बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

 पुष्पिता अवस्थी की कहानियों में सांस्कृतिक गरिमा

                                                                  - डॉ. सरोज सिंह

   प्रो. पुष्पिता अवस्थी का कथा साहित्य मनुष्यता की पहचान का साहित्य है। पुष्पिता जी विश्व के भारतवासियों और प्रवासी भारतीय साहित्य की प्रखर उद्घोषिका हैं। वह निरंतर विश्व के अमर इंडिया और भारत के आदिवासियों के जीवन की समानधर्मिता पर अध्ययनरत रही हैं। इनकी समकालीन कहानी कहीं पर संवेदना बचा रही है, तो कहीं उसे कुंद भी बना रही है। वैचारिकता के निकट आ रही है, भावनात्मकता के परे होकर पाठकों से दूर होती जा रही है। कहीं उलझे हुए यथार्थ को पकड़ रही है। प्रयोगशील होने के साथ भाषिक रूप समृद्ध हुई है। कहानी जब समय की रवानी से मिलती है, तो ज़िन्दगी बनकर खिलती हैै। पुष्पिता अवस्थी की कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा ही महसूस होता है। ‘कंत्राकी बागान और अन्य कहानियां’ कहानी संग्रह लेखिका पुष्पिता अवस्थी द्वारा 1987 से लेकर 2017 तक लिखी गई कहानियों का संकलन है। जिसमें तीन दशकों का इतिहास है। इन कहानियों के भारत से यूरोप होते हुए कैरेबियाई देशों की सौंधी-सौंधी सुगंध, प्रकृति, नैसार्गिक सुषमा और संस्कृत अस्मिता दृष्टिगोरचार होती है। लेखिका स्वयं कहती है कि इन कहानियों में पृथ्वी के तीन महाद्वीपों की कथाएं, बल्कि मनुष्य के मनमानष के तीनों की चिंताएं भी वर्णित हैं।

 प्रो. पुष्पिता अवस्थी

कंट्रॉक्ट का अपभ्रंश रूप कंत्राकी है। कहानी संग्रह का इसी नाम से शीर्षक ही रोचकता और जिज्ञासा जगृत करता है। जो कथा तत्व की विशेषता है। विश्व के पूर्वी देशों में क्लोनाइजरों द्वारा एग्रीमेंट के तहत हिन्दुस्तानियों को सूरीनाम, ब्रिटिश गयाना, फ्रेंच गयाना, ट्रिनिडाड ट्बैको और अन्य कैरेबियाई देश-द्वीपों में ले जाया गया, उन्हें आधार बनाकर कहानी-संग्रह की विश्व वस्तु को पिरोया गया हैै। पुष्पिता जी के इस कहानी संग्रह में ‘गोखरू’ शीर्षक अंतर्गत नौ कहानियां, जन्म के अंतर्गत आठ कहानियां और कंत्राकी बगान के अंतर्गत सात कहानियां हैं। तीन शीर्षक ही नहीं, तीन दशकों का पूरा परिवेश और घटनाओं का संयाजन कहानी संग्रह का मर्म यह स्पष्ट करता है कि संपूर्ण विश्व संस्कृति की अस्मिता एक ही है। संस्कृतियों के विविधता के बावजूद मनुष्यता कायम है। उधन्नी कहानी मंें वे लिखती हैं-‘ बच्चे का भाग्य मां और उसकी कोख नहीं, जन्मभूमि-जन्मभूमि सुनिश्चित करती है।’ प्रेम का स्वरूप और प्रवाह भी सवत्र विद्यामान है। हर संस्कृति और देश मेे समस्त प्राणी इससे प्रभावित होते हैं। ‘प्रातः तब द्वार पर’ कहानी में यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। ‘इसीलिए तो प्रेम से जीना चाहिए और प्रेम को हासिल करना चाहिए। प्रेम का सुख अगर देखा जाए तो जीवन का ही सुख नहीं है, मृत्यु पर विजय की घोषणा भी है।’

 ‘कंत्राकी बगान और अन्य कहानियां’ कहानी संग्रह की अनेक कहानियां नारी हृदय की मनोभावनाओं का बडा ही सटीक और सजीव अंकन करती है। घरेलू महिला हो अधिकारी, पढ़ी-लिखी हो अनपढ़, विवाहित हो या अविवाहिता, नवयुवती हो प्रौढ़, सभी स्थितियों को रेखांकन इनकी कहानियों में सजहता से दृष्टिगोचर होता है। ‘गोखरू’ केवल पांव में तलवे की छोटी-छोटी गांठे ही नहीं होती, बल्कि आत्मा में व्यथा और पीड़ा से उग आए गोखरू भी होते हैं, जिनसे घाव रिसता रहता है। ‘गोखरू’ कहानी में विलायत में पढ़ने वाला बेटा स्वत: अपना विवाह भी तय कर लेता है। मां ने कितने जतन करके पढ़ने भेजा। पिता की रही-सही पूंजी उस पर लुटा दी, किन्तु बेटे को मां की बेबसी, पीड़ा और बेचारगी महसूस ही नहीं होती। कहानी का प्रमुख पात्र कादम्बरी सोचती है-‘मुहताज है तो सिर्फ़ मां, लेकिन उसकी तड़प भरी ज़रूरत बेटे तक पहुंचे तब न ? घर देश से क्या दूर हो जाते हैं। लड़के बच्चे मां की छाती से भी दूर जा छिटकते हैं। मां ेकी छाती का सुनापन वे क्या जाने, ठठाता सागर कहीं द्वीप का सन्नाटा समझ पाता है। कलेजे के टुकड़े-सी संतान के दूर निकल जाने पर खोखल हो जाती है मां की छाती।’


 पुष्पिता जी बहुत ही संवदेनशील कथाकार हैं। ‘ठंडे बस्ते में पिघलता लावा’ कहानी में सुधा और कावेरी के माध्यम से उन्होंने स्त्री मन की उत्पीड़न एवं सराक्त दोनों चेतना के माध्यम उसके अंर्तमन और सामजित निर्मिति को भी सहजता से व्यक्त किया है। इस कहानी में सुधा उच्च पदस्थ  सरकारी अधिकारी हैं, उसने कभी भी स़्त्री होने का लाभ नहीं लिया। किंतु उसकी मृत्यु के उपरांत उस पर तमाम लांछन लगाए जाते हैं। मौत का कारण भी ‘स्त्री होना’ घोषित होता है, तो उसकी मित्र कावेरी को बहुत दुख होता है। सुधा की बातें उसे व्यथित करती है। पारिवारिक जीवन की विफलता, सरकारी नौकरी की सफलता के बीच भी नारी की नियति उसे हमेशा परेशान किए रहती है। आधुनिक समय में मनुष्य झंझावतों से जूझता जा रहा है। उन सभी का अंकन कहानियों में दृष्टिगोचार होता है। ‘कजरोटा’ जैसे लुप्त प्रायः तत्व और शब्द को लेकर लिखी गई उनकी कहानियां बहुत जीवंत हैं। कहानियां विषय-वैविध्य की दृष्टि से ही नहीं मानवीय संवेदना से युक्त है, जो पाठक को कहानी पढ़ने हेतु आकृष्ट करती है। उसकी भाषा में सहजता के साथ ही भाव गांभीर्य भी विद्वमान है। स़्त्री ही स्त्री मन के उद्वेग, पीड़ा, रहस्य और संत्रास को समझ सकती है। इस संग्रह की अधिकांश कहानियां स्त्री जीवन पर ही आधारित हैं। वे लिखती हैं-‘हर पुरूष स्त्री को अपने सांचे में ढालने का प्रयास करता है, जैसे वह सिर्फ़ मीडियम है, आदमी ही उसका सांचा है। इसमें उसे ढलना ही होगा, इसके बगैर ज़िन्दगी नहीं या वह जिन्दा नहीं रह सकती है या उसे जिन्दा नहीं रहने दिया जाता। पिता के घर में पिता का सांचा, पति के घर में उसका सांचा। क्या बिना बंधन के, रिश्तों के नाम के, पुरूष, अपने पुरूष प्रधान समाज के छल-प्रपंच के विरूद्ध उसका सहारा.... वास्विक अवलंब नहीं बन सकता।....मानवीय संबंधों के आधार पर।’

एजेक्स फुटबाल टीम कोच फ्रैंक डी बोयर के साथ पुष्पिता अवस्थी।

 पुष्पिता अवस्थी की कहानियों में पानी सी सरलता की साथ अपने की खुश्बू भी विद्यमान है। उन्होंने उपनिवेश की बस्तियों तथा गिरिमिटिया लोगों के दर्द को समझा, उन पर शोध करते हुए इस कहानी संग्रह ‘कंत्राकी बागान और अन्य कहानियां’ की विषय-वस्तु और परिवेश का चयन कर बड़ी आत्मीयता से लिखा। ‘मुट्ठी भर सुख’, अधर्म, अधर्म, भ्रम’ ‘जन्म’ जैसी कहानियां बहुत उत्कृष्ट करती हैं। मुट्ठीभर सुख कहानी में सूरीनाम में हिन्दू भारतवंशी सनातनी और आर्य समाजियों की स्थिति को व्यक्त किया गया है। उसने सनातन धर्म के विष्णु मंदिर में स्थित कार्यालय में देखा कि आर्य दिवाकर कार्यालय और मंदिर भी इसी सीध में अगली सड़क पर है और वह भी दिखाई देता है। दोनों भवनों का शीर्ष ंिसंदूरी रंग से रंजित है। भक्त दोनों भवनों के भीतर ईश्वर में विश्वास और आस्था से जाते हैं। प्रार्थना करते हैं....ध्यान लगाते हैं। फिर वह आर्य समाजी और सनातनी में क्यों बंटे हुए हैं। भारत में रहते हुए काव्यकुंज ब्राह्मण परिवार में पैदा होते हुए उसने कभी नहीं जाना कि वह सनातनी है या आर्य समाजी। लेकिन सूरीनाम जाकर उसे यह सब जानना पड़ा था। ‘इनिका’ कहानी में बेटी इनिका मां की स्मृतियों के जरिए अपना मार्ग तलाशती हैै तथा अपने अकेलेपन भतीं पूर्ति है। उसकी मां की स्मृतियां सदैव उसे आगाह करती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन आक्रमणकारियों के कारण बचने बचाने के क्रम में उसकी नानी किस तरह से अपने पति परिवार और भाई-बहन से अलग हो गई थी। इनिका ने अपनी मां से लोरी और परिकथाओं की जगह-अपने परिवार के भीषण संधर्ष की गाथाएं भी सुनी थी। युद्ध के दौरान कहीं से पहनने को पकड़ा मिल जाए, वहीं धन था, वही संम्पत्ति। रुपये-सिक्के देखने की कभी नौबत ही नहीं आयी। हथेलियों ने कभी रुपये के कागज की कड़क और सिक्कों की नमी ही नहीं जानी और न आंखों की चमक। सौभाग्य से मां को यह सब नसीब तो हुआ, लेकिन 1953 में उफनते समुंद्री तूफान की चपेट में दक्षिण हालैंड के साथ-साथ सी-लैंड प्रोविन्स भी समुंद्र में बह गया। समुंद्र से दो मीटर नीचे की नींदरलैंड की धरती पर कई मीटर उपर समुंद्री जल लहलहाने लगा तो इनिका अपने परिवार के साथ बेघर हो गई थी। उसने मां, पिता और भाइयों की मदद से गृहस्थी जमाई। भेड़ों और मुर्गियों का छोटा-मोटा व्यवसाय शुरू किया। परिवार का पोषण किया। इनिका के संवदेनशील मन के भीतर उसकी अपनी मां और नानी के दुख-दर्द का इतिहास है। जो विश्व इतिहास और वैश्विक युद्धों के समकालीन है।

1976 में आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की तरफ से रनर शील्ड विजेता पुष्पिता अवस्थी।

 इसी तरह ‘अधर्म’ कहानी भी पूरी दुनिया में व्याप्त धार्मिक मद्ध्यन्ता को दर्शाती है। सत्ता और हुकूमत के कारण यह व्याप्त होता जा रहा है। भारत के हिन्दूवादी सत्ताधारी लोग यह नहीं समझ पा रहे कि उनकी अपनी तथाकथिक धारणाओं के कारण पूरे विश्व में हिन्दू के अस्तित्व और धर्म की अस्मिता संकट में है। नीदरलैंड और सूरीनाम की स्थिति-परिस्थिति को दर्शाने वाली कहानियों वैश्विक परिदृश्यों को व्यक्त करने वाली है। 18वीं, 19वीं सदी के आसपास हालैंड अंग्रेज़ों के हुकूमततले मानव श्रमिक के दलालों ने एशियन देशों से मजदूरी के लिए मानव श्रमिकों का व्यसाय किया। अकरकाठियों ने नौकरी, मजदूरी के लोभ ने उन्हें फंसाकर उन सबकी मातृभूमि और जीवन को छीना। जलरस्युओं की तरह समुंद्री द्वीपों और देशों में जनशक्ति छिनौती करते रहे। महंगाई और उपभोग की चाहतों ने इंसान को पागल कर दिया है। ‘रिया’ शीर्षक कहानी में पुष्पिता जी ने सूरीनाम के सामाजिक परिवेश को गंभीरता से व्यक्त किया है। विक्टोरिया प्लांटेश कंत्राकी बगान शीर्षक कहानी प्लांटेशनकी यादों का एक क्रबगाह भर है-जंगल का महाश्माशान। विडंबना तो यह है कि हमारे हिन्दुस्तानी पुरखों ने कठोर और निर्दयी मजूदरी की उनकी दूरदर्शा का बयान है। भारतीय हेाने का गौरव एवं अपने देशवासियों के प्रति होने वाले कष्टों का आख्यान भी इन कहानियों में मिलता है।

पुष्पिता जी की कहानियों में एक साथ रिपोर्ताज, संस्मरण और रेखाचित्र जैसी विधाएं भी अपनी झलक दिखलाती है। इतने लंबे समय और विशाल कलेवर को समेटे इनका कहानी संग्रह विषय वैविध्य, भाषा वैविध्य, परिस्थिति वैविध्य, घटना विविध्य को अपन कथावस्तु में समाहित किए हुए है। रोचकता, प्रवाहमयता और गतिशीलता कथा को पठनीय बनाते हैं। भारतीय परिवेश के साथ विश्व के प्रमुख देशों के पर्यावरीय परिदृश्य के साथ संस्कृति गौरव और आसमता इस कहानी संग्रह बीच तत्व है। 


(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित )

बुधवार, 28 जनवरी 2026

भोजपत्र: सगुण एवं निर्गुण का संधिपत्र

                                                             - डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी 

                                                              सह-आचार्य, हिंदी विभाग 

                                                             क्वान्ग्तोंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, चीन

‘काव्य’- मानव ह्रदय से करुणा की कल कलनिःसरित अविरल धारा है। ‘काव्य’ अर्पण, दर्पण, समर्पण की प्रतिध्वनि है। काव्य मनुष्य के ह्रदय, मन तथा प्रज्ञा का वह संतुलित एवं सार्थक स्वरुप है, जिससे मानव मानव बनता है। काव्य ऐसे मनीषियों की सृष्टि है, जो संपूर्ण एवं सर्वज्ञ हो। इसलिए कवि-कर्म को काव्य संसार कहा गया है, और कवि को इस काव्य संसार का प्रजापति अर्थात स्रष्टा कहा गया है। ‘अपारे काव्य संसारे कवि एवं प्रजापति’ इस आप्त वचन के अनुसार कवि काव्य रूपी संसार का प्रजापति अर्थात स्रष्टा होता है। कवि निर्मित काव्य संसार में सहृदय जन काव्य गत चारुता एवं रसात्मक संवेदनाओं से आह्लादित होते रहते हैं, कारण कि उस सृजनात्मक सृष्टि का स्रष्टा स्वयं ही रसमय है। रस के वशीभूत होकर ही वह सृष्टि की संरचना में संलग्न हुआ है, फलतः रसमय स्रष्टा के समान ही कवि रुपी प्रजापति की संरचना भी सर्वदा रस से परिपूर्ण रहती है, इसलिए रस को काव्य की आत्मा कहा गया है- ‘रसात्मकंवाक्यंकाव्यं’



 कु धातु में अच् (इ ) प्रत्यय जोड़कर कविशब्द की व्युत्पति बतलाई गयी है। यहां ‘कु’ शब्द का अर्थ व्याप्ति एवं आकाश अर्थात सर्वज्ञता से है। अतः कवि सर्वज्ञ है, दृष्टा है। हमारी महान श्रुति कहती है-कविर्मनीषीपरिभूःस्वयंभूः। परिभूः अर्थात जो अपनी अनुभूति के लिए किसी अन्य का ऋणी न हो। वैदिक साहित्य में कवि, दृष्टा एवं ऋषि समानार्थक है। इसीलिए वेदों के प्रकाशक भगवन ब्रह्मा को आदि कवि कहा गया है। लौकिक साहित्य में विशिष्ट रमणीय शैली में काव्य की रचना करने वालों के लिए कवि शब्द प्रयुक्त किया जाता है।  

 प्रो. पुष्पिता अवस्थी जी की काव्य संग्रह ‘भोजपत्र’ वाचन करते समय कवि शब्द की परिभाषा, सार्थकता, उपयोगिता सर्वथा फलित हुई जान पड़ती है। कवयित्री द्वारा शताधिक पुष्पों से गुम्फित यह ‘भोजपत्र’ रूपी कव्यामाला प्रत्येक मानव के ह्रदय में स्थित कवि मन को श्रांत करने में पूर्णतः सिद्ध होती हुई दिखती ह।ै प्कवियित्री द्वारा अपने ह्रदय के उद्गारों को सरल भाषा व सहज रूप में पाठकों के समक्ष परोसा गया है, जिसके रसास्वादन से शायद ही कोई वंचित होना चाहेगा। संस्कृत साहित्य के आचार्य भामह ने काव्य की लक्षण बताते हुए कहा है कि शब्दार्थाैसहितौकाव्यम्  अर्थात शब्द तथा अर्थ का समन्वय काव्य है, कवयित्री ने इस ‘भोजपत्र’ काव्य संग्रह में आचार्य की इस उक्ति को इसे पूर्णतः स्थापित किया है। ‘प्रेम धुन’, ‘सुन्दरतम रहस्य’ शीर्षक से संग्रहीत कविताओं को पढ़ते समय पाठकों को आचार्य शौद्धोदनि की ‘काव्यंरसादिमद्वाक्यंश्रुतसुखविशेषकृत्’ अर्थात् जिस वाक्य में रस हों, वही ‘काव्य’ है की उक्ति की सार्थकता का अनुभव होगा।

‘काव्यस्यात्मा ध्वनि:। सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्वमेवकाव्यलक्षणम्।’ आचार्य आनंदवर्धन ने ध्वनि को काव्य की आत्मा मानते हुए कहा है कि जो सहृदय के हृदय को आह्लादित कर दे, वही काव्य है ‘सुनकर छूती हूं’, ‘अमृत अर्थ’, ‘आकाश गंगा’ शीर्षक से लिखित काव्य पुष्पों का सुगंध लेते समय पाठकपाठकों को यह उक्ति चरितार्थ होती हुई दिखेगी। आचार्य वाग्भट की उक्ति है कि ‘साधु शब्दार्थ सन्दर्भ गुणालंकारभूषितम्प्स्फुटरीतिरसोपेतंकाव्यंकुर्वीतकीर्तये।’  अर्थात श्रेष्ठ शब्दार्थ गुण एवं अलंकारों से सुसज्जित रीति एवं रस से युक्त रचना काव्य है जो कवि की कीर्ति करने वाला होता है। 



 प्रो. पुष्पिता अवस्थी जी प्रेम के देह की नहीं, विरन्तु परिपक्व प्रणय के विदेह की कवयित्री है। वे भक्ति कुल के प्रेम की कवयित्री हैं। उनका ‘तुम’ मनुष्य नहीं ईश्वर है। ईश्वर विश्व सृजन  की वैश्विक अलौकिक शक्ति है। इसलिए विश्व ह्रदय में धड़कने वाले अधिष्ठित ईश्वरी शक्ति  को, उसके प्रेम को संबोधित करती है। वे भक्ति काल की  मीरा, छायावाद की महादेवी की प्रेम कविताओं की परिपाटी का विस्तार करते हुए वैश्विक हृदय को समर्पित हार्दिक प्रेम की  कविताएं  लिखती हैं। वे विदेहीप्रणय चेतनाकी वर्षों से स्थापित कवयित्री हैं। उनकी प्रेम अभिव्यक्ति में पुरुष हृदय का प्रेम भी धड़कता है। प्रकृति के उपमाओं से संबोधित उनका प्रेम,  इसलिए ईश्वरी है, वैश्विक है। शब्दों में समाए अर्थ और अर्थ में समाए ब्रह्म और ब्रह्म में  समाए ब्रह्मांड और उसकी शक्तियों को ईश्वर का प्रारूपमानकर उसी से प्रेम करती हैं।

 वे निराकार निर्गुणकी नहीं साकार सगुण प्रणय की कवयित्री हैं। वे विराग के राग की, अनुराग के अनासक्ति की कवयित्री हैं। मीरा के सिर्फ श्रीकृष्ण थे, इनके तो ईश्वर है, ईश्वर अंश जीव अविनाशी सृष्टि है, इसलिए यह अनासक्ति की चित्त और चेतना में सिद्ध आत्मा को समर्पित प्रणयन की कवयित्री हैं। देह की आयु होती है, पर चित्त और चेतना की नहीं, इसलिए अपनी आयु की हर अवस्था में अपनी उसी प्रणय रागिनी के विभोर होकर अभोग की वे कविताएं लिखती आ रहीं हैं। इसलिए इनकी कविताओं के विश्व की कई  भाषाओं  में  अनुवाद हुए, कई देशों के दूरदर्शन में काव्य पाठ हुए, यूट्यूब  द्वारा वैश्विक स्तर पर संकलित और संग्रहित है।

         मृदुललितपदाढ्यंगूढ़शब्दार्थहीनंजनपदसुखबोध्यंयुक्तिमन्नृत्ययोज्यम्,

         बहुकृतरसमार्गंसंधिसंधानयुक्तं स भवतिशुभकाव्यंनाटकप्रेक्षकाणाम्।

आचार्य भरत मुनि ने शुभ काव्य के सात लक्षण माने हैं- 1. मृदुलालित पदावली 2. गूढ़ शब्दार्थ हीनता 3. सर्वसुगमता 4. युक्तिमता 5. नृत्य में उपयोग किये जाने की योग्यता 6. रस के अनेक स्रोतों के प्रवाहित करने के विशिष्ट गुण 7. संधियुक्तताप् आचार्य भरत मुनि द्वारा प्रस्तुत इन काव्य लक्षणों का सफल प्रयोग कवियित्री द्वारा ‘भोजपत्र’ में सर्वत्र हुआ है, यह काव्य संग्रह निश्चित ही भारतीय काव्य परम्परा की श्रीवृद्धि में अपना अद्वितीय योगदान देगा। आचार्य दंडी ने ‘इष्ट’ अर्थात चमत्कृत एवं सुंदर अर्थ से परिपूर्ण शब्दावली को काव्य कहा है। आचार्य वामन ने काव्य को दोष रहित तथा अलंकार सहित मानते हुए ‘सौंदर्य’ को अलंकार कहा है-सौन्दर्यमअलंकारः। ‘रीतिरात्माकाव्यस्य’ में आचार्य वामन जब रीति को काव्य की आत्मा मानते हैं तथा शब्दार्थ को काव्य का शरीर कहते हैं। आचार्य आनंदवर्धन ने उपरोक्त लक्षणों से अलग मार्ग का अनुसरण करते हुए ध्वनि सिद्धांत की स्थापना है तथा ध्वन्यार्थ  (ध्वनि के अर्थ) को ही काव्य की आत्मा कहा है -काव्यस्यात्मा ध्वनिः। सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्वमेवकाव्यलक्षणम्। (‘ध्वन्यालोक’- प्रथम उद्योत)

आचार्य कुंतक ने वक्र अर्थात टेढ़ी उक्ति को काव्य कहा है- शब्दार्थाैसहितौवक्रकविव्यापारशालिनी। 

बंधे व्यवस्थितौकाव्यंतद्विदाह्लादकारिणी।’ (वक्रोक्तिजीवितम् 1/7)



संस्कृत वांग्मय के विभिन्न आचार्यों ने काव्य के जो अलग अलग एवं आवश्यक लक्षण बताए हैं। प्रो. पुष्पिता अवस्थी जी द्वारा रचित इस काव्य संग्रह में अलग अलग स्थानों पर मुखर रूप से ध्वनित हुआ हुआ है। पंडितराज जगन्नाथ के अनुसार ‘रमणीयार्थप्रतिपादकःशब्दःकाव्यम्’ अर्थात् रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द ही काव्य है। यहां रमणीय का अर्थ रसात्मकता है। आचार्य जगन्नाथ की दृष्टि से काव्यत्व शब्द में निहित होता है न कि सम्पूर्ण वाक्य में। इस काव्य संग्रह में पाठकों को सर्वत्र ही काव्य रस का आनंद प्राप्त होगा। हिंदी साहित्य के आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-‘जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्थाज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्थारसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आयी है, उसे कविता कहते हैं।’  ‘भोजपत्र’ पाठकों को न केवल कवियत्री की आत्मा के ज्ञानदशा से परिचित कराएगी बल्कि कवियित्री की ह्रदय के रसदशा का पान भी कराएगी। प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने इस काव्य संग्रह के माध्यम से न केवल मानव जीवन के राग को झंकृत करने वाले काव्यों का संकलन किया है, बल्कि मानवीय ह्रदय, चित, बुद्धि आदि के विभिन्न पक्षों का भारतीय दर्शन की कसौटी पर कसते हुए, सरल एवं सहज भाषा में प्रस्तुत करते हुए, हमारे महान काव्यशास्त्रीयों की विरासत को नए युग में नए अर्थ को समाहित करते हुए, नव पीढ़ी को आशीर्वाद स्वरुप प्रदान की है-

               एकान्तिक मौन विलाप 

               सुदूर होकर भी 

               अपने धडकनों के भीतर 

               महसूस किया है- उसे 

               जैसे-

               नदी 

               जीती है - अपने भीतर 

               पूर्णिमा का चांद 

               दीपित सूर्य 

               झिलमिलाते सितारे 

 ‘ऋतुओं की हवाएं’ शीर्षक से कविता में प्रयुक्त इन काव्य बिंबों में कवियित्री द्वारा मानवीय मनः स्थिति का अत्यंत ही मर्मस्पर्शी चित्र प्रस्तुत किया गया है। इसमें न कोई शब्द भण्डार का अधिक क्लिष्ट रूप हगे न कोई चमत्कार, कवियित्री ने सरल शब्दों में मानवीय हृदय का जो रूप प्रस्तुत किया है, वह न केवल हमारे ह्रदय को छूता है बल्कि हमें एक नए अर्थ से साक्षात्कार कराता है।

            प्रेम आंखों में खुलता और खुलता है 

            दृष्टि बनकर रहता है-आंख में 

            प्रेम रचता है- प्रेम 

            सारे विरोधों के बावजूद।

‘प्रेम’ शीर्षक से कविता में प्रयुक्त उक्त काव्य बिंबो के माध्यम कवयित्री ने मानवीय जीवन के प्राण तत्त्व प्रेम को सरल भाषा में सहज रूप से चित्रित किया है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में मानव समाज को प्रेम की नितांत आवश्यकता है।

                 कोमल शब्द 

                 अजन्मे शिशु की तरह 

                 क्रीड़ा करते हैं 

                 संवेदनाओं के वक्ष भीतर 

                और भर देते हैं-सर्वस्व को अनाम ही 

‘आत्मीयता’ शीर्षक से कविता में प्रयुक्तबिंबों के माध्यम से कवियित्रीमानवीय संवेदना का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है।

 महावीर प्रसाद द्विवेदी का कथन है-‘अन्तः करण की वृतियों के चित्र का नाम कविता है।’ भोजपत्र काव्य संग्रह में संग्रहीत कविताएं न केवल मानव के अधीर मन को श्रांत करने में सक्षम हैं, साथ ही प्रेम रूपी शाश्वत सत्य की जन जन में प्रसार करने में भी पूर्णतः सक्षम हैं। सनातन ग्रंथों के अध्यात्म के ज्ञान का सार इस काव्य संग्रह के माध्यम से कवयित्री द्वारा सरल भाषा में पाठकों के समक्ष पहुंचाया गया है। काव्य संग्रह में संगृहीत कविताएं चिताकर्षक तथा हृदयस्पर्शी हैं। विविध भावभंगिमाओं से युक्त रमणीय पदावलियां प्रशंसनीय तथा प्रेरणास्पद है। काव्य रत्न रूपी इस काव्य सरिता से प्रवाहित विविध भाव- त्रसरणियों से निःसरितभावतरंगिणीयां मानव ह्रदय को बलात आकर्षित करने में भी सर्वथा समर्थ है। कवयित्री की यह कृति निश्चित रूप से उनकी कीर्ति में वृद्धि करेगी तथा पाठकवृन्द के ह्रदय को आह्लादित करते हुए उन्हें मानवता, राष्ट्रीयता, प्रेम, अध्यात्म, सनातन धर्म के मार्ग पर चलने को प्रेरित करेगा।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

 लक्ष्मीकांत वर्मा ने स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन नहीं लिया

बहुओं को बेटियों की तरह मानते थे, सर पर पल्लू  रखने पर था ऐतराज

                                                                    - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

  लक्ष्मीकांत वर्मा जी का जीवन वास्तविक रूप में लोहियावादी था। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिए थे, लेकिन इसका पेंशन लेने से उन्होंने यह कहते हुए इंकार कर दिया था ‘‘आज़ादी की लड़ाई पेंशन पाने के लिए नहीं लड़ा।’’ युवाओं से उनको बहुत स्नेह था, नए लिखने वालों को खूब प्रोत्साहित करते थे। उनकी बहू मंजुलता वर्मा का कहना है कि ‘‘जब मैं ब्याहकर इस घर में आयी तो बाबू जी मुझे बिल्कुल बेटी की तरह स्नेह करने लगे थे। उन्होंने सर पर पल्लू रखने से भी साफ़ मना कर दिया था। उनका आदेश था कि जैसे मेरी बेटियां रहती हैं, उसी तरह तुम भी इस घर में रहो।’’  

लक्ष्मीकांत वर्मा

मंजुलता वर्मा बताती हैं कि मैं घर का काम-काज करने के साथ ही एक कंपनी में नौकरी भी करती थी। आमतौर पर लोगों की घारणा है कि काम-काजी बहुएं घर के काम में ध्यान नहीं देतीं। इसी धारणा की वजह से वे मेरे हर काम को बहुत घ्यान से देखते रहते थे। एक बार चौका-चूल्हा का काम करने के बाद सारी चीज़ें समेट कर ठीक ढंग से रख रही थी, वे बहुत ध्यान से देख रहे थे। जब मैंने सबकुछ समेटकर ठीक ढंग से रख दिया, तो उन्होंने मेरी सासु मां को बुलाकर दिखाया। उनसे खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा कि-देखो सारा काम कितना अच्छे ढंग से करती है।

लक्ष्मीकांत वर्मा और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मोतीलात वोरा।

लक्ष्मीकांत के पौत्र श्लोक रंजन बताते हैं कि मेरे दादाजी मेरे मित्र की तरह थे। हर चीज़ को प्रैक्टिकली लेते थे। उनका मानना था कि एक बार में एक ही काम पर पूरा ध्यान देना चाहिए। अक्सर ही मैं उनके साथ बैठकर टीवी पर क्रिकेट मैच देखा करता था। मैं कक्षा चार का छात्र था। 1999 के वर्ल्ड कप में भारत का महत्वपूर्ण मैच था, उसी दिन मेरी परीक्षा थी। मेरा मन क्रिकेट मैच की तरफ था। उनको इसका आभास हो गया तो उन्होंने मेरी परीक्षा छुड़वा दी और कहा कि जब तुम्हारा मन क्रिकेट मैच की तरफ है तो फिर मैच ही देखो। श्लोक ने परीक्षा छोड़ दी और दादाजी के साथ बैठकर टीवी पर पूरा मैच देखा। लक्ष्मीकांत जी का कहना था कि जो चीज़ तुम्हें पसंद है, वही करो। किसी के दबाव में आकर कोई काम नहीं करना चाहिए। हालांकि श्लोक बहुत ही मेधावी छात्र हैं, इन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा 84 प्रतिशत अंकों के साथ पास किया है।

लक्ष्मीकांत वर्मा की बहू मंजुलता वर्मा, पौत श्लोक रंजन, डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और शिवाजी यादव

श्लोक को बचपन से ही पेंटिंग का शौक़ है। दादाजी की पुस्तक ‘मंुशी रायज़ादा’ जब छपने लगी तो उसका कवर श्लोक से उन्होंने डिजाइन कराया। उन्होंने अपने पौत्र का उत्साहवर्धन करने के लिए यह कार्य कराया। बाद में श्लोक के बनाए हुए उसी कवर को ही प्रकाशक ने थोड़ा संशोधित करके प्रकाशित किया। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल जब विष्णुकांत शास्त्री हुए तब उन्होंने लक्ष्मीकांत वर्मा जी को बुलाकर कहा कि आप स्वतंत्रता सेनानी हैं, इसलिए आपको सरकार की तरफ से पेंशन दिया जाना है। अपने कागज़ात उपलब्ध करा दीजिए। मगर, लक्ष्मीकांत जी ने पेंशन लेने से साफ इंकार कर दिया था।

 बहू मंजुलता वर्मा बताती हैं कि जब वे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष हो गए, तब भी वे बिल्कुल ज़मीन से जुड़े रहे। जब वे इलाहाबाद आते थे, उनकी सरकारी गाड़ी घर से कुछ दूर पर ही रुक जाती थी। गार्ड और गाड़ी चालक साथ में होने के बावजूद वे स्वयं गाड़ी से उतरने के बाद पास की ही सब्जी की दुकान से सब्जी खरीदकर अपने कुर्तें के आंचल में सब्जी लेकर घर आते थे। गार्ड और गाड़ी चालक के लाख कहने पर सब्जी उन लोगों को लाने के लिए नहीं देते थे। मुलायम सिंह यादव की सरकार में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष बने थे। जब दूसरी सरकार आ गई तो इनको हटाया जाना था। नई सरकार के मुखिया ने उनसे कहा कि लोहिया की किताब को मेरे सामने पैरों से रौंद दो, तो तुम्हें हिन्दी संस्थान के अध्यक्ष पद से नहीं हटाया जाएगा। यह बात लक्ष्मीकांत जी को बहुत बुरी लगी, और उन्होंने फौरन ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और घर चले आए।

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में यश मालवीय को सम्मानित करते तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा, साथ में लक्ष्मीकांत वर्मा।

मंजुलता बताती हैं कि इसके बाद सरकार की तरफ़ से बार-बार इन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जाता रहा। अक्सर ही कोई अधिकारी घर आता। घर आकर पूरी संपत्ति और बैंक एकाउंट आदि की जांच करता, लेकिन कुछ नहीं निकलता। यह सिलसिला बहुत दिनों तक चला। एक बार उनकी मुलाकात केशरीनाथ त्रिपाठी जी से हुई, तो लक्ष्मीकांत जी ने यह बात उनसे बताई। केशरीनाथ इस पर बहुत दुःखी हुए और उन्होंने कहा कि आपने यह बात मुझे बहुत देर से बताई है। मैं देख लेता हूं, अब ऐसा नहीं होगा। इसके बाद उनकी जांच होनी बंद हो गई। मंजुलता के मुताबिक बाबू जी के निधन के बाद उनके बैंक एकाउंट में एक भी रुपया नहीं मिला, उन्होंने अपने जीते-जी अपना मकान भी नहीं बनवाया। उनके पिताजी ने जो मकान बनाया था, उसी में आज भी हमलोग रह रहे हैं। बाबूजी के मुलायम सिंह यादव से बहुत अच्छे संबंध थे, लेकिन अपने बेटों की नौकरी तक के लिए कभी भी उन्होंने मुलायम सिंह से नहीं कहा, जबकि बहुत सारे दूसरे लोगों की नौकरी उन्होंने लगवाई। अपने पुत्रों को लेकर उनका कहना था कि खुद से अपना रास्ता बनाओ, किसी के सहारे आगे नहीं बढ़ना चाहिए।

 लक्ष्मीकांत वर्मा जी का जन्म 15 फ़रवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के रुधौली तहसील के टँडौठी ग्राम में हुआ था। इन्हें हिन्दी, उर्दू , फारसी और अंग्रेजी भाषाओं की अच्छी समझ और ज्ञान था। 40 के दशक में महात्मा गांधी के आनंद भवन आगमन पर लक्ष्मीकांत जी को गांधी जी का सानिध्य प्राप्त हुआ था, जिसके बाद गांधी जी के आह्वान पर स्वतंत्रता-आंदोलन में इन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस आंदोलन में वे इतना अधिक सक्रिय हुए कि उनकी शिक्षा पर काफी प्रभाव पड़ा। फिर इसके बाद 1946 में वे राम मनोहर लोहिया के संपर्क में आ गए थे। इसके बाद वे समाजवाद से काफी प्रभावित हो गए थे। इनके जीवन में समाजवादी दर्शन के प्रति आस्था पनपी और एक वटवृक्ष का आकार ग्रहण कर गई। हिन्दी-भाषा को प्रचारित-प्रसारित करने में इनका विशिष्ट योगदान रहा है। उनका मानना था कि हिन्दी भाषा के विकास से भारतीयता का विश्व में प्रमुख स्थान बनेगा। ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’ की अनेक सर्जनात्मक योजनाओं को उन्होंने प्रभावाकारी ढंग से क्रियान्वित किया था। उन्होंने कुछ समाचार-पत्रों के लिए नियमित लेखन-कार्य भी किया। इनके कॉलम काफी लोकप्रिय और चर्चित रहे हैं। 

 इनकी कई किताबें प्रकाशित हुई थीं, जिनके नाम ‘खाली कुर्सी की आत्मा’, ‘सफेद चेहरे’, ‘तीसरा प्रसंग’, ‘मुंशी रायज़ादा’, ‘सीमान्त के बादल’, ‘अपना-अपना जूता’, ‘रोशनी एक नदी है’, ‘धुएं की लकीरें’, ‘तीसरा पक्ष’, ‘कंचन मृग’, ‘राख का स्तूप’, ‘नीली झील का सपना’, ‘नीम के फूल’, ‘नयी कविता के प्रतिमान’ आदि हैं। इन्होंने इलाहाबाद से मासिक पत्रिका ‘आज की बात’ का प्रकाशन भी शुरू किया था, जो कुछ दिनों तक बड़़ी चर्चा के साथ प्रकाशित होती रही। इन्होंने 1960 में ‘सेतुमंच’ नाट्यसंस्था की स्थापना की थी, जिसके जरिए लोगों को रंगमंच से जोड़ने और प्रशिक्षण देकर उनके मार्गदर्शन का काम किया गया था। उत्तर प्रदेश हिन्दी-संस्थान, लखनऊ के वे कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे थे। संस्थान सम्मान, डॉ. लोहिया अतिविशिष्ट सम्मान, एकेडेमी सम्मान, साहित्य वाचस्पति आदि सम्मान इन्हें विभिन्न अवसरों पर प्रदान किए गए थे। 18 अक्तूबर 2002 को इनका निधन हो गया।


(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)   


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

विश्व-चेतना की कवयित्री पुष्पिता अवस्थी 

                                                                    - प्रो. अर्जुन चव्हाण

  समकालीन ही नहीं अपितु हमकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में डॉ. पुष्पिता अवस्थी का नाम शीर्षस्थ है। आप बहुमुखी प्रतिभा की धनी है, लेकिन कविता के क्षेत्र में अग्रणी। उनकी कविता का फलक जितना परिव्याप्त है उतना ही ताप से युक्त है। उनमें प्रेम की संचेतना जितनी प्रखर है, उतनी ही विश्व-चेतना उर्वर। सच तो यह है कि विश्व-चेतना वाया प्रेम-चेतना माने डॉ. पुष्पिता जी की काव्य संवेदना। इसमें आधारभूत परिवेश एवं परिप्रेक्ष्य ही है जो स्वदेश से विदेश की धरती पर पलता-फूलता-खिलता गया। उनके काव्य-कैनवास का अवगाहन करने के बाद कहने में कोई संकोच नहीं होता कि विश्व-चेतना की कवयित्री पुष्पिता का साहित्य चिंतन वैविध्यपूर्ण है जिनमें प्रधान बिंदु इस प्रकाश लक्षित होते हैं।

 डॉ. पुष्पिता मूलतः कवयित्री हैं। अतः सबसे ज्यादा चिंतन कविता को लेकर किया हुआ मिलता है। कविता क्या है इस बात का सबसे अधिक चिंतन ‘कविता संचयन’ खंड एक में दृष्टिगोचर होता है। कविता जीवन है से आरंभ किया हुआ यह चिंतन ‘कविता मेरा हृदय है। कविता के हृदय में मैं हूं। कविता मेरे हृदय और मानस की अचंचल इबारत है।... कविता के गर्भ से मैं स्वयं को उद्भूत मानती हूं। जब मैं खुश होती हूं, मेरी कविता मुझसे परिहास करती है, आत्म संवाद रचती है।’ कविता क्या है? जैसे विषय को लेकर कवयित्री सहज, सुबोध मगर गंभीर विचार चिंतन भी प्रस्तुत करती है कि जिनमें ‘कविता मेरी मां’ है। कविता मेरी मातृभूमि है। मैंने कविता के गर्भ से जन्म लिया है। जीवन और जिजीविषा की मेरी भूख कविता पढ़ने और लिखने से मिटती है। कविता ने मां की तरह मुझे पाला है। मेरी कविताओं ने अपनी संवेदनाओं का दुग्धपान करवा कर मेरा पोषण किया है। दुःखी, निराश और उदास होने पर विहवल मां की तरह कविता ने अपनी छाती से लगाया है, अपने आंचल में ढांपकर लोरी सुनाई है। मेरी सिसकियों और हिचकियों को उसी ने शब्द दिये हैं।’



 पुष्पिता जी की मान्यता है कविता उनका घर है, जहां वे अपने प्रिय के सपने देखती है। कविता उनको अपनी आत्मा लगती है, देह की आत्मा, जीवन की आत्मा। कविता उनके लिए ईश्वरीय शक्ति है, प्रेम। कविता ने उनको जीवन दिया है। आधी रात की अंगड़ाई के बाद उनकी कविता जन्म लेती है। वह उनको प्रसव का सुख देती। उनकी इकलौती हार्दिक विधा कविता है। लेकिन उनकी स्वीकारोक्ति इस बात का बोध कराती है कि उनकी कविता भोगवादी कतई नहीं। स्वयं उन्हीं के शब्दों में -‘मेरी कविता भोग के मोह से मुक्त मानवता के संयोग से संयोजित है।’ उनके विचार से कविता ऐसी शक्ति जो हमें सम्पन्न बनाती है। कविता देह है जिससे कवि का जन्म होता है। स्वयं उन्हीं के शब्दों में-‘कविता मुझे सजीव मानवीय देह लगती है-वह मेरा हाथ थामती है... मुझे सुनाती है। मुझे देखती है... मुझसे अभिसार करती है। कविता मुझमें स्वप्न देखती है, मैं कविता में स्वप्न देखती हूं। मैं कविता में स्वप्न रचती हूं।’ कविता के बारे में सबसे बड़ी बात तो उन्होंने इन शब्दों में प्रस्तुत की है-‘कविता इस मानव विरोधी समय में मुझे मानवीय बने रहने की ताकत प्रदान करती है।’

 कविता के बारे में पुष्पिता जी के विचार अत्यंत मौलिक, सामाजिक और वैश्विक हैं। बक़ौल पुष्पिता जी-‘मेरी दृष्टि में विश्व और मनुष्यता का रक्षण और संरक्षण ही कविता का मूल उद्देश्य है।’ मेरी दृष्टि से कविता की इतनी खूबसूरत जनवादी संकल्पना हो नहीं सकती। 

 भाषा पर पुष्पिता जी का जबरदस्त अधिकार है। उनकी रचनाओं में अत्यंत नपे-तुले शब्दों, रूपों एवं वाक्यों का प्रयोग मिलता है और प्रोक्ति का भी। उनका विचार है कि भाषा से मनुष्य के व्यक्तित्व की पहचान होती है। व्यक्ति के सामर्थ्य का परिचय भाषा से मिलना है। वे किसी के बाह्य व्यक्तित्व, शक्ल-सूरत, कद-काठी से अधिक महत्त्वपूर्ण भाषा को मानती है। उनकी मान्यता की शब्दावली इस प्रकार है-‘मेरे लिए किसी व्यक्ति की पहचान उनकी देह या चेहरे से नहीं बल्कि उसके भाषा-सामर्थ्य से निर्मित होती है।’ किसी व्यक्ति के सच्चे या झूठे पन का पता उनको भाषा से चलता है। किसी व्यक्ति के राज को भी भाषा से जाना जा सकता है। अपने भाषा विषयक विचार चिंतन को पुष्पिता जी इन शब्दों में बयान करती हैं-‘भाषा व्यक्ति के व्यक्तित्व के सारे रहस्यों को खोलकर रख देती है। भाषा से ही व्यक्ति के झूठ का पता चलता है।’ 

 वास्तव में पुष्पिता अवस्थी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में ‘थ्री इन वन’ की अनुभूति होतीहै। हिंदी की तीन महान महिला साहित्यकारों की झांकियों को देखना हो तो आप में देख सकेंगे, किसी और में नहीं। समसामयिक एवं सामाजिक भेद के बावजूद, पुष्पिता जी में उक्त तीनों की ख़ासियतें अवश्य देखने को मिलती हैं। वेदना भले हो न हो मगर पुष्पिता जी में मीराबाई की संवेदना ज़रूर मिलती है। दुःख की बदली मिले-न-मिले मगर उनमें महादेवी की साधना एवं आराधना मिलती है और मन्नू भण्डारी के ‘महाभोज’ का बिसू या ‘आपका बंटी’ का बंटी न दिखता हो मगर मन्नू का ‘एक कहानी यह भी’ के तर्ज पर एक ‘कविता संचयन यहा भी’ का नोटिस तो लेना ही पड़ेगा। अपने पूर्ववर्ती तीनों साहित्यकारों को पढ़ना, जानना, गुनना जिनको संभव नहीं हुआ, वे सिर्फ़ पुष्पिता अवस्थी के साहित्य से आजमा सकते हैं। तीनों की कारयत्री और भावयत्री प्रतिभा अकेले आप में सबको देखने को मिलेगी, मगर इन तीनों के वेदना, करुणा और निराशा की भावना से अलग पुष्पिता जी के यहां उमंग, उत्साह और उर्धवगामी ऊर्जा स्रोत-ओतप्रोत है। यहां प्रेम दीवानी नहीं, कविता की दीवानी मिलेगी, रहस्यात्मकता नहीं, अभिव्यक्ति की सहज किंतु स्पष्टता मिलेगी और जीवन साथी पति की बेवफाई का गम नहीं बल्कि विश्व चेतना और मानवता की गहरी संवेदना है। सार यह कि पुष्पिता जी का व्यक्तित्व ‘थ्री इन वन’ का समन्वित रूप प्रतीत होता है। 

 कहना ज़रूरी नहीं कि पुष्पिता अवस्थी मूलतः प्रेम कविता को प्रस्तुत करती है। उनकी अधिकांश कविताएं प्रेम कविता की श्रेणी में आती हैं। लेकिन उनका प्रेम आत्म-चेतना से होते हुए विश्व-चेतना के आगोश में समाहित होता है। प्रेम कविता की यात्रा देह से बढ़कर आत्मा के तह तक पहुंच जाती है। उनकी प्रेम कविताएं वर्गीकरण एवं विवेचन-विश्लेषण की शोधपरक मांग करती है, जिसे शोध का विषय कहना चाहिए। उनकी कविता इस तथ्य का बोध कराती है कि ये सारी प्रेम कविताएं उनके हृदय की पूंजी है और स्याही भी। इस संदर्भ उनका कथन द्रष्टव्य है-‘मेरी प्रेम कविताएं मेरे हृदय की प्रेम-पूंजी और स्याही है।’



 प्रेम के बारे में पुष्पिता अवस्थी की अपनी अलग मान्यता है कि ‘प्रेम अर्धनारीश्वर है। प्रेम हृदय का आनंद है। प्रेम आत्मा का सुख और चेतना की चौतन्य अभिव्यक्ति है। प्रेम आत्मा का धर्म है और धर्म की आत्मा है। प्रेम जीवन का बीजक है और धर्मों का भी बीजक मंत्र है।’ अतः बेहिचक कहना चाहिए कि पुष्पिता अवस्थी की प्रेम की अवधारणा उस तरह की नहीं जिसकी परिकल्पना अक्सर सामान्य सोच के लोग करते हैं। उनके प्रेम की ऊंचाई तथा गहराई को नापने के लिए बड़े व्यापक तथा गहरे कलेजे की ज़रूरत है। यही बात उनके प्रेम कविता को लागू होती है। उनका प्रेम काव्य आलोचना का नहीं, संवेदना का विषय है, सिर्फ़ व्याख्या का नहीं, अवगाहन का विषय है। उनकी दृष्टि से ‘प्रेम ईश्वरानुभूति का दूसरा नाम है।’ प्रेम कविता के जरिए उनका प्रेम विषयक दृष्टिकोण विशाल दिखाई देता है, जैसे-‘प्रेम का अनोखा पर्याय जीवन।’ उनका प्रेम संबंधी विचार है कि ‘प्रेम अनश्वर विरासत है’ प्रेम के बारे में उनकी मान्यता जितनी साफ उतनी ही अमाप है। ‘वसंत हुई देह में’ स्वयं उन्हीं की धारणा है-

प्रेम 

जीवन का 

हृदय है।

प्रेम के अहसास को तथा उसके आगमन को लेकर पुष्पिता जी की दृष्टि बड़ी सधी हुई लक्षित होती है, जैसे- 

प्रेम चुपचाप 

आपको चुराते हुए 

आपके भीतर रहता है

जैसे-

आकाश की शून्यता 

में ब्रह्मांड।

‘सूर्य की सुहागिन’ में कवयित्री ने प्रेम को ऐसी उपासना माना है, जिसमें उपवास रखना होता है। प्रेम की यह भव्यता और दिव्यता उनके इन शब्दों में देखी जा सकती है-

प्रेम उपासना में 

रखती है- उपवास।

  एक समय था कि दूरदर्शन तथा उसके चैनलों का प्रचार-प्रसार नहीं था, तब तक आकाशवाणी से मनोरंजन एवं प्रबोधनकार्य जारी था। मूलतः हिंदी और अन्य भाषाओं के अध्ययन ने उनके भीतर साहित्यिक संवेदना को विकसित किया है। मगर संगीत ने भी उनको प्रभावित किया। विशेषतः ‘फिल्मी गीतों’ ने विशेष प्रभाव डाला। स्वयं उन्हीं के शब्दों में- ‘परीक्षा की तैयारी के समय भी उस कालखण्ड में बनी फिल्मों के गीतों से प्रेम की रस पयस्विनी चित्त को तरंगित किये रहती थी। स्नातक और स्नातकोत्तर अध्ययन के दरमियान के सारे परिवेश ने कविता के अंतरंग शक्ति से साक्षात्कार करवाने शुरू कर दिये थे। कुछ शाश्वत गीत स्वदेश बिछोह की पीड़ा को भी आज वे ही गीत हरते हैं।’ कहना चाहिए कि पुष्पिता जी के जीवन के स्नातक तथा स्नातकोत्त अध्ययन के कालखण्ड के परिवेश ने उनके भीतर कविता की पहचान करा दी थी, जिसके प्रभाव स्वरूप गीतों की शब्द माधुरी ने कविता को हृदयशक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। कहना सही होगा कि गीत-संगीत का यह चरका कविता के सृजन का प्रेरक बना, जो आज भी निरंतर जारी मिलेगा।

वर्ष 2003 में सूरीनाम में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में सूरीनाम के राष्टपति फिनिट्यांग को अपनी पुस्तक भेंट करतीं पुष्पिता अवस्थी, साथ में अशोक माहेश्वरी। 

पीड़ा हो या परेशानी, असल में जीवित होने की निशानी होते हैं। पुष्पिता अवस्थी भी इसके लिए अपवाद नहीं। मगर सच तो यह है कि यह वह व्यक्तित्व है जो सदाबहार, ऊर्जावान, तेजस्वी, तरोताजा, उत्साह वर्धक एवं अपने रुचि के कार्य में मगन रहनेवाला है। पठन-पाठन, लेखन-चिंतन-अनुचिंतन, आयोजन-संयोजन तथा दग्दर्शन-निर्देशन में जिंदगी की खुशियों को महसूसनेवाले इस शख्स को अवसाद मायूसी के लिए वक्त कहां है लगातार अपने दायित्व के निर्वहन में जिं़दगी के सातवें दशक के मध्याहन तक पहुंचने पर भी व्यक्तिगत स्तर पर निराशा या पीड़ा के पल में जीने की मानो फुर्सत ही नहीं मिली। लेकिन अपने वतन से बिछड़ने की याद आने पर कविता का सृजन होता है फिर वह प्रेम संबंधी हो, चाहे मूल्य या समाज-सेवा संबंधी हो या मानवता संबंधी। इतना सच है कि गीत-संगीत से चेतित होकर साहित्य-सृजन पुष्पिता जी की अलग प्रवृत्ति है। 

 भारतीय साहित्य और उसमें भी हिंदी साहित्य की बिरादरी बड़ी विशाल है। जहां तक पुष्पिता जी की बात है, संयोग से ज्ञान का और साहित्य का गढ़ माने जानेवाले और बचपन से उच्च शिक्षा तथा उपाधि धारक बनने तक का समय उनका बनारस में बीता। उनको बचपन से लेकर डॉक्टरेट की उपाधि तक शैक्षिक एवं साहित्यिक माहौल मिला। साहित्य की बिरादरी से, साहित्य के साधकों से अखंड, अक्षुण्ण, अटूट नाता रहा। संबंधों का निर्वाह सीखें तो कोई आपसे ही। हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, जैनेंद्र, अज्ञेय आदि से आपकी भेंट वार्ता होना, पिताश्री डॉ. राजेन्द्र कुमार अवस्थी का गांधी संस्थान में उच्चपदस्थ, सेवारत होना, विष्णुकांत शास्त्री की सलाह से हिंदी में एम.ए. करना, प्रो. नामवरसिंह, प्रो. काशीनाथ सिंह, प्रो. बच्चनसिंह, प्रो. केदारनाथ सिंह, अमृतराय, सुधा जी और ऐसे अनेक गण्य-मान्य लेखकों, विद्वानों के सहचार्य ने पुष्पिता अवस्थी के लेखन को ज़मीन प्रदान की। कार्ल मार्क्स की शताब्दी के अवसर पर ‘प्रो. नामवर सिंह ने मैक्सिम गोर्की के पत्रों की पुस्तक मुझे भेंट की जिसमें 23 नवंबर, 1899 को निझनी नोवोग्रोद से इल्या रेपिन को लिखा पत्र बहुत महत्त्वपूर्ण है।’ दिग्गज रचनाकारों से संपर्क के बावजूद सृजन-शक्ति का विकास हुआ। उन्होंने श्रेष्ठ-सृजन के संस्कार अपने संस्कार के बूते पर हासिल किये। वाणी की मधुरता, भाषा और अभिव्यक्ति की क्षमता, चेहरे पर विद्वत्ता, आत्मविश्वास की तेजस्वीता और व्यक्तित्व में सहजता-सुलभता की वजह से उनकी साहित्य जगत की मुसाफिरी को बल मिलता गया। इन पंक्मियों के लेखक ने सुभद्रा कुमारी चौहान की बेटी सुधा और प्रेमचंद के बेटे अमृतराय की शादी का किस्सा पुष्पिता अवस्थी से ही सुना था कि कैसे अमृतराय ने सुधा जी को देखते ही पसंद किया, अपने पिता प्रेमचंद को बताया और प्रेमचंद जी ने इस प्रस्ताव को सुभद्रा कुमारी को बताया तब इन दोनों की शादी हुई। पुष्पिता अवस्थी का इस परिवार में आना-जाना-मिलना, बातचीत होना बरकरार था। 

 बड़े-बड़े साहित्यकारों से मिलना, उनसे संवाद, संपर्क और नया सीखना निरंतर जारी था जिससे उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के सुचारु गठन में सहायता मिलती रही। ‘अलीगढ़ में 1984 में जनवादी लेखक संघ का महाअधिवेश हुआ जहां बाबा नागार्जुन के साथ मंच से काव्य-पाठ का अवसर मिला।’ जाने-अनजाने में साहित्य-सागर की सारी बिरादरी और उसकी मुसाफिरी से पुष्पिता अवस्थी की लेखन शक्ति अधिक समृद्ध हुई। अनगिनत नामी-गिरामी, देश-विदेश के श्रेष्ठ, प्रतिभावान साहित्यकारों से निरंतर संवाद अर्जित करने की प्रवृत्ति एवं असीम अध्ययनशीता, ये वे कारक हैं जिनकी बदौलत पुष्पिता जी की साहित्य क्षेत्र की मुसाफिरी स्थानीय से वैश्वीय तथा वैयक्तिक से ऊपर उठकर वैश्विक बन बैठी है इसमें दो राय नहीं।

 पुष्पिता अवस्थी के जीवन सफ़र में उनका सक्षम लेखन ही उनका मूल साधन-स्रोत बना है। विदेश गमन की किसी की संस्तुति से नहीं बल्कि उनकी अपनी साहित्य निर्मिति से हुआ। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेई ने अपने आवास पर पुष्पिता अवस्थी का काव्यपाठ्य पहली बार सुना तो मूलतः कवि हृदय के प्रधानमंत्री जी ने उनकी क्षमता को भांप लिया। उनकी प्रतिभा, प्रस्तुति और काव्य प्रभाव को देखकर वाजपेई जी ने सूरीनाम की भारतीय दूतावास की राजदूत श्रीमती कमला सिन्हा को फोन किया कि ‘इस बार मैं एक कवि को सूरीनाम भेज रहा हूं। वह भी कवि स्त्री को। इसके परिणाम अवश्य ही कुछ विलक्षण होंगे।’ फिर क्या था, क़ाबिलियत को अवसर चाहिए और अवसर पर क़ाबिलियत। पुष्पिता अवस्थी का सूरीनाम जाना, उन्हें लेने राजदूत का आना, वहां पर बेहतरीन काव्यपाठ करना, स्थानीय कार्यक्रमों से जुड़ना, वहां के कवि जीत नाराइन और कवि लक्ष्मण हरिदत्त निवासी की कविताओं के हिंदी अनुवाद करना, वहां के पर्यावरण संरक्षक सिशिल और सेन्सी के कार्य से प्रभावित होकर उनपर कविताएं लिखना और सूरीनाम में संयोजित सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन का संयोजन डॉ. पुष्पिता अवस्थी को सौंपना उनके क्रियाशील एवं काबिल व्यक्तित्व को प्रमाणित कर गया। फिर क्या था, भारत से आये बड़े-बड़े दिग्गज-बाल कवि बैरागी, नरेंद्र कोहली, शैलेंद्र श्रीवास्तव, प्रो. रामशरण जोशी, प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण, कन्हैयालाल नंदन, महीपसिंह, सोम ठाकुर, कवि कुंअर बेचैन, चित्रा मुगदल, मृदुला सिहना आदि ने आपकी प्रशंसा की। यहां से आगे विश्व यात्री बनकर आधी से अधिक दुनिया के देशों की यात्राएं और जहां जाएं वहीं झंडा गाड़े बिना लौटी नहीं। अपनी सभ्यता और संस्कृति का और विशेषतः हिंदी का। 

  डॉ. पुष्पिता अवस्थी के साहित्य संसार एवं कारोबार ने उनसे विश्व यात्रा कराई है। युरोप और अन्य देशों की यात्राओं के विगत पच्चीस वर्षों ने उनकी अनुभूति और अभिव्यक्ति को वैश्विक बना दिया, व्यापक बना दिया। उनकी मान्यता है कि ‘सन 2001 से ही प्रवास में जीवन रहा। पच्चीस वर्षों के इस निर्वासन और विस्थापन ने मानवीय और आत्मीय संबंधों के सही मायने समझा दिए।’ विश्व यात्रा ने उनके चिंताओं, चेतना को वैश्विक बना दिया। हर देश यात्रा करने पर उन्हें अपना लगता है। सूरीनाम हो चाहे, नीदरलैंड-वहां की भाषा, संस्कृति और साहित्य के प्रति गहरी संवेदना निर्माण होने के कारण ‘कथा सूरीनाम’, ‘कविता सूरीनाम’ और ‘सूरीनाम का सृजनात्मक साहित्य’, सूरीनाम केंद्रित भारतवंशियों के जीवन पर ‘छिन्नमूल’ उपन्यास तथा ‘कैरिबियाई देशों में हिंदी शिक्षण’ ‘दि नागरी स्क्रिप्ट फॉर बिगनर्स’ विदेश में हिंदी प्रचार के लिए उपयुक्त पुस्तकें लेखिका को विश्व यात्री सिद्ध कर देती है। ‘संवेदना की आर्द्रता’ के बारे में उनकी मान्यता है कि ‘वैश्विक चिंताओं से प्रेरित होकर कुछ आलेख समय-समय पर लिखे गये लेख इसमें संकलित हैं।’

 विश्वयात्रा की फलश्रुति के बारे में उनका कहना बेबाक सच रेखांकित करता है कि ‘विश्व यात्राओं ने मेरी चित्त और चेतना को इस तरह वैश्विक बना दिया है कि हर देश मुझे अपना देश लगता है, हर घर मुझे अपना लगता है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ पंक्ति का अर्थ मेरे मन के भीतर घर की तरह है।’

 डॉ. पुष्पिता अवस्थी पर भारत के एकमात्र नोबेल विजेता कवि रवींद्रनाथ टैगोर का प्रभाव छात्र जीवन से था। उनका बंगाली में लिखा साहित्य पढ़ने के लिए पुष्पिता अवस्थी ने बंगाली सीखने का संकल्प किया था। उसकी पूर्ति भी की थी। लेकिन जब देश को छोड़कर विदेश की ज़मीन पर अपनीजड़ें ज़माने के लिए निकलना पड़ा तब टैगोर उनको अधिक अपने लगने लगे। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता उनको बल देती रही। उस संदर्भ में उनकी स्वीकारोक्ति है-‘स्वदेश छोड़कर विदेश में पांव जमाने और दुनिया समझने-जीने की चुनौतियों को स्वीकार करने की शक्ति कवि रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘एकला चलो रे’ से हासिल हुई-

एकला चलो रे 

तेरी आवाज पे कोई न आये तो फिर चल अकेला रे

फिर चल अकेला, चल अकेला, चल, अकेला, चल अकेला रे।

टैगोर जी के अलावा नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली विदेशी त्रयी है जिनके साहित्य से पुष्पिता अवस्थी काफी प्रभावित हैं। उनमें से पहली चिली की कवयित्री ग्रेबीला मिस्त्राल है जिसे 1945 में कविता के लिए नोबेल मिला था। उनके गीति काव्य लैटिन अमेरिका निवासियों में प्रेरणा भरते रहे-लंबे समय तक। इनमें हृदय की कोमलता, शक्ति,आवेश, ममता और विद्रोह निहित है। 

 पुष्पिता अवस्थी की दूसरी नोबेल पुरस्कार प्राप्त पसंदीदा कवयित्री है नेली साख्स। हिटलर की यहूदी-विरोधी नीति के कारण उन्हें जर्मनी (बर्लिन) छोड़कर स्वीडन में बसना पड़ा था। उनकी कविताओं में यहूदियों की पीड़ा, यातना का अंकन है, प्रेम गीत, विरह गीत हैं, युद्ध की विभीषिका, अमानवीय कृत्यों के शिकार स्त्री-पुरुष और बच्चों की कराह अभिव्यक्त है। नेली साख्स की यह पीड़ा कि “सबके पास अपना एक घर है, जब कि मैं संसार के एक छोर पर लटकी हूं। पुष्पिता अवस्थी को अहम लगती है और उसकी यह रचना भी उपलब्धि लगती है-

संसार के द्वार पर परित्यक्त

मेरे भाइयों और बहनों 

मैं तुम्हारे लिए युद्ध के गीत नहीं गाऊंगी,

सिर्फ बहते हुए रक्त को रोकूंगी 

और जमें आंसुओं को 

पिघलाकर बहा दंूगी।

स्पष्ट है कि भोगी हुई पीड़ा और परिवेश ने नेली साख्स के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समृद्ध बना दिया जिससे डॉ. पुष्पिता जी काफी प्रभावित रही हैं।

 डॉ. पुष्पिता अवस्थी की तीसरी पसंदीदा नोबेल विजेता कवयित्री है पोलंड की विल्सावा शिंवोर्सका। स्वीडिश अकादमी ने उनके बारे में पुरस्कार देते हुए कहा था-‘विल्सावा शिंवोर्सका की कविता मानव जीवन के सत्या के इतिहास के साथ जैविक संदर्भ में भी महत्त्वपूर्ण है।’ पोलंड में रहकर ही वह सेंसरशिप के क्रूर पंजों से बचती है। मगर व्यवस्था के विरोध में कभी पीछे नहीं रही। डॉ. पुष्पिता अवस्थी की पसंद में विल्सावा की राजनीतिक कविता द्रष्टव्य है-

अराजनीतिक कविताएं भी गहरे अर्थों में राजनीतिक हैं 

और हमारे ऊपर जो चंद्रमा चमक रहा है

वह भी विशुद्ध रूप से चंद्रमा नहीं है

यहां तक कि तुम जंगलों में भी चले जाओ

तो वहां भी तुम राजनीतिक मैदानों में 

राजनीतिक कदम उठा रहे होंगे।

वस्तुतः पुष्पिता अवस्थी सभी नोबेल पुरस्कार प्राप्त साहित्यकारों की कृतियों से प्रभावित हैं किन्तु उपर्युक्त विदेशी तीन कवयित्रियों को ज्यादा पसंद करती हैं, उन्हीं के शब्दों में-‘मेरी चहेती यह तीन कवयित्रियां विशेष हैं।’

 डॉ. पुष्पिता अवस्थी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व जिन रचनाकारों से प्रभावित रहा है, उनमें से एक है बांगला देश की निष्कासित लेखिका तसलीमा नसरीन। न केवल उनकी कविता का बल्कि जीने की शैली का प्रभाव भी पुष्पिता जी ने मान लिया है। उनकी धारणा है कि कविताएं- कवि के जीवन के लिए तो रास्ता बनाती ही हैं, वे अपने पाठकों के जीवन के लिए भी रास्ता बनाती है। तसलीमा जी की ‘तुम लड़की हो’ पुष्पिता अवस्थी को इसी श्रेणी की रचना लगती है, जैसे-

तुम लड़की हो

रखना यह अच्छी तरह याद 

लाँघोगी जब घर की चौखट तुम 

लोग तुम्हें देखेंगे तिरछी निगाह से 

तुम जब जा रही होगी गली से 

लोग पीछे पड़ेंगे, सीटी बजायेंगे 

जब तुम आओगी चौड़े रास्ते पर 

होकर गली से, लोग गाली देंगे तुम्हें 

कहेंगे चरित्र हीन

यदि निकली तुम कमजोर 

तुम पीछे लौटोगी 

नहीं तो, जैसे जा रही हो, चलती जाओगी।

  उनकी मान्यता है कि स्त्री के जीवन में इतनी लगामें लगाई जाती हैं कि उससे मुक्त होने के संघर्ष में ही सारी उम्र बीत जाती। ‘देश, समाज और संस्कृति की सारी लगामें स्त्री की गति को अवरुद्ध करने और वजूद को समाप्त करने के लिए होती हैं।’ पुष्पिता अवस्थी की यह मान्यता वर्तमान वैश्विक समाज की सच्चाई को दर्शाती है कि स्त्री की बेइज़्ज़ती करने वाले और उसकी इज़्ज़त से खेलने वाले वैश्विक खूंखार समाज के बावजूद वह है। वह ‘दैहिक बलात्कार अगर नहीं तो मानसिक बलात्कार को स्त्री झेलने के बावजूद जीवित है और सृजन तथा मानवीय संस्कृति को बचाए रखने की कविताएं लिख रही है। उस स्त्री समुदाय में से मैं भी एक हूं जिसने विश्व में अपने अध्ययन, अध्यापन, यायावरी और नौकरी के भीतर कविता बनाने के ज़रूरी तत्व इजाद किये।’

 डॉ. पुष्पिता अवस्थी की वैश्विक संवेदना के बावजूद,अपनी इस विश्व यात्रा के बारे में जो मान्यता है, उससे उनकी व्यथा की कथा व्यक्त हुए बिना नहीं रहती। इसमें सबसे पहले दर्द का कारण है अपनों से बिछोह। सारे नज़ारे प्यारे दुलारे इन सबसे जुदा होना, जिनमें मां के साथ-साथ मातृभूमि से जुदा होना, भारतीय संस्कृति एवं प्रेम से जुदा होना आदि शीर्षस्थ हैं। हां, यह बात अलग है कि प्रवासी भारतीय विदेश वासियों में हमारी सभ्यता एवं संस्कृति की पताका को लहराने का दायित्व सबसे ज्यादा कवयित्री ने निभाया है और आज भी निभा रही हैं सादगी, संयम और दम खम के साथ। मगर विदेश की आत्मकेंद्रित स्वार्थी जीवन शैली भी उनकी निगाह से छूट नहीं पाती। उन्होंने युरोपीय जीवन शैली पर उंगली रखते हुए स्पष्ट किया है कि वहां रात और दिन में अलग पर्यावरण मिलता है। ‘जिस देश की यात्रा करती हूं उसे अपना मानकर जीती हूं’ कहनेवाली इस कवयित्री की पैनी निगाहों से विदेशी जीवन शैली बच पाई और विदेशी यात्राओं का यह दर्द स्वयं उन्हीं के शब्दों में-‘विदेश में वैसे भी आत्मकेंद्रित स्वार्थी जीवन शैली है। योरोपीय देशों के नागरिकों को दूसरे देश जाने पर भाषा और भाषाई संस्कृति का पर्यावरण अवश्य कभी-कभी रात्रि में प्रताड़ित करता होगा। लेकिन दिवस की जीवन शैली सूर्यप्रकाश की तरह विभेद रहित रहती है। ग्रीष्म में जैसे समुद्र तट पर सूर्य सबकी देह सेंकता है और समुद्र सबके मन को तरलता के आगोश में भरता है, वैसे ही विस्थापन के बावजूद वे निर्वासन के दंश से पीड़ित नहीं होते हैं। लेकिन मेरे लिए विदेश प्रवास इन सबसे अलग विशेष दर्दनाक रहा, क्योंकि माँ की तरह मातृभूमि छूट गई और भारतीय संस्कृति की तरह प्रेम भी वहीं स्वदेश में छूट गया। उसके बिना जीना और खुद को जिलाना पड़ा।’

 अपने साहित्य में उन्होंने उस सच का भी संवेदनशीलता और ईमानदारी से अंकन किया है जो भारतवंशी विदेश में रहते हैं मगर वो सिर्फ़ दिखावे भर के भारतीय हैं। इसके बारे में उनकी यह बेबाक मान्यता दृष्टव्य है- ‘भारत से बाहर पीढ़ियों से रह रहे भारतवंशी खान-पान बोल-चाल से सिर्फ़ दिखावेभर को भारतीय होते हैं, आंतरिक रूप से वे पीढ़ियों से जिस देश में रह रहे हैं, वह मन, प्राण, आत्मा से उस देश के हो चुके होते हैं।’

 कवयित्री का जीवन सफ़र देखने के बाद मुझे वह कहने में संकोच नहीं कि उनका व्यक्तित्व ‘अत्त दीप भव’ की बेहतरीन मिसाल है। वे स्वयं प्रकाशित व्यक्तित्व की धनी है। अपनी चेतना, संचेतना, आत्मचेतना एवं संवेदना के बल पर उन्होंने भारत के देहात गुरगांव (कानपुर, उ.प्र.) से विश्वगाँव (ळसवइंसटपससंहम) तक का शानदार सफ़र किया, जिसमें पीड़ा के पड़ाव, अवरोध-गतिरोध नहीं थे ऐसा नहीं। लेकिन यात्रा का हर पड़ाव उनका अपना चयन था, जिसमें उधर्वगामी सफ़र का पुरज़ोर संकल्प और उससे कहीं ज्यादा हुनर था। तभी तो हर मक़ाम पर अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के झंडे गाड़े।

 सभ्यता एवं संस्कृति से, पुश्तैनी अमीर, समृद्ध होने के कारण डॉ. पुष्पिता अवस्थी अपनापा, कृतज्ञता की लता लगती है। मगर ऐसी लता जोस्नेह की कलियों और फूलों से लबालब होती है, जिसके अपनापे की सुगंध भौगोलिक सीमाओं के बाहर दुनिया के विविध देशों के कोने-कोने को महकाती है। विदेश में होते हुए स्वदेशियों को भी अपने कर्म की खुशबू से प्रसन्न करा देती है। कृतज्ञता का भाव उनकी आंतरिक शक्ति को बढ़ा देता है। अपने गुरु, शिक्षा संस्था के संस्थापक, साहित्यकार, लेखक, समीक्षक, गायक, नर्तक, कलाकार और अपने नाना-नानी एवं माता-पिता भ्राता का परिवार, इन सबके प्रति अपने हृदय सागर में जो अपार कृतज्ञता है वह यत्र-तत्र-सर्वत्र दृष्टिगोचर हुए बिना नहीं रहती। खासकर उनके ‘कविता संचयन’ के तीनों खंडों के समर्पण के पृष्ठ देखें तब इसका अहसास हुए बिना नहीं रहता। अपने परिवार वालों के समर्पण के बारे में उनके अनमोल शब्द हैं-‘यह समर्पण-स्याही से नहीं-हृदय के रक्त और आंसुओं से लिख रही हूं। क्योंकि इन लोगों ने जीवनभर मुझे अपना जीवन दिया है-अन्यथा मेरा जीवन और लेखन संभाव नहीं हो पाता।’ कहना सही होगा कि कृतज्ञता की स्वर्णिम शब्दावली देखें-पढे तो सिर्फ़ डॉ. पुष्पिता अवस्थी की रचनाओं में ‘कविता संचयन’ के खण्ड दो में समर्पण का शीर्षक है ‘मानस समर्पण’ जिसमें विश्वचिंतक जे कृष्णमूर्ति से लेकर प्रो. कृष्णनाथ, प्रो. नामवर सिंह, अमृतराय से होते हुए हमउम्र डॉ. अलका सिंह तक को याद करते हुए यह स्वीकारोक्ति है कि इन सबसे अनवरत संवाद से ही सृजन की अर्जित हुई। बक़ौल पुष्पिता अवस्थी-‘इस सत्य कथन के साथ कि विदेश के साहित्यिक विद्वानों से अधिक आत्मीयता और विश्वसनीयता स्वदेश के भारतीय हिंदी विद्वानों से  है। जो कष्ट सहकर भी नई पीढ़ी की शक्ति बनते हैं।’ कृतज्ञता का विराट रूप उनकी‘कविता संचयन’ खण्ड-3 के ‘चाहत समर्पण’ के पृष्ठ पर भी लबालब भरा हुए लक्षित होता है-‘उन्हें, और उनके साथ विदेश में मेरी तरह बसे हुए उन सभी भारतीय साहित्यकारों को यह तीसरा खण्ड समर्पित जिनकी सक्रियता से वर्तमान भारत का विकसित अस्तित्व विदेशियों की अस्मिता के समक्ष चुनौतीपूर्ण है।’

 किसी ग्रंथ की भूमिका माने हर साहित्यकार के अपने अंतरंग को जानने का सर्वाेत्तम साधन होता है। कहूं कि पुष्पिता जी के ‘कविता संचयन’ खंड एक की भूमिका माने मंदिर का महाद्वार कहना होगा। जिससे होकर मूर्ति तक अर्थात रचनाओं तक पहुंच जाना तथा उनको जानना अधिक आसान हो जाता है। इसमें कविता क्या है से लेकर उनकी सृजन यात्रा के सूत्र सर्वत्र विकीर्ण हैं। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को जानने एवं आत्मगत करने के क्ल्यू भूमिका के पृष्ठ-दर-पृष्ठ दृष्टिगोचर होते हैं। इतनी लम्बी भूमिका मेरे अध्ययन में शायद ही आई हो। महाराष्ट्र के महान संत तुकाराम के मराठी अभंगों के ‘तुकाराम अभंग गाथा’46का तीन खंडों में हिंदी अनुवाद वेदकुमार वेदालंकार जी ने किया और गुरुकुल के संस्थापक डॉ. अशोक कामत (पुणे, महाराष्ट्र) जी ने इन्हें प्रकाशित कर तीन खंडों की भूमिकाएं क्रमशः 39,45 तक 47 पृष्ठों में प्रस्तुत की है। दूसरा उदाहरण मराठी विश्वकोश के जनक ‘तर्कतीर्थ’ ’लक्ष्मण शास्त्री जोशी के समग्र साहित्य को अठारह खण्ड में संपादित’ कर महाराष्ट्र शासन की ओर से प्रकाशित करने का दायित्व जिन्होंने संपादक के नाते निभाया वे डॉ. सुनीलकुमार जी हैं- जिन्होंने प्रत्येक खण्ड की अलग-अलग भूमिकाएं लिखी कम-से-कम पचास से लेकर ज्यादा-से-ज्यादा सौ पृष्ठ तक।  

करीब चौहत्तर पृष्ठों की दीर्घाकार भूमिका कवयित्री पुष्पिता का आत्मविष्कार और सुदीर्घ साहित्य-चिंतन का परिष्कार है और उपसंहार भी। मुझे कहने में तनिक संकोच नहीं कि ‘जहां-जहां जाऊं सोई परिक्रमा, जो कुछ करूं सोई पूजा’ में पुष्पिता अवस्थी ने ‘अनुभूतियों की दस्तकें और दस्तकों की इबारतें’ शीर्षक भूमिका में अपनी आत्मकथा ही प्रस्तुत की है, भले ही पूरी न सही, अधूरी क्यों न हो। लेकिन भावि में इसमें कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण आत्मानुभाव, घटनाएं, प्रसंग और अंतर्बाह्य सबलताओं तथा दुर्बलताओं के साथ दस्तावेज़ दर्ज करें तो हिंदी साहित्य को एक और सशक्त, संवेदनशील, प्रेरणादायी उर्ध्वगाती जीवन की, त्याग एवं ताप की अनोखी आत्मकथा मिलेगी इसमें संदेह नहीं। क्षमता तो उनमें है ही और आत्मकथा के लिए जिस चीज़ की ज़रूरत होती है, वह उनमें ग़ज़़ब की है ही। बस आवश्यकता है ठाने और ख़तरे उठाने की। क्योंकि आपके जितनी ईमानदार सर्जना शायद ही किसी प्रवासी भारतीय साहित्यकार में शायद ही मिलेगी। वो वृत्ति-प्रवृत्ति सामने आयेगी जो सिंदूर उतारने पर पत्थर का परिचय कराती है, साथ ही वो अच्छाइयां आलोक में आयेंगी जो बुराइयों के राख़ के नीचे ढकी की ढकी रही हैं। अतः इन पंक्तियों के लेखक का साग्रह आवेदन एवं निवेदन रहेगा कि ‘कविता संचयन’ खण्ड एक के आत्मकथ्य को आत्मकथा के रूप में आंतरित करने संकल्प साकार करें।

 कवयित्री का साहित्य सृजन स्थानीय से वैश्वीय धरातल पर विकीर्ण है। उनके लेखन की संवेदना व्यापक है। उनके ‘स्व’ की अनुभूति पाठक को स्वयं अपनी लगती है। उनके कविता की चेतना ‘स्व’ तक सीमित न होकर ‘पर’ को प्रभावित करती है। वह वेदना और संवेदना- दोनों स्तरों पर तादात्म्य स्थापित कराती है और साधारणीकरण के स्थिति तक ले जाती है। उनकी अपनी मान्यता है है कि ‘मेरी दृष्टि में विश्व और मनुष्यता का रक्षण और संरक्षण ही कविता का मूल उद्देश्य है।’ जब वे यह मानकर लिखती है कि ‘जब मैं लिखूं तो ऐसे लिखूं कि उसमें अपनी बातें होते हुए भी पूरे विश्व की बातें हो, अपनी और अपनों की चिंता में पूरे विश्व की चिंता हो।’ तब कहने में कोई संकोच नहीं बचता कि उनका काव्य निजी परिपार्श्व के जरिए वैश्विक परिवेश एवं परिदृश्य को ही प्रस्तुत करता। जिसमें, अखंड एवं पाखंड, खुशी और गम, सबलताएं एवं दुर्बलताएं, स्वरूपता और विरूपता एवं ईमानी और बेईमानी के साथ अवतीर्ण है। उनका साहित्य संसार विशाल है जिसमें अस्सी से अधिक ग्रंथ हैं। कहानी, उपन्यास, आलोचना, शोध-निबंध और एक दर्जन से अधिक काव्य संग्रहों के बावजूद ‘कविता संचयन’ के तीन बड़े-बड़े खण्ड प्रकाशित हैं अपनी गरिमा और गौरव के साथ। इनमें आठसौ से अधिक कविताएं संकलित हैं। 

 मानव प्रेम और विश्व मानव प्रेम का गुणगान करनेवाली इस विश्व कोयल को यदि ‘कविता संचयन’के लिए किसी दिन ज्ञानपीठ या नोबेल पुरस्कार से नवाजा जाएँ तो किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए। जन धर्मिता, प्रेम धर्मिता तथा विश्व धर्मिता का दायित्व वहन करने वाली इस कवयित्री का कलेजा इतना बड़ा विशाल है कि उसके काव्य-सागर के तह तक जाना सहज संभव नहीं। 

 डॉ. पुष्पिता अवस्थी के समग्र साहित्य का अध्ययन उनके चेतना के वैविध्य का परिचायक लगता है। उनकी काव्य-दृष्टि अत्यंत व्यापक है, जिसके ओर-छोर को पकड़ना क्षितिज को पकड़ने के प्रयास जैसा है। जीवन के चार दशक स्वदेश में बिताने के बाद वे विदेश भूमि में जा बसी- अपने कर्म की अलग पहचान के साथ। जिस देश की यात्रा की, उसे अपना माना। जो दायित्व मिला या सौंपा गया, उसे क्षमता से निभाया। अपने वैश्विक भ्रमण से, तजुर्बे से तथ्य पाया कि विदेशी साहित्यकारों से अधिक आत्मीयता और विश्वसनीयता स्वदेशी अर्थात भारतीय हिंदी विद्वानों में है। समकालीन ही नहीं अपितु हमकालीन कविता के क्षेत्र में उनका स्थान शीर्षस्थ है। उनकी कविता नई सदी का स्वर बनकर शब्द ब्रह्म की प्रतीति कराती है और अहं की समाप्ति। वह ‘स्व’ से ऊपर उठकर ‘पर’ का चिंतन बनती है। उसमें अर्थ का अवगाहन करने वाली ओजस्वी वाणी, दिव्यदृष्टि और प्रेरणा मिलेगी इसमें संदेह नहीं। कोई श्रेष्ठ या कालजयी साहित्यकार पुरस्कार या सम्मान के लिए नहीं लिखता मगर सम्मान की प्राप्ति उसके दायित्व को बढ़ाती है इसे नकार नहीं सकते। 

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)


सोमवार, 5 जनवरी 2026

02 मई 1986 से छप रहा ‘आवाज़-ए-मुल्क’

                                                                     - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 

‘आवाज़-ए’-मुल्क’ अख़बार

भारत में उर्दू अख़बारों का अलग ही तेवर रहा है। जब देश आज़ादी की आंदोलन की आग में जल रहा था, तब उर्दू अख़बारों के मालिकान और संपादक अपेक्षाकृत अधिक प्रताड़ित किए गए थे। उर्दू पत्रकारिता में मौलवी मोहम्मद बाक़िर का नाम सरे-फेहरिस्त आता है। इन्होंने 1837 से सबसे ‘डेली उर्दू अख़बार’ नाम से अख़बार निकालने की शुरूआत दिल्ली से की थी। तब अख़बार निकालना बेहद कठिन काम था। मौलवी बाक़िर के अख़बार निकालने से अंग्रेज़ बहुत नाराज़ थे। इसी वजह से जब 1857 का विद्रोह हुआ तो मौलवी बाक़िर को 16 सितंबर 1857 को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके दो दिन बाद ही बिना किसी मुकदमे के उन्हें बंदूक की गोली से मार दिया गया। इतने जुल्म के बाद भी भारत में अख़बार निकालने का सिलसिला जारी रहा है। आज़ादी की आंदोलन में अख़बारों में ख़ास भूमिका निभाई।

वाराणसी के नदेसर स्थित सहकारी भवन में ‘आवाज़-ए-मुल्क’ का कार्यालय।

 आज़ादी के बाद 02 मई 1986 को वाराणसी से उर्दू अख़बार ‘आवाज़-ए-मुल्क’ निकलने का सिलसिला शुरू हुआ। वाराणसी के नदेसर स्थित सहकारी भवन में इसका ऑफिस बना। बाबू भुलन सिंह इसके संस्थापक हैं। इस अख़बार के पहले संपादक शाहीन मोहसिन थे। बाद में इस अख़बार के संपादक शायर सुलेमान आसिफ़ हुए, जो बीएचयू के उर्दू विभाग के सदर भी थे। वर्तमान समय में इसके मुद्रक, प्रकाशक और सपंादक इंद्र बहादुर सिंह है। इनके साथ इनके बेटे नितेश सिंह और अभिषेक सिंह इस अख़बार को चलाने में सहयोग कर रहे हैं।

बाबू भुलन सिंह

 ‘आवाज़-ए-मुल्क’ पूर्वांचल का प्रमुख उर्दू अख़बार है। तमाम दिक्कतों के बावजूद आज यह अख़बार वाराणसी से प्रकाशित हो रहा है। यहीं से छपकर मऊ, आज़मगढ़, जौनपुर, बलिया, ग़ाज़ीपुर और मिर्ज़ापुर जिलों में जाता है। इन जिलों में अख़बार के नुमाइंदे रोज़ाना ख़बरें भेजते हैं। आज भी उर्दू का एक ख़ास पाठक वर्ग है, जो हिन्दी अख़बारों के साथ-साथ उर्दू अख़बार ज़रूर पढ़ता है।

 90 के दशक में अक्सर ही फसादात हुआ करते थे, तब इस अख़बार के लोगों ने शांति कायम करने में अहम भूमिका निभाई थी। लोगों में सद्भाव पैदा करने के साथ ही पीड़ित लोगों की मदद का काम भी इस अख़बार के लोगों ने किया। 

‘आवाज़-ए-मुल्क’ के कार्यालय में बातचीत करते, बाएं से-इंद्र बहादुर सिंह, नितेश सिंह, डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और मोहम्मद अशफ़ा़क़ सिद्दीक़ी।

‘आवाज़-ए-मुल्क’ एक और ख़ास काम याद किया जाता है। इस अख़बार ने वाराणसी की सभी मस्जिदों का बारी-बारी से पूरा इतिहास फोटो सहित प्रकाशित किया था। उन दिनों छपे इन मस्जिदों के इतिहास को लोगों ने ऐतिहासिक दस्तावेज की तरफ संभाल कर रखा हुआ है। जब भी उर्दू पत्रकारिता की बात वाराणसी में होती है, लोग मस्जिदों के इतिहास वाले कॉलम को याद करते हैं।

इंद्र बहादुर सिंह बताते हैं वर्तमान समय में उर्दू अख़बार निकालना बहुत ही कठिन काम है। इसके बावजूद हम अख़बार के प्रकाशन का काम जारी रखे हुए हैं।


(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)

                                     


रविवार, 28 दिसंबर 2025

 बुद्धिसेन हमारे समय के ख़ास शायर: लालजी शुक्ल

‘बुद्धिसेन शर्मा जन्मोत्सव-2025’ के मौके पर छह लोगों को मिला सम्मान

बुद्धिसेन शर्मा अवार्ड पाने वाले लोग।

प्रयागराज। बु़िद्धसेन शर्मा जी हमारे समय के ख़ास शायर हैं, उनकी लिखी हुई ग़ज़लें आज विभिन्न मौके पर लोगों द्वारा कोट की जाती हैं। उनके परिवार में कोई नहीं है, इसके बावजूद उनका जन्मोत्सव मनाया जाना बहुत बड़ी बात है। उनके शिष्य डॉ. केके मिश्र उर्फ़ इश्क़ सुल्तानपुरी के प्रयास से यह आयोजन प्रति वर्ष किया जा रहा है। यह कार्य गुफ़्तगू संस्था द्वारा किया जाता है। बुद्धिसेन शर्मा को इस तरह याद किया जानाा आज के समय में बेहद उल्लेखनीय और सराहनीय है। डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने गुफ़्तगू के जरिए साहित्य को बेहतर ढंग से मूल्यांकिन और रेखांकित जाना हमारे शहर की ख़ास पहचान दिख रही है। यह बात 26 दिसंबर 2025 की शाम कटरा स्थित पुस्तक मेेले में गुफ़्तगू संस्था द्वारा आयोजित ‘बुद्धिसेन शर्मा जन्मोत्सव-2025’ के दौरान मुख्य अतिथि पूर्व एसएसपी लालजी शुक्ल ने कही।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि 23 वर्ष पूर्व स्थापित गुफ़्तगू संस्था ने अपने कार्यक्रमों के द्वारा देश में जो अपनी पहचान बनायी है, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। जब इस संस्था की शुरूआत हुई थी तब यह अंदाजा नहीं था कि यात्रा इतनी लंबी और शानदार होगी।

गुफ़्तगू के नवीनतम अंक का किया गया विमोचन

गुफ़्तगू के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ा़जी ने कहा कि बुद्धिसेन शर्मा हमारे समय के उल्लेखनीय शायर हैं। इसलिए इनको भुलाया नहीं जा सकता है। उनकी शायरी को हमेशा से प्रासंगिक बनाए रखने का प्रयास हम करते रहे हैं। सिविल डिफेंस के चीफ वार्डेन अनिल कुमार ‘अन्नू भइया’, ग़ाज़ीपुर के डाक अधीक्षक मासूम रज़ा राशदी, विनोद कुमार सिन्हा ‘विरल’, देवी प्रसाद मिश्र, नरेश कुमार महरानी, हकीम रेशादुल इस्लाम, अफ़सर जमाल और डॉ. एस.एम. अब्बास ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन शैलेंद्र जय ने किया। इस मौके पर छह लोगों को बुद्धिसेन शर्मा अवार्ड प्रदान किया गया, साथ ही गुफ़्तगू के नये अंक का विमोचन भी किया गया।

दूसरे दौर में कवि सम्मेलन-मुशायरा का आयोजन किया गया। रचना सक्सेना, संजय सक्सेना, अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’, शिवाजी यादव, अनिल मानव, नीना मोहन श्रीवास्तव, मंजुलता नागेश, दयाशंकर प्रसाद, धीरेंद्र सिंह नागा, सुनील दानिश, श्रीरंग पांडेय, शिबली सना, पीयूष मिश्र, डॉ. सरस्वती प्रसाद पांडेय, हनीफ़ मछलीशहरी, रामकृष्ण शर्मा, हरीश वर्मा ‘हरि’ अरुणिमा बहादुर खरे, रंजना, क्षमा द्विवेदी आदि ने कलाम पेश किया।


इन्हें मिला बुद्धिसेन शर्मा अवार्ड

सरिता गर्ग सरि, इबरत मछलीशहरी, अरविन्द सिंह, संजय पांडेय, राजेश वर्मा और राज जौनपुरी


शनिवार, 13 दिसंबर 2025

05 सितंबर 1920 से छप रहा ‘आज’

शिवप्रसाद गुप्त हैं इस दैनिक अख़बार के संस्थापक

यूपी, बिहार और झारखंड से भी निकलता है यह

                                                                              - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 देश में छपने वाले अख़बारों में ‘आज’ का प्रमुख स्थान रहा है। आज़ादी से पहले निकलने वाले अख़बारों का मुख्य उद्देश्य देश को आज़ाद कराना रहा है। इसके लिए अख़बार के मालिकों और संपादकों को अंग्रेज़ों के उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ा था। कुछ मालिकों और संपादकों को तो अंग्रेज़ों ने फांसी की सजा तक दे दी थी। इसके बावजूद अख़बारों ने अपना काम बखूबी किया था। इन्हीं उद्देश्यों और ऐसे ही माहौल में ‘आज’ अख़बार की शुरूआत करने वाले बाबू शिवप्रसाद गुप्त जी ने 30 अप्रैल 1914 से कई देशों का दौरा शुरू किया था। इस दौरान उन्हें कई अनुभव हुए। इनमें एक ख़ास अनुभव अख़बार को लेकर हुआ। उन्हें इंग्लैंड में ‘लन्दन टाइम्स’ नामक अख़़बार देखने को मिला। इस अख़बार से वे काफी प्रभावित हुए। तब उन्हें लगा कि अपने देश में हिन्दी में भी ऐसा ही एक प्रभावशाली अख़बार प्रकाशित किया जाना चाहिए। फिर जब वे भारत लौटे तो उन्होंने ‘आज’ नामक अख़बार का शुभारंभ 05 सितंबर 1920 को वाराणसी से किया, तब इसी दिन जन्माष्टमी भी थी। लोकमान्य तिलक जी से परामर्श करने के बाद इसका शुभारंभ किया गया था। 

वाराणसी के कबीरचौरा में ‘आज’ अख़बार का कार्यालय

बाबू शिवप्रसाद गुप्त जी का मानना था कि ‘‘हमारा अख़बार दैनिक है। रोजाना इसका प्रकाशन होगा। दुनिया भर की नई-नई ख़बरें इसमें छपेंगी। रोजाना दुनिया की बदलती हुई दशा में नये-नये विचार उपस्थित करने की ज़रूरत होगी। हमें रोज-रोज अपना मत तत्काल स्थिर करके बड़ी-छोटी सब प्रकार की समस्याओं को समयानुसार हल करना होगा। जिस क्षण जैसी आवश्यकता पड़ेगी, उसी की पूर्ति का उपाय सोचना और प्रचार करना होगा। इसलिए हम एक ही रोज की जिम्मेदारी प्रत्येक अंक में ले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक अंक में ले सकते हैं। वह जिम्मेदारी प्रत्येक दिन केवल आज की होगी, इस कारण इस पत्र का नाम ‘आज’ है।’’  पू. बाबूराव विष्णु पराडक़र इस अख़बार के पहले संपादक बने। पराडकर जी का कहना था कि हमारा मक़सद अपने देश के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्रता का उपार्जन करना होगा। हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते हैं और यही हमारा लक्ष्य है।

बाबू शिवप्रसाद गुप्त

‘आज’ के संपादकीय में छपा-‘‘संसार इस समय बेचैन है। चारों ओर हलचल है। सब नर-नारी परेशान हैं, क्यों ? राष्ट्रनीतिज्ञों को इसका कारण विचार कर निकालना चाहिए। जिधर देखिये उसी ओर अशान्ति विराज रही है। सब लोग एक दूसरे से अप्रसन्न हैं। अपनी-अपनी श्रेणी को संघटित कर सब लोग दूसरी श्रेणियों से लडऩे के लिए तैयार हैं। इस हलचल में केवल एक सिद्धान्त है-जिसके पास अधिकार है, उससे अधिकार ले लेना चाहिए। जिसके पास अधिकार नहीं है, वह दूसरों को अधिकार प्राप्त देखकर जलता है और उसके पास से अधिकार हटवाना चाहता है। अनधिकारी अधिकारी से द्वेष करता है और अधिकारी अनधिकारियों की संख्या देख उनसे डरता है, उनकी संघटित शक्ति घटाना चाहता है और उनके प्रति रोष दिखाकर उन्हें अधीन अवस्था में ही पड़े रहने का आदेश देता है। राष्ट्र-राष्ट्र, वर्ग-वर्ग, वर्ण-वर्ण सबके झगड़े का मूल मंत्र यही प्रतीत होता है कि अधिकारी के पास अधिकार न हो। अधिकार हटाया जाना चाहिए। तो शान्ति कैसे हो सकती है, चैन कैसे मिल सकता है? शासन और शासित, मालिक और मजदूर, अमीर और गरीब अपने-अपने हक़ और फर्ज दोनों को जब तक अच्छी तरह नहीं समझते, तब तक नीति नहीं हो सकती। दो परस्पर विरोधी श्रेणियों को यह सच समझना होगा।’’

विद्या भास्कर

इसी के साथ ‘आज’ अख़बार का सफ़र शुरू हो गया। ‘आज’ के विभिन्न संस्करण के प्रकाशन की शुरूआत 1977 से हुई। पहले कानपुर, इसके बाद आगरा, गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, बरेली से भी ‘आज’ निकलने लगा। फिर दूसरे राज्यों से इसका शुभारंभ किया गया। बिहार में पटना, रांची, धनबाद, जमशेदपुर से भी अख़बार निकलने लगा, यह सिलसिला आज भी जारी है। कुछ वर्षों (1943 से 1947 तक) को छोड़क़र पू. बाबूराव विष्णु पराडक़र 1920 से 1955 तक ‘आज’ के संपादक रहे। कमलापति त्रिपाठी ‘आज’ में 1932 में आये। कुछ समय बाद वह ‘आज’ के संपादक नियुक्त हुए और पराडक़रजी को प्रधान संपादक बना दिया गया। 1943 में विद्या भास्कर और बाद में श्रीकान्त ठाकुर, रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर ‘आज’ के सम्पादक बने।

कमलापति त्रिपाठी

 1959 में सत्येन्द्र कुमार गुप्त ने ‘आज’ के प्रधान सम्पादक का दायित्व संभाला। इससे पहले 1942 से सोलह वर्ष तक उन्होंने ‘आज’ का संचालन किया था। सत्येन्द्र कुमार गुप्त ने ‘आज’ की गौरवपूर्ण परम्परा की रक्षा करते हुए पत्र को उन्नति की ओर अग्रसर किया था। अनेक बाधाओं के बावजूद अख़बार का पृष्ठ-विस्तार कर उसे नये भारत की आवश्यकता के अनुरूप बनाया। पचीस वर्षों तक ‘आज’ के सम्पादन के बाद उनका निधन 6 नवम्बर, 1984 को हो गया।

श्रीकांत ठाकुर

 वर्ष 1942 में जब सत्येन्द्र कुमार गुप्त ने ज्ञानमण्डल लिमिटेड का प्रबंधन सम्भाला, उनकी सहधर्मिणी शशिबाला गुप्त इस कार्य में सक्रिय सहयोग प्रदान करती थीं, ज्ञानमण्डल लिमिटेड  से ही अख़बार का प्रकाशन होता है। उन्होंने 1959 में ज्ञानमण्डल के प्रबंध संचालक का कार्यभार संभाला। ‘आज’ की स्वर्ण जयंती के अवसर पर उनके प्रोत्साहन और प्रेरणा से सचित्र ‘प्रेमसागर’ का प्रकाशन हुआ और उसे निःशुल्क वितरित किया गया। वर्तमान समय में शार्दूल विक्रम गुप्त इस अख़बार के प्रधान सम्पादक हैं। इन्होंने सन 1984 में कार्यभार संभाला था। 

बाबूराव विष्णु पराड़कर

 प्रतिदिन प्रकाशित होने वाले इस संस्थान सेे कई और विशेषांक और पत्रिकाएं आदि प्रकाशित होती रही हैं। 1944 से सोमवार विशेषांक, 18 जुलाई 1938 से ‘आज’ साप्ताहिक के अलावा ज्ञानमण्डल से ‘स्वार्थ’ पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ था। दो-ढाई वर्ष तक चलने के बाद आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसे बंद करना पड़ा। 1921 में ‘मर्यादा’ मासिक पत्रिका का अधिग्रहण किया और संपूर्णानंद के संपादकत्व में इसका प्रकाशन शुरू हुआ था। 1947 में ‘समाज’ का प्रकाशन शुरू हुआ था। इसके संपादक मंडल में आचार्य नरेंद्र देव भी थे। एक अक्तूबर, 1950 से इसका प्रकाशन बंद हो गया। 1947 में ‘चित्ररेखा’ नामक कहानी पत्रिका का शुभारंभ हुआ था। इसके कुछ अंक प्रकाशित हुए थे। 30 जुलाई 1931 को अंग्रेज़ी दैनिक ‘टुडे’ का भी प्रकाशन यहीं से शुरू हुआ था। उन दिनों यह अख़बार भी चर्चा में रहा था। 1979 में ‘अवकाश’ नाम से हिन्दी पाक्षिक पत्रिका का शुभारंभ हुआ था, लगभग दस वर्षों तक इसका प्रकाशन हुआ।

शार्दूल विक्रम गुप्त

अख़बारों और पत्रिकाओं के अलावा इस संस्थान से कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का भी प्रकाशन हुआ है। ‘बृहत हिन्दी कोश’ के सात संस्करण अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। ‘अंगेजी-अंग्रेजी-हिन्दी’ नामक पुस्तक का प्रकाशन डॉ. हरदेव बाहरी के संपादन में हुआ है। यहीं से प्रकाशित हुआ ‘पौराणिक कोश’ बहुत ही उपयोगी है। इसी तरह ‘भाषा विज्ञान कोश’, ‘वाङ्मयार्णव’, ‘काव्य प्रकाश’, ‘ध्वन्यालोक’, ‘सूरसागर’, ‘हिन्दुत्व’, ‘अशोक के अभिलेख’, ‘वास्तु मर्म’, ‘स्वतंत्रता संग्राम’, ‘चिद्विलास’, ‘पालि साहित्य का इतिहास’, ‘पालि व्याकरण’, ‘महापरिनिब्बान सुत्तं’, ‘पालि पाठशाला’, ‘समाचार पत्रों का इतिहास’ और ‘मालवीय जी महाराज की छाया में’ आदि पुस्तकों का प्रकाशन भी इस संस्थान की तरफ से हुआ है। 

‘आज’ के वाराणसी कार्यालय में बातचीत करते। बाएं से-संजय कुमार, डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और मोहम्मद अशफ़ाक़ सिद्दीक़ी।

वर्तमान समय में ‘आज’ के वाराणसी कार्यालय में कार्यरत विज्ञापन प्रबंधक संजय कुमार जी का कहना है कि - ‘‘ ‘आज’ हर मोर्चे पर आज भी ईमानदार लड़ाई लड़ रहा है। उसकी नज़र आज भी शासक पर है, शासित पर है। अफ़सरशाही की गतिविधियों पर उसकी कड़ी नज़र होती है। ग्राम जगत उससे अछूता नहीं है। गांवों की समस्याओं को हम सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हैं। शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी, महिलाओंकी स्थिति, बढ़ते अपराध, सरकार की दुर्नीति, पुलिस की निष्क्रियता सब पर हमारी नज़र होती है।’’ 

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)