शनिवार, 15 अगस्त 2026

 बिहार गवर्नर की मेहमान बनी टीम गुफ़्तगू

डॉ. ग़ाज़ी, उस्मानी, तन्हा और महरानी पटना में दो दिन रुके 

ऐतिहासिक गुरुद्वारा और खुदाबक्श लाइब्रेरी भी देखने गए

                                                           - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

लोकभवन में राज्यपाल के साथ बाएं से- नरेश कुमार महरानी, मनमोहन सिंह तन्हा, आरिफ़ मोहम्मद ख़ान, आसिफ़ उस्मानी और डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 बिहार के राज्यपाल महामहिम आरिफ़़ मोहम्मद ख़ान साहब के आमंत्रण पर हम चार लोग (डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, आसिफ़ उस्मानी, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी) 01 फरवरी, 2026 की सुबह लगभग आठ बजे अपनी कार से प्रयागराज से पटना के लिए निकले। आरिफ़ साहब जब केरल के राज्यपाल थे, तब से ही हम लोगों को बुला रहे थे, लेकिन किसी न किसी वजह से हम जा नहीं पा रहे थे। बहुत टाल-मटोल और रस्सा-कस्सी के बीच 01 फरवरी को जाना फाइनल हुआ।

 हम कार से पटना के लिए निकले थे। हमारा अंदाज़ा था कि पांच-छह घंटे में पहुंच जाएंगे। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। रास्ता भटक जाने और बीच में सासाराम स्थित शेरशाह सूरी के मक़बरा पर जाने की वजह से हमें पटना पहुंचने में काफी विलंब हो गया। सुबह आठ बजे ही निकले थे, हमें भूख लगी थी। एक रेस्टोरेंट पर नाश्ता करने की सोचकर हम कार रोककर बाहर निकले। रेस्टोरेंट के अंदर गए, अंदर बिल्कुल सन्नाटा था, एक भी आदमी नहीं था, सिर्फ़ रेस्टोरेंट के कर्मचारी थे। सन्नाटा देखकर हमलोग वापस आने लगे। हमारे वापस आने पर रेस्टोरेंट के दो कर्मचारी हमारे पास आ गए और हमारे वापस जाने का कारण पूछने लगे। काफी बहस करने लगे, वे किसी भी हालत में हमें वापस जाने देना नहीं चाह रहे थे। लेकिन, हमें लगा कि इतना सन्नाटा होने का मतलब बासी बनाया हुआ खाना मिलेगा। इसलिए हमलोग रुके नहीं। लगभग दो किलोमीटर आगे जाकर एक ढाबा पर रुके, वहां पहले से ही और लोग भी नाश्ता कर रहे थे। इसलिए हमलोगों ने भी वहीं नाश्ता किया।

 नाश्ता करने के बाद जब हम आगे बढ़े, आसिफ़ उस्मानी ने कहा कि यहीं पर शेरशाह सूरी का मक़बरा है। हमें वहां ज़रूर चलना चाहिए। दिन के तकरीबन 11 बजे थे। हमने अपनी गाड़ी सासाराम में स्थित शेहशाह सूरी के मक़बरे की तरफ़ घुमा दी। मक़बरे के अंदर जाने के लिए टिकट लिए और प्रवेश कर गए। मक़बरे के दोनों तरफ बड़ा सा तालाब है। तालाब का पानी इतना साफ़ है कि उसमेें तैरती हुई मछलियां साफ़ दिखाई दे रही थीं। तकरीबन, 40-45 मिनट हमने मक़बरे का भ्रमण किया, विभिन्न तरह से तस्वीर खिंचाई। फिर बाहर आए तो एक आईसक्रीम वाला खड़ा था। हमने आइसक्रीम खाई, फिर पटना की ओर निकल गए। प्रयागराज से सासाराम तो हम बहुत आसानी से आ गए थे, बिना किसी विलंब या रुकावट के। लेकिन, सासाराम से जब पटना की ओर चले तो रास्ता भटक गए। हाई-वे से न जाकर मुख्य सिटी से चले, जिसकी वजह से जगह-जगह जाम के कारण परेशानी होती रही। बीच-बीच में महामहिम राज्यपाल साहब के पी.ए. अनिल जी का फोन मेरे मोबाइल पर आता रहा कि ‘अभी आप लोग कहां हैं?’ मैं उन्हें अपना लोकेशन बताता रहा। हमारा अनुमान था कि तीन बजे तक ज़रूर पहुंच जाएंगे। लेकिन, भटकते-भटकते हम शाम 7ः30 बजे पहुंचे।

 गवर्नर हाउस के गेट पर सुरक्षा कर्मियों ने हमें रोका। हालांकि, 31 जनवरी की शाम को ही गवर्नर साहब के पीए अनिल जी ने मुझे फोन करके सभी आने वालों का नाम और गाड़ी नंबर आदि नोट कर लिया था, जो गेट पर अंकित कराया गया था। गेट पर हमने अपना नाम बताया। सुरक्षाकर्मी तुरंत ही अपने केबिन में गया और एक लिस्ट उठा लाया। लिस्ट से नाम मिलाकर बोला-आप लोग जा सकते हैं।

 गवर्नर हाउस (लोक भवन) में एक फरवरी की शाम सात बजे से ही स्थापना दिवस का कार्यक्रम था। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और चंडीगढ़ का स्थापना दिवस कार्यक्रम शुरू हो गया था। हमारे पहुंचने पर गवर्नर साहब के पीए हमारे पास आए और बोले-‘आप लोग पहले अपने रुकने वाले कमरे में चलेंगे या सीधे प्रोग्राम में ?’ हमने फैसला किया कि पहले हम प्रोग्राम में जाएंगे। हमें आगे से दूसरी पंक्ति में बैठाया गया। गवर्नर साहब मंच पर जा चुके थे, उनके बगल में अन्य लोगों के अलावा उनकी पत्नी भी बैठीं थीं। गवर्नर साहब के अभिभाषण समेत कई रंगारंग कार्यक्रम हुए। हम सुबह से ही चले थे, शायद इसी वजह से आसिफ़ उस्मानी का शुगर लो होने लगा। उन्होंने मुझसे कहा कि मेरा शुगर लो हो रहा है, मेरे लिए कुछ खाने-पीने का इंतज़ाम कराइए। मैंने अनिल जी से यह बात बताई। उन्होंने तुरंत ही कुछ बिस्किट और चाय मंगवा कर दिया। आसिफ़ साहब के साथ मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश महरानी ने भी चाय-बिस्किट का आनंद लिया, मेरा चाय पीने का मन नहीं हुआ। इस आयोजन में ढेर सारे आई.ए.एस., पी.सी.एस. और आईपीएस अधिकारी समेत अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।

बिहार लोकभवन में राज्यपाल महामहिम आरिफ़ मोहम्मद ख़ान से मुलाकात 

 लगभग 8ः45 तक कार्यक्रम चला। कार्यक्रम के बाद वहीं उसी हॉल में डिनर का इंतज़ाम किया गया था। तीन-चार टेबिल पर बोर्ड लगे थे ‘गवर्नर फैमिली के लिए’। हमें इसी रिज़र्व टेबिल पर बिठाया गया। हमने साथ में खाना खाए। गवर्नर साहब के पीए ने भी हमारी ही टेबिल पर हमारे साथ ही खाना खाया। ठीक बगल वाले टेबिल पर गवर्नर साहब ने अपनी पत्नी, बेटे-बेटियों और पोता-पोतियों के साथ खाना खाया। खाने के बाद काफी देर तक लोग गवर्नर साहब के साथ फोटो खिंचवाते रहे। इसके बाद गवर्नर साहब हमारे पास आए। बोले, हमारे साथ आप लोग चलिए। फिर हमलोग उनके साथ गवर्नर हाउस के उस हिस्से की तरफ बढ़े, जिधर लोगों के रुकने का इंतज़ाम था। लिफ्ट के पास पहुंचे तो गवर्नर साहब ने  हमारी ओर इशारा करते हुए अपने सुरक्षाकर्मियों से कहा-‘इन लोगों को लिफ्ट से उपर ले चलो, मैं सीढ़ी से उपर आता हूं।’ हम लिफ्ट से दूसरी मंज़िल पर पहुंच गए। वहां ढेर सारे सोफ़े-कुर्सियां लगी थीं। बीच वाले सोफे को छोड़कर उसके दोनों तरफ के सोफे पर हम बैठ गए। एक तरफ मैं और आसिफ़ उस्मानी, दूसरी तरफ मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी। थोड़ी ही देर में गवर्नर साहब आकर अपनी सीट पर बैठ गए। फिर उन्होंने अपने कर्मचारियों से कहा कि इन लोगों को ‘कहवा’ पिलवाइए। फिर बातचीत शुरू हुई, जो लगभग ढाई घंटे चली। इसी बीच हमें ‘कहवा’ सर्व कर दिया गया था। तकरीबन 11ः30 बज गए, गवर्नर साहब ने कहा अब आप लोग अपने कमरे में आराम करिए, कल सुबह मिलते हैं। 

 हम चारो लोगों को साथ लेकर अनिल जी उन कमरों की तरफ आए, जहां हमारे रुकने का इंतज़ाम था। एक कमरा मेेरे (डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी) और आसिफ़ उस्मानी साहब के लिए, ठीक उसी के बगल वाला कमरा मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार ‘महरानी’ के लिए था। हमलोग अपने-अपने कमरे में आ गए। थोड़ी ही देर में नरेश कुमार महरानी हमारे कमरे में आ गए, बोले-’हमलोगों के कमरे में तो बाथरूम ही नहीं है।’ मुझे इस पर बहुत हैरानी हुई। मैंने अनिल जी को फोन करके यह बात बताई। अनिल जी हंसे, बोले-’गवर्नर हाउस के गेस्टरुम में बाथरुम न हो, ऐसा मुमकिन है? ठीक से देखिए।’ नरेश महरानी से मैंने कहा कि परदे वग़ैरह हटाकर देखिए, बाथरूम होगा। कमरे में कई तरफ़ भारी-भरकम परदे लगे हुए थे, बाथरूम का दरवाजा़ परदे से ढके होने की वजह से उनकी नज़र बाथरुम की तरफ़ नहीं पड़ी थी। कमरे में ही बाथरुम था, जो खोजने पर मिला।

बिहार लोकभवन के रिज़र्व टेबिल पर खाना खाते टीम गुफ़्तगू के लोग।

 हमारे लिए जो सेवक लगाया गया था, उससे आसिफ़ उस्मानी ने कहा कि मैं सुबह छह बजे ही काली चाय पीता हूं। उसके बाद ही बाथरूम जाता हूं। सेवक ने कहा-‘सुबह छह बजे आपको काली चाय मिल जाएगी।’ थोड़ी देर तक बात करने के बाद ही हमलोग सो गए। सुबह आठ बजे से ही चले थे, काफी थक गए थे। अगले दिन ठीक सुबह छह बजे कमरे की घंटी बजी। मैंने दरवाज़ा खोला, चाय-बिस्किट लिए सेवक खड़ा था। आसिफ़ उस्मानी ने उस सेवक से कहा कि हिन्दी का जो भी अख़बार आता हो, ले आओ। हमने चाय-बिस्किट का आनंद लिया, फिर बाथरूम गए। थोड़े ही देर में हमारे कमरे में ‘हिन्दुस्तान’ अख़बार आ गया। मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी भी हमारे ही कमरे में आ गए। एक बार फिर से हमने चाय के लिए आर्डर किया। इस बार चार लोगों के लिए चाय-बिस्किट आ गया। बातचीत करते-करते सुबह के नौ बज गए। तभी एक सेवक आकर बोला, आप लोग आइए नाश्ते के लिए। पास के ही कमरे में डाइनिंग टेबिल लगी थी। वहां अनिल जी और एक-दो लोग बैठे थे, हम भी पहुंच गए। मुझसे मुख़ातिब होते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में अनिल जी बोले-‘बाथरुम मिला था या नहीं।’ हमलोग भी हंस पड़े। फिर हम सभी ने नाश्ता किया। 

रात में गवर्नर साहब से बातचीत के दौरान ही मैंने उनको बताया दिया था कि मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ अपनी किताब ‘मशवरा’ लेकर आए हैं। आपके हाथों विमोचन कराना चाहते हैं। उन्होंने कहा था कि-’सुबह विमोचन हो जाएगा, तब हमारा कमैरामैन और अन्य लोग भी रहेंगे।‘ नाश्ते के बाद हमें गवर्नर साहब के ऑफ़िस में ले जाया गया। बीच वाली कुर्सी गर्वनर साहब के लिए थी। बाकी अगल-बगल वाली कुर्सियों पर हमलोग बैठ गए। थोड़ी ही देर में गवर्नर साहब आ गए। उन्होंने आते ही सेवक से चाय लाने को कहा। चाय आ गई। फिर उन्होंने कहा- ’किताब लाइए, विमोचन हो जाए।’ तब तक फोटोग्राफर और कई अन्य लोेग भी आ चुके थे। विमोचन हो गया, फोटोग्राफी भी हो गई।

पंजाब, हरियाण, दिल्ली और चंडीगढ़ दिवस पर बिहार लोकभवन में आयोजित हो रहा रंगारंग कार्यक्रम।

मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी ने कहा कि ’बिहार विधान सभा की कार्यवाही चल रही है, हमलोग देखना चाहते हैं।’ फिर मैंने अनिल से इनकी इच्छा बताई। अनिल जी कहा कि आप लोग देर से बता रहे हैं, फिर भी मैं पास बनवाने की कोशिश करता हूं। बहरहाल, थोड़ी देर में ही इन दोनों का पास बन गया। तन्हा और महरानी लोकभवन की गाड़ी में ही बैठकर बिहार विधान सभा गए। वहां बहुत लोगों के साथ-साथ इनकी मुलाकात मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से हुई। लगभग दो घंटे बाद ये लोग बिहार विधान सभा से लौटकर आए। इस दौरान मैं और आसिफ़ उस्मानी साहब अपने कमरे में ही रहे।

फिर, गवर्नर साहब से हमने पटना के गुरुद्वारा और ‘खुदाबख़्श लाइब्रेरी’ जाने की इच्छा जताई। हमारी बात सुनकर पास में खड़े पीए ने कहा कि आइए सारे इंतज़ाम करा देता हूं। गवर्नर साहब ने कहा कि दिन में मुझे कई कार्यक्रमों में जाना है, शाम को हमलोग फिर से साथ बैठेंगे। यह कहकर गवर्नर साहब अपने निर्धारित कार्यक्रम के लिए निकल गए। गवर्नर हाउस के एक सीनियर कर्मचारी ने आकर हमसे कहा कि आप लोगों के लिए नीचे कार तैयार है, आ जाइए। हम चारों लोग लिफ्ट से नीचे आ गए। गवर्नर हाउस की कार में चालक पहले से ही तैयार बैठा था। हमलोग भी बैठ गए।

 विभिन्न रास्तों से होते हुए हमारी कार गुरुद्वारे के दरवाज़े पर पहुंची। पहले से ही यहां हमारे आने की सूचना दी जा चुकी थी। कार के रुकते ही सिख धर्म का एक आदमी हमारी कार के दरवाज़े पर आया। हमें बहुत ही सम्मान के साथ गुरुद्वारे के अंदर ले गया। पहले हमें गुरुद्वारे के गेस्टरूम में ले जाया गया। वहां, पहले हमें पानी दिया गया, फिर थोड़ी ही देर में सबके लिए चाय आ गई। हमने चाय पी। इसके बाद गुरुद्वारे का ही एक आदमी हमें साथ ले गया। गुरुद्वारे के विभिन्न हिस्सों से हम घूमते हुए निकल रहे थे, काफ़ी भीड़ थी। भीड़ से ही लग रहा था कि यह कोई ख़ास और ऐतिहासिक गुरुद्वारा है। हमें प्रसाद दिया गया, साथ ही गेरूआ रंग का शॉल भी दिया गया। मैंने ग़ौर किया-यह शॉल सिर्फ़ हमीं चार लोगों को ही दी गई, अन्य जो लोग घूम रहे थे, उन्हें नहीं दिया गया। फिर गुरुद्वारे के उस हिस्से में हम गए, जहां लंगर चल रहा था। मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी अन्य लोगों के साथ लंगर खाने के लिए कतार में बैठ गए। बुजुर्गों के खाने के लिए दो-तीन बेंच और टेबिल लगे हुए थे। आसिफ उस्मानी अपनी लंगर की थाली को लेकर उसी बेंच पर बैठ गए। मैं भी उनके साथ बैठ गया, लेकिन मैंने लंगर की थाली नहीं ली, मेरा खाना खाने का मन नहीं कर रहा था। तीनों लोगों के लंगर खा लेने के बाद हम गुरुद्वारे के दरवाज़े की तरफ़ आ गए। दरवाजे़ पर खड़ी कार में चालक हमारा इंतज़ार कर रहा था।

  हम सभी कार में बैठे और फिर ‘खुदाबख़्श लाइब्रेरी’ की तरफ़ चल पड़े। थोड़ी ही देर में लाइब्रेरी पहुंच गए। यहां भी हमारे आने की सूचना पहले ही दे दी गई थी। कार के पहुंचते ही लाइब्रेरी के दो कर्मचारी आ गए। सलाम किए और अंदर ले गए। मोहम्मद असग़र साहब के चैम्बर में हमें बिठाया गया। पहले चाय-बिस्किट हमें पेश किया गया। इसके बाद असग़र साहब ने लाइब्रेरी में मौजूद बहुत सारे पुराने कु़रआन दिखाए, कई ऐसे कु़रआन भी इस लाइब्रेरी में है, जो पांचवीं और छवीं शताब्दी के हैं, जिन्हें सोने से लिखा गया। और बहुत सारी ऐतिहासिक किताबें दिखाई गईं। फिर मैंने उत्सुकता से पूछा-यहां ‘गुफ़्तगू’ पत्रिका भी भेजी जाती है, वह कहां रखी है। असग़र साहब हमें साथ उस ओर ले गए, जहां गुफ़्तगू पत्रिका रखी हुई थी, हमने उसकी फोटो ली। लाइब्रेरी का पूरा मुआयना करने के बाद हम वापस गवर्नर हाउस आ गए। शाम के छह बज गए थे। गुरुद्वारे में मैंने लंगर नहीं खाई थी, इसलिए भूख लग गई थी। मगर, यह खाने का वक़्त भी नहीं था। इसलिए अपने कमरे में पहुंचकर मैंने टोस्ट और चाय लाने को कहा। थोड़ी ही देर में ढेर सारा टोस्ट और चाय आ गया। मेरे साथ अन्य तीन लोगों ने भी चाय-टोस्ट लिया। फिर आराम करने का मन हुआ। अपने-अपने बेड पर लेट गए।

  रात के आठ बजे हमें खाना खाने के लिए बुलाया गया। हमारे साथ कई अन्य लोग भी ख़ाना खाने बैठे। दो लोग कश्मीर से भी थे। गवर्नर साहब ने सुबह ही कह दिया था कि आज के खाने में आप लोगों को मखाने का हलवा खिलवाऊंगा, यहां का बहुत ख़ास डिश है। खाना खाने के बाद मीठे के तौर पर मखाने का हलवा दिया गया। हम सभी ने बड़े चाव से उसका आनंद लिया। फिर हम अपने कमरे में आ गए। तकरीबन 20 मिनट बाद हमें यह कहकर बुलाया गया कि गवर्नर साहब बुला रहे हैं। एक दूसरे कमरे मे हम पहुंचे, जहां सोफे-कुर्सियां लगी थीं। हम पहले उस कमरे में पहुंचे, तुरंत ही गवर्नर साहब भी आ गए। फिर उन्होंने ‘कहवा’ का आर्डर दिया, हमने कहवा का आनंद लिया। फिर बातचीत शुरू हुई। बातचीत करते 11 बज गए।

पटना के खुदाबक्श लाइब्रेरी में दूसरी किताबों के साथ ‘गुफ़्तगू’ पत्रिका।

 मनमोहन सिंह तन्हा ने पहले ही बताया था कि कि कल बैंक में एक ज़रूरी काम है, इसलिए बिल्कुल सुबह ही निकलना पड़ेगा। सुबह जल्दी निकलने की बात जब गवर्नर साहब से बताई गई, तो वे नाराज़ हो गए, बोले-नाश्ता करने के बाद 10 बजे तक निकलिए। लेकिन, जब मनमोहन सिंह तन्हा ने अपना ज़रूरी काम बताया तो उन्होंने सुबह निकलने की इज़ाज़त दे दी। सुबह छह बजे निकलने की प्लानिंग हुई, इसलिए रात में ही गवर्नर साहब से हमलोगों ने विदाई ले ली। हमलोग अपने कमरे मे आ गए। थोड़ी ही देर में अनिल जी गवर्नर हाउस के बैग में रखे हुए हमलोगों के लिए गिफ़्ट लेकर आ गए, हमने उसे सहर्ष रख लिया और फिर सो गए। सुबह पांच बजे ही मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने हमारे कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। मैं और आसिफ़ उस्मानी उठ गए। फ्रेश होने के बाद हम चारो ने एक साथ अपने कमरे में ही चाय-टोस्ट वगैरह लिए और फिर प्रयागराज के लिए निकल गए। शाम चार बजे तक घर पहुंच गए।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित ) 


बुधवार, 12 अगस्त 2026

 कबीर, रहीम की तरह साधक हैं डॉ. सोमनाथ: अतुल

डॉ. सोमनाथ शुक्ल की पुस्तक ‘श्रम-साधक’ का हुआ विमोचन

बालीवुड अभिनेता का ‘गुफ़्तगू’ ने किया नागरिक अभिनंदन

अतुल तिवारी

प्रयागराज। डॉ. सोमनाथ शुक्ल के दोहे पढ़कर सहज ही कहा जा सकता है कि इन्होंने कबीर और रहीम की तरह साधना करके काव्य रचा है। इतनी आसानी से मजदूरों और श्रमिकों को रेखांकित करते हुए दोहा लिख देना बहुत बड़ी बात है। ‘श्रम साधक’ पुस्तक में इन्होंने जिस तरह से मजदूरों की हालात को रेखांकित किया है, वह आज दौर में बहुत अधिक ही उल्लेखनीय है। यह बात 09 अगस्त की शाम गुफ़्तगू की तरफ से सिविल लाइंस स्थित एक होटल में डॉ. सोमनाथ शुक्ल की पुस्तक ‘श्रम-साधक’ के विमोचन अवसर पर बॉलीवुड अभिनेता अतुल तिवारी जी ने कही। 

श्री तिवारी ने कहा कि यह पहली बार है कि किसी शहर ने मेरा नागरिक अभिनंदन किया है, वर्ना मेरे होम सिटी लखनऊ ने कभी नागरिक अभिनंदन नहीं किया। इसके लिए मैं गुुफ़्तगू संस्था का आभारी हूं।

डॉ. सोमनाथ शुक्ल की पुस्तक ‘श्रम-साधक’ का विमोचन करते अतिथिगण

डॉ. सरोज सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि डॉ. सोमनाथ जी ने दोहा लिखने के लिए जिन मुद्दों को उठाया है, आज के दौर में इस मुद्दे पर काव्य का लेखन नहीं हो रहा, अलबत्ता कहानियां लिखी जा रही हैं। डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि डॉ. सोमनाथ शुक्ल हमारे दौर के बहुत ही प्रतिभावान कवि हैं, ऐसे लोगों का सम्मान होना चाहिए। डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कहा कि इस पुस्तक में कुछ ऐसे दोहे हैं, जो मेरे जीवन से जुड़े हुए हैं। न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. सोमनाथ शुक्ल की किताब बेहद सराहनीय और ख़ास है। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा और धन्यवाद ज्ञापन नरेश कुमार महरानी ने किया।

फिल्म अभिनेता और कवि अतुल तिवारी का नागरिक अभिनंदन करते टीम गुफ़्तगू के लोग

इस मौके पर प्रभाशंकर शर्मा, नीना मोहन श्रीवास्तव, शैलेंद्र जय, आसिफ़ उस्मानी, डॉ. एस.एम. अब्बास, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, शिबली सना, अफसर जमाल, शिवाजी यादव, मंजुलता नागेश, सुनील दानिश, धीरेंद्र सिंह नागा, क्षमा द्विवेदी, शाहीद खुश्बू आदि मौजूद रहे।


सोमवार, 3 अगस्त 2026

सज्जाद ज़हीर को नहीं रास आया पाकिस्तान

मज़हब की बुनियाद पर बने मुल्क को छोड़ने का लिया था फैसला

पाकिस्तान में हो गई थी उम्रकै़द, पंडित नेहरु ने ज़हीर को छुड़वाया

                                                                          - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


 प्रगतिशील लेखक संघ का ज़िक्र आते ही सबसे पहले सज्जाद ज़हीर का नाम जे़ह्न में अपने-आप आ जाता है। 11 सितम्बर 1973 को लखनऊ में जन्मे सज्जाद ज़हीर ने ही मुल्कराज आनंद और ज्योतिर्मय घोष के साथ मिलकर 1935 में इंग्लैंड में प्रलेस का गठन किया था। 21वीं सदी के प्रथम दशक तक इस संघ ने बहुत शानदार काम किया है, मगर अब कई मुद्दों पर भटकता हुआ-सा दिखता है। सत्ता की महत्वाकांक्षा और खुद को सबसे बेहतर साबित करने की मंशा के कारण यह संगठन अपने मूल उद्देश्यों से ही भटक गया है। हालांकि कुछ शहरों में यह संगठन अब भी अच्छा कार्य कर रहा है।

सज्जाद ज़हीर

 सज्जाद ज़हीर की बेटी नादिरा ज़हीर बब्बर बताती हैं-‘‘सैंतालिस में जब देश आज़ाद हुआ  उस वक़्त अब्बा पाकिस्तान में थे। पाकिस्तान तो इस्लामिक विचार से बना था इसलिए वहां पर कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करने वालों की धर-पकड़ शुरू हो गई, अब्बा इसी पार्टी के लिए काम करते थे। इसी वजह से वो अंडरग्राउंड हो गए, लेकिन फाइनली उनको किसी ने मुख़बिरी करके पकड़वा दिया और उनको उम्रकैद हो गई। फिर यहां पर मेरी मां ने अपने तीनों बच्चों को पाला। उस समय मेरी मां और हम लोग लखनऊ में ही थे। मैं उस समय बहुत छोटी थी, मां ने बहुत मेहनत की। हम तीनों बहनों को लेकर एक बार पाकिस्तान भी गई थीं, अब्बा से जेल में मिलीं। जब उनसे हम मिलने पहुंचे तो अब्बा ने कहा तुम लोग भी यहीं आ जाओ तो मिलने में आसानी रहेगी। लेकिन उस समय मेरी मां ने फैसला लिया कि मैं ऐसे मुल्क में नहीं रहूंगी जो मज़हब की बुनियाद पर बना हो। अब्बा ने मेरी मां की बात पर सहमति जताई, फिर हम वापस लखनऊ आ गए।

अपनी पत्नी और चारो बेटियों के साथ सज्जाद ज़हीर।

 

 उस वक़्त मां ने बहुत मेहनत की और अब्बा को लाने की कोशिश की। जवाहरलाल नेहरू से मिलीं। उनसे कहा कि-‘‘मेरा शौहर तो पाकिस्तान में कैद है और यहां के लोग बोलते हैं कि जब हिन्दोस्तान आज़ाद हुआ तो सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान में थे, तो वो पाकिस्तानी हो गए। सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान में जेल में बंद हैं, हम लोग पूरी फैमिली यहां हैं तो हम लोग पाकिस्तानी कैसे हो गए।’’ उस वक़्त मोरारजी देसाई गृहमंत्री थे, उन्होंने इनके ख़त पर लिख दिया कि ये तो पाकिस्तानी हैं, हमको इनसे कोई लेना-देना नहीं है। फिर जवाहरलाल नेहरू साहब ने हस्तक्षेप करके, पाकिस्तान सरकार से बात करके उनको रिहा कराने की कोशिश की और सज्जाद ज़हीर दिसंबर 1957 में भारत वापस आ पाए। अब्बा के वापस भारत लौटने के बाद मेरी सबसे छोटी बहन नूर ज़हीर का जन्म हुआ, इससे पहले हम तीन बहनें थीं।’’ 

 नादिरा बताती हैं-‘‘अब्बा के पाकिस्तान से वापस आने के बाद हम लोग दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। दिल्ली में कोई घर नहीं था तो किराए का घर लिया जिसका साढ़े तीन सौ रूपया किराया था। दो बेडरूम थे, एक हॉल था और किचन था। हम लोग चार बहनंे थीं, एक कमरे में हम सब बहनें रहती थीं। एक में अब्बा रहते थे। रात में अब्बा हॉल में चले जाते थे, मेरी छोटी बहन उन्हीं के पास सोती थी। खाना हमारे यहां बहुत अच्छा बनता था। अब्बा को इंदिरा गांधी जी भी जानती थीं, क्योंकि इंदिरा जी के साथ भी उन्होंने काम किया था। जब शिमला समझौता हुआ था तो अब्बा वहां साथ में गए थे। मैं भी अब्बा के साथ थी। उस वक़्त बाद में इनको दिल्ली में रहने के लिए मकान इंदिरा जी ने दिया था और कहा कि आपने हमारे लिए जो काम किया है, उसके लिए ये एक छोटी सी भेंट है।’’

बाएं से-सज्जाद ज़हीर, कृष्ण चंदर, फ़िराक़ गोरखपुरी और जोश मलीहाबादी।

सज्जाद ज़हीर के जेल में बंद होने के दौरान जब उनकी पत्नी और बच्चे वापस लखनऊ अपने घर आ गए, तब यहां सर वजीद हसन साहब की कोठी में ये लोग रहते थे। उनके परिवार के पाकिस्तान से लौट आने पर सज्जाद ज़हीर की मां को बहुत बुरा लगा। उन्होंने अपनी बहू से कहा कि तुम गई थी, मगर मेरे बेटे को वापस लिए बिना लौट आई ? वह तुम्हारी वजह से ही बिगड़ गया। तुम उसको मना नहीं कर सकती थी कि वो कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम न करे? तुमको मना करना चाहिए था। तुम्हें यहां रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम अब यहां नहीं रह सकती हो। इस पर उनकी पत्नी रज़िया ने कहा कि घर में न सही हमको इस घर के बाहर बने आउटहाऊस में ही रहने दीजिए। किसी तरह आउटहाऊस में रहने की इज़ाज़त मिल गई। 

 आउटहाऊस की स्थिति अच्छी नहीं थी, बरामदे में बहुत बड़ी-बड़ी घास थी, पत्थर थे, सांप थे। सब साफ कर इन लोगों ने रहना शुरू किया। बाद में यहीं पर प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकें होने लगीं। पत्नी रज़िया ज़हीर ही बैठक करती थीं। सज्जाद भाई बन्ने भाई के नाम से मशहूर थे। सब लोग उन्हें बन्ने भाई ही बोलते थे। उस वक़्त रज़िया ने अदब से संबंधित कामों का बीड़ा उठाया हुआ था। उस समय भी जब लोग मिलने के लिए आते थे तो उनकी सास सब पर नज़र रखती थीं कि कौन आया, कहां से आया ? पूछती थीं भाई तुम कौन हो, किसके लड़के हो, ज़रा सी भी वो बोलने में चूक जाए तो वो पकड़ लेती थीं। तुम तो वो नहीं हो। तुम उनके लड़के तो नहीं हो। उसके तो तीन बेटे हैं, तुम कौन से वाले हो, इस तरह से वो सब पर चौकीदारी करती थीं, निगाह रखती थीं। बाद में लोरगों के आने-जाने के लिए पीछे की तरफ से एक दरवाज़ा बनाया गया। 

राजेंद्र सिंह बेदी और गु़लामी रब्बानी ताबां के साथ सज्जाद ज़हीर।

नादिरा बताती हैं-‘‘मेरे अब्बा बहुत अच्छे इंसान थे। एकदम नर्म मिज़ाज, चुपचाप रहने वाले, वो ज़्यादा बात भी नहीं करते थे, मुस्कराते रहते थे। किसी से रूडली तो कभी बात ही नहीं करते थे। अम्मी की बहुत इज़्ज़त करते थे। उनको कुछ कहा ही नहीं कभी। मिसाल के तौर पर खाना जैसे लगता था, हमेशा बैठ जाते थे और सबसे पहले डोंगा उठाकर अम्मी को देते थे और कहते थे - लीजिए रज़िया। अम्मी ये इन सब चीजा़ें से बजाय खुश होने के नाराज़ होती थीं।‘‘ 

 नादिरा यह भी कहती हैं-‘‘हम लोग नैनीताल जाते थे। वहां पर किसी का एक कॉटेज था, जो अम्मी की वजह से मिल जाता था। वह छह कमरे का था और सब कमरे अच्छे थे।  उसमें खाना हम लोग खुद पकाते थे। शाम के वक़्त सब घूमने जाते थे। खाना अच्छा पका हो तो कहते थे-तुम लोग बहुत अच्छा पकाती हो, आज तो बहुत अच्छा पका है। तुम लोग पहले खाओ। कभी-कभार अम्मी टोक देती थीं, बेटा थोड़ा शर्म करो वो तुम्हारा बाप है, थोड़ा लिहाज करो, थोड़ी अच्छी बोटियां छोड़ दो उनके लिए, सब अपनी प्लेट में उड़ेल लोगी! मैं कहती-मैं क्या करूं वो तो खुद ही कह रहे हैं। वो कहते हैं पर तुम्हें भी तो अकल होनी चाहिए।’’

प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते सज्जाद ज़हीर।

नादिरा के मुताबिक अब्बा हम लोगों को पढ़ाते नहीं थे, अम्मी ही पढ़ाती थीं। लेकिन, अब्बा शायरों और शायरी के बारे में अच्छे से समझाते थे। अदब के बारे में भी समझाते थे। कैसे क्रिटिसिजम होता है, सब समझाते थे। बाकी मेरी दोनों बड़ी बहने बहुत ज़हीन थीं, वो ही पढ़ा देती थीं और कुछ अम्मी पढ़ा देती थीं। गणित पढ़ाने के लिए एक टीचर आते थे, इसहाक नाम था उनका। अम्मी ने कहा कि थोड़ा इसको भी दो-चार मिनट दीजिए और मैथ पढ़ा दिया करिए, क्योंकि मेरी मैथ बहुत वीक थी और मन भी नहीं लगता था। मन तो खेलने में रहता था। कैसे यहां से भागूं, खेलने जाऊं। वो कहते थे कहां है आपका ध्यान, कहां है आपका ध्यान। घर में सब अदब के लोग आते थे, बातें होती थी माहौल था और हम लोग भी बैठे रहते थे। हम सब सुनते थे इसलिए ये अपने आप आ गई। अलग से सिखाने के लिए कुछ नहीं था।

बाएं से - साहिर लुधियानवी, सज्जाद ज़हीर और जां-निसार अख़्तर।

 सज्जाद ज़हीर की चार बेटियों के नाम नजमा ज़हीर बक़र, नसीम ज़हीर भाटिया, नादिरा ज़हीर बब्बर और नूर ज़हीर हैं। उन्होंने कई किताबें लिखीं हैं, जो बहुत चर्चित रहीं हैं। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार ‘क़ौमी जंग’ और ‘नया ज़माना’ अख़बार में प्रधान सम्पादक की हैसियत से काम किया। लंदन में जर्नलिज्म की पढ़ाई, संपादकीय सूझ-बूझ और अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि की बदौलत इन पत्रों ने ज़ल्द ही लोगों के बीच अपनी पहचान बना ली थी। 13 सितंबर, 1973 को अल्माअता (सोवियत संघ) में (जो कि अब कज़ाकिस्तान में पड़ता है।) अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित)   


शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

अंग्रेज़ी का बहुत सारा सेकेंड ग्रेड राइटिंग है, जिसे भारतीय शान के साथ पढ़ रहे: राजेश जोशी 

 समकालीन हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, साहित्य में मानवीयता एवं समाजिक चेतना के पक्षधर और साहित्य अकादमी पुरस्कार, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार जैसे अनेक पुरस्कार से विभूषित राजेश जोशी का जन्म 18 जुलाई, 1946 को नरसिंहगढ़, मध्यप्रदेश में हुआ। वर्तमान में आप भोपाल में निवास कर रहे हैं। लेखन के अलावा आपने कुछ सालों तक पत्रकारिता किया, इसके बाद बैंक में भी कार्य किया। ‘एक दिन बोलेंगे पेड़’, ‘नेपथ्य में हंसी’, ‘मिट्टी का चेहरा’, तथा ‘दो पंक्तियों के बीच’, ‘सोमवार और अन्य कहानियां’, ‘कपिल का पेड़’, ‘जादू जंगल’, ‘कहन कबीर’, ‘टंकारा का गाना’ और ‘किस्सा कोता’ आदि आपकी चर्चित और  कृतियां हैं। ‘गेंद निराली मिट्टू की’ नामक एक बाल संग्रह के साथ-साथ ‘एक कवि की नोटबुक’ और ‘एक कवि की दूसरी नोटबुक’ के रूप में आलोचनात्मक टिप्पणियों पर आपकी दो किताबें भी प्रकाशित हुई हैं। आपने भर्तृहरि और मायकोवस्की की कविताओं का हिंदी अनुवाद भी किया है। अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’ ने इनसे मुलाकात करते विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है इसके प्रमुख अंश-


सवाल: हिन्दी साहित्य की ओर आपका रुझान कब, क्यों और कैसे हुआ ?

जवाब: साहित्य की तरफ मेरा रुझान तो शुरू से था। मेरे पिता संस्कृत के विद्वान थे, लेकिन हिन्दी में लिखते थे। इसलिए कुछ प्रभाव तो परिवारिक माहौल से और कुछ कवि सम्मेलनों को सुनने से पड़ा। हालांकि मैं तो साइंस से आया था, इसलिए बहुत ठीक से नहीं जानता था कि साहित्य क्या है। वर्ष 1972 के आसपास दो साहित्यिक मित्रों राजस्थान के अशोक आत्रे और कहानीकार वेणुगोपाल जी से हुई मुलाकात कालांतर में दोस्ती में बदल गई। फिर वो भोपाल में मेरे साथ ही मेरे कमरे पे रहने लगे। धीरे-धीरे वेणुगोपाल जी ने बताना शुरू किया कि समकालीन लेखन और समकालीन साहित्य क्या है?  और मुझे क्या-क्या पढ़ना चाहिए।  इस तरह धीरे-धीरे मैं साहित्य की तरफ प्रवृत्त हुआ। 

राजेश जोशी

सवाल: प्रारंभिक दौर में साइंस के विद्यार्थी होने के नाते, संक्षिप्तता के महत्व से आप भलीभांति परिचित हैं। साहित्य में भी संक्षिप्तता के महत्व पर आपका क्या विचार है ? 

जवाब: साहित्य में, विशेषकर कविता के लिए यह माना जाता है कि अच्छे साहित्यकार को शब्द मितव्ययी और कम से कम शब्दों में, अधिक से अधिक कह सकने की क्षमताएं रखना चाहिए। यही कविता का गुण और सौन्दर्य है। इसलिए मितव्ययिता साइंस और साहित्य दोनों जगह है। अच्छा साहित्य वही माना जाता हो जो कम में ज्यादा कहने की कुवत रखता हो। विज्ञान में तो आप फार्मूले के तरह हो जाते हैं, लेकिन साहित्य में फार्मूला नहीं हो सकता। तब भी, मितव्ययिता तो साहित्य, खासतौर से कविता का भी गुण है। गद्य में तो फिर भी आप थोड़ा ज्यादा कह सकते हैं पर कविता एक ऐसी विधा है जो आपको इस बात के लिए प्रेरित करती है कि आप मितव्ययी होकर अपनी बात को कहें। 


सवाल: एक शिक्षक तथा साहित्यकार के रूप में सामाजिक विकास जैसे चुनौतिपूर्ण कार्य में आप अपने आपको कैसे जोड़कर देखते हैं ? 

जवाब: शिक्षक भी बच्चों को पढ़ा कर भविष्य का एक शिक्षित-सुसंस्कृत नागरिक बनाने का बहुत बड़ा सामाजिक कार्य ही कर रहा है। शिक्षा का जो काम है वही साहित्य का भी काम है। अतः साहित्य और शिक्षा के बीच में सदा एक संबंध बना ही रहा है। हम लोगों ने पहली कविता चाहे वह झांसी की रानी हो या चाहे कोई अन्य कविता हो, स्कूलों में किताब से ही,  सीखी थी। पुराने साहित्यकारों जैसे निराला, महादेवी या सुभद्रा जी को स्कूल में ही पढ़ा। इस तरह से दोनों का काम अलग-अलग स्तर पर एक जैसा ही है। साईंस में आप अलग-अलग फील्ड में जाते हैं। आप इंजीनियर, डाक्टर या साइंटिस्ट बनते हैं। ये भी साइंस के द्वारा किया गया, एक तरह का सामाजिक विकास का कार्य ही है। ऐसा ही एक कार्य यानी एक तरह की चेतना या मानसिक विकास का कार्य, भावनाओं को संयोजित करने-बनाने का काम, साहित्य भी करता है। इस तरह शिक्षा द्वारा किया गया विकास कार्य, साहित्य द्वारा किए जा रहे विकास कार्य से कोई बहुत अलग नहीं है। 

राजेश जोशी से बातचीत करते अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’।

सवाल: हिन्दी साहित्य लेखन में किस विषय/विमर्श को आप ज्यादा पसंद करते हैं? 

जवाब:  मुझे लगता है कि साहित्य में स्मिता विमर्श, हमारे यहां खासतौर से नब्बे के दशक आसपास ही शुरु होता है। उससे पहले स्मिता विमर्श का हमारे यहां उतना दबाव नहीं था। आजकल कई विषयों पर जो विमर्श चल रहे हैं, उन विषयों पर काम बहुत पहले से ही शुरु हो गए थे। मराठी में महात्मा फूले की पत्नी सावित्रीबाई फूले शिक्षा के लिए काम कर रही थीं और हमारे यहां महात्मा गांधी ने भी स्त्रियों को घर से बाहर निकलने या स्वाधीनता संग्राम आन्दोलन से जोड़ने के अतिरिक्त तमाम चीजें जैसे जाति तोड़ो, मंदिर प्रवेश के आंदोलन किए। ये सारे काम, अब इन विमर्शों के अंदर मान लिए गए हैं। अत: विमर्श के जो काम अब विमर्श के अंदर आ रहे है, वो हमारे समाज में पहले भी हो रहे थे। स्वाधीनता उस समय सबसे बड़ा मुद्दा था। अतः विमर्श का काम सेकेंडरी हो जाता था। 1990 के बाद जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो एक तरह से सारे विमर्श जिन्हें सबाल्टर्न कहा गया है और जो गांधी के जमाने से चला आ रहा था परंतु उनका उतना उभार नहीं हो पाया था, वो सारे विमर्श नब्बे के बाद अचानक सतह पर आ गए। उसके बहुत सकारात्मक पहलू भी सामने आए। लेकिन किसी भी स्मिता विमर्श की एक सीमा है और वो उस सीमा से बाहर नहीं जा पाता। अक्सर समाज के बदलने का जो संघर्ष है, वहां तक न जाकर के, वो स्मिता के प्रश्न पर ही रुक जाता है। इसलिए स्मिता विमर्श की एक सीमा है और उसको लांघना ज़रूरी है। पूरे समाज को ही बदलना चाहिए। 


सवाल: जीवन के इस अंतराल में एक विज्ञानवेत्ता का अपने शैक्षिक क्षेत्र से हटकर, सामाजिक मुद्दों से जुड़े विषयों पर रचना करना आपको कैसा प्रतीत होता है।

जवाब: आप जब विज्ञान के किसी ख़ास तरह के अकादमिक डिसीप्लिन में काम कर रहे होते हैं तब आप एक बहुत सीमित यानी एक ही सब्जेक्ट पर काम कर रहे होते हैं। फिर जब आप इससे बाहर निकलकर, साहित्य या सामाजिक दुनिया में आते हैं तो आपका ये क्षेत्र बढ़ जाता है। आप ज्यादा जगह, ज्यादा चीज़ों को देख पाते हैं। अतः साइंस, सिर्फ एक सब्जेक्ट ही नहीं बल्कि चीजों को देखने की एक दृष्टि भी देता है। समाज, साहित्य या और दूसरी प्रॉब्लम्स को देखने की जो दृष्टि आपको साइंस देती है वो वैज्ञानिक दृष्टि अगर आपको मिल गई तो वो कहीं न कहीं पूरे समाज और पूरी दुनिया को ज्यादा बेहतर ढंग से देखने की सहूलियत आपको देती है। इसलिए मुझे लगता है कि आप एक सब्जेक्ट की अकादमिक दुनिया से जब बाहर निकलते हैं तो इस बढ़ते हुए क्षेत्रफल के साथ-साथ, मिल रही संतुष्टि भी निश्चित ही ज्यादा लगती है कि आप ज्यादा बड़े एरिया में काम करके, जीवन को ज्यादा बड़े फलक पर समझ रहे हैं। हालांकि हर क्षेत्र और समय का अपना महत्व है। 


सवाल: साहित्यकार को कविता, कहानी, नाटक आदि आम पाठक या आलोचक में, किसके लिए लिखना चाहिए ? 

जवाब: रचनाकार, आलोचक को खुश करने के लिए नहीं लिखता, बल्कि वो पाठक के लिए लिखता है। लेकिन उसका काम पाठक की रुचि को बदलकर, पाठक की समझ को बढ़ाकर, विकसित कर, उसे शिक्षित करना भी है। हम लोगों ने प्रारंभिक कक्षाओं में धीरे-धीरे पढ़कर ही तुलसीदास, निराला, पंत या प्रेमचंद को या गद्य को जाना। आप धीरे-धीरे सीखते हैं। शुरु में तो ऐसा लगता है कि ये आपकी रुचि का तो नहीं है, पर पढ़ते-पढ़ते आपकी रुचि बदलती है। इसलिए रचनाकार एक समझ को विकसित करने का काम भी करता है। लेखक, पाठक की रुचि से संचालित नहीं होता। पाठक की रुचि को एक तरह से वो अपनी रचना से कहीं न कहीं समृद्ध भी करता है। उसकी समझ को समृद्ध करता है। इसलिए लेखक का ये दायित्व ज्यादा है कि वो पाठक को आगे की बात बताए और उसको ज्यादा समृद्ध करे। उसकी समझ को समृद्ध करे तभी वो कुछ काम कर पाएगा। आलोचक का काम तो तब शुरू होता है जब रचना हो चुकी होती है। कुछ कामर्शियल लेखक जरूर इस तरह से लिख रहे हैं कि पुरस्कार या कीर्ति मिल जाए या आलोचक की नज़र में आ जाए। एक वास्तविक लेखक क्या इस बात की कभी परवाह कर सकता है कि आलोचक की क्या रुचि है वो क्या कहेगा और न ही वो इसके लिए क्षेत्र में आता है। इसलिए आलोचक का काम तो बाद का है कि वो रचना पढ़े और अगर ठीक लगे तो उसे जैसी लगे वैसा लिखे एवं वो उससे खुद भी समृद्ध हो। रचना पढ़कर ही तो आलोचक की समझ बनेगी। इसलिए रचना मूल काम है और बाकी लोगों का काम सेकेंडरी है।  


सवाल: क्या कारण है कि किसी विचारधारा के पक्षधर साहित्यकार की रचनाओं में अक्सर अंतर्विरोध नजर आते हैं ?

जवाब: हम लोगों ने विचारधारा के सवाल को बहुत सीमित करके मान लिया है। कोई भी रचनाकार बिना किसी विचार के तो वह नहीं लिखेगा। किसी न किसी विचार से वह अवश्य जुड़ा होगा। कालीदास शैव थे और शैवों की जो वैचारिक परंपरा थी उससे संचालित हो रहे थे। तुलसी या कबीर के पास भी अपनी एक विचार प्रणालियां थी। ऐसा बहुत बार ज़रूर होता है कि एक विचारधारा के रहते हुए भी आपमें कई अंतर्विरोध दिखाई देते हैं। तुलसी में बहुत सारे अंतर्विरोध हैं। एक समय तुलसी जो शबरी के जूठे बैर, राम को खिला रहे हैं वही तुलसी, वर्ण व्यवस्था और शंबूक वध का समर्थन भी कर रहे हैं। वहीं इस बात को भी कह रहे हैं कि ब्राम्हण चाहे मूर्ख हो तो भी वो पूज्यनीय है और दलित चाहे विद्वान हो तो भी वो पूजनीय नहीं है। यह तुलसी का अपना अंतर्विरोध है। हम एक समाज में रह रहे हैं। हम पर उसके जो प्रभाव होंगे उसके कारण अंतर्विरोध होंगे। आप पर कोई न कोई चीज़ प्रभाव डालेगी ही और उसकी वजह से कुछ न कुछ अंतर्विरोध आएगा ही। कुछ अंतर्विरोध से आप निपट भी लेते हैं। ये हो सकता है कि वो विचारधारा की दृष्टि से गड़बड़ हो। हालांकि किसी भी रचनाकार में अंतर्विरोध की एक सीमा होती है। हर रचनाकार की वैचारिक ज़मीन बुनियादी रूप से मनुष्य के पक्ष की होगी, जिसके बिना आप रचनाकार नहीं हो सकते। महात्मा गांधी कहते हैं कि पेरीफेरी पे खड़े, अंतिम मनुष्य के लिए मुझे काम करना है। अत: सीधी सी बात यह है कि इस अंतिम मनुष्य के पक्ष में अगर आप नहीं हैं तो फिर आप रचनाकार तो नहीं हैं।

पुरबा (बेटी), राजेश जोशी और निरूपा जोशी (पत्नी)।

सवाल: साहित्य रचना आपको आत्मिक सुख तो प्रदान करती है पर आजीविका का साधन नहीं हो सकती। इस कथन पर आपका क्या दृष्टिकोण है ?

जवाब: हमारे यहां खासकर हिंदी में ये समस्या थोड़ी बड़ी है कि आप फ्रीलांस राइटर रहकर काम नहीं कर सकते। हालांकि, हिंदी में कई बड़े लेखक जैसे शरद जोशी, हरिशंकर परसाई, अमृत लाल नागर, शैलेश मटियानी ऐसे कुछ नाम हैं, जो स्वतंत्र लेखन में फ्री लांसर हैं। इन्होंने थोड़े-थोड़े दिन नौकरी की, फिर नौकरी छोड़ कर, स्वतंत्र लेखन की तरफ गए।  परंतु ऐसे चांस बहुत थोड़े हैं। हर विधा में तो ये संभव नहीं हो पाता जैसे कविता में ये संभव नहीं है। गद्य में ये थोड़ा संभव है। गद्य में आप कालम लिख सकते हैं। आप अख़बारों के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन फिर भी फ्रीलांस करना हिंदी में तो कठिन है। इसलिए ज्यादा बेहतर स्थिति तो वो होती है कि जीविका के लिए आपके पास कोई निश्चित साधन हो और आप अपनी मरजी से, बिना किसी दबाव के लिख सकें। फ्रीलांसर अगर आप हैं तो बहुत सारे दबाव भी आप पर होते हैं। कुछ भाषाओं में तो आप फ्रीलांस कर सकते हैं। बांग्ला में तो  पूजाअंक के लिए लेखक साल भर में एक रचना लिखता है और उसका साल भर का काम निकल जाता है। कुछ भाषाओं में हो सकता है कि इतना पैसा मिल जाय और वो अपनी मर्जी से काम कर सके, पर हिंदी में अभी ये थोड़ा दिक़्क़त है।


सवाल: विश्वविद्यालयों में साहित्य पर शोध कार्य तो बहुत किया जा रहा है, परंतु तमाम प्रयासों के बावजूद विश्वविद्यालय में कहानी, कविता, उपन्यास के क्षेत्र में नये विषयों पर मौलिक लेखन संबंधित अपेक्षित कार्य नहीं हो पा रहा है, इस पर आपका क्या विचार है।

जवाब: हमने शोध का जो ढांचा बनाया कि थीसिस इस तरह की, सिनाप्सिस वगैरह ऐसी और इस इस तरह से उसके विभाजन होंगे, वो ढंग ही अपने आप में काम करने वाले को क्षात्र को बहुत जकड़ लेता है और उससे कोई नया विचार या नई बात नहीं पैदा होती यानी उससे कोई सृजनात्मक काम संभव नहीं है। वो अकादमिक महत्व का ही है। अकादमिक काम की भी एक सीमा होती है। शोध कार्य को बहुत अकादमिक बना दिया गया है।  विश्वविद्यालयों में कुछ सालों पहले, इस तरह का माहौल बना था कि अगर आपने कोई बहुत अच्छा सृजनात्मक कार्य जैसे उपन्यास, कोई महत्वपूर्ण संग्रह या आलोचना की बहुत महत्वपूर्ण किताब लिखी, तब उसका भी मूल्यांकन करके, आपको पीएचडी दी जा सकती थी। यह व्यवस्था बाद में ख़त्म हो गई। मुझे तो हमेशा ये लगता है कि अगर किसी को शोध कार्य करना हो तो करे, मगर कोई सृजनात्मक कार्य करे तो उसका भी मूल्यांकन करके आप उसको पीएचडी दीजिए। पीएचडी हमेशा एक बंधे-बंधाए काम पर और शोध पर ही क्यों दिया जाए। किसी भी आदमी ने अगर आलोचना में या किसी भी विधा में कोई अच्छा गंभीर, मौलिक काम किया है तब उसे भी पीएचडी मिलना चाहिए। बहुत बड़ी संख्या में हो रहे शोधकार्य के कारण, इसे नौकरियों में अनिवार्य कर दिया गया है। इसलिए बेचारे बच्चे जैसे तैसे इसे पूरा करते हैं मगर उसमें उनकी प्रतिभा भी नष्ट हो रही है। विद्यार्थी के हाथ में तो कुछ है नहीं। वो चाहता है कि किसी तरह से पीएचडी पूरी हो जाए तो मैं नौकरी के लिए अप्लाई करूं। इसलिए शोध के ढांचे को बदलने की ज़रूरत है। 

बाएं से - विनोद दास, राजेश जोशी, विजय कुमार, अनूप सेठी और निरूपा जोशी (पत्नी)।

सवाल: नई पीढी नौजवानों मे हिंदी में पठन पाठन के घटते रुझान पर आपको क्या महसूस होता है ?

जवाब: वास्तविकता तो ये है कि भाषा का सम्मान जब तक नहीं बढ़ेगा, साहित्य का सम्मान भी नहीं बढ़ेगा। साहित्य का सम्मान तब ही बढ़ता है जब भाषा का सम्मान बढ़ता है। रूस में जब क्रांति हुई तो रूसी भाषा का सम्मान बढ़ा, तब हम सबने जाना टॉलस्टॉय, गोर्की और तमाम लोगों को। जब भाषा का सम्मान बढ़ा तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूसी में लिखे जा रहे साहित्य का भी सम्मान बढ़ा। कई भाषा में अनुवाद होना शुरू हुआ। जब आप अपनी भाषा को सम्मान दिला पाएंगे तब ही आप अपेक्षा कर पाएंगे कि लोग हिंदी साहित्य की तरफ भी जाएं। यहां दिक़्क़त ये है कि बहुत सारे लोग इस गलतफहमी में हैं कि अंग्रेज़ी में सब कुछ बहुत अच्छा लिखा जाता है। अंग्रेज़ी में कुछ तो बहुत कूड़ा लिखा गया है। अंग्रेज़ी में जितना पल्प राइटिंग है उतना हिंदी में नहीं है। बहुत पल्प है और वो पूरे मार्केट में बिखरा पड़ा है। ये बहुत सजावट के साथ बेचा जाता है और क्योंकि अंग्रेज़ी बहुत कम लोग जानते हैं तो अंग्रेज़ी की कोई बहुत ही दो कौड़ी की किताब हाथ में लेकर, लोग समझते हैं कि वो कोई बहुत महान काम या सम्मानित किताब लिए हुए हैं। शिवपुराण को अंग्रेजी में पढ़कर, एक लेखक ने शिव पर तीन चार उपन्यास लिख दिए। वो बहुत ज्यादा बिके। उनका हिंदी अनुवाद हुआ।मेरा यह कहना है कि उसको पढ़ने से पहले ओरिजनल शिवपुराण पढ़ लो। लोगों को ये नहीं मालूम कि ये सारे काम, हिंदी और संस्कृत में बहुत पहले हो चुका जो आप अभी समझ रहे हो कि आप कोई बहुत बड़ा काम पढ़ रहे हो या देख रहे हो। अंग्रेजी का बहुत सारा सेकेंड ग्रेड राइटिंग है वो थोड़ा-बहुत अंग्रेजी जानने वाले हमारे भारतीय लोग बहुत शान के साथ पढ़ रहे हैं। 


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 22 जुलाई 2026

 गुफ़्तगू ने मनाया 24 साल की साहित्य साधन का जश्न

पुस्तक ‘गुफ़्तगू परिवार’ का न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने किया विमोचन

केक काटकर गुफ़्तगू का 25वां स्थापना दिवस मनाया गया।

प्रयागराज। साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू ने आज अपनी स्थापना के 24 वर्ष पूरे करके 25वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है। किसी संस्था का लगातार इतने दिनों तक काम करना बेहद ख़ास और उल्लेखनीय है। संस्था के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अपनी एक टीम बनाकर बहुत सारे उल्लेखनीय साहित्यिक कार्य किए हैं, यह सिलसिला अब भी जारी है। आज से ही यह संस्था अपनी स्थापना के सिल्वर जुबली वर्ष में प्रवेश कर गई है। इसका सिल्वर जुबली कार्यक्रम भी बहुता ख़ास होने जा रहा है। यह बात मंगलवार की देर शाम न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने सिविल लाइंस स्थित होटल विलास में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कही। इस मौके पर  ख़ास पुस्तक ‘गुफ़्तगू परिवार’ का विमोचन किया गया।

 पुस्तक ‘गुफ़्तगू परिवार’ को हुआ विमोचन

 डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अपने संबोधन में कहा कि हमारी टीम के सदस्यतों की मेहनत और लगन के कारण ही हम इतने कार्य कर रहे हैं। सिल्वर जुबली वर्ष के मौके पर 9 और 10 जनवरी को दो दिवसीय आयोजन किया जाएगा। जिसमें देश के बड़े साहित्यकारों के साथ-साथ बालीवुड के कई मशहूर अभिनेताओं को भी आमंत्रित किया जाएगा। संस्था के सचिव नरेश कुमार महरानी ने कहा कि हमलोग मिलजुल कर साहित्य का काम करते रहे हैं, आगे भी करते रहेंगे।

इस मौके पर प्रभाशंकर शर्मा, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, अनिल मानव, संजय सक्सेना, डॉ. नीना मोहन श्रीवास्तव, मुनेश्वर मिश्र, नारायण जी गोपाल, हकीम रेशादुल इस्लाम, राम नारायण श्रीवास्तव, अर्चना जायसवाल ‘सरताज’, अफ़सर जमाल, डॉ. शैलेंद्र जय, आसिफ़ उस्मानी, मंजूलता नागेश, धीरेंद्र सिंह नागा, डॉ. एस.एम. अब्बास, डॉ. तारिक़ महमूद, सुनील दानिश, शिबली सना आदि मौजूद रहे।




रविवार, 19 जुलाई 2026

 गुफ्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में



7. संपादकीय: पुस्तक मेले का नकारात्मक पक्ष भी

8-12. लोकभवन में दो दिन: बिहार गवर्नर की मेहमान बनी टीम गुफ़्तगू

13-15. ख़ास प्रस्तुति: उर्दू शायरी में अहंकार नहीं तारीफ़-ए-खुद - भानु झा

16. इतिहास: कु़रआन की छपाई करते थे नवल किशोल -हकीम रेशादुल इस्लाम

17-19. दास्तान-ए-अदीब: सज्जाद ज़हीर को नहीं रास आया पाकिस्तान- डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

20-24. इंटरव्यू: अंग्रेज़ी की बहुत सेकेंड ग्रडेट राइटिंग है: राजेश जोशी

25-29. चौपाल: किसे कहते हैं पुस्तक विमोचन

30. मुस्तनद शायरी: एक होनहार शायर मुजीब सिद्दीक़ी-डॉ. इम्तियाज़ समर

31-38. ग़ज़लें: पवन कुमार, तेजेंद्र शर्मा, आरडीएन श्रीवास्तव, बसंत कुमार शर्मा, यासीन अंसारी, अरविन्द असर, डॉ. इम्तियाज़ समर, डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’, रियाज़ इटावी, शमा फ़िरोज़,  शगुफ्ता रहमान ‘सोना’, डॉ. शैलेंद्र जय, भानु झा, सोनिया वर्मा, मुमताज हसन

39-43. कविताएं: यश मालवीय, संतोष श्रीवास्तव, अरुण अर्णव खरे, भोलानाथ कुशवाहा, डॉ. आशा सिंह सिकरवार, सुधा श्रीवास्तव ‘पीयूषी’,  प्रदीप बहराइची, सरिता गर्ग ‘सरि’, डॉ. चंद्रमिण, सीमा सिरोमणि, अरुणिमा खरे ‘वैदेही’

44-45.लधु कथा:  डॉ. प्रमिला वर्मा, डॉ. मीरा रामनिवास

46-48. तब्सेरा: हृदय की बात, मशवरा, फुर्सत किसे है इन दिनों

49-53. उर्दू अदब: फिक्रे-नव, शजर-शजर, पहचान, शाम का धुंधुलका

54-55. ग़ाज़ीपुर के वीर: इलाके के ख़ास समाजेसवी डॉ. श्यामादत्त: सुहैल ख़ान

56-59. अदबी ख़बरें


60-89. परिशिष्ट-1: डॉ. कंचना सक्सेना

60. डॉ. कंचना सक्सेना का परिचय

61-63. अथाह जिज्ञासा और समर्पण का संदेश- नीना मोहन श्रीवास्तव

64. व्यापक सोच को दर्शाती कविताएं - निरुपमा खरे

65-66. यथार्थ को वर्तमान पटल पर रखतीं कविताएं- जगदीश धुर्वे

67-89. डॉ. कंचना सक्सेना की कविताएं


90-118. परिशिष्ट-2: आलोक भदौरिया ‘अर्श’

90. आलोक भदौरिया ‘अर्श’ का परिचय

91. उर्दू अदब का हिमालय आलोक भदौरिया - रईस सिद्दीक़ी

92-93. तलब को ज़ब्त के सांचे में ढालना होगा- डॉ. शैलेंद्र जय

94-95. समाज के कड़वे सच से रुबरु ग़ज़लें - डॉ. इश्क़ सुल्तानपुरी

96. समाज का चित्रण करतीं ग़ज़लें- धीरेंद्र सिंह नागा

97-118. आलोक भदौरिया अर्श की ग़ज़लें 


119-148. परिशिष्ट-3: उर्मिल शर्मा

119. उर्मिल शर्मा का परिचय

120. छह अध्याय का काव्य-रूप: उर्मिल शर्मा

121-122. स्त्री संवेदन की प्रखर कवयित्री - डॉ. संतोष कुमार मिश्र

123-125. जीवन के विविध रंग से सराबोर कविताएं- रचंना सक्सेना

126-127. संवदेना से संघर्ष तक फैला काव्य दर्शन - शगुफ्ता रहमान ‘सोना’

128-148. उर्मिल शर्मा का लेखन  



(गुफ़्तगू का जनवरी-मार्च 2026 अंक)


गुरुवार, 2 जुलाई 2026

       ईमान ताज़ा करने वाली किताब

                                                                          - डॉ. वारिस अंसारी


           

     रज़िया काज़मी का तअल्लुक़ इलाहाबाद से है, जो किसी तआरुफ़ (परिचय) की मोहताज नहीं हैं। शायरी यूं तो ख़ुदादाद सलाहियत होती है, लेकिन ख़ुदा उन्हीं को कामयाब व कामरान करता है जो अपने काम के लिए कोशा रहते हैं। रज़िया काज़मी भी एक ऐसा नाम है जो अपना बहुत क़ीमती वक़्त अदब के लिए खर्च कर रही हैं। उनकी ये मेहनत अदबी दुनिया में हमेशा ज़िन्दा रहेगी। उनकी किताब ‘गुल हाय अक़ीदत़’ पढ़ कर ईमान ताज़ा हो जाता है। वह एक दीनदार और तालीम-याफ़्ता (शिक्षित) खानदान से तअल्लुक़ रखती हैं। उनकी शायरी पढ़ कर कहीं भी ऐसा महसूस नहीं होता कि उन्होंने कोई कोताही की है बल्कि हर शेर उनके जिंदा दिली की गवाही देता नज़र आता है। वह ख़ुदा की ज़ात, रसूले करीम, अहलेबैत और बुज़ुर्गान-ए-दीन पर ईमान रखने वाली एक कामिल शायरा हैं। उन्होंने इस किताब ‘गुल हाय अक़ीदत’ को हम्द, नात, सलाम और मन्क़बत से सजाया है। उनकी शायरी में शगुफ्तगी, दर्द, शीरी बयानी, आसान अल्फ़ाज़ और पढ़ने में रवानी है। जिससे क़ारी (पाठक) का मज़ा दोबाला हो जाता है। उन्होंने बड़े ही सलीके से ख़ुदा की वहदानियत, रसूल की रिसालत, अहले बैत और बुज़ुर्गान-ए-दीन की मोहब्बत को अपने अशआर में पिरोया है। 

 यह किताब ईमान का पैग़ाम है जो कि अहले ईमान में मील का पत्थर साबित होगी। आइए उनके कुछ अशआर भी पढ़ते चलें-‘दिल में वह शम्मा जला दे या रब/ राह भटके हैं दिखा दे या रब/ कुछ मोहब्बत का सिला दे या रब/ बंदगी हमको सिखा दे या रब।’, ‘सभी अंबिया में हैं आला मोहम्मद/ नहीं कोई भी आप जैसा मोहम्मद/ किया तीरगी में उजाला मोहम्मद/ कि हैं नूर ए हक़ का मिनारा मोहम्मद।’, ‘करे हुसैन कोई आपकी विला के बगैर/ तो ज़िंदगी ये हुई उनकी मुद्दुआ के बग़ैर/ ख़लील होती है ज़िबहा अज़ीम कुर्बानी/हुसैन इब्ने अली सिब्ते मुसतफ़ा के बगैर।’ मज़कूरा बाला शेर उनकी शायराना हैसियत की ग़म्माज़ी के लिए काफी है। बाक़ी पूरी किताब गुल हाय अक़ीदत पढ़ने लायक़ है। बहुत ही खूबसूरत हार्ड कवर और उम्दा कागज़ के साथ उनकी किताब 96 पेज की है । जिसको फरीद कंप्यूटर ग्राफिक्स, करेली इलाहाबाद ने कम्पोज किया और स्काईलाइन प्रिंटर्स, प्रयागराज से छपा कर गुफ्तगू पब्लिकेशन 123।/1 , हरवारा, धूमनगंज से प्रकाशित किया गया। किताब की क़ीमत दो सौ (200) रुपए है। दुआ है ख़ुदा रज़िया काज़मी को इस ईमान अफ़्ज़ा किताब के लिए अल्लाह जज़ा-ए-खैर अता फरमाए। आमीन ।


इरशाद की शायरी में कई तरह के रंग


 

 इस वक़्त मेरे हाथ में इरशाद आतिफ का शेरी मजमुआ (काव्य संग्रह) ‘जुस्तजू’ है। जिसे पढ़ कर मैं भी उनकी जुस्तजू से रुशनास हुआ। इनकी शायरी में जिंदगी के उतार चढ़ाव, समाजी हालत, इश्क मोहब्बत हर तरह के रंग देखने को मिलते हैं। वह शायरी में जद्दू जेहद करते नज़र आते हैं। कहीं वह अपने आपसे तो समाज और वक्त के हुक्मरानों से लड़ते नज़र आते हैं। और इतनी मेहनत के बाद भी वह किसी चीज़ को बोझ नहीं समझते बल्कि हर लम्हा बेदार नज़र आते हैं। जुस्तजू की तमाम ग़ज़लें पढ़ने पर पता चला कि उनकी ग़ज़लों में लताफ़त है और फनी शउर भी, वह सच्ची शायरी करते हैं और अपनी बात सलीके से कहने का हुनर भी रखते हैं। वह एक हस्सास शायर हैं, यही वजह है कि उनकी शायरी में हक़्क़ानियत (सच्चाई) नज़र आती है। उनकी ग़ज़लें बहुत सादा और आम फ़हम ज़बान में हैं, जो कि कारी (पाठक) बआसानी रवानी के साथ पढ़ता चला जाता है और अपने आप पर बार भी नहीं महसूस करता। चंद अशआर देखें- 

‘हमारा दिल दुखाया जा रहा है/ मगर उनको हंसाया जा रहा है/ जो हैं मज़लूम दुनिया में उन्हीं को/ बड़ा ज़ालिम बताया जा रहा है।’, ‘उन गरीबों की भूख के बदले/ लो ज़मीर अपना बेचता हूं मैं/ मुझसे दो बात देख ले करके/ ज़ख़्म भर जाएंगे दवा हूं मैं।’ ऐसे तमाम खूबसूरत अशआर पढ़ने पर पता चलता है कि इरशाद आतिफ एक हुनरमंद शायर हैं। वह शायरी के ग्रामर से भी बहुत हद तक वाक़िफ़ हैं। फने ग़ज़ल पर उन्हें बड़ा उबूर (महारथ) हासिल है। उन्होंने मजमुआ की शुरुआत नात से की है, जिससे उनके दीनी इल्म का भी अंदाज़ा होता है। तीन शेर उनकी नात के भी पढ़ते चलें-‘दौलत उसे मिल जाती है अनमोल जहां में/ जिसको भी खुदा देता है ये नामे मोहम्मद।’, ‘मेरे सरकार की आमद तो है बेशक अंधेरे में/ मगर दुनिया तो आई है उसी दिन से उजाले में।’, ‘माने न माने कोई हक़ीक़त है ये मगर/ इक दिन पड़ेगी सबको ज़रूरत रसूल की।’ 

 इनकी ग़ज़ल का एक और शेर जो वाकई बहुत ही सादा है, लेकिन अपने अंदर इतनी गहराई लिए है जिसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। सच पूछो तो उनका ये शेर ही उनकी इंसानियत और इंकसारी का पता देता है। ‘दुश्मनों को गले लगाता हूं/ ये मेरा इन्तेक़ाम होता है।’

इस तरह पूरी किताब में एक से बढ़ कर एक शेर मौजूद हैं। इस शेरी मजमुआ जुस्तजू में खूबसूरत हार्ड जिल्द के साथ 190 पेज हैं, जिसकी डिजाइन गुलाम मोहम्मद अंसारी ने की है। किताब को गुजरात उर्दू साहित्य अकादमी के माली इमदाद से अनीका पब्लिकेशंस कनाल नारोल अहमदाबाद से प्रकाशित किया गया है जिसकी कीमत 350 रुपए है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)


शनिवार, 13 जून 2026

प्रेम की एक अनोखी दास्तान : रॉबर्ट गिल और ......’

                                                           - अजीत शर्मा ‘आकाश’


  

 ‘रॉबर्ट गिल और अजन्ता की पारो’ शीर्षक की पुस्तक लेखिका डॉ. प्रमिला वर्मा की उपन्यास कृति है, जो एक ब्रिटिश सैन्य अफ़सर के प्रेम और जज़्बात की सच्ची कहानी पर आधारित है। लेखिका के अनुसार वर्ष 1824-1879 के समय को सामने रखकर यह उपन्यास लिखा गया है, जिसके सभी पात्र एवं घटनाएं सत्य हैं। इसके अंतर्गत अजन्ता ग्राम में पारो एवं रॉबर्ट गिल की प्रेम कहानी को घटनाओं के आधार पर कल्पना का सहारा लेते हुए इसके कथ्य की रचना की गयी है। लेखिका ने उपन्यास के स्थान, पात्रों एवं घटनाओं को जीवंत करने की कोशिश की है। रॉबर्ट गिल की उन्नीस वर्ष की आयु से लेकर उसके संपूर्ण जीवन का चित्रण इस कृति में किया गया है। रॉबर्ट 1824 में कैडेट के रूप में लंदन में सेवा में भर्ती होने के पश्चात् वह ऐच्छिक नियुक्ति पर इंडिया आ गया था। लेफ्टिनेंट एवं कैप्टन के पश्चात् वह ब्रिटिश सैन्य अधिकारी मेजर के पद पर था। विशेष अनुरोध पर उसे जॉन स्मिथ द्वारा प्राचीन भारतीय कला के मूर्तरूप में खोजी गयी अजन्ता में बौद्ध गुफाओं का एक चित्रमय रिकॉर्ड बनाने के लिए नियुक्त किया जाता है। इस कार्य हेतु हैदराबाद के निजाम द्वारा महाराष्ट्र के औरंगाबाद में अजन्ता ग्राम स्थित बारादरी में उसके रहने का प्रबन्ध किया गया।

  गुफाओं की चित्रकारी और पेंटिंग के दौरान यहीं पर रॉबर्ट गिल को उसी अजन्ता ग्राम की कोली जाति की आदिवासी ‘पारो’ नाम की बनजारा लड़की अपनी बगिया का काला गुलाब दिया करती थी। वह अक्षर ज्ञान से अनभिज्ञ एक नृत्यांगना तथा समझदार लड़की है, जो गुफाओं की पेंटिंग्स में उसके साथ होती थी। गांव की आदिवासी लड़की पारो और रॉबर्ट का यह प्रसंग धीमे-धीमे प्रेम में बदल जाता है। सैन्य अधिकारी मेजर रॉबर्ट गिल बहुमुखी प्रतिभा का मालिक, तबियत से चित्रकार और फ़ोटोग्राफ़र है, साथ ही माउथ ऑर्गन और प्यानो का शौकीन तथा बहुआयामी व्यक्तित्व का स्वामी है। सेना में होने के बावजूद वह अत्यन्त भावुक प्रवृत्ति का है, जबकि सैन्य-क्षेत्र में भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं होता। उपन्यास के कथानक के अनुसार रॉबर्ट गिल की पत्नी फ्लावर ड्यू वैचारिक मतभेद के कारण उसे इंडिया में छोड़कर लन्दन वापस चली गयी थी। ऐसी मनः स्थिति में पारो के प्रेम ने ही उसे संभाला था। बाद में गांव वालों द्वारा गर्भवती पारो की हत्या कर दी जाती है। इसके पश्चात् रॉबर्ट की जिंदगी में एनी आई और उसने रॉबर्ट को इस अवसाद से बाहर निकाला। उपन्यास के अन्त में रॉबर्ट गिल की भी मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार यह एक दुखान्त उपन्यास है।

 रॉबर्ट गिल और पारो के प्रेम की यह एक अनोखी दास्तान आज भी विश्व प्रसिद्ध कही जाती है। रॉबर्ट की कब्र पर महाराष्ट्र के भुसावल में आज भी हर साल उसकी डेथ एनिवर्सरी मनाई जाती है। कहा जा सकता है कि प्रेमानुभूति को झकझोरने वाला यह एक बेहतर एवं महत्वपूर्ण उपन्यास है, जो ब्रिटिशकालीन इंडिया की स्थिति एवं मराठी कल्चर का विस्तृत वर्णन करता है। और रॉबर्ट के सैन्य जीवन का अभूतपूर्व वर्णन पाठकों के समक्ष आता है। लेखिका के अनुसार यह कृति उनके इस विषय पर श्रमपूर्वक किये गये रिसर्च का परिणाम है।

  सरल, सहज एवं प्रवाहमयी भाषा तथां रोचक शैली में लिखा गया यह उपन्यास पठनीय एवं सराहनीय है। मानवीय रिश्ते, मानवीय कमज़ोरियां हृद्गत भावनाएं एवं संवेदनाएं एवं विभिन्न घटनाएं पाठक को निरन्तर बांधे रखती हैं। रचना-कर्म के साथ न्याय करते हुए उपन्यासकार ने इसकी रचना की है। पुस्तक का मुद्रण एवं अन्य तकनीकी पक्ष उच्चकोटि का है। लोकमित्र प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस हार्ड बाउण्ड पुस्तक का मूल्य 600 रुपये है।     


सराहनीय ग़ज़लों का संग्रह ‘शाम तक लौटा नहीं’



 ग़ज़ल-संग्रह ‘शाम तक लौटा नहीं’ की रचनाओं के वर्ण्य-विषय प्रमुखतः प्रेम, विरह, सामाजिक मुद्दे, प्रकृति की छटा आदि हैं, जिनके अंतर्गत जीवन की विभिन्न अनुभूतियों और संवेदनाओं को शब्द प्रदान किये गये हैं। कहीं-कहीं दर्शन, श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य का भी पुट देखने को मिलता है। रचनाकार ने अपने आस-पास, घर-परिवार, समाज, सोशल मीडिया, सिनेमा आदि के माध्यम से जो अनुभव प्राप्त किये हैं, उन्हें इन रचनाओं के माध्यम से पाठकों से साझा करने का प्रयास किया है। पुस्तक में संग्रहीत ग़ज़लों के कुछ उल्लेखनीय अंश इस प्रकार से हैं-‘ये धूल ये धुआं ये नदी जल ये उजड़े वन/माहौल ये हुआ है कि जीना मुहाल है।’, ‘नदी में बाढ़ की तरह बहा था/ये कैसा प्यार था जो घट गया है।’, ‘अंधेरा है बड़ा घनघोर चारों ओर/मशालें फिर जलाना है चलो साथी।’, ‘एक सागर खड़ा का खड़ा रह गया/इक नदी खो गयी दो किनारे लिये।’, 

 इन गज़लों में रचनाकार ने हिन्दी-उर्दू के साथ ही अंग्रेज़ी के दैनिक बोलचाल के शब्दों से युक्त सरल-सुगम, तथा प्रवाहमय भाषा का प्रयोग किया है। विचारों, भावों एवं अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में स्पष्टता झलकती है। लेखन में हालांकि सावधानी एवं सतर्कता का परिचय प्रदान किया गया प्रतीत होता है, फिर भी ग़ज़ल-व्याकरण की दृष्टि से कुछ रचनाओं में ऐब (दोष) भी यत्र-तत्र परिलक्षित होते हैं। यथा- मन नहीं, हर रोज, आराम मत, हर रूत,, पास साहिल जैसे प्रयोगों में ऐबे-तनाफ़ुर (स्वरदोष), तक़ाबुले रदीफ़- पृ.-36, त्रुटिपूर्ण क़ाफ़िया- हरजाई- परछाई आदि। हटा कर राख फिर से कुछ अंगारे ढूंढने होंगे-बह्रदोष। फिर भी, कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि संग्रह की ग़ज़लें पाठकों को निराश नहीं करती हैं। रचनाधर्मिता एवं सृजनात्मकता की दृष्टि से लेखन सराहनीय है। इस पुस्तक को गुफ्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है, जिसकी पृष्ठ संख्या 104 तथा मूल्य 200 रूपये है।


एक ही रूक्न से बनी ग़ज़लों का संग्रह


 

‘पतवार तुम्हारी यादें’ रचनाकार महावीर सिंह ‘दिवाकर’ की पुस्तक है, जिसमें उनकी 84 ग़ज़लें संग्रहीत हैं। यह ग़ज़ल-संग्रह अन्य ग़ज़लकारों के ग़ज़ल-संग्रहों से इसलिए अलग है, क्योंकि इसकी समस्त ग़ज़लें ‘बह्र-ए-मीर में हैं, जो एक विशेष रूक्न ‘फेलुन’ तथा उसके दोहराव से बनी होती है। यह बह्र अपवाद स्वरूप है, जिस पर अरूज़ के नियम नहीं लागू होते हैं। सभी मिसरों में कुल मात्राएं बराबर होने के कारण यह मात्रिक बह्र कहलाती है। लय भंग न होने देना ही इस ग़ज़ल की एक प्रमुख एवं अनिवार्य शर्त है। शास्त्रीय पक्ष के दृष्टिगत संकलन में रूक्न ‘फेलुन’ तथा उसके दोहराव से बनी छोटी तथा लम्बी बह्रों में ग़ज़लें कही गयी हैं, यथा- ‘अपनापन रख/मत अनबन रख’ और ‘ज्यादा से ज्यादा क्या होगा तेरे बिन मैं मर जाऊंगा।’ यह मात्रिक ग़ज़लों का संग्रह है, जिसे ग़ज़लकार का एक विलक्षण प्रयोग कहा जा सकता है।

  रचनाकार ने परंपरा से हटकर अनेक नये और विशिष्ट क़ाफ़ियों तथा रदीफ़ों का प्रयोग भी किया है, जैसे- चिरकुट-गुट, न्यूटन-दरपन, मृग-दृग आदि। रदीफ़- ओके, तू जाने आदि। शिल्प की दृष्टि से ग़ज़लें शुद्ध हैं। हालांकि, कुछ मिसरों में मात्रा गिराने के कारण लयभंग का दोष प्रतीत होने के कारण पढ़ने में अटकाव-सा आता है, यथा- आखि़र मन को कचोट बिकेगा (पृ.-25), आंखंे दिल जां शहर में तेरे ही (पृ.-27), काम शुरू होने के समय जो सुझाव नहीं रखते (पृ.-76) आदि। ग़ज़लों की भाषा सरल, सहज एवं शुद्ध है, जो उर्दू-हिन्दी शब्दों का मिलाजुला रूप है। उदाहरणार्थ, दग्ध-हृदय, अपावन, प्रतिबिंब, रोमांटिक, पोज़, साजन, चाय सुड़क ले, फीका चावल, ताक-धिना-धिन जैसे शुद्ध हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी एवं आम बोलचाल के शब्द एवं शब्दावली का प्रयोग किया गया है। आवश्यकतानुसार कुछ कठिन शब्दों के अर्थ फु़टनोट में दिये गये हैं।

 पुस्तक में संग्रहीत ग़ज़लों के कुछ उल्लेखनीय अशआर प्रस्तुत हैं- दौर-ए-हाज़िर मे मक्कारी/बनकर आला घूम रही है। आ पहुंचे आखि़र मज़िल पर/रस्ते ने भटकाया तो था। किसके होश ठिकाने थे/दोनो दिल दीवाने थे। दग्ध-हृदय था पहला कवि/गीत बनी थी पहली आह। तू आवाज़ तो दे मुझको/तेरे भीतर बैठा हूं। शीशे सा है अपना दिल/और ज़माना पत्थर है। उड़कर आ फिर चीं-चीं का सगीत सुना/डाली-डाली उपवन-उपवन गौरैया। 

 ग़ज़ल व्याकरण के दृष्टिगत कुछ ग़ज़लों में दोष भी परिलक्षित होते हैं। यथा- कोलाहल लहरें, उमस सी, ख़ालिस सोना, ढब बाज़ारी आदि में ऐबे तनाफुर (स्वरदोष- किसी शब्द के अंतिम अक्षर की उसके बाद वाले शब्द के पहले अक्षर से समानता) है। तक़ाबुले रदीफ- मतले के अलावा किसी भी शे’र की पहली पंक्ति के अन्त में रदीफ़ या रदीफ़ के हिस्से की मौजूदगी का दोष-बरसेंगे-सच के (पृ.-16), भर का-मेरा-दुनिया (पृ.-23) आदि। इसके अतिरिक्त ग़ज़लों में अनेक स्थानों पर ‘यार’ शब्द भरती का प्रतीत होता है। ‘परछाईं’ के स्थान पर प्रयुक्त ‘परछाई’ शब्द में भाषाई त्रुटि है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ‘पतवार तुम्हारी यादें’ एक सहज और सम्प्रेषणीय, श्रेष्ठ, पठनीय एवं सराहनीय ग़ज़ल-संग्रह है। नव रचनाकारों के लिए यह संग्रह प्रेरक हो सकता है। हिन्दी शिक्षण संस्थान, जोधपुर द्वारा प्रकाशित 112 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 250 रुपये है।


रचनाधर्मिता का परिचायक काव्य संग्रह


 ‘मैं कविता हूं’ शीर्षक पुस्तक में कवियत्री नीना मोहन श्रीवास्तव की 62 काव्य-रचनाएं संग्रहीत हैं। कथ्य की दृष्टि से इनके वर्ण्य-विषय में वैविध्य है। संग्रह में छन्द रहित एवं छंदबद्ध, दोनों ही प्रकार की कविताएं सम्मिलित हैं। कथ्य की दृष्टि से पुस्तक में विविध विषय, भावानुभाव एवं अंतर्मन की अभिव्यक्तियां समाहित हैं। ‘गणेश वन्दना’ एवं ‘सरस्वती वन्दना’ रचनाओं से पुस्तक का प्रारम्भ किया गया हैं। इसमें ‘देशगीत’, ‘तिरंगा’, ‘निराला देश है मेरा’ आदि देशभक्तिपरक कविताएं हैं तथा ‘गुलमोहर’, ‘ऋतुराज बसंत’, ‘चीर हरित वसुधा’, ‘गगन का चाँद’ आदि के माध्यम से प्रकृति-चित्रण किया गया है। ‘समय चक्र’, ‘जीवन धारा’, ‘ये जो ज़िन्दगी है’, ‘वक्त’ आदि रचनाओं के द्वारा जीवन को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। ‘मन’, ‘कसक’, ‘पीड़ा’, ‘विश्वास’ शीर्षक कविताएं भी इसी कोटि की हैं। इसके अतिरिक्त नारी विमर्श को भी महत्त्व प्रदान किया गया है, यथा- ‘निर्भया’, ‘नारी क्यों मौन हो तुम’, ‘हां, मैं ही सिन्धु’, ‘मैं ना हारी’, ‘बेड़ी’ आदि रचनाएं नारी की पीड़ा एवं उसके अन्तःकरण की अभिव्यक्तियों को प्रतिबिम्बित करती हैं।

 रचनाओं की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है, जिसमें हिन्दी की तत्सम शब्दावली एवं कुछ संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग किया गया है। भाषा-व्याकरण के अनुसार ‘प्रीति दिखाया है- रीत निभाया है’ (पृ.-81) जैसे वाक्यांश दोषयुक्त हैं। ‘अमलतास’ शीर्षक कविता में ‘तुम’ के साथ ‘तेरी’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जो निषिद्ध है (पृ.-79)। रचनाओं में ‘न’ के स्थान पर ‘ना’ का प्रयोग शुद्ध नहीं माना जाता है। पुस्तक में संग्रहीत रचनाओं के कुछ अंश प्रस्तुत हैं-व्यथित यामिनी तिमिर घना है/नवल प्रभात खिलेगा ही/धूप कड़ी आयेगी सन्ध्या/शीतल मलय चलेगी ही। (सुख की आहट)। टूटी जब भी आशा मन की/आहत उतनी बार हुआ है/हंसना चाहा जब भी मैंने/आहों से सत्कार हुआ है (आहें)। नहीं बदली अगर यह दुर्दशा तो/खड्ग की धार बन कर तनी हंूं/चीर देने को तम का हरेक बंधन/दामिनी की धमक बन कर चली हूं (हां, मैं ही सिन्धु,)। मांग सजाये कड़ी दुपहरी किसे जोहती गुलमोहर/हरी चुनर में पुष्प लाल हैं करे प्रतीक्षा गुलमोहर। (गुलमोहर)। कमल पुष्प पर ऊषा काल में/लेटी चमक बिखेरे हुए/राह निहारी भानु किरण की/सुध‘-बुध को बिसराते हुए। (तुहिन)।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कवयित्री की सृजनशीलता एवं रचनाधर्मिता सराहनीय है, जिसका परिचायक यह काव्य संग्रह है। राका प्रकाशन, प्रयागराज द्वारा प्रकाशित 128 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 250 रुपये है।


विसंगतियों को चित्रित करती लघुकथाएं


‘पहला वेतन’ पुस्तक रचनाकार केदारनाथ ‘सविता’ की 64 छोटी-बड़ी लघुकथाओं एवं कहानियों का संग्रह है। कहानियों कें कथ्य के अंतर्गत कहानीकार द्वारा आम आदमी की समस्याओं, समाज के लोगों का खोखला चरित्र,, क्रूरताओं, ग़लत परंपराओं और विश्वासघातों की जांच-पड़ताल कर समाज को दर्पण दिखाकर उसे एक नयी राह दिखाने तथा मध्यमवर्गीय परिवारों का विघटन, भौतिकता की चकाचौंध, समाज का दोहरा चरित्र आदि सामाजिक विसंगतियों का चित्रण कर समस्याओं का समाधान खोजने की चेष्टा की गयी है। वर्तमान समय ने सामाजिक और मानवीय रिश्तों को प्रभावित कर उन्हें विघटित-सा कर दिया है। रिश्तों और संबंधों की समूहवादी चेतना व्यक्तिवादी चेतना में बदलती जा रही है। मनुष्य आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। रिश्तों की मजबूत डोर कमजोर होकर टूटती-सी जा रही है। समाज में इस प्रकार की की मनःस्थिति एवं उससे उत्पन्न पीड़ा का भी चित्रण लघुकथाओं तथा कहानियों में किया गया है। वर्तमान परिवेश के अनेक बड़े सामाजिक प्रश्नों को सम्मुख लाने एवं उनसे जूझने का एक प्रयास लघुकथाओं में परिलक्षित होता है।

  ‘पहला वेतन’ लघुकथा मध्यमवर्गीय परिवारों कें विघटन को दर्शाती है, जहां बेटा अपने बूढ़े बाप से दूरी बना लेता है। ‘हल्के आभूषण’ दहेज प्रथा पर एक प्रहार-सा है। ‘दवा’ कहानी में मरीज़ों की जान से खिलवाड़ करने वाले चिकित्सकों को आइना दिखाने का प्रयास किया गया है। ‘हनुमान जी की कृपा से’ लघुकथा में लोगों में व्याप्त अन्धविश्वास एवं अज्ञान को दर्शाया गया है। ‘चुनावी हथकंडे’ गांवों तक पहुँच चुकी सियासत की गन्दगी का चित्रण करती र्है। इस प्रकार सभी कहानियां किसी न किसी समस्या को प्रदर्शित करती हैं। इन कहानियों में रचनाकार द्वारा सरल, सहज और साधारण बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। इस प्रयास में भाषा में कहीं-कहीं अ-स्तरीयता उत्पन्न हो गयी है तथा इस प्रकार की भाषा साहित्यिकता से काफ़ी दूर होती गयी है। रचनाकार ने सृजनात्मकता को ध्यान में रखते हुए लघुकथाओं तथा कहानियों में अपने सचाई बयान करने का सम्पूर्ण प्रयास किया है। संग्रह की लघुकथाएं रचनाधर्मिता के प्रति आश्वस्त करती हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि पुस्तक पठनीय है तथा रचनाकार की रचनाधर्मिता सराहनीय है। 128 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 300 रुपये है, जो हिन्दी श्री पब्लिकेशन, सन्त रविदासनगर द्वारा प्रकाशित की गयी है।

मनोभावों की अभिव्यक्ति का सराहनीय सृजन



 ‘गहवर’ शीर्षक कविता-संग्रह की रचनाकार डॉ. मधुबाला सिन्हा हैं, जिसमें उनकी 51 कविताएं सम्मिलित हैं। इन कविताओं का वर्ण्य विषय प्रमुखतः श्रृंगार एवं प्रणय है, साथ ही वर्तमान समाज, जीवन की अनुभूतियों तथा संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों, स्त्री की व्यथा-कथा, उसके अन्तर्मन के मनोभावों आदि का चित्रण भी इनमें किया गया है। संकलन की कविताओं को यदि शिल्प की दृष्टि से देखा जाए, तो इनमें काव्य एवं छन्दानुशासन का नितान्त अभाव परिलक्षित होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि काव्य व्याकरण एवं छन्द शास्त्र को नज़रअन्दाज़ कर रचनाओं को किसी प्रकार से काव्य-रूप देने का प्रयास किया गया है। 

 संग्रह की कुछ कविताओं के अंश प्रस्तुत हैंः- मैं स्त्री हूं- स्त्री हंू/ हां, गर्व है मुझे कि मैं स्त्री हूं/सृष्टि के आदि से ही/उज्ज्वलता की किरण हूं/हां, क्योंकि मैं स्त्री हूं। क्यों छोड़ंू- क्यों छोड़ूं मैं/उस जीवन को जो देता है ख़ुशी आशीष प्यार/अपनत्व भरे अपनों का इज़हार। जिंदगी- ऐ जिंदगी, खुशनसीब है तू/मत कह खुद को कंगाल। नारी हूं- पर शोषित अब मैं नहीं बनूंगी/धार उलट के दिशा बहूंगी। क्या पता है तुम्हें?- जैसे रह जाती हैं आत्माएं/इंसान के जाने के बाद भी/वैसे ही रह जाएगा/मेरा और तुम्हारा प्रेम/और प्रेम का एहसास भी। 

 रचनाओं में अधिकतर सरल एवं सहज शब्दों का प्रयोग किया गया है, किन्तु कुछ स्थानों पर भाषा व्याकरण, वाक्य विन्यास, वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ पाठक के समक्ष आती हैं। यथा- दिग्भर्मित, खण्डर, सम्भालते, बनाईए, गहराईयों आदि (अशुद्ध वर्तनी)। तुझीको, बिखरी ढेरों में, सर्पीली मोड जैसे शब्दों के अशुद्ध प्रयोग तथा हर रस्म निभे अपनो का, लकड़ी फिर उसमें सुलगाया, हर रिश्ते अकेले पड़ने लगे हैं जैसे वाक्यांशों में व्याकरणिक अशुद्धियाँ दृष्टिगत होती हैं। अनुस्वार सम्बन्धी त्रुटियां तो अनेक स्थानों पर हैं। पुस्तक का शीर्षक ‘गहवर’ है, जो स्वयं में एक अशुद्ध शब्द है। शब्दकोश के अनुसार शुद्ध शब्द ‘गह्वर’ है, जिसका अर्थ होता है गुफा। हमरूह पब्लिकेशन हाउस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 108 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 199 रुपये है।

भारत की महान विभूतियों का परिचय


 चित्रकार एवं लेखक विनय कुमार दुबे की पुस्तक शब्द-रंग में 101 भूले बिसरे साहित्य मनीषियों, हिन्दी सेवियों, साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों तथा राजनीतिज्ञों के चित्र उनकी परिचयात्मक टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत किये गये हैं। ऐसा करके रचनाकार ने उन महान विभूतियों की छवियों तथा उनके कृतित्व को मूर्तिमान रूप देने का प्रयास किया है। पुस्तक के इस प्रथम भाग में 101 दिवंगत साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, निबन्धकारों, पत्रकारों तथा कुछ अन्य भाषा के उन्नायकों के व्यक्ति-चित्र एवं परिचय को सम्मिलित किया गया है। 

 इस पुस्तक में सम्मिलित कुछ व्यक्तित्वों तथा महान विभूतियों के नाम इस प्रकार से हैं- फ़ारसी के कवि- अमीर खुसरो, सन्त रविदास। हिन्दी के साहित्यकार कवि- कबीरदास, मलिक मुहम्मद ‘जायसी’, मीराबाई, महाकवि गंग, सूरदास, नरोत्तमदास, गोस्वामी तुलसीदास, अब्दुल रहीम खानखाना,रसखान, आचार्य केशवदास, सन्त मलूकदास, बिहारीलाल, भूषण, महाकवि देव, गिरिधर कविराज, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, जगन्नाथदास रत्नाकर, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पन्त, सोहनलाल द्विवेदी, महादेवी वर्मा, नागार्जुन, राहुल सांकृत्यायन, गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’, डॉ. धर्मवीर भारती। गद्यकार- राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’, बाबू देवकीनन्द खत्री, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, बालकृष्ण भट्ट, भारतेन्दं हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, डॉ. श्यामसुन्दर दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बाबू गुलाबराय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा। कहानी एवं उपन्यासकार- मुंशी प्रेमचन्द, वृन्दावन लाल वर्मा, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, अमुतलाल नागर, फणीश्वरनाथ रेणु। हिन्दी के अनन्य सेवक- सुब्रह्मण्य भारती, फ़ादर कामिल बुल्के। पत्रकार- बाबूराव विष्णु पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी। अन्य विभूतियाँ- दयानन्द सरस्वती, महामना पं0 मदन मोहन मालवीय, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गान्धी, राजर्षि पुरूषोत्तमदास टुडन, डॉ. सम्पूर्णानन्द, जय प्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया आदि।

 पुस्तक के कथ्यात्मक लेखन में यत्र-तत्र भाषाई व्याकरण तथा वर्तनीगत अशुद्धियां परिलक्षित होती हैं साथ ही प्रूफ़ सम्बन्धी त्रुटियां भी हैं, यथा- ना-ना विषयोन्मुख, निहारे/निहारें, श्वांस, अभित्सिंचित, चेष्ठा, श्रद्धांजली, क्रितित्व, नामोलेख, अतिसयोक्ति, नजरबंध आदि। 

कहा जा सकता है कि 101 विभिन्न भारतीय विभूतियों का परिचय एक साथ प्राप्त करने के दृष्टिकोण से यह यह एक उपयोगी पुस्तक है। लेखक द्वारा श्रमपूर्वक कार्य करके इसकी सामग्री जुटायी गयी है। इस दृष्टि से पुस्तक को राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार प्रसार में एक महत्त्वपूर्ण योगदान की भाँति माना जा सकता है। पुस्तक को एवं लेखक के श्रम को सराहनीय कहा जाएगा। 126 पृष्ठों की इस पुस्तक में इसके प्रकाशक एवं मूल्य का उल्लेख नहीं किया गया है।


प्राचीन छन्द कुण्डलिया की सराहनीय पुस्तक



 पुस्तक ‘मेरी प्रिय कुण्डलियां’ में रचनाकार डॉ. राकेश ‘चक्र’ की 321 रचनाएं संग्रहीत हैं। पुस्तक 15 विषयों में विभक्त की गयी है, जिनमें प्रकृति, प्रेम, भ्रष्टाचार, भ्रूण हत्या-दहेज, चुनाव राजनीति, प्रेम भक्ति/अध्यात्म, दर्शन, हास परिहास आदि सम्मिलित हैं। जन जीवन से जुड़े इस प्रकार के विविध विषयों पर रचनाओं के माध्यम से हमारे आज के समाज की विकृतियों, विद्रूपताओं, राजनैतिक पाखण्ड आदि पर प्रहार करते हुए प्रेम, अघ्यात्म, सकारात्मकता तथा सुविचार जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना पर बल प्रदान किया गया है। पुस्तक की रचनाएँ आज के परिवेश का चित्रांकन करते हुए समाज को जोड़ने की बात करती हैं।

कुण्डलियों में प्रयुक्त भाषा सरस, सुबोध एवं भावानुकूल प्रकार की है, जिसमें हिन्दी के तत्सम, तद्भव तथा  देशज शब्दों के साथ-साथ दैनिक बोलचाल के उर्दू- अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग भी सम्मिलित है। ‘टन्न’ (कुण्डलिया सं.-108) जैसे नितान्त व्यावहारिक शब्द पाठक से तादात्म्य स्थापित करते हैं। पुस्तक की रचनाओं के कुछ अंश प्रस्तुत हैं- ’बीवी अच्छी वो लगे, रखे सदा घर टन्न/पति से मिलने पर सदा, मन को रखे प्रसन्न/मन को रखे प्रसन्न, बात खाने की पूछे/मीठे-मीठे बोल सुनाकर पति पर रीझे/कहे चक्र’कविराय, मिले बस ऐसी बीवी/अच्छी जिसकी सोच, वही सुन्दर है बीवी।’  ‘फैशन के इस दौर में कपड़े दिए उतार/खुले हुए तन से बहे, मस्ती की रस धार/मस्ती की रस धार, नहावैं दौलत वाले/चेहरे उजले लगें, मगर अन्दर से काले/कहे ‘चक्र’ कविराय, बढ़े फैशन के लैशन/संसाधन भी बढ़े, कि चहुंदिश छाया फैशन।’ 

  कुण्डलिया का छन्द-विधान विशिष्ट प्रकार का होने के कारण इससे अनभिज्ञ रचनाकार प्रायः दोषपूर्ण कुण्डलिया रच देते हैं। इस पुस्तक के रचनाकार ने यथासम्भव इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए छन्द की शर्तों के पालन का प्रयास किया है। बावजूद इसके कुछ दोहे तथा रोला छन्द-दोषयुक्त हो गये हैं, जिसके कारण इन कुण्डलियों के पठन में लयात्मकता तथा प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है। यथा- मकर संक्रान्ति (कुण्डलिया सं. 10), जन्म सरस्वती मां का (कुण्डलिया सं. 14), अच्छी नियुक्ति (कुण्डलिया सं. 42) आदि। कुण्डलिया सं. 192, 194, 195, 266 आदि में प्रथम तथा अन्तिम शब्द सम्बन्धी आंशिक दोष दृष्टिगत होता है। कुछ रचनाओं (कुण्डलिया सं. 9, 11 आदि) के अन्त में गुरू-लघु आया है, जो निषिद्ध माना जाता है। ‘दिग्गंत’ तथा ‘अनेकों’ (कुंडलिया संत्र 14, 145) जैसे प्रयोग भाषा-व्याकरणिक दृष्टि से अशुद्ध हैं तथा ‘झूमीं’ (कुण्डलिया सं. 1) जैसे शब्दों में अनुस्वार सम्बन्धी दोष है। तथापि, कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पुस्तक पठनीय है तथा लेखक की रचनाधर्मिता एवं सृजनशीलता सराहनीय है। आर.के.पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 144 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 700 रुपये रखा गया है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)