बुधवार, 10 अगस्त 2022

गांधीजी के निजी स्वयंसेवक थे श्रीकृष्ण राय हृदयेश

                

                               

श्रीकृष्ण राय हृदयेश

                  

                                                                            - अमरनाथ तिवारी ‘अमर’

      श्रीकृष्ण राय हृदयेश का जन्म ग़ाज़ीपुर जनपद के कठउत गांव में सन 1909 में हुआ। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हृदयेश जी साहित्य सृजन, पत्रकारिता, स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन, सहकारिता आंदोलन सहित साहित्यिक, सामाजिक गतिविधियों में आजीवन सक्रिय रहे। ग़ाज़ीपुर में एक स्वस्थ साहित्यिक वातावरण के सृजन, कवि सम्मेलनों और साहित्यिक गोष्ठियों के निरंतर आयोजन एवं नवोदित रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

 गंाधीवादी विचारधारा और राष्टीय चेतना से ओत-प्रोत हृदयेश जी गांधी जी के ग़ाज़ीपुर आगमन पर उनके निजी स्वयंसेवक के रूप में कार्य किए थे और अपने विद्यार्थी जीवन में ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर जेल यात्रा किया। हिंदी के साथ संस्कृत, अंग्रेज़ी, भोजपुरी एंव बंग्ला भाषा के जानकार हृदयेश जी टाइम्स ऑफ इंडिया, नेशनल हेराल्ड सहित देश के कई पत्रों में लेखन करते रहे। उस समय के लोकप्रिय हिंदी दैनिक ‘आज’ के वे काफी अवधि तक ग़ाज़ीपुर के प्रतिनिधि रहे। सन 1949 में उन्होंने ग़ाज़ीपुर से ‘लोकसेवक नायक’ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया था।

हदेयष जी का रचना संसार भी विस्तृत है। उनका पहला काव्य संग्रह ‘युवक से’ 1935 में प्रकाशित हुआ। इस काव्य संग्रह से मानवीयता और राष्टीयता का जो उनका स्वर उभरा वह हिमांशु (1940) से लेकर पथदीप (1950) तक बना रहा। इसके बाद तीन दशकों तक उनका सामाजिक, राजनैतिक और पत्रकारिता वाला व्यक्तित्व प्रभावी रहा। सन 1980 में प्रकाशित ‘सत्यासत्य’ महाकाव्य उनकी साहित्यिक यात्रा में मील का पत्थर साबित हुआ। इसके बाद उनकी लगभग दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुईं। अश्वघोष के बुद्धचरितम पर आधारित भवानुवाद ‘महाप्रकाश’ प्रबंध काव्य है। ‘नवदीप’ महाकाव्य एवं ‘लहर-लहर लहराए गंगा’ खंडकाव्य है। इन्होंने गिरिराज शाह की अंग्रेज़ी भाषा में लिखी पुस्तक ‘वैली ऑफ फ्लवार्स’ का काव्य अनुवाद ’फूलों की घाटी’ नाम से किया। गंगा मुझे पुकारे (1989) एवं मेघदूत (1990) में भी काव्यनुवाद है। इसके बाद उनकी ग़ज़लों का संग्रह ‘बदगुमानी का मौसम’ नाम से आया। ‘सत्यासत्य’ के बाद उनका सर्वाधिक चर्चित महाकाव्य ‘शंखपुष’(1996) है। वेदकालीन राज्य व्यवस्था की पृष्ठभूमि पर केंद्रित इस महाकाव्य का सृजन अत्यंत गंभीर है। इसमें महेंद्र, रुद्र, अग्नि, सरस्वती आदि को पात्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भोजपुरी भाषा में ‘हृदेयश सतसई’ अप्रतिम पुस्तक है। हृदयेश जी लगभग दो दर्जन अप्रकाशित पुस्तकों में प्रमुख हैं- ग़ाज़ीपुर का इतिहास, दोहों का संग्रह, संजय बतीसी, कसौरी (ललित निबंध)।

 श्रीकृष्ण राय हृदयेश का पार्थिव शरीर 13 जून 1999 को पंचतत्व में विलीन हो गया। ग़ाज़ीपुर की साहित्यिक, राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेश में उनके योगदान का स्मरण सदैव किया जाएगा।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में प्रकाशित )




बुधवार, 27 जुलाई 2022

विभा की शायरी में पूरे समाज का चित्रण: शिवम शर्मा

गुफ़्तगू के ‘विजय लक्ष्मी विभा विशेषांक’ का विमोचन



प्रयागराज। विजय लक्ष्मी विभा प्रयागराज की वरिष्ठ शायरा हैं, जिन्होंने लगभग हर विधा में लेखनी की है। इनकी शायरी में वास्तविक समाज का चित्रण है। गुफ़्तगू ने इनके उपर विशेषांक निकालकार बहुत ही सराहनीय कार्य किया है। आज के दौर में गुफ़्तगू ऐसी पत्रिका है जो सच्चे मायने में गंगा-जमुनी तहज़ीब को कायम रखने में ख़ास भूमिका अदा रही है। इस समय प्रयागराज और पूरे देश को ऐसी पत्रिका की जरूरत है। यह बात उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. शिवम शर्मा ने 24 जुलाई को गुफ़्तगू की ओर से करैली स्थित अदब घर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कही। मुख्य अतिथि डॉ. शर्मा ने कहा कि यह गुफ़्तगू का यह अंक बहुत ही ख़ास है। इस दौरान गुफ्तगू के विजय लक्ष्मी विभा विशेषां का विमोचन किया गया।

गु्फ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि विजय लक्ष्मी विभा देश की उन चुनिंदा महिलाओं में से हैं, जो ग़ज़ल के सही पैरामीटर पर ग़ज़लें लिखती हैं। वर्ना आज के समय में ग़ज़ल लेखन के नाम पर इसके मूल स्वरूप से ही खिलवाड़ किया जा रहा है। प्रभाशंकर शर्मा ने कहा कि विभा जी को शायरी विरासत में मिली है। इनके पिता भी कवि थे, जिनकी तीन दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हुई थी। गुफ़्तगू के इसी अंक में विभा जी की प्रकाशित कहानी में कई नए बिम्ब और परिदृश्य दिखाए देते हैं, उनकी रचनाशीलता का बेहतरीन वर्णन इन्होंने अपनी कहानी में किया है। 

नरेश महरानी ने कहा कि विजय लक्ष्मी विभा हमारे दौर की बहुत ही ख़ास कलमकार हैं, इन्होंने कई बिम्बों को अपनी रचनाओं में बेहतरीन ढंग से उल्लेखित किया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे तलब जौनपुरी ने कहा कि विजय लक्ष्मी विभा की शायरी बहुत ही अलग और ख़ास है। समाज की वास्तविक हालात का वर्णन इनकी शायरी में मिलते हैं। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। मुशायरे के दौरान अतिथियों और कुछ श्रोताओं द्वारा दिए गए अंक के आधार पर पहले स्थान असलम निज़ामी, दूसरे स्थान पर संयुक्त रूप से फ़रमूद इलाहाबादी और अजीत शर्मा ‘आकाश’, तीसरे स्थान पर शरत चंद्र श्रीवास्तव    और चौथे स्थान पर शाहिद इलाहाबादी रहे। इनको विशेष सम्मान पत्र प्रदान किया गया।

 दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें शिवाजी यादव, अर्चन जायसवाल,  शैलेंद्र जय, रेशादुल इस्लाम, फरमूद इलाहाबादी, अजीत शर्मा आकाश, नाज़ खान, शाहीन खुश्बू, सम्पदा मिश्रा, असलम निज़ामी, सेलाल इलाहाबादी, रुखसार अहमद आदि ने कलाम पेश किया।


बुधवार, 20 जुलाई 2022

गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2022 अंक में



4. संपादकीय: साहित्य को समर्पित विजय लक्ष्मी विभा

5-12. आत्मकथ्य: विजय लक्ष्मी विभा

13-15. मां की साहित्य यात्रा का साक्षी मैं- अनमोल खरे

16-18. काव्य शिरोमणि विजय लक्ष्मी विभा - जगदीश किंजल्क

19-22. गीत के अस्तित्व की पहचान - डॉ. हुकुमपाल सिंह विकल

23-24. विभा जी के गीत स्वयं बोलते एवं बतियाते- मयंक श्रीवास्तव

25-27. विभाजी का छायावादी वाम चिंतन - राघवेंद्र तिवारी

28-30. जग में मेरे होने पर- दिवाकर वर्मा

31-32. विभा जी साहित्य में महादेवी सी - श्याम बिहारी सक्सेना

33-36. जागतिक दार्शनिक सरस गीतों की प्रत्यंचा- डॉ. दया दीक्षित

37-38. कवि स्वयं का नहीं सम्पूर्ण सृष्टि का होता है - प्रियदर्शी खैरा

39-42. अखियां पानी-पानी में दर्शन का स्वरूप  -  नलिनी शर्मा

43-44. अदब के गुुलशन में ताज़ा हवा के झोंके - मनमोहन सिंह तन्हा

45-46.  मन को छूती लेखनी की धार - नीना मोहन श्रीवास्तव

47-48. विभा की ग़ज़लों के कई रंग - अर्चना जायसवाल ‘सरताज’

49-53. कहानी: अपनी-अपनी भूल - विजय लक्ष्मी विभा

54-60. विजय लक्ष्मी विभा के पद

61-77. विजय लक्ष्मी विभा की कविताएं

78-95. विजय लक्ष्मी विभा की ग़ज़लें

96-99. विजय लक्ष्मी विभा का परिचय

100-103. इंटरव्यू: केशरीनाथ त्रिपाठी

104-105 . गुलशन-ए-इलाहाबाद: राजेश पांडेय

106. ग़ाज़ीपुर के वीर- 18 

107-111. तब्सेरा

112-114.  उर्दू अदब

115-119.  अदबी ख़बरें


रविवार, 10 जुलाई 2022

मुग़ल खानदान की शायरा जे़बुन्निसा मख़्फ़ी

                                                                       

- ’डॉ. राकेश तूफ़ान’ 


                                  दर सुख़न पिन्हा शुदम मानिन्द बू दर-बर्गेग़ुल,

                                 हर कि दीदन मैल दारद दर सुख़न बीनद मरा।

(जैसे ख़ुशबू फूल की पंखुड़ियों में छुपी है, वैसे ही मैं अपनी कविता में व्याप्त हूं। जो मुझसे मिलने का इच्छुक हो, मेरे काव्य में मुझे पा ले)

 ज़ेबुन्निसा की उपरोक्त पंक्तियां इतिहास के पन्नों में उनके खो जाने का स्वयं ही अहसास कराती हैं। उनकी ग़ज़लों में मुहब्बत के रूहानी अहसासात की हर जगह हिफ़ाज़त हुई है, लेकिन अदीबों और इतिहासविदों ने इस प्रतिभाशाली शहज़ादी पर उतना नहीं लिखा है, जितने की वो हक़दार है। उनके अशआर की कशिश ने मुझे उन पर क़लम उठाने को मजबूर किया। ज़ेबुन्निसा अंतिम सशक्त मुग़ल बादशाह औरंग़जेब की सबसे बड़ी पुत्री थीं। बादशाह की पहली बेग़म दिलरास बानो को उनकी मां होने का गौरव प्राप्त है। शहज़ादी की पैदाइश बादशाह शाहजहां के शासनकाल में 1631 में दक्कन में हुई, लेकिन परवरिश हुई आगरा और दिल्ली में। तारीख़ में शहज़ादी को एक फ़ारसी कवयित्री और सूफ़ी के तौर पे याद किया जाता है। 

 वास्तव में ज़ेबुन्निसा, जिन्हें इतिहासकारों के बीच ‘ज़ेबिन्दा बेग़म’ के नाम से भी जाना जाता है, सत्रहवीं शताब्दी की सबसे प्रतिभाशाली महिलाओं में से एक थीं। वे फ़ारसी, अरबी और उर्दू जैसी ज़बानों में तो प्रवीण थीं ही, स्थापत्य एवं ख़ुशकत (श्रुतिलेख) में भी उनकी गहरी रुचि थी। इस दृष्टि से वे बहुआयामी शख़्सियत की मालकिन थीं। ज़ेबुन्निसा ने फ़ारसी विद्वान मोहम्मद सईद अशरफ़ मंज़धारानी से समय का विज्ञान भी सीखा था। शहज़ादी ने दर्शन, गणित, खगोल विज्ञान तथा साहित्य की अन्य विधाओं में भी महारत हासिल की। ज़ेबुन्निसा की लाइब्रेरी बादशाह अकबर के संग्रह की भांति थी, जिसमें क़ुरआन से लेकर हिन्दू व जैन ग्रंथों सहित यूनानी पौराणिक कथाएं, बाइबिल का तर्जुमा तथा मुग़लों का समकालीन लेखन शामिल था।


जे़बुन्निसा मख़्फ़ी


 व्युत्पत्ति की दृष्टि से फ़ारसी में ‘ज़ेबुन्निसा’ का अर्थ है-‘सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत स्त्री या नारी जगत का आभूषण’। शहज़ादी सचमुच अपने इस नाम को चरितार्थ करते हुए दिखाई देती हैं। चौदह साल की उम्र से ही उन्होंने कविताएं लिखना आरम्भ कर दिया था। उस्ताद बयाज़ साहब ने सदैव उन्हें सृजनात्मक लेखन के लिए प्रेरित किया। जब औरंग़जेब बादशाह बना तब ज़ेबुन्निसा इक्कीस वर्ष की हो चुकी थीं। बादशाह शहज़ादी की प्रतिभा एवं योग्यता से इतना अधिक प्रभावित था कि वह मुग़ल साम्रज्य के नीतिगत मुद्दों और सियासत पर उससे विमर्श करता था तथा उसके दृष्टिकोण को पर्याप्त महत्व देता था। मुग़लों में आमतौर से शहज़ादियों के निकाह की परंपरा नहीं थी, क्योंकि बादशाह की पुत्री के अनुरूप योग्य वर के रूप में किसी को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता था। अतः शहज़ादी आजीवन अविवाहित रहीं। हालांकि एक हिन्दू राजकुमार छत्रसाल से प्रणय के विषय में जानकारी मिलती है। यह भी कहा जाता है कि शहज़ादी एक अफ़ग़ान सिपाही को अपना दिल दे बैठीं, लेकिन बादशाह ने उसे मौत के घाट उतार दिया।

जेबुन्निसा मख़्फी की हस्तलिखित शायरी

औरंग़जेब पर रुढ़िवादी होने का आरोप लगाया जाता है, क्योंकि साहित्य, कला, संगीत आदि उसकी पसंद में शामिल नहीं थे। यही कारण था कि ज़ेबुन्निसा ने छुप- छुपाकर ही सृजनात्मक लेखन संबंधी कार्य किया। शहज़ादी ‘मख्फ़ी’ उपनाम से कविताएं लिखती थी, जिसका मानी ही  ‘गुप्त या छिपा हुआ’ है। मिसाल के तौर पर उनकी कविताओं के अंग्रेज़ी और हिंदी तर्जुमे के इस हिस्से से ये बात स्पष्ट भी होती है-

‘व्ी डंाीपिए पज पे जीम चंजी व िसवअम ंदक ंसवदम लवन उनेज हव.....’ या फिर-

           देवी अपने पुष्प-गीत को विस्मृत कर देगी,

           अगर वह मुझे उद्यान में विचरण करते देख ले।

           अगर ब्राह्मण मेरा दीदार कर ले,

           तो वह देव-मूर्ति को विस्मृत कर देगा।

           मैं अपने शब्दों में ही छुपी हूं,

           जैसे फूल की पंखुड़ियों में ख़ुशबू।

 मख्फ़ी उस ज़माने के अब्दुल क़ादिर बेदिल, कलीम कसानी, सायेब तबरीज़ी और ग़नी कश्मीरी जैसे अदीबों के बीच जलवाफ़रोश चराग़ के मानिन्द थीं। उनकी ग़ज़लों पर हमें हफ़ीज़ शिराजी का पर्याप्त प्रभाव दिखायी पड़ता है। दीवान-ए-मख्फ़ी उनके 5,000 अशआर का अद्भुत संकलन है। इसमें ज़्यादातर कविताएं ग़ज़लों के रूप में हैं, जिनमें मानव और ईश्वर के प्रति प्रेम की ज़बरदस्त अभिव्यक्ति हुई है। यह बात दीग़र है कि उनकी रचनाएं देवनागरी लिपि में प्रकाशित नहीं हुई हैं। उनकी रचनाएं पुस्तक के आकार में 1929 में दिल्ली से तथा 2001 में तेहरान से प्रकाशित हुईं। इसकी पांडुलिपियां नेशनल लाइब्रेरी पेरिस, ब्रिटिश संग्रहालय, ट्यूबिंगेन विश्वविद्यालय (जर्मनी) तथा मोटा पुस्तकालय (भारत) में आज भी सुरक्षित हैं। उनकी रचनाओं में आम तौर से अरबी और फ़ारसी की रवायत से आई हुई कविता के दर्शन होते हैं। मोनिस-उल-रोह, ज़ेबुलमोंशा और ज़ेब-उल-तफ़्सीर जैसी उनकी मशहूर रचनाओं में ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ़ रंग दिखायी पड़ते हैं। 

 ज़ेबुन्निसा की ख़ुशकत (श्रुतिलेख/ब्ंससपहतंचील) तथा स्थापत्य कला में भी गहरी अभिरुचि थी। शहज़ादी ने 1646 में लाहौर के मुल्तान रोड पर ‘चौबुर्ज़ी’ के रूप में एक शानदार और मनमोहक बाग़ की नींव रखी। यह इमारत नीले और हरे टाइल्स के ज़रिए ख़ूबसूरत जड़ावट का अद्भुत नमूना पेश करती है। इसके प्रवेश द्वार पर एक केंद्रीय गुम्बद के साथ चार मीनारें हैं, जिसकी दीवारों पर अरबी में क़ुरआन की आयतों को बड़ी ख़ूबसूरती से उकेरा गया है। मेहराब के ऊपर फ़ारसी में इसे ‘स्वर्ग उपवन’ तथा शहज़ादी को ‘युग की नारी’ के रूप में उद्धृत किया गया है। 

 ज़ेबुन्निसा ने 1701 में पुरानी दिल्ली के शाहजहांनाबाद इलाक़े में इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया। दिल्ली के काबुली दरवाज़े के बाहरी इलाक़े में ‘तीस हज़ार शजर के बाग़’ के नाम से शहज़ादी का मक़बरा तामीर हुआ। लेकिन दिल्ली में रेलवे लाइन बिछाये जाने के दौरान इसे सिकंदरा स्थित अकबर के मक़बरे के पास स्थानांतरित कर दिया गया। मखफ़ी की क़लम हमेशा के लिए ख़ामोश हो चुकी है, मगर ये खोयी हुई शहज़ादी अपने अशआर, अपनी कविताओं में आज भी ज़िंदा है। बक़ौल अख़्तर----

         मेरा हर शेर है अख़्तर मेरी ज़िन्दा तस्वीर,

         देखने वालों ने हर लफ़्ज़ में देखा है मुझे।


( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2022 अंक में प्रकाशित )


मंगलवार, 28 जून 2022

अपने करामात के लिए मशहूर हैं सूफी शम्सुद्दीन

                               

 सूफ़ी शम्सुद्दीन की मजार

                                         

                                                    - शहाब खान गोड़सरावी

                                             

  सूफी शम्सुद्दीन खान का जन्म 1910 ई. में ग़ाज़ीपुर जिले के रकसहा गांव में अबु सईद खान के घर हुआ था। उन्होंने इब्तेदाई दीनी तालीम अपने वालिद से हासिल किया, इसके बाद फारसी अरबी की पढ़ाई की। उन्हें दीनी तालीम लेने के बाद जो समय मिलता उसमें वो अक्सर बकरियों को चराते थे। पढ़ाई के दरमयान उनकी शादी सरैला गांव के ज़मींदार बहादुर खां की बेटी होतीयम बीबी से हुई। उनसे चार बेटे और चार बेटियां हुई। बेटों का नाम फ़ैयाज़ हुसैन, अयाज़ हुसैन, नियाज़ हुसैन, रियाज़ हुसैन है। शम्सुद्दीन खां के वालिद के इंतिक़ाल के बाद उन पर घर की ज़िम्मेदारियां थीं। कोलकाता पुलिस में गांव के कोडार मोहल्ले के बादशाह खान कार्यरत थे, उन्होंने सूफी शम्सुद्ीन को अपने साथ कोलकाता ले जाकर पुलिस में भर्ती करा दिया। पुलिस सेवा में आने के बाद भी वे दीनी कामों से जुड़े रहे। नौकरी के दौरान ही वो बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित सुरकाही शरीफ के पीर सरकार तेग अली शाह से मुरीद हो गए थे। 

   सन् 1960 में सूफी शम्सुद्दीन खान के नेतृत्व में मुस्लिम राजपूत इंटर कॉलेज यानी ‘एसकेबीएम’ दिलदारनगर के मैदान पर कमसारोबार इलाके का जलसा हुआ। दीनी इदारा कायम करने के लिए सूफी साहब ने यह जलसा मुनअक़िद किया था, इसमें बिरादरी के तमाम नामी-गरामी लोग मौजूद थे। जलसे के आखिर में मुबारकपुर से तशरीफ़ लाए बानिए मदरसा अल-ज़मीअतुल अशरफिया के बानी हाफिजे मिल्लत ने कहा कि इलाके में एक दीनी इदारा क़ायम करना है, इस पर मौजूद लोगों ने बुलंद आवाज में लब्बैक कहकर हाथ उठाया। इसकी जानकारी देवबंद सहारनपुर से फारिग कारी फ़ैयाज़ खां (देवैथवी) को हुई, वे उन दिनों इलाहाबाद के यूनानी मेडिकल कॉलेज में तिब्ब सीख रहे थे। वे तिब्ब की पढ़ाई छोड़कर इलाके में आ गए, और लोगों से राब्ता करके सन.1961 में दिलदारनगर स्थित हुसैनाबाद में ‘जामिया अरबिया मख्जुनूल उलूम’ मदरसा कायम कर दिया। 

 सूफी शम्सुद्दीन खान को यह बात नागवार गुजरी, उन्होंने मसलकी मतभेद की वजह से उससे अपने को अलग कर लिया। उन्होंने खुद का मदरसा ‘मकतब’ की सूरत में रकसहां गांव स्थित अधवार मोहल्ले की छोटी मस्जिद में ‘मदरसा तेगिया अनवारुल उलूम’ के नाम से शुरू की। यह मकतब सन् 1964 से 1967 तक चलता रहा। 26 मार्च 1967 ई. में सूफी साहब का इंतिकाल हो गया। इसके बाद उनके द्वारा संचालित मकतब मदरसा मुकम्मल तरीके से बन्द हो गया। लेकिन वो अपनी जिंदगी में मदरसे के लिए तकरीबन एक बीघा ज़मीन को वक़्फ़ कर गए थे। इस जमीन पर सन् 1975 में उनके बेटों के नेतृत्व में मदरसा का काम शुरू हुआ। 1979 में मदरसा बनने के बाद मकतब ‘तेगीया अनवारुल उलूम’ का नाम मदरसा ‘तेगीया शम्सुल उलूम’ कर दिया गया। आज भी यह मदरसा अच्छे ढंग से चल रहा है।

सूफी साहब की तमाम करामात मशहूर हैं, जिनमें अपनी मौत के मुतअल्लिक तीन दिन पहले अपनी क़ब्र की निशानदेही करना भी शामिल था। इसके अलावा ड्यूटी के दौरान बंदूक का ग़ायब होना और अफसर के तलब करने पर अपनी पीठ पर हाथ फेरकर उसी बंदूक को सामने ला देना, आपके सामने आकर खूंखार सांड का अंधा होना, गांव के नामी पहलवान जगदेव यादव को कुश्ती में मात देना वगैरह। इन्ही बुजुर्गी व करामतों की वजह से उन्हें सूफ़ी शम्सुद्दीन अल मारूफ़ शम्सुल मशायख का लक़ब दिया गया।

(नोट - सूफी शम्सुद्दीन खां से जुड़ी जानकारी किताब ‘इरफाने औलिया’ से ली गई है, इसके लेखक सय्यद मौलाना शम्सुल होदा शम्सी हैं )


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2022 अंक में प्रकाशित)

शनिवार, 25 जून 2022

कथक में उर्मिला शर्मा का है ख़ास मुकाम


उर्मिला शर्मा


                                                               - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

   14 फरवरी 1963 को मुरादाबाद जिले के चन्दौसी कस्बे में जन्मी उर्मिला शर्मा अपने माता-पिता की आठवीं संतान हैं। चार वर्ष की आयु में ही इनमें कुछ अलग तरह के हाव-भाव प्रकट होने लगे जो रूढ़िवादी सोच वाले लोगों के लिए अचंभित करने वाला था, क्योंकि नृत्य को अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन अपनी जिद और लगन की वजह से इन्होंने अपने लक्ष्य को कभी नहीं छोड़ा। पं. बिरजू महाराज के निर्देशन में नृत्य की कला को स्टेप-बाई-स्पेट सीखा और इसे अपने अंदर आत्मसात कर लिया। शुरू के दिनों में अपने माता-पिता के छिपकर बड़ी बहन के साथ कथक सीखने के लिए जाया करती थीं, धीरे-धीरे जब इनकी कला को सराहना मिलने लगी, अख़बारों नाम और तस्वीरें छपने लगीं तो घर वालों को पता चला। फिर परिवार के लोगों का सभी सहयोग मिलने लगा। आठ वर्ष की उम्र में ही इन्होंने आल इंडिया कथक प्रतियोगिता में प्रथम स्थान हासिल करके अपने अंदर की प्रतिभा को दुनिया के सामने ला दिया। इन्होंने समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर करने के साथ कथक प्रवीण और कथक में नई दिल्ली से डिप्लोमा किया है। आज इनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि पूरे भारत के अलावा साउथ अफ्रीका, त्रिनिदाद, फिजी, हालैंड, गयाना आदि देशों में अपनी कला की बदौलत आमंत्रित की जाती हैं। इतना ही नहीं इन्होंने कथक नृत्य के नए प्रयोग किए हैं, तालों को पैरों द्वारा निकालने और प्रत्येक ताल तत्कार की नई रचनाएं इन्होंने इजाद किया है। तबला पखावज, हारमोनियम जैसे वाद्ययंत्रों में पारंगत गायन और पढ़न्त काक अद्भुत तालमेल प्रस्तुत करने की नई विधा का भी इन्होंने ही गठन किया है। अब तक नायिका भेद गत-भाव की 50 से ज्यादा बार प्रस्तुति कर चुकी हैं। तीन हजार से अधिक बार कथक नृत्य की मंच प्रस्तुति कर चुकी हैं। कथके माध्यम से टी-20 क्रिकेट प्रतियोगिताओं के द्वारा देश-विदेश मे ंप्रस्तुति दे चुकी हैं।

 प्रसार भारती द्वारा कथक नृत्य के लिए टॉप ग्रेड आर्टिस्ट, भारत सरकार के सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र द्वारा, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा अकादमी पुरस्कार, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद द्वारा सम्मान, भारतीय राज दूतावास-सूरीनाम द्वारा प्रशस्ति पत्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा सम्मान पत्र, उस्ताद अलाउद्दीन खान संगीत एवं कला अकादमी द्वारा पुरस्कार, सिंगारमणि-सर-सिंगार अकादमी मुंबई, पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज द्वारा सम्मान पत्र, नेशनल यूथ फॉर कल्चरल रिनेसेन्स देवरिया द्वारा पुरस्कार, राष्टीय ग्रामीण महिला संगीत शिक्षण समिति प्रयागराज द्वारा सम्मान, कथक केंद्र नई दिल्ली द्वारा प्रशस्ति पत्र, महादेवी वर्मा चेतना श्री-समन्वय द्वारा सम्मान, हंडिया माटी कथक महोत्सव में रत्न पुरस्कार, जवाहर नवोदय विद्यालय मेजा द्वारा सम्मान, मेजा उर्जा निगम लिमिटेड द्वारा सम्मान, सांस्कृतिक मंदिर महोत्सव उज्जैन द्वारा प्रशस्ति पत्र, कपिलवस्तु महोत्सव उज्जैन द्वारा प्रशस्ति पत्र, अंतरराष्टीय रामायण मेला चित्रकुट, कथक के इंद्रधनुषीय रंग-अंतरराष्टीय कथक व्याख्यान माला द्वारा, आज़ादी के अमृत महोत्सव में स्वाधीनता रंग फागुन के संग-नई दिल्ली में और पं. बिंदादीन महाराज स्मृति उत्सव-संगीत नाटक अकादमी लखनउ द्वारा इन्होंने सम्मानित किया जा चुका है।

 1989 में आईसीसीआर की ओर से दक्षिणी अमेरिका में तीन वर्ष तक प्रवास किया, इस दौरान अपनी कला का प्रदर्शन कर खूब वाहवाही बटोरी। 1998 में एक बार फिर दक्षिण अमेरिकी सरकार के निवेदन पर भारत की ओर से इन्हें स्वीडेन, स्विटजरलैंड, वेस्टइंडीज, गयाना, बार्बिडोज, त्रिनिडाड और यूरोप में नृत्य प्रस्तुति के लिए भेज गया, जहां इन्होंने सबको प्रभावित किया। वर्ष 2003 में इन्होंने कथक केंद्र का स्थापना किया है, जहां आज तमाम छात्र-छात्राएं इनसे कथक नृत्य कला सीख रहे हैं। इससे पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इन्होंने दो वर्ष तक विजिटिंग फैकेल्टी के पद पर काम किया है। दूरदर्शन समेत कई टीवी चैनलों पर इनकी प्रस्तुतियों का प्रसारण समय-समय पर होता रहा है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2022 अंक में प्रकाशित )


 

रविवार, 12 जून 2022

बड़ी शख़्सियत के मालिक हैं सलीम इक़बाल शेरवानी

                                                   -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 

सलीम इक़बाल शेरवानी 

सलीम इक़बाल शेरवानी की सहजता और हर किसी की मदद करने की भावना इन्हें अन्य लोगों से काफी अलग खड़ा करती है। बेहद विनम्र और समाजिक कार्यों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेने वाले व्यक्तित्व के रूप में जाने-पहचाने जाते हैं। 22 मार्च 1953 को इलाहाबाद में जन्में सलीम शेरवानी केंद्र सरकर में मंत्री रहे हैं। इससे पहले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्याल से पढ़ाई पूरी की है, यहां से ये इकोनॉमिक्स में गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं। छात्र जीवन में ही इन्होंने अपनी दक्षता का परिचय दे दिया था। इनके दादा स्वर्गीय एन.ए.के. शेरवानी पंडित जवाहर लाल नेहरू के काफी करीबी थे, आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश में बनी पहली सरकार में मंत्री थे। पिता स्वर्गीय एम.आर. शेरवानी तीन बार राज्य सभा के सदस्य रहे हैं। सलीम शेरवानी का पूरा परिवार लोगों की मदद और समाजिक कार्यों में बढ़कर चढ़कर हिस्सा वाला रहा है। विभिन्न सांस्कृतिक और समाजिक आयोजनों में भाग लेते रहे हैं। 

 बहुत कम उम्र में ही सलीम शेरवानी ने शेरवानी ग्रुप ऑफ कम्पनीज की जिम्मेदारी संभाल लिया था, जिसे बहुत ही कौशलपूर्ण क्षमता के साथ संचालित किया। बिजनेस के अलावा भारतीय राजनीति में भी आपकी सक्रिय भूमिका रही है। 1984 में 32 वर्ष की उम्र में आपको  कांग्रेस से लोकसभा के बदायूं निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए टिकट मिला था, इस चुनाव में जीत हासिल करके मात्र 32 वर्ष की उम्र में लोकसभा सदस्य बने गए थे। 1996 में फिर से लोकसभा के लिए चुने जाने बाद तत्कालीन भारत सरकार में आप स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री बनाए गए थे। एक वर्ष के बाद मई, 1997 में जिनिवा में हुए विश्व स्वास्थ्य संसद के अध्यक्ष चुने गए थे। फिर जून 1997 में भारत सरकार में विदेश राज्य मंत्री बनाए थे। इसके बाद सलीम शेरवानी ने 1998, 1999 और 2004 में भी बदायूं लोकसभा का चुनाव फतेह किया था। अक्तूबर 1985 में इन्हें इंडियन डेलिगशन के सदस्य के तौर पर यू.एन.ओ. भेजा गया था। इसके बाद यूएनओ में भारतीय प्रतिनिधि के तौर पर कई बार भेजा जा चुका है। 1990 में इन्हें ‘इंदिरा गांधी नेशनल यूनिटी एवार्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है। आप वर्तमान समय में विभिन्न संस्थाओं के संरक्षक, अध्यक्ष, ट्रस्टी और सदस्य हैं।

 इस समय सलीम शेरवानी शेरवानी इंडस्ट्रीयल सिंडिकेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक, फारको फूड्स प्राइवेट लिमिटेड, कैपून फूड स्पेशियलीटिज लिमिटेड, शेरवानी फूड प्राइवेट लिमिटेड और एएसई कार्गो प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं। आप कृषि इंटर कॉलेज और शेरवानी इंटर कॉलेज के अध्यक्ष हैं। इनके अलावा कानसुलेटिव कमेटी ऑफ एक्सटरनल अफेयर्स, स्टैडिंग कमेटी ऑफ एक्सटरनल अफेयर्स, मिनिस्ट्री ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री, रेलवे कनवेन्सन कमेटी और वक्फ बोर्ड के ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी के सदस्य रहे हैं।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2021 अंक में प्रकाशित )






मंगलवार, 31 मई 2022

मानवीय प्रेम का प्रतिबिंब है शायरी : डॉ. तिवारी

उस्मान उतरौलवी और रईस की किताबों का हुआ विमोचन

मुशायरा में शायरों ने अपने कलाम से दिया मोहब्बत का पैगाम

प्रयागराज। शायरी मानवीय प्रेम की प्रतिबिंब होती है, जिसके दिल में प्रेम का सागर होता है वही शायरी करता है। उस्मान उतरौलवी और रईस सिद्दीक़ी बहराइची भी ऐसे ही शायर हैें, जिनके दिल में प्यार का सागर उबाल मार रहा है। इन दोनों शायरों को पढ़ने के बाद बिना संकोच के यह कहा जा सकता है कि इनकी इस देश, समाज और वर्तमान परिदृश्य पर बारीक नज़र है, इसलिए लोगों की बेहतरी और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देने की बात इनकी शायरी में जगह-जगह दिखाई देती है। इनकी शायरी आज के समाज के लिए बेहद ज़रूरी है, जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। यह बात वरिष्ठ गीतकार डॉ. वीरेंद्र तिवारी ने 28 मई को करैली स्थित अदब में गुफ़्तगू की ओर से आयोजित विमोचन समारोह में कही। कार्यक्रम के दौरान किताबें ‘उस्मान उतरौलवी के सौ शेर’ और ‘रईस सिद्दीक़ी बहराइची के सौ शेर’ का विमोचन किया गया।

 गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि उस्मान और रईस आज के दौर के ऐसे शायर हैं, जिन्हें पढ़ा जाना बेहद ज़रूरी है, इन्होंने अपनी शायरी में समाज के मौजूदा हालात पर बेहतरीन बातें कहीं है, जो आज की ज़रूरत है। रईस सिद्दीक़ी ने कहा कि गुफ़्तगू प़िब्लकेशन ने हमारी शायरी का चयन करके प्रकाशित किया है, जो हमारे लिए बेहद ज़रूरी था। उस्मान उतरौलवी ने अपनी किताब के प्रकाशन के लिए गुफ़्तगू का शुक्रिया अदा किया।

 प्रभाशंकर शर्मा ने कहा कि शायरी ऐसी चीज़ है, जो युगांे-युगों तक दुनिया में कायम रहती है। उस्मान उतरौलवी भी ऐसी ही शायरी करते हैं, जो रहती दुनिया तक याद रखी जाएगी। नरेश महरानी ने कहा कि रईस सिद्दीक़ी की शायरी को पढ़ने के बाद बिना संकोच कहा जा सकता है कि उनकी पूरी दुनिया पर बारीक नज़र है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे तलब जौनपुरी ने कहा कि रईस और उस्मान की शायरी बेहद स्तरीय है, आज के समय में ऐसी ही शायरी की ज़रूरत है। इन दोनों की किताबें आज के समय के लिए बेहद ख़ास है, उम्मीद है कि अदब की दुनिया में इन्हें हाथों-हाथ लिया जाएगा। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन  सिह तन्हा ने किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। फ़रमूद इलाहाबादी, रेशादुल इस्लाम, अफसर जमाल, अजीत शर्मा आकाश, राकेश मालवीय, जीशान फतेहपुरी, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, नरेश महरानी, शाहीन खुश्बू, प्रकाश सिंह अश्क, तलब जौनपुरी, डॉ. वीरेंद्र तिवारी, असलम  निजामी और आलम इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया।


गुरुवार, 19 मई 2022

गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2022 अंक में

 



4. संपादकीय: साहित्य के मूल उद्देश्य को ख़तरा

5-6. मुग़ल ख़ानदान की शायरा ज़ेबिन्नुनिशा मख़फ़ी- डॉ. राकेश तूफ़ान

7-8. कमाल अमरोही का अंदाज़ था सबसे जुदा - हकीम रेशादुल इस्लाम

9-21. ग़ज़लें: डॉ. बशीर बद्र, केके सिंह मयंक, सागर होशियारपुरी, इक़बाल आज़र, तलब जौनपुरी,, मनोज फगवाड़वी, राजीव राय, राजेंद्र वर्मा, अखिलेश निगम अखिल,  इश्क़ सुल्तानपुरी, डॉ. राकेश तूफ़ान, डॉ. श्रद्धा निकुंज ‘अश्क’, बसंत कुमार शर्मा, रईस सिद्दीक़ी बहराइची, डॉ. शमीम देवबंदी,  डॉ. नलिन, डॉ. अंजना सिंह सेंगर,  शहाबुद्दीन कन्नौजी, अरविंद असर, रश्मि लहर, केशपाल सिंह सच,  कुंवर नाजुक, राज जौनपुरी, प्रकाश प्रियम, विवेक चतुर्वेदी, शिव सिंह सागर

22-29. कविताएं: सोम ठाकुर, यश मालवीय, सरिता गर्ग सरि,  मंजुला शरण मनु, डॉ. मधुबाला सिन्हा, शिव कुमार राय, डॉ. निशा मौर्या, प्रिया शर्मा,  मनमोहन सिंह तन्हा,  केदारनाथ सविता, विभु सागर, सुरजीत मान जलैया सिंह, दीप्ति दीप, अर्शा हय्यूम

30-33. इंटरव्यू: ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

34-38. चौपाल: कविता के लिए छंद कितना ज़रूरी 

39-43. तब्सेरा: कविता के प्रमुख हस्ताक्षर, तिमिर से समर, अच्छे दिन का सोग, लोक-नाट्य नौटंकी,

44-47. उर्दू अदब: ज़गे आज़ादी में मुमताज शोअरा का हिस्सा, आवाज़, जर्बे-तब्बसुम,  फिक्रे पैकर, सआते-फिक्र, तोहफा-ए-रबीउल अव्वल,

48. शख़्सियत: कोरोना काल के मसीहा डॉ. तारिक़ महमूद- यश मालवीय

49-50. गुलशन-ए-इलाहाबाद: उर्मिला शर्मा

51. ग़ाजीपुर के वीर: सूफ़ी शम्सुद्दीन

52-56. अदबी ख़बरें

57-89. परिशिष्ट-1: डॉ. एम.डी. सिंहश्

57. डॉ. एम.डी. सिंह का परिचय

58. प्रतिभा स्फोट के सिद्ध साधक कवि - प्रो. शशिभूषण शीतांशु

59-60. एक जंगल मेरे भीतर - पद्मश्री रमेश चंद्र शाह

61-63. डॉ. एम.डी. सिंह की कविताई का जंगल - आनंद कुमार सिंह

64-89. डॉ. एम.डी. सिंह की कविताएं

90-121. परिशिष्ट-2: साबिर जौहरी

90. साबिर जौहरी का परिचय

91. अंधेरे के खिलाफ़ उजाले का सफ़र - विजय प्रताप सिंह

92-93. संजीदा और मोतबर शायर - शैलेंद्र जय

94-95. सच्चाई से सामना कराती साबिर की शायरी- नीना मोहन श्रीवास्तव

96-121. साबिर जौहरी की रचनाएं

122-152. परिशिष्ट-3: जितेंद्र कुमार दुबे

122. जितेंद्र कुमार दुबे का परिचय

123. हर व्यक्ति हो गया महेश है - यश मालवीय

124-126. अतीत की प्रतीति कराती कविताएं - इश्क़ सुल्तानपुरी

127-128. जनता का दर्द बयां करती कविताएं - शिवाजी यादव 


मंगलवार, 10 मई 2022

फूलों के जरिए मोहब्बत का पैग़ाम देते हैं ग़ाज़ी: अंसारी

‘फूल मुख़ाबित हैं’ के विमोचन अवसर पर बोले पूर्व डीजीपी
मुशायरा में शायरों ने अपने कलाम से दिया मोहब्बत का पैगाम


प्रयागराज। वर्तमान समय में ‘फूल मुख़ातिब हैं’ एक ऐसा दस्तावेज है, जिसे पढ़ना हर किसी के लिए बेहद ज़रूरी है। नफ़रत और मतलबपरस्ती के माहौल में इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने फूलों के बहाने इंसानियत और मोहब्बत का पैग़ाम अपनी किताब के माध्यम से पेश किया है। एक ही विषय पर 300 शेर कह देना हर किसी के बस की बात नहीं है, लेकिन इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने इसे कर दिखाया है। आज के समय में ऐसी शायरी की ज़रूरत है, इस किताब का आंकलन ऐतिहासिक तौर पर किया जाएगा, यह एकदम अलग किस्म की किताब है। यह बात 08 मई को इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की पुस्तक ‘फूल मुख़ातिब हैं’ के विमोचन अवसर पर छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी मोहम्मद वज़ीर अंसारी ने कही। कार्यक्रम का आयोजन गुफ़्तगू की आरे से सिविल लाइंस बाल भारती स्कूल में किया गया। 
 इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि एक छोटी सी घटना से फूल पर शेर कहने का सिलसिला शुरू हुआ, जो 300 शेर कहने तक जारी रहा। एक ही विषय ‘फूल’ पर शेर कहना बहुत आसान नहीं होता, लेकिन एक-एक दो-दो करके कब 300 शेर पूरे हो गए पता ही नहीं चला।                         

‘गुफ़्तगू’ की संरक्षक डॉ. मधुबाला सिन्हा को को सम्मानित करते अतिथि



कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मशहूर गीतकार यश मालवीय ने कहा कि ‘फूल मुख़ातिब हैं’ सिर्फ़ एक किताब नहीं है बल्कि यह फूलों की घाटी है जहां पहुंचकर इंसान सारे दुख दर्द भूल जाता है। इस किताब की खुश्बू इतनी व्यापक है कि पतझड़ में सावन और कश्मीर की वादियां सामने दिखने लगती हैं। आज के समय में जब हर नफ़रत का माहौल बनाया जा रहा है, वैसे में इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी सैकड़ों फूलों के साथ खड़े है, जिसका खुले मन से स्वागत किया जाना चाहिए। एसटीएफ में एडीशनल एसपी डॉ. राकेश तूफ़ान ने कहा कि ‘फूल मुख़ातिब हैं’ पढ़ने के बाद निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इम्तियाज़ गा़ज़ी आने वाले समय में अदब के देवानंद और राजेश खन्ना साबित होंगे। इन्होंने फूलों के माध्यम से मोहब्बत का पैगाम देकर लोगों को सराबोर कर दिया है।  ,
                              
            
‘गुफ़्तगू’ की संरक्षक डॉ. शबाना रफ़ीक को सम्मानित करते अतिथि



उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. शिवम शर्मा ने कहा कि इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की यह किताब अदब की दुनिया के लिए एक नायाब तोहफा है, एक ही विषय पर पूरी किताब तैयार कर देना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन इम्तियाज़ गा़ज़ी ने यह कर दिखाया है। सहायक डाक अधीक्षक मासूम रज़ा राशदी ने कहा कि यह एक बहुत ही विशिष्ट किताब है, क्योंकि यह पैमामे मोहब्बत लाने वाली किताब है। हसनैन मुस्तफ़ाबादी, उस्मान उतरौलवी और नरेश महरानी ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। 
                 

‘गुफ़्तगू’ के संरक्षक हसनैन मुस्तफ़ाबादी को सम्मानित करते अतिथि

           


‘गुफ़्तगू’ की संरक्षक ग़ाज़ियाबाद की डॉ. उपासना दीक्षित को सम्मानित करते अतिथि




‘गुफ़्तगू’ के संरक्षक डॉ. राकेश तूफ़ान को सम्मानित करते अतिथि़

                            


   
‘गुफ़्तगू’ के संरक्षक मासूम रज़ा राशदी को सम्मानित करते अतिथि


                                                                                  
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। अनिल मानव, प्रभाशंकर शर्मा, हकीम रेशादुल इस्लाम, डॉ. मधुबाला सिन्हा, डॉ. उपासना दीक्षित, शैलेंद्र जय, एस. जे. रहमानी, संजय सक्सेना, सरिता श्रीवास्तव, अर्चना जायसवाल, शिवपूजन सिंह, राज जौनपुरी, आलोक सिंह, धीरेंद्र सिंह नागा, डॉ. प्रकाश खेतान,, वाकिफ़ अंसारी, रचना सक्सेना, अशोक श्रीवास्तव कुमुद, अफसर जमाल, चेतना चितेरी, सचिन गुप्ता आदि ने कलाम पेश किया।

‘गुफ़्तगू’ के संरक्षक प्रभाकर द्विवेदी प्रभामाल को सम्मानित करते अतिथि

 


‘गुफ़्तगू’ के संरक्षक ज़फ़र बख़्त को सम्मानित करते अतिथि


‘गुफ़्तगू’ की संरक्षक सरिता श्रीवास्तव को सम्मानित करते अतिथि

‘गुफ़्तगू’ के संरक्षक संजय सक्सेना को सम्मानित करते अतिथि

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

साहित्य हमेशा मानवीय मूल्यों की वकालत करता है: डॉ. हरिओम

  उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के कटारी गांव में जन्मे आईएएस डॉ. हरिओम वर्तमान समय में सचिव सामान्य प्रशासन के रूप में कार्यरत हैं, इससे पहले कानपुर, गोरखपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर और इलाहाबाद समेत 11 जिलों के जिलाधिकारी रहे हैं। इन्होंने आठवीं तक की शिक्षा गांव में हासिल करने के बाद वहां से 8-9 किलोमीटर दूर गवर्नमेंट इंटर कॉलेज में 12वीं तक की पढ़ाई की। ये ह्यूमनटीज के छात्र थे, इनके दो बड़े भाई साइंस के स्टूडेंट थे। पिताजी का यह मानना था, कि साइंस के स्टूडेंट डॉक्टर इंजीनियर बनते हैं और जो आर्ट्स पढ़ते हैं, वो अफसर या प्रोफ़ेसर बना करते हैं। बारहवीं के बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी आए। यहां से पॉलिटिकल साइंस, हिस्ट्री और हिंदी विषय के साथ ग्रेजुएशन किया। इसके बाद इन्होंने जे. एन. यू. दिल्ली से हिन्दी विषय से एम.ए. और एम. फिल. की पढ़ाई की। इनको लिटरेचर बचपन से बेहद पसंद था। तहसील के एक लाइब्रेरी में मेंबरशिप लिया था, यहीं से प्रेमचंद, फणीश्वर नाथ रेणु,भगवती चरण वर्मा आदि की कई उपन्यासें लाकर अक्सर पढ़ते रहे। लिखने का काम बारहवीं से ही शुरु हो गया था। अब तक आपकी सात किताबें प्रकाशित हो चुकी है, जिनमें तीन ग़ज़ल संग्रह ‘धूप का परचम’, ‘ख़्वाबों की हंसी’, ‘मैं कोई एक रास्ता जैसे’ दो कहानी संग्रह ‘अमरीका मेरी जान’ और ‘तितलियों का शोर’, एक कविता संग्रह ‘कपास के अगले मौसम में’ और एक किताब ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा’ है। आप एक मशहूर ग़ज़ल गायक भी हैं, अब तक इनके पांच एलबम मंज़रेआम पर आ चुके हैं, जिनमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को समर्पित एलबम ‘रंग पैरहन’ और ‘इंतिसाब’ है। इसके तीन एलबम ‘रोशनी के पंख’, ‘रंग का दरिया’ और ‘ख़नकते ख़्वाब’ हैं। गायकी के लिए अब तक कनाडा, लंदन और दुबई का भ्रमण कर चुके हैं। 13 दिसंबर 2021 को इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, डॉ. राकेश तूफ़ान और अनिल मानव से इनकी मुलाकात लखनऊ स्थित उनके कार्यालय में हुई। अनिल मानव ने इनसे विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश।

 डॉ. हरओम से वार्तालाप करते अनिल मानव

सवाल: प्रशासनिक सेवा में रहते हुए अदब के लिए आप समय कैसे निकाल लेते हैं?

जवाब: ऐसा नहीं होता, कि हम कागज और कलम लेकर बैठ जाएं और अच्छा लिख ही लें। अदब हमसे समय निकलवा ही लेता है। जो अमूमन घटना घटती है, उसमें आम आदमी को तो कुछ नहीं दिखता, लेकिन उसमें आर्टिस्ट बहुत कुछ देख लेता। ग़ज़ल को कहा जाता है कि यह महबूबा से गुफ़्तगू है, लेकिन एक समय के बाद यह आवाम से गुफ़्तगू करती है। यदि मोहब्बत केवल एक आदमी तक महदूद है, तो ये मोहब्बत कोई बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर पाती। मोहब्बत का जब दायरा बढ़ता, तो उसमें पूरा समाज आ जाता है। त्रिलोचन जी ने अपनी ‘धरती’ नामक काव्य संग्रह में कहा है-‘मुझे जगत जीवन का प्रेमी बना रहा है प्रेम तुम्हारा...’  हमारा जो लिखना-पढ़ना है, वो आवाम से गुफ्तगू है, आप ऐसी जबान में गुफ़्तगू करिए, जो आवाम न समझे, तो आपकी गुफ़्तगू करना बेकार है। आप बहुत कुछ लिखते हैं, लेकिन वह पाठक, श्रोता तक न पहुंचे, तो आपका लिखना बेकार है। ग़ालिब के बारे में भी यह कहा जाता है कि जो उनकी मशहूर और मक़बूल शायरी है वह उनके साठ साल उम्र के बाद की है। पहले वो अरबी-फारसी में शायरी करते रहे, लेकिन लोगों ने उसको अप्रीशिएट नहीं किया। तो उनके दोस्तों ने उनसे कहा कि जो आम-फ़हम जो जुबान है,  हिंदुस्तानी जबान है, उसमें आप लिखिए, तो उन्होंने रेख़्ता जो मिली-जुली भाषा है। उसमें उन्होंने लिखा और इतने मशहूर हो गए।

सवाल: साहित्य प्रशासन के लिए किस प्रकार से मददग़ार का साबित हो सकता है ?

जवाब: प्रशासन ही क्यों, साहित्य एक बेहतर इंसान बनाती है। साहित्य का जो मकसद है, वो एक बेहतर समाज बनाना है। सबसे पहले साहित्य जो लिखता पढ़ता है, उसको बेहतर इंसान बनाता है। उसके बाद जो सुनता-पढ़ता है, उसको बेहतर इंसान बनाता है। और बाद में वो विचार और संवेदनाएं फैलती है। साहित्य कभी अन्याय,  शोषण, अत्याचार, गैर बराबरी और भेदभाव की वकालत नहीं करता है। साहित्य हमेशा मानवीय मूल्यों की वकालत करता है। साहित्य हमारे अंदर पेशेंस और समझने का नजरिया देता है। हमारे वैचारिक और संवेदना के स्तर को बहुत समृद्ध करता है।

बाएं से- डॉ. राकेश तूफ़ान, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, डॉ. हरिओम और अनिल मानव


सवाल: ग़ज़ल-गायन की तरफ आपका पदार्पण शुरू से ही रहा या बाद में हुआ ?

जवाब: मुझे गाने और गुनगुनाने का शौक़ तो बचपन से ही रहा है। मैं एक अच्छे सुरीले गायक बच्चे के तौर पर जाना जाता था। जब मैं स्टूडेंट था तो टीचर्स मुझे 15 अगस्त, 26 जनवरी पर गाने के लिए कहते थे। प्रार्थना मैं ही करता था। जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मुझे यार-दोस्त घेरकर कहते थे, यार! ये सुनाओ, वो सुनाओ। वो सब करते-करते मैं भी खुश रहता था, कि लोग मेरे पास गाना सुनने के लिए बैठे रहते हैं। स्टूडेंट लाइफ में जब भी मुझे मौका मिलता था, स्टेज पर मैं गाता था। हॉस्टल की महफ़िल में गाता था। लेकिन वो शौक़िया ही था। पढ़ाई लिखाई में हम अच्छे थे। मन ज्यादा उधर भी लगा रहता था और ये भी था कि पढ़-लिखकर कुछ करना है। संगीत हमेशा एक स्ट्रेस बस्टर के तौर पर था। जब भी तनाव हो या पढ़कर बोरियत होने लगे, तो ये भी हो जाता था। लेकिन एक खास बात है, कि हरमोनियम बारहवीं के बाद हमेशा मेरे साथ में थी। हारमोनियम बजाना मैंने बारहवीं में स्टार्ट किया था। कुछ गाने मैं बजाने लग गया था। हारमोनियम मैंने कहीं सीखी नहीं, बल्कि ख़ुद से ही सीख लिया था। ये मेरी दोस्त हो गई थी। ग्रेजुएशन के बाद जब तक मैं स्टूडेंट था, तब तक मेरे कमरे में हमेशा मेरे साथ थी। एक तरह संगीत ही मेरा साथी था। एफएम रेडियो और टेप रिकॉर्डर में मैं हमेशा गाना सुना करता था। ग़ज़ल सुनने का भी इसी दौरान मुझे बहुत चस्का लगा। मेहंदी हसन, अहमद हुसैन, मोहम्मद हुसैन और जगजीत सिंह, गुलाम अली, पंकज उदास को खूब सुनता था। एक दौर था, जब नॉनफिल्मी संगीत हिंदुस्तानी समाज में छा गया था, खूब बजता था। अभी तक तो मेरे गाने का सब काम शौक़िया चल रहा था, लेकिन  असल में गाने की शुरुआत 2015 के बाद हुई। जब मैंने कहा कि मुझे पब्लिक में एज ए सिंगर गाना है। मैंने सोच लिया था, कि मुझे अब किसी की कापी नहीं करनी है, मुझे ओरिजिनल अपना लिखा गाना है। चूंकि मैं लिखता था, तो मैंने कुछ अपने और कुछ फ़ैज़ साहब के कलाम गाये। ‘इंतिसाब’ नाम से मेरा पहला एल्बम 2011 में रिलीज हुआ। यह मेरा पहला ओरिजिनल काम था। 2015 में मैं पब्लिक में गाना शुरु किया। जिसमे मैने ‘रोशनी के पंख’ जो अपना एलबम है। जिसमें मैंने ‘मैं तेरे प्यार का मारा हुआ हूं, सिकंदर हूं मगर हारा हुआ हूं।’ और ‘मुस्कुराती हुई सुबह हो तुम’ नज़्म काफ़ी चर्चित हुई। उसमें फ़ैज़ की भी 2-4 गजलें शामिल थी। उसके बाद मैं पब्लिक में आया और खूब रियाज करने लगा।


सवाल: वर्तमान समय में सबसे महत्वपूर्ण शायर आप किन्हें मानते हैं?

जवाब: ये बहुत ही कठिन सवाल है। सारे शायर ही महत्वपूर्ण हैं। हर शायर हमेशा अच्छी शायरी नहीं करता है। संगीत में एक कहावत है, कि ‘खाना, गाना, पागड़ी कभी-कभी बन जाए’ शायरी और कविता में भी ये चीज है। ऐसा नहीं है, हर बार ही अच्छा ही हो जाए। कोई न कोई नुक्स हमेशा रह जाता है। कभी-कभी ही अच्छा हो पाता है। हमउम्र जो शायर हैं, अभी उस पर टिपण्णी करना बहुत जल्दी होगी। सब अच्छा ही लिख रहे हैं। अगर हमारे एज में देखें, तो पवन कुमार, मनीष शुक्ला, अभिषेक शुक्ला, आलोक यादव आदि अच्छा लिख रहे हैं। जो शायरी के यंगर लॉट हैं। बाकी पहले के लोग तो लीजेंड है ही हैं। मीर, ग़़ालिब, निदा फ़ाज़ली आदि तो अच्छे ही हैं।


सवाल: नई पीढ़ी तो कविता या शे’र को सोशल मीडिया पर पब्लिश करके वाह-वाही पा लेने को ही कामयाबी मानती है, आप इसे किस रूप में देखते हैं?

जवाब: सोशल मीडिया ने डेमोक्रेटाइजेशन के प्रोसेस को बहुत तेज किया है। हमने पहले एक रचना की, तो ये सोचते थे, कि इसे कहां छपाएं ? या तो हम अख़बार का चक्कर काटें या किसी मैगजीन के चक्कर काटें। संपादक की कृपादृष्टि होगी, तो छपेगा, नहीं तो नहीं छपेगा। अब सोसल मीडिया ने कहा है, कि आप ख़ुद ही अपने प्रकाशक हैं और खुद ही राइटर हैं और इंस्टेंट राय भी आ जाती है। सबसे बड़ी बात है, कि पाठक की चिट्ठियों की भी प्रतीक्षा नहीं करनी होती है। वहीं नीचे कमेंट आ गया, लाइक आ गया। वहां आपकी शायरी तुरंत पब्लिक में पहुंचती है। लेकिन ज्यादा लाइक या कमेंट का मतलब यह नहीं है, कि कविता अच्छी है, बल्कि यह देखना जरूरी है, कि वह किन्होंने लाइक किया है। उनको शायरी की समझ है, कि नहीं हैं। किन लोगों की राय है? कौन लोग आपके फॉलोवर हैं ? जैसे मान लीजिए, कि आप संगीतकार है और आपके तमाम लोग ऐसे फालोवर हैं, जिनका संगीत से कोई लेना-देना ही नहीं है। और वो लोग आपको इसलिए लाइक करते हैं, क्योंकि वो आपको किसी और वजह से पसंद करते हैं और फॉलो करते हैं। लेकिन एक बात यह है, कि वहीं पर अच्छे लोग भी हैं। जैसे सोसल मीडिया पर तो आज हर कोई है और इस परिवर्तन को समाज में उल्टा भी नहीं जा सकता। और उलटने की ज़रूरत भी नहीं है। पहले छापा खाना था, तो खाली प्रिंट ही था। फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आया, सोसल मीडिया आया, फिर डिजिटल मीडिया आ गया। इसमें तामम अच्छी चीजे़ भी हैं। तमाम अच्छे शायरों को हम एक क्लिक में पढ़ लेते हैं। भले ही किताब हो या न हो, गूगल पर सब मिलता है। जो प्रतिभाशाली राइटर्स, कवि, शायर हैं या फनकार हैं, उनके लिए एक अच्छा प्लेटफॉर्म है। उनको सीखने का भी मौका है, बशर्ते कि वो अपना जहन और आँख खुला रखें। देखें कि और बेहतर कौन लिख रहा है। कोई कमियां हैं तो उसको दुरुस्त करने के भी तमाम तरीके हैं। बड़े-बड़े लोगों के कलाम हैं, उनसे सीख सकते हैं। सोसल मीडिया मदद करता है, मगर उसे अपने अच्छे होने का पैमाना न मानें। आप सीखते चलें, अपने आपको माँजते चलें।


सवाल: आपके नजरिए से शायरी के लिए उस्ताद का होना कितना ज़रूरी है ?

जवाब: उस्ताद होना ज़रूरी है। अब ये उस्ताद कोई इंसान हो सकता है, कोई किताब हो सकती है, सोशल मीडिया हो सकता है। उस्ताद का काम है सिखाना। और आदमी तमाम तरह से सीखता है। अगर आपकी सीखने की इच्छा है, तो सीखना जिं़दगी भर चलता रहेगा। उस्ताद का दौर वह था, जब आदमी एक जगह रहता था। उस्ताद भी आसानी से उपलब्ध था। उस्ताद में भी बड़प्पन था, उदारता थी, कि वह सिर्फ प्यार-मोहब्बत में सिखाता था। अब तो उस्ताद ढूंढना मुश्किल है। हमारे जैसे लोग एक जगह टिक कर रहते ही नहीं हैं। हमेशा ट्रांसफर होता रहता है। तो आप किताब से सीखिए। बड़े-बड़े लोगों ने इतना लिखा है, उससे सीखिए। जानकार लोगों से पूछते रहना चाहिए। हमारे साथ यह है, कि चाहे संगीत हो या शायरी हो कोई एक बंदा नहीं है, जिससे हम सीखते हैं। हम तो बहुतों से सीखते हैं। किसी ने कुछ बता दिया, तो उस पर रिसर्च कर लिया। गूगल पर सर्च कर लिया। बड़े-बड़े लोगों का कलाम पढ़ लिया। क्लासिकल सुन लिया। देखा कि कुछ कमी है, तो उसे दुरुस्त कर लिया। इस तरह से सीखने की प्रोसेस चलती है। जैसे एकलव्य थे। उनका कौन उस्ताद था? द्रोणाचार्य ने सीखाने से मना कर दिया, लेकिन उनको रोक तो नहीं पाए। क्योंकि प्रतिभा उनके अंदर थी। आस्था थी। सीखने की लगन थी, तो उन्होंने अपने आप सीख लिया। हमारे जैसे लोग भी उसी विश्वास के साथ शायरी कर रहे हैं। उसी विश्वास के साथ संगीत भी कर रहे हैं। और यह मानकर चल रहे हैं, कि इसमें बहुत सुधार की गुंजाइश है।

सवाल: वर्तमान समय में आपका कौन सा सृजन कार्य और अध्ययन चल रहा है

जवाब: देखिए! मैं हमेशा पढ़ता रहता हूं। तमाम मैगजीन्स और किताबें मेरे पास आती रहती हैं। उन्हें मैं पढ़ता रहता हूं। लगातार ही कुछ न कुछ मैं अवश्य पढ़ता रहता हूं। अब आज की तारीख में क्या कर रहा हूं, कि यह कहना मुश्किल है। नोबेल पढ़ता हूं। ‘सोफीज वर्ल्ड’ वेस्टर्न फिलासफी की एक किताब है, उसे पढ़ा हूं। एक ‘गन फैक्ट्री’ अमिताभ घोष का नोबेल मिली, उसे पढ़ रहा हूं। मुझे जो भी हाथ में मिल जाती है, उसे मैं पढ़ जाता हूं। अंबेडकर की ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ मिली है, उसे पढ़ रहा हूं। अभी भगवत गीता पढ़ा, रामचरितमानस दो बार पढ़ी। पवन जी ने एक नॉवेल लिखी है ‘मैं हनुमान’ उसे पढ़ रहा हूं। जो भी किताब मुझे अच्छी लगती है, उसे पूरा पढ़ जाता हूं। इसके अलावा मैं म्यूजिक की कोई धुन अक्सर बनाता रहता हूं और उसे कंपोज करता हूं। इसमें भी मेरा बहुत समय जाता है।

इंटरव्यू के दौरान डॉ हरिओम के ऑफिस में माजूद बाएं से- अनिल मानव, डॉ. हरिओम, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और डॉ. राकेश तूफ़ान


सवाल: साहित्य में शिक्षकों का क्या योगदान है?

जवाब: जो साहित्यकार है, उससे बड़ा शिक्षक कौन हो सकता है ? पहले क्या था, कि जितने भी विद्वान या ज्ञानी लोग होते थे, वो सब समाज को शिक्षित करने का कार्य करते थे। शिक्षक का मतलब किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाला व्यक्ति ही नहीं, बल्कि शिक्षक का मतलब यह है, कि जो समाज को अच्छी दिशा में ले जाने का कार्य करें। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ यही साहित्यकार का काम था। प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष के तौर पर 1936 में मुंशी प्रेमचंद ने कहा है, कि साहित्य समाज के आगे-आगे चलने वाली मशाल है। इसका मतलब है, कि वह समाज को रास्ता दिखा रही है। आज शिक्षक को हम अध्यापक मास्टर या प्रोफेसर मानते हैं, जबकि जो भी हमें अच्छी शिक्षा दें वही शिक्षक है। आप देखिए, कि हिंदी साहित्य में तमाम लोग रहे हैं, जो बड़े साहित्यकार रहे हैं और शिक्षक भी रहे हैं। आलोचना में नामवर सिंह, रामविलास शर्मा जी, वीर भारत तलवार, पुरुषोत्तम अग्रवाल आदि सारे लोग शिक्षक भी हैं और विद्वान भी हैं। अज्ञेय, फ़िराक़ साहब लेखक और शिक्षक दोनों रहे हैं।


( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2021 अंक में प्रकाशित )


शनिवार, 23 अप्रैल 2022

अशोक स्नेही की कविताएं अतुलनीय हैं: यश मालवीय

 अशोक स्नेही की पुस्तक ’मैं भी सूरज होता’ का हुआ विमोचन

डॉ. खेतान, राजेश समेत सात को मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’


प्रयागराज। अशोक कुमार स्नेही की कविताएं अतुलनीय हैं, उन्होंने अपनी एक कविता में जिस प्रकार से राम और तुलसी की तुलना करते थे, वह बेहद ख़ास और बेहद मार्मिक है, इस तरह की तुलना करना हर किसी के बस की बात नहीं है। स्नेही जी बेहद मार्मिक और संवेदनशील कवि थे, आज उनके परिवार और गुफ़्तगू की तरफ से जिस तरह उन्हें याद किया जा रहा है, वह आज के समय के लिए बहुत ही ख़ास है। यह बात मशहूर गीतकार यश मालवीय ने 18 अप्रैल को हिन्दुस्तानी एकेडेमी में गुफ्तगू की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में कही। कार्यक्रम के दौरान अशोक कुुमार स्नेही की पुस्तक ‘मैं भी सूरज होता’ और गुफ्तगू के नए अंक का विमोचन किया गया, साथ ही सात लोगों को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान किया गया।



 मुख्य अतिथि जौनपुर के एसपी सिटी जितेंद्र कुमार दुबे ने कहा कि आज प्रयागराज में आकर गुफ़्तगू के कार्यक्रम में शामिल होकर एहसास हुआ कि वाकई यह शहर साहित्य का है। आज के मौके पर पुस्तक विमोचन और सम्मान समारोह का आयोजन किया गया, जो बहुत ही तार्किक और प्रभावशाली है। सरस्वती पत्रिका के संपादक रविनंदन सिह ने कहा कि स्नेही जी ने जिस तरह की कविताओं का सृजन किया है, आज के लोगों के मिसाल कहैं, ऐसे काव्य की ही आज समय में जरूरत हैं। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि स्नेही जी की कविताएं इतनी मार्मिक होती हैं कि जब से खुद पढ़ते थेे तो रोने लगते थे। अशोक कुमार स्नेही की पुत्री अलका श्रीवास्तव ने कहा कि मेरे पिता ने हमेशा सच और साहित्य को जिया था, उनके जाने के बाद उनकी रचनाओं को सहेजना और प्रकाशित करवाना हमारी जिम्मेदारी है। अध्यक्षता कर रहे श्रीराम मिश्र उर्फ तलब जौनपुरी ने कहा कि स्नेही जी ख़ासकर नए लोगों के लिए प्रेरणादायक थे, वे नए लोगों को खूब प्रोत्साहित करते थे। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। अनिल मानव, प्रभाशंकर शर्मा, नीना मोहन श्रीवास्तव, संजय सक्सेना, डॉ. नीलिमा मिश्रा, नायाब बलियावी, ललिता पाठक नारायणी, विजय लक्ष्मी विभा, डॉ. अमरजीत, गीता सिंह, रचना सक्सेना, राकेश मालवीय, प्रेमा राय, जया मोहन, बिहारी लाल अम्बर, विक्टर इलाहाबादी, जगदीश कौर, अपर्णा सिंह, अजय प्रकाश, शाहीन खुश्बू, सम्पदा मिश्रा आदि ने काव्य पाठ किया। मनीष कुमार श्रीवास्तव, राहुल कुमार श्रीवास्तव, मोनिका श्रीवास्तव, गौरव श्रीवास्तव, सोनिका श्रीवास्तव, पंकज श्रीवास्तव, दीपा श्रीवास्तव और अमल श्रीवास्तव आदि मौजूद रहे।

इन्हें मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’


अशोक कुमार स्नेही (मरणोपरांत), आईपीएस राजेश पांडेय, डॉ. प्रकाश खेतान, राजेंद्र सिंह बेदी, अनिता गोपेश, डॉ. तारिक़ महमूद, हकीम रेशादुल इस्लाम

सोमवार, 11 अप्रैल 2022

सलीक़े से ज़िन्दगी गुजारने का हुनर

                                                                  - डॉ. वारिस अंसारी 

                                          


 अल्लाह का बेशुमार एहसान है कि हमें उसने रसूल की उम्मत ने पैदा किया। दीन से वाबस्ता किया, दीन समझने और उस पर अमल करने का शऊर अता किया। यक़ीनन वह लोग बहुत खुशनसीब हैं जो दिन की बातों पर अमल करने के साथ-साथ दूसरों को भी दीन सिखा रहे हैं, ऐसे अज़ीम लोगों की फेहरिस्त में एक अहम नाम मौलाना शर्फ़उद्दीन ख़ान कादरी का भी है, जिन्होंने ‘खुतबात-ए-क़ादरी’ जैसी आसान किताब लिखकर उम्मते मुसलमान की जिं़दगी को ताबनाक बनाने का काम अंजाम दिया है। इस किताब में आपने अच्छी तकरीरों को बहुत ही आसान जबान में समझाने की कोशिश की है। जिसमें वालिदैन के एहसान और उनके हुकूक के साथ-साथ मौत पर भी रोशनी डाली है। जुमा के फ़ज़ाइल, रमजान की अहमियत और मीलादे मुबारक का भी पुरअसर अंदाज़ में जिक्र किया है। मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूं कि इस किताब को पढ़ने से ईमान में ताज़गी व सलीके से जिं़दगी गुजारने का हुनर ज़रूर मिलेगा। 86 पेज की इस किताब की कीमत 40 रुपये है, जिसे कादरी बुक डिपो इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है। 


   इस्लामी मालूमात के लिए सवाल-जवाब


  आज की इस भागमभाग ज़िंदगी में किसे फुर्सत है कि वह ज़ख़ीम किताबों का मुतआला करे। शायद इसी लिहाज़ से मौलाना शरफुद्दीन खान ने बेहद आसान ज़़बान में सवाल-जवाब की शक्ल में एक खूबसूरत इस्लामी किताब ‘इस्लामी मालूमात’ अवाम को अता किया है, जोकि मदारिस के लिए भी एक कारामद किताब है। इस किताब को पढ़ कर आप इस्लामी मालूमात के साथ-साथ अपनी जिं़दगी को और भी खूबसूरत बना सकते हैं। जे़रे नज़र किताब में  कुरआन करीम, हदीसे-मुस्तफ़ा, तफ़सीर, फकह और तारीख़ के पांच सौ नब्बे (590) सवाल और जवाब मौजूद हैं। जिनको पढ़ कर मसरूफ लोग भी बहुत कम वक़्त में ज़्यादा मालूमात हासिल कर सकते हैं। किताब की बड़ी खूबी ये है कि मुसन्निफ़ ने इसे बहुत ही सादा और आसान ज़बान में तखलीक की है। 110 पेज की इस किताब को कादरी बुक डिपो इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत सिर्फ 50 रूपये है। यक़ीनन इस किताब को हर मोमिन के घर की ज़ीनत होनी चाहिए, जिससे इस्लामी मालूमात में मज़ीद इज़ाफा हो सकेगा।


’शरफ-ए-खिताबत’ मोमिन के लिए एक तोहफ़ा



 मौलाना शरफुद्दीन ख़ान की किताब ‘शरफ़-ए-खि़ताबत’ का पूरा मोतआला किया। बेहद पसंद आई, ईमान ताज़ा हो गया। दिल इस क़दर खुश हुआ कि बयान मुमकिन नहीं। दुआ है अल्लाह हज़रत मौलाना शरफुद्दीन खान की उम्र व सेहत में बरकतें अता फरमाए-आमीन। ज़ेरे नज़र किताब में मौसूफ ने शरफ़-ए-खि़ताबत में सीरत-ए-नबी, औलिया अल्लाह की जिं़दगी, वसीला, एहकाम-ए-वालिदैन, मोहर्रम शरीफ और रिज्क हलाल के मौजू पर जिस खूबसूरत अंदाज़ में बयान फरमाया है वह काबिलेकद्र है। यही अंदाजे़ बयां लोगों को इस किताब को पढ़ने के लिए अपनी तरफ माइल करता है। इस किताब की तखलीक में मौसूफ़ ने बेहद सादा ज़बानी से काम लिया है, जिससे ये किताब अवामुन्नास व तलबा को पढ़ने और समझने में काफी सहूलत होती है। 96 पेज की ये किताब कादरी बुक डिपो इलाहाबाद से प्रकाशित हुई है, जिसकी कीमत सिर्फ़ तीस रूपये है।


  इंसानी नफ़सियात की अक्कासी करते अफसांचे



 आइये सबसे पहले जान लेते हैं कि अफसांचा है क्या ? दर असल ये फारसी के लफ्ज़ अफसाना से बना है जिसका मतलब होता है किस्सा कहानी। अफसांचे को हिंदी में लघु कथा कहते हैं। जब भी अफसांचों की बात होती है तो डॉ. नज़ीर मुश्ताक का नाम सरे-फेहरिस्त आता है। इससे पहले मैंने भी आपके तमाम अफसांचे अलग-अलग रिसालों में पढ़े। ये मेरी खुशनसीबी है कि आज आपके अफसांचों की किताब ‘तिनका’ मेरे हाथ में है। अब तक मैने इस किताब के चालीस अफसांचो को बागौर पढ़ा-पढ़ कर लुत्फअंदोज हुआ। ज़ह्न सोचने पर मजबूर हुआ कि आखिर इतने कम सेंटेंस (वाक्यों) में इतनी संजीदा बातें लिखना मामूली काम नहीं, ये हुनर मंदाना काम एक बाकमाल इंसान ही कर सकता है, जो कि डॉ. नज़ीर साहब के यहां बखूबी मिलता है। मैं आपके कुछ अफसंचो के नाम लूं जैसे तावीज़, इश्क़, मजदूर, गुर्दा, बाप, दासी, भिकारी, गुनाह, करामात, क़ातिल, बदला वगैरह पढ़ने के बाद ज़ेह्न व दिल जिस तरह मुतासिर होते हैं बयान कर पाना मुमकिन नहीं। पूरी किताब में एक से बढ़ कर एक अफसांचे दिल को झकझोर देने वाला है। डॉ. नज़ीर के अफसांचों की बहुत बड़ी खूबी ये है कि वह इंसानी नफ़सियात की अक्कासी सलीके से करते हैं और अफसाने के मेयार को बरकरार रखने की सलाहियत रखते हैं। उनके यहां इंसानी फितरत का तजरुबा भी है और मुशाहेदात का शऊर भी। आपके अफसानों में बेवजह की तूल न होने के बाद भी बलंद ख़्याली है, संजीदगी है, अदब है, एहतेजाज है, समाज की जिम्मेदारियों का एहसास और जिं़दगी के उतार चढ़ाव के रंग भी। किताब में कुल 100 अफसांचे हैं। 188 पेज की इस किताब को जीएनके पब्लिकेशन (चरार शरीफ) ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 300 रुपये है। 


   फिक्र और एहसास की खूबसूरत तर्जुमानी 



राजा रानी देव परी लकड़हारा वगैरा की कहानियां हम बचपन में सुना करते थे, धीरे-धीरे लोग बदले, वक़्त बदला हमारा वातावरण बदला और इसी बदलाव ने हमारी कहानियों का भी रुख मोड़ दिया। आज हम जिस जगह हैं, वहां इंसान की फिक्र और पल-पल बदलते  एहसास से गिरे हुए हैं, और इन्हीं एसासात को डॉ. ज़ाकिर फ़ैज़ी ने खूबसूरत अंदाज़ में टालकर अफसानो की शक्ल में आवाम को दिया। ‘नया हमाम’ में 25 अफसाने और पांच अफसांचे हैं। ‘मेरा कमरा’, ‘नया हमाम’, ’स्टोरी में दम नहीं’ और किताब में मौजूद पांचो अफसांचे दिलचस्प हैं। इन कहानियों को पढ़ने के बाद अंदाजा हो गया कि डॉ. फ़ैज़ी का नाम कहानीकारों की सफ में अहम मुकाम रखता है आज रोजमर्रा के होने वाले मसाइलों को कहानी में ढालने का हुनर जानते हैं। ‘नया हमाम’ इसकी खूबसूरत मिसाल है आपने अपनी कहानी में मीडिया को भी जबरदस्त तरीके से नंगा किया है, उन्होंने बताया कि मीडिया को जिस एहतराम की नजर से देखा जाता था, आज मीडिया ने सिर्फ़ टीआरपी के चक्कर में अपना वक़ार खो दिया और दौलत कमाने की मशीन बन गई। इसी किताब में मौजूद अफसांचा ‘झटके का गोश्त’ भी इंसान को सोचने पर मजबूर कर रहा है। 204 पेज की सजिल्द पुस्तक की कीमत 250 रुपए है, इसे एजुकेशनल पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित किया है।


( गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2021 अंक में प्रकाशित )


मंगलवार, 29 मार्च 2022

सीरियस लिटरेचर हमेशा पॉपुलर लिटरेचर से आगे होगा : असग़र वजाहत

 गुफ़्तगू पत्रिका पढ़ते हुए असग़र वजाहत

 असग़र वजाहत का जन्म 05 जुलाई 1946 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में हुआ। इन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. करने के बाद यहीं से पी-एच.डी. भी किया। पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली से किया। 1971 से जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली के हिंदी विभाग में अध्यापन का कार्य किया है। रिंकल शर्मा ने उनके नोएडा स्थित निवास पर उनसे मुलाकात कर विस्तृत बातचीत किया है। प्रस्तुत है उसके प्रमुख अंश।

सवाल:  आपके लिखने-पढ़ने का सिलसिला है कब से और कैसे शुरू हुआ ?

जवाब: 1963-64 में जब मैं अलीगढ़ मे पढ़ रहा था, तभी दिलचस्पी पैदा हुई और लिखना शुरू किया। वजह ये  थी कि मैं चीज़ों को शेयर करना चाहता था। मैं यह चाहता था कि मेरे जो एक्सपीरियंस है  जैसे-मैं जो देखता हूं, जो सुनता हूं या जो लोग मुझे बताते हैं, अगर वो  इंपॉर्टेंट है तो उसे मैं लोगों के साथ शेयर करूं। सबसे पहले वहां की जो स्टूडेंट मैगजीन निकलती थी, उसमें छपा और फिर धीरे-धीरे बाहर की मैगज़ीन में भी छपने लगा। 

सवाल:  लेखन की शुरुआत कहानियों से हुई या कविताओं से ? 

जवाब: पहले कहानियां लिखना शुरू किया। उस ज़माने में कविता से सभी को बड़ा लगाव होता था,  तो कुछ कविताएं भी लिखी और नाटक भी। उस ज़माने में लेखक के लिए जो अलग-अलग विधाएं है, उन सभी विधाओं में कोशिश करते रहे. ज्यादातर कहानियां लिखी जो उस ज़माने की साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने लगीं। 

असग़र वजाहत से बात करतीं रिंकल शर्मा    

सवाल: जब आपने लिखना शुरू किया उस समय समाज में लेखक, कवि और साहित्य का समाज में ख़ास स्थान होता था। आज के समाज में साहित्य का क्या स्थान है ? 

जवाब: उस ज़माने में जो पॉपुलर लिटरेचर है वो ऐसा नहीं था जैसा आजकल है। मैं पॉपुलर लिटरेचर का विरोधी नहीं हूं.  लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि समाज में पॉपुलर लिटरेचर उस समय भी था लेकिन आज मीडिया की वजह से पॉपुलर लिटरेचर के लिए स्पेस बड़ी हो गई है। पहले जो कवि सम्मेलन या मुशायरा हुआ करते थे, वहां पर पॉपुलर कवि, पॉपुलर संगीतकार सुनाते थे, आमतौर से अच्छे कवि भी जाते थे. लेकिन अब मीडिया ने पॉपुलर लिटरेचर को बहुत बड़े-बड़े प्लेटफार्म दे दिये हैं। इतने बड़े प्लेटफार्म पर पॉपुलर लिटरेचर पहले नहीं था। दूसरा अंतर यह है कि जो गंभीरता पहले हुआ करती थी उसमें अब शायद कुछ कमी आई है, क्योंकि जब आप पॉपुलर कल्चर में चले जाते हैं तो उसमें फिर सफलता के स्टैंडर्ड से अलग हो जाते हैं। सफलता के स्टैंडर्ड फिर ये हो जाते हैं कि- किसको कितना पैसा मिलता है ? किसको कितना काम मिलता है? अब स्टैंडर्ड काम की क्वालिटी नहीं होती बल्कि ये है कि कविता से या रचना से कितना पैसा मिलता है। तो ये दो बड़े अंतर है जो उस समय से लेकर आज के बीच में दिखाई देते हैं।

सवाल: आपकी एक बहुचर्चित कहानी ‘ड्रेन में रहने वाली लड़कियां’ एक ऐसी कहानी है जो कन्या भ्रूण हत्याओं पर सीधा प्रहार करती है। इस कहानी को लिखने की प्रेरणा आपको कैसे मिली ?

जवाब: देखिए हर लेखक या साहित्यकार जो है वह अपने समाज से सीखता है। समाज  सबसे बड़ी पाठशाला है। आप ऐसा नहीं सोच सकतीं हैं कि कोई लेखक या साहित्यकार  समाज से कट जाएगा और पूरी तरह खुद लिखेगा। समाज से कटना असंभव है और समाज से कट के कोई लिख नहीं सकता। समाज में जो हो रहा है उसकी एक तरीके से गूंज सुनाई देती है लेखन में, जिसको पुराने लोग कहा करते थे कि साहित्य समाज का आईना है। आज आप देखिये हमारे समाज में महिलाओं के साथ जो भेदभाव है. ख़ासतौर से कमजोर वर्ग की महिलाओं के साथ जो शोषण होता है। आज भी वहां किसी घर में लड़की पैदा हो जाए तो उसको बहुत बुरा मानते हैं। तो इस तरह के पूरे माहौल ने ये प्रेरणा दी कि इस तरीके की कहानी जो है, वो लिखी जाए। आपने पढ़ा भी होगा कि राजस्थान में या कई दूसरी जगहों पर भी, लड़कियों के पैदा होते ही, परिवार के लोग ऐसी कोशिश करते हैं कि वह न रहे. ये समाज की बहुत बड़ी ट्रेजडी है.

सवाल: जिस समय आपने यह कहानी रची उस समय से लेकर आज तक भी देखा जाए तो हालात वही है. हमारे समाज में भू्रण हत्याएं आज भी होती हैं। बतौर लेखक आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?

जवाब: देखिए सबसे बड़ी बात है शिक्षा जो आपके संस्कार है समाज के वह बदलने चाहिए हमारे देश में सबसे बड़ी गलती क्या हुई। हमारे देश के नेताओं ने प्रारंभ में यह सोचा कि जब देश आजाद हुआ कि आर्थिक प्रगति होगी तो उससे सामाजिक प्रगति भी होगी तो उन्होंने पंचवर्षीय योजनाएं बनाई. बहुत बड़े-बड़े कल-कारखाने लगाएं ताकि लोगों को नौकरी मिले. यदि ज्यादा काम मिलेगा, प्रोडक्शन बढ़ेगा तो आर्थिक व्यवस्था सुधरेगी और इससे जीवन अच्छा होगा। लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा कि आर्थिक प्रगति जो है वह सामाजिक और बौद्धिक विचारों की प्रगति करती हो, इसकी कोई गारंटी नहीं। जैसे एक आदमी ट्रैक्टर चलाता है और वह हत्यारों की पूजा करता है या एक आदमी डॉक्टर है लेकिन उसके विचार जो है वो पुरातन विचार हैं। तो क्या हालात सुधरेंगे? शिक्षा के द्वारा लोगों के नए विचार या  संस्कार बनाने की कोशिश नहीं की गई। केवल आर्थिक प्रगति कराई गई, आर्थिक प्रगति  ज़रूरी नहीं है कि सामाजिक प्रगति भी करे.  इसलिए आज ज़रूरी है कि शिक्षा के ऊपर बल दिया जाए। कम्पलसरी एजुकेशन अगर चीन में हो सकती है तो हमारे देश में क्यों नहीं हो सकती? जबकि चीन हमसे बड़ा देश है. हमने सामाजिक प्रगति पर ध्यान नहीं दिया. सामाजिक प्रगति पर अगर ध्यान दिया होता तो आज यह स्थिति नहीं होती.

सवाल:  आपका रंगमंच से भी आपका बहुत गहरा नाता रहा है।  रंगमंच के प्रति आकर्षण कैसे हुआ ? 

जवाब: रंगमंच एक तरीके का मास मीडिया है, आप जब मंच के ऊपर कुछ प्रस्तुत करते हैं तो उसके हजारों दर्शक होते हैं और उसका बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता है, देखने वालों के मन के ऊपर। थिएटर जो है वह समाज से इतना अधिक जुड़ा है कि समाज को सीधे तौर पर प्रभावित करता है और समाज से वह ग्रहण भी करता है, उसका रिश्ता समाज से बहुत गहरा बनता है। साहित्य की एक तरीके की सीमा है कि वह जब जाएगा, तभी लोगों तक जाएगा। लेकिन थिएटर में जो नहीं पढ़ा लिखा है अगर वह भी देख रहा है तो उसको भी संदेश जा रहा है. वह समझ रहा है कि क्या कहना चाह रहा है लेखक। हमारे जैसे देश में जहां पढ़े-लिखे साक्षर लोगों की संख्या कम है वहां थिएटर की एक बहुत बड़ी भूमिका है.  रंगमंच हमेशा हमारे देश की पुरानी परंपरा है। हजारों साल पुरानी इस नाटकीय परंपरा को बनाए रखना और आगे बढ़ाना, ये हम सब लोगों का काम है। इसी वजह से मैं नाटक के क्षेत्र में आया।


असग़र वजाहत की पत्नी रेहाना, असग़र वजाहत और रिंकल शर्मा  

सवाल: आपका एक बहुत चर्चित नाटक रहा है ‘‘जिन लाहौर नहीं वेख्या...’ जिसमें बंटवारे का एक दर्द दिखाया गया है। क्या असल जिं़दगी में आपके जीवन में कोई ऐसा वाकया रहा जिससे आपको नाटक लिखने का आईडिया आया ?

जवाब: जैसा कि मैंने कहा कि हम लोग समाज से ही सीखते हैं। इस नाटक में बहुत सी ऐसी बातें या बहुत से ऐसे किरदार आपको मिलेंगे जो की रियल लाइफ से या रियल लाइफ में घटी घटनाओं से मिलते जुलते हैं। तो उन हो चुकी घटनाओं को विस्तार देना, उनको एक कहानी में पिरोना और उनको प्रारंभ से लेकर क्लाइमेक्स तक ले जाना, यह सब काम जो है वह लेखक का होता है। तो इसमें भी मुझे जानकारी मिली थी कि पार्टीशन के बाद लाहौर में एक बूढ़ी हिंदू औरत रह गई थी। चूंकि वह बड़ी भली औरत थी, सबकी सहायता करती थी मदद करती थी इसीलिए उसका लोग बड़ा सम्मान करते थे। केवल इतनी जानकारी मुझे मिली और इस जानकारी में, मैंने यह सोचना शुरू किया कि अगर कुछ लोग उसको बहुत पसंद करते थे, तो कुछ ऐसे लोग (कट्टरपंथी टाइप) भी होंगे जो उसको नहीं पसंद करते होंगे, तो यहां से द्वंद्व शुरू हो गया। नाटक की जो आत्मा है वह है-कनफ्लिक्ट और इसी कनफ्लिक्ट को फिर बढ़ाया और इसमें दूसरे पात्र,  दूसरी घटनाएं आकर जुड़ना शुरू हुई, दूसरे साहित्य शामिल होना शुरू हुई फिर इसमें धर्म का एक पक्ष आकर जुड़ा क्योंकि मेरा मानना यह है कि हर धर्म जो है अच्छाई की शिक्षा देता है। कोई धर्म आपको संसार में ऐसा नहीं मिलेगा जो यह कहे कि हत्या करना, चोरी करना या अपराध करना ठीक है। सारे धर्म यही कहते हैं कि यह सब ग़लत है। जैसे इस नाटक में जो मौलवी है जब उससे पूछा जाता है कि यह हिंदू औरत (मुख्य नायिका) है और यह देश अब पाकिस्तान बन गया है तो क्या यह यहां रह सकती है? तो मौलवी यही कहता है कि इस पूरी धरती को भगवान ने बनाया है, अल्लाह ने बनाया है., मनुष्य को भी उसी ने बनाया है तो हमें क्या अधिकार है कि हम यह कह सकंे कि भगवान की बनाई सृष्टि में भगवान का बनाया हुआ कोई व्यक्ति कहीं रह सकता है या नहीं रह सकता। तो इस तरह से धर्म का एक ऐसा स्वरूप जो कि मानवतावादी है वह इस नाटक में सामने आया. और फिर यह आगे बढ़ता गया।  

सवाल: जब आप ऐसे एक नाटक लिखते हैं तो नाटक के चरित्रों और घटनाओं की रूपरेखा  किस तरह बनाते हैं ? 

जवाब: इसके लिए बहुत ज़रूरी है कि आपके अनुभव व्यापक हों,  जैसे मान लीजिए यह नाटक लिखने से पहले मैंने पार्टीशन के ऊपर जो किताबें पढ़ी तो एक किताब से मुझे एक बिंदु मिला, दूसरी किताब से दूसरी चीज़ मिली। एक किताब में एक पात्र मिला जो पाकिस्तान गया था रियल लाइफ कैरेक्टर है और वह पूरे जीवन यह समझने की कोशिश करता रहा कि विभाजन क्यों हुआ ? क्या आधार था ? उसके समझ नहीं आता कि यहां भी यही भाषा वहां भी यही भाषा, यहां का भी यही कल्चर वहां का भी यही कल्चर. तो कहने का मतलब यह है कि जब आपको एक कथा सूत्र मिल जाता है तो उस कथा सूत्र को फैलाने के लिए अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है. जैसे-जैसे आप का अध्ययन बढ़ता जाता है वैसे-वैसे उस कथा सूत्र में चीज़ें आगे जुड़ती जाती है और उसका विस्तार होता जाता है.

सवाल: आप अपने लेखन में मुहावरों या लोकोत्तियों का इस्तेमाल करते हैं। आज जो साहित्य लिखा जा रहा है उसमें जिस तरह की भाषा इस्तेमाल हो रही है. भाषा में आये बदलाव पर आपकी क्या राय है ?

जवाब: बदलाव तो हमेशा से आते रहे हैं और आते रहेंगे। अब सवाल यह भी देखने का है कि वह कितने प्रभावशाली हैं ? क्या उनसे भाषा हमारी सक्षम हो रही है, उसके अंदर नये  शब्द आ रहे हैं या उसके अंदर नई अभिव्यक्ति आ आ रही है कि नहीं आ रही ? बदलाव जो  पॉजिटिव है तो उनका स्वागत होना चाहिए और अगर वह पॉजिटिव नहीं है तो उसके बारे में चर्चा होनी चाहिए कि क्या किया जाए ? आप देखिए  इतनी बड़ी भाषा है अंग्रेज़ी, उसके अगर आप 10 शब्द निकालिए तो उसमें से पांच आपको दूसरी भाषा के मिलेंगे जैसे फ्रेंच के मिलेंगे, जर्मन के मिलेंगे या इटालियन के मिलेंगे। अंग्रेज़ी मुल्कों ने उन्हें स्वीकार किया, अपनी भाषा को बढ़ाया और विस्तार दिया. तो भाषा को विस्तार देना बहुत ज़रूरी है और भाषा को संकुचित बनाना, भाषा को मार देना जैसा है .

सवाल: आज सहित्य का सामने जो बड़ी चुनौती है वो ये कि पाठकों की संख्या घट रही है. किताबें कम बिक रही हैं. इसके लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं ?

जवाब: साहित्य को नुक्सान हो रहा है चूंकि पाठक कम हो रहे हैं, यह मूल वज़ह नहीं है। आप मुझे बता दो कि हिंदी का ऐसा कौन सा प्रकाशक है जो नुकसान में है या बंद हो गया है। हिंदी में जिन्होंने 10 साल पहले प्रकाशन शुरू किया था, उनका प्रकाशन आज बहुत ऊंचा हो गया है। अगर किताबें भी लोगों ने खरीदी नहीं तो कहां से प्रकाशन चला। हिंदी में मुझे किसी ने बताया कि हर रोज़ 5000 किताबें छपती है।  5000 किताबें कहीं न कहीं तो जाती होंगी, गोदामों में तो पढ़ी नहीं रहती होंगी। दूसरी बात यह है कि जो किताब जिस तरीके का  आप को साहित्य दिया करती थी, उस कमी को पॉपुलर लिटरेचर या मीडिया पूरी कर रहा है. 

सवाल:  सुरेन्द्र मोहन पाठक ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था की सीरियस साहित्य की अपेक्षा  पॉपुलर साहित्य की किताबें अधिक बिकती हैं. इस पर आपका क्या दृष्टिकोण हैं ? 

जवाब: पॉपुलर साहित्य बनाम सीरियस साहित्य। आप पॉपुलर साहित्य की कोई किताब मुझे ऐसी बताएं जो सबसे अधिक बिकी हो। मान लीजिए गुलशन नंदा का एक उपन्यास कितना बिका होगा 5,00,000 या 10,000,00 और फिर बिकना बंद हो गया होगा। अब आप देखिए गोदान प्रेमचंद का 1936 से लेकर हर साल हजारों में छपता है और आज भी छपा चले जा रहा है, वह बंद नहीं हो रहा। गंभीर साहित्य जो न केवल संख्या में अधिक होता है बल्कि उसकी लाइफ भी ज्यादा होती है। सीरियस लिटरेचर जो है, वह हमेशा पॉपुलर लिटरेचर से आगे होगा. पॉपुलर लिटरेचर जो है एक सीडी है जो ज़रूरी है लोगों को साहित्य की तरफ़ आकर्षित करने के लिए। लेकिन पॉपुलर लिटरेचर को ही महत्वपूर्ण मान लेना वह ज़रूरी नहीं है।

सवाल: यह सोशल मीडिया का ज़माना है। लोग फेसबुक या ट्विटर पर अपनी रचनाएं लिखते हैं। सोशल मीडिया पर जो साहित्य है इसे आप साहित्य के लिए सही मानते हैं या गलत ?

जवाब: जब टेक्नोलॉजी कोई नई आती है तो प्रारंभ में यह आप बिल्कुल नहीं कह सकते कि इससे आगे चलकर क्या होगा। लेकिन अनुभव यह बताता है कि टेक्नोलॉजी की प्रगति ने हमेशा चीज़ को बढ़ाया है जैसे जब प्रिंटिंग प्रेस आया तो लोग डर गए कि अब क्या होगा ? साहित्य तो लिखा जाता था और लिखी हुई किताबें चलती थी, पर अब छप रही है, लेकिन आप जानती हैं कि उस टेक्नोलॉजी ने साहित्य की एक क्रांति ला दी. लेकिन समय हमेशा बदलता रहा है आप ऐसा नहीं कह सकते कि छपी हुई किताब हमेशा चलेगी. एक समय आएगा कि यह कम होगी और ज्यादा लोग जो है वो डिजिटल पढ़ना चाहेंगे। इसी तरह से जो आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या सोशल मीडिया है ये शुरुआत है और इससे आगे चलकर क्या होगा कह नहीं सकते।

सवाल:  हर लेखक चाहता है कि उसकी किताब बेस्ट सेलर हो, सफल लेखक बनने के लिए बेस्ट-सेलर का तमगा कितना आवश्यक है ?

जवाब: बेस्टसेलर किताबें तो लेखक से ज्यादा प्रकाशक को चाहिए। लेखक तो पीछे रह जाता है लेकिन एक प्रकाशक किताब को बेस्ट सेलर बनाता है क्यूंकि ये उसका व्यवसाय है और उसको व्यवसाय में फायदा होता है। हर दुकानदार कहता है कि मेरा सामान सबसे अच्छा है, कौन होगा जो यह कहेगा कि नहीं जी मेरा सामान अच्छा नहीं है। अब यह तो खरीदने वाले पर है कि वह देखे किसका समान अच्छा है, किताब को बेस्टसेलर बनाने में  लेखक रुचि लेते हैं क्योंकि थोड़ा बहुत लाभ तो लेखकों को भी जाता है। अच्छे साहित्य और बेस्टसेलर साहित्य में वही फर्क है जो गुलशन नंदा के उपन्यास और प्रेमचंद के गोदान में है।   इसलिए यह मानना कि वह बेस्ट सेलर हो गया तो बहुत अच्छा होगा, इसका कोई मतलब नहीं है।

सवाल:  आपने फिल्मों के लिए भी पटकथा लिखीं हैं, फिल्मों की पटकथा लेखन और साहित्य लेखन में कितना अंतर होता है ?

जवाब: बहुत अंतर होता है क्योंकि दोनों मीडियम अलग है। फिल्म जो है वह ऑडियो-वीडियो मीडियम हैं और इस मीडियम की अपनी लिमिटेशंस होती है। फिल्में विजुअलिटी की लिबर्टी नहीं देती. जैसे मैं एक मिसाल दूं आपको कि आपने कहीं लिखा हुआ पढ़ा कि वहां पर एक बाग था और आपको विजुअल में एक गार्डन दिखाई दिया. तो जो आपको विजुअल में गार्डन दिखाई दिया उसने आपको लिमिट कर दिया उसी गार्डन तक.  लेकिन जब आपने बाग शब्द को पढ़ा तो आपने इमेजिन किया कि अच्छा गार्डन क्या होगा ? तो अब आपके सामने जो होगा वो आपकी पसंद का गार्डन होगा। शब्द जो है वह आपको लिबर्टी देता है और विजुअल जो है वह आपको बांधता है। वीडियो एक तरीके से सरल होता है जो लोग सोचना नहीं चाहते। सिनेमा की रिक्वायरमेंट अलग है और राइटिंग के रिक्वायरमेंट अलग है। दोनों माध्यम अलग हैं इसीलिए दोनों के लिखने में काफी फर्क है।

सवाल:  एक बेहतरीन रचना तैयार करने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ? 

जवाब: यह बात तय है कि जो काम आप कर रहे हैं, उस काम में अगर पूरा इंवॉल्वमेंटनहीं होगा तो काम अच्छा नहीं हो पाएगा, जितना ज्यादा इंवॉल्वमेंट होगा उतना ही काम ज्यादा अच्छा होगा। चाहे फिल्म हो या राइटिंग हो या म्यूजिक हो या वह पेंटिंग हो,  जितना ज्यादा करने वाला उसके अंदर डूबेगा, जितना उसको महसूस करेगा और टाइम देगा, उसको उतना ज्यादा अच्छा रिजल्ट मिलेगा। आपको मालूम है एक राइटर थीं कुर्रतुल ऐन हैदर जिनका उपन्यास है ना आग का दरिया, तो वह अपने घर में अकेली रहती थी और उनके दिमाग में उसकी राइटिंग के अलावा कुछ और नहीं रहता था. वो छोटे-छोटे कागज़ों पर शब्द लिख लेतीं थीं फिर उस शब्द को उस जगह पर चिपका लेतीं थी जहां उसकी आवश्यकता पड सकती है. जितना ज्यादा एक राइटर इंवॉल्व होगा उसकी राइटिंग में उतना अच्छा रिजल्ट होगा।

सवाल: आजकल सम्मान समारोह बहुत आयोजित होने लगे हैं. लेकिन कहीं न कहीं इस सम्मानों की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठते रहते हैं। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे ? 

उत्तर: देखो एक साइकेट्रिस्ट है पाकिस्तान के मुश्ताक अहमद युसूफ उनका कहना है कि “झूठ बोलने वाला और सुनने वाला दोनों जानते हो कि यह झूठ है तो उसे फिर झूठ नहीं मानेंगे”. अवार्ड के मामले में, मैं नहीं कहता कि सब अवार्ड ग़लत है. चूंकि मैं बड़ी-बड़ी बोर्ड कमिटी में रहा हूं तो वहां क्या होता है यह मुझे मालूम है. मैं ये नहीं कह सकता सब ग़लत होता है लेकिन ये भी नहीं कह सकता कि सब सही होता है। सबसे बड़ा अवार्ड लेखक को दूसरे तरीकों से मिलता है जैसे मैं आपको एक एग्जांपल दूं। अभी तीन-चार दिन पहले मेरे पास एक फोन आया तो कोई बच्चा बोल रहा था, बच्चे की आवाज थी तो मैं समझ गया कि उसने अपने फादर का फोन लेकर नंबर मिलाया है। तो मैंने उससे पूछा कि किससे बात करनी है? तो कहने लगा आप ही से बात करनी है, मैंने कहा भाई कौन हो तुम ? तो कहने लगा, ‘मैं सिक्स क्लास में पढ़ता हूं और आपकी एक किताब मैंने पढ़ी, मुझे बहुत अच्छी लगी”. इस तरह चीज़ें राइटर को ज्यादा सेटिस्फेक्शन देती है बजाय इसके कि कोई अवार्ड मिल जाए। तो कहने का मतलब यह है कि अवार्ड से ज्यादा एप्रिसिएशन ज़रूरी है.

सवाल: आपने बहुत से देशों की यात्रा की है, विदेशों में साहित्य को लेकर कैसा वातावरण है ?

उत्तर: जिस देश में पढ़ाई लिखाई ज्यादा होगी, उस देश में लोगों के अच्छे संस्कार बनेंगे, उन देशों में साहित्यकार या कलाकार के सम्मान का तरीका ही अलग है। जैसे मैं आपको बताऊं कि एक देश है ऑस्ट्रिया। ऑस्ट्रिया के नोटों के ऊपर एक म्यूजिक कंपोजर की फोटो छपती है। उनका यह मानना है कि कलाकार से ज्यादा कोई और समाज को कोई कुछ दे नहीं सकता। जैसे म्यूजिक कंपोजर तो मर गया, 200 साल हो गए लेकिन उसका म्यूजिक जो है, वह अब तक लोगों को कुछ दे रहा है. कोई भी रचना जो है वह मरती नहीं है. मैं नहीं रहूंगा तो ऐसा नहीं है कि मेरी रचा कुछ नहीं रहेगा। तो जो समाज जैसा होता है, वह अपने  कलाकारों का वैसा सम्मान करता है.

सवाल: आजकल आप क्या नया लिख रहे हैं ?

जवाब: बहुत सी है चीज़ें हैं जो चलती रहतीं हैं। एक दो प्ले हैं जिन पर काम चल रहा है. साथ ही राजकुमार संतोषी ने मेरे नाटक गोडसे एट गांधी डॉट कॉम पर एक फिल्म बनायीं है. फिल्म अभी रिलीज़ नहीं की है क्यूंकि सिनेमा हॉल खुले नहीं है। दूसरा मेरे नाटक ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जम्याई नई’ पर भी फिल्म बन रही है.  

सवाल: नवोदित रचनाकारों को क्या सन्देश देना चाहेंगे ?

जवाब: देखिए दो बातें हैं एक बात तो यह होती है कि जो एक्सपीरियंस है समाज का वह

होना चाहिए। एक सी जिं़दगी जीते हुए कि सुबह उठे ऑफिस गए  और ऑफिस से शाम को घर आ गए तो क्या अनुभव होगा। अनुभवों के लिए समाज को अनुभव कीजिये। दूसरा एक्सपीरियंस का तरीका है रीडिंग यानि पढ़ना.  अगर आप पढ़ेंगे तो आपको दूसरों के अनुभवों को जानने का अवसर प्राप्त होगा.

( गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2021 अंक में प्रकाशित )