शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

बेहद जिन्दादिल थे कमेंटेटर इफ़्तेख़ार पापू


                                                  -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

इफ़्तेख़ार अहमद पापू 


 इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों की रेडियो पर आंखों देखा हाल यानी कमेंट्री की बात होती है तो प्रयागराज के इफ़्तेख़ार अहमद पापू का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अगर प्रयागराज से इंटरनेशनल मैचों की कमेंट्री करने वालों की बात की जाती है तो एक अकेला नाम पापू का ही सामने आता है। हालांकि पिछले 03 मई को उनका इंतिक़ाल हो गया, मगर उनके द्वारा किए गए काम को किसी भी कीमत पर भुलाया नहीं जा सकता। 19 मार्च को हुई मुलाकात के दौरान उन्होंने अपने कार्य के बारे में विस्तार से हमें बताया था, उनकी जिन्दादिली और आने वाले लोगों के स्वागत करने अंदाज़ पर फिदा हुए बिना नहीं रहा जा सकता था।

 पापू का जन्म 04 मई 1958 को इलाहाबाद में ही हुआ था। वालिद मरहूम फैयाज़ अहमद खुद का कारोबार करते थे, मां मरहूमा मोबीना बेग़म कामयाब गृहणि थीं। नौ भाई और चार बहन में आप पांचवें नंबर पर थे। शुरूआती पढ़ाई नगर के अटाला स्थित मजीदिया इस्लामिया  कॉलेज से किया था, इसके बाद स्नातक की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया। स्नातकोत्तर में दाखिला लिया था, लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। 1986 में रेलवे में क्लर्क ग्रेड-1 में नौकरी लग गई। बचपन से ही क्रिकेट खेलने का शौक़ रहा, गली-मुहल्लों में खूब खेलते थे। इसी दौरान कमेंट्री करने का शौक़ हुआ, 1970 के दशक में कमेंट्री करने के लिए मनीष देव का नाम काफी लोकप्रिय था, पापू इन्हीं की नकल करने की कोशिश करते थे। स्थानीय स्तर पर होने वाले क्रिकेट मुकाबलों की कमेंट्री करने लगे।


इफ़्तेख़ार अहमद पापू से बात करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी (फाइल फोटो)


 एक बार मजीदिया इस्लामिया इंटर कॉलेज के हो रहे क्रिकेट मुकाबले की कमेंट्री कर रहे थे, वहां आकाशवाणी इलाहाबाद की टीम भी आई थी, टीम के लोगों को पापू की आवाज़ और कमेंट्री करने का अंदाज़ बहुत पसंद आया। फिर मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में हो रहे मैच की कमेंट्री करने के लिए ट्रायल के तौर इन्हें आमंत्रित किया गया, इनकी कमेंट्री को रिकार्ड करके आकाशवाणी की टीम ले गई। फिर इन्हें आकाशवाणी इलाहाबाद की टीम ने अपने पैनल में शामिल कर लिया। 1978 में पहली आकाशवाणी के लिए कमेंट्री किया, तब इन्हें पहली बार पारिश्रमिक के तौर पर 75 रुपये का चेक मिला था। यहीं से सिलसिला शुरू हो गया। फिर इन्हें दिल्ली बुलाया गया, यहां जोनल क्रिकेट मैच की कमेंट्री कराई गई। 1983 में पहली बार भारत-ए और वेस्टइंडीज के मुकाबले की कमेंट्री का अवसर मिला। 1984 में श्रीलंका और भारत-ए के मुकाबले की कमेंट्री किया।  1987 में अहमदाबाद में भारत और वेस्टइंडीज के बीच इंटरनेशनल एक दिवसीय मैच हुआ तो इन्हें कमेंट्री करने का अवसर मिला, यह इनका पहला इंटरनेशनल मैच में कमेंट्री करने का अवसर था। 1987, 1996, 2007, 2011, 2015 और 2019 के वर्ल्ड कप क्रिकेट मुकाबलों में भी आपने कमेंट्री किया था। 1987 में बीबीसी के लिए भी कमेंट्री किया। टेस्ट मैच और वन-डे को मिलाकर लगभग 150 मुकाबलों की कमेंट्री कर चुके थे, कमेंट्री के लिए आपने पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश का भी दौरा किया था। आखिरी बार 13 से 17 फरवरी तक चेन्नई में भारत और इंग्लैंड के बीच हुए टेस्ट मैच की कमेंट्री पापू ने किया था।

 प्रयागराज के मिन्हाजपुर में इनका निवास स्थान है। इनकी एक बेटी और बेटा है, बेटी की शादी हो गयी है। पापू का कहना था कि टीवी प्रसारण के मुकाबले रेडियो पर कमेंट्री सुनते समय लोग टीवी पर देखने के मुकाबले ज्यादा सजग रहते हैं। टीवी पर मैच देख रहे लोगों से स्कोर वगैरह पूछ लिया जाए तो बता नहीं पाएंगे, याद नहीं होगा। लेकिन रेडियो पर कमेंट्री सुनने वाले से पूछ लीजिए तो उसको सब याद रहता है।

   (गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2021 अंक में प्रकाशित )


1 टिप्पणियाँ:

tulsi ने कहा…

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