दीं, 1994 में रिटायर हुए थे। अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी ने 2002 में और मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी हैदराबाद ने 2007 में आपको डी.लिट की मानद उपाधियों से विभूषित किया। 1991 से 2004 तक यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसलवानिया, फिलाडेल्फिया (यूएसए) में मानद प्रोफेसर रहे, 1997 से 1999 तक ‘खान अब्दुल गफ्फार खां प्रोफेसर’ के पद पर कार्यरत रहे। नेशनल कौंसिल फार प्रमोशन ऑफ उर्दू (नई दिल्ली) के वाइस चेयरमैन के रूप में उर्दू की तरक्की के लिए किया गया काम आपकी महत्वपूर्ण सेवाओं में से है। 


शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी


 मीर तकी मीर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर श्री फारूकी ने चार खंडों में ‘शेर-शोर अंगेज’ नामक किताब लिखकर तहलका मचा दिया। इस किताब पर 1996 में ‘सरस्वती सम्मान’ प्रदान किया, सम्मान के रूप में मिला पांच लाख रुपये उस समय का सबसे बड़ी इनामी राशि वाला सम्मान था। 1996 में ही आपने ‘शबखून‘ नामक मासिक पत्रिका निकाली, जो दुनिया-ए-उर्दू अदब में चर्चा का विषय हुआ करती थी। इनकी किताब ‘उर्दू का इब्तिदाई जमाना’ उर्दू और हिन्दी के अलावा अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुआ है। अंग्रेजी में इसे आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित किया है। शायरी में चार किताबें छप चुकी हैं, जिनके नाम ‘गंजे-सोख्ता’, सब्ज अंदर सब्ज’,‘चार सिम्त का दरिया’ और ‘आसमां मेहराब’ हैं। गद्य की किताबों में ‘लफ्जी मआनी’,‘फ़ारूक़ी के तब्सरे’,‘शेर गैर शेर और नस्र’,‘अफसाने की हिमायत में’, ‘तफहीमे-ग़ालिब’,‘दास्ताने अमीर हमजा का अध्ययन’ और ‘तन्कीदे अफकार’ आदि हैं। अंग्रेजी किताबों में ‘द सीक्रेट मिरर’,‘अर्ली उर्दू लिटेरेरी कल्चर एंड हिस्टी’,‘हाउ टु रीड इकबाल‘ हिन्दी में ‘अकबर इलाहाबादी पर एक और नजर’ वगैरह विशेष उल्लेखनीय हैं। हाल ही में अंग्रेजी में प्रकाशित उनका नाविल ‘कई चांद थे सरे आसमां’ का हिन्दी अनुदित संस्करण काफी चर्चा में रहा है। ‘उर्दू की नई किताब’ और ‘इंतिख़ाबे-नस्रे’ समेत कई किताबों का संपादन भी किया। श्री फ़ारूक़ी ने कुछ किताबों का अंग्रेजी से उर्दू अनुवाद भी किया है, जिनमें अरस्तू की पुस्तक ‘पाएटिक्स’ का उर्दू अनुवाद ‘शेरियत’ है। ‘शेर शोर अंगेज’ नामक पुस्तक चार खंडों वाली किताब में मीर तक़ी मीर के एक-एक शेर की व्याख्या और उसके विशलेषण में उसी विषय के कवियों के अश्आर की मिसालें दे-देकर ऐसा लिखा है की उर्दू अदब में तहलका सा मच गया, बड़े-बड़े आलिम चैंक पड़े। उनकी पुस्तक ‘एसेज इन उर्दू क्रिटिसिज्म एंड थ्योरी’ के अलावा गालिब और मुसहफी की जिदगी पर आधारित कहानियां हैं। उर्दू में ऐसे शब्दों और मुहावरों को शामिल करते हुए एक शब्दकोश की पुस्तक तैयार किया, जो आम शब्दकोश में मिलना लगभग असंभव है।

 ( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित) 


रविवार, 25 अप्रैल 2021

हर घटना में व्यंग्य तलाश लेते थे फ़ज़्ले हसनैन

    

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी 

   जाने-माने उर्दू अदीब, व्यंग्यकार और पत्रकार फ़़ज़्ले हसनैन का 24 अप्रैल को इंतिकाल हो गया, इसी के साथ एक ऐसे अध्याय का अंत हो गया, जिसकी पूर्ति कोई नहीं कर सकता। वे वे अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो हर छोटी-बड़ी घटना को व्यंग्य का रूप देने एक्सपर्ट थे। मुझे याद है, तकरीबन 17-18 साल पहले की बात है, मालिकाना झगड़े में उन दिनों ‘अमृत प्रभात’ के कर्मचारियों को तनख़्वाह कई महीने से नहीं मिल रहा था। ‘अमृत प्रभात’ के दफ़्तर में मैं कार्यकारी संपादक मुनेश्वर मिश्र जी के केबिन बैठा हुआ। उसी दिन कर्मचारियों को 200-200 रुपये दिए गए थे। अचानक फ़ज्ले हसनैन केबिन में दाखिल हुए, मुनेश्वर जी से मुख़ातिब होकर बोले-‘मिश्रा जी आज 200 रुपये मिल गए हैं, सोच रहा हूं कि इतनी बड़ी रकम कैसे लेकर जाउंगा, कहीं रास्ते में कोई छीन न ले। आप संपादक हैं, पुलिस से बात करके सुरक्षा के इंतज़ाम करा दीजिए।’ इसके बाद केबिन में बैठे सभी लोग जोर-जोर से हंसने लगे। यह उनके व्यंग्य का नमूना भर है। ऐसी बहुत से वाक़यात हैं।

 फ़ज़्ले हसनैन का जन्म 07 दिसंबर 1946 को प्रयागराज के लालगोपालगंज स्थित रावां नामक गांव में हुआ था। इंटरमीडिएट तक की परीक्षा लालगोपालगंज में ही उत्तीर्ण करने के बाद 1973 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से उर्दू विषय में स्नातकोत्तर किया था। प्र्रयागराज से प्रकाशित नार्दन इंडिया पत्रिका से पत्रकारिता की शुरूआत की थी, फिर अमृत प्रभात और स्वतंत्र भारत में भी सेवाएं दीं। व्यक्तिगत लेखन की शुरूआत हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में 1974 में किया था। ग़ालिब पर लिखी इनकी पुस्तक ‘ग़ालिब एक नज़र में’ को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया था। आपकी कहानियां, नाटक और व्यंग्य देश-विदेश की पत्रिकाओं और अख़बारों छपते रहे हैं। 1982 में इनका पहला व्यंग्य संग्रह ‘रुसवा सरे बाज़ार’ प्रकाशित हुआ था, इस पुस्तक पर उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें पुरस्कृत किया था। इनके तीन नाटक संग्रह ‘रोशनी और धूप’, ‘रेत के महल’, ‘रात ढलती रही’ छपे हैं। वर्ष 2001 में व्यंग्य रचना संग्रह ‘दू-ब-दू’ प्रकाशित हुआ। प्रयागराज के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का परिचय कराती आपकी एक पुस्तक ‘हुआ जिनसे शहर का नाम रौशन’ वर्ष 2004 में छपी थी, इस पुस्तक के तीन संस्करण प्रकाशित हुए हैं। इन्होंने कौमी उर्दू कौसिंल बराय फरोग उर्दू नई दिल्ली के अनुरोध पर मशहूर उपन्यासकार चाल्र्स डिकेंस के उपन्यास ‘डेविड कापर फील्ड’ का उर्दू में अनुवाद किया था। 


फ़ज़्ले हसनैन


 वरिष्ठ पत्रकार एसएस खान उनके बारे में लिखते हैं- ‘ फ़ज़्ले हसनैन उर्दू अदब में महारथ के साथ अंग्रेजी और हिंदी में भी वह बराबर का दखल रखते थे। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी व्यंग रचनाएं आज भी लोगों के जेह्न पर नक्श हैं। उनके साथ अमृत प्रभात में काम करते हुए बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। उनके लिखने और बोलने का अंदाज़ बिल्कुल जुदा था। रोजमर्रा की जिं़दगी में होने वाली बातों, छोटी बड़ी घटनाओं को जिस सहज तरीके से शब्दों में पीरोते वह अनायास ही एक श्रेष्ठ व्यंग्य रचना का शक्ल अख़्तियार कर लेता. आचार-व्यवहार सियासत-शिक्षा हो या फिर रीति रिवाज व धरम-करम. इन सब विषयों पर कटाक्ष करती उनकी कलम हर किसी को अपना मुरीद बना लेती। उनकी इसी काबिलियत व फनकारी को देखते हुए मैंने इलाहाबाद में अमर उजाला और दैनिक जागरण में कार्यकाल के दौरान उनकी सैकड़ों व्यंग्य रचना सिलसिलेवार तरीके से प्रकाशित की। उसी दौरान इलाहाबाद के 10 चोटी के साहित्यकारों के साहित्य लेखन और उनके जीवन के अनछुए पहलुओं पर भी उन्होंने कलम चलाई. उनका यह लेख न सिर्फ़ इलाहाबाद में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हुआ, यह लेख दैनिक जागरण के विशेष फीचर पेज पर प्रत्येक बुधवार को ‘हुआ जिससे शहर का नाम रोशन’ कालम के अंतर्गत प्रकाशित होता था। बाद में यही लेख किताब की शक्ल में इसी नाम से प्रकाशित हुआ।’



शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

खड़ी बोली के साथ लोकभाषा में भी महारत

प्रो. सोम ठाकुर


                                            - प्रो. सोम ठाकुर
                                               
   गीत काव्य के पुरोधा महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की पांचवीं पीढ़ी के गीत-कवि जमादार धीरज की काव्य कृति भावांजलि पर दृष्टिपात करने से पूर्व हमें गीत काव्य की पूर्व पीढ़ियों पर विचार करना होगा। गीत काव्य शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग लोचन प्रसाद पांडेय ने ‘कविता कुसुम माला’ की भूमिका में किया और पाठकों से निवेदन के अंतर्गत लिखा, कि काव्य के तीन प्रकार हैं-
 गीत कवि जमादार धीरज की काव्यकृति भावांजलि के आरंभ में कवि ने का मूल स्रोत पीड़ा की ओर संकेत करते हुए कहा है- 
                     गीत सृजन वह प्रसव तीर पीर है
                     जिसको मां झेला करती है
                     बन जाती है मुस्कान मधुर जब
                     शिशु से वह खेला करती है।
                     दर्द भरे भावों से जुड़कर
                     शब्द सार्थक हो जाते हैं
                     बिना जुड़े कवि की पीड़ा से
                     गीत निरर्थक हो जाते हैं।
परम्परा के अनुसार धीरज ने सर्वप्रथम वाणी वन्दना की है -
                     वात्सल्यमयी जननी जग की
                     हे ! वीणा वादिन नमन चरन
                      उठ जाते तेरा वरद हम
                      सब शोक नशावन पाप हरन। 
                      स्वीकार करो सविनय वंदन
                      मां धीरज की तेरे अभय सरन
                      वात्सलयमयी जननी जग की
                      हे! वीणावादिनी नम चरण।

जमादार धीरज


 संसार में मनुष्य निष्कलंक संस्कार लेकर जन्म लेता है, किन्तु जगत में आकर वह यहां के मायाजाल में विकृतियों से घिर जाता है। इस भाववता को कवि ने निम्न पंक्तियों में व्यक्त किया है -

                      ढ़ूढ़ता सुख रहा दुख के संसार में

                      हर कदम आंसुओं से भिगोता रहा

                      एक पीड़ा-कसक-दर्द, तड़पन चुभन

                      झेलता मैं सिसकता ही रोता रहा

                      धोर के तम का पड़ा सोच का आवरण

                      अर्थ उन्माद ने ऐसा पागल किया

                      बस मुखौटे बदलता रहा रात दिन

                      छल कपट द्वेष पाखंड में ही जिया

                      देने वाले ने दी थी धवल ज़िन्दगी

                      बीज मैं वासनाओं के बोता रहा।

नारी कविता की मूल प्रेरणा स्रोत होती है। प्रिया के अभवा सृजन अकर्मण्यता की ओर अग्रसर होता है -

                       बासठ बरस संग बिताये पलों को

                       बताओ भला भूल पायेगें कैसे

                       तुम्हारे बिना लेखनी आज गुम सुम

                       भला गीत के भाव आयेंगे कैसे।

                       तुम्ही शब्द हो, छन्द हो, गीत हो तुम

                       तुम्ही गीत बनकर हो अधरों पे आई

                       तुम्ही गीत उद्गम, तुम्हीं प्रेरणा हो

                       प्रथम गीत सुनकर तुम्हीं मुस्कुराई

                       सदा प्यार में थी लपेटी शिकायत

                       तुम्हें गीत रचकर सुनायेंगे कैसे।

जमादार धीरज ने ऋतु प्रसंगों को बड़े कौशल से आत्मसात किया है, जो निम्न पंक्तियों से दृष्टव्य है -

                        फागुन में बहकी बहार बहे मस्त-मस्त

                        जन-जन के मन में उमंग आज होली में

                        बौराई बगिया में गंध उठे मदमाती

                        झूम-झूम गाये विहंग आज होली में

                        पीली चुनरिया में सर सैया शरमाये

                        गदराये गेहूं के संग आज होली में

                        मौसम वासंती है, जीव जन्तु मस्त हुए

                        जंगल में नाचे कुरंग आज होली में

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने फगुनाहट को पूर्ण सशक्त ढंग से शब्दायित किया है। नारी अस्तित्व और उसके सशक्तीकरण पर कवि ने बल दिया है -

                         सदियों से चलता चला आ रहा है

                         नारी के श्रम का यही सिलसिला है

                         कहते हैं देवी जनम दायिनी पर

                          विरासत में उसको कहो क्या मिला है?

पारिवारिक परिवेश पर हिन्दी में बहुत कम लिखा गया है। डाॅ. कुंवर बेचैन और डाॅ. सरिता शर्मा ने इस दिशा में अच्छे गीत लिखे हैं। जमादार धीरज ने बहन को श्रद्धांजलि देते हुए भलीभांति संवेदना को निम्न पंक्तियों में व्यक्त किया है-

                           क्यों मौन हुई कुछ बोली तो

                           मन कहता है तुमसे बात करूं

                           तुम बसी हुई तो वादों में

                           मैं क्या भुलूं? क्या याद करूं?

सर्वहारा वर्ग के प्रति कवि ने सकारात्मक ढंग से अपने गीत व्यक्त किये हैं, जिसमें लेबर वेलफेयर की सुगंध का अनुभव किया जा सकता है -

                           दो संस्कृतियों की सहमति से

                           जब समुद्र मंथन होता है

                           अमृत-विष के बंटवारे में

                           ठगा हुआ-सा श्रम रोता है

समाज के साथ सायुज्य के दायित्व पर जमादार धीरज ने बल दिया है -

                           साथ जो न ज़माने के ढल जाएगा

                           ज़िन्दगी को ज़माना ही छल जाएगा

                           वक़्त पहचानिए जो रुकेगा नहीं

                           अपना चेहरा छुपाये निकल जाएगा।

                           नाम सबका न इतिहास बनता यहां

                           काल कितनों को बैठा निगल जाएगा

                           आह को मैं सवारूं इसी चाह से

                           गीत में दर्द अपना बदल जाएगा।

उपर्युक्त पंक्तियों में पाठकों को नागरी ग़ज़ल की सुगंध अवश्य मिलेगी। हिन्दी में ऐसे कवि बहुत कम हैं, जिनको खड़ी बोली के साथ-साथ लोकभाषा में भी महारत हासिल हो। जमादार धीरज ने अवधी में अनेक रस-सिक्त गीतों की रचना की है। कवि ने गीत-ग़ज़ल और दोहों में भी अपनी रचनाशीलता का परिचय दिया है। जमादार धीरज ने जीवन, समाज, राजनीति आदि सभी पाश्र्वों का सफलतापूर्वक स्पर्श किया है।

( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)

रविवार, 11 अप्रैल 2021

डाॅ. विधु खरे ने रंगमंच को ही बना लिया कैरियर

                                    

डॉ. विधु खरे दास

                                                 

                                                                              - ऋतंधरा मिश्रा

    डॉ. विधु खरे दास का जन्म बहराइच में हुआ। इनके पिता इलाहाबाद के माध्यमिक शिक्षा परिषद में डिप्टी सेक्रेटरी थे। विधू खरे की रुचि रंगमंच की गतिविधियों में रही, प्रारंभिक पढ़ाई द्वारिका प्रसाद गल्र्स इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट, ईसीसी से ग्रेजुएशन और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से मास्टर्स किया। छात्र जीवन से ही मंच की गतिविधियों से जुड़ गईं। साइंस की स्टूडेंट होने के कारण इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के जुलॉजी डिपार्टमेंट मंे अनिता गोपेश, स्वर्गीय पी के के साथ जुड़ गईं। पीके मंडल और अनिल रंजन भौमिक के साथ बहुत सारे नुक्कड़ नाटकों मे काम किया। बहुत से गांवों में गईं, लखनऊ मे भी खूब काम किया। नेहरु युवा केंद्र के लिए भी नुक्कड़ किया। 

​ये सब करते-करते डॉ. विधु खरे दास का मन इसी में रमने लगा। स्पार्टाकस नाटक में अभिनय करने के बाद परिपक्वता आने लगीं। हालांकि यह काम घर वालों को बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। एमएससी पूरा हो जाने पर बीएड करने के लिए अवध यूनिवर्सिटी प्रतापगढ़ चली गईं। प्रतापगढ़ में बीएड करने के साथ वहां भी खूब थिएटर किया। खुद ही लिखतीं थी खुद की नाटक करती थी, खुद ही डायरेक्ट भी करती थी। उस समय मोहन राकेश कृत ‘अण्डे के छिलके’ किया जो पहला बड़ा डायरेक्ट नाटक था। बीएड पूरा करने के दौरान ही नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का फॉर्म आया था, कथाकार मार्कंडेय जी और दूधनाथ की प्रेरणा से एनएसडी के लिए अप्लाई किया, जहां इनका चयन हो गया। एनएसडी के बाद फेलोशिप मिल गई तो मुंबई चली गईं। मुंबई में टेलीविजन, फिल्म इंडस्ट्री में काम भी किया, लेकिन ज्यादातर समय रंगमंच को दिया। अपना प्रोडक्शन किया जो खुद का लिखा हुआ था नाम था ‘अन्तर्बहियात्रा’ ये महिला  पात्रो  पर आधारित नाटक था। भारतीय व पश्चिम के विभिन्न नाटको की महिला पात्रों को एकत्रित करके एक स्क्रिप्ट बनायी थी। फिर मुंबई से वापस आ गईं, एन एस डी के टाई विंग के साथ मिलकर एक्टर टीचर की तरह एक साल काम किया। फिर दिल्ली और पूरे देश मे घूम-घूम कर कार्यशालाएं की। एनएसडी के एक्सटेंशन डिपार्टमेंट के साथ जुड़ गईं। विभिन्न निर्देशकों जैसे अनुराधा कपूर, कीर्ति जैन, फैजल अलकाजी, विपिन शर्मा अमिता उत्गाता आदि के साथ काम किया। 

​प्रतिवर्ष इलाहाबाद आकर सचिन तिवारी के मार्गदर्शन में कैंपस थिएटर के अंतर्गत एक नाटक करती रहीं। सीतापुर, चित्रकूट, आजमगढ़ आदि जगहो में भी कार्यशालाएं आयोजित की। भारतेंदु नाट्य अकादमी में वही रहकर कुछ समय तक अध्यापन कार्य किया। छात्रों के साथ प्रोडक्शन किया। रंगमंच में काम करने के लिए मंत्रालय से जूनियर व सीनियर फेलोशिप भी मिली। प्रो. देवेन्द्र राज अंकुर के मार्गदर्शन में रंगमंच मे ही पीएचडी भी कर लिया। सन 2011 से महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के ड्रामा विभाग में अध्यापन का कार्य किया।

डॉ. विधु खरे का कहना है कि आज समाज में स्त्री व पूरुष सभी को बराबर का दर्जा दिया जाता है, किंतु यह पूर्ण सच्चाई नहीं है। वास्तव मे रंगमंच मे महिलाएं अब भी गिनी-चुनी ही हैं। खासतौर पर अभिनेत्री बहुत ही कम है, क्योकि परिवार व समाज दोनों साथ नही देता।  जबकि रंगमंच समाज का ही हिस्सा है । रंगमंच संदेश देने का कार्य नहीं करता वरन  रंगमंच स्वयं एक संदेश है। आप मंच पर क्या दिखा रहे है यह अवश्य महत्वपूर्ण है। हमें  रंगमंच पर गरिमा सौंदर्य तथा अनुभूति का एक विश्वसनीय स्तर बनाये रखना चाहिएं। रंगमंच पैसा कमाने का माध्यम नहीं है। ये एक बहुत ही पारिश्रमिक कला स्वरूप है। रंगमंच मे आनें वाले कलाकारो को सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए इसमे नही आना चाहिये। डाॅ. विधु वर्तमान समय में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित)


गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

मूछ नृत्य के लिए हर आम-खा़स में चर्चित हैं ’दुकान जी’

    

 राजेंद्र कुमार तिवारी उर्फ़ ‘दुकान जी’

                                                                   -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 राजेंद्र कुमार तिवारी उर्फ़ ‘दुकान जी’ किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है। ख़ासकर प्रयागराज का बच्चा-बच्चा इन्हें पहचानता और जानता है। इन्होंने अपने कार्य और सक्रियता से अपनी बेहद अलग पहचान बनाई है। कार्य की वजह से ही 1995 में गिनिज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड और लिमका बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड में अपना नाम दज़ करा चुके हैं। इनका जन्म एक मई 1963 को प्रयागराज के दारागंज मुहल्ले में हुआ। चार बहन और तीन भाइयों में आप सबसे छोटे हैं। पिता स्वर्गीय नंद कुमार तिवारी भारतीय सेना में कार्यरत थे। दुकान जी ने इंटरमीडिएट की पढ़ाई राधा रमण इंटर काॅलेज प्रयागराज से पूरी की थी। इनके पिता की एक दुकान भी थी, जिसका नाम ‘निराला पुस्तक भंडार’ था। इसी दुकान में बैठकर बचपन से कार्टून आदि बनाते रहते थे, दुकान में ही बैठकर काम करने की वजह से इनका नाम ‘दुकान जी’ पड़ गया। मूंछ के नृत्य के लिए ही ये बेहद मशहूर हुए हैं, इसी कार्य के लिए इन्हें सारे सम्मान आदि मिले हैं। मूंछ पर मोमबत्तियां जलाकर बिना शरीर के हिलाए मूंछ नृत्य करते हैं, इस काम में दिक्कत आने पर इन्होंने अपने मुंह के सभी दांत उखड़वा दिए थे। ये प्रयागराज के नगर निगम और सिविल डिफेंस प्रयागराज के ब्रांड अम्बेसडर भी हैं।

 लखनउ महोत्सव, सैफई महोत्सव, ताज महोत्सव, इलाहाबाद त्रिवेणी महोत्सव, झांसी महोत्सव, उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, गोवा, कन्या कुमारी समते देशभर के अनेक स्थनों पर मूंछ का नृत्य दिखा चुके हैं। डिस्कवरी चैनल से लेकर नेशनल ज्योग्राफी चैनल समेत टेलीविजन के विभिन्न चैनलों से इनके कार्यक्रम प्रसारित हो चुके हैं। रामोजी फिल्मी सिटी हैदराबाद में कार्यक्रम पेश करने के लिए गए थे, कार्यक्रम पसंद आने पर फिल्मी सिटी के मालिक ने इन्हें अपने यहां रहने का प्रस्ताव दिया था, वहां तकरीबन दो साल तक रहने के बाद फिर इलाहाबाद लौट आए, इनका मन वहां नहीं लगा। गिनिज बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड और लिमका बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड के अलावा इंडिया बुक आॅफ रिकार्ड, मालवल्स बुक आॅफ इंडिया में इनका नाम दर्ज़ हो चुका है। जिला निरोधक समिति द्वारा ‘गोल्ड मेडल’, इंटरनेशनल डायरेक्टरी द्वारा ‘हाल आॅफ फेम’, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा ‘गंगा सेवा सम्मान’, वल्र्ड इनाइरोमेंट सर्टिफिकेट, स्वच्छ भारत मिशन सर्टिफिकेट समेत देशभर से कुल 44 सम्मान इनको अब तक मिल चुके हैं।

 रहस्य, ग्लोबल बाबा, इशा के इस्वा, धरती पुत्र, चाहत, भाग हिन्दू भाग, पानी, तियां, व्यस्था, रंगबाज दारोगा, रोड टू संगम, प्यार करेंगे पल-पल, मकानिक मोमिया, सच भइल सपनवा हमार और दरिया आदि फिल्मों में काम कर चुके हैं। कालूडीह, प्रतिज्ञा, जेलर की डायरी, तिरा चरित्र आदि टीवी सीरियलों में भी अभिनय किया है। मशहूर टीवी सीरियल प्रतिज्ञा के शुरू के दो एपिशोड इन्हीं से आरंभ हुए थे। अब तक इनके 170 एलबम बन चुके हैं। तकरीबन दो दर्जन रंगमंच के नाटकों में अभियन कर चुके हैं। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, पूर्व राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री, पूर्व राज्यपाल मोतीलाल बोरा समेत तमाम राजनेताओं ने इनके मूंछ पर लगी मोमबत्ती जलाकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया है। 

 उनकी भेषभूशा वीरप्पन से काफी मिलती है। जिसकी वजह से एक बार ये हरियाणा में बस से यात्रा करते समय पुलिस की गिरफ्त में आ गए। सूचना मिलने पर बस को पुलिस ने रुकवाया, फिर सुरक्षा घेरे में सभी यात्रियों को बस से बाहर निकालकर उन्हें पकड़ लिया। इनके स्पष्टीकरण देने पर पुलिस ने इलाहाबाद के एसएसपी को फोन करके इनके बारे में जानकारी मांगी। स्पष्टीकरण मिल जाने पर इन्हें छोड़ा गया। इन्होंने अपने दारागंज स्थित निवास स्थान को एक छोटा सा म्यूजियम का रूप दे रखा है। इनका दावा है कि इसमें तमाम अन्य वस्तुओं के अलावा दुनिया की सबसे छोटी गीता और सबसे छोटा कुरआन इनके म्यूजियम में एकत्र है। इनका कहना है कि अतिक्रमण की जद में इनका निवास स्थान आ गया है, जल्द ही इसे तोड़ा जाना है। म्युजियम की वस्तुओं को कही और स्थानांतरित करने के लिए तमाम नेताओं और अधिकारियों से गुहार लगा चुके हैं, लेकिन अभी तक कोरा आश्वासन हीं मिला है।

( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च  2021 अंक में प्रकाशित )

 


बुधवार, 24 मार्च 2021

भोजपुरी के अमर गीतकार थे भोलानाथ गहमरी

                                         

 

भोलानाथ गहमरी

                                                                      - शहाब खान गोड़सरावी

      

 कवि सम्मेलनों के मंच पर भोजपुरी कविता को देश के दूर-दराज़़ तक के इलाकों में ले जाने श्रेय जिन कवियों को जाता है, उनमें एक प्रमुख नाम भोलानाथ गहमरी का है। मंच पर जब वे अपनी सुरीली आवाज़ में गीत पढ़ने लगते तो श्रोता झूम उठते। ख़ासकर 80 और 90 के दशक में मंच पर उनकी उपस्थिति मुख्य आकर्षण की वजह होती थी। हालांकि उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के लिए भी कई गीत लिखे हैं, लेकिन उनकी मंच की प्रस्तुति सब पर भारी पड़ती है। भोलानाथ गहमरी का जन्म 17 दिसंबर 1923 को एशिया के सबसे बड़े गांव गहमर के भीखम राव पट्टी मुहल्ले में रामचंद्र लाल वर्मा जी के घर हुआ था। पिता कानूनगों व प्रथम श्रेणी के न्यायिक अधिकारी थे। इनकी माता भागमनी देवी घरेलू स्त्री थी। भोलानाथ ने कक्षा छह तक की पढ़ाई बर्मा में की थी। उसके बाद पहले गहमर और फिर ग़ाज़ीपुर से इंटरमीडिएट की शिक्षा पूरी की। फिर इलाहाबाद के बिजली विभाग के इलेक्ट्रिक सप्लाई यूनिट प्राइवेट लिमिटेड में नौकरी मिल गई। नौकरी के दौरान वे इलाहाबाद के ही हीवेट रोड रहते थे। इलाहाबाद के एक कवि सम्मेलन में गोपालदास नीरज ने उन्हें पहली बार भोजपुरी गीत पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनकी प्रस्तुति ने लोगों का दिल जीत लिया, यहीं से उनके कवि सम्मेलनों की यात्रा शुरू हुई थी। सेवानिवृत्ति के बाद ग़ाज़ीपुर शहर के आमघाट में पारसनाथ वकील के यहां किराए पर रहने लगे थे।

 भोलानाथ की शादी एक सम्पन्न परिवार विहार के इटाढ़ी समीप ग्राम इंदौर में शिव कुमारी से हुआ था। उनकी कुल छह संतान थी, जिनमें एक बेटी का निधन हो गया है। बेटी ज्योत्सना श्रीवास्तव वकील हैं। चार बेटे डाॅ. अरुण कुमार, पदम श्रीवास्तव, सुमंत श्रीवास्तव और हेमंत कुमार श्रीवास्तव हैं। भोलानाथ के पहला काव्य संग्रह 1959 में ‘मौलश्री’ नाम से छपा था। नाटक ‘लंबे हाथ’ 1967 में और ‘लोहे की दीवार’ 1972 में प्रकाशित हुआ। सन् 1969 में भोजपुरी के उनका पहला गीत-संग्रह ‘बयार पुरवइया’ प्रकाशित हुआ, जिसकी भूमिका आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखी थी। दूसरा भोजपुरी गीत-संग्रह ‘अंजुरी भर मोती’ 1980 में प्रकाशित हुई। इस किताब की भूमिका फ़िराक़ गोरखपुरी ने भोजपुरी में लिखा था। भोजपुरी में तीसरी पुस्तक ‘लोक रागिनी’ 1995 में छपी थी। उनके द्वारा भोजपुरी फिल्मों में लिखी गीत ‘सजना के अंगना’, ‘बबुआ हमार’, ‘बैरी भइल कंगना हमार’, ‘बहिना तोहरे खातिर’ काफी प्रचलित रहे। उत्तर प्रदेश सरकार के चलचित्र विभाग के फिल्म ‘विवेक’ और ‘सबेरा’ के गीत और संवाद भी उन्होंने लिखा। इसके लिए उन्हें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी व उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्डी ने पुरस्कृत किया था। 

उनके भोजपुरी गीत - ‘लोग रागिनी में रहि-रहि नाचे मन मोर हो’, ‘जिनिगिया से भोर भइले बलमू’ आदि बहुत मशहूर हैं। अपने कलम से भोजपुरी को जो उन्होंने जो अनमोल योगदान दिया है, उसकी मिसाल नहीं। भोजपुरी के सुप्रसिद्ध लोक गायक मुहम्मद खलील, झनकार बलिया ने जिं़दगी भर भोलानाथ गहमरी के गीत गाए। भोलानाथ गहमरी आकाशवाणी में स्वर-परीक्षक और सलाहकार की भूमिका लंबे अरसे तक निभाते रहे। वो अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पहला अधिवेशन 1975-77 में कला मंत्री, छठवा-सातवां 1981-83 में महामंत्री, बारहवा-तेरवाह 1993-95 में उपाध्यक्ष और चैदहवां में अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में पंद्रहवा अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन गाजीपुर में हुआ। 

गौरतलब हो कि भोजपुरी अखिल साहित्य से कई बरस पहले गहमरी जी के नेतृत्व में गहमर में भोजपुरी अधिवेशन हुआ था। साथ ही अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन विलासपुर में आयोजित आठवां अधिवेशन में उनके द्वारा लिखा भोजपुरी चित्रण नाटक का निर्देशन काफी प्रचलित हुआ था। भोजपुरी के दीर्घकालीन विशिष्ट सेवा के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से उन्हें राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार और भोजपुरी अकादमी पटना द्वारा उनकी गीत संग्रह ‘अजुरी भर मोती’ पर विशिष्ट भोजपुरी पुरस्कार विहार एवं हिंदी साहित्य सम्मेलन-प्रयाग द्वारा मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था। सन 2019 में भोलानाथ स्मृति में गाजीपुर जुलेलाल-लालदरवाजा स्थित मार्ग का नाम उनके नाम पर रखा गया है। भोलानाथ स्मृति में प्रत्येक वर्ष हरि नारायण हरीश के नेतृत्व में भोलानाथ गहमरी कवि सम्मेलन का विशेष आयोजन भी किया जाता है। भोलानाथ गहमरी को आंत में कैंसर हो गया था, जिसकी वजह से 8 दिसंबर 2000 ई० को गाजीपुर में उनका देहावसान हो गया।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित)

मंगलवार, 16 मार्च 2021

धीरज से पहली मुलकात को मैं भरत-मिलाप कहता हूं: गोपीकृष्ण

गोपी कृष्ण श्रीवास्तव का जन्म जनपद प्रतापगढ़ के ग्राम मधुपुर के सुशिक्षित एवं प्रतिष्ठित कायस्थ परिवार में 24 नवंबर 1930 को हुआ। आपकी शिक्षा-दीक्षा प्रताप बहादुर इंटरमीडिएट कॉलेज प्रतापगढ़ सिटी में हुई। आप कुछ दिनों तक पुलिस मुख्यालय में कार्यालय अधीक्षक के पद पर कार्यरत रहे। तत्पश्चात माध्यमिक शिक्षा परिषद में सेवा करते हुए नवंबर 1990 में सेवानिवृत्त हो गए। वर्तमान में आप राजरूपपुर प्रयागराज में रहते हुए साहित्य साधना में निमग्न हैं। 15 अगस्त 1990 में अपने ‘राष्ट्रीय साहित्य संगम’ नाम की संस्था की स्थापना की। जिसकी गणना आज प्रयाग की पुरानी साहित्यिक संस्थाओं में होती है। इसके माध्यम से आप निरंतर कार्यक्रम कराते हैं। आप गीत, ग़ज़ल, छंद, मुक्तक, दोहे आदि विधाओं में लेखन करते हैं। देश प्रेम और राष्ट्र भक्ति पूर्ण रचनाएं आपने अधिक की। स्मृति शेष जमादार धीरज  आपके अभिन्न मित्र थे। जो आपकी संस्था के उपाध्यक्ष भी रहे। धीरज जी का जाना इन्हें गहरे शोक में उतार गया। जमादार धीरज के बारे में नज़दीक से जानने के लिए अनिल मानव ने आपसे बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के संपादित भाग -

गोपीकृष्ण श्रीवास्तव से वार्ता करते अनिल मानव


सवाल:  जमादार धीरज से आप की पहली मुलाकात कब और कैसे हुई ?
जवाब:  जब वो गांव से यहां आए थे, वो वायुयान विभाग मनौरी, इलाहाबाद में राजपत्रित अधिकारी थे। रिटायर होने के बाद उन्होंने राजरूपपुर में मकान बना लिया और यहीं रहने लगे। उन्होंने भी हमारे बारे में सुन रखा था और मैं भी उनके बारे में। हम और वो दोनों लोग एक-दूसरे से मिलने के इच्छुक थे। लेकिन घर नहीं पता था। एक बार एक कवि सम्मेलन हुआ। वहां पर धीरज जी भी गए और मैं भी गया था। वहीं पर हम दोनों लोगों की पहली मुलाकात हुई। जिसे मैं ‘भरत-मिलाप’ कहता हूं। हमारी एक संस्था थी ‘राष्ट्रीय साहित्य संगम’। जिसकी स्थापना मैंने 15 अगस्त 1990 में किया था।  जिसमें 20-25 लोग थे, जिसका मैंने पंजीकरण कराया। इस संस्था का मैं अध्यक्ष था और धीरज जी को उपाध्यक्ष बना लिया।  अभी 6 मार्च 2020 को हमारी किताब का विमोचन पं. केसरीनाथ त्रिपाठी जी ने किया है। मैंने धीरज जी से पहले भी कई बार कहा था, कि आप अध्यक्ष बन जाइए, लेकिन वह बार-बार इनकार कर देते थे। और कहते थे, कि नहीं आप ही अध्यक्ष रहिए, मगर उस विमोचन के दिन हमें खुद मंच पर बोलने का मौका मिला। तब हमने कहा, कि अभी तक तो धीरज जी आप इंकार कर रहे थे, लेकिन आज सबके सामने में आपको अध्यक्ष मान रहा हूं। मैं संस्था में रहूंगा, अलग नहीं होऊंगा, मगर मुझे जिस पद पर रखेंगे मैं उसे खुले मन से स्वीकार कर लूंगा।
सवाल: राष्ट्रीय साहित्य संगम में जमादार धीरज की क्या भूमिका थी ? वह किस प्रकार से सहयोग करते थे ? 
जवाब: मैं राष्ट्रीय साहित्य संगम का अध्यक्ष केवल कहने के लिए था। जमादार धीरज जो कहते थे, वही मैं करता था। अब इससे बड़ी भूमिका और क्या होगी ? मैंने हमेशा उन्हीं को अध्यक्ष माना और अंतिम में 6 मार्च को सबके सामने घोषित भी कर दिया। राष्ट्रीय साहित्य संगम की जो भी कार्य योजनाएं बनती थीं, बैठक होती थी, उसमें प्रमुख रूप से धीरज जी की ही भूमिका रहती थी। धीरज जी संस्था के लिए बहुत से काम किए हैं उनका अतुलनीय योगदान है।

अनिल मानव, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


सवाल: इधर बहुत दिनों से राष्ट्रीय साहित्य संगम का कोई आयोजन नहीं हुआ है। इसकी क्या वजह हैं।
जवाब: ऐसा नहीं है। अभी 2 महीने पहले हमने इलाहाबाद सहित बाहर के बहुत से कवियों को इकट्ठा किया था। एक बड़ा कार्यक्रम चला था। लगभग चार-पांच घंटे का। इस तरह अभी हमने दो बार बड़ा कार्यक्रम कराया है।
सवाल: जमादार धीरज को आप कवि के रूप में कहां पाते हैं? 
जवाब: धीरज जी को मैं एक बड़ा कवि मानता हूं। उन्होंने देश और समाज के बारे में बहुत कुछ लिखा है। ‘दर्द हमारे गीत हो गए’ उनकी मशहूर कविता है। साहित्य को उन्होंने हमेशा साधना के रूप में रखा है। धीरज जी ने बहुत उम्दा और मार्मिक गीत लिखे हैं, जिसकी वजह से वह हमेशा अमर रहेंगे। मैं उन्हें अपने से भी श्रेष्ठ कभी मानता हूं। 

सवाल: इनके गीतों में भोजपुरी और अवधी शब्दों की भरमार है। इसको आप किस रूप में देखते हैं ?
जवाब: उनके गीतों और कविताओं में भोजपुरी और अवधी के शब्द बहुतायत देखने को मिलते हैं। अवधी की अपेक्षा भोजपुरी के शब्द कम इस्तेमाल करते थे। कवि को जिस मिट्टी से अधिक प्रेम और लगाव होता है, उसके काव्य में वहां की बोलियां और शब्द अनायास ही आ जाते हैं। ये नैसर्गिक होते हैं। इसके लिए कवि पूर्णतः स्वतंत्र होता है। यही उसकी विशिष्टता होती है। जो उसके काव्य को औरों से अलग बनाते हैं। उसे अलग पहचान दिलाते हैं। हम सदैव इसके पक्ष में हैं। कवि का अपना मन और लेखनी होती है, इस पर उसका निजी अधिकार होता है।

अनिल मानव, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव, मधुबाला गौतम और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 सवाल: जमादार धीरज जिस स्तर के कवि थे, देश के पटल पर क्या उनको वह स्थान मिल पाया ?

जवाब: धीरज जी की रचनाएं बहुत दमदार हैं। इलाहाबाद में ज्यादातर लोग उन्हें जानते हैं। वह लगभग हर कवि गोष्ठियों में पहुंचा करते थे और उनका एक वरिष्ठ कवि के रूप में अलग सम्मान रहता था। लेकिन जो पहचान और स्थान उन्हें वृहद क्षेत्र में मिलना चाहिए था, शायद उतना नहीं मिल पाया है। पूरे देश में सब को पहचान मिल पाना बेहद कठिन होता है।

सवाल: जमादार धीरज की पुस्तक ‘युग प्रवर्तक डॉक्टर आंबेडकर’ को आप किस रूप में देखते हैं ? 

जवाब: इस किताब को लिखने से पहले धीरज जी ने इस पर मुझसे चर्चा की थी। इस किताब पर स्पेशल एक गोष्ठी भी हुई। मैं इसे एक उत्कृष्ट किताब मानता हूं। अम्बेडकर जी के जीवन से संबंधित तमाम स्याह और सफेद पक्ष इस किताब के जरिए उन्होंने उजागर किया है। उनके जीवन संघर्षों को बहुत अच्छे तरीके से धीरज जी ने रचा है जो काबिले-तारीफ है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)


सोमवार, 8 मार्च 2021

लाॅकडाउन के 55 दिन और तन्हाइयां

                                                                                - डाॅ. हसीन जीलानी

                                         


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी जो बुनियादी तौर पर तो सहाफ़ी हैं ‘गुफ़्तगू’ के ज़रिए उनकी पहचान शह्र और बैरून-ए-शह्र में एक अदीब व शायर की भी बन गयी है। उनके काम करने की लगन ने उनके चाहने वालों का दायरा काफी वसी कर दिया है। कुछ लोग इम्तियाज़ ग़ाज़ी की सरगर्मी पर अपनी हैरानी का इज़हार करते हैं और कहते हैं भाई आप अतने सारे काम कैसे कर लेते हैं। ऐसे मौक़े पर मुझे अल्लामा इक़बाल का मार्का-आरा नज़्म ‘खिज्रे-राह’ का एक शेर याद आता है -

                  क्या तअज्जुब है मेरी सरहान वर्दी पर तुझे

                  ये तगायू-ए-दमादम ज़िन्दगी की है दलील।

‘लाॅकडाउन के 55’ दिन इम्तियाज़ ग़ाज़ी की ताज़ा-तरीन किताब है। दुनिया में फैले वबा करोना की वजह से दुनिया के बेशतर मुमालिक में ज़िन्दगी जैसे ठहर सी गयी। हिन्दुस्तान में 25 मार्च 2020 को पूरे मुल्क में लाॅकडाउन नाक़िद कर दिया गया। इसके बावजूद बहुत से दानिश्वरों, अदीबों और शायरों ने इस पुर-आशोब दौर में भी पढ़ने लिखने का काम जारी व तारी रखा। इन्हीं में से एक नाम इम्तिया अहमद ग़ाज़ी का भी है। लाॅकडाउन के दरमियान इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने कारनामों का तज्जिया करने के लिए आॅनलाइन नशिस्तों का एहतिमाम किया, जिसमें लोगों ने अपने अपने ख़्यालात बड़ी बेबाक़ी से ज़ाहिर किए। इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने इन्हीं ख़्यालात को तहरीरी शक्ल देकर बाक़ायदा किताब शायरा कर दी है। किताब में इम्तियाज़ ग़ाज़ी का सहाफ़ती रंग ग़ालिब है। दौर-ए-हाजिर के मारुफ़ शायर मुनव्वर राना ने दुरुस्त लिखा है कि-‘39 शायरों पर परिचर्चा तो एक मामूली काम है लेकिन ये एक बुनियाद है। गुफ़्तगू एक बुनियाद रख रहा है। यह अदब की एक बहुत बुलंद इमारत, साहित्य की आलीशान इमारत की बुनियाद है। लाॅकडाउन के ज़माने में एक अच्छा और एक सच्चा काम कर लेना बड़ी बात है।’

गुफ़्तगू पब्लिकेशन की जानिब से शाया इस किताब का कवर दिलकश है। तारीख़ी हैसियत की हामिल इस किताब की कीमत सिर्फ़ 300 रुपये है। 280 सफ्हात़ पर मुश्तमिल ये किताब हिन्दी और उर्दू दोनों ज़बानों में दस्तयाब है।

 


 ‘तन्हाइयां’ तबस्सुम नाज़ का तीसरा शेरी मजमुआ है जो कि हम्द, नात, मन्क़बत, ग़ज़ल, गीत और नज़्मों पर मुश्तमिल है। इससे क़ब्ल सन् 2008 ई. में ‘बूए-ग़ज़ल’ और सन 2015 ई. में ‘मुस्कुराहट’ नाम के मजमुए भी शाया होकर मंज़र-ए-आम पर आ चुके हैं। तबस्सुम नाज़ ब-यक वक़्त कई सलाहियतों की मालिक हैं। एक इंसान में ब-यक वक़्त कई सलाहियतों का होना कभी-कभी अच्छा होता है तो कभी-कभी मुश्किलें भी पैदा करता है। तबस्सुम नाज़ शेरी मजमुओं के साथ-साथ अफ़्सानवी मजमुआ ‘अंदाज़-ए-बयां कुछ और’ की भी मुसन्निफ़ हैं।

 तन्हाइयां में मुतालिआ से ये बात शिद्दत से महससू होती है कि तबस्सुम नाज़ के दिल में जज़्बात का एक समुंदर ठाठें मार रहा है जो कभी अफ़्साना निगारी की शक्ल में ज़ाहिर होता है तो कभी शायरी का रूप अख़्तियार कर लेता है, लेकिन इसमें बहने वाले बेशुमार कीमती  गुहर उज़्लत पसन्दी के सबब धागे में सलीके से नहीं पिरोये जा सके हैं। ख़्वाजा हैदर अली आतिश का बहुत मशहूर शेर है- 

              बन्दिश-ए-अज्फ़ाज़ जड़ने से नगों के कम नहीं

              शायरी भी काम है आतिश मुरस्सा साज़ का।

यानी फ़नकार के लिए लफ़्ज़ों को सलीके़मन्दी से शेरी पैक़र में ढालने के फन से वाक़िफ़ होना ज़रूरी होता है। जैसा तबस्सुम नाज़ साहिबा ने खुद फ़रमाया है कि परवीन शाकिर उनकी आइडियल शायरा हैं। अगर वाक़ई वह उन्हें अपना आइडियल समझती हैं तो परवीन शाकिर की शायरी के उन अहसन पहलुओं पर भी ग़ौर करना चाहिए जो उनको उर्दू शायरी का माह-ए-तमाम बनाते हैं। तबस्सुम नाज़ के चंद उम्दा शेर मुलाहिजा कीजिए -

                चलने दो हवा-ए-उल्फ़त फिर दुनिया बदलेगी चेहरा,

                उम्मीद जगी है पत्थर दिल इंसान पिघलने वाला है।

                सूरज के डूबने पे जला देते हैं चिराग़,

                सच्चाई को फ़रेब से झुटला रहे हैं हम।

150 पेजा पर मुश्तमिल इस किताब की क़ीमत सिर्फ़ 300 रुपये है, जो इरम पब्लिशिंग हाउस, पटना से शाया हुई है। किताब का कवर दिलकश है। उम्मीद है ‘तन्हाइयां’ को अदबी हल्क़े में क़द्र की निगाहों से देखा जाएगा।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)


सोमवार, 1 मार्च 2021

गंगा-जमुनी तहजीब की बेहतरीन मिसाल है गुफ़्तगू: डाॅ. मालवीय



गुफ़्तगू के शहनाज़ फ़ातमी/शगुफ़्ता रहमान अंक का हुआ विमोचन

प्रयागराज। देश के मौजूदा हालात में भाषाई एकता की सबसे अधिक आवश्यकता है, ताकि भाषा के आधार पर लोग एक दूसरे को जाने समझें और उस पर काम करें। ऐसे ही काम को अंजाम दे रही है गुफ़्तगू पत्रिका। इसके हर अंक में उर्दू ंके साथ हिन्दी साहित्य भी भरपूर मात्रा में प्रकाशित हो रही है। यही वजह है दोनों ही भाषाओं के लोगों में यह पत्रिका समान रूप से लोकप्रिय है। मौजूद अंक में जहां डाॅ. बशीर बद्र और मुनव्वर राना जैसे लोगों की ग़ज़लें छपी हैं तो दूसरी ओर प्रो. सोम ठाकुर और यश मालवीय की भी कविताएं हैं। यह बात 28 फरवरी को गुफ़्तगू की ओर से करैली स्थित अदब घर में आयोजित विमोचन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि मशहूर उर्दू अदीब डाॅ. अजय मालवीय ने कही।

 इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि गुफ़्तगू के मौजूद अंक में शम्सुरर्हमान फ़ारूक़ी का एक महत्वपूर्ण लेख ‘क्लासिकी ग़ज़ल की शेरीआत’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है, सभी ग़ज़ल लिखने वालों को यह लेख अवश्य पढ़ना चाहिए। इसी तरह इस ंअंक में डाॅ. बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मंज़र भोपाली, मुनव्वर राना जैसे नामचीन लोगों की भी ग़ज़लें नए लोगों के साथ छपी है। हमारी हमेशा से कोशिश रही है कि नामचीन लोगों के साथ नए लोगों को भी स्थान दिया जाए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. सुरेश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि आज के दौर में जब बड़ी-बड़ी साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो रही हैं, गुफ़्तगू का प्रकाशन जारी है और इसमें निरंतर निखार आ रहा है। गुफ़्तगू जैसी पत्रिका एक तरह से साहित्यिक नगरी प्रयागराज की पहचान बन गई है। यह पत्रिका पूरे देश के साथ कुछ दूसरों मुल्कों में भी पढ़ी जा रही है। विशिष्टि अतिथि संजय सक्सेना ने कहा कि आज के दौर में साहित्यिक पत्रिका निकलना बहुत बड़ा और कठिन काम है, लेकिन इम्तियाज़ ग़ाज़ी यह काम बेहतरीन तरीके से कर रहे हैं। कार्यक्रम का संचालन फ़रमूद इलाहाबादी ने किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। डाॅ. नीलिमा मिश्रा, शैलेंद्र जय, अफसर जमाल, श्रीराम तिवारी, शिवाजी यादव, असद ग़ाज़ीपुरी, राम कैलाश प्रयागवासी, प्रभाशंकर शर्मा, पूजा कुमारी रूही, प्रभाकर केसरी, राकेश मालवीय, जीशान चमन, प्रकाश सिंह अश्क, सुजाता सिंह, आसिफ उस्मानी आदि ने कलाम पेश किया। 


बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

काव्य व्याकरण, सपनों का सम्मान, सहरा के फूल और मुनिसुतायन

- अजीत शर्मा आकाश



आजकल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़ल और कविता के नाम पर अनेक त्रुटिपूर्ण रचनाएं प्रकाशित हो रही हैं। इन रचनाओं में क्या और किस प्रकार के दोष हैं, इसकी जानकारी न तो रचनाकार को होती है, न ही सम्पादक को। जिसके अभाव में अच्छे साहित्य के पाठक एवं सीखने के इच्छुक नवांकुर अच्छी एवं मानक रचनाओं से वंचित रह जाते हैं। सोशल मीडिया के अंतर्गत फेसबुक एवं व्हाट्स एप ग्रुपों में तो कचरा ही कचरा भरा रहता है। यह स्थिति काव्य-लेखन की समुचित जानकारी के अभाव के कारण उत्पन्न हुई है। कुछ प्रकाशनों एवं लेखकों ने इस दिशा में सराहनीय कदम उठाये हैं। गुफ्तगू पब्लिकेशन की पुस्तक ‘काव्य व्याकरणं’ ऐसा ही एक अच्छा कार्य है। यह पुस्तक वर्ष 2017 में छपकर आयी थी, जिसका प्रथम संस्करण समाप्त हो चुका है। अतः पाठकों एवं सीखने के इच्छुक रचनाकारों की आवश्यकता को देखते हुए पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित किया गया है, जो एक सराहनीय प्रयास है। पुस्तक के प्रारम्भ में गजल से सम्बन्धित विस्तृत, विवेचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक दो लम्बे आलेख हैं। इनके अंतर्गत शम्सुर्रहमान फारूकी के ‘क्लासिकी ग़ज़ल की शेरीआत’ नामक आलेख में शास्त्रीय ग़ज़ल के काव्यशात्र पर गंभीर चर्चा करते हुए विभिन्न अशआर के उद्धरण के साथ ग़ज़ल के शास्त्रीय स्वरूप के विषय में जानकारी दी गई है। इसी प्रकार अली अहमद फ़ातमी के ‘नए इकदार और नई उर्दू ग़ज़ल’ में आधुनिक ग़ज़लगोई एवं ग़ज़ल के आधुनिक कथ्यात्मक स्वरूप के विषय में सविस्तार चर्चा की गई है। दोनों आलेख ग़ज़ल साहित्य की विस्तृत व्याख्या करते हैं एवं ग़ज़ल के कई ऐसे पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं, जिनके विषय में कम पाठकों को ही पता होगा। डा. नईम ‘साहिल’  के ‘ग़ज़ल लेखन का व्यावहारिक ज्ञान’ नामक लेख में ग़ज़लकारों के लिए अच्छी जानकारी उपलब्ध कराई गई है। ग़ज़ल की विशेषताओं एवं उसमें आने वाले दोषों के विषय में जानकारी प्राप्त कर श्रेष्ठ ग़ज़लों की रचना की जा सकती है। अवधेश कुमार के ‘हिन्दी ग़ज़ल की परम्परा’ में ग़ज़ल की शुरूआत के विषय में एवं हिन्दी में ग़ज़ल-लेखन के जनक दुष्यन्त कुमार के योगदान पर प्रमुख रूप से चर्चा की गई है। आर.पी.शर्मा ‘महर्षि’ के ‘बह्र-विज्ञान के बारे में’ पुस्तकाकार आलेख बह्रों की जानकारी से भरा पड़ा है एवं सीखने के इच्छुक ग़ज़लकारों के लिए स्वर्णिम जानकारी की तरह है। बह्र की समुचित जानकारी के बिना शायरी, विशेष रूप से ग़ज़ल-लेखन का कोई अर्थ नहीं है। इस दुष्टि से ग़ज़ल लेखकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सामग्री इस आलेख में समाहित की गयी है।
 ग़ज़ल के अतिरिक्त उर्दू शायरी की अन्य विधाओं के छन्द एवं उसके इतिहास पर भी पुस्तक में प्रकाश डाला गया है। इनमें रूबाई, मुनाजात, हम्द, नात, मर्सिया, आदि विधाएं शामिल हैं। इनमें अख़्तर अज़ीज़ का आलेख ‘हम्द, मुनाजात और नात’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। डाॅ. फरीद परबती ने रूबाई विधा का विशेष परिचय प्रदान किया है। नायाब बलियावी ने मर्सिया के विषय में बताया है। हिन्दी में काव्य-रचना करने वालों के लिए भी उपयोगी सामग्री पुस्तक में उपलब्ध है। हिन्दी कविता की प्रमुख विधाओं में से डा. बुद्धिनाथ मिश्र ने गीत विधा के इतिहास एवं उसकी वर्तमान दशा-दुर्दशा पर चर्चा की है। हिन्दी के शास़्त्रीय छन्द दोहा की रचना करने के लिए रघुविन्द्र यादव ने अपने आलेख सही दोहे लिखने के लिए क्या करें सविस्तार बताया है। हिन्दी में हाइकू नयी विधा का काव्य है, जो जापानी काव्यशास्त्र से आया हुआ है। हिन्दी के सन्दर्भ में इसकी रचना एवं प्रस्तुति को कमलेश भट्ट कमल के आलेख के माध्यम से अच्छे एवं रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इनके अतिरिक्त माहिया और जनक छन्दों की जानकारी प्रदान करते हुए आलेख भी पुस्तक के अन्तर्गत हैं। फिल्मी गीतकार एवं शायर इब्राहीम ‘अश्क’ ने फिल्मी गीतों के विभिन्न प्रकार एवं फिल्मों में उनकी अपरिहार्यता पर ‘फिल्मी गीत की परिभाषा’ आलेख के माध्यम से इस विषय में पर्याप्त प्रकाश डाला है। अच्छे एवं उपयोगी प्रकाशन के लिए संपादक इम्तियाज अहमद गाजी धन्यवाद के पात्र हैं। इम्तियाज अहमद गाजी द्वारा सम्पादित 164 पृष्ठों की इस सजिल्द पुस्तक को गुफ्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य 400 रुपये है।
 


ग़ज़ल साहित्य की एक लोकप्रिय विधा है। रामचंद्र ‘राजा‘ की 59 ग़ज़लों का संकलन ‘सपनों का सम्मान’ प्रकाशित हुआ है। इस पुस्तक में वर्तमान समाज एवं जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करने का प्रयास किया गया है। सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक आदि जीवन के सभी पहलुओं को स्पर्श किया गया है, जिसके अंतर्गत जीवन की अनुभूति, मानव संवेदना, आज के युग की विडम्बनाएं आदि प्रमुख विषयों को इंगित किया गया हैं। संग्रह में ग़ज़लों के कुछ उल्लेखनीय अशआर इस प्रकार हैं- ‘देश को जो खोखला करते रहे/एकता के गीत गाने आ गये।’ एवं ‘है हवा के इशारे पे उसका सफर/वो जिधर चाहे खुशबू उधर जायेगी।’ ये शेर देश के वर्तमान अधिनायकों का चरित्र उजागर करते हैं। आज की राजनीति पर व्यंग्य- ‘अब दिल से दिल को जोड़ना आसां नहीं रहा/नफ़रत का ज़ह्र शह्र में फैला दिया गया।’ समाज एवं देश के कल्याण की चाह इन पंक्तियों में परिलक्षित होती है- ‘हम चाहते हैं कोई भी ठोकर न खाये अब/फूलों से सबकी राह सजाया करेंगे हम।’ एवं ‘सूरज बनूंगा मैं भी कभी आसमान का/रोशन करूंगा कोना-कोना मैं जहान का।’ आज के दौर की स्वार्थपरता का चित्रण- ‘गायब हुआ कुछ ऐसे वो मतलब निकाल के/मुद्दत गुजर गई वो दुबारा कहां मिला।’ एवं ‘जो शजर अपने पत्तों से महरूम है/छोड़कर उनको पक्षी भी जाने लगे।’ रचनाकार ने बाजारवाद पर इस शेर के माध्यम से सटीक व्यंग्य किया है- ‘व्यापार कितना गिर के है करता ये आदमी/औरत की फोटो छापता है इश्तहार में।’ गांवों से शहरों की ओर पलायन- ‘वो लहलहाता प्यार का मंजर नहीं मिला/गांवों के जैसा शहर में आदर नहीं मिला।’ सर्वहारा के जीवन का चित्रण देखें- ‘मुफलिसी के दौर में दिन रात हम/क्या बताएं किस तरह पलते रहे।’
ग़ज़लकार ने अच्छी ग़ज़लें कहने की भरसक कोशिश की है, लेकिन ग़ज़ल की विधा पर बहुत अच्छी पकड़ न होने के कारण कहीं-कहीं अधकचरापन झलकता है। हालांकि ग़ज़लकार स्वयं मानता है कि- ‘लिखना कलाम सीख ले तो फिर उसे तू पढ़/ख़ामी हो जिसमें ऐसी कभी शायरी न कर।’ लेकिन इसके बावजूद ग़ज़ल संग्रह में ख़ामियां  दृष्टिगत होती हैं। व्याकरण की दृष्टि से ऐबे तनाफुर, तकाबुले रदीफ़, मिस्रों का कहीं-कहीं बे-बह्र होना जैसे दोष भी कुछ गजलों में हैं। 72 पेज की इस पुस्तक की कीमत 100 रुपये है, जिसे गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।
 


हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल की लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही जा रही है। इसी का परिणाम है कि प्रायः सभी रचनाकार, जो इस विधा से जरा-सा भी वाक़िफ़ हैं, इसे अपना रहे हैं और अपनी लेखनी का जोर आजमा रहे हैं। ऐसी ही जोर आजमाइश के परिणामस्वरूप मोहन बेगोवाल का ‘सहरा के फूल’ नामक गजल संग्रह प्रकाशित होकर आया है। इस संग्रह में रचनाकार ने अपनी 100 गजलें प्रस्तुत की हैं। कथ्य की दृष्टि से इसमें अनेक सामाजिक विद्रूपताओं एवं जीवन की विसंगतियों को स्पर्श किया गया है। कुछ ग़ज़लों के अश्आर सराहनीय हैं, जिनका उल्लेख निम्नवत् है-‘जुल्म का पुतला अगर जल जायेगा/साथ नफ़रत का किला भी ढायेगा।’ ‘जिस ने चाहा वो ही कीमत लगा गया/क्या दौर हम बाजार का सामान बन गए।’, ‘तू अभी जाग क्यूँ नहीं जाता/देख पानी जा रहा है सर से।’, ‘सोच जब आसमान तक पहुंची/तब ये कोशिश उड़ान तक पहुंची।’ लेकिन, इस रचनात्मकता के साथ ग़ज़ल-लेखन के प्रति लापरवाही इस संग्रह में सबसे अधिक खटकने वाली बात है। यह सर्वविदित है कि प्रत्येक विधा की भाँति गजल के भी अपने कुछ नियम, शर्तें एवं बंधन हैं, जिनका पालन अनिवार्यतः करना होता है। ग़ज़ल की ऊपरी बनावट को देखकर ही लिखने से वह एक अधकचरेपन का शिकार होते हुए ग़ज़ल न होकर ग़ज़लनुमा रचना के रूप में हमारे सम्मुख आती हैं। ‘सहरा के फूल’ इसी प्रकार का ग़ज़ल संग्रह है। शिल्प विधान अपरिपक्व होने के कारण रचनाओं में रब्त और रवानी का अभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है एवं भावों की अस्पष्टता कथ्य को दुरूह बना देती है। उदाहरणार्थ, आंसू उछल तो सकती हैं, खुद मुझे उस बचा हो गया, तुम जलाने मेरी खता लाया, मेरे से दिल्ल्गी न हो जाए, जब मैं नजदीक से पढ़ा, जिस लुटा के घर रहा हूं, तदबीर हम बनाई है, बात हर पे मेरी, तू रूलाया, तेरे से, करी जो बात, घर मिरे के, जिस मिलाया था, जैसे अशुद्ध एवं अनर्गल वाक्यांशों का प्रयोग खड़ी बोली की ग़ज़ल में नितान्त अग्राह्य है। यही नहीं, अन्य शायरों की कुछ पंक्तियां इस ग़ज़ल संग्रह में ज्यों की त्यों प्रयोग की गयी हैं, जो नितान्त आपत्तिजनक होने के साथ ही ग़ज़लकार की रचनाधर्मिता पर प्रश्नचिह्न लगा जाती हैं। उदाहरणार्थ, पानी पानी हुआ जाता है समन्दर देखो-एहतराम इस्लाम (पृष्ठ-12), हर नए गम से खुशी होने लगी- साहिर होशियारपुरी (पृष्ठ-16), अभी कुछ और करिश्मे गजल के देखते हैं-अहमद फराज (पृष्ठ-29), इसको हंसा के मारा, उसको रुला के मारा-अकबर इलाहाबादी (पृष्ठ-41)। बहरहाल, ग़ज़लकार को इस प्रकार की भूलों से बचना चाहिए था। लेकिन, ग़ज़ल लेखन के लेखक के इस प्रयास को पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता। ‘सहरा के फूल’ की ग़ज़लों के माध्यम से अपनी बात पाठक तक पंहुंचाने की भरपूर चेष्टा की गयी है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। रचनाकार को इस प्रयास के लिए साधुवाद एवं आशा की जाएगी, कि अगला संग्रह एक अच्छे रूप में पाठकों के सम्मुख आएगा। कुल 108 पृष्ठों की इस सजिल्द पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य रुपये 200 मात्र है।
 



 कवयित्री डाॅ. शैलकुमारी तिवारी द्वारा रचित ‘मुनिसुतायन‘ तीन भागों में विभक्त 704 पद्यों की प्रबंध कविता है। प्रबंध काव्य में कोई प्रमुख कथा काव्य के आदि से अंत तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। समीक्ष्य कृति में कवयित्री ने शकुन्तला के जीवन की सम्पूर्ण कथा कही है। महाकवि कालिदास के संस्कृत नाटक ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्‘ से कथानक ग्रहण करके ‘मुनिसुतायन‘ कृति का प्रणयन किया गया है, जो खड़ी बोली हिन्दी में पद्य रूपांतरण के स्वरूप में है। इस रचना में 30 मात्राओं वाले ‘पद-पादाकुलक‘ छन्द का प्रयोग किया गया है। इसके साथ ही इससे मिलते-जुलते ‘वीर‘ या ‘आल्हा‘ छन्द का भी प्रयोग किया गया है। कथा के प्रथम भाग में ऋषि विश्वामित्र एवं अप्सरा मेनका के गर्भ से उत्पन्न अद्भुत सौन्दर्य-पुंज कन्या के जन्म का वृत्तान्त वर्णित है, जिसे उसकी जन्मदात्री ने प्रसव के तत्काल बाद ही त्याग दिया। कण्व ऋषि के आश्रम में उनकी धर्मभगिनी गौतमी द्वारा उस कन्या पालन-पोषण किया गया। कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात् राजा दुष्यन्त द्वारा शकुन्तला के प्रति आकृष्ट होकर गान्धर्व विवाह किये जाने एवं शकुन्तला-दुष्यन्त का प्रणय-प्रसंग है। द्वितीय भाग में दुष्यन्त की स्मृतियों में खोयी हुई शकुंतला को दुर्वासा ऋषि द्वारा शाप दिया जाना, महर्षि कण्व द्वारा शकुन्तला की विदाई करके नृप दुष्यन्त के पास भेजना तथा दुष्यंत द्वारा उसे अस्वीकार किये जाने के पश्चात् उसकी जननी मेनका द्वारा उसे मारीचाश्रम में ले जाना वर्णित है। तृतीय भाग में नृप दुष्यन्त की स्मृति का जागृत होना, मारीचाश्रम में पहुंचने पर शकुन्तला एवं उसके गर्भ से उत्पन्न अपने पुत्र की प्राप्ति के साथ ही कथा सम्पन्न होती है। कवयित्री के अनुसार वर्तमान समाज में व्याप्त विषमता को दूर करने एवं समरसता का अभिवर्द्धन, निरन्तर घटित हो रही आत्महत्याएँ, कन्याओं की भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, अशिक्षा आदि कुरीतियों के प्रति सहज संवेदना जगाने के साथ ही स्वावलम्बन की शिक्षा भी कथा के बीच-बीच में प्रदान की गयी है। अपनी सन्तान के प्रति कर्तव्यहीन मेनका की भी कवयित्री ने निन्दा की है। काव्य की भाषा परिमार्जित, परिष्कृत एवं संस्कृतनिष्ठ हिन्दी है तथा कहीं-कहीं सामान्य बोलचाल के शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। कायल, मुश्किल, दिल जैसे अन्य भाषाओं के शब्द भी कहीं-कहीं हैं। शैली अत्यन्त रोचक एवं प्रवाहमय है, यद्यपि प्रवाह किन्हीं-किन्हीं छन्दों में बाधित-सा भी प्रतीत होता है। पुस्तक के कुछ उल्लेखनीय अंश प्रस्तुत हैं। शकुन्तला का परिचय ‘मुनिसुतायन‘ में कुछ इस प्रकार प्रदान किया गया है-’यह वात्सल्य-भाव की भूखी पिता विश्वसख तप आसक्त/देवराज प्रेषित मेनका ही माता इसकी भगिनी हंत।।030!!’ शकुन्तला की प्रेम-व्यंजना दृष्टव्य है-‘कण्व सुता का कोमल अन्तस नृप-नयनों से था घायल/ बसे हुए थे नृप नेत्रों में चित्त उन्हीं का था कायल।।122।।’ राजा का कर्तव्य-‘प्रजा सदा राजा की संतति होती नृप की दृष्टि अभेद/ भारतीय संस्कृति में प्राणी सम होते हैं नहीं विभेद।।067।।’ वर्तमान समाज में व्याप्त विषमता के प्रति कवयित्री का दृष्टिकोण कुछ इस प्रकार परिलक्षित होता है-‘जीवन का अधिकार सभी का और स्वास्थ्यप्रद भोजन का/ सबको मिले समान ही शिक्षा कोई पात्र न शोषण का।।014।।’ काव्य-रचना के पद्यों में तुकांतता सम्बन्धी अशुद्धियां किन्हीं स्थानों पर परिलक्षित होती हैं, यथा-आसक्त-हंत, जल-कण, अक्षय-धन्य, अब से-वश में। कहीं-कहीं ‘‘होए नहीं उदास” जैसी भाषा भी प्रयोग की गयी है। पुस्तक के विषय में कहा जा सकता है, कि प्राचीन कथा में आधुनिक सन्दर्भों का समावेश करते हुए अच्छी प्रबन्ध कविता का सृजन किया गया है। मुख्य रूप से शकुन्तला-दुष्यन्त की प्रणय-कथा का यह पद्य रूपान्तरण इस अभिरूचि के पाठकों को रोचक एवं पठनीय प्रतीत होगा। कवयित्री डाॅ. शैलकुमारी तिवारी इस पुस्तक के प्रणयन हेतु बधाई की पात्र हैं। देववाणी परिषद, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 96 पृष्ठीय इस पुस्तक का मूल्य  200 रुपये मात्र है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)


सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

धीरज ने समाज के सभी पहलुओं को उजागर किया



‘जमादार धीरज विशेषांक’ के विमोचन के अवसर पर बोलीं सुमय्या राना

प्रयागराज। इलाहाबाद साहित्य का गढ़ रहा है, यहां बड़े-बड़े शायर, कवि और अदीब पैदा हुए हैं। इसी सिलसिले के कवि रहे हैं जमादार धीरज। इन्होंने अपने गीत के माध्यम से समाज के सभी पहलुओं को उजागर किया है, जहां भी विडंबना देखी, उस पर कलम चलाया। लोगों के दुख-दर्द का समझा और सही राह चलने की सीख दी। ऐसे कवि पर विशेषांक निकाल कर गुफ़्तगू ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह बात 07 फरवरी को ‘गुफ़्तगू’ की ओर से राजरूपपुर स्थित डाॅ. अंबेडकर मार्ग पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान के सुमय्या राना ने कही। इस मौके पर गुफ़्तगू के ‘जमादार धीरज’ विशेषांक का विमोचन किया गया।

गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि जमादार धीरज की बेटी मधुबाला धीरज की पहल पर इस विशेषांक का प्रकाशन किया गया है। अब प्रत्येक वर्ष अक्तूबर के महीने में जमादार धीरज के जन्म दिन पर कार्यक्रम होगा, जिसमें पांच कवियों को ‘जमादार धीरज सम्मान’ का प्रदान किया जाएगा, इसी वर्ष से इसकी शुरूआत की जाएगी।

 मधुबाला धीरज ने कहा कि पापा के देहांत के बाद हर किसी ने अपना दर्द बयान किया, जो भी उनके निधन की खबर सुनता उसी तरह दुखी हो जाता, जिस तरह कि हम हुए। उनके जैसा पिता होना मेरे लिए बड़े गर्व की बात है। ग़ाज़ीपुर से आए शायर मासूम रज़ा राशदी ने कहा कि जमादार धीजर ने गुलो-बुलबुल वाली शायरी कभी नहीं की, उन्होंने समाज के वंचित लोगों के दर्द को अपनी कविता में उकेरा, लोगों का सही मार्गदर्शन किया। आज ऐसी ही शायरी की आवश्यकता है। दूरदर्शन केंद्र के पूर्व निदेशक श्याम विद्यार्थी ने कहा कि जमादार धीरज बेहद जीवन्त इंसान और कवि थे, उनसे मिलने के बाद कभी भी निराशा नहीं हो सकती थी, उनके निधन से प्रयागराज ने एक महत्वपूर्ण कवि को खो दिया है। डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, तलब जौनपुरी, सागर होशियारपुरी, डाॅ. सुरेश वंद्र द्विवेदी, अशोक कुमर धीरज, नीलम चंद्र धीरज, शीला सरन, उर्मिला सिंह, आर  जी सिंह, सीमा मोहन, ब्रजेश मोहन, अंजनी कुमार, आसिफ उस्मानी, आदि ने भी विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता गोण्डा के कवि सतीश आर्या और संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। मीठी मोहन, नरेश महरानी, अनिल मानव, शैलेंद्र जय, नीना मोहन श्रीवास्तव, डाॅ.नीलिमा मिश्रा, प्रभाशंकर शर्मा, संजय सक्सेना, रेशादुल इस्लाम, अना इलाहाबादी, केशव प्रसाद सक्सेना, अशोक कुमार स्नेही, रचना सक्सेना, सुजाता सिंह, शाहीन खुश्बू आदि ने कलाम पेश किया। 


गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

श्रोता के तौर पर आसिफ़ उस्मानी की है ख़ास पहचान

                                                             

 आसिफ़ उस्मानी

                                                           -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

  मुशायरों का जिक्र होता है तो सबसे पहले यही बात होती है कि कौन-कौन शायर आए हैं या आ रहे हैं, या फिर किन शायरों ने अच्छे कलाम पेश किए, वगैरह..वगैरह। मगर, इन सबके साथ-साथ प्रयागराज में जब भी कहीं कोई मुशायरा होता है तो श्रोता के तौर पर एक नाम सबसे पहले याद किया जाता है। इनकी मौजूदगी में मुशायरा काफी दिलचस्प हो जाता है, क्योंकि शायरों के कलाम पेश करते ही ये साहब कोई न कोई दिलचस्प कमेंट कर देते हैं, जो सुनने वालों को भी काफी पसंद आता है। वह शख़्स हैं आसिफ़ उस्मानी। इनकी ख़ासियत यह है कि प्रयागराज में होने वाले लगभग हर मुशायरे में श्रोता के रूप में मौजूद रहते हैं और शुरू से आख़ीर तक मुशायरे का लुत्फ़ अपने ख़ास अंदाज़ में लेते हैं। आसिफ उस्मानी को इतना अधिक शौक़ है कि ये दूसरे शहरों में भी मुशायरा सुनने के लिए पहुंच जाते हैं। एक बार ये अलीगढ़ के मुशायरा में पहुंच गए थे, डाॅ. राहत इंदौरी की शायरी पर कमेंट करते ही राहत साहब ने इनको पहचान लिया और फिर बोले-‘आसिफ़ साहब जरा खड़े हो जाइए।’ उनके खड़े होने पर राहत इंदौरी से पूरे मजमे से तआरुफ़ कराते हुए इनके बारे में बताया, कहा कि जैसे मैं आल इंडिया मुशायरों का शायर हूं, उसी तरह आसिफ़ उस्मानी आल इंडिया मुशायरों के ‘हूटर’ हैं। मुनव्वर राना ने तो आसिफ उस्मानी पर एक ख़ास मज़मून ही लिख दिया है।

 आसिफ़ उस्मानी का जन्म 03 सितंबर 1955 को इलाहाबाद में हुआ। इनके पिता स्वर्गीय हाजी मोहम्मद उस्मानी गर्वमेंट इंटरमीडिएट काॅलेज में प्रधानाचार्य रहे हैं, मां स्वर्गीय कुलसुम बीवी कुशल गृहणिी थीं। आप दो भाई और चार बहने हैं। आपने कक्षा छह से नौ तक की पढ़ाई जीआईसी में की थी। कक्षा 10 से इंटरमीडिएट की पढ़ाई मजीदिया इस्लामिया इंटर काॅलेज से करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक किया, यहीं से लाॅ की पढ़ाई पूरी की। 1982 में रेलवे विभाग में आप अलीगढ़ में असिस्टेंट स्टेशन मास्टर हो गए। 1986 में इलाहाबाद डीआरएम आफिस में आ गए, यहीं से आप बतौर चीफ आफिस सुप्रीटेंडेंट सेवानिवृत्त हुए।

 आसिफ उस्मानी के पिता हाजी मोहम्मद उस्मानी उस्ताद शायर थे। जिसकी वजह से इनके घर जिगर मुरादाबादी, बलवंत सिंह, उपेंद्र नाथ अश्क, काजी अब्दुल सत्तार जैसे लोगों का आना-जाना रहा है। बचपन से ही इन लोगों की खिदमतगारी का मौका आसिफ उस्मानी को मिलता रहा है, जिसकी वजह से शायरी की समझ इनके अंदर भर गई थी। मुशायरा सुनने के शौक़ के बारे में इनका कहना है कि-‘शायर हमेशा अपनी शायरी में मौजूदा दौर की बात बड़े सलीक़े से करता है, जिन चीज़ों पर आम लोगों की नज़र नहीं होती उसका जिक्र अक्सर शायरी में मिल जाती है, इसलिए मुशायरा सुनना और समझना अच्छा लगता है।’ उनका कहना है कि शायरों के कलाम पर फौरन ही जवाब देने की वजह से लोगों और शायरों के बीच उनकी पहचान बन गई है। 

 कई बार तो मुशायरों में पहुंचने पर शायर यह पता लगाते हैं कि आज आसिफ़ उस्मानी आए हैं या नहीं। उनको इस बात की फिक्र रहती है कि कुछ गड़बड़ पढ़ने पर आसिफ़ ख़ामोश नहीं बैठेगा। आसिफ़ उस्मानी को तमाम शायरों के कई हजार अशआर याद है। किसी भी शायर का नाम लेते ही फौरन उसका कोई न कोई शेर पढ़कर सुना देत हैं। ‘खुद शायरी क्यों नहीं करते ?’ इस सवाल पर उनका कहना है कि मैं थोड़ी बहुत शायरी कर लेता हूं लेकिन स्टैंडर्ड शायरी नहीं कर पाता इसलिए अपने अंदर के शायर को बाहर लाने की कोशिश ही नहीं की, मुझे दूसरों को सुनने ही अच्छा लगता है। उनका कहना है कि उर्दू की तरक्की के लिए जावेद अख़्तर ने काफी काम किया है, पूरी दुनिया में अपनी शायरी के जरिए उर्दू की तर्जुमानी कर रहे हैं।

 (गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित )