गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

धीरज की रचनाओं पर गंभीरता से काम करना चाहिए

गुफ़्तगू की ओर से ‘धीरज जन्मोत्सव-2021’ का आयोजन



प्रयागराज। जमादार धीरज हमारे समय के ऐसे कवि रहे हैं, जिनकी रचनाएं बेहद गंभीर, प्रासंगिक और समय से वार्तालाप करते हुए हैं, इन रचनाओं का गंभीरता से अध्ययन करते हुए काम किया जाना चाहिए। समय के अनुसार पर इनकी कविताओं पर विश्वविद्यालयों के माध्यम से शोध कराया जाना चाहिए। यह बात इलाहाबाद दूरदर्शन केंद्र्र के पूर्व निदेशक वरिष्ठ साहित्यकार श्याम विद्यार्थी ने 20 अक्तूबर को राजरूपपुर स्थित डॉ. अंबेडकर मार्ग पर गुफ़्तगू की ओर से आयोजित ‘जमादार धीरज जन्मोत्सव-2021’ में कही। 
‘धीरज सम्मान-2021’ प्राप्त करते मासूम रज़ा राशदी


 कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री विद्यार्थी ने कहा कि धीरज जी ने अपने बच्चों में ऐसा संस्कार दिया है कि उनके निधन के बाद भी उनकी रचनाओं को कालजयी बनाने, स्थापित कराने और उन्हें उनके जन्मदिन पर याद करने का वीणा है उठाया है, यह एक ऐसा आदर्श जिसे स्थापित करना बेहद ज़रूरी है।
‘धीरज सम्मान-2021’ प्राप्त करते विजय लक्ष्मी विभा 


गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि जमादार धीरज की रचनाएं बेहद खास और हमारे के समय लिए प्रासंगिक है, इनकी कविताओं को पाठ्यक्रम में शामिल कराने का प्रयास करना चाहिए, इसके लिए हमलोग अपने स्तर प्रयास करेंगे।
‘धीरज सम्मान-2021’ प्राप्त करते गोपीकृष्ण श्रीवास्तव


 मुख्य अतिथि पूर्व अपर महाधिवक्ता क़मरुल हसन सिद्दीक़ी ने कहा कि आज के दौर में जिस तरह से जमादार धीरज को याद किया जा रहा है, यह बहुत बड़ी बात है। वर्ना इसी इलाहाबाद से बड़े-बड़े शायरों का निधन हो गया, आज उनके परिवार के लोग भी उन्हें याद तक नहीं करते। इसलिए इस आयोजन के लिए टीम गुफ़्तगू के साथ जमादार धीरज परिवार बहुत ही बधाई का पात्र है। रांची की कवयित्री अंकिता सिन्हा ने कहा निराला, फ़िराक़, महादेवी, पंत और अकबर इलाहाबादी की सरजमीन पर आकर आज बेहद फख्र महसूस कर रही हूं। जिस तरह से जमादार धीरज को याद किया जा रहा है, वह इलाहाबाद जैसे साहित्यिक नगरी में ही हो सकता है। लाल सरन, गोपाल सिंह, तलब जौनपुरी, मधुबाला गौतम, अशोक कुमार, शीला सरन, अंजनी कुमार आदि ने भी विचार व्यक्त किए। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

‘धीरज सम्मान-2021’ प्राप्त करते प्रभाशंकर शर्मा


 दूसरे दौर में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। अनिल मानव, फ़रमूद इलाहाबादी, शिवाजी यादव, श्रीराम तिवारी सहज, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, अना इलाहाबादी, अजीत शर्मा आकाश, केशव सक्सेना, अर्चना जायसवाल, मीठी मोहन, प्रीता बाजपेयी, अन्वेशा सिंह और शाहिद इलाहाबादी ने कलाम पेश किया। 

इन्हें मिला धीरज सम्मान

नज़र कानपुरी का सम्मान प्राप्त करते शिवाजी यादव


नज़र कानपुरी (लखनऊ), मासूम रज़ा राशदी (ग़ाजीपुर), गोपीकृष्ण श्रीवास्तव (प्रयागराज), विजय लक्ष्मी विभा (प्रयागराज) और प्रभाशंकर शर्मा (प्रयागराज) 

बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

‘कामयाबी सिर्फ़ छह कदम पर’

                          

                                                                                       - डॉ. हसीन जीलानी


                                         

 ‘कामयाबी सिर्फ़ छह कदम पर’ दिनेश बोहरा की मराठी ज़बान में लिखी गई किताब है, जिसका उर्दू में तर्जुमा मोहतरमा सैयद नौशाद बेगम ने किया है। मोहतरमा ने इससे क़ब्ल भी मुन्फरिद मौज़ूआत पर लिखी गई किताबों के उर्दू ज़बान में तर्जुमे किए हैं। खुदा ने इंसान को सबसे अशरफ़ मख़्लूक बनाकर दुनिया में भेजा है। इंसान अपनी ज़ेहानत से बड़े-बड़े मारके सर करता रहा है। लेकिन दुनिया में बहुत से ऐसे भी इंसान हैं जिनका कोई नसबुल-ऐन नहीं, बस ज़िन्दगी जिये जा रहे हैं। मीर तक़ी मीर का बहुत मशहूर शेर है-

            बारे दुनिया रहो ग़मज़दा या शाद रहो,

            ऐसा कुछ करके चलो यां कि बहुत याद रहो।

 बहुत याद रहने की चाह अगर हर इंसान के दिल में पैदा हो जाए तो हज़रत-ए-इंसान दुनिया में बड़ी से बड़ी कामयाबी हासिल कर सकता है। बहुत से इंसान दुनिया में बड़े-बड़े कारनामे अंजाम देने के ख़्वाब तो देखते हैं लेकिन इन ख़्वाबों को शर्मिन्द-ए-ताबीर करने के लिए जिस कूव्वत-ए-इरादी, हिम्मत, सब्र-ओ-इस्तेक़लाल और जां-फिशानी की ज़रूरत होती है वो उससे कोसो दूर होते हैं, और अक्सर अपनी नाकामी का ठीकरा अपनी तक़दीर के सिर फोड़ देते हैं। शायर ने क्या उम्दा बात कही है-‘तद्बीर के दस्त-ए-जर्री से तक़दीर दरख्शां होती हैै/कुदरत भी मदद फ़रमाती है, जब कोशिश-ए-यकसां होती है।’ ‘कामयाबी सिर्फ़ छह कदम दूर पर’ अपने मौजूआत और मवाद के लिहाज से एक मुन्फरिद किताब है। इस किताब का मुतालिआ बग़ौर बार-बार किया जाना चाहिए। कामयाबी की राह में पेश आने वाली दुश्वारियों का सामना करने में ये किताब सहायक साबित होगी। इस किताब को पढ़ने के बाद इसकी मदद से इंसान एक बा-मक़सद और बा-मानी ज़िन्दगी गुजार सकता है। बक़ौल दिनेश बोहरा-‘दोस्तों ! ये किताब उन अफ़राद के लिए जो अपने नसबुल-ऐन का तअय्युन करके अपनी ज़िन्दगी को ख़ास बनाने और रौशन मुस्तक़बिल की तरफ कदम बढ़ाने का इरादा रखते हों और जिन्होंने अपने क़ौल से आगे बढ़कर अमली दुनिया में पेश रफ्त की है, उन्हें राह दिखाने की एक दयानत दाराना काविश है।’  200 सफ्हात पर मुश्तमिल इस किताब का कवर दिलकश और दीदा जेब है, जिसकी कीमत सिर्फ़ 150 रुपये है। 


‘बिहार, बंगाल और उड़ीसा के क़लमकार’   


                               

 अहसन इमाम अहसन उर्दू ज़बान-ओ-अदब का एक जाना पहचाना नाम है, जो उर्दू की बेलौस खि़दमात अंजाम दे रहे हैं। वे मुलाज़मत के सिलसिले में भुवनेश्वर, उड़ीसा में कयाम पेज़ीर है जहां उर्दू ज़बान व अदब की तरवीज व तरक़्क़ी में रियासती हुकूमत की दिलचस्पी बिल्कुल नज़र नहीं आती। इसके बाजवूद अहसन इमाम मुसलसल न सिर्फ़ अदब का मुतालिआ कर रहे हैं, बल्कि उम्दा मज़ामीन भी तहरीर कर रहे हैं। आज जबकि हर इंसान नफ़ा व नुकसान को जे़हन में रखकर अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहा है, ऐसे में अहसन इमाम उर्दू के गुमनाम अदीबों व शायरों पर मजामीन लिख रहे हैं, वे गोशा-नशीन होकर अदब तख़्लीक कर रहे हैं। मुल्क के मुख़्तलिफ़ सूबों से वाबस्ता अदीबों व शायरों पर इन्होंने अपनी कीमती आरा पेश की हैं। जे़रे तब्सेरा किताब ‘बिहार, बंगाल और उड़ीसा के क़लमकार’ इनकी पांचवीं किताब है। इससे क़ब्ल इन्होंने महाराष्ट्र और झारखंड के क़लमकारों पर मज़ामीन लिखे हैं, जो किताबी शक्ल में शाया हो चुके हैं।

 अदबी तन्क़ीद रोज़ ब रोज़ कारोबार की शक्ल अख़्तियार करती जा रही है। अपने मोहसिनों और अपने चाहने वालों पर उर्दू के नाम-निहाद नक़्क़ादों ने ऐसे मज़ामीन तहरीर किए जो मुबालग़े से पुर हैं। बजाए खूबियों और ख़ामियों का जिक्र करने के उन्होंने तख़्लीककार के मन्सब और ओहदे को ज़ेहन में रखकर बाज़ ऐसी बातें लिख दी जो हक़ीक़त में उनमें थी ही नहीं। इसीलिए अब हर फनकार अपनी तख़्लीक के साथ-साथ अपनी तन्क़ीद का बोझ भी अपने सिर उठाने के लिए मज़बूर है। ये बात अहसन इमाम खूब अच्छी तरह से समझते हैं। इनकी इस किताब में बिहार के दस, बंगाल के आठ और उड़ीसा के 13 क़लमकारों पर मज़ामीन तहरीर किए गए हैं। इनमें शायर भी हैं और अफसाना निगार भी। साफ़ सुथरी ज़बान में लिखे गए ये मज़ामीन दिलचस्प और मालूमाती हैं। उम्मीद है अदबी हल्के में इस किताब की ख़ातिर-ख़्वाह पज़ीराई होगी। 192 सफ़्हात पर मुश्तमिल इस किताब की कीमत सिर्फ़ 200 रुपये है, जिसे एजुकेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली ने शाया किया है। किताब के कवर पर मुसन्निफ़ व नाशिर अहसन इमाम असहन की तस्वीर उनके बेटे अतहर इमाम ने बहुत उम्दा स्केच की है।


 ‘सैयद मोहम्मद अली शाह मयकश अकबराबादी’                                  


 

आगरा यानी अकबराबाद एक तारीख़ी शहर है। जो किसी ज़माने में अहल-ए-इल्म व अदब और आलिमों का मरकज़ हुआ करता था। नज़ीर अकबराबादी, सीमाब अकबराबादी, सबा अकबराबादी और दीगर अदबी शख़्सियतें इस शहर से वाबस्ता रही हैं। ज़ेरे तब्सेरा किताब दबिस्तान-ए-आगरा के मुमताज शायर व अदीब सैयद मोहम्मद अली शाह मयकश अकबराबादी के मुरत्तेबीन डॉ. नसरीन बेगम अलीग और सैयद फ़ैज़ अली शाह नियाज़ी ने इस किताब को शाया कर उर्दू अदब की गिरां क़द्र खि़दमत अंजाम दी है। किताब में खुद मयकश अकबराबादी के तीन अहम मज़ामीन और उर्दू के कई नामी गिरामी अदीबों व तन्कीदनिगारों मसलन आफ़ाक़ अहमद इरफानी, प्रो. मुग़ीसउद्दीन फ़रीदी, प्रो. ज़हीर अहमद सिद्दीक़ी, प्रो. उन्वान चिश्ती, प्रो. शमीम हन्फ़ी, प्रो. अली अहमद फ़ातमी, डॉ. सिराज अजमली वगैरह के मेयारी मज़ामीन यकजा कर दिए गए हैं। मयकश अकबराबादी का नाम तसव्वुफ के हवाले से एक मोतबर नाम है। वह एक अच्छे शायर ही नहीं अच्छे इंसान भी थे। उनकी शख़्सियत तसव्वुफ के रंग में रंगी हुई थी। वह एक इंसान दोस्त और रौशन ख़्याल शख़्स थे। शायरी और तसव्वुफ़ मयकश अकबराबादी को विरसे में मिले। और इन दोनों से फितरी मुनासबत के सबब इन्होंने बहुत कम उम्री में ही बग़ैर किसी उस्ताद की रहनुमाई के शेरगोई का आग़ाज़ कर दिया और तसव्वुफ़ के असरार रोमूज़ से वाक़फियत हासिल कर ली।

 प्रो. शमीम हन्फ़ी ने मयकश अकबराबादी के तअल्लुक से उम्दा बात कही है-‘मयकश साहब ने बुजुर्गों की मीरास को आज तक जिस जिस तरह से बचाए रखा, ये हिकायत भी कम अजीब नहीं। ये मीरास इल्मी और अदबी नवादिर से क़ता नज़र उन कद्रों, रिवायतों और जीने के उन करीनों से इबारत है जो सीना-ब-सीना मयकश साहब को मुन्तक़िल हुई।’ किताब का कवर पेज सादा लेकिन दिलकश है। जो ऐन मयकश अकबराबादी के रंग के मुताबिक है। 286 सफ्हात के इस किताब की कीमत महज 300 रुपये है। इसकी इशाअत लेथू आफ़सेट प्रिन्टर्स, अलीगढ़ से हुई है।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2021 अंक में प्रकाशित )


शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

बेहद जिन्दादिल थे कमेंटेटर इफ़्तेख़ार पापू


                                                  -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

इफ़्तेख़ार अहमद पापू 


 इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों की रेडियो पर आंखों देखा हाल यानी कमेंट्री की बात होती है तो प्रयागराज के इफ़्तेख़ार अहमद पापू का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अगर प्रयागराज से इंटरनेशनल मैचों की कमेंट्री करने वालों की बात की जाती है तो एक अकेला नाम पापू का ही सामने आता है। हालांकि पिछले 03 मई को उनका इंतिक़ाल हो गया, मगर उनके द्वारा किए गए काम को किसी भी कीमत पर भुलाया नहीं जा सकता। 19 मार्च को हुई मुलाकात के दौरान उन्होंने अपने कार्य के बारे में विस्तार से हमें बताया था, उनकी जिन्दादिली और आने वाले लोगों के स्वागत करने अंदाज़ पर फिदा हुए बिना नहीं रहा जा सकता था।

 पापू का जन्म 04 मई 1958 को इलाहाबाद में ही हुआ था। वालिद मरहूम फैयाज़ अहमद खुद का कारोबार करते थे, मां मरहूमा मोबीना बेग़म कामयाब गृहणि थीं। नौ भाई और चार बहन में आप पांचवें नंबर पर थे। शुरूआती पढ़ाई नगर के अटाला स्थित मजीदिया इस्लामिया  कॉलेज से किया था, इसके बाद स्नातक की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया। स्नातकोत्तर में दाखिला लिया था, लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। 1986 में रेलवे में क्लर्क ग्रेड-1 में नौकरी लग गई। बचपन से ही क्रिकेट खेलने का शौक़ रहा, गली-मुहल्लों में खूब खेलते थे। इसी दौरान कमेंट्री करने का शौक़ हुआ, 1970 के दशक में कमेंट्री करने के लिए मनीष देव का नाम काफी लोकप्रिय था, पापू इन्हीं की नकल करने की कोशिश करते थे। स्थानीय स्तर पर होने वाले क्रिकेट मुकाबलों की कमेंट्री करने लगे।


इफ़्तेख़ार अहमद पापू से बात करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी (फाइल फोटो)


 एक बार मजीदिया इस्लामिया इंटर कॉलेज के हो रहे क्रिकेट मुकाबले की कमेंट्री कर रहे थे, वहां आकाशवाणी इलाहाबाद की टीम भी आई थी, टीम के लोगों को पापू की आवाज़ और कमेंट्री करने का अंदाज़ बहुत पसंद आया। फिर मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में हो रहे मैच की कमेंट्री करने के लिए ट्रायल के तौर इन्हें आमंत्रित किया गया, इनकी कमेंट्री को रिकार्ड करके आकाशवाणी की टीम ले गई। फिर इन्हें आकाशवाणी इलाहाबाद की टीम ने अपने पैनल में शामिल कर लिया। 1978 में पहली आकाशवाणी के लिए कमेंट्री किया, तब इन्हें पहली बार पारिश्रमिक के तौर पर 75 रुपये का चेक मिला था। यहीं से सिलसिला शुरू हो गया। फिर इन्हें दिल्ली बुलाया गया, यहां जोनल क्रिकेट मैच की कमेंट्री कराई गई। 1983 में पहली बार भारत-ए और वेस्टइंडीज के मुकाबले की कमेंट्री का अवसर मिला। 1984 में श्रीलंका और भारत-ए के मुकाबले की कमेंट्री किया।  1987 में अहमदाबाद में भारत और वेस्टइंडीज के बीच इंटरनेशनल एक दिवसीय मैच हुआ तो इन्हें कमेंट्री करने का अवसर मिला, यह इनका पहला इंटरनेशनल मैच में कमेंट्री करने का अवसर था। 1987, 1996, 2007, 2011, 2015 और 2019 के वर्ल्ड कप क्रिकेट मुकाबलों में भी आपने कमेंट्री किया था। 1987 में बीबीसी के लिए भी कमेंट्री किया। टेस्ट मैच और वन-डे को मिलाकर लगभग 150 मुकाबलों की कमेंट्री कर चुके थे, कमेंट्री के लिए आपने पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश का भी दौरा किया था। आखिरी बार 13 से 17 फरवरी तक चेन्नई में भारत और इंग्लैंड के बीच हुए टेस्ट मैच की कमेंट्री पापू ने किया था।

 प्रयागराज के मिन्हाजपुर में इनका निवास स्थान है। इनकी एक बेटी और बेटा है, बेटी की शादी हो गयी है। पापू का कहना था कि टीवी प्रसारण के मुकाबले रेडियो पर कमेंट्री सुनते समय लोग टीवी पर देखने के मुकाबले ज्यादा सजग रहते हैं। टीवी पर मैच देख रहे लोगों से स्कोर वगैरह पूछ लिया जाए तो बता नहीं पाएंगे, याद नहीं होगा। लेकिन रेडियो पर कमेंट्री सुनने वाले से पूछ लीजिए तो उसको सब याद रहता है।

   (गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2021 अंक में प्रकाशित )


बुधवार, 22 सितंबर 2021

‘अकबर की शायरी में अपने समय का बेहतरीन चित्रण’

‘अकबर इलाहाबादी के सौ साल बाद’ कार्यक्रम में बोले जस्टिस अशोक कुमार

तीन पुस्तकों का विमोचन, सात लोगों को मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान

न्यायमूर्ति अशोक कुमार 

प्रयागराज। यह वर्ष जहां अकबर इलाहाबादी के निधन का 100वां साल है, वहीं उनके जन्म का भी 175वां वर्ष है। ऐसे मौके पर अकबर इलाहाबादी को याद करना बेहद ज़रूरी था। अकबर ने अपनी शायरी में अपने समय की बेहतरीन चित्रण किया है। उस समय अंग्रेज़ों का देश पर कब्जा था, पूरा देश उनकी जुल्म से परेशान था, ऐसे अकबर ने बिना डरे हुए शायरी की और अंग्रेजों का मुकाबला अपनी शायरी के जरिए किया। यह बात राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने 19 सितंबर 2021 को गुफ़्तगू की ओर से हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित ‘अकबर इलाहाबादी के सौ साल बाद’ कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि कही। उन्होंने कहा कि अकबर इलाहाबादी की शायरी से इलाहाबाद की ख़ास पहचान भी हैं, हमें ऐसे शायर को ठीक से पढ़ना भी चाहिए। कार्यक्रम के दौरान सात लोगों को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ दिया गया। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की संपादित पुस्तक ‘सदी के मशहूर ग़ज़लकार’, विजय लक्ष्मी विभा की पुस्तक ‘हम हैं देश के पहरेदार’ और जया मोहन की पुस्तक ‘रूठा बसंत’ का विमोचन किया गया।



गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि अबकर इलाहाबादी की शायरी की मक़बूलियत इतनी अधिक है कि उनकी शायरी को बडे़-बड़े गायकों ने अपनी आवाज़ दी है, पाकिस्तान से लेकर पूरे एशिया में उनके लिखे नग़में गाए जाते हैं। साहित्यकार रविनंदन सिंह ने कहा कि अकबर की शायरी में अनेक पर्तें हैं, अपने समय के तमाम पात्रों को अकबर ने उल्लेखित किया है। उन पर आरोप लगता है कि वे अंग्रेज़ी के खिलाफ थे, लेकिन हक़ीक़त यह है कि वो अंग्रेज़ी के खिलाफ नहीं थे, बल्कि अंग्रेजियत के खिलाफ थे। अंग्रेजियत की वजह से भारतीय संस्कृति नष्ट हो रही थी, जिस पर अकबर ने शायरी की। 

डॉ. ताहिरा परवीन ने कहा कि अकबर के ज़माने में दो संस्कृतियों में टकराव थी। अंग्रेजियत और हिन्दुस्तानियत के टकराव की वजह से उन्होंने इस विषय पर काफी शायरी है। उनका खिला नज्म ‘गांधीनामा’ बहुत ही मशहूर है, जिसमें उन्होंने उस समय भारत में गांधी जी के काम को शानदार ढंग से रेखांकित किया है। डॉ. मोहम्मद शाहिद ख़ान ने कहा कि अकबर की शायरी हमारे लिए एक नज़ीर है कि वक्त के साथ कैसे शायरी की जाती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. असलम इलाहाबादी ने किया। 

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। नरेश महरानी, प्रभाशंकर शर्मा, अर्चना जायसवाल, इश्क़ सुल्तानपुरी, डॉ. नीलिमा मिश्रा, शिवाजी यादव, विजय प्रताप सिंह, डॉ. राकेश तूफ़ान, नीना मोहन श्रीवास्तव, संजय सक्सेना, अफसर जमाल, शिवपूजन सिंह, संजय सागर, सरिता जायसवाल, डॉ. मधुबाला सिन्हा, सुजाता सिंह, नाज़ खान, हकीम रेशादुल इस्लाम, शैलेंद्र जय, विजय लक्ष्मी विभा, शिबली सना, अर्शी बस्तवी, उस्मान उतरौलवी, साजिद अली सतरंगी, बहर बनारसी, बसंत कुमार शर्मा, सागर होशियारपुरी, अंदाज़ अमरोहवी, रईस सिद्दीक़ी, राज जौनपुरी, अतिया नूर, रजिया सुल्ताना आदि ने कलाम ने पेश किया।


इन्हें मिला ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान

इफ्तेख़ार अहमद पापू (मरणोपरांत), सरदार जोगिंदर सिंह (मरणोपरांत), नीलकांत, राजेंद्र कुमार तिवारी उर्फ दुकान जी, अतुल यदुवंशी, डॉ. सविता दीक्षित, डॉ. सोनिया सिंह 



बुधवार, 15 सितंबर 2021

हिन्दी भाषा के लिए अतुलनीय प्रयास

                                        - अजीत शर्मा ’आकाश’


   

माननीय उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कीर्तिशेष न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी ने अपने न्यायिक कार्यकाल में लगभग 5,000 निर्णय एवं आदेश हिन्दी भाषा में दिये, जो आज एक कीर्तिमान बन गया है। ‘पावन स्मृतियां’ शीर्षक पुस्तक उन्हीं के सुपुत्र माननीय न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने उनके 90 वें जन्म दिवस 30 सितम्बर, 2020 के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत की है। पुस्तक में प्राक्कथन के अंतर्गत लेखक ने न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी के जीवन, शिक्षा एवं न्यायिक क्षेत्र में उनके द्वारा मातृभाषा हिन्दी को प्रतिष्ठित किये जाने एवं गरिमापूर्ण स्थान दिलाये जाने के विषय में सविस्तार प्रकाश डाला है। पुस्तक में बताया गया है कि वकालत से न्यायिक सेवा प्रारम्भ करने वाले उनके पिताश्री ने अपीलीय ट्राइल एवं वादों में अपना पक्ष हिन्दी भाषा में रखा, जिससे वादकारी यह जान सके कि उसके अधिवक्ता द्वारा उसके वाद को ठीक से प्रस्तुत किया गया है। न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी मानते थे कि जनता को न्याय जनभाषा में नहीं मिलता है। आज भी उच्च न्यायालय में अंग्रेजी का बोलबाला है और इस कारण समाज में वर्गभेद स्थापित हो रहा है। अत : वे मातृभाषा हिन्दी में ही बहस की अनुमति लेकर न्यायिक कार्य सम्पन्न करते थे। मातृभाषा हिन्दी के प्रति उनका यह अगाध प्रेम 1992 में उनकी सेवानिवृत्ति और उसके पश्चात् भी जीवन भर बना रहा। वर्ष 1993 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा उन्हें ‘हिन्दी गौरव’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं की अभिवृद्धि के लिए उन्होंने वर्ष 1993 में ‘इटावा हिन्दी सेवा निधि’ संस्था स्थापित की। 

  इस पुस्तक के लेखक विद्वान् न्यायमूर्ति अशोक कुमार को भी हिन्दी के प्रति निष्ठा अपने पिताश्री से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुई। इसी का परिणाम रहा कि उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश का पदभार ग्रहण कर अपना प्रथम निर्णय हिन्दी में लिखवाकर एवं अपने कार्यकाल का अन्तिम आदेश भी हिन्दी में पारित कर अपने पिताश्री को श्रद्धांजलि अर्पित की। मात्र यही नहीं, अपने कार्यकाल में जब भी सम्भव हो सका तब उन्होंने हिन्दी में निर्णय एवं आदेश पारित किये। पुस्तक को दो खंडों में विभक्त किया गया है। प्रथम खंड में लेखक द्वारा अपने कार्यकाल में दिये गये लगभग 32 न्यायिक निर्णय एवं द्वितीय खंड में लगभग 26 न्यायिक आदेशों का संकलन है। न्यायिक कार्यों में हिन्दी का प्रयोग करके अपनी मातृभाषा की सेवा के साथ ही जन-जन तक न्याय पहुंचाने की दिशा में किया गया उनका यह अभिनव प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय एवं स्वागतयोग्य है। पुस्तक के अन्त में कीर्तिशेष न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त जी की स्मृतियां संजोए हुए कुछ छायाचित्र एवं लेखक के न्यायिक कार्यकाल की स्मृतियाँ एवं कुछ पारिवारिक छायाचित्र भी संकलित हैं। पुस्तक का मुद्रण एवं प्रकाशन उच्च कोटि का है। 202 पेज की इस पुस्तक को माडर्न लॉ हाउस प्रा.लि. इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है, 

 

 देशप्रेम का रंग लिए अच्छी बाल-कविताएं


  

अच्छा बाल-साहित्य बच्चों के मानसिक विकास के लिए नितान्त आवश्यक है। यह बच्चों से सीधा संवाद स्थापित करने की विधा है। साधारणतः यह धारणा है कि बच्चों के लिए लिखना सहज कार्य है। लेकिन ऐसा नहीं है। इसके लिए स्वयं को बच्चों के मानसिक स्तर पर लाना होता है, तभी यह सृजन नन्हें बालकों को प्रेरित करता है। वरिष्ठ कवयित्री विजयलक्ष्मी ‘विभा‘ अपनी अन्य विधाओं की अपनी कृतियों के साथ ही बाल साहित्य के सृजन में भी उतनी ही सक्रिय हैं। अपने बालगीत संग्रह ‘हम हैं देश के पहरेदार’ के माध्यम से उन्होंने बच्चों को उनके परिवेश, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, संस्कारों, जीवन मूल्यों, आचार-विचार एवं व्यवहार के प्रति सतत् चेतन बनाने का प्रयास किया है। प्रस्तुत संग्रह में 32 बाल कविताएं संकलित हैं। प्रायः सभी रचनाएं देशभक्ति का स्वर लिए हुए हैं, साथ ही विविध मानवीय मूल्यों से युक्त भी हैं। इनमें रोचकता एवं मनोरंजकता का भी ध्यान रखा गया है, जिससे रचनाएं बोझिल न होने पायें। प्रस्तुत हैं इस बाल गीत संग्रह की कुछ रचनाओं के उल्लेखनीय अंशः- संग्रह की पहली रचना ‘भारत सबसे प्यारा है’ देशप्रेम की अच्छी कविता है एवं बच्चों के मन में देशभक्ति का भाव जाग्रत करने में सक्षम है- नील गगन के तारों में/सबसे उज्ज्वल ध्रुवतारा है/धरती के तारों में अपना/भारत सबसे प्यारा है।’ इस कविता में सम्पूर्ण मानवजाति के कल्याण की कामना की गयी है-‘सुख, शांति और खुशहाली हो/हर मुख पर मुखरित लाली हो।’ इनके अतिरिक्त हरदम हैं तैयार, तसवीर बनायें, मणि मुक्ता सा मन है, चांद सूरज वाला, इंसाफ कर, हम हैं अपने स्वयं प्रणेता आदि कविताएं भी उल्लेखनीय हैं। संग्रह की रचनाएं छन्दबद्ध, गेय एवं बाल-पाठकों को देशभक्ति के रंग में रंगने में सक्षम हैं। यह कविताएं बच्चों में अपनी जन्मभूमि, अपने देश, प्रकृति व पर्यावरण के प्रति रुचि जाग्रत करती हैं। कुल मिलाकर श्रेष्ठ बाल-कविताओं का संग्रह ‘हम हैं देश के पहरेदार’ बच्चों के लिए उपादेय होगा एवं बाल-मन को भायेगा, ऐसी आशा है। बाल-साहित्य के सृजन में कवयित्री का यह योगदान सराहनीय है। इस पुस्तक को गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 50 रुपये है।


 ग़ज़ल लेखन का सराहनीय प्रयास


 

ग़ज़ल आज हिन्दी साहित्य में भी एक लोकप्रिय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। इसका शिल्प एवं इसके व्याकरण की समझ रखने वाले कुछ ग़ज़लकार इस विधा को और ऊंचाइयां प्रदान कर रहे हैं। लेकिन, ध्यातव्य है कि ग़ज़ल का एक विशेष अनुशासन एवं व्याकरण है, जिसका पालन किया जाना गजल-लेखन के लिए अनिवार्य होता है। रामावतार सागर का ग़ज़ल संग्रह ‘निगाहों में बसा सावन’ अपनी कुछ खूबियों के साथ ही कुछ कमियां भी समेटे हुए है। ग़ज़ल संग्रह से चयनित किये गये अशआर इसके साक्षी है। उदाहरणार्थ-आज के नेताओं की सियासत बयान करते हुए ये अश्आर- ‘वोट देकर जिताया था हमने जिसे/वो भी निकला नहीं है खरा आदमी। तुझे बस काम है वोटों से मेरे/तेरा वादा तो हर झूठा रहा है।’ आम आदमी की पीड़ा का चित्रण- ‘होगा गुजारा कैसे ये सोचना हमारा/राशन ख़त्म है सारा और इक माह बिताना। रोटियां फाकाकशों से दूर हैं/ अब ये दिन कैसे गुजारे जाएंगे।’ संग्रह की कई ग़ज़लें बे-बह्र हैं। स्थान-स्थान पर शे‘रों में रवानी की कमी खटकती है। अधिकतर शे‘र शब्दों के गठजोड़ के रूप में सामने आते हैं। ग़ज़लकार ने अच्छी ग़ज़लें कहने की भरसक कोशिश की है। इसके अतिरिक्त ख़्यालों, तर्जुबे, फिकर, रोड़, होंसले, जैसे अशुद्ध शब्दों का प्रयोग ग़ज़ल के सौन्दर्य एवं कथ्य को बाधित करता है। मात्रा पूर्ति के लिए ‘न’ के स्थान पर ‘ना’ का प्रयोग उचित नहीं। फिर भी, ग़ज़ल-लेखन के क्षेत्र में इसे रचनाकार का एक सराहनीय प्रयास कहा जा सकता है। आशा है कि गजलकार का अगला संग्रह ग़ज़ल के शिल्प एवं व्याकरण को दृष्टिगत रखते हुए और बेहतर होगा। 80 पेज की इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 100 रुपये है।


 मनोभावों की सहज अभिव्यक्त करतीं कविताएं



 देश भर की महिला रचनाकारों की सोच, उनके मनोभाव एवं उद्गारों को व्यक्त करता हुआ देश की 11 कवयित्रियां काव्य संकलन का प्रकाशन एक सार्थक एवं सराहनीय प्रयास है। अधिकतर रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों एवं अनर्गल परम्पराओं के विरूद्ध संघर्ष छेड़ते हुए समाज को एक नई दिशा देने का प्रयास किया है।  राजकांता राज की महिला सशक्तीकरण की रचना- ‘मत समझो मैं बेचारी हूं/मैं नारी हूं (’मैं नारी हूं’)। बेटी शक्ति थी बेटी शक्ति है/और बेटी हमेशा शक्ति ही रहेगी (’बेटी’)। ममता बाजपेयी ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से अपने मनोभाव व्यक्त किये हैं -‘चांदनी भी तो एक धोखा है/ये उजाले उधार वाले हैं। ममता कालड़ा की ’अधूरी  आस’ कविता में समाज को जागृत करने का प्रयास किया गया है। प्रीति शर्मा ‘असीम‘ की कविताएं भी प्रभावित करती हैं। डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई की कविताओं में वर्तमान सामाजिक यथार्थ का विशेष रूप से चित्रण है -‘सब रिश्ते बाजार हुए अब/अब रिश्तों में जान कहां है। (’कहां है’) ओढ़े रहो आवरण चाहे जितने/तुम्हारा सच हमें दिखने लगा है।’ डॉ. रेणु अग्रवाल की कविताएं पाठकों को आशान्वित करती हैं। करूणा झा की ’जवानी’ कविता में आज के राजनीतिक यथार्थ का चित्रण हैः-‘उठाओ, मारो, काटो, खत्म कर दो/ये कैसी हुक्मरानी आ गई है।’ कुल मिलाकर महिला रचनाकारों की काव्य-यात्रा में सहभागिता की ओर ध्यानाकर्षण करता है ‘देश की 11 कवयित्रियां‘ काव्य संकलन। 200 पेज के इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 300 रुपये है।

रचनाधर्मिता को रेखांकित करने का प्रयास


 

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के संपादन में प्रकाशित हुई पुस्तक ‘उत्तर प्रदेश की सात कवयित्रियां’  की कवयित्रियां अपने मनोभावों को व्यक्त करने में काफी हद तक सफल रही हैं। अतिया नूर का काव्य सृजन उनकी रचनाधर्मिता एवं उनकी सृजनात्मकता को उजागर करता है। कई रचनाएं अच्छी बन पड़ी हैं। शिल्प विधान की दृष्टि से भी कविताएं आकर्षित करती हैं। ‘उर्दू की कहानी’ कविता के माध्यम से संक्षेप में उर्दू भाषा का पूरा इतिहास बता दिया है। ‘तख़्त पे कातिल बिठाया जाएगा’ कविता में तुच्छ राजनीति पर प्रहार करने का प्रयास किया गया है। डॉ. मंजरी पांडेय की कविताएं सार्थक सृजन की पहचान हैं, समाज को सन्देश देती हैं। ‘सरसों खेत में फूल रही है’ कविता प्रकृति प्रेम को दर्शाती है। डॉ. नीलम रावत की ग़ज़लें कथ्यात्मक दृष्टि से अच्छी हैं, लेकिन शिल्प की दृष्टि से कहीं-कहीं कुछ कमियां हैं। कुछ उल्लेखनीय अश्आर-‘रेत पर घर फिर बनाना है तुझे/पीर में भी मुस्कुराना है तुझे।’ डॉ. नसीमा निशा की ग़ज़लें राजनीति, सामाजिक सरोकार एवं स्त्री विमर्श की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं एवं अच्छी बन पड़ी हैं। शिल्प विधान की ओर अधिक ध्यान दिया जाता, तो और अच्छा होतां। ममता देवी की काव्य रचनाएं यथार्थ के धरातल पर हैं एवं कवयित्री के मनोभावों को स्पष्ट रूप से प्रकट करती हैं। शबीहा खातून की रचनाओं का शिल्प पक्ष अपेक्षाकृत ठीक है। इनकी ‘उल्फत भरे लमहात’, ‘चूड़ियों की सदा’ उल्लेखनीय हैं। शगुफ़्ता रहमान की रचनाएं भी मनोभावों और उद्वेगों की अभिव्यक्ति करने में सफल हैं। ‘मेरा भी वतन तेरा भी वतन’ देशप्रेम, भाईचारे और आपसी सद्भाव की कविता है। कुल मिलाकर काव्य-संकलन महिला रचनाकारों की रचनाधर्मिता एवं उनकी सृजनात्मकता को उजागर करता है। 128 पेज के इस संकलन को गुफ्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 200 रुपये है।


  विसंगतियों को रेखांकित करती कहानियां 



 जया मोहन के कहानी-संग्रह ‘परसी थाली’ में सामाजिक विषयों को लेकर लिखी गयी  कहानियां संकलित हैं। जिनके माध्यम से समाज को रचनाधर्मी सन्देश दिए गए है। कहानियों की विषयवस्तु में सामाजिक कुरीतियों, गिरते हुए मानव मूल्यों एवं बिगड़ते हुए वर्तमान परिवेश पर प्रहार किया गया है। संग्रह की कहानियां मार्मिक, हृदयग्राही, प्रभावशाली एवं विविध मनोभाव लिए हुए हैं, जिनमें मानवीय संवेदनाओं एवं भावनाओं को सफलतापूर्वक उकेरने का प्रयास किया गया है। संग्रह की प्रथम कहानी ‘हॉर्न’ एक विधवा स्त्री की मानसिक पीड़ा को व्यक्त करती है, जो न चाहते हुए भी परिस्थिति जन्य कारणों से पतन के दलदल में फंस जाती है। उसकी पीड़ा वास्तविक रूप से समाज की पीड़ा ही है। ‘ऐ री मैं तो’ एक प्रेमकथा है, जिसमें सामाजिक रूढ़ियां एवं जाति-पाँति आड़े आती है। बाद में विधवा होने पर ऊंच-नीच का भेदभाव दूर कर प्रेमी और प्रेमिका विवाह करा दिया जाता है। ‘जाति-पाँति नहीं, मानवता महत्व रखती है’, इस कहानी का मूल सन्देश है। ‘बाजूबंद’ आभूषण-मोह के कारण माँ और बेटियों के रिश्तों के बीच आयी खटास की कहानी है। इस कारण माँ विक्षिप्त हो जाती है और प्यार के रिश्तों में दरार पैदा हो जाती है। इस कहानी में भी जाति-पाँति प्रथा के खण्डन की बात की गयी है। ,

‘गुनाहगार कौन’ शक में बिखर जाने वाले एक परिवार की कहानी है। पति का अत्याचार सहन करती हुई प्रताड़ित नारी का चित्रण इसमें किया गया है। संस्कारों की जीवित रखने की बात भी कही गयी है। इसी तरह अन्य कहानियों के परिदृश्य हैं, जो पाठक को अपनी ओर खींचती हैं। प्रूफ एवं मुद्रण-त्रुटियों के कारण व्याकरण एवं वर्तनी सम्बन्धी अनेक अशुद्धियाँ पुस्तक में यत्र-तत्र दृष्टिगत होती हैं। अनुस्वार सम्बन्धी अशुद्धियों की भरमार है। इसके अतिरिक्त ध-घ, भ-म, व-ब की भी अशुद्धिया हैं। कहानियों के संवादों में उद्धरण-चिह्न (“ “) प्रयुक्त न किये जाने के कारण कथावस्तु एवं संवाद एक दूसरे में मिल गये हैं, जिससे पाठक को बोधगम्यता में असुविधा होती है। कहानियों की भाषा सहज एवं सरल है, किन्तु जायजाद, ववंडर, आवाक, अभीभूत, अक्ष्मय, गर्भजोशी, अवरूध, पंड़ित जैसे अशुद्ध शब्दों का प्रयोग संग्रह की स्तरीयता को कम करता है। इन सबके बावजूद नारी विमर्श एवं अन्य सामाजिक विषयों को उठाने के लिए लेखिका साधुवाद की पात्र हैं। रवीना प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 114 पृष्ठ के इस कहानी-संग्रह का मूल्य 250 रुपये है।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2021 अंक में प्रकाशित )


सोमवार, 6 सितंबर 2021

‘बतख मियां के ज़रिए खुला इतिहास का सुनहरा पन्ना’

 विमोचन समारोह और मुशायरा में बोले यश मालवीय 



 ‘बतख मिया अंसारी की अनोखी कहानी’ का हुआ विमोचन 

प्रयागराज। छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी मोहम्मद वज़ीर अंसारी ने ‘बतख मियां असंारी की अनोखी कहानी’ प्रकाशित करके इतिहास का एक सुनहरा पन्ना खोल दिया है। जिस बतख मियां अंसारी की वजह से चम्पारण में गांधी जी जान बची थी, आज उसे इतिहास पन्नों से गायब कर दिया गया है, यह हमारे लिए बहुत ही दुख की बात है। लेकिन मोहम्मद वजीर अंसारी ने इस पुस्तक का संपादन करके दुनिया के सामने उनकी सच्चाई को लाने का बेहद सराहनीय प्रयास किया है। हम जब बतख मियां की कहानी पढ़ते हैं तो हमारा सीना गर्व से चैड़ा हो जाता है। यह बात मशहूर साहित्यकार यश मालवीय ने 05 september साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ की ओर से करैली स्थित इक़बाल एकेडेमी हाॅल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कही। यश मालवीय ने कहा कि गांधी जी की जान बचाने के एवज में बतख मियां को अंग्रेेज़ों की यातना का सामना करना पड़ा था, उनकी ज़मीन छीन ली गई थीं, उन्हें जेल में डाल दिया गया था।

गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि अगर बतख मियां ने गांधी जी की जान नहीं बचाई होती तो भारत का इतिहास ही बदल गया होता, न जाने कब हमें अंग्रेंजों से आजादी मिली होती। साहित्यकार रविनंदन सिंह ने कहा कि इस किताब का प्रकाशन एम.डब्ल्यू. अंसारी ही करा सकते थे, क्योंकि जेल से लेकर थाने तक से कागज़ात निकलवाना और उसे किताब में सुबूत के तौर पर शामिल करना किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है, यह कोई आईपीएस अधिकारी ही कर सकता है। एम.डब्ल्यू. अंसारी ने यह काम करके एक उदाहरण पेश किया है। देश को आजाद कराने में जिन लोगों का हाथ है, उनमें एक मुख्य किरदार बतख मियां असंारी का भी हैं। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि चम्पारण में अंग्रेज़ों ने गांधी जी और डाॅ. राजेंद्र प्रसाद को दावत पर आमंत्रित किया था, बतख मियां अंसारी को खाना परोसना था। अंग्रेजों का आदेश था कि गांधी जी खाने के बाद दूध पीते हैं, दूध में जहर मिलाकर देना है, बतख मियां को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लेकिन बतख मियां असंारी ने अदम्य साहस का परिचय दिया, धीरे से डाॅ. राजेंद्र प्रसाद को बता दिया कि गांधी के दूध में ज़हर मिलाया गया है। जिसकी वजह से गांधी ने वह दूध नहीं पिया, वही दूध एक बिल्ली को दे दी गई, जिसे पीने के बाद तुरंत ही उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद बतख मियां को बहुत प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी। उनके इस साहस भरे कार्य को भूला दिया गया है, इस पर काम करने की आवश्यकता है। उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य क्लेम्स आफिसर शैलेंद्र कपिल ने कहा कि बतख मियां के काम को कभी भुलाया नहीं जा सकता, इनके बारे में लोगों बताने की आवश्यकता है।

पूर्व अपर महाधिवक्ता क़मरुल हसन सिंद्दीक़ी ने कहा कि बतख मियां अंसारी को किस तरह वजीर अंसारी ने खोज निकाला और सारी जानकारी एकत्र करके किताब का शक्ल दिया है, यह बहुत बड़ा काम है। अब हमारी जिम्मेदारी है कि इस काम को आगे बढ़ाया जाए। इससे पहले एम.डब्ल्यू. अंसारी ने कहा कि जब बतख मियां अंसारी के बारे पता चला तो मैं बहुत हैरान था, कि इतना बड़ा काम करने वाले को भुला दिया गया है, इस पर काम होना चाहिए। इसी सोच के तहत जगह-जगह से सामग्री एकत्र करके किताब प्रकाशित किया है। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया।

दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। नरेश महरानी, शैलेंद्र जय, शिवाजी यादव, हकीम रेशादुल इस्लाम, अफसर जमाल, शिबली सना, शिवपूजन सिंह, प्रभाशंकर शर्मा,  अजय मालवीय, तलब जौनपुरी, डाॅ. वीरेंद्र तिवारी, श्रीराम तिवारी सहज, विजय लक्ष्मी विभा, अजीत शर्मा आकाश, फ़रमूद इलाहाबादी, असद ग़ाज़ीपुरी, बख़्तियार युसूफ, शाहिद इलाहाबादी आदि ने कलाम पेश किया। अंत में संयोजक क़मरुल हसन सिद्दीक़ी ने सबके प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

शनिवार, 28 अगस्त 2021

टी-सीरीज के चहेते गीतकार थे अंजुम ग़ाज़ीपुरी

                                   

अंजुम ग़ाज़ीपुरी

          

                                                                   - मोहम्मद शहाबुद्दीन ख़ान   


 गुलशन कुमार ने 11 जुलाई 1983 को टी-सीरीज कंपनी की स्थापना की। तब आॅडियो कैसेट खूब बिकते थे, लोग टेपरिर्काडर सुनते थे। रेडिया के बाद यही मनोरंजन के मुख्य साधनों में से एक हुआ करता था। गुलशन कुमार की यह कंपनी चल पड़ी, इसके कैसेट्स खूब बिकते थे। इसी दौरान अंजुम ग़ाज़ीपुरी ने गुलशन कुमार के टी-सीरीज कंपनी के लिए गाने लिखना शुरू किया, इनके गीतों ने तहलका सा मचा दिया। पूरे हिन्दुस्तान में अंजुम ग़ाज़ीपुरी के गीत बजने लगे। अपनी मेहनत और क़ाबलियत से उन्होंने यह मकाम बना लिया था। अंजुम ग़ाज़ीपरुी का असली नाम रियासत हुसैन था, इनकी पैदाईश एक जनवरी 1945 को ग़ाज़ीपुर जिले के बहुअरा गांव के पूरब मोहल्ला स्थित हनीफ हुसैन के घर हुआ था। हनीफ हुसैन कोलकाता के एक जूट कंपनी में काम करते थे। अंजुम की मां सकीना खातून जो नेक दिल घरेलू खातून थी। अंजुम एक बहन और तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई जलील अहमद कमसारोबार इलाके में मशहूर कव्वालों में जाने जाते थे। अंजुम को गाने-बजाने व शायरी करने के साथ पढ़ने का शौक अपने बड़े भाई से मिली थी। वे गाने के साथ बिंजु से सुरीली धुन देते थे। उनकी इब्तेदाई तालीम गांव के प्राइमरी मदरसे से हुई। उसके बाद वो अपने वालिद के साथ कोलकाता पढ़ने चले गये। वहां से उन्होंने इंटरमीडिएट करने के बाद अदीब कामिल और फ़ाज़िल की डिग्री हासिल की। पढ़ाई के बाद माता-पिता ने उनकी शादी अपने पैतृक गांव बहुअरा में ही डिप्टी कादीर हुसैन की बेटी शमीम बानो से कर दी। शादी के कुछ दिनों बाद माता-पिता का निधन हो गया। 

 शादी के बाद उन्होने घर का खर्च चलाने के लिए कई छोटी-छोटी नौकरियां कीं। फिर भाई जलील कव्वाल के वफ़ात के बाद गाजीपुर के कव्वाल टीम में शामिल होकर अपने साथियों को इकट्ठा करके कव्वाली गाने की काम शुरू कर दिया, लेकिन उन दिन कव्वाली से कोई ख़ास आमदनी नहीं होती थी। सन 2006 में वाराणसी के एक मुशायरे में उनकी मुलाकात टी-सीरीज कंपनी के चीफ दीप मोहम्मदाबादी से हुई। दीप मोहम्मदाबादी उन्हें दिल्ली बुलाकर उन्हें टी-सीरीज के कैसेेट्स के लिए गीत लिखने का मौका दिया। अंजुम के लिखे गीत, कव्वाली, नात वगैरह जब रिकार्ड होकर मार्केट में आए तो तहलका सा मच गया। अंजुम ने टी-सीरीज के लिए सैकड़ों नज़्म, भोजपुरी गीत, भक्ति व देश भक्ति लोक गीत, मर्शिया, नात व ग़ज़लें लिखी। इनके लिखे नग़मों को तस्लीम आरीफ, टीना परवीन, बरखा रानी, तृप्ति सकयां व रुखसाना बानो, मनोज तिवार वगैरह ने आवाज दी। इन्होंने ‘माहे रमजान’, ‘तैबा चला कारवां’, ‘ख़्वाज़ा का दर नूरानी’ ‘आजा गोरी’, ‘पूर्णागिरी’, ‘राजू हिंदुस्तानी’, बेवफ़ा तेरा मासूम चेहरा, ‘शाम वाली गाड़ी’, ‘भोलेनाथ बनके विश्वनाथ बनके’, ‘चल दीवाने देवा चल’, ‘ऐ मेरी गुलनार चमेली’, ‘गांव के छोरी’, ‘शाम वाली गाड़ी’, ‘टाइम बम है तेरी जवानी’, ‘गांव के छोरी’, ’समधी सीटी मारे;, ‘चढ़ती जवानी होली खेले’ और ‘बगलवाली’ आदि कैसेट्स के लिए गीत लिखे हैं। इनके कुछ मशहूर गीतों में- ‘तूं हसीं मैं जवां गुलबदन रेशमा’, ‘तू तो है बेवफा लूट करके मजा’, ‘पास आके जब दिल की दूरियां मिटाओगी’, ‘हम से दूर परदेसी तुम भी रह न पाओगे’, ‘तुम तो ठहर परदेशी’, ‘गाल गुलाबी नैन शराबी तेरे’, ‘बेगम लखनऊ वाली’, ‘नज़रे करम साबिर’, ‘साबिर के दर पर चलिए’, ‘राम व श्याम’, ‘जोता वाली तेरा जवाब नहीं’ वगैरह हैं।

 उनके जीवन का आखिरी दौर बहुत मुफलिसी में गांव में ही गुजरी। 19 जनवरी 2021 को उनका इंतिकाल हो गया। अंजुम गाजीपुरी के दो बेटे और तीन बेटियां हैं। बड़े बेटे का नाम शकील अंजुम व छोटे का परवेज अंजुम और बेटियों के नाम इशरत जहां, नुसरत जहां, मुसर्रत जहां हैं।

(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2021 अंक में प्रकाशित )

 


गुरुवार, 5 अगस्त 2021

साहिर की शायरी में है जनता की आवाज़: फ़ातमी

गुफ़्तगू की तरफ से साहिर लुधियानवी जन्म शताब्दी समारोह 
देशभर के 21 ग़ज़लकारों को मिला ‘साहिर लुधियानवी सम्मान’

पुलिस महानिरीक्षक कवींद्र प्रताप सिंह



‘देश के 21 ग़ज़लकार’ का विमोचन


प्रयागराज। साहिर लुधियानवी की शायरी में जनता की आवाज़ स्पष्ट रूप से जगह-जगह दिखाई और सुनाई देती है, उन्होंने अपनी शायरी के कथन को लेकर कभी समझौता नहीं किया। वे फिल्मों के लिए गीत अपनी शर्तों पर ही लिखते थे। यह बात मशहूर उर्दू आलोचक प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने 04 अगस्त को गुफ़्तगू की ओर से निराला सभागार में आयोजित ‘साहिर लुधियानवी जन्म शताब्दी समारोह’ के दौरान कही। प्रो. फ़ातमी ने कहा कि साहिर सिर्फ़ एक फिल्मी गीतकार ही नहीं थे, उन्होंने कई सामाजिक कार्य किए, कई पत्रिकाओं का कामयाब संपादन भी किया, उनकी संपादकीय में बहुत तल्ख सच्चाई होती थी, जिसकी वजह से उनके उपर कई बार मुकदमे भी कायम हुए थे। उन्होंने फिल्मों में साहित्य को स्थापित करने का भी काम किया। कार्यक्रम के दौरान इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की ओर संपादित पुस्तक ‘देश के 21 ग़ज़लकार’, अलका श्रीवास्तव की पुस्तक ‘किसने इतने रंग’, जया मोहन की पुस्तक ‘बिरजू की बंसी’ और गुुफ़्तगू के नए अंक का विमोचन किया गया।



साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करते रामावतार सागर



साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करते डाॅ. क़मर आब्दी



साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करते डाॅ. राकेश तूफ़ान



साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करते तामेश्वर शुक्ला तारक



साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करते अनिल मानव


साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करते डाॅ. इम्तियाज़ समर

 

साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करते रईस अहमद सिद्दीक़ी
मुख्य अतिथि पुलिस महानिरीक्षक कवींद्र प्रताप सिंह ने कहा कि मैं साहिर के बारे में बहुत अधिक तो नहीं जानता लेकिन उनके लिखे फिल्मी गीत बचपन से ही सुनते आए हैं। उनकी याद में गुफ़्तगू की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में आकर  कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलीं। साहिर के बारे में वक्ताओं की बातें सुनकर बहुत अच्छा लगा। गुफ़्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि साहिर लुधियानवी अपने दौर के बहुत ही महत्वपूर्ण शायर थे, उनके 100वें जन्मदिन पर उन्हें याद करना बेहद ज़रूरी था, उनका इलाहाबाद सेे भी तअल्लुकात थे, उनकी रिश्तेदारियां यहां थीं, जिसकी वजह से वो यहां कई बाए आए थे।

साहित्यकार रविनंदन सिंह ने कहा कि 1950 से 1970 के दौर में मज़रूह, कैफ़ी समेत कई बड़े शायर थे, उसी समय साहिर का शायरी की दुनिया में उदय हुआ था। 23 वर्ष की उम्र में उनका पहला काव्य संग्रह ‘तल्खियां’ प्रकाशित हुई थी, पहला संग्रह छपकर आते ही वो देश के बड़े शायर के रूप में उभरक सामने आ गए। पहले फिल्मों के पोस्टर पर गीतकार का नाम प्रकाशित नहीं होता था, लेकिन साहिर ने ही निर्माताओं से लड़ाई लड़कर इसकी शुरूआत कराई। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा ने किया। दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया। नीना मोहन श्रीवास्तव, नेरश महरानी, शिवपूजन सिंह, सरिता श्रीवास्तव, संजय सक्सेना, शिवाजी यादव, अफसर जमाल, शिबली सना, सम्पदा मिश्रा, जया मोहन, मधुबाला, अजीत इलाहाबादी, श्रीराम तिवारी, अतिया नूर आदि ने कलाम पेश किए।


इन्हें मिला साहिर लुधियानवी सम्मान -




नागरानी(अमेरिका), विजय लक्ष्मी विभा (प्रयागराज), अर्श अमृतसरी (दिल्ली), रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे (नागपुर), फ़रमूद इलाहाबादी (प्रयागराज), ओम प्रकाश यती(नोएडा), इक़बाल आज़र(देहरादून), मणि बेन द्विवेदी (वाराणसी), उस्मान उतरौली(बलरामपुर), रईस अहमद सिद्दीक़ी (बहराइच), डाॅ. इम्तियाज़ समर (कुशीनगर), रामचंद्र राजा (बस्ती), डाॅ. रामावतार मेघवाल (कोटा), डाॅ. क़मर आब्दी (प्रयागराज), विजय प्रताप सिंह (मैनपुरी), डाॅ. राकेश तूफ़ान (वाराणसी), डाॅ. शैलेष गुप्त वीर (फतेहपुर), तामेश्वर शुक्ला तारक (सतना), डाॅ. सादिक़ देवबंदी (सहारनपुर), अनिल मानव (कौशांबी) और ए. आर. साहिल (अलीगढ़)  






साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करतीं मणि बेन द्विवेदी


साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त फ़रमूद इलाहाबादी

साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करते रामकृष्ण विनायक सहस्रबुद्धे

साहिर लुधियानवी सम्मान प्राप्त करतीं विजय लक्ष्मी विभा

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

‘उस नदी के घाट पर ही काफिला रह जाएगा’

लखनऊ के बीएसए विजय प्रताप के सम्मान में काव्य गोष्ठी



प्रयागराज। साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ की तरफ से 26 जुलाई को हरवारा, धूमनगंज में लखनऊ के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विजय प्रताप सिंह के सम्मान में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि शैलेंद्र कपिल ने किया, मुख्य अतिथि बीएसए विजय प्रताप सिंह थे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। सबसे पहले फरमूद इलाहाबादी ने हास्य-व्यंग्य की शायरी पेश की-‘यार बीबी को खंडर जब कह दिया तो कह दिया/ बरतरफ ख़ौफोखतर जब कह दिया तो कह दिया।’

प्रभाशंकर शर्मा की इन पंक्तियों को खूब सराहा गया-‘मेरे अल्फाज अदब जो भी हैं, दिल से कहता हूं मेरी मां जाने /उससे अपना जो भी रिश्ता है, दर्द कम होगा, बस दुआ जाने।’ शिबली सना ने कहा-‘याद आ रहा है वह जिसे भूला बैठे / आज दिल पे फिर गम के बादल का मौसम है।’ डाॅ. नीलिमा मिश्रा की गजल खूब सराही गईं-‘उल्फत है बेमआनी बिना ऐतबार के / भूले हैं सारे वादे वो अपने करार के।’

इम्तियाज अहमद गाजी के के अशआर यूं थे-‘कुछ सलीका सिखा गईं गजलें / फर्ज अपना निभा गईं गजलें। इश्को-माशूक तक नहीं कायम/ पूरे गुलशन में छा गईं गजलें।’ मुख्य अतिथि विजय प्रताप सिंह ने अलग अंदाज की शायरी पेश की, कहा-‘ बस नदी के पार तक ही लोग लेकर आएंगे / उस नदी के घाट पर ही काफिला रह जाएगा।’ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि शैलेंद्र कपिल की कविता यूं थी-‘कोई सुबह अजनबी नहीं होती / कोई मुलाकात अजनबी नहीं होती/ संयोग कर्मों के अनुसार उपस्थित होते, प्रयोगों, प्रयासों से जिन्दगी बनती/ छनती और संवरती।’ अंत में अफसर जमाल ने सबके प्रति धन्यावद ज्ञापित किया।

रविवार, 11 जुलाई 2021

उर्दू के सही उच्चारण के बिना फिल्मों में नहीं मिलता काम : अजमेरी


23 जनवरी 1961 को राजस्थान के अजमेर में जन्मे आफ़ताब अजमेरी फिल्म इंडस्ट्री में मुख्यत कलाकारों को उर्दू का सही उच्चारण करना सीखाते हैं। इंडस्ट्री के लगभग सभी बड़े स्टार को इन्होंने यह गुण सिखाया है और आज भी सिखा रहे हैं। आपने स्नातक की पढ़ाई अजमेर से पूरी करने के बाद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से अदीब, माहिर, कामिल की डिग्री हासिल की। शायरी का शौक़ बचपन से ही रहा है। पहले मां और फिर बाद में पत्नी ने इनके काम में काफी सहयोग किया। कलाकारों को उच्चारण सिखाने के साथ इन्होंने कई फिल्मों के लिए डायलाॅग और गीत भी लिखे हैं, तमाम फिल्मों और टीवी सीरियलो में अभिनय भी किया है। उर्दू शायरी के लिए उन्होंने अपने उस्ताद से अरुज़ आदि भी सीखा है। मुशायरों में भी जाते रहे हैं। अनिल मानव ने इनसे विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है उसका प्रमुख अंश।


                                 दिलीप कुमार के साथ आफ़ताब अजमेरी (फाइल फोटो)



सवाल: फिल्मी अदाकारों को उर्दू का उच्चारण सिखाने के लिए क्या करना पड़ता है, इसमें किस प्रकार की दिक्कतें आती हैं ?

जवाब: आपने बिल्कुल सही फरमाया। मैं बतौरे-ख़ास फिल्म स्टारों को उर्दू की तालीम देता हूं। जो अपने तलफ़्फुज, उच्चारण या प्रोनॉन्सिएशन सही करना चाहते हैं, उन्हें सीखताा हूं। मगर जिनको मैंने पढ़ाया उनका नाम मैं नहीं लेना चाहता, क्योंकि कुछ लोग कहते हैं जैसे- ऋषि कपूर, रितिक रोशन...। इनको थोड़ा सा एतराज है, कि साहब! आप हमारे नाम का सहारा लेकर अपने आप को पॉपुलर कर रहे हैं। जी-न्यूज में भी मैंने एक इंटरव्यू दिया था। उसमें सब स्टारों के नाम ले लिए थे। तो उनको नाराजगी हुई थी। कहा साहब! आप हमें पढ़ाते हो। उसके पैसे लिए थे। बहरहाल मैं यह अर्ज करना चाह रहा था कि पढ़ाने के लिए  जो स्टार हैं उनका तलफ्फुज़ दुरुस्त कराने होते हैं। उर्दू लिखना और पढ़ना नहीं सीखना होता। क्योंकि वह बोलते ग़लत हैं ‘सीन’ की जगह ‘शीन’ बोलते हैं। उनको यह मालूम नहीं होता, कि सीन, नून, ग़ैन ये कहां बोले जाते हैं। जबकि यह हुनर मैं जानता हूं। बहुत सारे लोग लिखते-पढ़ते भी हैं। और वो लिखना-पढ़ना भी सीखना चाहते हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि खाली हमारा तलफ़्फुज दुरुस्त करा दो, ताकि जब हम डायलॉग बोले, तो उसमें तलफ़्फुज की ग़लतियां न हो। इसके लिए मेरा नाम स्क्रीन पर भी आता है। जिन फिल्मों और सीरियलों के अंदर मुझे डायलॉग डायरेक्टर की हैसियत से बुलाया जाता है, वहां पर मैं अपना नाम देता हूं। हर सेट पर एक डायलॉग डायरेक्टर तो होता ही है। इससे अच्छा असर पड़ता है। ग़लतियां दुरुस्त हो जाती हैं। फिल्म अच्छी होती है। ऐसा लोगों का मानना है। इस काम के अंदर बहुत-सी दुश्वारियां आती हैं, क्योंकि जो भी शख़्स हो, वह जिस जगह का होता है। वहीं की भाषा बोलता है। पंजाब का एक बंदा मेरे पास आया। उसने कहा हम भी पढ़ेंगे।  उनका जो टोन और लबो-लहजा था। वह पंजाबी था। वह जब भी बोलते तो पंजाबी अंदाज़ में ही बोलते थे। जो नजाकत और नफ़ासत उर्दू में है, वह उनकी जुबान में नहीं आ रही थी। वह उनके लबो-लहजे में नहीं आ रहे थे। उर्दू तो माशाअल्लाह एक ऐसी मीठी और प्यारी जुबान है। किसी ने क्या खूब कहा कि--वो जो बोले तो हर एक लफ्ज से खुशबू आये/ ऐसी बोली वही बोले जिसे उर्दू आये।’ 

 आजकल मैं एक बंगाली लड़के को पढ़ा रहा हूं। वह बंगाल के फिल्मों का हीरो है। यहां वह मुम्बई में आया हुआ है। इसमें इतनी तकलीफ होती है, कि उसे तलफ़्फुज दुरुस्त आ ही नहीं रहा। लेकिन यहां की फिल्मों में काम करने के लिए उसे सही तलफ़्फुज वाली हिंदी-उर्दू बोलनी है। अभी-अभी आपने एक सवाल किया, कि मैं जो उर्दू पढ़ाता हूं। उसका सर्टिफिकेट उर्दू में क्यों नहीं आता। हां, यह एक बड़ी अजीब बात है। हमारी बहुत सारी फिल्में जैसे ‘लैला-मजनू’ और बहुत सारे सीरियल जैसे ‘इश्क सुबहान अल्लाह’ चल रहा है। इसके अलावा ‘कुबूल है’ सीरियल जिसके अंदर मैंने 3 साल तक काजी मौलवी का रोल किया है।  उसकी हीरोइन चेंज हो गई। हीरो आर्टिस्ट लोग आते रह जाते रहे। लेकिन गुलबानो जो इसकी प्रोड्यूसर है। उन्होंने कहा नहीं साहब आफ़ताब आजमेरी ही हमारे फिल्म का काजी रहेगा। और आखिर में तीन साल बाद ताजमहल में जाकर उसका आखिरी एपिसोड हुआ। मुंबई में उसके अंदर मैंने उसी हीरो-हीरोइन को निकाह पढ़ाया और फिल्म खत्म हुई। इसी तरह ‘जोधा-अकबर’ एक सीरियल है। उसके अंदर मैंने दो साल तक जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का सलाहकार के रूप में काम किया। और बहुत सारी सीरियल हैं जिसमें उर्दू की ज़रूरत पड़ती है। आप मुझे गूगल पर सर्च करेंगे तो उसके साथ काजी आफताब आजमेरी लिखा हुआ आएगा। हालांकि मैं काजी नहीं हूं। मैं तो शेख हूं। लेकिन क्या है, फिल्मों में काम कर-कर के ‘काजी’ वाला काम करते-करते मुझे गूगल वालों ने भी काजी आफ़ताब आजमेरी कर दिया। वैसे मैं रोल हर तरह का करता हूं। क्योंकि हम एक्टरों की जिं़दगी ऐसी ही है-‘रोज नए सांचे में ढलती रहती है/ज़िंदगी क्या-क्या रंग बदलती रहती है। मैं भी एक उम्मीद लगाए फिरता हूं/सुनता हूं तक़दीर बदलती रहती है।’ और यक़ीनन मेरी जिं़दगी बदल रही है अल्लाह का बड़ा एहसान है।


                                      सलमान खान के साथ आफ़ताब अजमेरी                             

सवाल: आपने यह काम कब से शुरू किया ? इसकी शुरूआत कैसे हुई ?

जवाब: फिल्म इंडस्ट्री में मैं आया नहीं, बल्कि लाया गया हूं। मैं अजमेर के मोनिया इस्लामिया हाई सेकेंडरी स्कूल के अंदर जे़रे-तालीम था, तो एक फिल्मी यूनिट आकर के ठहरा।  जिसके अंदर हाजी मस्तान साहब ने सोना को और सतीश कौल को लेकर एक फिल्म बनाई थी। उसका नाम था ‘सुल्तान-उल-हिंद’। उसकी शूटिंग होने के लिए आई तो सब लोग बड़े खुश थे। मैंने देख, कि मधुबाला की एक हमशक़्ल औरत बाद में उसका नाम पता चला कि वह मधुबाला नहीं थी, बल्कि सोना थी। और वही उस फिल्म की हीरोइन थी। एक शख़्स से हमने कहा कि हमें भी इस फिल्म में काम मिल जाए तो इसके लिए किस से बात करें। उन्होंने कहा कि वह सामने बैठे हैं लूंगी और कुर्ता पहने हुए वे हाजी मस्तान हैं। उनके पास जाकर कहो, वो काम दे सकते हैं। मैंने जाकर उन्हें सलाम किया और कहा कि सर मुझे भी आपकी फिल्म इंडस्ट्री में काम मिल जाए तो अच्छा होगा। उन्होंने चश्मा उतारते हुए कहा कि क्या काम जानते हो ? क्या करते हो ? मैंने कहा, कि मैं शायर हूं। मैं कुछ भी काम कर लूंगा। उन्होंने कहा शायर हो तो सरकार गरीब नवाज के लिए लिख रहे हैं हम। सरकार पर मनक़बत लिखो, कव्वाली लिखो, तो हम तुम्हें काम दे देंगे। तो मैंने कहा शुक्रिया। बस इतनी-सी बात की और सलाम करके चला आया। फिर उसके बाद मैं नसीम अजमेरी साहब से मिला और उनको मैंने बताया कि भाई इस-इस तरह से चाहिए। वह उस्ताद थे। बेहतरीन शायर थे। उनके साथ फिर हम लग गए। और हमने एक कव्वाली लिखी-‘आफताब-ए-रिसालत मदीने में है/ और किरण जगमगाती है अजमेर में।’ जो मशहूर कव्वाली हुई। पाकिस्तान के मशहूर कव्वाल ने गायी। साबरी ब्रदर्स, जिन्होंने पहले सरकार गरीब नवाज में यह कव्वाली गायी। फिर उसके बाद स्टूडियो के अंदर उसकी रिकॉर्डिंग हुई। और उसी यूनिट के साथ मैं यहां मुंबई आ गया। वह फिल्म जब तक बनती रही। तब तक मैं उनके ऑफिस के अंदर जो तारदेव में तीन महले पर था। हाजी मस्तान का ऑफिस, जिसमें मैं रहता रहा। खाना-पीना मुझे मिलता था। उनकी फिल्मी यूनिट के साथ शूटिंग के लिए चला जाता था। और उसके अंदर कई जगह मेरे छोटे-छोटे कुछ सीन भी हैं।  जहां ज़रूरत पड़ी, वहां मुझे उन्होंने इस्तेमाल किया। जब वह फिल्म कंप्लीट हो गई, तो उन्होंने मुझसे कहा भाई हमारी फिल्म हो गई और अच्छी चली। अब आप वापस अपने घर अजमेर जा सकते हैं। अब मैं क्या जाता ? किसको क्या मुंह दिखाता ? लिहाजा फिर मैं वहीं कोशिश करता रहा। आज मैं यहां फिल्मों में सिंटा का मेंबर हूं। जूनियर आर्टिस्ट का मेंबर हूं। चीफ सेना का मेंबर हूं। और आल इंडिया फिल्म राइटर एसोसिएशन का मेंबर हूं। मैंने राइटर एसोसिएशन में कई कहानियां भी लिखीं। सीन भी लिखता हूं। डायलॉग भी लिखता हूं। इसके अलावा मैंने एक फिल्म थी जो राज कपूर साउंड रिकॉड्रेस अलाउद्दीन खान साहब बना रहे थे। उनकी फिल्म का नाम था ‘खुफिया’। हीरो थे उस जमाने के जितेंद्र जी और विद्या सिन्हा हीरोइन थी। डेविड साहब ने उनके बाप का रोल किया था। बहुत अच्छी स्टार कास्ट थी उस ज़माने की। उनके पास मिलाया मुझे किसी ने। और कहा कि भाई यह शायर हैं, तो उन्होंने कहा कि तुम गाना लिखो। उन्होंने पहली बार कल्याणजी-आनंदजी भाई के पास ले गए। उनके बंगले पर हम लोग पहुंचे। उन्होंने कहा कि यह शायर हैं हमारे लिए ये गाना लिखेंगे। तो उन्होंने कहा, कि सिक्वेंस बता दिया आपने। उन्होंने कहा कि ‘हीरो-हीरोइन का छेड़छाड़ वाला गाना है।’ वो बैठ गए हारमोनियम पर और उन्होंने कहा डडा डडा डा डडा डूडू. मैंने कहा, ये क्या है। तो उन्होंने कहा भाई! यह लिख लो आप। मैंने कहा ये तो मेरे समझ में नहीं आया। मैंने आज तक जो शायरी की है। उसके अंदर एक मिसरा दिया जाता है और उसके ऊपर हम शायरी करते हैं। लेकिन उन्होंने ऐसी धुन दे दी और उसको कह दिया, कि यह मीटर है। इसी मीटर पर आपको लिखना है। यह मेरे लिए बड़ी दुश्वारी ही हुई। लेकिन मैंने कहा मुझे कोशिश करके कामयाब होना था। इसलिए मैंने उनका वह मीटर लिख लिया। और उस मीटर पर लिखने के बाद एक गाना लिखा। जो बहुत पॉपुलर हुआ। मोहम्मद रफी साहब और लता जी के आवाज में फिल्माया गया। और म्यूजिक डायरेक्टर उसके कल्यानजी भाई-आनंदजी भाई हैं। उसके फिल्म का नाम है ‘खुफिया’। मैंने लिखा- ‘हुस्न शिकारी बन कर आया हो गया खुदी शिकार/जीत के सपने देखने वाले हो गई तेरी हार।’ इसमें जितेंद्र जी का बड़ा थिरकना-मटकना जो उनकी स्टाइल थी। बहुत ही अच्छा किया। और वह मेरा पहला गाना इस तरह से हुआ। बाद में इंदीवर जी से जुड़ गया और उन्होंने मुझे अपना असिस्टेंट लिख रख लिया। उनके लिए मैं लिखता था। वह जो मिसरा मुझे देते थे, जो सिचुएशन बताते जाते थे मुझे उस पर मैं लिखता था। और फिर कई मुख़्तलिफ लोगों के साथ काम किया मैंने। खासतौर से मैंने क़ादर खान साहब के साथ। उन के बहुत सारे असिस्टेंट थे। उनमें मैं भी एक असिस्टेंट रहा। और मुझे रोज़ाना के पैसे मिलते थे जो मेरे खर्च के लिए काफी होते थे। इस तरह से मेरा यह फिल्मी सफ़र शुरू हुआ।


ऋषि कपूर के साथ आफ़ताब अजमेरी (फाइल फोटो)


सवाल: फिल्मों में अभिनय करने के ख़्वाहिशमंद नए लोगों के लिए उर्दू उच्चारण की सही जानकारी कितनी ज़रूरी है ?

जवाब: बहुत अच्छा सवाल किया मानव साहब आपने। जो नए लोग आते हैं उनका जब ऑडिशन होता है। नए लड़के और लड़कियां जो हैं, वो सही डायलॉग नहीं बोल पाते या उनका तलफ़्फुज वगैरह नहीं दुरुस्त होता। तो वहां कहा जाता है, कि ‘तुस्सी तो पंजाबी हो।’ यह उर्दू सीरियल है। यहां पर इससे काम नहीं चल पाएगा। आजकल फिल्मों के बजाय वेबसीरीज बहुत बन रही है। हुआ यह है कि फिल्म स्टार जबसे कोरोना आया है, जब से यह बीमारी शुरू हुई। तब से सारे स्टार्स कुछ तो मुंबई से बाहर चले गए हैं और कुछ जैसे सलमान खान जैसे लोगों ने अपने फॉर्म हाउस के अंदर ही सेट लगा दिया है। ‘बिग-बॉस’ करने के लिए वह घर से निकलते हैं और अपने सामने वाले मैदान पर डायलॉग बोलते हैं और वापस अपने घर में चले जाते हैं। आमिर खान, शाहरुख खान और बहुत सारे स्टार्स मुंबई से बाहर चले गए हैं। जब तक यहां खतरा है। वह लोग वहां से लौटकर नहीं आने वाले हैं। सही भी है जिं़दगी अनमोल है। लेकिन अक्षय ऐसे आदमी हैं, जो अभी तक शूटिंग कर रहे हैं। उनकी डे-नाइट शूटिंग चल रही है। उनका वही क्राउड है। वही शोर-शराबा है। खाली अक्षय यहां पर सक्रिय हैं और काम कर रहे हैं।

 वेब सीरीज इसलिए ज्यादा बन रही है, क्योंकि जो लड़के-लड़कियां नये आए हैं। वो ‘बालाजी’ या बालाजी जैसे और दूसरे प्रोडक्शन उन लोगों को हीरो-हीरोइन के रूप में ले लेते हैं। उन पर एक छोटी सी कहानी लिखते हैं। दो घंटे या एक घंटे की। और उसकी वेबसीरीज बनती है। वह सस्ती बन जाती है। फटाफट बनती है। क्योंकि डे-नाइट काम होता है। वो आर्टिस्ट ऐसी डेटों का प्रॉब्लम नहीं डालते, जैसे हमारे स्टार डालते हैं। उनकी अभी एक डेट है, फिर महीने दो महीने तक डेट नहीं होगी। वेब सीरीज वाली फिल्म जल्दी बन जाती है। और मोबाइल पर भी चलती है। इसलिए वह बिक भी जल्दी से जाती है। इसलिए वेबसीरीज आजकल अधिक कामयाब है। सीरियल तो बहुत मुख़्तसर चल रही हैं। जो डे-नाइट चल रही हैं। जो कई महीनों सालों से चल रही हैं, वही चलती जा रही हैं। उनको और बढ़ावा मिल रहा है। उनके अगले एपिसोड बनते रहते हैं। बस मैं यह कहना चाहता हूं, कि नए लोगों के लिए भी उर्दू सीखना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि जब तक वह सीख नहीं पाते हैं तब तक उन्हें काम नहीं मिलता है। उन्हें वापस कर दिया जाता है। बहुत से लोग फिल्मी दुनिया में काम करने के लिए आए और उनकी यहीं पर पूरी उम्र गुजर गई। कुछ नहीं कर पाए। छोटे-मोटे, कहीं पर खड़े हैं, कहीं बैठे हैं, कहीं एक लाइन का डायलॉग मिल गया, पूरी उम्र गुजर गई। अभी लाॅकडाउन में हमारे यहां बहुत सारे लोग आए थे करेक्टर करने के लिए। जो जूनियर आर्टिस्ट में थे। बहुत सारे लोगों की मौत हो गई। उनके पास घर-बार नहीं, ठिकाना नहीं। कुछ बना नहीं पाये। कुछ कर नहीं पाए। इसलिए वो लोग ऐसे ही मर गए। और जब उनके घर वाले को पता चला, वो लोग आए, तो हमें ताज्जुब हुआ कि वह बहुत बड़े घराने के लोग थे। बड़ा कामयाब बनाना था। बहुत पढ़े लिखे थे। और यहां पर ठोकरे खा-खाकर ख़त्म हो गए। तो यह मुंबई है, जो कि रोज नए सांचे में ढलती रहती है।


विनोद खन्ना के साथ आफ़ताब अजमेरी (फाइल फोटो)


सवाल: आप शायरी से कब से जुड़े हैं ? किन विधाओं की शायरी करते हैं, आपका कोई उस्ताद भी है ?

जवाब: बचपन से ही मैं शेरो-अदब की दुनिया में दिलचस्पी रखता हूं। इसके अंदर सबसे बड़ा दखल मेरी वालिदा मोहतरमा शफाद बानो मिर्ज़ा का है। जिन्होंने मुझे बचपन से नाते-नबी और इक़बाल के नगमे याद करा दिए थे। और मैं स्कूल के ज़माने में स्कूल के स्टेज पर या तो ख्व़ाजा गरीब नवाज के दरबार में मनक़बत पढ़ता था। इस तरह मेरी शेरो-अदब का जौक़ बढ़ता गया। पहले वहां एक बड़े मशहूर उस्ताद थे, जिनका नाम था आरसी उस्ताद। उन्होंने फिल्म डंका में गाने लिखें। उसके बाद एक हाफिज कमर आसिफ थे। एक कैसर शाहजहांपुरी मशहूर शायर थे, जो शकील बदायूनी के शागिर्द थे। उनसे भी मैंने इस्लाह ली और मैं बस कोशिश करता रहा। और जो भी मोतबर शख़्स मिला। उसे मैंने कहा कि मोहतरम इसे दुरुस्त कर दें। बस समझ लीजिए वही मेरे उस्ताद हैं। और इस तरह से मेरे कई उस्ताद रहे। आज भी मैं अपने आप को मुकम्मल नहीं पाता। मैं समझता हूं कि यह बहुत बड़ा समंदर है और इसके अंदर ढलने के लिए ज़रूरी है कि कोई एक सहारा हो। कोई एक पतवार हो, एक कश्ती हो। जिसके जरिए इस समंदर को पार कर सकें। दिल में तो एक समंदर है जितना पढ़ते जाइए बढ़ते जाइए। मैं गजलियात, नज्में, दोहे, कतात, नाते-नबी, मनक़बत आदि लिखता हूँ। 

सवाल: फिल्मों में जो गीत लिखे जाते हैं, उनके लिखने वाले ज्यादातर उर्दू के ही शायर है, ऐसा क्यों ?

जवाब: दरअसल यह है, कि उर्दू में जितने भी गाने लिखे गए या जितने फिल्मों में गीत लिखे जाते हैं। उसके गीतकार इंदीवर और बहुत सारे लोग हिंदू भी हैं, मगर मगर इत्तेफ़ाक़ की बात यह है कि वह पुराने जमाने के लोग हैं और उर्दू से वाक़फ़ियात रखते हैं। वहीं ज्यादा बेहतर लिख सकते हैं, जो उर्दू जानते हैं। क्योंकि उर्दू मीठी ज़बान है। उर्दू की जो शेरीयत है जहनो-दिल में उतरती चली जाती है। चैनो-सुकून बख्सती है, और वही कामयाब है। आज के दौर में जितने गाने लिखे जा रहे हैं। देर तक नहीं याद किए जाते। लोग सुनते हैं और फिल्म थिएटर हाल से बाहर निकलते-निकलते भूल जाते हैं। कि क्या था वो गाना यार ? उसी वक़्त वह गाना डिंग डोंग करके निकल जाता है। मगर पिछले ज़माने के गाने जो मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले आदि जितने भी लोगों ने गाए हैं। वो आज भी लोगों के जे़ह्न ओ दिल में है। अपने तन्हाई को दूर करने के लिए और सुकून हासिल करने के लिए आज भी सुने-सुनाये जाते हैं। 


सैफ़ अली खान के साथ आफ़ताब अजमेरी


 सवाल: फिल्मों के डायलाग कैसे मुकम्मल होता है ?

जवाब: जब मैं यहां आया था तो राज कपूर के साउंड रिकॉर्ड्स अलाउद्दीन खान की फिल्म में मौका मिला था और उसके बाद मैंने कई जगह लिखे, लेकिन वो गाने मेरे नाम से नहीं हो सके। जाहिर है, कि जब इंदीवर जी के साथ आप काम कर रहे हैं। असिस्टेंट हैं। तो जो भी लिखेंगे, जो भी नाम होगा, इंदीवर जी का होगा। कादर खान साहब अकेले थोड़ी लिखते थे सारे डायलॉग। उनके कई असिस्टेंट थे। एक स्क्रिप्ट आती थी। उसमें कह दिया जाता था, कि भाई! अमिताभ बच्चन का एक डायलॉग है। एक लाइन दी जाती थी मिसरे की तरह कि ये डायलॉग बोलना है। और यह सीन है। एक ही कहानी पर एक ही लाइन पर दस लोग डायलॉग लिखते थे और शाम को कादर खान आकर उसका करेक्शन करते थे। दिन भर काम करने वाले लोगों की पेमेंट उनको दी जाती थी। इस तरह से कादर खान की वह स्क्रिप्ट मुकम्मल होती थी। और उसे वह बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ से अपने जहन से कुछ अल्फाज़ मिलाकर प्रोड्यूसर को देते थे। उसके वह लाखों रुपए लेते थे। लिखने वाले लोगों को जो भी उनका मुआवजा तय होता था वह दे दिया जाता था। तो इस तरह से मैंने कोशिश भी की है और काम मिला भी है। अल इंडिया फिल्म रायटर्स एसोसिएशन का 35 साल पुराना मेंबर भी हूं।

( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2021 अंक में प्रकाशित )


शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

गुफ़्तगू के जून-2021 अंक में

 


3. फोटो फीचर

4. संपादकीय (सोशल साइट्स पर भी लगाम ज़रूरी )

5-10. तरक़्क़ी पंसदी ने अब्दुल हई को साहिर बनाया- अली अहमद फ़ातमी

11-21. ग़ज़लें (बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, इब्राहीम अश्क, मंज़र भोपाली, आफ़ताब अजमेरी, बीआर विप्लवी, आरडीएन श्रीवास्तव, मासूम रज़ा राशदी,  इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, असगर शमीम, साजिद अली सतरंगी मेरठी, विजय प्रताप सिंह, तामेश्वर शुक्ल तारक, नरेश महरानी, अनिल मानव, अभिनव अरुण, ओम प्रकाश नदीम, मंजुल मंज़र लखनवी, प्रकाश प्र्रियम, शगुफ़्ता रहमान सोना, राज जौनपुरी)

22-31. कविताएं (यश मालवीय, शांतिभूषण, अरविंद असर, डाॅ. मृदुल शर्मा, शैलेंद्र जय, नीना मोहन श्रीवास्तव, मोतीलाल दास, संजय सक्सेना, रचना सक्सेना, ऋचा सिन्हा, अनुजा मिश्रा, अनिल मिश्र गुरुजी, केदारनाथ सविता, रमोला रुथ लाल आरजू, श्रीराम तिवारी सजह, ममता सिंह, रेनू मिश्रा दीपशिखा, सुजाता सिंह)

32-35. इंटरव्यू (जावेद अख़्तर )

36-37. नज़रिया (लावा यानी जावेद अख़्तर का जादू- पवन कुमार )

38-42. चौपाल (आप मुक्त छंद कविता को किस रुप में देखते हैं ?- सोम ठाकुर माहेश्वर तिवारी, यश मालवीय, विज्ञान व्रत, रविनंदन सिंह )

43-46. तब्सेरा ( पावन स्मृतियां, हम हैं देश के पहरेदार, निगाहों में बसा सावन, देश की 11 कवयित्रियां, उत्तर प्रदेश की सात कवयित्रियां, परसी थाली - अजीत शर्मा आकाश)

47-49. उर्दू अदब (कामयाबी सिर्फ़ छह कदम पर, बिहार, बंगाल और उड़ीसा के क़लमकार, सैयद मोहम्मद अली शाह मयकश अकबराबादी - डाॅ. हसीन जीलानी )

50-51. गुलशन-ए-इलाहाबाद (बेहद जिन्दादिल कमेंटेटर थे इफ्तेख़ार पापू - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी )

52. रंगमंच (विभांशु ने मेहनत से फिल्म और टीवी की दुनिया में बनाया मकाम - ऋतंधरा मिश्रा )

53-54. ग़ाज़ीपुर के वीर-14 (टी-सीरीज के चहेते गीतकार थे अंजुम ग़ाज़ीपुरी- मोहम्मद शहाबुद्दीन खान )

55-60. अदबी ख़बरें

!! परिशिष्ट: केके सिंह मयंक अकबराबादी !!

61. केके सिंह मयंक अकबराबादी का परिचय

62. कुछ ख़ास लोगों के साथ केके सिंह मयंक

63-64. मयंक के बारे में अदीबों की राय

65-66. विद्रूपताओं को अभिव्यक्त करने का सहज प्रयास- डाॅ. शैलेष गुप्त वीर

67. जीवन की तल्ख़ सच्चाई बयां करती हुई ग़ज़लें- शिवाजी यादव

68-127. केके सिंह मयंक अकबराबादी के कलाम

  


बुधवार, 30 जून 2021

रचनाओं में जीवन-जगत का अद्यतन स्वरूप



                                                
 अमर नाथ श्रीवास्तव

 कवि जमादार धीरज के गीत का समय है वह 40 वर्ष से उपर का है, इसलिए इनकी भाषा और काव्य दृष्टि को इसी संदर्भ में देखना और समझना ज़रूरी है। इनकी रचनाओं में जीवन-जगत का अद्यतन स्वरूप, जिसका एक सामाजिक सरोकार है, जगह-जगह देखने को मिलता है। लेकिन प्रकृति का वैभव और मनुष्य की गरिमा भी इनकी रचना केंद्र में हैं। जहां जीवन का  नाकारात्मक चित्रण है वहां भी ‘सबसे उपर मानुष....’ का भाव ही उभरकर सामने आता है। गीत एक मनः स्थिति विशेष और भावना विशेष के बिंदु का विस्तार है। इनके गीत चाहे रूपासिक्त को, निराश मन के उद्वेलन का है, चाहे देश प्रेम का, सबमें भावों के उद्मग का सफल विस्तार है। इस विस्तार का संप्रेषित करने में इनकी काव्य भाषा जो पिछले चालीस-बयालिस साल से अपना स्वरूप् निर्धारित कर रही है बहुत सहायक है। कभी-कभी तो आश्चर्य होता है कि ऐसी जन संप्रेष्य और जन संवेद्य भाषा का लोप क्यों होता जा रहा है ? क्या आधुनिकता के नाम पर जिस तरह हम बनावटी चमक-दमक में खुद की पहचान भूूलते जा रहे हैं, कभी भाषा के साथ भी तो ऐसा ही नहीं हो रहा है। समकालीनता और आधुनिकता के संदर्भ में निस्संदेह एक नई भाषा चाहिए जो अपनी जड़ से जुड़ी है। कवि जमादार धीरज की पहचान इनकी लोक भाषा की जड़ में है। इसको पहचानने के लिए इनकी अवधी की रचनाओं में भाव और भाषा की समृद्धि को पहचानना ज़रूरी है। मुझे याद है विद्वान समीक्षक डाॅ. राम विलास शर्मा ने अवधी अप्रतिम कवि पं. बलभद्र दीक्षित पढ़ीस को निराला को निराला के साथ ही उदकृत किया है। इन संदर्भ में उनका एक लेख भी महत्वपूर्ण है। 
  मैं जमादार धीरज की भाषा की जड़ इनकी अवधी ज़मीन में देख रहा हूं। इनकी एक कविता है ’सूखा’। कविता शुरू होती है-
                    हम कहा तेवार काउ करी
                    सूखा नहरा, बालू चमकड़
                    कीरा का केंचुल अस लपकड़
                    देखत-देखत अंखिया सूनी
                    ना बादर से टपकड़ बूनी
                    सूखी बेहनि, जरि गई बजरी
                    हम कहा तेरी काउ करी।
नहर का सूखना, सांप के केंचुल जैसा बालू का चमकना जैसा अप्रस्तुत विधान के साथ ही हम कहा तेवारी काउ करी, जैसा संबोधन जमादार की काव्य प्रतिमा को उद्भासित करता है। देस-जवार की चिन्ता, वहां की मिट्टी की खुश्बू और कीचड़-कांदो में सने रहकर भी इस मिट्टी की चमक से गौरवान्वित होने की अनुभूति और इस गौरव पर आये संकट की पहचान कवि धीरज की हिन्दी कविता में, इसी अवधी भाषा के शिल्प से आती है। इसलिए इनकी भाषा में शिल्प का प्रयोग कम है, लेकिन परंपरा के निर्वाह में नयेपन की एक चमक है, जो आजकल कम देखने को मिलती है।
  रचनाकार के गांव की मिट्टी देश की पवित्र मिट्टी बनती है और अपनी मातृभूमि की चिंता इनके गीतों में उजागर होती है। कवि काश्मीर की सुषमा और उस पर आये संकट को चित्रित करता है -
                           खुश नहीं क्यों आज बादल
                           वादियों को चूम कर
                           सेब की बगिया बुलाती
                           है नहीं क्यों झूमकर
                           क्यों कली कश्मीर की
                           सहमी हुई, सूखे अधर
                           झील की रंगीनियों को
                           लग गई किसी नज़र
जैसा मैंने पहले ही कहा कि इनकी भाषा को समझे बग़ैर इनकी कविताओं को समझना एक बंधे-बंधाये फार्मूले को अनुकरण जैसा ही होगा। जमादार धीरज के गांव की भारतीय नारी अब भी वही है जहां सालों पहले थी। उसकी मर्यादा इस आधुनिकता की दौड़ में भंग हुई है। गांव में शहरों के प्रवेश ने जीवन-मूल्य पर अर्थ को वरियता दी है। जिसकी शिकार सबसे पहले औरत है। इस चिन्ता को, जो उनके गांव की बहू बेटी की चिंता है और प्रकारान्तर से पूरे भारतीय समाज की चिंता है, रचनाकार ने अनेक रचनाओं में व्यक्त किया है। उनकी नारी शीर्षक की कविता में उस स्त्री की व्यथा-कथा है जो राजा की पत्नी होकर भी बेंच दी गई, दुर्दिन के बहाने। उस औरत की कहानी है जो वन में पति का साथ देती है, लेकिन वहां अपहृत हो जाती है। विरह की आग में झुलसती रही लेकिन जब दिन बहुरे तो उसे अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी। कवि पूछता है कि इससे किस मर्यादा की रक्षा हुई। कवि उस साध्वी स्त्री का भी जिक्र करता है, जहां भ्रष्ट और कामान्ध देवराज यथावत है किन्तु अबोध स्त्री को शिला होने का शाप झेलना पड़ता है। ये सभी मिथक निरर्थक हो जाते हैं अगर रचनाकार इन्हें तन्दूर में भून डाली गई सुनयना के पति की क्रूरता के साथ चित्रित नहीं करता। यह संदर्भ पाकर प्रस्तुत कविता अत्याधुनिक हो जाती है और निसंदेह रचनाकार की सामाजिक चेतना और उसकी मूलदृष्टि स्पष्ट होती है। यद्यपि यह रचना छंद की है लेकिन इसमें जो लयात्मकता है, इसे गीत की कोटि में लाती है। 
  जमादार धीरज के गीतों के मूल में एक पीड़ा है जो प्रत्यक्ष उनकी निजी है लेकिन उसका दायरा बड़ा है। सम्प्रेषणीयता के स्तर पर मुक्ति बोध का कथन समीचीन है कि ‘जो वस्तु देखने में निजी होती है, कविता में उसके बहुत बड़े हिस्से पर देश और समाज होता है’। इस प्रकार इनकी रचना अपनी क्षमता के चलते बहुतों की हो जाती और पूरे समाज की चिन्ता से  
उद्वेलित है। कवि अपनी ‘आंसू’ कविता मे कहता है -
                        नये गीत सब गई उमंगे
                        एक साथ मिट गयी तरंगे
                        सूखे अधर कंठ रूठे हैं
                        अब स्वर में संगीत नहीं है
                        आंसू है, यह गीत नहीं है।
इन आंसुओं के कारक के तत्व रचनाकार की स्मृतियां हैं-
                        मन के सागर में उठती है
                        यादों की अविराम तरंगे
                        रह-रह कर उभरी आती है
                        बीते क्षण की छिपी उमंगे
                        छोटे से जीवन में साथी
                        तेरे मन की थाह न पाया
संभवतः यह गीत किशोरावस्था का है और इसमें बाद की ‘जीवन सांझ’ ढलती वय का गीत है। दोनों रचनाओं में रचनाकार की उम्र बोलती है। उम्र की इन सीढ़ियों का अनुभव कविता में रचनकार बहुत की कुशलता से व्यक्त करता है। इन गीतों को ‘वियोगी होगा पहला कवि’ जैसी प्रसिद्धिा भले न मिले लेकिन इनकी भाव-सघनता रसात्मक है जो नहीं भूलती। यह समझना आनंदायक है कि रचनाकार के जीवन की निराशा में प्यार का रूप है या असफलता उसे जीवन की असफलताओं के रूपक से जोड़ती है। रचनाकार कहता है-‘ गीत रूठे हुए कंठ सूखे हुए, शब्द अधरों पे आने से डरने लगे’ लेकिन इसी पीड़ा के आसपास न घूम कर वह कहता है ‘ जल रहे हैं दिये पर हटा तम नहीं, हम सजाते हुए थाल चलते रहे’। प्यार की निराशा से उपजे अंधेरे का विस्तार तो रचनाकार की काव्य चेतना में है, लेकिन वह जगह-जगह रोशनी तलाशता है। इस तलाश में उसके अंदर आशा और उत्साह की तरंगें भी  उपतजी हैं। वह जीवन के प्रति सकारात्मक हो उठता है। लेकिन इससे पहले वह दर्द को गीत में बदलता है। इन गीतों में अपसंस्कृति का दर्द तो है ही। एक जगह रचनाकार कहता है-
                       कामना मन में यही, सरिता बहा दूं प्यार की
                       पर सदा मिलती रही सौग़ात मुझको हार की
                       लोग मेरी हार के उपहार पर हंसते रहे
                       हर कदम की हार को मैं जीत ही लिखता रहा
                       मैं नयन में नीर भरकर गीत ही लिखता रहा।
कवि अपने पराजय के क्षणों में भी उम्मीद की डोर नहीं छोड़ता। उसका सौंदर्य बोध एक समानांतर भाव भूमि का स्जन करता है। प्रकृति के विस्तृत प्रांगण में बसे हुए गांव अपनी गरीबी और अभाव के बावजूद वसंतागमन के उल्लास से प्रफुल्लित हो जाते हैं। इस उल्लास में कृषक और श्रमिक नारियां कहां पीछे रहने वाली हैं -
                        प्रातगात पुलकित हिय हर्षित
                        हंसिया हाथ लगाये
                        चलीं खेत को कृषक नारियां
                        नयनों में मुस्कायें
                        हाथ मिलाये चले मगन मन
                        गाते नूतन गीत रे।


जमादार धीरज


 रचनाकार की काव्यदृष्टि विस्तार पाती है। कविताओं में लोकमंगल की कामना जगह-जगह देखते बनती है। इन्हीं भावनाओं से प्रेरित और अपनी विरासत पर गर्व करने वाले रचनाकार जमादार धीरज की दृष्टि कभी अरुणाचल की सुषमा को समेटने का प्रयास करती है, मदर टेरेसा को अंतिम प्रणाम देेती है और देश के वीर जवानों को याद करती है। रचनाकार का निजत्व देश और समाज से जुड़ता है। लोक जीवन और लोक संस्कृति इनकी रचनाओं का आधार है। जिसमें शिल्प का अंधानुकरण नहीं करतीं। ये उन कवियों में भी नहेीं आते जो निरंकुश हुआ करते हैं। फिर भी इनकी हिन्दी का ग्राम्यत्व जो छंद और भाषा के स्तर पर है, एक चुनौती है। यह संस्कृतनिष्ठ हिन्दी प्रेमियों को चैंकाता ज़रूर है। लेकिन हिन्दी प्रेमियों को रुचिकर है। भरत मत के पुष्ट करते हुए भोज के ‘ग्रात्यत्व’ को विद्वदजनों की  उक्ति में गुण माना है, जो प्रत्यक्षत: उनकी दृष्टि में एक दोष है। किन्तु हिन्दी के वैयाकरण आचार्य भिखारी दास तो भाषा और भाव की समृद्धि की दृष्ट से इसे स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है-

                     ‘कहूं भदेषों होत कहुं, दोष होत गुन खान’

हिन्दी जैसी जीवित भाषा अपनी खुराक लोकभाषा से लेती है। यहां प्राय: ग्राम्यदोष एक सकारात्मक पक्ष है। भरत मुनि के शब्दों में भी दोष का विपर्यय गुण है। ‘न्यून पदत्व’ एक दोष है। इसके विपर्यय के लिए जमादार धीरज देशज और तद्भव शब्दों का प्रश्रय लेते हैं। रचानाकार ने एक ऐसी भाषा स्वीकार की है जो सरल, सर्वमान्य और सर्वग्राहा्र है। इनके शब्दों में पारंपरिक शब्द जैसे गीत, दर्द, दीपक, अंधेरा, जीत, हार, सौगात आदि का व्यवहार है क्योंकि ये शब्द लोकभाषा में यथावत है और इन्हें समझ लेने से कविता की चमक बढ़ जाती है। इनकी रचनाओं में बिम्ब-विधान संक्षिप्त और धारदार छंद कम हैं, क्योंकि कवि आवश्यकतानुसार वर्णनात्मक कविताओं में ही संवेदना और सप्रेषणीयता के गवाक्ष खोलता है, और अन्य आलम्बन तलाश करता है। कुछ ऐसी रचनाएं भी हैं जो कवि की काव्य दृष्टि की ओर संकेत करती हैं। ‘वक़्त आया सरकता गया पास से, हम खड़े बस बगल झांकते रहे गये साथ में जो बहे वे किनारे लगे, हम खड़े धूल को फांकते रह गये’। रचनाकार 26 जनवरी के गीत में भी कहता है -

                        आज देश पर ताक लगाये

                        तत्व स्वार्थी भ्रष्ट निगाहें

                        उनसे हमें सजग रहना है

                        चलो रोक दें उनकी राहें

                        हम प्रहरी है सजग राष्ट्र के

                        आओ स्वयं दीप बन जायें।

इस उद्बोधन गीत की मूल दृष्टि भगवान की ‘अत्त दीपो भव’ है। कवि अपनी एक कविता में कहता है।

                  मन को छलकर जीते-जीते जीवन भार हुआ

                  मीठे विष को पीते-पीते तन बेज़ार हुआ।

कविता में जो नकारात्मक है वह प्रकारान्तर में एक सकारात्मक भाव का सृजन करती है। विचारों में कहीं न कहीं एक दार्शनिकता है। जमादार धीरज की कविताएं पुराने शिल्प में  नवता की संकल्पना ज़रूरी हुआ तो उद्बोधन का भी आश्रय लेती है। इनकी रचनाओं में देश, समाज, गांव-घर और स्वयं की पीड़ा है, सुख-दुःख है और तद्जनित एक मूलदृष्टि है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)