शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

ग़ज़लों से नये चिराग़ जलाने की कोशिश

                                                                                  - डॉ. ज़की तारिक़

                                                   



  ‘फ़िक्रे-नौ’ अज़हर रसूल की ग़ज़लों का संकलन है। जिसमें दो हम्द, पांच नात और एक मनक़बत तरानये-रमज़ान भी हैं। ये बात सभी जानते कि शेर कहना आसान काम नहीं है। खुदा जिस को चाहता है उस व्यक्ति को अपने करम से नवाज़ देता है। अज़हर रसूल के साथ भी यही हुआ है। तालीम हासिल करने के बाद टेलरिंग जैसे ख़ुश्क व्यवसाय को अपनाभर घर-बार चालाने वाला व्यक्ति घर के धार्मिक और साहित्यिक वातावरण के प्रभावित होकर शायरी से मुहब्बत कर बैठा। इस तरह वह धीरे-धीरे ग़ज़ल की जु़ल्फ़ें संवारने लगा। शुरू में क़सीम सहसरामी को ग़ज़लें दिखाई, जिनसे शायरी के शुरूआती गुण-दोष सीखते हुए अपने वालिद सबा कैफ़ी से ग़ज़ल का व्याकरण सीखा और अपने मन में पलती हुई अभिलाषाओं को ग़ज़ल के सांचे में ढालने में कामयाब हो गए। वह यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि इस दौर में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है-

                   कर दे मंज़िल से आशना जो तुम्हें,

                   ऐसा अब राहबर नहीं होता।

वह ग़ज़ल की तकनीक और शब्दों के प्रयोग से अच्छी प्रकार से परिचित हैं, इसीलिए सादा ज़बान में कहते हैं-

               वह जब से मुझे याद आने लगे हैं।

               मिरे ज़ख़्मे-दिल मुस्कुराने लगे हैं।

शह्र से कहीं अधिक उनको गांव के दृश्य पसंद आते हैं-

              मुझे अब भी शह्रों से गांवों के मंज़र,

              क़सम से बहुत ही सुहाने लगे हैं।

आज का इंसान दिल में नफ़रत और ज़बान पर मीठे बोल रखता है, जिसका भरपूर एहसास अज़हर रसूल को है। देखिए, कितना तीखा तन्ज़ वह करते हैं-

            नफ़रत का ज़ह्र दिल में ज़बां पर है मीठी बात,

            कहने का हाथ मुझसे मिलाये हुए तो हैं।

देश प्रेम में भी अज़हर रसूल किसी दूसरे हमवतन से पीछे नहीं हैं। उनका मज़बू इरादा इस शेर से साफ़ ज़ाहिर है-

            किसी भी हाल में कश्मीर हम नहीं देेंगे,

           मिलेगा कुछ नहीं दुश्मन का सर उठान से।

           ज़मीं वतन की पुकारेगी जब कभी हमको,

           तो पीछे हट नहीं सकते हैं सर कटान से।

सांप्रदायिक विचार रखने वालों से भी उन्होंने क्या सुंदर ढंग से अपनी बात कही है-

हमारे घर को तअस्सुब से देखने वालों,

महक वफ़ा की मिलेगी इसी घराने से।

आज जिस प्रकार ग़ज़ल का जादू सर चढ़कर बोल रहा है, शायर कहलाने के शौक़ में अदब में जिस प्रकार से साज़िश हो रही है, उसका उल्लेख भी उन्हीं के शब्दों में देखिए-

      किसी का शेर है पढ़ता है कोई, अदब के साथ साज़िश हो रही है।

      मिरी तख़लीक़ ही मुझको सुनाकर, बड़ी अच्छी नवाज़िश हो रही है।

अज़हर रसूल अपनी ग़ज़लों से समाज को जिस प्रकार जागृत करना चाहते हैं। हमें आशा है कि वह निरंतर इसी प्रकार ग़ज़लों से नये चिराग़ जलाकर समाज को रोशनी की किरन दिखाते रहेंगे। 144 पेज की इस किताब को आज़ाद स्क्रीन प्रिंटर्स ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 250 रुपये है।

ग़ज़ल की सजावट और बुनावट वाली शायरी


 

 शौक़त ‘सबा’ कैफ़ी भोजपुर (बिहार) के मशहूर शायर हैं। इनका जन्म भोजपुर के एक छोटे से गांव पीरू में हुआ। इस गांव को इन्होंने अपनी मेहनत और सूझ-बूझ से शिक्षा का केंद्र बनाकर गांव में शायरी का चिराग़ रौशन किया और वहां के सीधे-सादे लोगों को शेर कहने और सुनने का सलीक़ा भी सिख़ाया।

 शौक़त ‘सबा’ कैफ़ी ने कड़ी मेहरनत और बड़ी समझदारी से शायरी के मैदान में क़दम रक्खा है। पहले इन्होंने कैफ़ सहसरामी और बाद में हज़रत नावक हमज़ापुरी से शेर कहने के हुनर के साथ-साथ ग़ज़ल के क्राफ्ट का पाठ भी इसी मेहनत से पढ़ा कि बाद में पूरी ईमानदारी के साथ इस विधा में दक्षता प्राप्त कर ली। जिसका नतीज़ा इनका यह ग़ज़ल संग्रह ‘शजर-शजर’ हमारे सामने है। इनकी यह किताब पढ़कर अंदाज़ा हुआ कि वह शेर कहने के लिए शेर नहीं कहते है बल्कि पहले वह हालात का जायज़ा लेते हैं, उस पर विचार करते हैं, जब जाकर पूरी संजीदगी के साथ उन हालात को शेर का रूप देते हैं। वह जहां अपने सीने में धड़कता हुआ दिल रखते हैं, वही ज़िन्दगी की कड़ी धूप का सफ़ भी उनके क़दमों की रफ़तार को धीमा नहीं करता है। कुछ शेर उनके देखिए, जिनमें पूरे हौसले का इज़हार करते नज़र आत हैं-

                 यूं ही आंखों से जो टपक जाये,

                 अश्क इतना मिरा हक़ीर नहीं।


                 होगा इक दिन उसे मलाल बहुत,

                 मुझ को जो आज़मा रहा है अभी।

समाज में जिस प्रकार स्वार्थ और छल-कपट का बोलबाला है, उसका एहसास शायर को भली-भांति है। इस एहसास को वह अपने पाठक के मन में भी उतारना चाहता है, इसीलिए कहता है-

                           खुल न जाये भरम मुहब्बत का,  आम से दास्तां न हो जाए।

                          वक़्त के साथ-साथ मुमकिन है, बेज़बानी ज़बा न हो जाए।


                        अब ये अपनी ज़बान खोलेंगे,

                        शह्र के बेज़बान बोलेंगे।


                       जिसे भी टूट के चाहेगे इस ज़मान में,

                       वह आस्तीन का खं़जर ज़रूर निकलेगा।

 ग़ज़ल की सजावट और बुनावट में जिस मेहनत से उन्होंने काम किया है और भटके हुए इंसान, समाज में होने वाली कुरीतियों को अपनी ग़ज़ल में इंगित किया है, यक़ीनन वह इस बात की गवाही दे रही है कि शौक़त सबा कैफ़ी एक संवेदनशील शायर हैं और वह भटके हुए समाज को ईमानदारी और सांप्रदायिक सद्भाव का सच्चा रासाता दिखाना चाहते हैं। हम उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। 168 पेज की इस किताब को आज़ाद स्क्रीन प्रिंटर्स ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 250 रुपये है। 


पहचान से अक़ील नोमानी की पहचान

                                                                                 - डॉ. वारिस अंसारी 

                               


   अक़ील नोमानी का ग़ज़ल संग्रह ‘पहचान’ कई माने में अहम है। एक तो वह खुद ही मुस्तनद और मोहतरम शायर की हैसियत रखते हैं। दूसरे उनकी इस किताब पर इतने अज़ीम लोगों की टिप्पणी इसे खास बना रही है। अक़ील नोमानी की शायरी में ज़िंदगी के उतार चढ़ाव, समाजी हालत और इश्क़-मोहब्बत के हर तरह के रंग देखने को मिलते हैं। वह शायरी में जद्दोज़हद करते नज़र आते हैं। कहीं वह अपने-आप से तो कहीं समाज और वक़्त के हुक्मरानों से लड़ते नज़र आते हैं, और इतनी मेहनत के बाद भी वह किसी चीज़ को बोझ नहीं समझते, बल्कि हर लम्हा बेदार नज़र आते हैं। उनकी किताब पहचान पढ़ने पर पता चला कि उनकी ग़ज़लों में लताफ़त है और फनी शऊर भी। वह सच्ची शायरी करते हैं और अपनी बात सलीके़ से कहने का हुनर भी रखते हैं। वह एक हस्सास शायर हैं। यही वजह है कि उनकी शायरी में हक़्क़ानियत (सच्चाई) नज़र आती है। उनकी ग़ज़लें सादा और आमफ़हम ज़बान में हैं, जो कि क़ारी (पाठक) आसानी के साथ रवानी से पढ़ता चला जाता है और अपने आप पर बोर नहीं महसूस करता। चंद अशआर देखें- 

                           अपनी कहो हमारी सुनो और खुश रहो।

                            आओ कलंदरों से मिलो और खुश रहो। 


                          जुल्म उर्दू पे भी होता है और इस निस्बत से,

                           लोग उर्दू को मुसलमान समझ लेते हैं।

 

                            मुसाफिर तेरा जिक्र करते रहे,

                            महकता रहा रास्ता देर तक। 


                            ख़बर है कोई चारागर आएगा,

                            सलीके से बैठें हैं बीमार सब। 

   इन अशआर में अक़ील नोमानी की फ़िक्ऱ का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इनकी ज़बान और उर्दू ग्रामर पर अच्छी और मज़बूत गिरफ़्त है। इनकी शायरी में ज़िंदगी का कर्ब भी है और इश्क़ की तमाम कैफ़ियत का इज़हार भी। वह काली रातों के अजाब पर भी नज़र रखते हैं और सुबह के उजालों की उम्मीद भी रखते हैं। उनकी शायरी में मतलब परस्ती, ज़माने के बदलते हुए मयार, कमज़ोर और मजलूम की मासूमियत और ताकतवरों का जुल्म व समाजी हालत का जिक्र जगह जगह है। इस तरह पूरी किताब में एक से बढ़ कर एक शेर मौजूद हैं। जिनको पढ़ने पर उनकी सच्ची और पाकीज़ा सोच का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इस किताब में खूबसूरत हार्ड कवर की डिज़ाइन,टीम अर्शिया पब्लिकेशंस देहली ने किया है । किताब क्लासिक आर्ट प्रेस देहली से कंपोज करा कर अर्शिया पब्लिकेशंस देहली से प्रकाशित किया गया है। शानदार कागज़ के साथ 116 पेज के किताब की कीमत 250 रुपए है।


 रौशनी बिखेरता ‘शाम का धुंधलका’


   

  इस वक़्त मेरे हाथ में डॉ. ज़की तारिक़ का शेरी मजमुआ (ग़ज़ल संग्रह) ‘शाम का धुंधलका’ है। बताना ये है कि वह जितना मज़मून निगारी पर कुदरत रखते हैं, उससे कहीं ज्यादा उन्हें शायरी में भी महारत हासिल है। क्योंकि डॉ. ज़की तारिक़ के वालिद एक कोहना-मश्क बुलंद पाया शायर थे। उनका तअल्लुक एक उम्दा पढ़े-लिखे खानदान से है। वह दीनी, इल्मी, अदबी तालीम से वाबस्ता फनकार हैं। वह रूमानी शायरी पर भी करिश्माई ताक़त रखते हैं और क्लासिकल शायरी पर भी बड़ी कुदरत रखते हैं। इसलिए इनकी शायरी किसी एक की तरफ नहीं जोड़ी जा सकती। बल्कि ये कहना गलत न होगा कि उन्होंने अपनी शायरी में समाज, दर्द, मोहब्बत सभी के साथ बराबर का हक़ अदा किया है। इनकी शायरी में जो फ़िक्री सलाहियत नज़र आती है वह कम ही लोगों में देखने को मिलती है। 

 मौजूदा दौर पर नज़र डाली जाए तो ग़ज़ल भी मुख्तलिफ उन्वान में ढली है। ज़बान व बयान के अंदाज भी बदले हैं। ग़ज़ल पर नए नए तजुर्बात हुए हैं। उर्दू के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी के अल्फाज़ के इस्तेमाल से भी ग़ज़ल को एक नई दिशा मिली है। डॉ. तारिक़ ने वक़्त के किसी मामले को और भी खूबसूरत पहलू में ढालने की कोशिश की है। इनके कुछ अशआर देखें- 

                          पहले लीडर बन जाते है यार जक़ी,

                           फिर लोगों से मारा मारी करते हैं। 


                          नफरतों का शजर है ऐ तारिक,

                         काश ! आए समर मोहब्बत का। 

  

                        शगफ बढ़ा है मोबाइल का आजकल इतना,

                        रमक न आई नज़र दूर तक सवेरे की। 

    इनके अशआर में लीडर और मोबाइल अंग्रेजी के शब्द हैं। शायर ने इन शब्दों का इस्तेमाल करके शेर में चार चांद लगा दिया। इस तरह नफ़रत के पेड़ से मोहब्बत के फल की उम्मीद एक उम्दा फिक्र है। उनके चंद अशआर और देखते हैं- 

                                मिले उनसे ज़माना हो गया है,

                                ये रिश्ता अब पुराना हो गया है। 


                               बाम पर खड़े हो कर जुल्फ को संवारा है,

                                इस ग़ज़ल की लड़की ने फिर हमें पुकारा हैं। 


                                  मैं जकी एक कलंदर वह सिकंदर निकला,

                                  वह जो आवाज़ भी दे मुझको तो जाऊं कैसे। 

   ऐसी खूबसूरत शायरी में जकी की जो सोच का इज़हार हो रहा है वह काबिले दाद है । वह आसान लफ्जों के साथ रवानी की शायरी करते हैं। इनकी शायरी में ऐसे बेशुमार पहलू मौजूद हैं। खूबसूरत हार्ड जिल्द के साथ 120 पेज की इस किताब को ख़ैरुल बशर (हापुड़) ने डिजाइन किया है। मासूमा एंड कंपनी से छपवा कर खुद ही डॉ. ज़की तारिक़ ने केला रोड , गौ शाला फाटक गाजियाबाद से प्रकाशित किया है। किताब की कीमत 200 रुपए है।


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित)



शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

 हिन्दी छन्दों पर आधारित ग़ज़लों का लेखन

                                                                                - अजीत शर्मा ‘आकाश’



 ग़ज़लकार राजेंद्र वर्मा की पुस्तक ‘हृदय की बात’ में उनकी 88 ग़ज़लें सम्मिलित हैं, जिन्हें उन्होंने कथ्य और भाषिक विधान और हिन्दी छन्दों के आधार पर हिन्दी ग़ज़लों का नाम दिया है। कथ्य के दृष्टिकोण से रचनाओं के वर्ण्य-विषय में विविधता का समावेश परिलक्षित होता है। वर्तमान समाज का चित्रण, जीवन की अनुभूतियां और संवेदनाएं, व्यक्ति एवं समाज का दुख-दर्द, सामाजिक सरोकार, आम आदमी का संकट, आज का राजनीतिक परिदृश्य आदि को चित्रित किया गया है। कुछ ग़ज़लों में प्रेम एव श्रंगार के भी मनोभाव परिलक्षित होते हैं तथा वर्तमान सत्ताधारियों के प्रति कटाक्ष एवं तीक्ष्ण व्यंग्य भी किये गये हैं।

  रचनाओं में प्रयुक्त भाषा प्रमुखतः सरल एवं सहज है, जो कहीं-कहीं खड़ी बोली के तत्सम एवं तद्भव शब्द भी लिये हुए हुए है। कुछ स्थानों पर संस्कृतनिष्ठ शब्दावली, यथा-प्रहार, विहंग, स्वप्न आदि भी हैं। ठकुरसुहाती जैसे आम बोलचाल के शब्द भी हैं। पुस्तक में हिन्दी ग़ज़लों के नाम पर यद्यपि साहित्यिक हिन्दी भाषा का सायास प्रयोग किया गया प्रतीत होता है, फिर भी लाजिम, महफ़िल, फ़ितरत, हयात, अजल, यक़ीनन, जैसे उर्दू-फ़ारसी के शब्द भी ग़ज़लों में आये हैं। शिल्प की दृष्टि से संग्रह की ग़ज़लें कथ्य और भाषिक विधान तथा हिन्दी छन्दों पर आधारित हैं। इनमें उर्दू की उन्हीं बह्रों का प्रयोग किया गया है, जिनके समानांतर हिन्दी कें छन्द उपलब्ध होते हैं। मुजतस, कामिल, वाफ़िर जैसी बह्रों के समानान्तर हिन्दी में छन्द नहीं हैं, अतः उन्हें सम्मिलित नहीं किया गया है। उर्दू की आम प्रचलित बह्रों से तो ग़ज़लों के पाठक परिचित हैं, किन्तु मनोरम, मालिका, विमोहा, बाला, श्येनिका, सम्मोहा, अभीर, विजात, मधुमालती, अरिल्ल, ताटंक जैसे हिन्दी छन्दों को तो मात्र हिन्दी विषय के विद्यार्थी ही समझ सकते हैं। इस दृष्टि से इस पुस्तक को लक्षण ग्रन्थों की श्रृंखला में रखा जा सकता है।

  रचनाओं के अंतर्गत वोटें, गबारा, इनसानियत जैसे शब्द आये हैं, जो भाषा-व्याकरण एवं वर्तनी की अशुद्धियों से युक्त हैं। ग़ज़ल व्याकरणानुसार ऐबे-तनाफ़ुर एवं तक़ाबुले रदीफ़ जैसे दोष भी कुछ ग़ज़लों में दृष्टिगत होते हैं। इसके अतिरिक्त कल्मष जैसे क्लिष्ट एवं बोझिल शब्दों का प्रयोग ग़ज़ल के स्वभाव के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। पुस्तक में संग्रहीत कुछ ग़ज़लों के अशआर प्रस्तुत हैं-‘दर्द छलका तो होगी हंसी/दर्द भीतर-ही-भीतर सहो।..... मुखौटा धर्म का शातिर लगाए है/ मगर जनता भी उसको सिर चढ़ाए है।..... अभी तो आंख भर देखा न उनको/ हृदय लेकिन उन्हीं का हो गया है।..... अब सनातन ही अकेला एक दर्शन/ साम्यवादी बनके रहना जुर्म जैसे।..... लोग धर्मांध होते चले ही गए/ अंततः एक दिन हो गया गोधरा।.....  व्यथा एक-सी है हमारी-तुम्हारी/ सुनो कुछ हमारी, कुछ अपनी सुनाओ।..... शुक्रिया ऐ वक़्त! तूने मेरी आँखें खोल दीं/ यों तो सब लगते थे अपने, था नहीं अपना कोई।..... हम तो हैं घरबार वाले, हम कहाँ जाएँ/ आप तो झोला उठाकर चट से चल देंगे।..... हज़ारों हेक्टेयर घेरे ज़मीनें धर्म के पटठे/ हमारे भाग लेकिन आ न पायी झोपड़ी-भर की।“

 कुल मिलाकर पुस्तक पठनीय एवं सराहनीय है, जो रचनाकार की सृजनशीलता एवं काव्यधर्म को उजागर करती है। इसके माध्यम से हिन्दी छंदों के नामों एवं उदाहरणों के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 112 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 225 रुपये है।


रोचक और सराहनीय अशआर का संकलन 


 

शायर मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ की ‘मशवरा’ शीर्षक लघु पुस्तक में उनकी ग़ज़लों के कुछ चुनिंदा अशआर प्रस्तुत किये गये हैं, जिनके माध्यम से रचनाकार की काव्यात्मक क्षमता एवं सृजनात्मक शक्ति का परिचय प्राप्त होता है। रचनाकार ने अपने मनोभावों को सरल, स्पष्ट एवं सहज भाषा में व्यक्त करने का प्रयास किया है, जिसमें उन्हें सफलता भी प्राप्त हुर्ह है। पुस्तक में संग्रहीत अशआर भावपक्ष तथा कथ्य की दृष्टि से भी रोचक एवं सराहनीय बन पड़े हैं। जीवन में व्याप्त संघर्ष तथा देश-दुनिया की बातें इत्यादि विषयों को शब्द-चित्रों के माध्यम से प्रकाश में लाने का प्रयास किया गया है। 

 आसान शब्दावली से युक्त इन संग्रहीत अशआर की भाषा सरल, सहज बोधगम्य तथा जनसामान्य की भाषा है। इनमें हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेज़ी के प्रचलित एवं अति प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिसके कारण ये आम बोलचाल की भाषा के निकट के प्रतीत होते हैं। कुछ शे’रों को पढ़कर पाठक को आनन्द की अनुभूति होती है। संग्रहीत हर एक शे’र का अपने आप में एक अलग महत्व है, जिसके माध्यम से रचनाकार की प्रतिनिधि शायरी एवं सृजन क्षमता की झलक देखने को मिलती है। प्रस्तुत हैं इस पुस्तक के कुछ अंश-‘मुझको ‘तन्हा’ जीवन में बस इसी बात का खेद था/जिसके जिसके तलुवे चाटे उन तलुवों में छेद था।’, ‘मंज़िल मिलेगी तुमको सही राह से ‘तन्हा’/ रफ़्तार तेज़ होने से मंज़िल नहीं मिलती।’, ‘तन्हा’ मेरा जुनून भी कितना अजीब है/ गुज़रा वहीं-वहीं से जहां रास्ता न था।’, ‘रोशन हो तेरी याद से दिल मेरा ऐ ख़ुदा/दुनिया ये मुझको भूल भी जाए तो ग़म नहीं।’,  ‘ख़ुद को समझ रहा है वो इक आइना ‘तन्हा’/अब टूटने से कैसे भला बच वो सकेगा।’, ‘दास्तां उम्र की कुछ इतनी तवील है आखि़र/चंद लफ़़्ज़ों में इसे कैसे समेटूं ‘तन्हा’।’ 

 पुस्तक में कुछ स्थानों पर भाषिक एवं व्याकरणिक छोटी-मोटी अशुद्धियां भी दृष्टिगोचर होती हैं, यथा- इमान, ख़्याल आदि (वर्तनी/प्रूफ), तुम मुझको, मिल लेंगे (ऐबे-तनाफ़ुर), बरसों के इन्तज़ार....(पृ.-9), सज़ा तजबीज़ है.....(पृ.11) जैसे कुछ अशआर को पढ़ने पर उनमें बह्र-दोष प्रतीत होता है। यह भी ध्यातत्य है कि एक ही शे‘र के मिसरों में तेरी और तुमने, दे और दीजिए जैसा प्रयोग करने से ऐबे-शुतुरगुर्बा (सम्बोधन दोष) आ जाता है, जो पुस्तक के कुछ शे’रों में दृष्टिगत होता है, यथा- क्यों ख़फ़ा हो.... (पृ.-7), अभी बैठो.... (पृ.-28), ये नहीं कहता.... (पृ.-29)। इसे बड़ा दोष माना गया है। रचनाकारों को इस दोष से सदैव बचना चाहिए।कुल मिलाकर विविध रंग लिए हुए चुनिन्दा अशआर की इस लघु पुस्तक को रोचक, पठनीय एवं सराहनीय कहा जा सकता है। इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया गया है, जिसकी कीमत 25 रुपये है। 


रोचक पुस्तक ‘फुर्सत किसे है इन दिनों’ 



 ‘क़त्अः’ उर्दू,-फ़ारसी नज़्म की एक क़िस्म है, जिसमें गज़ल की तरह क़ाफ़िये की पाबन्दी होती है, और जिसमें कोई एक बात कही जाती है। क़त्आत शब्द इसी क़त्अः का बहुवचन रूप है। हिन्दी काव्यशास्त्र में इस विधा को मुक्तक कहा जाता है। चार पंक्तियों के क़त्अः (मुक्तक) में विभिन्न विषयों पर लिखी गई छोटी-छोटी विचार प्रधान रचनाएं होती हैं। छंदों का परस्पर कोई संबन्ध नहीं होता तथा प्रत्येक छन्द अपने आप में पूर्णः स्वतंत्र एवं संपूर्ण अर्थ वाला होता है। शायर मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ की पुस्तक ‘फुर्सत किसे है इन दिनों’ क़त्आत (मुक्तकों) का संग्रह है। आज के समाज तथा आम आदमी के जीवन में व्याप्त विसंगतियां, विद्रूपताएं, आशा एवं निराशावाद, पारस्परिक सद्भाव और भाईचारे में कमी जैसे बिन्दु पुस्तक के प्रमुख वर्ण्य-विषय हैं।

 शिल्प की दृष्टि से रचनाकार ने छन्दविधान का पालन करने का प्रयास किया है, जिससे रचनाओं में लय, प्रवाह एवं गतिशीलता विद्यमान रहती है। लेखन-शैली सामान्य तथा कहीं-कहीं व्यंग्यात्मक भी है। रचनाओं की भाषा सरल, सहज, स्वाभाविक तथा आम बोलचाल की है। इनमे शुद्ध हिन्दी के साथ-साथ उर्दू एवं अंग्रेज़ी के दैनिक बोलचाल के शब्दों का प्रयोग भी किया गया है, यथा-प्रतीक्षा, मर्यादा, स्वीकार, कश्ती, मतलबपरस्त, सिस्टम फ़ेसबुक, मोबाइल आदि।

पुस्तक में संग्रहीत क़त्आत के कुछ अंश इस प्रकार हैं- ‘उलझे हुए हैं लोग मोबाइल में इस तरह/फुर्सत किसे है इन दिनों चेहरा कोई पढ़े।..... जब से बने हैं दोस्त फ़ेसबुक पे बेहिसाब/‘तन्हा’ अब दोस्ती के माने बदले गए हैं।..... इक दिन वक़्त की गर्दिश में मिट जाता है सब ‘तन्हा’/मगर पहली मोहब्बत की निशानी याद रहती है।..... है किस आमाल से लिखी हुई क़िस्मत भला इनकी/ये वो बच्चे हैं जो फुटपाथ को ही घर समझते हैं।..... ज़िन्दगी की कश्ती में इतना न तू सामान भर/आएगा तूफ़ान तो सब कुछ बहा ले जाएगा।..... क्या मिलेगा आपसी झगड़ों से ऐ ‘तन्हा’ हमें/आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए।..... ‘तन्हा’ ये जब लगा कि हैं मतलब परस्त लोग/जीने का हमने अपने तरीक़ा बदल दिया।’

 पुस्तक के कुछ क़त्आत काव्यदोष युक्त हैं-जैसे ऐबे-तनाफ़ुर-किसी मिसरे में किसी शब्द के अंतिम अक्षर की उसके बाद वाले शब्द के पहले अक्षर से समानता होने पर शेर पढ़ते समय उसका उच्चारण परवर्तित हो जाता है। नफ़रत़$तो= नफ़रत्तो, इक$कमी= इक्कमी, भर$रहा= भर्रहा, और$रब= और्रब आदि में यह दोष है। हालाँकि यह दोष बहुत हल्का माना जाता है। इसी प्रकार ऐबे-शुतुरगुर्बा (सम्बोधन दोष)-एक ही शे’र के दो मिस्रों में किसी के लिए दो अलग-अलग संबोधनों, यथा-तुम और तू या आप और तुम का प्रयोग। यथा- ‘नाज़ तुम करते हो ‘तन्हा’ किसलिए इस ख़ाक़ पर/शाम तक ढल जाएगी तेरी जवानी सोच लो।’ (पृष्ठ-16)। पृष्ठ सं.-18, 24, 37, 38, 53, 54, 56, 70, 108 आदि पर भी यह दोष है। शायरी एवं काव्य में यह बड़ा दोष माना गया है। किसी भी हालत में इससे बचना चाहिए। (3) अशुद्ध वर्तनी- गल्ती (ग़लती) पृ.-4, ख़्यालात (ख़यालात) पृ.-12, लब्ज़ (लफ़्ज़) पृ.-85, जंगो जूं (जंगो जू) पृ0-93 आदि। (4) भाषा-व्याकरण के अनुसार अशुद्ध भाषा- हर जज़्बात (पृ.-22), अश्क बहता (पृ.-27), गुज़रे राहों (पृ.-55), हर धड़कनों (पृ.-57), इक इक लम्हों (पृ.-106) आदि। इन सबके बावजूद यह कहा जा सकता है कि ‘फुर्सत किसे है इन दिनों’ पुस्तक रोचक एवं पठनीय है। गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की कीमत 300 रुपये है।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित )


रविवार, 6 सितंबर 2026

 इलाके के ख़ास समाज सेवी डॉ. श्यामा दत्त

                                                                                             - सुहैल ख़ान

                                           



 ग़ाज़ीपुर जिले के दिलदानगर के रहने वाले डॉ. श्यामादत्त पांडेय न सिर्फ़ एक चिकित्सक थे, बल्कि इसके साथ-साथ बेहतरीन समाजसेवी और समाज सुधाकर भी थे। बचपन से ही इनको इस बात की चिंता थी कि हमारे यहां के अधिकतर लोगों का जीवन इतना निम्न स्तर का क्यों है? लोगों के जीवन को बेहतर बनाने और उन्हें सही शिक्षा, स्वास्थ प्रदान करने के लिए उन्होंने पूरा जीवन कार्य किया। जिसकी वजह से आज उन्हें बहुत सम्मान के साथ याद किया जाता है। इनका जन्म बभनौलिया गांव के पं. श्यामदास पांडेय के यहां 10 नवंबर 1924 को हुआ। उस समय गांव में प्लेग रूपी महामारी से बचने के लिए गांव से बाहर झोपड़ी में लोग रहते थे। उसी झोपड़ी में आपका जन्म हुआ। आपकी माता का नाम साधवी थी, जो उदार और साक्षात गृहलक्ष्मी थीं। डॉ. श्यामादत्त ने प्रारंभिक शिक्षा बिहार राज्य में अपने नाना के यहां प्राप्त की। आपके नाना उदार, दानी और संस्कृत के प्राकंड विद्वान थे। वे गरीब छात्रों और रिश्तेदारों की सहायता अपने परिवार से छिपकर करते थे। उनके इन्हीं संस्कारों का प्रभाव आप पर भी पड़ा। इसके बाद आपने दरभंगा के चिकित्सा शिक्षालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और बिहार के रका चिकित्सा संस्थान में सर्जन के पद पर आसीन हुए।

इनके गांव में शिक्षा के लिए कोई स्कूल नहीं था। इसे देखते हुए इन्होंने 26 जनवरी 1948 को प्राइमरी विद्यालय भवन के निर्माण की नींव रखी। फिर आपने 26 जनवरी 1950 को अपने निजी मकान में ‘नेहरु पुस्तकालय’ की स्थापना की। इससे गांव में शिक्षा और संस्कृति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। दिलदारनगर और आसपास के लोगों की सेवा की खातिर इन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद दिलदानगर बाज़ार में अपना निजी सेवा सदन स्थापित किया, जहां गरीबों, अपाहिजों और असहायों लोगों की चिकित्सीय सेवा शुरू की। सन 1967 में देश सूखे की चपेट में आ गया, लोगों दाने-दाने को मोहताज होने लगे। तब उन्होंने पूरे इलाके में खोज-खोजकर ऐसे लोगों तक भोजन पहुंचाया, जिन्हें खाना नसीब नहीं हो रहा था। इनकी इसी सेवा को देखते हुए आपको ‘दीनबंधु’ की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित किया गया।

 डॉ. श्यामादत्त जी का जीवन लगभग 50 वर्षों का ही रहा। इनकी मृत्यु अचानक 05 जनवरी 1973 को पटना में हो गई। डॉ. श्यामादत्त पांडेय चिकित्सा के क्षेत्र के साथ साहित्य और संगीत के क्षेत्र में भी एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे। उनके ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय डॉ. सुधाकर पांडेय ने भी इस परंपरा का निर्वाह किया। एक व्यस्त चिकित्सक होते हुए भी संगीत, साहित्य और समाज के क्षेत्र में अपने पिता के साहित्यिक कार्यों को संजोने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। उनके जीवन शैली में पिता के आदर्श और विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। डॉ. सुधाकर पांडेय के पुत्र सिद्धार्थ पांडेय अपने पिता के सम्मान में प्रत्येक वर्षों कई क्षेत्रों में लोगों को ‘डॉ. सुधाकर पांडेय अवार्ड’ से सम्मानित कराते हैं।


( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित )


शनिवार, 15 अगस्त 2026

 बिहार गवर्नर की मेहमान बनी टीम गुफ़्तगू

डॉ. ग़ाज़ी, उस्मानी, तन्हा और महरानी पटना में दो दिन रुके 

ऐतिहासिक गुरुद्वारा और खुदाबक्श लाइब्रेरी भी देखने गए

                                                           - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

लोकभवन में राज्यपाल के साथ बाएं से- नरेश कुमार महरानी, मनमोहन सिंह तन्हा, आरिफ़ मोहम्मद ख़ान, आसिफ़ उस्मानी और डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 बिहार के राज्यपाल महामहिम आरिफ़़ मोहम्मद ख़ान साहब के आमंत्रण पर हम चार लोग (डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, आसिफ़ उस्मानी, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी) 01 फरवरी, 2026 की सुबह लगभग आठ बजे अपनी कार से प्रयागराज से पटना के लिए निकले। आरिफ़ साहब जब केरल के राज्यपाल थे, तब से ही हम लोगों को बुला रहे थे, लेकिन किसी न किसी वजह से हम जा नहीं पा रहे थे। बहुत टाल-मटोल और रस्सा-कस्सी के बीच 01 फरवरी को जाना फाइनल हुआ।

 हम कार से पटना के लिए निकले थे। हमारा अंदाज़ा था कि पांच-छह घंटे में पहुंच जाएंगे। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। रास्ता भटक जाने और बीच में सासाराम स्थित शेरशाह सूरी के मक़बरा पर जाने की वजह से हमें पटना पहुंचने में काफी विलंब हो गया। सुबह आठ बजे ही निकले थे, हमें भूख लगी थी। एक रेस्टोरेंट पर नाश्ता करने की सोचकर हम कार रोककर बाहर निकले। रेस्टोरेंट के अंदर गए, अंदर बिल्कुल सन्नाटा था, एक भी आदमी नहीं था, सिर्फ़ रेस्टोरेंट के कर्मचारी थे। सन्नाटा देखकर हमलोग वापस आने लगे। हमारे वापस आने पर रेस्टोरेंट के दो कर्मचारी हमारे पास आ गए और हमारे वापस जाने का कारण पूछने लगे। काफी बहस करने लगे, वे किसी भी हालत में हमें वापस जाने देना नहीं चाह रहे थे। लेकिन, हमें लगा कि इतना सन्नाटा होने का मतलब बासी बनाया हुआ खाना मिलेगा। इसलिए हमलोग रुके नहीं। लगभग दो किलोमीटर आगे जाकर एक ढाबा पर रुके, वहां पहले से ही और लोग भी नाश्ता कर रहे थे। इसलिए हमलोगों ने भी वहीं नाश्ता किया।

 नाश्ता करने के बाद जब हम आगे बढ़े, आसिफ़ उस्मानी ने कहा कि यहीं पर शेरशाह सूरी का मक़बरा है। हमें वहां ज़रूर चलना चाहिए। दिन के तकरीबन 11 बजे थे। हमने अपनी गाड़ी सासाराम में स्थित शेहशाह सूरी के मक़बरे की तरफ़ घुमा दी। मक़बरे के अंदर जाने के लिए टिकट लिए और प्रवेश कर गए। मक़बरे के दोनों तरफ बड़ा सा तालाब है। तालाब का पानी इतना साफ़ है कि उसमेें तैरती हुई मछलियां साफ़ दिखाई दे रही थीं। तकरीबन, 40-45 मिनट हमने मक़बरे का भ्रमण किया, विभिन्न तरह से तस्वीर खिंचाई। फिर बाहर आए तो एक आईसक्रीम वाला खड़ा था। हमने आइसक्रीम खाई, फिर पटना की ओर निकल गए। प्रयागराज से सासाराम तो हम बहुत आसानी से आ गए थे, बिना किसी विलंब या रुकावट के। लेकिन, सासाराम से जब पटना की ओर चले तो रास्ता भटक गए। हाई-वे से न जाकर मुख्य सिटी से चले, जिसकी वजह से जगह-जगह जाम के कारण परेशानी होती रही। बीच-बीच में महामहिम राज्यपाल साहब के पी.ए. अनिल जी का फोन मेरे मोबाइल पर आता रहा कि ‘अभी आप लोग कहां हैं?’ मैं उन्हें अपना लोकेशन बताता रहा। हमारा अनुमान था कि तीन बजे तक ज़रूर पहुंच जाएंगे। लेकिन, भटकते-भटकते हम शाम 7ः30 बजे पहुंचे।

 गवर्नर हाउस के गेट पर सुरक्षा कर्मियों ने हमें रोका। हालांकि, 31 जनवरी की शाम को ही गवर्नर साहब के पीए अनिल जी ने मुझे फोन करके सभी आने वालों का नाम और गाड़ी नंबर आदि नोट कर लिया था, जो गेट पर अंकित कराया गया था। गेट पर हमने अपना नाम बताया। सुरक्षाकर्मी तुरंत ही अपने केबिन में गया और एक लिस्ट उठा लाया। लिस्ट से नाम मिलाकर बोला-आप लोग जा सकते हैं।

 गवर्नर हाउस (लोक भवन) में एक फरवरी की शाम सात बजे से ही स्थापना दिवस का कार्यक्रम था। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और चंडीगढ़ का स्थापना दिवस कार्यक्रम शुरू हो गया था। हमारे पहुंचने पर गवर्नर साहब के पीए हमारे पास आए और बोले-‘आप लोग पहले अपने रुकने वाले कमरे में चलेंगे या सीधे प्रोग्राम में ?’ हमने फैसला किया कि पहले हम प्रोग्राम में जाएंगे। हमें आगे से दूसरी पंक्ति में बैठाया गया। गवर्नर साहब मंच पर जा चुके थे, उनके बगल में अन्य लोगों के अलावा उनकी पत्नी भी बैठीं थीं। गवर्नर साहब के अभिभाषण समेत कई रंगारंग कार्यक्रम हुए। हम सुबह से ही चले थे, शायद इसी वजह से आसिफ़ उस्मानी का शुगर लो होने लगा। उन्होंने मुझसे कहा कि मेरा शुगर लो हो रहा है, मेरे लिए कुछ खाने-पीने का इंतज़ाम कराइए। मैंने अनिल जी से यह बात बताई। उन्होंने तुरंत ही कुछ बिस्किट और चाय मंगवा कर दिया। आसिफ़ साहब के साथ मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश महरानी ने भी चाय-बिस्किट का आनंद लिया, मेरा चाय पीने का मन नहीं हुआ। इस आयोजन में ढेर सारे आई.ए.एस., पी.सी.एस. और आईपीएस अधिकारी समेत अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।

बिहार लोकभवन में राज्यपाल महामहिम आरिफ़ मोहम्मद ख़ान से मुलाकात 

 लगभग 8ः45 तक कार्यक्रम चला। कार्यक्रम के बाद वहीं उसी हॉल में डिनर का इंतज़ाम किया गया था। तीन-चार टेबिल पर बोर्ड लगे थे ‘गवर्नर फैमिली के लिए’। हमें इसी रिज़र्व टेबिल पर बिठाया गया। हमने साथ में खाना खाए। गवर्नर साहब के पीए ने भी हमारी ही टेबिल पर हमारे साथ ही खाना खाया। ठीक बगल वाले टेबिल पर गवर्नर साहब ने अपनी पत्नी, बेटे-बेटियों और पोता-पोतियों के साथ खाना खाया। खाने के बाद काफी देर तक लोग गवर्नर साहब के साथ फोटो खिंचवाते रहे। इसके बाद गवर्नर साहब हमारे पास आए। बोले, हमारे साथ आप लोग चलिए। फिर हमलोग उनके साथ गवर्नर हाउस के उस हिस्से की तरफ बढ़े, जिधर लोगों के रुकने का इंतज़ाम था। लिफ्ट के पास पहुंचे तो गवर्नर साहब ने  हमारी ओर इशारा करते हुए अपने सुरक्षाकर्मियों से कहा-‘इन लोगों को लिफ्ट से उपर ले चलो, मैं सीढ़ी से उपर आता हूं।’ हम लिफ्ट से दूसरी मंज़िल पर पहुंच गए। वहां ढेर सारे सोफ़े-कुर्सियां लगी थीं। बीच वाले सोफे को छोड़कर उसके दोनों तरफ के सोफे पर हम बैठ गए। एक तरफ मैं और आसिफ़ उस्मानी, दूसरी तरफ मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी। थोड़ी ही देर में गवर्नर साहब आकर अपनी सीट पर बैठ गए। फिर उन्होंने अपने कर्मचारियों से कहा कि इन लोगों को ‘कहवा’ पिलवाइए। फिर बातचीत शुरू हुई, जो लगभग ढाई घंटे चली। इसी बीच हमें ‘कहवा’ सर्व कर दिया गया था। तकरीबन 11ः30 बज गए, गवर्नर साहब ने कहा अब आप लोग अपने कमरे में आराम करिए, कल सुबह मिलते हैं। 

 हम चारो लोगों को साथ लेकर अनिल जी उन कमरों की तरफ आए, जहां हमारे रुकने का इंतज़ाम था। एक कमरा मेेरे (डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी) और आसिफ़ उस्मानी साहब के लिए, ठीक उसी के बगल वाला कमरा मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार ‘महरानी’ के लिए था। हमलोग अपने-अपने कमरे में आ गए। थोड़ी ही देर में नरेश कुमार महरानी हमारे कमरे में आ गए, बोले-’हमलोगों के कमरे में तो बाथरूम ही नहीं है।’ मुझे इस पर बहुत हैरानी हुई। मैंने अनिल जी को फोन करके यह बात बताई। अनिल जी हंसे, बोले-’गवर्नर हाउस के गेस्टरुम में बाथरुम न हो, ऐसा मुमकिन है? ठीक से देखिए।’ नरेश महरानी से मैंने कहा कि परदे वग़ैरह हटाकर देखिए, बाथरूम होगा। कमरे में कई तरफ़ भारी-भरकम परदे लगे हुए थे, बाथरूम का दरवाजा़ परदे से ढके होने की वजह से उनकी नज़र बाथरुम की तरफ़ नहीं पड़ी थी। कमरे में ही बाथरुम था, जो खोजने पर मिला।

बिहार लोकभवन के रिज़र्व टेबिल पर खाना खाते टीम गुफ़्तगू के लोग।

 हमारे लिए जो सेवक लगाया गया था, उससे आसिफ़ उस्मानी ने कहा कि मैं सुबह छह बजे ही काली चाय पीता हूं। उसके बाद ही बाथरूम जाता हूं। सेवक ने कहा-‘सुबह छह बजे आपको काली चाय मिल जाएगी।’ थोड़ी देर तक बात करने के बाद ही हमलोग सो गए। सुबह आठ बजे से ही चले थे, काफी थक गए थे। अगले दिन ठीक सुबह छह बजे कमरे की घंटी बजी। मैंने दरवाज़ा खोला, चाय-बिस्किट लिए सेवक खड़ा था। आसिफ़ उस्मानी ने उस सेवक से कहा कि हिन्दी का जो भी अख़बार आता हो, ले आओ। हमने चाय-बिस्किट का आनंद लिया, फिर बाथरूम गए। थोड़े ही देर में हमारे कमरे में ‘हिन्दुस्तान’ अख़बार आ गया। मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी भी हमारे ही कमरे में आ गए। एक बार फिर से हमने चाय के लिए आर्डर किया। इस बार चार लोगों के लिए चाय-बिस्किट आ गया। बातचीत करते-करते सुबह के नौ बज गए। तभी एक सेवक आकर बोला, आप लोग आइए नाश्ते के लिए। पास के ही कमरे में डाइनिंग टेबिल लगी थी। वहां अनिल जी और एक-दो लोग बैठे थे, हम भी पहुंच गए। मुझसे मुख़ातिब होते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में अनिल जी बोले-‘बाथरुम मिला था या नहीं।’ हमलोग भी हंस पड़े। फिर हम सभी ने नाश्ता किया। 

रात में गवर्नर साहब से बातचीत के दौरान ही मैंने उनको बताया दिया था कि मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ अपनी किताब ‘मशवरा’ लेकर आए हैं। आपके हाथों विमोचन कराना चाहते हैं। उन्होंने कहा था कि-’सुबह विमोचन हो जाएगा, तब हमारा कमैरामैन और अन्य लोग भी रहेंगे।‘ नाश्ते के बाद हमें गवर्नर साहब के ऑफ़िस में ले जाया गया। बीच वाली कुर्सी गर्वनर साहब के लिए थी। बाकी अगल-बगल वाली कुर्सियों पर हमलोग बैठ गए। थोड़ी ही देर में गवर्नर साहब आ गए। उन्होंने आते ही सेवक से चाय लाने को कहा। चाय आ गई। फिर उन्होंने कहा- ’किताब लाइए, विमोचन हो जाए।’ तब तक फोटोग्राफर और कई अन्य लोेग भी आ चुके थे। विमोचन हो गया, फोटोग्राफी भी हो गई।

पंजाब, हरियाण, दिल्ली और चंडीगढ़ दिवस पर बिहार लोकभवन में आयोजित हो रहा रंगारंग कार्यक्रम।

मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी ने कहा कि ’बिहार विधान सभा की कार्यवाही चल रही है, हमलोग देखना चाहते हैं।’ फिर मैंने अनिल से इनकी इच्छा बताई। अनिल जी कहा कि आप लोग देर से बता रहे हैं, फिर भी मैं पास बनवाने की कोशिश करता हूं। बहरहाल, थोड़ी देर में ही इन दोनों का पास बन गया। तन्हा और महरानी लोकभवन की गाड़ी में ही बैठकर बिहार विधान सभा गए। वहां बहुत लोगों के साथ-साथ इनकी मुलाकात मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से हुई। लगभग दो घंटे बाद ये लोग बिहार विधान सभा से लौटकर आए। इस दौरान मैं और आसिफ़ उस्मानी साहब अपने कमरे में ही रहे।

फिर, गवर्नर साहब से हमने पटना के गुरुद्वारा और ‘खुदाबख़्श लाइब्रेरी’ जाने की इच्छा जताई। हमारी बात सुनकर पास में खड़े पीए ने कहा कि आइए सारे इंतज़ाम करा देता हूं। गवर्नर साहब ने कहा कि दिन में मुझे कई कार्यक्रमों में जाना है, शाम को हमलोग फिर से साथ बैठेंगे। यह कहकर गवर्नर साहब अपने निर्धारित कार्यक्रम के लिए निकल गए। गवर्नर हाउस के एक सीनियर कर्मचारी ने आकर हमसे कहा कि आप लोगों के लिए नीचे कार तैयार है, आ जाइए। हम चारों लोग लिफ्ट से नीचे आ गए। गवर्नर हाउस की कार में चालक पहले से ही तैयार बैठा था। हमलोग भी बैठ गए।

 विभिन्न रास्तों से होते हुए हमारी कार गुरुद्वारे के दरवाज़े पर पहुंची। पहले से ही यहां हमारे आने की सूचना दी जा चुकी थी। कार के रुकते ही सिख धर्म का एक आदमी हमारी कार के दरवाज़े पर आया। हमें बहुत ही सम्मान के साथ गुरुद्वारे के अंदर ले गया। पहले हमें गुरुद्वारे के गेस्टरूम में ले जाया गया। वहां, पहले हमें पानी दिया गया, फिर थोड़ी ही देर में सबके लिए चाय आ गई। हमने चाय पी। इसके बाद गुरुद्वारे का ही एक आदमी हमें साथ ले गया। गुरुद्वारे के विभिन्न हिस्सों से हम घूमते हुए निकल रहे थे, काफ़ी भीड़ थी। भीड़ से ही लग रहा था कि यह कोई ख़ास और ऐतिहासिक गुरुद्वारा है। हमें प्रसाद दिया गया, साथ ही गेरूआ रंग का शॉल भी दिया गया। मैंने ग़ौर किया-यह शॉल सिर्फ़ हमीं चार लोगों को ही दी गई, अन्य जो लोग घूम रहे थे, उन्हें नहीं दिया गया। फिर गुरुद्वारे के उस हिस्से में हम गए, जहां लंगर चल रहा था। मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी अन्य लोगों के साथ लंगर खाने के लिए कतार में बैठ गए। बुजुर्गों के खाने के लिए दो-तीन बेंच और टेबिल लगे हुए थे। आसिफ उस्मानी अपनी लंगर की थाली को लेकर उसी बेंच पर बैठ गए। मैं भी उनके साथ बैठ गया, लेकिन मैंने लंगर की थाली नहीं ली, मेरा खाना खाने का मन नहीं कर रहा था। तीनों लोगों के लंगर खा लेने के बाद हम गुरुद्वारे के दरवाज़े की तरफ़ आ गए। दरवाजे़ पर खड़ी कार में चालक हमारा इंतज़ार कर रहा था।

  हम सभी कार में बैठे और फिर ‘खुदाबख़्श लाइब्रेरी’ की तरफ़ चल पड़े। थोड़ी ही देर में लाइब्रेरी पहुंच गए। यहां भी हमारे आने की सूचना पहले ही दे दी गई थी। कार के पहुंचते ही लाइब्रेरी के दो कर्मचारी आ गए। सलाम किए और अंदर ले गए। मोहम्मद असग़र साहब के चैम्बर में हमें बिठाया गया। पहले चाय-बिस्किट हमें पेश किया गया। इसके बाद असग़र साहब ने लाइब्रेरी में मौजूद बहुत सारे पुराने कु़रआन दिखाए, कई ऐसे कु़रआन भी इस लाइब्रेरी में है, जो पांचवीं और छवीं शताब्दी के हैं, जिन्हें सोने से लिखा गया। और बहुत सारी ऐतिहासिक किताबें दिखाई गईं। फिर मैंने उत्सुकता से पूछा-यहां ‘गुफ़्तगू’ पत्रिका भी भेजी जाती है, वह कहां रखी है। असग़र साहब हमें साथ उस ओर ले गए, जहां गुफ़्तगू पत्रिका रखी हुई थी, हमने उसकी फोटो ली। लाइब्रेरी का पूरा मुआयना करने के बाद हम वापस गवर्नर हाउस आ गए। शाम के छह बज गए थे। गुरुद्वारे में मैंने लंगर नहीं खाई थी, इसलिए भूख लग गई थी। मगर, यह खाने का वक़्त भी नहीं था। इसलिए अपने कमरे में पहुंचकर मैंने टोस्ट और चाय लाने को कहा। थोड़ी ही देर में ढेर सारा टोस्ट और चाय आ गया। मेरे साथ अन्य तीन लोगों ने भी चाय-टोस्ट लिया। फिर आराम करने का मन हुआ। अपने-अपने बेड पर लेट गए।

  रात के आठ बजे हमें खाना खाने के लिए बुलाया गया। हमारे साथ कई अन्य लोग भी ख़ाना खाने बैठे। दो लोग कश्मीर से भी थे। गवर्नर साहब ने सुबह ही कह दिया था कि आज के खाने में आप लोगों को मखाने का हलवा खिलवाऊंगा, यहां का बहुत ख़ास डिश है। खाना खाने के बाद मीठे के तौर पर मखाने का हलवा दिया गया। हम सभी ने बड़े चाव से उसका आनंद लिया। फिर हम अपने कमरे में आ गए। तकरीबन 20 मिनट बाद हमें यह कहकर बुलाया गया कि गवर्नर साहब बुला रहे हैं। एक दूसरे कमरे मे हम पहुंचे, जहां सोफे-कुर्सियां लगी थीं। हम पहले उस कमरे में पहुंचे, तुरंत ही गवर्नर साहब भी आ गए। फिर उन्होंने ‘कहवा’ का आर्डर दिया, हमने कहवा का आनंद लिया। फिर बातचीत शुरू हुई। बातचीत करते 11 बज गए।

पटना के खुदाबक्श लाइब्रेरी में दूसरी किताबों के साथ ‘गुफ़्तगू’ पत्रिका।

 मनमोहन सिंह तन्हा ने पहले ही बताया था कि कि कल बैंक में एक ज़रूरी काम है, इसलिए बिल्कुल सुबह ही निकलना पड़ेगा। सुबह जल्दी निकलने की बात जब गवर्नर साहब से बताई गई, तो वे नाराज़ हो गए, बोले-नाश्ता करने के बाद 10 बजे तक निकलिए। लेकिन, जब मनमोहन सिंह तन्हा ने अपना ज़रूरी काम बताया तो उन्होंने सुबह निकलने की इज़ाज़त दे दी। सुबह छह बजे निकलने की प्लानिंग हुई, इसलिए रात में ही गवर्नर साहब से हमलोगों ने विदाई ले ली। हमलोग अपने कमरे मे आ गए। थोड़ी ही देर में अनिल जी गवर्नर हाउस के बैग में रखे हुए हमलोगों के लिए गिफ़्ट लेकर आ गए, हमने उसे सहर्ष रख लिया और फिर सो गए। सुबह पांच बजे ही मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने हमारे कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। मैं और आसिफ़ उस्मानी उठ गए। फ्रेश होने के बाद हम चारो ने एक साथ अपने कमरे में ही चाय-टोस्ट वगैरह लिए और फिर प्रयागराज के लिए निकल गए। शाम चार बजे तक घर पहुंच गए।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित ) 


बुधवार, 12 अगस्त 2026

 कबीर, रहीम की तरह साधक हैं डॉ. सोमनाथ: अतुल

डॉ. सोमनाथ शुक्ल की पुस्तक ‘श्रम-साधक’ का हुआ विमोचन

बालीवुड अभिनेता का ‘गुफ़्तगू’ ने किया नागरिक अभिनंदन

अतुल तिवारी

प्रयागराज। डॉ. सोमनाथ शुक्ल के दोहे पढ़कर सहज ही कहा जा सकता है कि इन्होंने कबीर और रहीम की तरह साधना करके काव्य रचा है। इतनी आसानी से मजदूरों और श्रमिकों को रेखांकित करते हुए दोहा लिख देना बहुत बड़ी बात है। ‘श्रम साधक’ पुस्तक में इन्होंने जिस तरह से मजदूरों की हालात को रेखांकित किया है, वह आज दौर में बहुत अधिक ही उल्लेखनीय है। यह बात 09 अगस्त की शाम गुफ़्तगू की तरफ से सिविल लाइंस स्थित एक होटल में डॉ. सोमनाथ शुक्ल की पुस्तक ‘श्रम-साधक’ के विमोचन अवसर पर बॉलीवुड अभिनेता अतुल तिवारी जी ने कही। 

श्री तिवारी ने कहा कि यह पहली बार है कि किसी शहर ने मेरा नागरिक अभिनंदन किया है, वर्ना मेरे होम सिटी लखनऊ ने कभी नागरिक अभिनंदन नहीं किया। इसके लिए मैं गुुफ़्तगू संस्था का आभारी हूं।

डॉ. सोमनाथ शुक्ल की पुस्तक ‘श्रम-साधक’ का विमोचन करते अतिथिगण

डॉ. सरोज सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि डॉ. सोमनाथ जी ने दोहा लिखने के लिए जिन मुद्दों को उठाया है, आज के दौर में इस मुद्दे पर काव्य का लेखन नहीं हो रहा, अलबत्ता कहानियां लिखी जा रही हैं। डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि डॉ. सोमनाथ शुक्ल हमारे दौर के बहुत ही प्रतिभावान कवि हैं, ऐसे लोगों का सम्मान होना चाहिए। डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कहा कि इस पुस्तक में कुछ ऐसे दोहे हैं, जो मेरे जीवन से जुड़े हुए हैं। न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. सोमनाथ शुक्ल की किताब बेहद सराहनीय और ख़ास है। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा और धन्यवाद ज्ञापन नरेश कुमार महरानी ने किया।

फिल्म अभिनेता और कवि अतुल तिवारी का नागरिक अभिनंदन करते टीम गुफ़्तगू के लोग

इस मौके पर प्रभाशंकर शर्मा, नीना मोहन श्रीवास्तव, शैलेंद्र जय, आसिफ़ उस्मानी, डॉ. एस.एम. अब्बास, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, शिबली सना, अफसर जमाल, शिवाजी यादव, मंजुलता नागेश, सुनील दानिश, धीरेंद्र सिंह नागा, क्षमा द्विवेदी, शाहीद खुश्बू आदि मौजूद रहे।


सोमवार, 3 अगस्त 2026

सज्जाद ज़हीर को नहीं रास आया पाकिस्तान

मज़हब की बुनियाद पर बने मुल्क को छोड़ने का लिया था फैसला

पाकिस्तान में हो गई थी उम्रकै़द, पंडित नेहरु ने ज़हीर को छुड़वाया

                                                                          - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


 प्रगतिशील लेखक संघ का ज़िक्र आते ही सबसे पहले सज्जाद ज़हीर का नाम जे़ह्न में अपने-आप आ जाता है। 11 सितम्बर 1973 को लखनऊ में जन्मे सज्जाद ज़हीर ने ही मुल्कराज आनंद और ज्योतिर्मय घोष के साथ मिलकर 1935 में इंग्लैंड में प्रलेस का गठन किया था। 21वीं सदी के प्रथम दशक तक इस संघ ने बहुत शानदार काम किया है, मगर अब कई मुद्दों पर भटकता हुआ-सा दिखता है। सत्ता की महत्वाकांक्षा और खुद को सबसे बेहतर साबित करने की मंशा के कारण यह संगठन अपने मूल उद्देश्यों से ही भटक गया है। हालांकि कुछ शहरों में यह संगठन अब भी अच्छा कार्य कर रहा है।

सज्जाद ज़हीर

 सज्जाद ज़हीर की बेटी नादिरा ज़हीर बब्बर बताती हैं-‘‘सैंतालिस में जब देश आज़ाद हुआ  उस वक़्त अब्बा पाकिस्तान में थे। पाकिस्तान तो इस्लामिक विचार से बना था इसलिए वहां पर कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करने वालों की धर-पकड़ शुरू हो गई, अब्बा इसी पार्टी के लिए काम करते थे। इसी वजह से वो अंडरग्राउंड हो गए, लेकिन फाइनली उनको किसी ने मुख़बिरी करके पकड़वा दिया और उनको उम्रकैद हो गई। फिर यहां पर मेरी मां ने अपने तीनों बच्चों को पाला। उस समय मेरी मां और हम लोग लखनऊ में ही थे। मैं उस समय बहुत छोटी थी, मां ने बहुत मेहनत की। हम तीनों बहनों को लेकर एक बार पाकिस्तान भी गई थीं, अब्बा से जेल में मिलीं। जब उनसे हम मिलने पहुंचे तो अब्बा ने कहा तुम लोग भी यहीं आ जाओ तो मिलने में आसानी रहेगी। लेकिन उस समय मेरी मां ने फैसला लिया कि मैं ऐसे मुल्क में नहीं रहूंगी जो मज़हब की बुनियाद पर बना हो। अब्बा ने मेरी मां की बात पर सहमति जताई, फिर हम वापस लखनऊ आ गए।

अपनी पत्नी और चारो बेटियों के साथ सज्जाद ज़हीर।

 

 उस वक़्त मां ने बहुत मेहनत की और अब्बा को लाने की कोशिश की। जवाहरलाल नेहरू से मिलीं। उनसे कहा कि-‘‘मेरा शौहर तो पाकिस्तान में कैद है और यहां के लोग बोलते हैं कि जब हिन्दोस्तान आज़ाद हुआ तो सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान में थे, तो वो पाकिस्तानी हो गए। सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान में जेल में बंद हैं, हम लोग पूरी फैमिली यहां हैं तो हम लोग पाकिस्तानी कैसे हो गए।’’ उस वक़्त मोरारजी देसाई गृहमंत्री थे, उन्होंने इनके ख़त पर लिख दिया कि ये तो पाकिस्तानी हैं, हमको इनसे कोई लेना-देना नहीं है। फिर जवाहरलाल नेहरू साहब ने हस्तक्षेप करके, पाकिस्तान सरकार से बात करके उनको रिहा कराने की कोशिश की और सज्जाद ज़हीर दिसंबर 1957 में भारत वापस आ पाए। अब्बा के वापस भारत लौटने के बाद मेरी सबसे छोटी बहन नूर ज़हीर का जन्म हुआ, इससे पहले हम तीन बहनें थीं।’’ 

 नादिरा बताती हैं-‘‘अब्बा के पाकिस्तान से वापस आने के बाद हम लोग दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। दिल्ली में कोई घर नहीं था तो किराए का घर लिया जिसका साढ़े तीन सौ रूपया किराया था। दो बेडरूम थे, एक हॉल था और किचन था। हम लोग चार बहनंे थीं, एक कमरे में हम सब बहनें रहती थीं। एक में अब्बा रहते थे। रात में अब्बा हॉल में चले जाते थे, मेरी छोटी बहन उन्हीं के पास सोती थी। खाना हमारे यहां बहुत अच्छा बनता था। अब्बा को इंदिरा गांधी जी भी जानती थीं, क्योंकि इंदिरा जी के साथ भी उन्होंने काम किया था। जब शिमला समझौता हुआ था तो अब्बा वहां साथ में गए थे। मैं भी अब्बा के साथ थी। उस वक़्त बाद में इनको दिल्ली में रहने के लिए मकान इंदिरा जी ने दिया था और कहा कि आपने हमारे लिए जो काम किया है, उसके लिए ये एक छोटी सी भेंट है।’’

बाएं से-सज्जाद ज़हीर, कृष्ण चंदर, फ़िराक़ गोरखपुरी और जोश मलीहाबादी।

सज्जाद ज़हीर के जेल में बंद होने के दौरान जब उनकी पत्नी और बच्चे वापस लखनऊ अपने घर आ गए, तब यहां सर वजीद हसन साहब की कोठी में ये लोग रहते थे। उनके परिवार के पाकिस्तान से लौट आने पर सज्जाद ज़हीर की मां को बहुत बुरा लगा। उन्होंने अपनी बहू से कहा कि तुम गई थी, मगर मेरे बेटे को वापस लिए बिना लौट आई ? वह तुम्हारी वजह से ही बिगड़ गया। तुम उसको मना नहीं कर सकती थी कि वो कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम न करे? तुमको मना करना चाहिए था। तुम्हें यहां रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम अब यहां नहीं रह सकती हो। इस पर उनकी पत्नी रज़िया ने कहा कि घर में न सही हमको इस घर के बाहर बने आउटहाऊस में ही रहने दीजिए। किसी तरह आउटहाऊस में रहने की इज़ाज़त मिल गई। 

 आउटहाऊस की स्थिति अच्छी नहीं थी, बरामदे में बहुत बड़ी-बड़ी घास थी, पत्थर थे, सांप थे। सब साफ कर इन लोगों ने रहना शुरू किया। बाद में यहीं पर प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकें होने लगीं। पत्नी रज़िया ज़हीर ही बैठक करती थीं। सज्जाद भाई बन्ने भाई के नाम से मशहूर थे। सब लोग उन्हें बन्ने भाई ही बोलते थे। उस वक़्त रज़िया ने अदब से संबंधित कामों का बीड़ा उठाया हुआ था। उस समय भी जब लोग मिलने के लिए आते थे तो उनकी सास सब पर नज़र रखती थीं कि कौन आया, कहां से आया ? पूछती थीं भाई तुम कौन हो, किसके लड़के हो, ज़रा सी भी वो बोलने में चूक जाए तो वो पकड़ लेती थीं। तुम तो वो नहीं हो। तुम उनके लड़के तो नहीं हो। उसके तो तीन बेटे हैं, तुम कौन से वाले हो, इस तरह से वो सब पर चौकीदारी करती थीं, निगाह रखती थीं। बाद में लोरगों के आने-जाने के लिए पीछे की तरफ से एक दरवाज़ा बनाया गया। 

राजेंद्र सिंह बेदी और गु़लामी रब्बानी ताबां के साथ सज्जाद ज़हीर।

नादिरा बताती हैं-‘‘मेरे अब्बा बहुत अच्छे इंसान थे। एकदम नर्म मिज़ाज, चुपचाप रहने वाले, वो ज़्यादा बात भी नहीं करते थे, मुस्कराते रहते थे। किसी से रूडली तो कभी बात ही नहीं करते थे। अम्मी की बहुत इज़्ज़त करते थे। उनको कुछ कहा ही नहीं कभी। मिसाल के तौर पर खाना जैसे लगता था, हमेशा बैठ जाते थे और सबसे पहले डोंगा उठाकर अम्मी को देते थे और कहते थे - लीजिए रज़िया। अम्मी ये इन सब चीजा़ें से बजाय खुश होने के नाराज़ होती थीं।‘‘ 

 नादिरा यह भी कहती हैं-‘‘हम लोग नैनीताल जाते थे। वहां पर किसी का एक कॉटेज था, जो अम्मी की वजह से मिल जाता था। वह छह कमरे का था और सब कमरे अच्छे थे।  उसमें खाना हम लोग खुद पकाते थे। शाम के वक़्त सब घूमने जाते थे। खाना अच्छा पका हो तो कहते थे-तुम लोग बहुत अच्छा पकाती हो, आज तो बहुत अच्छा पका है। तुम लोग पहले खाओ। कभी-कभार अम्मी टोक देती थीं, बेटा थोड़ा शर्म करो वो तुम्हारा बाप है, थोड़ा लिहाज करो, थोड़ी अच्छी बोटियां छोड़ दो उनके लिए, सब अपनी प्लेट में उड़ेल लोगी! मैं कहती-मैं क्या करूं वो तो खुद ही कह रहे हैं। वो कहते हैं पर तुम्हें भी तो अकल होनी चाहिए।’’

प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते सज्जाद ज़हीर।

नादिरा के मुताबिक अब्बा हम लोगों को पढ़ाते नहीं थे, अम्मी ही पढ़ाती थीं। लेकिन, अब्बा शायरों और शायरी के बारे में अच्छे से समझाते थे। अदब के बारे में भी समझाते थे। कैसे क्रिटिसिजम होता है, सब समझाते थे। बाकी मेरी दोनों बड़ी बहने बहुत ज़हीन थीं, वो ही पढ़ा देती थीं और कुछ अम्मी पढ़ा देती थीं। गणित पढ़ाने के लिए एक टीचर आते थे, इसहाक नाम था उनका। अम्मी ने कहा कि थोड़ा इसको भी दो-चार मिनट दीजिए और मैथ पढ़ा दिया करिए, क्योंकि मेरी मैथ बहुत वीक थी और मन भी नहीं लगता था। मन तो खेलने में रहता था। कैसे यहां से भागूं, खेलने जाऊं। वो कहते थे कहां है आपका ध्यान, कहां है आपका ध्यान। घर में सब अदब के लोग आते थे, बातें होती थी माहौल था और हम लोग भी बैठे रहते थे। हम सब सुनते थे इसलिए ये अपने आप आ गई। अलग से सिखाने के लिए कुछ नहीं था।

बाएं से - साहिर लुधियानवी, सज्जाद ज़हीर और जां-निसार अख़्तर।

 सज्जाद ज़हीर की चार बेटियों के नाम नजमा ज़हीर बक़र, नसीम ज़हीर भाटिया, नादिरा ज़हीर बब्बर और नूर ज़हीर हैं। उन्होंने कई किताबें लिखीं हैं, जो बहुत चर्चित रहीं हैं। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार ‘क़ौमी जंग’ और ‘नया ज़माना’ अख़बार में प्रधान सम्पादक की हैसियत से काम किया। लंदन में जर्नलिज्म की पढ़ाई, संपादकीय सूझ-बूझ और अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि की बदौलत इन पत्रों ने ज़ल्द ही लोगों के बीच अपनी पहचान बना ली थी। 13 सितंबर, 1973 को अल्माअता (सोवियत संघ) में (जो कि अब कज़ाकिस्तान में पड़ता है।) अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित)   


शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

अंग्रेज़ी का बहुत सारा सेकेंड ग्रेड राइटिंग है, जिसे भारतीय शान के साथ पढ़ रहे: राजेश जोशी 

 समकालीन हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, साहित्य में मानवीयता एवं समाजिक चेतना के पक्षधर और साहित्य अकादमी पुरस्कार, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार जैसे अनेक पुरस्कार से विभूषित राजेश जोशी का जन्म 18 जुलाई, 1946 को नरसिंहगढ़, मध्यप्रदेश में हुआ। वर्तमान में आप भोपाल में निवास कर रहे हैं। लेखन के अलावा आपने कुछ सालों तक पत्रकारिता किया, इसके बाद बैंक में भी कार्य किया। ‘एक दिन बोलेंगे पेड़’, ‘नेपथ्य में हंसी’, ‘मिट्टी का चेहरा’, तथा ‘दो पंक्तियों के बीच’, ‘सोमवार और अन्य कहानियां’, ‘कपिल का पेड़’, ‘जादू जंगल’, ‘कहन कबीर’, ‘टंकारा का गाना’ और ‘किस्सा कोता’ आदि आपकी चर्चित और  कृतियां हैं। ‘गेंद निराली मिट्टू की’ नामक एक बाल संग्रह के साथ-साथ ‘एक कवि की नोटबुक’ और ‘एक कवि की दूसरी नोटबुक’ के रूप में आलोचनात्मक टिप्पणियों पर आपकी दो किताबें भी प्रकाशित हुई हैं। आपने भर्तृहरि और मायकोवस्की की कविताओं का हिंदी अनुवाद भी किया है। अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’ ने इनसे मुलाकात करते विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है इसके प्रमुख अंश-


सवाल: हिन्दी साहित्य की ओर आपका रुझान कब, क्यों और कैसे हुआ ?

जवाब: साहित्य की तरफ मेरा रुझान तो शुरू से था। मेरे पिता संस्कृत के विद्वान थे, लेकिन हिन्दी में लिखते थे। इसलिए कुछ प्रभाव तो परिवारिक माहौल से और कुछ कवि सम्मेलनों को सुनने से पड़ा। हालांकि मैं तो साइंस से आया था, इसलिए बहुत ठीक से नहीं जानता था कि साहित्य क्या है। वर्ष 1972 के आसपास दो साहित्यिक मित्रों राजस्थान के अशोक आत्रे और कहानीकार वेणुगोपाल जी से हुई मुलाकात कालांतर में दोस्ती में बदल गई। फिर वो भोपाल में मेरे साथ ही मेरे कमरे पे रहने लगे। धीरे-धीरे वेणुगोपाल जी ने बताना शुरू किया कि समकालीन लेखन और समकालीन साहित्य क्या है?  और मुझे क्या-क्या पढ़ना चाहिए।  इस तरह धीरे-धीरे मैं साहित्य की तरफ प्रवृत्त हुआ। 

राजेश जोशी

सवाल: प्रारंभिक दौर में साइंस के विद्यार्थी होने के नाते, संक्षिप्तता के महत्व से आप भलीभांति परिचित हैं। साहित्य में भी संक्षिप्तता के महत्व पर आपका क्या विचार है ? 

जवाब: साहित्य में, विशेषकर कविता के लिए यह माना जाता है कि अच्छे साहित्यकार को शब्द मितव्ययी और कम से कम शब्दों में, अधिक से अधिक कह सकने की क्षमताएं रखना चाहिए। यही कविता का गुण और सौन्दर्य है। इसलिए मितव्ययिता साइंस और साहित्य दोनों जगह है। अच्छा साहित्य वही माना जाता हो जो कम में ज्यादा कहने की कुवत रखता हो। विज्ञान में तो आप फार्मूले के तरह हो जाते हैं, लेकिन साहित्य में फार्मूला नहीं हो सकता। तब भी, मितव्ययिता तो साहित्य, खासतौर से कविता का भी गुण है। गद्य में तो फिर भी आप थोड़ा ज्यादा कह सकते हैं पर कविता एक ऐसी विधा है जो आपको इस बात के लिए प्रेरित करती है कि आप मितव्ययी होकर अपनी बात को कहें। 


सवाल: एक शिक्षक तथा साहित्यकार के रूप में सामाजिक विकास जैसे चुनौतिपूर्ण कार्य में आप अपने आपको कैसे जोड़कर देखते हैं ? 

जवाब: शिक्षक भी बच्चों को पढ़ा कर भविष्य का एक शिक्षित-सुसंस्कृत नागरिक बनाने का बहुत बड़ा सामाजिक कार्य ही कर रहा है। शिक्षा का जो काम है वही साहित्य का भी काम है। अतः साहित्य और शिक्षा के बीच में सदा एक संबंध बना ही रहा है। हम लोगों ने पहली कविता चाहे वह झांसी की रानी हो या चाहे कोई अन्य कविता हो, स्कूलों में किताब से ही,  सीखी थी। पुराने साहित्यकारों जैसे निराला, महादेवी या सुभद्रा जी को स्कूल में ही पढ़ा। इस तरह से दोनों का काम अलग-अलग स्तर पर एक जैसा ही है। साईंस में आप अलग-अलग फील्ड में जाते हैं। आप इंजीनियर, डाक्टर या साइंटिस्ट बनते हैं। ये भी साइंस के द्वारा किया गया, एक तरह का सामाजिक विकास का कार्य ही है। ऐसा ही एक कार्य यानी एक तरह की चेतना या मानसिक विकास का कार्य, भावनाओं को संयोजित करने-बनाने का काम, साहित्य भी करता है। इस तरह शिक्षा द्वारा किया गया विकास कार्य, साहित्य द्वारा किए जा रहे विकास कार्य से कोई बहुत अलग नहीं है। 

राजेश जोशी से बातचीत करते अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’।

सवाल: हिन्दी साहित्य लेखन में किस विषय/विमर्श को आप ज्यादा पसंद करते हैं? 

जवाब:  मुझे लगता है कि साहित्य में स्मिता विमर्श, हमारे यहां खासतौर से नब्बे के दशक आसपास ही शुरु होता है। उससे पहले स्मिता विमर्श का हमारे यहां उतना दबाव नहीं था। आजकल कई विषयों पर जो विमर्श चल रहे हैं, उन विषयों पर काम बहुत पहले से ही शुरु हो गए थे। मराठी में महात्मा फूले की पत्नी सावित्रीबाई फूले शिक्षा के लिए काम कर रही थीं और हमारे यहां महात्मा गांधी ने भी स्त्रियों को घर से बाहर निकलने या स्वाधीनता संग्राम आन्दोलन से जोड़ने के अतिरिक्त तमाम चीजें जैसे जाति तोड़ो, मंदिर प्रवेश के आंदोलन किए। ये सारे काम, अब इन विमर्शों के अंदर मान लिए गए हैं। अत: विमर्श के जो काम अब विमर्श के अंदर आ रहे है, वो हमारे समाज में पहले भी हो रहे थे। स्वाधीनता उस समय सबसे बड़ा मुद्दा था। अतः विमर्श का काम सेकेंडरी हो जाता था। 1990 के बाद जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो एक तरह से सारे विमर्श जिन्हें सबाल्टर्न कहा गया है और जो गांधी के जमाने से चला आ रहा था परंतु उनका उतना उभार नहीं हो पाया था, वो सारे विमर्श नब्बे के बाद अचानक सतह पर आ गए। उसके बहुत सकारात्मक पहलू भी सामने आए। लेकिन किसी भी स्मिता विमर्श की एक सीमा है और वो उस सीमा से बाहर नहीं जा पाता। अक्सर समाज के बदलने का जो संघर्ष है, वहां तक न जाकर के, वो स्मिता के प्रश्न पर ही रुक जाता है। इसलिए स्मिता विमर्श की एक सीमा है और उसको लांघना ज़रूरी है। पूरे समाज को ही बदलना चाहिए। 


सवाल: जीवन के इस अंतराल में एक विज्ञानवेत्ता का अपने शैक्षिक क्षेत्र से हटकर, सामाजिक मुद्दों से जुड़े विषयों पर रचना करना आपको कैसा प्रतीत होता है।

जवाब: आप जब विज्ञान के किसी ख़ास तरह के अकादमिक डिसीप्लिन में काम कर रहे होते हैं तब आप एक बहुत सीमित यानी एक ही सब्जेक्ट पर काम कर रहे होते हैं। फिर जब आप इससे बाहर निकलकर, साहित्य या सामाजिक दुनिया में आते हैं तो आपका ये क्षेत्र बढ़ जाता है। आप ज्यादा जगह, ज्यादा चीज़ों को देख पाते हैं। अतः साइंस, सिर्फ एक सब्जेक्ट ही नहीं बल्कि चीजों को देखने की एक दृष्टि भी देता है। समाज, साहित्य या और दूसरी प्रॉब्लम्स को देखने की जो दृष्टि आपको साइंस देती है वो वैज्ञानिक दृष्टि अगर आपको मिल गई तो वो कहीं न कहीं पूरे समाज और पूरी दुनिया को ज्यादा बेहतर ढंग से देखने की सहूलियत आपको देती है। इसलिए मुझे लगता है कि आप एक सब्जेक्ट की अकादमिक दुनिया से जब बाहर निकलते हैं तो इस बढ़ते हुए क्षेत्रफल के साथ-साथ, मिल रही संतुष्टि भी निश्चित ही ज्यादा लगती है कि आप ज्यादा बड़े एरिया में काम करके, जीवन को ज्यादा बड़े फलक पर समझ रहे हैं। हालांकि हर क्षेत्र और समय का अपना महत्व है। 


सवाल: साहित्यकार को कविता, कहानी, नाटक आदि आम पाठक या आलोचक में, किसके लिए लिखना चाहिए ? 

जवाब: रचनाकार, आलोचक को खुश करने के लिए नहीं लिखता, बल्कि वो पाठक के लिए लिखता है। लेकिन उसका काम पाठक की रुचि को बदलकर, पाठक की समझ को बढ़ाकर, विकसित कर, उसे शिक्षित करना भी है। हम लोगों ने प्रारंभिक कक्षाओं में धीरे-धीरे पढ़कर ही तुलसीदास, निराला, पंत या प्रेमचंद को या गद्य को जाना। आप धीरे-धीरे सीखते हैं। शुरु में तो ऐसा लगता है कि ये आपकी रुचि का तो नहीं है, पर पढ़ते-पढ़ते आपकी रुचि बदलती है। इसलिए रचनाकार एक समझ को विकसित करने का काम भी करता है। लेखक, पाठक की रुचि से संचालित नहीं होता। पाठक की रुचि को एक तरह से वो अपनी रचना से कहीं न कहीं समृद्ध भी करता है। उसकी समझ को समृद्ध करता है। इसलिए लेखक का ये दायित्व ज्यादा है कि वो पाठक को आगे की बात बताए और उसको ज्यादा समृद्ध करे। उसकी समझ को समृद्ध करे तभी वो कुछ काम कर पाएगा। आलोचक का काम तो तब शुरू होता है जब रचना हो चुकी होती है। कुछ कामर्शियल लेखक जरूर इस तरह से लिख रहे हैं कि पुरस्कार या कीर्ति मिल जाए या आलोचक की नज़र में आ जाए। एक वास्तविक लेखक क्या इस बात की कभी परवाह कर सकता है कि आलोचक की क्या रुचि है वो क्या कहेगा और न ही वो इसके लिए क्षेत्र में आता है। इसलिए आलोचक का काम तो बाद का है कि वो रचना पढ़े और अगर ठीक लगे तो उसे जैसी लगे वैसा लिखे एवं वो उससे खुद भी समृद्ध हो। रचना पढ़कर ही तो आलोचक की समझ बनेगी। इसलिए रचना मूल काम है और बाकी लोगों का काम सेकेंडरी है।  


सवाल: क्या कारण है कि किसी विचारधारा के पक्षधर साहित्यकार की रचनाओं में अक्सर अंतर्विरोध नजर आते हैं ?

जवाब: हम लोगों ने विचारधारा के सवाल को बहुत सीमित करके मान लिया है। कोई भी रचनाकार बिना किसी विचार के तो वह नहीं लिखेगा। किसी न किसी विचार से वह अवश्य जुड़ा होगा। कालीदास शैव थे और शैवों की जो वैचारिक परंपरा थी उससे संचालित हो रहे थे। तुलसी या कबीर के पास भी अपनी एक विचार प्रणालियां थी। ऐसा बहुत बार ज़रूर होता है कि एक विचारधारा के रहते हुए भी आपमें कई अंतर्विरोध दिखाई देते हैं। तुलसी में बहुत सारे अंतर्विरोध हैं। एक समय तुलसी जो शबरी के जूठे बैर, राम को खिला रहे हैं वही तुलसी, वर्ण व्यवस्था और शंबूक वध का समर्थन भी कर रहे हैं। वहीं इस बात को भी कह रहे हैं कि ब्राम्हण चाहे मूर्ख हो तो भी वो पूज्यनीय है और दलित चाहे विद्वान हो तो भी वो पूजनीय नहीं है। यह तुलसी का अपना अंतर्विरोध है। हम एक समाज में रह रहे हैं। हम पर उसके जो प्रभाव होंगे उसके कारण अंतर्विरोध होंगे। आप पर कोई न कोई चीज़ प्रभाव डालेगी ही और उसकी वजह से कुछ न कुछ अंतर्विरोध आएगा ही। कुछ अंतर्विरोध से आप निपट भी लेते हैं। ये हो सकता है कि वो विचारधारा की दृष्टि से गड़बड़ हो। हालांकि किसी भी रचनाकार में अंतर्विरोध की एक सीमा होती है। हर रचनाकार की वैचारिक ज़मीन बुनियादी रूप से मनुष्य के पक्ष की होगी, जिसके बिना आप रचनाकार नहीं हो सकते। महात्मा गांधी कहते हैं कि पेरीफेरी पे खड़े, अंतिम मनुष्य के लिए मुझे काम करना है। अत: सीधी सी बात यह है कि इस अंतिम मनुष्य के पक्ष में अगर आप नहीं हैं तो फिर आप रचनाकार तो नहीं हैं।

पुरबा (बेटी), राजेश जोशी और निरूपा जोशी (पत्नी)।

सवाल: साहित्य रचना आपको आत्मिक सुख तो प्रदान करती है पर आजीविका का साधन नहीं हो सकती। इस कथन पर आपका क्या दृष्टिकोण है ?

जवाब: हमारे यहां खासकर हिंदी में ये समस्या थोड़ी बड़ी है कि आप फ्रीलांस राइटर रहकर काम नहीं कर सकते। हालांकि, हिंदी में कई बड़े लेखक जैसे शरद जोशी, हरिशंकर परसाई, अमृत लाल नागर, शैलेश मटियानी ऐसे कुछ नाम हैं, जो स्वतंत्र लेखन में फ्री लांसर हैं। इन्होंने थोड़े-थोड़े दिन नौकरी की, फिर नौकरी छोड़ कर, स्वतंत्र लेखन की तरफ गए।  परंतु ऐसे चांस बहुत थोड़े हैं। हर विधा में तो ये संभव नहीं हो पाता जैसे कविता में ये संभव नहीं है। गद्य में ये थोड़ा संभव है। गद्य में आप कालम लिख सकते हैं। आप अख़बारों के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन फिर भी फ्रीलांस करना हिंदी में तो कठिन है। इसलिए ज्यादा बेहतर स्थिति तो वो होती है कि जीविका के लिए आपके पास कोई निश्चित साधन हो और आप अपनी मरजी से, बिना किसी दबाव के लिख सकें। फ्रीलांसर अगर आप हैं तो बहुत सारे दबाव भी आप पर होते हैं। कुछ भाषाओं में तो आप फ्रीलांस कर सकते हैं। बांग्ला में तो  पूजाअंक के लिए लेखक साल भर में एक रचना लिखता है और उसका साल भर का काम निकल जाता है। कुछ भाषाओं में हो सकता है कि इतना पैसा मिल जाय और वो अपनी मर्जी से काम कर सके, पर हिंदी में अभी ये थोड़ा दिक़्क़त है।


सवाल: विश्वविद्यालयों में साहित्य पर शोध कार्य तो बहुत किया जा रहा है, परंतु तमाम प्रयासों के बावजूद विश्वविद्यालय में कहानी, कविता, उपन्यास के क्षेत्र में नये विषयों पर मौलिक लेखन संबंधित अपेक्षित कार्य नहीं हो पा रहा है, इस पर आपका क्या विचार है।

जवाब: हमने शोध का जो ढांचा बनाया कि थीसिस इस तरह की, सिनाप्सिस वगैरह ऐसी और इस इस तरह से उसके विभाजन होंगे, वो ढंग ही अपने आप में काम करने वाले को क्षात्र को बहुत जकड़ लेता है और उससे कोई नया विचार या नई बात नहीं पैदा होती यानी उससे कोई सृजनात्मक काम संभव नहीं है। वो अकादमिक महत्व का ही है। अकादमिक काम की भी एक सीमा होती है। शोध कार्य को बहुत अकादमिक बना दिया गया है।  विश्वविद्यालयों में कुछ सालों पहले, इस तरह का माहौल बना था कि अगर आपने कोई बहुत अच्छा सृजनात्मक कार्य जैसे उपन्यास, कोई महत्वपूर्ण संग्रह या आलोचना की बहुत महत्वपूर्ण किताब लिखी, तब उसका भी मूल्यांकन करके, आपको पीएचडी दी जा सकती थी। यह व्यवस्था बाद में ख़त्म हो गई। मुझे तो हमेशा ये लगता है कि अगर किसी को शोध कार्य करना हो तो करे, मगर कोई सृजनात्मक कार्य करे तो उसका भी मूल्यांकन करके आप उसको पीएचडी दीजिए। पीएचडी हमेशा एक बंधे-बंधाए काम पर और शोध पर ही क्यों दिया जाए। किसी भी आदमी ने अगर आलोचना में या किसी भी विधा में कोई अच्छा गंभीर, मौलिक काम किया है तब उसे भी पीएचडी मिलना चाहिए। बहुत बड़ी संख्या में हो रहे शोधकार्य के कारण, इसे नौकरियों में अनिवार्य कर दिया गया है। इसलिए बेचारे बच्चे जैसे तैसे इसे पूरा करते हैं मगर उसमें उनकी प्रतिभा भी नष्ट हो रही है। विद्यार्थी के हाथ में तो कुछ है नहीं। वो चाहता है कि किसी तरह से पीएचडी पूरी हो जाए तो मैं नौकरी के लिए अप्लाई करूं। इसलिए शोध के ढांचे को बदलने की ज़रूरत है। 

बाएं से - विनोद दास, राजेश जोशी, विजय कुमार, अनूप सेठी और निरूपा जोशी (पत्नी)।

सवाल: नई पीढी नौजवानों मे हिंदी में पठन पाठन के घटते रुझान पर आपको क्या महसूस होता है ?

जवाब: वास्तविकता तो ये है कि भाषा का सम्मान जब तक नहीं बढ़ेगा, साहित्य का सम्मान भी नहीं बढ़ेगा। साहित्य का सम्मान तब ही बढ़ता है जब भाषा का सम्मान बढ़ता है। रूस में जब क्रांति हुई तो रूसी भाषा का सम्मान बढ़ा, तब हम सबने जाना टॉलस्टॉय, गोर्की और तमाम लोगों को। जब भाषा का सम्मान बढ़ा तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूसी में लिखे जा रहे साहित्य का भी सम्मान बढ़ा। कई भाषा में अनुवाद होना शुरू हुआ। जब आप अपनी भाषा को सम्मान दिला पाएंगे तब ही आप अपेक्षा कर पाएंगे कि लोग हिंदी साहित्य की तरफ भी जाएं। यहां दिक़्क़त ये है कि बहुत सारे लोग इस गलतफहमी में हैं कि अंग्रेज़ी में सब कुछ बहुत अच्छा लिखा जाता है। अंग्रेज़ी में कुछ तो बहुत कूड़ा लिखा गया है। अंग्रेज़ी में जितना पल्प राइटिंग है उतना हिंदी में नहीं है। बहुत पल्प है और वो पूरे मार्केट में बिखरा पड़ा है। ये बहुत सजावट के साथ बेचा जाता है और क्योंकि अंग्रेज़ी बहुत कम लोग जानते हैं तो अंग्रेज़ी की कोई बहुत ही दो कौड़ी की किताब हाथ में लेकर, लोग समझते हैं कि वो कोई बहुत महान काम या सम्मानित किताब लिए हुए हैं। शिवपुराण को अंग्रेजी में पढ़कर, एक लेखक ने शिव पर तीन चार उपन्यास लिख दिए। वो बहुत ज्यादा बिके। उनका हिंदी अनुवाद हुआ।मेरा यह कहना है कि उसको पढ़ने से पहले ओरिजनल शिवपुराण पढ़ लो। लोगों को ये नहीं मालूम कि ये सारे काम, हिंदी और संस्कृत में बहुत पहले हो चुका जो आप अभी समझ रहे हो कि आप कोई बहुत बड़ा काम पढ़ रहे हो या देख रहे हो। अंग्रेजी का बहुत सारा सेकेंड ग्रेड राइटिंग है वो थोड़ा-बहुत अंग्रेजी जानने वाले हमारे भारतीय लोग बहुत शान के साथ पढ़ रहे हैं। 


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 22 जुलाई 2026

 गुफ़्तगू ने मनाया 24 साल की साहित्य साधन का जश्न

पुस्तक ‘गुफ़्तगू परिवार’ का न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने किया विमोचन

केक काटकर गुफ़्तगू का 25वां स्थापना दिवस मनाया गया।

प्रयागराज। साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू ने आज अपनी स्थापना के 24 वर्ष पूरे करके 25वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है। किसी संस्था का लगातार इतने दिनों तक काम करना बेहद ख़ास और उल्लेखनीय है। संस्था के अध्यक्ष डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अपनी एक टीम बनाकर बहुत सारे उल्लेखनीय साहित्यिक कार्य किए हैं, यह सिलसिला अब भी जारी है। आज से ही यह संस्था अपनी स्थापना के सिल्वर जुबली वर्ष में प्रवेश कर गई है। इसका सिल्वर जुबली कार्यक्रम भी बहुता ख़ास होने जा रहा है। यह बात मंगलवार की देर शाम न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने सिविल लाइंस स्थित होटल विलास में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कही। इस मौके पर  ख़ास पुस्तक ‘गुफ़्तगू परिवार’ का विमोचन किया गया।

 पुस्तक ‘गुफ़्तगू परिवार’ को हुआ विमोचन

 डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अपने संबोधन में कहा कि हमारी टीम के सदस्यतों की मेहनत और लगन के कारण ही हम इतने कार्य कर रहे हैं। सिल्वर जुबली वर्ष के मौके पर 9 और 10 जनवरी को दो दिवसीय आयोजन किया जाएगा। जिसमें देश के बड़े साहित्यकारों के साथ-साथ बालीवुड के कई मशहूर अभिनेताओं को भी आमंत्रित किया जाएगा। संस्था के सचिव नरेश कुमार महरानी ने कहा कि हमलोग मिलजुल कर साहित्य का काम करते रहे हैं, आगे भी करते रहेंगे।

इस मौके पर प्रभाशंकर शर्मा, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, अनिल मानव, संजय सक्सेना, डॉ. नीना मोहन श्रीवास्तव, मुनेश्वर मिश्र, नारायण जी गोपाल, हकीम रेशादुल इस्लाम, राम नारायण श्रीवास्तव, अर्चना जायसवाल ‘सरताज’, अफ़सर जमाल, डॉ. शैलेंद्र जय, आसिफ़ उस्मानी, मंजूलता नागेश, धीरेंद्र सिंह नागा, डॉ. एस.एम. अब्बास, डॉ. तारिक़ महमूद, सुनील दानिश, शिबली सना आदि मौजूद रहे।




रविवार, 19 जुलाई 2026

 गुफ्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में



7. संपादकीय: पुस्तक मेले का नकारात्मक पक्ष भी

8-12. लोकभवन में दो दिन: बिहार गवर्नर की मेहमान बनी टीम गुफ़्तगू

13-15. ख़ास प्रस्तुति: उर्दू शायरी में अहंकार नहीं तारीफ़-ए-खुद - भानु झा

16. इतिहास: कु़रआन की छपाई करते थे नवल किशोल -हकीम रेशादुल इस्लाम

17-19. दास्तान-ए-अदीब: सज्जाद ज़हीर को नहीं रास आया पाकिस्तान- डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

20-24. इंटरव्यू: अंग्रेज़ी की बहुत सेकेंड ग्रडेट राइटिंग है: राजेश जोशी

25-29. चौपाल: किसे कहते हैं पुस्तक विमोचन

30. मुस्तनद शायरी: एक होनहार शायर मुजीब सिद्दीक़ी-डॉ. इम्तियाज़ समर

31-38. ग़ज़लें: पवन कुमार, तेजेंद्र शर्मा, आरडीएन श्रीवास्तव, बसंत कुमार शर्मा, यासीन अंसारी, अरविन्द असर, डॉ. इम्तियाज़ समर, डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’, रियाज़ इटावी, शमा फ़िरोज़,  शगुफ्ता रहमान ‘सोना’, डॉ. शैलेंद्र जय, भानु झा, सोनिया वर्मा, मुमताज हसन

39-43. कविताएं: यश मालवीय, संतोष श्रीवास्तव, अरुण अर्णव खरे, भोलानाथ कुशवाहा, डॉ. आशा सिंह सिकरवार, सुधा श्रीवास्तव ‘पीयूषी’,  प्रदीप बहराइची, सरिता गर्ग ‘सरि’, डॉ. चंद्रमिण, सीमा सिरोमणि, अरुणिमा खरे ‘वैदेही’

44-45.लधु कथा:  डॉ. प्रमिला वर्मा, डॉ. मीरा रामनिवास

46-48. तब्सेरा: हृदय की बात, मशवरा, फुर्सत किसे है इन दिनों

49-53. उर्दू अदब: फिक्रे-नव, शजर-शजर, पहचान, शाम का धुंधुलका

54-55. ग़ाज़ीपुर के वीर: इलाके के ख़ास समाजेसवी डॉ. श्यामादत्त: सुहैल ख़ान

56-59. अदबी ख़बरें


60-89. परिशिष्ट-1: डॉ. कंचना सक्सेना

60. डॉ. कंचना सक्सेना का परिचय

61-63. अथाह जिज्ञासा और समर्पण का संदेश- नीना मोहन श्रीवास्तव

64. व्यापक सोच को दर्शाती कविताएं - निरुपमा खरे

65-66. यथार्थ को वर्तमान पटल पर रखतीं कविताएं- जगदीश धुर्वे

67-89. डॉ. कंचना सक्सेना की कविताएं


90-118. परिशिष्ट-2: आलोक भदौरिया ‘अर्श’

90. आलोक भदौरिया ‘अर्श’ का परिचय

91. उर्दू अदब का हिमालय आलोक भदौरिया - रईस सिद्दीक़ी

92-93. तलब को ज़ब्त के सांचे में ढालना होगा- डॉ. शैलेंद्र जय

94-95. समाज के कड़वे सच से रुबरु ग़ज़लें - डॉ. इश्क़ सुल्तानपुरी

96. समाज का चित्रण करतीं ग़ज़लें- धीरेंद्र सिंह नागा

97-118. आलोक भदौरिया अर्श की ग़ज़लें 


119-148. परिशिष्ट-3: उर्मिल शर्मा

119. उर्मिल शर्मा का परिचय

120. छह अध्याय का काव्य-रूप: उर्मिल शर्मा

121-122. स्त्री संवेदन की प्रखर कवयित्री - डॉ. संतोष कुमार मिश्र

123-125. जीवन के विविध रंग से सराबोर कविताएं- रचंना सक्सेना

126-127. संवदेना से संघर्ष तक फैला काव्य दर्शन - शगुफ्ता रहमान ‘सोना’

128-148. उर्मिल शर्मा का लेखन  



(गुफ़्तगू का जनवरी-मार्च 2026 अंक)