गुरुवार, 4 जून 2026

01 अक्तूबर 1950 से शुरू हुआ ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’

एचटी मीडिया ग्रुप की इस पत्रिका के पहले संपादक थे मुकुट बिहारी वर्मा 

एक प्रति का मूल्य ’तीन आना’ था, नौ रुपये में मिलती थी पूरे वर्ष पत्रिका

                                                                    - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 देश से प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का ख़ास स्थान रहा है। 1950 के दशक में पत्रिकाएं खूब पढ़ी जाती थीं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के प्रकाशन के साथ ही इसकी प्रतिस्पर्धा ‘धर्मयुग’ से शुरू हुई थी। देश के लगभग सभी बड़े लेखक इन पत्रिकाओं में छपते थे। नये लोगों की रचना का इसमें प्रकाशन हो जाना किसी सपने से कम नहीं था। इन पत्रिकाओं में छपने वाले ‘पाठकों के पत्र’ में भी छप जाना ख़ास अहमियत रखता था। पत्र छप जाने पर ही नये लोग अपने को लेखक मानने लगते थे, फूले नहीं समाते थे। 26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू होने के लगभग आठ महीने बाद ही इसका पदार्पण हुआ और देशभर में यह पत्रिका छा गई।

साप्ताहिक हिन्दुस्तान का कवर पेज

 नई दिल्ली में एचटी मीडिया ग्रुप से शुरू हुई इस पत्रिका के प्रबंधक देवी प्रसाद शर्मा और पहले संपादक मुकुट बिहारी वर्मा थे। 01 अक्तूबर 1950 को छपे पहले अंक में जैनेंद्र कुमार का लेख ‘हम कहां क्यों ?’ और ‘गांधी जी बापू क्यों ?’ शीर्षक से बनारसी दास चतुर्वेदी का लेख प्रकाशित हुआ। इसी अंक के पेज नंबर पांच पर एक चित्र प्रकाशित हुआ था। इस चित्र में गिरधारी कृपलानी और श्रीमती कृपलानी के नवजात शिशु को महात्मा गांधी आशीर्वाद दे रहे हैं। इसी अंक के पेज नंबर 23 पर महात्मा गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु का चित्र छपा था। 08 अक्तूबर 1950 के दूसरे अंक के पेज नंबर एक पर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का गीत और पेज तीन पर सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘आवाहन’ प्रकाशित हुई थी। तब पत्रिका की एक प्रति का मूल्य मात्र तीन आना था, छह महीने की सदस्यता शुल्क पांच रुपये और एक वर्ष का नौ रुपये था।

साप्ताहिक हिन्दुस्तान के पहले का पहला पेज


 01 अक्तूबर 1950 के अंक में यह संदेश प्रकाशित हुआ था-‘‘गांधी जयंती के अवसर पर गांधी जी के जीवन की प्रमुख विशेषताओं की पुनरावृत्ति करना या उनकी प्रार्थना सभाओं में दिए गए बहुमूल्य संदेशों की फिर चर्चा करना कोई नई बात नहीं होगी। यह संदेश तो आज भी देश के कोने-कोने में हर स्त्री, पुरुष और बच्चों के दिल में गूंज रहे हैं। अतः यहां हम एक दूसरे महापुरुष -- गोपाल कृष्ण गोखले -- के उन उद्गारों को उद्घृत कर रहे हैं, जो उन्होंने गांधी जी के प्रति आज से 38 वर्ष पूर्व सन 1912 में व्यक्त किए थे, जब इन पंक्तियों के अधिकांश पाठक या तो नन्हें बच्चे थे या जन्मे ही नहीं थे। बहुतों के लिए तो यह पंक्तियां बिल्कुल नई होंगी और जो इनसे परिचित हैं, उन्हें इनका पुनः पारायण करने में आनंद आएगा। गंाधी जी के संबंध में इनसे अधिक प्रशंसात्मक शब्दों का प्रयोग आज तक किसी ने नहीं किया। फिर भी भारतीय जनता जानती है कि गोखले से बढ़कर शांत और अधिक संतुलित व्यक्ति देश में और कोई नहीं हुआ। यह देशभक्त 1912 में दक्षिण अफ्रीका गया था, जबकि भारतीय प्रवासियों का जनरल बोथा तथा स्मट्स की गोराशाही से भयंकर संग्राम चल रहा था। यह भाषण गोखले जी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटकर लाहौर में भारतीय कांग्रेस के 24वें अधिवेशन के अवसर पर दिया था। उसे यहां प्रकाशित करने का केवल यही कारण नहीं है कि उसमें गांधी जी के प्रति कुछ अमर उद्गार व्यक्त किए गए हैं। बल्कि यह भी कि उनका आज की दक्षिण अफ्रीका संबंधी समस्त समस्या से घनिष्ठ संबंध हैं। गोखले जी अपने समय के एक महान राजनैतिक नेता था और सार्वजनिक रंगमंच पर तथा शाही धारा सभा के भीतर दिए गए उनके भाषणों से अपने को धर्मात्मा मानने वाले ब्रिटिश शासकों का अहंकार उतना ही विचलित हो उठा था, जितना रानाडे, तिलक, अरविंद घोष और लाजपत राय जैसे अन्य समकालीन तथा बाद के नेताओं के कार्य से। कुछ भाषण, जिनका श्री नटेसन ने संग्रह किया है, बड़ा ही जोखि़म उठाकर दिए गए थे, क्योंकि उनसे लार्ड कर्जन जैसे शक्तिशाली व्यक्ति के अप्रसन्न होने की निरंतर आशंका बनी रहती थी।’’

हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संग्रहालय में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ की फाइल देखते डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और दुर्गानंद शर्मा।

इस पत्रिका के एक अंक में 26 जनवरी 1950 को उप प्रधानमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल द्वारा दिया गया यह संदेश प्रकाशित हुआ था-‘‘आज से ठीक 20 वर्ष पूर्व हमने पूर्ण स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा की थी। इस प्रतिज्ञा के पीछे संपूर्ण जनता का निश्चय तथा बल छिपा था। 15 अगस्त 1947 को मिली स्वतंत्रता अधूरी थी। ईश्वर की कृपा से आज हमारी प्रतिज्ञा पूर्ण हो गई। इस महान अवसर पर हमें अपने राष्ट्रपिता की याद आना स्वाभाविक है। 

07 जनवरी 1951 के अंक में छपा यह चित्र इलाहाबाद के बमरौली हवाई अड्डे का है। सरदार बल्लभ भाई पटेल का अस्थिपात्र हाथ में लिए खड़े हैं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद।

वे यहां अनुपस्थित रहकर भी ऊपर से अपना आशीर्वाद हमें दे रहे रहे हैं। आज का दिन भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। विदेशी सत्ता की समाप्ति के साथ हमें वास्तविक स्वतंत्रता मिल गई है, हम अब अपने भाग्यविधाता हैं। पुनर्निर्माण के लिए हमें अभी अनेक बलिदान करने पड़ेंगे। अतः हम उत्सव की गंभीरता को समझकर कठोर परिश्रम करें। ईश्वर हमारी सहायता करेगा।’’ यह संदेश आज भी हमारे लिए अनुकरणीय है।

साप्ताहिक हिन्दुस्तान के पहले अंक में प्रकाशित चित्र। इसमें गिरधारी कृपलानी और श्रीमती कृपलानी के नवजात शिशु को महात्मा गांधी आशीर्वाद दे रहे हैं।

साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 07 जनवरी 1951 के अंक में एक चित्र प्रकाशित हुआ था, जिसमें इलाहाबाद के बमरौली हवाई अड्डे पर सरदार बल्लभ भाई पटेल का अस्थिपात्र हाथ में लिए खड़े हैं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद। 29 अप्रैल 1951 के अंक में मासिक पत्रिका ‘जीवन साहित्य’ का विज्ञापन प्रकाशित है, इस पत्रिका के संपादक के तौर पर हरिभाऊ उपाध्याय और यशपाल जैन का नाम छपा है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 12 जनवरी 1992 के अंक में सआदत हसन मंटो के बारे में देवेन्द्र इस्सर का लेख ‘उर्दू का वह युगांतरकारी कहानीकार था’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इस लेख में मंटो की कहानियों की शानदार ढंग से समीक्षा की गई है। साथ ही मंटो की लेखन-शैली का भी उल्लेख किया गया है। 12 अप्रैल 1992 के अंक में मनोहर श्याम जोशी का लेख ‘अमूर्त कला: भ्रांतियां और सच्चाई’ प्रकाशित हुआ था। 

08 अक्तूबर 1950 के अंक में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का गीत।


08 अक्तूबर 1950 के अंक में सुमित्रानंदन पंत की कविता।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडी सेंटर के को-ऑडिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा बताते हैं-‘‘1977 के बाद 80 के दशक में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के अलावा ‘रविवार’ और ‘दिनमान’ नामक साप्ताहिक पत्रिकाएं भी निकलती थीं। लेकिन इनमें साप्ताहिक हिन्दुस्तान ही पारिवारिक पत्रिका थी। इसमें हर तरह का स्वाद मौजूद था। बेहतरीन प्रस्तुति थी। कई बड़े उपन्यासों के धारावाहिक भी इसमें प्रकाशित हुए। हम बड़े चाव से इसे पढ़ते थे।’’ वरिष्ठ पत्रकार स्नेह मधुर के मुताबिक-एक साप्ताहिक पत्रिका का इस तरह से प्रकाशन होना गौरव की बात थी। बड़े-बड़े विद्वान लेखक इसमें छपते थे। धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान में आपस में जबरदस्त मुकाबला भी था। वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय कहते हैं-‘‘हिन्दुस्तान की पत्रकारिता में एक तरह जबरदस्त बदलावा आ गया था। अख़बारों की पत्रकारिता के साथ अब साहित्यिक पत्रकारिता का दौर शुरू हो गया था। ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं ने लोगों को बताया कि साहित्यिक पत्रकारिता की अलग ही धारा है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान को पढ़ने वाले देश के कोने-कोने में मौजूद थे। बड़े-बड़े लेखकों को इस पत्रिका में स्थान मिलता था। साहित्य के अलावा अन्य विषयों को भी पर्याप्त स्थान मिलता रहा। 80 से लेकर 90 के शुरूआती दशक तक पत्रिकाओं का खूब बोलबाला था।’’

साप्ताहिक हिन्दुस्तान में यह चित्र भी प्रकाशित हुआ।

 इस पत्रिका के पहले संपादक मुकुट बिहारी वर्मा थे। इनके बाद क्रमशः बांके बिहारी भटनागर, मनोहर श्याम जोशी और मृणाल पांडेय इसकी संपादक रहे हैं। 10-16 मई, 1992 का अंक ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का अंतिम पड़ाव था। इसके बाद यह पत्रिका बंद कर दी गई।


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित )

    



गुरुवार, 21 मई 2026

 

बेला, चंपा, गुलाब सब थे मगर/ तुम जो आए तो तीरगी महकी’

‘स्मार्ट सिटी कार्निवाल’ में कवि सम्मेलन और मुशायरा

अपना कलाम पेश करते डॉ. नायाब बलियावी

प्रयागराज। ‘स्मार्ट सिटी कार्निवाल-2026’ के अंतर्गत साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ की तरफ से 06 मई को सिविल लाइंस मेें कवि सम्मेलन और मुशायरे का आयोजन किया गया। अध्यक्षता डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने किया।

मशहूर शायर डॉ. नायाब बलियावी ने अपनी शायरी में संगम का शानदार उल्लेख किया-‘कली के शहर को शबनम का शहर कहते हैं/इलाहाबाद को संगम का शहर कहते हैं।’

गुफ़्तगू के सचिव नरेश कुमार महरानी ने ज़िन्दगी की हक़ीक़त को दर्शाया-‘न बदला है न बदलेगा, देख ज़माना रूप/कभी न फैलाऊं मैं पंख, पाकर ऊर्जा धूप।’ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की ग़ज़ल में प्रेमिका उल्लेख इस तरह था-‘बेला, चंपा, गुलाब सब थे मगर/तुम जो आए तो तीरगी महकी।’ मख़दूम फूलपुरी ने तरन्नुम से महफ़िल में उत्साह उत्पन्न कर दिया-‘सितमगरों में कभी अपना नाम मत करना/गिरो निगाह से सबकी वो काम मत करना।

कार्यक्रम के दौरान मंच पर मौजूद- (बाएं से) नरेश कुमार महरानी, डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, प्रयागराज के मेयर गणेश केसरवानी, राजेश गुप्ता और विधायक पूजा पाल

युवा शायर अनिल मानव की शायरी ने अलग छाप छोड़ी-‘ कहते हैं जिसको इबादत की बात है/सज़दा न आरती वो मोहब्बत की बात है’। शैलेंद्र जय की कविता काफी उल्लेखनीय रही-‘ज़िन्दगी का वही तो राज़ रखता है/जीने का अपना जो अंदाज़ रखता है।’

वरिष्ठ कवयित्री नीना मोहन श्रीवास्तव ने अपनी शायरी ने मोहब्बत का जिक्र किया-‘वो मोढ़ ढूढ लाएं फिर मिलते थे हम कभी/हर शै महकता हुआ हम भी थे अजनबी।’ रचना सक्सेना ने अपनी ग़ज़ल से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा-चोट पर यूं सितम ढा रही हैं सिसकियां/ज़ख़्म दिल के भरे जा रही हैं सिसकियां’। अना इलाहाबादी ने कहा-‘एक जैसी परविश दे, एक से अवसर/बेटियां होती नहीं, बेटों से कमतर।’इनके अलावा डॉ. प्रीता वाजपेयी, सुनील दानिश, मधु गौतम, शिबली सना, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, हरिनाथ शर्मा ‘सनसनी’, शाहीन खूश्बू आदि ने कलाम पेश किए। गौतम मुखर्जी और मोहम्मद आरिफ़ ख़ान ने संयुक्त रूप से धन्यवाद ज्ञापित किया। 


बुधवार, 20 मई 2026

 बच्चों के साथ खूब खेलते थे राही मासूम रज़ा

चारपाई पर लेटकर पतंग उड़ाने का था ख़ास शौक़

तीन फिल्मों के संवाद लेखन के लिए मिला फिल्मफेयर

                                                                            - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

                                 

राही मासूम रज़ा

राही मासूम रज़ा को टीवी सीरियल ‘महाभारत’ का संवाद लिखने के लिए सबसे ज़्यादा याद किया जाता है, हालांकि इन्होंने और भी बहुत सारे काम किए हैं। रविवार की सुबह नौ बजे जब यह सीरियल दूरदर्शन पर आता था, सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था, जैसे कफर््यू लगा हो। इस सीरियल के संवाद में इन्होंने ‘माताश्री’ और ‘पिताश्री’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया और हिन्दी भाषा को दो नये शब्द दिए। इसके पहले ये शब्द किसी ने सुना या पढ़ा नहीं था। टीवी सीरियल महाभारत के लिए लिखे गए उनके संवाद आज भी हमारे मन-मतिष्क में इस तरह से समाहित हैं कि इसके अलावा कोई अन्य संवाद स्वीकार हो ही नहीं सकता। फिल्म ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ (1979), तवायफ़ (1985) और लम्हे (1991) के लिए बेहतरीन संवाद लिखने पर उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ संवाद का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड प्रदान किया गया था।  

अपनी पत्नी नैयर जहां के साथ राही मासूम रज़ा।

 राही मासूम रज़ा की भांजी डॉ. शबनम रिज़वी बताती हैं-‘बच्चों से उनको बहुत लगाव था। जब कभी ग़ाज़ीपुर आते, पूरे परिवार और मुहल्ले के कई बच्चों को एकत्र करके उनके साथ खेलते थे, उनको कहानियां सुनाते थे। उनके लिए नई-नई कहानियां गढ़ते भी थे। बच्चों से उनकी स्कूल की बातें भी खूब सुनते थे। हर बच्चे से पूछते कि आज स्कूल में क्या-क्या हुआ। ज़रूरत के मुताबिक बच्चों को सलाह देते थे कि-क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।’ पढ़ने-लिखने के अलावा उनको पतंग उड़ाने का भी बहुत शौक़ था। ख़ासियत यह थी कि छत पर रखी हुई चारपाई पर लेटकर पतंग उड़ाते थे। घंटों पतंगबाजी करते थे, ग़ाज़ीपुर में रहने के दौरान यह काम भी ज़रूर करते थे और खूब करते थे।

परिवार के बच्चों के साथ राही मासूम रज़ा।

 वे काफी लंबे समय तक बीमार रहे। उन्होंने अपनी बीमारी को भी खूब इंज्वाय किया। डॉ. शबनम रिज़वी के मुताबिक-‘वे कहते थे कि बीमार हो जाने का मतलब यह नहीं है कि ज़िन्दगी ख़त्म हो गई।‘ उनकी दो शादी हुई थी। पहली पत्नी से कोई औलाद नहीं थी। उसके निधन हो जाने पर उन्होंने नैयर जहां से शादी की। दूसरी पत्नी पहले से तलाक़शुदा थी, उसके पहले से ही तीन बच्चे थे, इन्हें भी राही मासूम रज़ा ने अपने बच्चों की तरह पाला था। विधवा से विवाह करने के कारण उन्हें बहुत मुख़ालफ़त का सामना करना पड़ा था। इसी मुख़ालफत की वजह से उन्होंने अलीगढ़ छोड़ दिया था, जबकि वे इसी यूनिवर्सिटी में अध्यापक थे। मासूम रज़ा की एक बेटी मरियम है, जो वर्तमान समय में अपने पति मजाल मूनिस के साथ अमेरिका में रहती है। उनका एक बेटा शेखू है, जो इस समय मुंबई में रहता है।

 मासूम रज़ा राही का जन्म 01 सितंबर 1927 को ़उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने धार्मिक पुस्तकों का खूब अध्ययन किया। हिंदुस्तानी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने बाद उनकी रूझान साहित्य की तरफ हुई। 

ग़ाज़ीपुर के गंगौली गांव में स्थित राही का घर।

 वर्ष 1967 में अलीगढ़ छोड़कर वे मुंबई चले गए। यहां आकर इन्होंने फिल्मों के लिए लेखन शुरू किया। इनका हिंदी फ़िल्मों में करियर ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित रोमांटिक ड्रामा फ़िल्म ‘मिली’ (1975) से शुरू हुआ। उनके संवाद की काफ़ी प्रशंसा हुई, इसी के साथ हिंदी फ़िल्म उद्योग में उनके सफल करियर की शुरुआत हुई। गोलमाल (1979), कर्ज़ (1980), जुदाई (1980) और डिस्को डांसर (1982) जैसी कई सफल फ़िल्मों में काम करने के बाद बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ‘तवायफ़’ (1985) के लिए भी संवाद लिखा। एक तवायफ़ के जीवन और उसकी दुविधाओं को दर्शाती इस फ़िल्म में उनके संवादों ने किरदारों को मानवीय बनाने और कहानी की भावनात्मक गहराई को व्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे फ़िल्म को आलोचकों की प्रशंसा मिली। इसके बाद राही मासूम रज़ा ने हनी ईरानी के साथ मिलकर यश चोपड़ा की संगीतमय रोमांटिक ड्रामा ‘लम्हे’ (1991) की पटकथा और संवाद लिखा। कुल मिलाकर उन्होंने फिल्म मिली (1975), अलाप (1977), मैं तुलसी तेरे आंगन की (1978), गोलमाल (1979), कर्ज़ (1980), जुदाई (1980), हम पांच (1980), तवायफ़ (1985), अनोखा रिश्ता (1986), बात बन जाए (1986), नाचे मयूरी (1986), आवाम (1987), लम्हे (1991), परम्परा (1992) और आइना (1993) के लिए संवाद लेखन किया।

 उनकी प्रमुख किताबों में आधा गांव, दिल एक सादा कागज़, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद, कटरा बी आरज़ू, दृश्य संख्या-75, मौज-ए-ग़ुल मौज-ए-सबा (उर्दू), अजनबी शहर: अजनबी रास्ते (उर्दू), मैं एक फेरीवाला (हिन्दी), शीशे के मकान वाले (हिन्दी), छोटे आदमी की बड़ी कहानी और नीम का पेड़ आदि हैं। 15 मार्च 1992 को 62 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। शिक्षाविद् मूनिस रज़ा और विद्वान मेहंदी रज़ा के छोटे भाई थे मासूम रज़ा।


(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)   


शुक्रवार, 15 मई 2026

वर्तमान समय में उर्दू के लिए संजीदगी से काम करने की ज़रूरत है: शबनम हमीद

प्रो. शबनम हमीद उर्दू अदब की मशहूर शोधकर्ता, आलोचक, अनुवादक और शिक्षाविद हैं, जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग से लंबे समय से कार्यरत हैं। इनकी मशहूर किताबों में शेरी अस्नाफ, इंतखाबे ग़ज़लियात, हिंदुस्तानी किस्सों से माखूज उर्दू ड्रामा, आगा हश्र: शख़्सियत और फन, उर्दू साहित्य का इतिहास, और तनकीदी औराक आदि हैं। इन्होंने ड्रामा अनारकली को हिंदी लिपि में हस्तांतरित किया और नासिरा शर्मा के साहित्य अकेडमी एवार्ड से सम्मानित नाविल ‘कोईयां जान’ का हिंदी से उर्दू अनुवाद भी किया जो उनकी शोधीय  योग्यता का बेहतरीन उदाहरण है। रेशादुल इस्लाम ने इनसे ख़ास बातचीत की है, जो इस प्रकार है-

प्रो. शबनम हमीद

सवाल: तालीम के मैयार को बेहतर करने के लिए क्या करना चाहिए? 

जवाब: मेरे ख्याल में अगर शैक्षिक संस्थाएं तत्पर और एकजुट हो जाएं तो यहां की साहित्यिक गतिविधियां बेहतर और स्टैंडर्ड हो सकती हैं। इसके लिए संजीदगी से काम करने की ज़रूरत है। 


सवाल: आप तो बहुत सी उर्दू संस्थाओं से भी जुड़ी रही हैं वहां क्या स्थिति है? 

जवाब:इन संस्थाओं का मकसद उर्दू का प्रसारण एवं विकास जरूर है, मगर वहां के हालात भी संतोषजनक नहीं हैं। 


सवाल: आप यूनिवर्सिटी के जिस विभाग से जुड़ी हैं उस से प्रो. जामिन अली, प्रो. एजाज हुसैन, प्रो. एहतेशाम हुसैन, सैयद अकील रिजवी, प्रो. अली अहमद फातिमी वगैरह जैसे प्रसिद्ध अध्यापक जुड़े रहे हैं इन पर आपको गर्व तो होता होगा? 

जवाब: यकीनन मुझे गर्व महसूस होता है कि मैं इस ऐतिहासिक विभाग का हिस्सा रही हूं, जिस ने उर्दू के कई मशहूर चिंतक, शोधकर्ता और साहित्यकार पैदा किया। 

प्रो. शबनम हमीद से बातचीत करते रेशादुल इस्लाम।

सवाल: सरकारी उर्दू संस्थाओं को कैसे बेहतर किया जा सकता है ?

जवाब: अगर हम खुद को संगठित करें, संस्थाओं पर दबाव डालें, हुकूमत को सही स्थिति से आगाह करें तो स्थिति बदल सकती है। 


सवाल: इलाहाबाद में आप उर्दू भाषा एवं साहित्य  का भविष्य किस तरह देखती हैं? 

जवाब:लाहाबाद उर्दू कविता और साहित्य की एक उपजाऊ जमीन रही है और आज भी है। यहां की फिजाओं में साहित्य व कला की खुशबू रची बची है। छात्रों की दिलचस्पी भी बढ़ रही है यह हर्ष की बात है बस ज़रूरत इस बात की है कि बड़े बुजुर्ग आगे आएं और नई पीढ़ी का मार्ग दर्शन करें उनका प्रशिक्षण करें। 


सवाल: आपने उर्दू विभाग इलाहाबाद यूनिवर्सिटी कब से ज्वाइन किया? 

जवाब: मैंने 1977 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से शिक्षा का आरंभ किया। 1992 में उर्दू ड्रामा पर पीएचडी की डिग्री हासिल की। 2001 में इसी यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर की हैसियत से अपॉइंटमेंट हुआ। इसी साल यूपी सलेक्शन कमीशन के द्वारा प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्य के पद पर मेरा अपॉइंटमेंट हुआ, मगर मुझे अपने विद्यालय से इस हद तक मोहब्बत थी कि मैं ने महिला विद्यापीठ ज्वाइन नहीं किया। 


(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2026 अंक में प्रकाशित)


बुधवार, 13 मई 2026

 गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2025 अंक में 



07. संपादकीय : बाबा-ए-अदब और युग कवि

8-11. मीडिया हाउस: 01 अक्तूबर 1950 से शुरू हुआ साप्ताहिक हिन्दुस्तान - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

12-13. उर्दू नाटक: हे ग़ज़ाला, हे ग़ज़ाला - असग़र वजाहत

14-16.रूह के पुकार बने शकील बदायूंनी के गीत - डॉ. प्रमिला वर्मा

17-19. दास्तान-ए-अदीब: बच्चों के साथ खूब खेलते थे राही मासूम रज़ा - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

20-21. इंटरव्यू: प्रो. शबनम हमीद - उर्दू के लिए संजीदगी से काम करने की ज़रूरत

22-28. चौपाल: 30 लाख रुपये की रॉयल्टी को किस रूप में देखते हैं ?

29. उर्दू के मुस्तनद शायर फ़हीम जोगापुरी

30-37. ग़ज़लें: उदय प्रताप सिंह, क़ादिर हनफ़ी, बसंत कुमार शर्मा, अनुराग मिश्र ‘ग़ैर’, डॉ. इश्क़ सुल्तानपुरी, प्रेमचंद गुप्त, अरविंद असर, शिवचरण शर्मा ‘मुज़्तर’, डॉ. इम्तियाज़ समर, रामावतार सागर, अर्शी बस्तवी, प्रदीप बहराइची, मनजीत कौर मीत, यासीन अंसारी, नूरउद्दीन नूर, नितिन पांडेय

38. अमर राग के मुक्तक

39-44. कविताएं: यश मालवीय, अरविन्द सिंह, प्रियंका माथुर, अरुण आदित्य, अर्चना गुप्ता, कमल चंद्रा, डॉ. पूर्णिमा पांडेय, मंजुल शरण, केदारनाथ सविता, अरुणिमा बहादुर खरे, पूनम श्रीवास्तव

45-53. तब्सेरा: रार्बट गिल और अजंता की पारो, शाम तक लौटा नहीं, पतवारी तुम्हारी यादें, मैं कविता हूं, पहला वेतन, गहवर, शब्द रंग, मेरी कुंडलियां, प्रदीप बहराइची के सौ शेर

54-55. उर्दू अदब :  गुल हाय अक़ीदत, जुस्तजू

56-57. ग़ाज़ीपुर के वीर-31: सबके चहेते थे उसियां के असलम नेता-सुहैल ख़ान

58-62. अदबी ख़बरें


63-92. परिशिष्ट-1: डॉ. शबाना रफ़ी़क 

63. डॉ. शबाना रफ़ीक़ का परिचय

64-66. अनुभूति और लोकानुभूति को उकेरती कविताएं - अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’

67. नारी मन को उधेड़ती कविताएं - शैलेंद्र जय

68. एक बहुआयामी व्यक्तित्व - नरेश कुमार महरानी

69-70. समाज की विसंगतियों, कुप्रथाओं पर प्रहार- निरुपमा खरे

71-92. डॉ. शबाना रफ़ीक़ की कविताएं


93-125.परिशिष्ट-2 परिशिष्ट-2: शगुफ्ता रहमान ‘सोना’

93-94शगुफ्ता रहमान ‘सोना’ का परिचय

95-97. मिलने से बिछुड़ने तक का फलसफ़ा - डॉ. इश्क़ सुल्तानपुरी

98. शब्दों में पिरोकर किया दुनिया के हवाले- मनमोहन सिंह ‘तन्हा’

99. जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास - प्रिया श्रीवास्तव ‘दिव्यम्’

100. क़लम से जादू बिखेरती शगुफ़्ता रहमान -शिवाजी यादव

101-125. शगुफ़्ता रहमान की कविताएं


126-148. परिशिष्ट-3: जगदीश कुमार धुर्वे

126.जगदीश कुमार धुर्वे का परिचय

127-129. कविताओं में वस्तुस्थित का शानदार अवलोकन- नीना मोहन श्रीवास्तव

130-131. भरपूर मनोरंजन करतीं जगदीश कुमार धुर्वे की कविताएं- शिवाशंकर पांडेय

132-133. बहुमुखी प्रतिभा के प्रचारक-जयचंद प्रजापति ‘जय’

134-135. काव्यधारा में समाज के अनेक विषय समाहित-कमलचंद्रा

136-148. जगदीश कुमार धुर्वे की कविताएं


(गुफ़्तगू: अक्तूबर-दिसंबर 2025)


शनिवार, 9 मई 2026

 ‘गुफ़्तगू’ एक मजबूत दरख़्त बन चुका है: रज़ा मुराद

‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ के दूसरे दिन विभूतियों का हुआ सम्मान


लोगों को संबोधित करते रज़ा मुराद

प्रयागराज। 24 साल पहले गुफ़्तगू जो एक नन्हा पौधा था, आज वह एक मजबूत दरख़्त बना चुका है। ऐसे दरख़्त का खड़ा हो जाना बहुत बड़ी बात है। अगले साल इसकी सिल्वर जुबली होगी और बहुत ही शान से यह सिल्वर जुबली कार्यक्रम आयोजित करेंगे। यह बात 29 मार्च की शाम साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू की तरफ से आर्य कन्या इंटर कॉलेज में आयोजित ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ के दूसरे दिन फिल्म अभिनेता रज़ा मुराद ने कही। उन्होंने कहा कि डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी से जज़्बे को सलाम हैं, जिन्होंने लगातार अदब की खि़दमत की है। हमलोग तो जो अभिनय करते हैं, वह फिल्म के परदे और टीवी पर आ जाता है, मगर अदब का काम इस तरह से नहीं आ पाता। इसके बावजूद अदब का काम करना बहुत बड़ी बात है।

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि गुफ़्तगू का काम बहुत ही सराहनीय है, ऐसे ही साहित्य का काम होते रहना चाहिए। आज इस कार्यक्रम में आकर एक ऐसी शख़्सियत से मिलने का मौका मिला है, जिन्हें हम परदे पर देखते रहे हैं।

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी

गुफ़्तगू के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा सामूहिक प्रयास से हमलोगों ने ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ का आयोजन किया है। इस शहर की साहित्य के रूप में एक ख़ास पहचान रही है, जिसका बार-बार उल्लेख किया जाना चाहिए।

पूर्व अपर महाधिवक्ता क़मरूल हसन सिद्दीकी, अनिल कुमार ‘अन्नू भइया’, पंकज जायसवाल, डॉ. राकेश तूफ़ान, इश्क़ सुल्तानपुरी आदि ने भी लोगों को संबोधित किया। इस मौके पर गुफ़्तगू पत्रिका के नये अंक, डॉ. प्रमिला वर्मा की पुस्तक ‘पत्थर बोल उठे’, डॉ. शबाना रफ़ीक़ की पुस्तक ‘कोरोना तेरे काल में’ और मंजू लता नागेश की पुस्तक ‘यादों का कारवां’ का विमोचन किया गया।कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह तन्हा और धन्यवाद ज्ञापित किया।

  इससे पहले सुबह के सत्र में ‘लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार सुनील शुक्ल और संचालन वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने किया। अजय राय, रविकांत, शिवाशंकर पांडेय, डॉ. एस.एम. अब्बास और डॉ. तारिक़ महमूद ने विचार व्यक्त किए। दोपहर के सत्र में कवि सम्मेलन-मुशायरे का आयोजन किया गया था।

 इस मौके प्रभाशंकर शर्मा, अफ़सर जमाल, अनिल मानव, नीना मोहन श्रीवास्तव, शिवाजी यादव, हकीम रेशादुल इस्लाम, अर्चना जायसवाल, मधुबाला गौतम, संजय सक्सेना, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, सिद्धार्थ पांडेय, डॉ. शबाना रफ़ीक, डॉ. पूनम अग्रवाल, मंजुलता नागेश, डॉ. सोमनाथ शुक्ल आदि मौजूद रहे।


इन्हें मिला अवार्ड


अकबर इलाहाबादी अवार्ड- शबीना अदीब 

अदब नवाज अवार्ड - न्यायमूर्ति अशोक कुमार, आसिफ़ उस्मानी 

डॉ. प्रीतम दास अवार्ड  

डॉ. संदीप कुमार (लखनऊ), डॉ. प्रकाश खेतान (प्रयागराज) 

 

कुलदीप नैयर अवार्ड- 

रामदत्त त्रिपाठी 

रविकांत 

पंकज श्रीवास्तव 

अक्षय चौहान ‘अक्स’


कैलाश गौतम अवार्ड - 

विश्वास दुबे (नीदरलैंड)

जितेंद्र कुमार गंगवार (लखनऊ)

डॉ. प्रदीप मिश्र (सतना)

कुंवर नाजुक (चन्दौली)


सुभद्रा कुमारी चौहान अवार्ड-  

सय्यदा तबस्सुम मंज़ूर (मंुबई)

डॉ. आरती कुमारी (मुजफ्फरपुर, बिहार)

डॉ. कुंकुम गुप्ता (भोपाल)

अर्पणा आर्या (प्रयागराज)

  

सीमा अपराजिता अवार्ड - 

मधूलिका श्रीवास्तव (भोपाल)

नाज़ पुरवाई (अमरावती)

 प्रियंका माथुर (नई दिल्ली)

  शालू सुधीर अवस्थी (भोपाल)


पुष्पिता अवस्थी अवार्ड -

 साँवत राम बैरवा (अजमेर)

  निरुपमा खरे (भोपाल)

   कमलचंद्रा (भोपाल) 

 पूजा गुप्ता (मिर्ज़ापुर)


धीरज अवार्ड - 

ज़किया शेख़ मोहम्मद अमीन (मुंबई)

शकुंतला मित्तल (गुरुग्राम, हरियाणा)

सत्यम भारती (बेगुसराय)

 सुधा श्रीवास्तव (प्रयागराज)


डॉ. सुधाकर पांडेय अवार्ड -

 जनार्दन ज्वाला (मरणोपरांत, ग़ाज़ीपुर), 

मोहन राकेश (दिलदारनगर), 

डॉ. अब्दुल मन्नान (नई दिल्ली), 

डॉ. वसीम रज़ा अंसारी (ग़ाज़ीपुर)


उमेश नारायण शर्मा अवार्ड - 

वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार यादव

 वरिष्ठ अधिवक्ता इमरान उल्लाह

  अधिवक्ता राहुल चौधरी

  अधिवक्ता अनिल कुमार वाजपेयी


मिल्खा सिंह अवार्ड -  

आर. पी. शुक्ल (वालीबाल)

 बिप्लब घोस (फुटबाल)


गुफ़्तगू अवार्ड - 

डॉ. कंचना सक्सेना (जयपुर) 

जगदीश कुमार धुर्वे (इटारसी)

डॉ. शैलेष गुप्त वीर (फतेहरपुर)

 रचना सक्सेना (प्रयागराज) 




प्रयागराज से ही पूर्ण होता है देश का साहित्य: मेयर 

कार्यक्रम के पहले दिन ‘हमारी सांस्कृति विरासत’ पर हुई संगोष्ठी 

 ‘गुफ़्तगू के 24 साल’ नामक स्मारिका का विमोचन करते अतिथि और टीम गुफ़्तगू के सदस्य।

प्रयागराज। हमारे शहर से ही पूरे भारतवर्ष का साहित्य संपूर्ण होता है, बिना प्रयागराज के साहित्य को शामिल किए बिना देश का साहित्य कभी मुकम्मल नहीं हो सकता। निराला, फ़िराक़ महादेवी, अकबर, पंत तो यहां की धरोहर हैं ही, इसके साथ-साथ महत्वपूर्ण यह है कि महर्षि बाल्मीकि ने भी रामचरित मानस की रचना इसी धरती से की थी। इसी परंपरा और ऐतिहास को रेखांकित करने के लिए साहित्यिक संस्था ‘गुफ़्तगू’ ने ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ का आयोजन किया है। इस प्रयास की जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम है। गुफ़्तगू परिवार ने साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया है। यह बात 28 मार्च की शाम आर्य कन्या इंटर कॉलेज में साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू की तरफ़ आयोजित ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ के पहले दिन ‘हमारी सांस्कृति विरासत’ विषय पर मेयर गणेश केसरवानी ने कही। उन्होंने कहा कि शहर की परंपरा और बेहतर ढंग से उल्लेखित करने के लिए नगर निगम की तरफ से ‘साहित्य तीर्थ’ की स्थापना की जा रही है। इस मौके पर पुस्तक ‘गुफ़्तगू के 24 वर्ष’ और ‘ए जनरी ऑफ अचिवमेंट एण्ड एस्पाइरेशन’ का विमोचन किया गया।

गुफ़्तगू के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि हमने प्रयागराज की परंपरा को एक बार फिर से पूरी दुनिया में उल्लेखित करने के लिए ही ‘प्रयागराज लिटरेरी फेस्टिवल’ का आयोजन किया है।

 इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडी सेंटर के कोआर्डिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कहा कि इस शहर का तहज़ीब कण-कण में बसा हुआ है। इस शहर को पत्रकारों, साहित्यकारों, ऋषियों-मुनियों, मौलवियों, चित्रकारों आदि ने मिलकर रचाया और बसाया है। इस शहर की ख़ासियत यहां की अक्कड़ी, फक्कड़ी और मक्कड़ी है, जो देश के किसी भी दूसरे शहर में नहीं मिलती।

 मुख्य अतिथि पूर्व पुलिस महानिरीक्षक लालजी शुक्ल ने कहा कि संस्कार को मूल में रखकर ही सांस्कृतिक विरासत तैयार होती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि अन्य चीज़ों के अलावा यहां की दही-जलेबी भी बहुत मशहूर है, जो कहीं और नहीं मिलती। अनिल कुमार ‘अन्नू’ भइया ने कहा कि गुफ़्तगू के प्रयास की जितनी भी सराहना की जाए कम है। डॉ. कंचन सक्सेना और अजीत शर्मा आकाश ने भी लोगों को संबोधित किया। संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और धन्यवाद ज्ञापन नरेश कुमार महरानी ने किया।


सोमवार, 2 मार्च 2026

 मानवीय संवेदनाओं की कहानियां

                                                                           - डॉ. विशाला शर्मा

     पुष्पिता अवस्थी मूल रूप से कवयित्री है। साथ ही डायरी, यात्रा वृत्तान्त, विविध प्रकार के आलेख, शोध समीक्षाएं सभी आपके लेखनी का हिस्सा रही हैं। साहित्य विधा के धरातल पर प्रत्येक विधा को आपने अपनी कलम से नापा है। टेलीविजन के लिए भी आपका काम करती रही। शिवप्रसाद सिंह, श्रीलाल शुक्ल, विद्यानिवास मिश्र पर श्रंखला बनाने का कार्य भी आपके द्वारा किया गया। विश्व के अधिकतर देशों की यात्राएं आपने की। आपकी पुस्तक ‘आधुनिक हिंदी काव्यालोचना के सौ वर्ष’ बड़ी चर्चित हुई। आपके द्वारा भारतेंदु जी से लेकर नामवर सिंह तक की कविताओं की आलोचना की गई। अपनी उम्र के ग्यारह  वर्ष से ही आपने कविताएं लिखना आरंभ कर दिया और युवा होते-होते युगवाणी में अपनी कविताएं पढ़ने शुरू की। ‘छिन्नमूल’ आपका चर्चित उपन्यास है। जिसमें सुरीनाम के प्रवासी भारतीय परिवारों की जीवन शैली और संस्कृति के साथ-साथ उनके संघर्ष को विस्तृत फलक पर दर्शाया गया है। साहित्य के क्षेत्र में लगभग 90 पुस्तकें पुष्पिता जी की प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही संस्मरण एवं अन्य विधाओं में भी सजग होकर साहित्य लेखन की ओर आप अग्रसर है। आपका कहानी संग्रह गोखरू एवं जन्म कहानी कला क्षेत्र के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। साथ ही छिन्नमूल उपन्यास में प्रवासी साहित्यकार पुष्पिता अवस्थी ने सुरीनाम में रहने वाले गिरमिटिया भारतीयों और उनके वंशजों के संघर्षों का विस्तृत वर्णन किया है। सातवें विश्व सम्मेलन का आपने सफलतापूर्वक संयोजन किया। ‘बचपन बचाओ’ आंदोलन और स्त्री अधिकारों के लिए आप सदैव संघर्षरत रही।

1984 में प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय के साथ उनके इलाहाबाद स्थित आवास पर पुष्पिता अवस्थी

‘गोखरू’ कहानी संकलन में आपकी आठ कहानियां संग्रहित है। सामाजिक सरोकारों को लेकर लिखी गई यह कहानियां अपने निम्न वर्ग कि त्रासदी के बीच जन्में पात्रों की सच्ची बयानी है। ‘उघन्नी’ कहानी में निम्न वर्ग का पात्र रामदिन पाठक के मन में अपनी जगह बना लेता है। वह चन्ना, मूंगफली, मटर रेत में भूनकर अपनी जीविका चलाता है। अपने पिता की हत्या से हुई मौत ने उसे हमेशा के लिए सतर्वहृ बना दिय गया था। ‘‘अब वह जागते हुए भी सोता था क्योंकि चुप रहता था और सोते हुए भी जागता था क्योंकि अपने पिता की हत्या से हुई मौत देखी है। पिता की मौत ने उसे हमेशा के लिए जगा दिया है। मां की चीख ने आंखें खोल दी है। उसकी हथेली में मुलायम सपने की जगह दियासलाई की डिबिया रखी हुई है जिससे वह रोज अपने भड़भूजे की अँगीठी सुलगाता है। दाने भूंजता है - इसके साथ-साथ कहीं-न-कहीं वह अपने पिता के हत्यारों को भी इसी तरह भूनने की कल्पना करता है।’’ अर्थात, प्रतिशोध की अग्नि से वह जल रहा है लेकिन बेबस है समय ने उसे उम्र के पहले ही प्रौढ़ बना दिया है उसकी छोटी-सी दुनिया में उसकी जीवन का आधार एक मात्र उसकी मां है और उसकी छोटी-सी कोठरी जिसमें वह रहता है वहां उसे सर्वाधिक सुरक्षा का मानसिक आधार मिलता है। ‘‘वय में किशोर रामदीन अपने धन्धे में कुशल और प्रौढ़ है... समय से पहले ही छोटे हाथ अनुभवी हाथों में तब्दील हो गए है। एकाएक वह मुलायम से मजबूत हो गए है, मजदूरी की रगड़ से। बोलता कम था शायद इसलिए भी कि अनुभव का संसार छोटा था। उसकी दुनिया में माँ और माँ की कोठरी थी दृ कोख-सी छोटी और सुरक्षित।’’ 

 इसी कहानी में निम्न वर्ग का दूसरा पात्र किशन है। रामदीन की दुकान पर किशन का रोज का आना जान है अपनी पिता की हत्या की सारी घटना वह किशन को बतलाता है किशन के परिवार में उसकी एक सीधी-साधी मां है। अपनी मां की याद आने के बाद ‘‘किशन सोचता है इस दुनिया में अगर कुछ बचा है और बचा रहेगा तो मां और मां का घर...। सन्तान के कोख के बाहर आने पर भी मां अपनी औलाद की वैसे ही सुरक्षा करती है। रक्षा-कवच होती है मां। अनाथ अकेली होने के बावजूद। दुआओं का घर होती है मां...। और सच। अपनी मनौतियों से निर्जला उपवासों से बचाती रहती है- वह सब कुछ अपनी कोशिश पर।’’ किन्तु परिस्थितियां व्यक्ति को समय के पहले समझदार बना देती है। किशन अब रामदीन की चूप्पी का दर्दनाक कारण जान गया था। अपनी दुकान पर रखी अंगीठी की आँच में वह अपनी जिंदगी सेंक रहा है उसके कान में एक संदूक के चाभी का छल्ला हमेशा लटकता रहता है। और वह रामदीन की पहचान बनाने का अनुठा तरीका है। बिना विज्ञापन के वह अपनी दुकान की पहचान खुद बना लेता है। ‘‘भईयाजी है, कान पर टँगल चाभी का छल्ला हमार पहचान बा। नाही तौ... ई भारी चम्मक-दम्मकवाले सहर मा कहां हमार बोर्ड... और का हमार पहचान। सुनकर किशन की आंखंे चमक उठी बच्चे की उजली चमक से सरोबार।’’

 किशन टेम्पो से अपनी नोकरी की जगह पर पहुंचता था वह देखता है टेम्पो भरने का काम अर्थात संवारी जुटाना और चिल्ला-चिल्लाकर संवारी को बुलवाना लोगों की झिडकियां सुनाना हाई-वे रास्ते पर तेज रफ्तार में दौंडे हुए टेम्पो में लोहे के हैंडल को पकड़कर अपनी जीवन की दोर को बचाने का काम कम उम्र के बच्चे किया करते है। लेखिका इन कहानी में उन बाल मजदूरों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करती है गरीबी इन बालमजूदरों को नाजुक नहीं बने रहने देती है। रामदीन जैसे लोगों या फिर इन टेम्पो पर काम करनेवाले बालमजदूर गांव से पैसे कमाने आए किशन जैसे पात्र जीवन की त्रासदी के बीच सदी की कहानियों के सच्चे पात्र हैं। जो अपने जीवन में अपनी संवेदना को दिखाकर करुणा की भीख  नहीं मांगले अपितु इस जगत् की निष्ठुरता को चुपचाप सहते है, निम्नवर्ग की दशा कहानी ‘प्रातः तव द्वार पर’ कहानी में लयलीना मृत्यु के रु-ब-रु नहीं होना चाहती थी। अपनी कुसुम गुरुजी की हत्या और उनके दाह संस्कार की रस्मों ने मौत के प्रति एक खौफनाक दर्द पैदा कर दिया था। किन्तु पेट की भूख व्यक्ति को कितना लाचार बनाती है इसका वर्णन स्मशान घाट पर होनवाली कुछेक घटना जब लयलीना के समक्ष सवाल बनकर उपस्थित होती है कि लोग शव की अधबुझी लकड़ियों को चुराते हुए उठाकर गंगा में बुझकर बटोर ले जाते हैं रात के चूल्हे के ईंधन के लिए। पेट की रोटी के लिए। मौत से चुराए हुए चइलों से सिंकती हुई रोटी को देखकर वह कई बार सिहर चुकी है कि जिंदगी अपनी भूख मिटाने के लिए कितने जीवन विरोधी खौफनाक काम करवाती है।’ 

 इस कहानी में दहला देने वाली खौफनाक मौत का सामना लयलीना करती है। जिस भांजी को कुसुम गुरुजी पढ़ा-लिखाकर अपने पाँव पर खड़ा करती है वही उनकी हत्या कर देती है पैसा और सारी जायजाद पाना उसका उद्देश्य होता है। कुसुम के मृत्य अंगुठे से कंचन मकान के कागजात पर निशान लगवा लेती है। समाज में ऐसी घटनाएं घटित होती है तब हमारे सम्मुख यह प्रश्न उपस्थित होता है कि पैसों के लिए मानवीय संवेदनाएं हमेशा के लिए खत्म होती है ऐसे ही प्रवासी बेटे और मां के संबंधों की कहानी ‘गोखरू’ है। बुढ़ापे में भी अपनी मान-सम्मान की रक्षा करनेवाले बुजुर्ग भारत में रहते है। ऐसे ही पात्र बुढ़ी नानी है। अपने बेटे और बहु के द्वारा नानी को अपशब्द कहने पर गांव छोड़ देती है। इस कहानी में गोखरू नानी के पैरों में पड़नेवाली दर्दनाक गाठे है। जो जीवनभर कैटस की तरह चुभते रहते है लेकिन उसकी आत्मा में उग आए गोखरू के दर्द को उसने कभी नहीं लोगों के सामने खोला अपना घर द्वार छोड़कर अपनी बेटी के सूसराल में आकर रहने का दर्द कादंबरी महसूस करती है। जब बुढ़ी नानी के मौत की चिठ्ठी उसके हाथ लगती है ऐसे ही दर्दनाक गोखरू आज उसके मन में टीस पैदा कर रहे है। जब उसका बेटा प्रताप कादंबरी को विदेश से खबर देता है कि उसने अपने लिए लडकी पसंद की है। उसे अपने पत्नी निशांत कि याद आती है। जो उसे इस दुनिया में अकेला छोड़कर चले गए है। ‘‘प्रताप की एकसाल की पढ़ाई बाकी थी कि उसके पिता का एक एक्सीडेंट में निधन हो गया। उनके जीवन बीमे के पैसे से प्रताप को पढ़ाया-लिखाया। पिता की मृत्यु से प्राप्त हुए धन से पुत्र की पढ़ाई हुई। अपने पिता की कब्र पर उगा हुआ पेड़ है प्रताप जिसकी न छाया नसीब है कादम्बरी को, न फल। अपने हालात के बारे में सोचती है तो छाती धक से रह जाती है।’’ 


 ‘देहिया’ कहानी उम्र और शरीर से जुड़ी देह की कहानी है। अपने बहु बेटे का रास्ता देखती बुढ़ी मां, बहु सावित्री और बेटे आनंद के आने के बाद अपने सारे दुःख दर्द उन्हें बताकर बांटना चाहती है अपने मजबुरी के रहते सावित्री और आनंद को नीदरलैंड में माँ को वृद्धाश्रम में रखना पड़ता है। जहां विदेशी वृद्ध ओल्ड हाऊस में टेलिव्हिजन के सामने बैठकर और एक-दूसरे से संवाद कर अपने दिन गुजार रहे है, भारतीय वृद्ध अपने बच्चों का आने का इंतजार में टकटकी लगाए होते है। वृद्धों की छोटी छोटी जरुरत अपने परिवार के लोग ही पूरी कर सकते है। जिससे उन्हें सुख भी मिलता है बुजुर्ग अपने अतीत की मीठी यादों में वर्तमान के दुःख को भूलना चाहते है पर अतीत के पन्नों को खोलने के लिए उनके समक्ष अपना कोई नहीं होता। आनंद की मां अपनी बहु से कई उम्मीदें रखती है। सावित्री जब घर जाने के लिए मां से अलग होती है तो वह ‘‘मां के सामने वह आंसू नहीं पोछती है क्योंकि इससे मां को पता लग जायेगा कि वह रो रही है... वह सोचती है कि मां की धुंधली आंखों को आंसू नहीं दिखाई देंगे। जबकि सावित्री का यह सिर्पहृ भ्रम भर है। मां की भीतरिया आंखों को सब कुछ साफ-साफ दिखाई देता है। क्योंकि अनुभव की आंखें कभी बुढ़ी नहीं होती हैं..। बल्कि यूं देखा जाये कि जैसे-जैसे अनुभव की आंखों की उम्र बढ़ती है उन्हें साफ और इतना अधिक साफ दिखाई देने लगता है कि वे रक्त की पहचान करने लगती है। उनकी कांपती हथेलियों के स्पर्श में खून की तासीर बोलने लगती है। यहां तक कि वे भविष्य भी देखने लगती है।’’ 

 ‘जन्म’ कहानी की हनिका और सोफिया बिना पिता के बच्चों को पाकर भी खुश है। कामकाजी महिला होते हुए अपने बच्चों को बड़े प्यार से पालती है। सोफिया कहती है, ‘‘मैं तो इस बात से खुश हूं और ईश्वर को धन्यावाद देती हूँ कि इस उम्र में भी मेरे अपने पैदा किए हुए दो बच्चें है, मुझे कम-से-कम अकेलापन और जिंदगी काटने के लिए कुत्ता, बिल्ली तो नहीं पालने पड़ेगे और मेरी माँ पिताजी के साथ-साथ विशेषकर मेरी दादी बहुत खुश है। वे कहती हैं कि ‘‘जब तुम्हारे पास काम अधिक हुआ करे और वीकेन्ड में समय हो तो बच्चे हमारे पास छोड़ दिया करना। हम लोग देखभाल कर लेंगे। ईश्वर को धन्यावाद दो कि उसने तुम्हें दो खूबसूरत बच्चे दियें है।’’

 इस बात में सच्चाई है कि मानवतावाद और इन्सानियत मौत से साक्षात्कार होने के बाद ही जन्म ले लेते है। सुरीनाम देश की राजधानी पारामरिबो का तीन सौ साल पुराना अस्पताल जिसमें रिया अपने ऑपरेशन के लिए भरती हुई है। ‘ए’ क्लास के कमरे में ‘‘रिया को लग रहा था- अस्पताल के बाहर का आदमी रुपया... मकान, औरत और माया के बारे में सोचता है। लेकिन अस्पताल में भर्ती हुआ आदमी सिर्पहृ जिंदगी और इंसानियत के बारे में सोचता है। सबकी भलई के लिए वह एक बार फिर से जी लेना चाहता है। किसी तरह बच जान चाहता है। रह-रहकर ईश्वर से प्रार्थना करता है और दुआएं मांगता है।’’ 

 उसी अस्पताल में पीनास नर्स सभी मरिजों की हृदय से ठीक होने की कामना करती है। अपनी करुणा, प्रेम और दया भाव के साथ मानवतावाद में उनका विश्वास है। जब रिया कुछ नहीं खाती तो वह खुद के पैसे से फ्रूट ज्यूस के दो बोतले लेकर आती है। जब रिया बिस्तर से नीचे गिर जाती है दर्द के कारण वह कॉलबेल बजाती है अपनी ड्यूटी पर रहनेवाली एक अन्य नर्स उसके कॉलबेल बजाने पर आकर डॉटती और फटकारती है पीनास और डांटनेवाली नर्स के व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर था। पिनास जब अपने ड्यूटी पर आती है उसे जब पता चलता है तब वह रिया से कहती है, ‘‘मैडम, वी मस्ट प्रे... भगवान से हम लोगों ऐसे लोगों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए कि वे दूसरों को दुःख पहुंचाने वाले कठोर हृदय को बदल दें और उनके निर्दयी अत्याचारों के लिए उन्हें क्षमा करें। जिससे वह निर्बल... सरल लोगों को दुःख पहुंचाना छोड़ दें। उन्हें नहीं मालूम कि, असहाय्य और जरुरतमंदों को दुःख पहुँचाना ईश्वर को दुःख पहुंचाना है और ईश्वर को पहुंचा हुआ दुःख पलटकर दुःख देनेवाले तक पहुंचता है- देर-सबेर ही सही।’’ 

 सामाजिक सरोकारों की चर्चा करे तो बाजार, औद्योगिकीकरण, बढ़ता उपभोक्तावाद और महंगाई के दुश्चक्र में फंसा आम आदमी का चित्रण ‘रिया’ कहानी के द्वारा हमारे समक्ष आता है। मार्क कहता है, ‘‘महंगाई और उपभोग की चाहतों ने आदमी को किस तरह से पागल बना दिया है। जिनके पास इस महंगाई से लड़ने के लिए नौकरी नहीं है और न ही कोई खिलाने-पिलाने वाला तो वे लोग राह चलते लोगों के सामान... और पर्स छीनते है...’’

 ‘उपस्थिति’ कहानी की मां अपने पति के चले जाने के बाद हरपल उनकी कमी को महसूस करती है। अपनी कर्मठ, मां के जीवन के बारे में जब नताशा सोचती है मां का जीवन उसे खुली किताब की तरह ऩजर आता है। ‘‘मां, जीवनभर बप्पा की गृहस्थी तथा खेत-खलिहान में बैल की तरह जुती रही। घर की चक्की पीसते हुए, नौ-नौ बच्चे पाल-पोसकर बड़े किये। छब्बीस गायों का गौशाला संभाला तो चालीस मुर्गी का दइबा भी देखा-भाला। घर के आगे-पीछे की जमीन में तरकारी बोने और तोड़ने में जुती रहती थी जिसे अपने जीवन में प्यार को महसूस करने का समय ही नहीं मिला। जब बच्चे बड़े हुए तो बप्पा बुढ़ा गये। एक ओर अपनी बीमारी से और दूसरी ओर, बच्चों के विश्वासघात से बप्पा ऐसे टूट गये कि रोज-रोज की अपनी इस दर्दनाक घुटन को भी सहने में असमर्थ हो गये थे। हर क्षण मृत्यु से भी भयानक पीड़ा को झेलने से अच्छा है मर जाना। ...और जब यह मर जान सहज नहीं होता है तभी लोग अपने को मार लेते हैं और बप्पा ने भी लोग अपने को मार लिया था। बगैर माँ का पूछे-बताये। मां को जैसे वे और बातें बताना जरुरी नहीं समझते थे वैसे ही इसे बावजूद मां हमेशा बप्पा के साथ रहीं। आज भी सोते-जागते उनकी ही जरुरतों के साथ हैं।’’ 

 ‘अधर्म’ कहानी में गायत्री समाज में उपस्थिति धर्म के प्रश्नों ने आहत होकर विश्व में जिस ‘रिलिजन’ शब्द ने चिंता पैदा की है उस रिलीजन की किताब को खरीदकर अॅम्बेसडर की फेयरवेल पार्टी में देना चाहती है। पुष्पगुच्छ देने की अपेक्षा किताब देना बहुत ज्यादा उपयुक्त समझती है। ‘‘गायत्री ने सोचा रिलिजन की किताब खरीदना बेहतर होगा? रिलिजन को लेकर पूरे विश्व में चिंतक पैदा हो गये है। किताबों की दुनिया में उन्होंने अपनी अच्छी मार्वेहृट बनाई है। कुछ आधुनिक दिमाग के गुरु बने बैठे हुए हैं।’’

आज गायत्री राजदूत के विदाई समारोह में शामिल हुई है एक प्रवासी भारतीय होने के नाते वह जानती है कि ‘‘भारतीय दूतावास में प्रवासी भारतीय और भारतवंशियों को कोई महत्व नहीं मिलता है। सामान्य कागजों पर हस्ताक्षर के लिए उन्हें महिनों दौड़ना पड़ता है जैसे भारतीय अधिकारियों को अपने देश के नागरिकों को दौड़ाने और चक्कर लगवाने की आदत पड़ जाती है वैसा ही सलूक वे विदेश के भारतीय नागरिकों के साथ करते हैं। पर वे अपना यह दर्द किससे कहें आखिर भारत सरकार के ये ही तो सुनाई करने वाले नियुक्त अधिकारी हैं। जबकि नीदरलैंड के सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों में एक फोन-कॉल पर अपाइंटमेंट मिल जाता है।’’

 अतः भारतीय होने का दंभ भरनेवाले लोग अपने ही लोगों से आहत होते है जबकि जिस देश में वे प्रवास कर जीविका चलने के लिए गए है वहाँ के लोग उनके साथ आत्मियता के साथ व्यवहार करते है वैसे ही अपने देश के प्रति सम्मान का भाव मन से निकल जाता है कारण सिर्पहृ एक ही होता है। उस विदेशी धरती पर अपने ही लोगों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के कारण उनकी सोच अपने देश के कारण बदल गई है। वही ‘विन्टरकोनिंग’ कहानी में अपने ही बच्चों से आहत  माताजी के जवीन की घुटन है और वह मां है अब वह ओल्ड हाऊस में रहती है। इस मां के जीवन की कहानी बिल्कुल अलग है आज युरापीय वृद्धाश्रम का उबला हुआ खाना मां को नहीं भाता जहां पांचवी मंजिल से झांक कर हमेशा शेखर और शिला के आने का रास्ता देखती है इस अनपढ़ मां ने। पति से प्यार करने और वैवाहिक जीवन का सुख जीवना चाहता तो पैंतालीस वर्ष की उम्र तक के बीच दस बच्चे पैदा करने में बीत गये। सब बन गये जब, तब अपना-अपना सबने घर बसा लिया और कुछ ऐसे बसा लिया कि मां-बाप के लिए किसी के पास न जगह बची और न ही समय बचा। पिता बच्चों के प्यार के अभाव की अनुभूति में टूट गये। अपने बड़े लड़के की बातें न सुनीं। धीरे-धीरे परिवार में दरारे पड़ती गयीं और परिवार बिखर गया। इस टूटन से पिता टूट गये। आस्थावान पिता अपनी प्रार्थना में ईश्वर से हाथ जोड़कर... हाथ उठाकर यही मांगते है... हे प्रभू... अब की बार मनुष्य जन्म मत देना। मानव बनने में बड़ा दुख है। जीना कठिन है। ऐसे ही कठिन जीवन से थककर एक शाम मां को छोड़कर चले गये। अंतिम समय माँ से यही कहा था कि अपने पन्द्रह बरस की उम्र से तुम हमारी साथी रही हो...। तुमने मेरा सबसे ज्यादा साथ दिया है...। तुमसे मुझे कोई दुःख नहीं पहुंचा है...। लेकिन... अब हम जाते हैं। जीना कठिन है...। और ... और... वह बैठक में लरजकर गिर गये। लडखडाते हुए उनके गिरने से पैंट की जेब से एक छोटी-सी शीशी गिरी। 

  भारतीय नारी के जीवन की त्रासदी को समाज के समक्ष लाने का कार्य साहित्य के द्वारा किया गया। प्रवासी साहित्य में कई ऐसे स्त्री पात्र हमारे समक्ष आते है जो पुरुषीय मानसिकता के शिकार है। पुष्पिता जी अपने गोखरू कहानी में तीन पीढ़ियों की महिलाओं का चित्रण करती है। जो एक ही परिवार से है। कादम्बरी, उसकी मां और मां की नानी जिसे सभी बुढ़ी नानी कहते थे। बुढ़ी नानी विचारों से बहुत आगे की सोच रखती है। उन्होंने अपने जीवन में कभी घूंघट नहीं निकाला, परंतु अपने बहु और बेटे के व्यवहार से आहत होकर वह अपने बेटी के यहां रहने चली जाती है। कादम्बरी अपनी पति के मृत्यु के बाद अपने इकलौते पुत्र को पढ़ा लिखाकर विदेश भेजती है। और वहीं बेटा मां को फोन पर सूचना देता है कि उसने अपने लिए लडकी ढूंढ ली है। मां के आग्रह के पश्चात भी वह कभी मां को खत नहीं लिख पाता। अपने पुत्र की इच्छाओं के आगे उसने अपने जीवन का बलिदान कर दिया। अपना घर बेचकर सारा पैसा आनेवाली बहु और बेटे के लिए जमा करती रही। वह पुत्र को पाल रही थी जिससे प्रताप वहां अपने मनोकुल नौकरी पा सके। पुत्र की जरुरत पूरी करने के लिए कादम्बरी अपनी जरुरत कम-से-कम करती गई। उसका बस चलता तो पेट एक कोर का कर लेती और देह एक हाथ की। कादम्बरी ने अपने खर्चे को पूरा करने के लिए एक स्वूहृल में नौकरी कर ली थी।’’ 


‘ठंडे बस्तें पिघलता लावा’ में सुधा प्रथम दर्जे की अफसर है। वह उच्च पदस्थ कमिशनर रेंज की अधिकार के साथ साथ एक साहसी महिला भी है। कई तरह के दबाव के चलते भी वह अटल रहकर वह अपनी ड्यूटी निभाती रही। इतनी सशक्त महिला की जब हत्या हो जाती है तो कार्यालय के अधिकारी उसकी मौत का कारण चरित्रहीन होना घोषित करते है। उसके केस की फाईलें भी गायब कर दी जाती है। वही पुष्पिता जी की ‘कंचा’ कहानी में हेमा जैसी स्वतंत्र किन्तु आत्मविश्वासी लडकियों को भी समाज गलत नजरियें से देखता है। अपने पिता के उम्र के  श्रीनाथ जी के साथ जब वह मकान ढूंढने जाते है तो लोग उसे गलत नजर से देखते है। जिससे हेमा के वजूद को चोट लगती है। किन्तु अपनी वाणी में संयम रखते हुए वह प्रत्युत्तर देती है। हेमा जैसे पात्र निडर होकर जीने का साहस पैदा करते है। वही विधवा स्त्रियों की दशा पर भी ‘कजरोटा’ कहानी में प्रकाश डाला गया है।

 ‘इनीका’ कहानी में इनीका के मां को जब उसके पिता तलाक देकर चले जाते है, तो इनीका के संवेदनशील मन में अपने मां और नानी के दुःख और दर्द धरोहर के रूप में इकट्ठा हो जाते है। इस तरह पुष्पिता जी के कहानी में शोषण, अमानवीयता, अन्याय-अत्याचार के खिलाफ खुला प्रतिवाद भी है। उनके नारी पात्र आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन जीना चाहते है। नौकरीपेशा महिला, घरेलू महिला, बुर्जूग महिला, युवा महिला सभी वर्ग और आयु की महिला पात्र मानविय भावनाओं और विचारों के साथ आपके कथासाहित्य का हिस्सा है।

निष्कर्ष - साथ ही अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय नारी का शोषण अन्याय, अत्याचार और उसका खुला प्रतिवाद भी नजर आता है। मानवतावाद, करुणा, प्रेम भी उनकी कहानियों का हिस्सा है। तो रोजगार की तलाश में निम्न वर्ग की दयनीय स्थिति में जीवन जीनेवाले रामदीन और किशन की पीड़ा भी है। समग्रता से मानवीय जीवन का संवेदनात्मक आख्यान उनकी कहानियों में परिलक्षित होता है। उनकी कहानियों में विचारों के उलझाव और जटिलता नहीं है। किन्तु विभिन्न सामाजिक प्रश्नों पर प्रश्न चिह्न लगाती हुई उनकी कहानियां में सार्थक अभिव्यक्ति है।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित )


गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

पुष्पिता अवस्थी होना आसान नहीं

                                                           - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

   पुष्पिता अवस्थी हमारे दौर की ऐसी शख़्सियत हैं, जिनका पूरा-पूरा आंकलन एक लेख में करना असंभव है। इन्होंने सिर्फ़ एक ही विधा में काम नहीं किया। कविता, उपन्यास, कहानी समेत कई विधाओं में काम किया है। काम भी कोई ऐसा-वैसा नहीं। प्रत्येक विधा पर समुंदर में उतरकर उसकी पूरी गहराई ठीक-ठीक नाप लेने जैसा कार्य किया है। आम तौर पर कोई लेखक एक ही विधा में अधिक गहराई तक उतरकर काम कर पाता है, लेकिन उन्होंने प्रत्येक विधा में उल्लेखनीय कार्य किया है। इनके कार्य को देखकर अत्यधिक आश्चर्य और हैरानी होती है। ऐसे लोग पूरे लेखक समाज के लिए सही मायने में प्रेरणास्रोत होते हैं।


 अगर इनकी कविताओं की बात करें तो इनमें अनेक देशों, द्वीपों, पहाड़ों, नदियों, महासागरों, आदिवासी जातियों की स्मृति जिनमें कैरेबियाई द्वीप, आस्ट्रिया का नाउदर गांव, रोम के भव्य भवन, आल्प्स की कोमल झील, सेंटलूशिया, अटलांटिक और हिंद महासागर के साथ और जाने क्या-क्या समाहित है। इतनी सारी चीज़ों को देखना-परखना और फिर उन अपनी अभिव्यक्ति ज़ाहिर करना वाक़ई हैरतअंगेज़ है। इसी तरह इनके उपन्यास के विषय-वस्तु और उनका उल्लेख हैरान कर देता है। जब पुष्पिता अवस्थी पर लिखने बैठिए तो समझ में ही नहीं आता कि आखिर किस विषय और बिंदु उठाया जाए।

उनके व्यक्तित्व की बात करें तो वे कवयित्री हैं, कवि हैं, अनुवादक, कहानीकार, कुशल संगठनकर्ता और हिंदी की विश्वदूत तो हैं ही। इसके साथ ग़ज़ब की फुटबाल प्रेमी भी हैं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ। पढ़ाई राजघाट, वाराणसी के प्रतिष्टित जे.कृष्णमूर्ति फाउंडेशन (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संबद्ध) में हुई। वर्ष 1984 से 2001 तक जे. कृष्णमूर्ति फाउंडेशन के वसंत कॉलेज फ़ॉर विमैन के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष भी रहीं। भारतीय दूतावास एवं भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र, पारामारियो, सूरीनाम में प्रथम सचिव एवं हिंदी प्रोफ़ेसर के रूप में सन् 2001 से 2005 तक कार्य किया। सन् 2003 में इन्होंने सूरीनाम में सातवां विश्व हिंदी सम्मेलन कराया। इस आयोजन की आजतक मिसाल दी जाती है।

 सन् 2006 से नीदरलैंड स्थित ‘हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन’ की निदेशक हैं। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ और स्त्री अधिकारों के लिए भी लगातार लड़ती रही हैं, जूझती रही हैं, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। अपने सूरीनाम प्रवास के दौरान इन्होंनेएक हिंदी प्रेमी समुदाय संगठित किया, जिसकी परिणति उनके द्वारा अनूदित और संपादित समकालीन सूरीनामी लेखन के दो संग्रहों ‘कविता सूरीनाम’और ‘कहानी सूरीनाम’ का प्रकाशन हुआ। वर्ष 2003 में ही राजकमल प्रकाशन से मोनोग्राफ़ ‘सूरीनाम’ भी प्रकाशित हुआ। इनके कविता संग्रहों ‘शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएं’, ‘अक्षत’, ‘ईश्वराशीष’ और ‘हृदय की हथेली’ और कहानी संग्रह ‘गोखरू’ समेत लगभग सभी पुस्तकों को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया है। 

लीलाधर मंडलोई कहते हैं-‘‘पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निवार्सित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं। जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़, बिहार झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों यथा-सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। डॉ. अवस्थी पर इन्हीं पर दशकों तक काम किया है। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इनमें प्रवासी भारतीय के इलाकों की भी छवियां हैं। भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है।’’

जावेद अख़्तर के साथ पुष्पिता अवस्थी 

पुष्पिता अवस्थी लगभग दो दशकों से विदेश में हिंदी साहित्य, भाषा, संस्कृति के प्रचार -प्रसार  में संलग्न हैं। कविता, कहानी, निबंध, आलोचना, मोनोग्राफ व हिंदी शिक्षण, जीवनी इत्यादि की हिंदी, डच, अंग्रेजी व बांग्ला आदि भाषाओं की लगभग 90 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। विदेश में उनके प्रकाशित  साहित्य एवं कृतित्व से हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए किए गए बहुविध कार्य उन्हें ‘हिंदी की विश्वदूत’ के रूप में एक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।

 डॉ. अवस्थी सिर्फ़ साहित्य तक ही सीमित नहीं हैं। फुटबाल के प्रति भी इनकी दीवानगी चरम पर रही है। नीदरलैंड के आयक्स फुटबॉल क्लब (18 मार्च 1900 से स्थापित) के बिजनेस क्लब की वरिष्ठ सदस्य हैं और इतनी व्यस्तताओं के बावजूद दस वर्षों से राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साप्ताहिक फुटबॉल मैच नियमित रूप से देखती आ रही हैं। खुद उनका कहना है कि ‘‘मुझे यह खेल इसलिए पसंद है क्योंकि इस खेल में दोनों टीम का हर खिलाड़ी अंतिम क्षण तक हार नहीं मानता है और आखिरी सांस तक गोल करने के लिए प्राण-प्रण से लगा रहता है। गिरता है, पड़ता है, धक्के खाता है, चोटिल होता है फिर भी रुकता नहीं है, उसकी आंखें फुटबाल और गोल पर ही लगी रहती हैं।“

कुल मिलाकर पुष्पिता अवस्थी का होना हमारे देश और समाज के लिए बहुत ही ख़ास है। इन्होंने अपने पूरे जीवन के एक-एक क्षण का सदुपयोग किया है। ऐसी शख़्सियत हमेशा ही सबके लिए प्रेरणादयक होती है। बिना किसी संकोच के हम कह सकते हैं कि पुष्पिता अवस्थी होना आसान नहीं है।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

 पुष्पिता अवस्थी की कहानियों में सांस्कृतिक गरिमा

                                                                  - डॉ. सरोज सिंह

   प्रो. पुष्पिता अवस्थी का कथा साहित्य मनुष्यता की पहचान का साहित्य है। पुष्पिता जी विश्व के भारतवासियों और प्रवासी भारतीय साहित्य की प्रखर उद्घोषिका हैं। वह निरंतर विश्व के अमर इंडिया और भारत के आदिवासियों के जीवन की समानधर्मिता पर अध्ययनरत रही हैं। इनकी समकालीन कहानी कहीं पर संवेदना बचा रही है, तो कहीं उसे कुंद भी बना रही है। वैचारिकता के निकट आ रही है, भावनात्मकता के परे होकर पाठकों से दूर होती जा रही है। कहीं उलझे हुए यथार्थ को पकड़ रही है। प्रयोगशील होने के साथ भाषिक रूप समृद्ध हुई है। कहानी जब समय की रवानी से मिलती है, तो ज़िन्दगी बनकर खिलती हैै। पुष्पिता अवस्थी की कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा ही महसूस होता है। ‘कंत्राकी बागान और अन्य कहानियां’ कहानी संग्रह लेखिका पुष्पिता अवस्थी द्वारा 1987 से लेकर 2017 तक लिखी गई कहानियों का संकलन है। जिसमें तीन दशकों का इतिहास है। इन कहानियों के भारत से यूरोप होते हुए कैरेबियाई देशों की सौंधी-सौंधी सुगंध, प्रकृति, नैसार्गिक सुषमा और संस्कृत अस्मिता दृष्टिगोरचार होती है। लेखिका स्वयं कहती है कि इन कहानियों में पृथ्वी के तीन महाद्वीपों की कथाएं, बल्कि मनुष्य के मनमानष के तीनों की चिंताएं भी वर्णित हैं।

 प्रो. पुष्पिता अवस्थी

कंट्रॉक्ट का अपभ्रंश रूप कंत्राकी है। कहानी संग्रह का इसी नाम से शीर्षक ही रोचकता और जिज्ञासा जगृत करता है। जो कथा तत्व की विशेषता है। विश्व के पूर्वी देशों में क्लोनाइजरों द्वारा एग्रीमेंट के तहत हिन्दुस्तानियों को सूरीनाम, ब्रिटिश गयाना, फ्रेंच गयाना, ट्रिनिडाड ट्बैको और अन्य कैरेबियाई देश-द्वीपों में ले जाया गया, उन्हें आधार बनाकर कहानी-संग्रह की विश्व वस्तु को पिरोया गया हैै। पुष्पिता जी के इस कहानी संग्रह में ‘गोखरू’ शीर्षक अंतर्गत नौ कहानियां, जन्म के अंतर्गत आठ कहानियां और कंत्राकी बगान के अंतर्गत सात कहानियां हैं। तीन शीर्षक ही नहीं, तीन दशकों का पूरा परिवेश और घटनाओं का संयाजन कहानी संग्रह का मर्म यह स्पष्ट करता है कि संपूर्ण विश्व संस्कृति की अस्मिता एक ही है। संस्कृतियों के विविधता के बावजूद मनुष्यता कायम है। उधन्नी कहानी मंें वे लिखती हैं-‘ बच्चे का भाग्य मां और उसकी कोख नहीं, जन्मभूमि-जन्मभूमि सुनिश्चित करती है।’ प्रेम का स्वरूप और प्रवाह भी सवत्र विद्यामान है। हर संस्कृति और देश मेे समस्त प्राणी इससे प्रभावित होते हैं। ‘प्रातः तब द्वार पर’ कहानी में यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। ‘इसीलिए तो प्रेम से जीना चाहिए और प्रेम को हासिल करना चाहिए। प्रेम का सुख अगर देखा जाए तो जीवन का ही सुख नहीं है, मृत्यु पर विजय की घोषणा भी है।’

 ‘कंत्राकी बगान और अन्य कहानियां’ कहानी संग्रह की अनेक कहानियां नारी हृदय की मनोभावनाओं का बडा ही सटीक और सजीव अंकन करती है। घरेलू महिला हो अधिकारी, पढ़ी-लिखी हो अनपढ़, विवाहित हो या अविवाहिता, नवयुवती हो प्रौढ़, सभी स्थितियों को रेखांकन इनकी कहानियों में सजहता से दृष्टिगोचर होता है। ‘गोखरू’ केवल पांव में तलवे की छोटी-छोटी गांठे ही नहीं होती, बल्कि आत्मा में व्यथा और पीड़ा से उग आए गोखरू भी होते हैं, जिनसे घाव रिसता रहता है। ‘गोखरू’ कहानी में विलायत में पढ़ने वाला बेटा स्वत: अपना विवाह भी तय कर लेता है। मां ने कितने जतन करके पढ़ने भेजा। पिता की रही-सही पूंजी उस पर लुटा दी, किन्तु बेटे को मां की बेबसी, पीड़ा और बेचारगी महसूस ही नहीं होती। कहानी का प्रमुख पात्र कादम्बरी सोचती है-‘मुहताज है तो सिर्फ़ मां, लेकिन उसकी तड़प भरी ज़रूरत बेटे तक पहुंचे तब न ? घर देश से क्या दूर हो जाते हैं। लड़के बच्चे मां की छाती से भी दूर जा छिटकते हैं। मां ेकी छाती का सुनापन वे क्या जाने, ठठाता सागर कहीं द्वीप का सन्नाटा समझ पाता है। कलेजे के टुकड़े-सी संतान के दूर निकल जाने पर खोखल हो जाती है मां की छाती।’


 पुष्पिता जी बहुत ही संवदेनशील कथाकार हैं। ‘ठंडे बस्ते में पिघलता लावा’ कहानी में सुधा और कावेरी के माध्यम से उन्होंने स्त्री मन की उत्पीड़न एवं सराक्त दोनों चेतना के माध्यम उसके अंर्तमन और सामजित निर्मिति को भी सहजता से व्यक्त किया है। इस कहानी में सुधा उच्च पदस्थ  सरकारी अधिकारी हैं, उसने कभी भी स़्त्री होने का लाभ नहीं लिया। किंतु उसकी मृत्यु के उपरांत उस पर तमाम लांछन लगाए जाते हैं। मौत का कारण भी ‘स्त्री होना’ घोषित होता है, तो उसकी मित्र कावेरी को बहुत दुख होता है। सुधा की बातें उसे व्यथित करती है। पारिवारिक जीवन की विफलता, सरकारी नौकरी की सफलता के बीच भी नारी की नियति उसे हमेशा परेशान किए रहती है। आधुनिक समय में मनुष्य झंझावतों से जूझता जा रहा है। उन सभी का अंकन कहानियों में दृष्टिगोचार होता है। ‘कजरोटा’ जैसे लुप्त प्रायः तत्व और शब्द को लेकर लिखी गई उनकी कहानियां बहुत जीवंत हैं। कहानियां विषय-वैविध्य की दृष्टि से ही नहीं मानवीय संवेदना से युक्त है, जो पाठक को कहानी पढ़ने हेतु आकृष्ट करती है। उसकी भाषा में सहजता के साथ ही भाव गांभीर्य भी विद्वमान है। स़्त्री ही स्त्री मन के उद्वेग, पीड़ा, रहस्य और संत्रास को समझ सकती है। इस संग्रह की अधिकांश कहानियां स्त्री जीवन पर ही आधारित हैं। वे लिखती हैं-‘हर पुरूष स्त्री को अपने सांचे में ढालने का प्रयास करता है, जैसे वह सिर्फ़ मीडियम है, आदमी ही उसका सांचा है। इसमें उसे ढलना ही होगा, इसके बगैर ज़िन्दगी नहीं या वह जिन्दा नहीं रह सकती है या उसे जिन्दा नहीं रहने दिया जाता। पिता के घर में पिता का सांचा, पति के घर में उसका सांचा। क्या बिना बंधन के, रिश्तों के नाम के, पुरूष, अपने पुरूष प्रधान समाज के छल-प्रपंच के विरूद्ध उसका सहारा.... वास्विक अवलंब नहीं बन सकता।....मानवीय संबंधों के आधार पर।’

एजेक्स फुटबाल टीम कोच फ्रैंक डी बोयर के साथ पुष्पिता अवस्थी।

 पुष्पिता अवस्थी की कहानियों में पानी सी सरलता की साथ अपने की खुश्बू भी विद्यमान है। उन्होंने उपनिवेश की बस्तियों तथा गिरिमिटिया लोगों के दर्द को समझा, उन पर शोध करते हुए इस कहानी संग्रह ‘कंत्राकी बागान और अन्य कहानियां’ की विषय-वस्तु और परिवेश का चयन कर बड़ी आत्मीयता से लिखा। ‘मुट्ठी भर सुख’, अधर्म, अधर्म, भ्रम’ ‘जन्म’ जैसी कहानियां बहुत उत्कृष्ट करती हैं। मुट्ठीभर सुख कहानी में सूरीनाम में हिन्दू भारतवंशी सनातनी और आर्य समाजियों की स्थिति को व्यक्त किया गया है। उसने सनातन धर्म के विष्णु मंदिर में स्थित कार्यालय में देखा कि आर्य दिवाकर कार्यालय और मंदिर भी इसी सीध में अगली सड़क पर है और वह भी दिखाई देता है। दोनों भवनों का शीर्ष ंिसंदूरी रंग से रंजित है। भक्त दोनों भवनों के भीतर ईश्वर में विश्वास और आस्था से जाते हैं। प्रार्थना करते हैं....ध्यान लगाते हैं। फिर वह आर्य समाजी और सनातनी में क्यों बंटे हुए हैं। भारत में रहते हुए काव्यकुंज ब्राह्मण परिवार में पैदा होते हुए उसने कभी नहीं जाना कि वह सनातनी है या आर्य समाजी। लेकिन सूरीनाम जाकर उसे यह सब जानना पड़ा था। ‘इनिका’ कहानी में बेटी इनिका मां की स्मृतियों के जरिए अपना मार्ग तलाशती हैै तथा अपने अकेलेपन भतीं पूर्ति है। उसकी मां की स्मृतियां सदैव उसे आगाह करती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन आक्रमणकारियों के कारण बचने बचाने के क्रम में उसकी नानी किस तरह से अपने पति परिवार और भाई-बहन से अलग हो गई थी। इनिका ने अपनी मां से लोरी और परिकथाओं की जगह-अपने परिवार के भीषण संधर्ष की गाथाएं भी सुनी थी। युद्ध के दौरान कहीं से पहनने को पकड़ा मिल जाए, वहीं धन था, वही संम्पत्ति। रुपये-सिक्के देखने की कभी नौबत ही नहीं आयी। हथेलियों ने कभी रुपये के कागज की कड़क और सिक्कों की नमी ही नहीं जानी और न आंखों की चमक। सौभाग्य से मां को यह सब नसीब तो हुआ, लेकिन 1953 में उफनते समुंद्री तूफान की चपेट में दक्षिण हालैंड के साथ-साथ सी-लैंड प्रोविन्स भी समुंद्र में बह गया। समुंद्र से दो मीटर नीचे की नींदरलैंड की धरती पर कई मीटर उपर समुंद्री जल लहलहाने लगा तो इनिका अपने परिवार के साथ बेघर हो गई थी। उसने मां, पिता और भाइयों की मदद से गृहस्थी जमाई। भेड़ों और मुर्गियों का छोटा-मोटा व्यवसाय शुरू किया। परिवार का पोषण किया। इनिका के संवदेनशील मन के भीतर उसकी अपनी मां और नानी के दुख-दर्द का इतिहास है। जो विश्व इतिहास और वैश्विक युद्धों के समकालीन है।

1976 में आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की तरफ से रनर शील्ड विजेता पुष्पिता अवस्थी।

 इसी तरह ‘अधर्म’ कहानी भी पूरी दुनिया में व्याप्त धार्मिक मद्ध्यन्ता को दर्शाती है। सत्ता और हुकूमत के कारण यह व्याप्त होता जा रहा है। भारत के हिन्दूवादी सत्ताधारी लोग यह नहीं समझ पा रहे कि उनकी अपनी तथाकथिक धारणाओं के कारण पूरे विश्व में हिन्दू के अस्तित्व और धर्म की अस्मिता संकट में है। नीदरलैंड और सूरीनाम की स्थिति-परिस्थिति को दर्शाने वाली कहानियों वैश्विक परिदृश्यों को व्यक्त करने वाली है। 18वीं, 19वीं सदी के आसपास हालैंड अंग्रेज़ों के हुकूमततले मानव श्रमिक के दलालों ने एशियन देशों से मजदूरी के लिए मानव श्रमिकों का व्यसाय किया। अकरकाठियों ने नौकरी, मजदूरी के लोभ ने उन्हें फंसाकर उन सबकी मातृभूमि और जीवन को छीना। जलरस्युओं की तरह समुंद्री द्वीपों और देशों में जनशक्ति छिनौती करते रहे। महंगाई और उपभोग की चाहतों ने इंसान को पागल कर दिया है। ‘रिया’ शीर्षक कहानी में पुष्पिता जी ने सूरीनाम के सामाजिक परिवेश को गंभीरता से व्यक्त किया है। विक्टोरिया प्लांटेश कंत्राकी बगान शीर्षक कहानी प्लांटेशनकी यादों का एक क्रबगाह भर है-जंगल का महाश्माशान। विडंबना तो यह है कि हमारे हिन्दुस्तानी पुरखों ने कठोर और निर्दयी मजूदरी की उनकी दूरदर्शा का बयान है। भारतीय हेाने का गौरव एवं अपने देशवासियों के प्रति होने वाले कष्टों का आख्यान भी इन कहानियों में मिलता है।

पुष्पिता जी की कहानियों में एक साथ रिपोर्ताज, संस्मरण और रेखाचित्र जैसी विधाएं भी अपनी झलक दिखलाती है। इतने लंबे समय और विशाल कलेवर को समेटे इनका कहानी संग्रह विषय वैविध्य, भाषा वैविध्य, परिस्थिति वैविध्य, घटना विविध्य को अपन कथावस्तु में समाहित किए हुए है। रोचकता, प्रवाहमयता और गतिशीलता कथा को पठनीय बनाते हैं। भारतीय परिवेश के साथ विश्व के प्रमुख देशों के पर्यावरीय परिदृश्य के साथ संस्कृति गौरव और आसमता इस कहानी संग्रह बीच तत्व है। 


(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित )