शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

अंग्रेज़ी का बहुत सारा सेकेंड ग्रेड राइटिंग है, जिसे भारतीय शान से साथ पढ़ रहे: राजेश जोशी 

 समकालीन हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, साहित्य में मानवीयता एवं समाजिक चेतना के पक्षधर और साहित्य अकादमी पुरस्कार, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार जैसे अनेक पुरस्कार से विभूषित राजेश जोशी का जन्म 18 जुलाई, 1946 को नरसिंहगढ़, मध्यप्रदेश में हुआ। वर्तमान में आप भोपाल में निवास कर रहे हैं। लेखन के अलावा आपने कुछ सालों तक पत्रकारिता किया, इसके बाद बैंक में भी कार्य किया। ‘एक दिन बोलेंगे पेड़’, ‘नेपथ्य में हंसी’, ‘मिट्टी का चेहरा’, तथा ‘दो पंक्तियों के बीच’, ‘सोमवार और अन्य कहानियां’, ‘कपिल का पेड़’, ‘जादू जंगल’, ‘कहन कबीर’, ‘टंकारा का गाना’ और ‘किस्सा कोता’ आदि आपकी चर्चित और  कृतियां हैं। ‘गेंद निराली मिट्टू की’ नामक एक बाल संग्रह के साथ-साथ ‘एक कवि की नोटबुक’ और ‘एक कवि की दूसरी नोटबुक’ के रूप में आलोचनात्मक टिप्पणियों पर आपकी दो किताबें भी प्रकाशित हुई हैं। आपने भर्तृहरि और मायकोवस्की की कविताओं का हिंदी अनुवाद भी किया है। अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’ ने इनसे मुलाकात करते विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है इसके प्रमुख अंश-


सवाल: हिन्दी साहित्य की ओर आपका रुझान कब, क्यों और कैसे हुआ ?

जवाब: साहित्य की तरफ मेरा रुझान तो शुरू से था। मेरे पिता संस्कृत के विद्वान थे, लेकिन हिन्दी में लिखते थे। इसलिए कुछ प्रभाव तो परिवारिक माहौल से और कुछ कवि सम्मेलनों को सुनने से पड़ा। हालांकि मैं तो साइंस से आया था, इसलिए बहुत ठीक से नहीं जानता था कि साहित्य क्या है। वर्ष 1972 के आसपास दो साहित्यिक मित्रों राजस्थान के अशोक आत्रे और कहानीकार वेणुगोपाल जी से हुई मुलाकात कालांतर में दोस्ती में बदल गई। फिर वो भोपाल में मेरे साथ ही मेरे कमरे पे रहने लगे। धीरे-धीरे वेणुगोपाल जी ने बताना शुरू किया कि समकालीन लेखन और समकालीन साहित्य क्या है?  और मुझे क्या-क्या पढ़ना चाहिए।  इस तरह धीरे-धीरे मैं साहित्य की तरफ प्रवृत्त हुआ। 

राजेश जोशी

सवाल: प्रारंभिक दौर में साइंस के विद्यार्थी होने के नाते, संक्षिप्तता के महत्व से आप भलीभांति परिचित हैं। साहित्य में भी संक्षिप्तता के महत्व पर आपका क्या विचार है ? 

जवाब: साहित्य में, विशेषकर कविता के लिए यह माना जाता है कि अच्छे साहित्यकार को शब्द मितव्ययी और कम से कम शब्दों में, अधिक से अधिक कह सकने की क्षमताएं रखना चाहिए। यही कविता का गुण और सौन्दर्य है। इसलिए मितव्ययिता साइंस और साहित्य दोनों जगह है। अच्छा साहित्य वही माना जाता हो जो कम में ज्यादा कहने की कुवत रखता हो। विज्ञान में तो आप फार्मूले के तरह हो जाते हैं, लेकिन साहित्य में फार्मूला नहीं हो सकता। तब भी, मितव्ययिता तो साहित्य, खासतौर से कविता का भी गुण है। गद्य में तो फिर भी आप थोड़ा ज्यादा कह सकते हैं पर कविता एक ऐसी विधा है जो आपको इस बात के लिए प्रेरित करती है कि आप मितव्ययी होकर अपनी बात को कहें। 


सवाल: एक शिक्षक तथा साहित्यकार के रूप में सामाजिक विकास जैसे चुनौतिपूर्ण कार्य में आप अपने आपको कैसे जोड़कर देखते हैं ? 

जवाब: शिक्षक भी बच्चों को पढ़ा कर भविष्य का एक शिक्षित-सुसंस्कृत नागरिक बनाने का बहुत बड़ा सामाजिक कार्य ही कर रहा है। शिक्षा का जो काम है वही साहित्य का भी काम है। अतः साहित्य और शिक्षा के बीच में सदा एक संबंध बना ही रहा है। हम लोगों ने पहली कविता चाहे वह झांसी की रानी हो या चाहे कोई अन्य कविता हो, स्कूलों में किताब से ही,  सीखी थी। पुराने साहित्यकारों जैसे निराला, महादेवी या सुभद्रा जी को स्कूल में ही पढ़ा। इस तरह से दोनों का काम अलग-अलग स्तर पर एक जैसा ही है। साईंस में आप अलग-अलग फील्ड में जाते हैं। आप इंजीनियर, डाक्टर या साइंटिस्ट बनते हैं। ये भी साइंस के द्वारा किया गया, एक तरह का सामाजिक विकास का कार्य ही है। ऐसा ही एक कार्य यानी एक तरह की चेतना या मानसिक विकास का कार्य, भावनाओं को संयोजित करने-बनाने का काम, साहित्य भी करता है। इस तरह शिक्षा द्वारा किया गया विकास कार्य, साहित्य द्वारा किए जा रहे विकास कार्य से कोई बहुत अलग नहीं है। 

राजेश जोशी से बातचीत करते अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’।

सवाल: हिन्दी साहित्य लेखन में किस विषय/विमर्श को आप ज्यादा पसंद करते हैं? 

जवाब:  मुझे लगता है कि साहित्य में स्मिता विमर्श, हमारे यहां खासतौर से नब्बे के दशक आसपास ही शुरु होता है। उससे पहले स्मिता विमर्श का हमारे यहां उतना दबाव नहीं था। आजकल कई विषयों पर जो विमर्श चल रहे हैं, उन विषयों पर काम बहुत पहले से ही शुरु हो गए थे। मराठी में महात्मा फूले की पत्नी सावित्रीबाई फूले शिक्षा के लिए काम कर रही थीं और हमारे यहां महात्मा गांधी ने भी स्त्रियों को घर से बाहर निकलने या स्वाधीनता संग्राम आन्दोलन से जोड़ने के अतिरिक्त तमाम चीजें जैसे जाति तोड़ो, मंदिर प्रवेश के आंदोलन किए। ये सारे काम, अब इन विमर्शों के अंदर मान लिए गए हैं। अत: विमर्श के जो काम अब विमर्श के अंदर आ रहे है, वो हमारे समाज में पहले भी हो रहे थे। स्वाधीनता उस समय सबसे बड़ा मुद्दा था। अतः विमर्श का काम सेकेंडरी हो जाता था। 1990 के बाद जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो एक तरह से सारे विमर्श जिन्हें सबाल्टर्न कहा गया है और जो गांधी के जमाने से चला आ रहा था परंतु उनका उतना उभार नहीं हो पाया था, वो सारे विमर्श नब्बे के बाद अचानक सतह पर आ गए। उसके बहुत सकारात्मक पहलू भी सामने आए। लेकिन किसी भी स्मिता विमर्श की एक सीमा है और वो उस सीमा से बाहर नहीं जा पाता। अक्सर समाज के बदलने का जो संघर्ष है, वहां तक न जाकर के, वो स्मिता के प्रश्न पर ही रुक जाता है। इसलिए स्मिता विमर्श की एक सीमा है और उसको लांघना ज़रूरी है। पूरे समाज को ही बदलना चाहिए। 


सवाल: जीवन के इस अंतराल में एक विज्ञानवेत्ता का अपने शैक्षिक क्षेत्र से हटकर, सामाजिक मुद्दों से जुड़े विषयों पर रचना करना आपको कैसा प्रतीत होता है।

जवाब: आप जब विज्ञान के किसी ख़ास तरह के अकादमिक डिसीप्लिन में काम कर रहे होते हैं तब आप एक बहुत सीमित यानी एक ही सब्जेक्ट पर काम कर रहे होते हैं। फिर जब आप इससे बाहर निकलकर, साहित्य या सामाजिक दुनिया में आते हैं तो आपका ये क्षेत्र बढ़ जाता है। आप ज्यादा जगह, ज्यादा चीज़ों को देख पाते हैं। अतः साइंस, सिर्फ एक सब्जेक्ट ही नहीं बल्कि चीजों को देखने की एक दृष्टि भी देता है। समाज, साहित्य या और दूसरी प्रॉब्लम्स को देखने की जो दृष्टि आपको साइंस देती है वो वैज्ञानिक दृष्टि अगर आपको मिल गई तो वो कहीं न कहीं पूरे समाज और पूरी दुनिया को ज्यादा बेहतर ढंग से देखने की सहूलियत आपको देती है। इसलिए मुझे लगता है कि आप एक सब्जेक्ट की अकादमिक दुनिया से जब बाहर निकलते हैं तो इस बढ़ते हुए क्षेत्रफल के साथ-साथ, मिल रही संतुष्टि भी निश्चित ही ज्यादा लगती है कि आप ज्यादा बड़े एरिया में काम करके, जीवन को ज्यादा बड़े फलक पर समझ रहे हैं। हालांकि हर क्षेत्र और समय का अपना महत्व है। 


सवाल: साहित्यकार को कविता, कहानी, नाटक आदि आम पाठक या आलोचक में, किसके लिए लिखना चाहिए ? 

जवाब: रचनाकार, आलोचक को खुश करने के लिए नहीं लिखता, बल्कि वो पाठक के लिए लिखता है। लेकिन उसका काम पाठक की रुचि को बदलकर, पाठक की समझ को बढ़ाकर, विकसित कर, उसे शिक्षित करना भी है। हम लोगों ने प्रारंभिक कक्षाओं में धीरे-धीरे पढ़कर ही तुलसीदास, निराला, पंत या प्रेमचंद को या गद्य को जाना। आप धीरे-धीरे सीखते हैं। शुरु में तो ऐसा लगता है कि ये आपकी रुचि का तो नहीं है, पर पढ़ते-पढ़ते आपकी रुचि बदलती है। इसलिए रचनाकार एक समझ को विकसित करने का काम भी करता है। लेखक, पाठक की रुचि से संचालित नहीं होता। पाठक की रुचि को एक तरह से वो अपनी रचना से कहीं न कहीं समृद्ध भी करता है। उसकी समझ को समृद्ध करता है। इसलिए लेखक का ये दायित्व ज्यादा है कि वो पाठक को आगे की बात बताए और उसको ज्यादा समृद्ध करे। उसकी समझ को समृद्ध करे तभी वो कुछ काम कर पाएगा। आलोचक का काम तो तब शुरू होता है जब रचना हो चुकी होती है। कुछ कामर्शियल लेखक जरूर इस तरह से लिख रहे हैं कि पुरस्कार या कीर्ति मिल जाए या आलोचक की नज़र में आ जाए। एक वास्तविक लेखक क्या इस बात की कभी परवाह कर सकता है कि आलोचक की क्या रुचि है वो क्या कहेगा और न ही वो इसके लिए क्षेत्र में आता है। इसलिए आलोचक का काम तो बाद का है कि वो रचना पढ़े और अगर ठीक लगे तो उसे जैसी लगे वैसा लिखे एवं वो उससे खुद भी समृद्ध हो। रचना पढ़कर ही तो आलोचक की समझ बनेगी। इसलिए रचना मूल काम है और बाकी लोगों का काम सेकेंडरी है।  


सवाल: क्या कारण है कि किसी विचारधारा के पक्षधर साहित्यकार की रचनाओं में अक्सर अंतर्विरोध नजर आते हैं ?

जवाब: हम लोगों ने विचारधारा के सवाल को बहुत सीमित करके मान लिया है। कोई भी रचनाकार बिना किसी विचार के तो वह नहीं लिखेगा। किसी न किसी विचार से वह अवश्य जुड़ा होगा। कालीदास शैव थे और शैवों की जो वैचारिक परंपरा थी उससे संचालित हो रहे थे। तुलसी या कबीर के पास भी अपनी एक विचार प्रणालियां थी। ऐसा बहुत बार ज़रूर होता है कि एक विचारधारा के रहते हुए भी आपमें कई अंतर्विरोध दिखाई देते हैं। तुलसी में बहुत सारे अंतर्विरोध हैं। एक समय तुलसी जो शबरी के जूठे बैर, राम को खिला रहे हैं वही तुलसी, वर्ण व्यवस्था और शंबूक वध का समर्थन भी कर रहे हैं। वहीं इस बात को भी कह रहे हैं कि ब्राम्हण चाहे मूर्ख हो तो भी वो पूज्यनीय है और दलित चाहे विद्वान हो तो भी वो पूजनीय नहीं है। यह तुलसी का अपना अंतर्विरोध है। हम एक समाज में रह रहे हैं। हम पर उसके जो प्रभाव होंगे उसके कारण अंतर्विरोध होंगे। आप पर कोई न कोई चीज़ प्रभाव डालेगी ही और उसकी वजह से कुछ न कुछ अंतर्विरोध आएगा ही। कुछ अंतर्विरोध से आप निपट भी लेते हैं। ये हो सकता है कि वो विचारधारा की दृष्टि से गड़बड़ हो। हालांकि किसी भी रचनाकार में अंतर्विरोध की एक सीमा होती है। हर रचनाकार की वैचारिक ज़मीन बुनियादी रूप से मनुष्य के पक्ष की होगी, जिसके बिना आप रचनाकार नहीं हो सकते। महात्मा गांधी कहते हैं कि पेरीफेरी पे खड़े, अंतिम मनुष्य के लिए मुझे काम करना है। अत: सीधी सी बात यह है कि इस अंतिम मनुष्य के पक्ष में अगर आप नहीं हैं तो फिर आप रचनाकार तो नहीं हैं।

पुरबा (बेटी), राजेश जोशी और निरूपा जोशी (पत्नी)।

सवाल: साहित्य रचना आपको आत्मिक सुख तो प्रदान करती है पर आजीविका का साधन नहीं हो सकती। इस कथन पर आपका क्या दृष्टिकोण है ?

जवाब: हमारे यहां खासकर हिंदी में ये समस्या थोड़ी बड़ी है कि आप फ्रीलांस राइटर रहकर काम नहीं कर सकते। हालांकि, हिंदी में कई बड़े लेखक जैसे शरद जोशी, हरिशंकर परसाई, अमृत लाल नागर, शैलेश मटियानी ऐसे कुछ नाम हैं, जो स्वतंत्र लेखन में फ्री लांसर हैं। इन्होंने थोड़े-थोड़े दिन नौकरी की, फिर नौकरी छोड़ कर, स्वतंत्र लेखन की तरफ गए।  परंतु ऐसे चांस बहुत थोड़े हैं। हर विधा में तो ये संभव नहीं हो पाता जैसे कविता में ये संभव नहीं है। गद्य में ये थोड़ा संभव है। गद्य में आप कालम लिख सकते हैं। आप अख़बारों के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन फिर भी फ्रीलांस करना हिंदी में तो कठिन है। इसलिए ज्यादा बेहतर स्थिति तो वो होती है कि जीविका के लिए आपके पास कोई निश्चित साधन हो और आप अपनी मरजी से, बिना किसी दबाव के लिख सकें। फ्रीलांसर अगर आप हैं तो बहुत सारे दबाव भी आप पर होते हैं। कुछ भाषाओं में तो आप फ्रीलांस कर सकते हैं। बांग्ला में तो  पूजाअंक के लिए लेखक साल भर में एक रचना लिखता है और उसका साल भर का काम निकल जाता है। कुछ भाषाओं में हो सकता है कि इतना पैसा मिल जाय और वो अपनी मर्जी से काम कर सके, पर हिंदी में अभी ये थोड़ा दिक़्क़त है।


सवाल: विश्वविद्यालयों में साहित्य पर शोध कार्य तो बहुत किया जा रहा है, परंतु तमाम प्रयासों के बावजूद विश्वविद्यालय में कहानी, कविता, उपन्यास के क्षेत्र में नये विषयों पर मौलिक लेखन संबंधित अपेक्षित कार्य नहीं हो पा रहा है, इस पर आपका क्या विचार है।

जवाब: हमने शोध का जो ढांचा बनाया कि थीसिस इस तरह की, सिनाप्सिस वगैरह ऐसी और इस इस तरह से उसके विभाजन होंगे, वो ढंग ही अपने आप में काम करने वाले को क्षात्र को बहुत जकड़ लेता है और उससे कोई नया विचार या नई बात नहीं पैदा होती यानी उससे कोई सृजनात्मक काम संभव नहीं है। वो अकादमिक महत्व का ही है। अकादमिक काम की भी एक सीमा होती है। शोध कार्य को बहुत अकादमिक बना दिया गया है।  विश्वविद्यालयों में कुछ सालों पहले, इस तरह का माहौल बना था कि अगर आपने कोई बहुत अच्छा सृजनात्मक कार्य जैसे उपन्यास, कोई महत्वपूर्ण संग्रह या आलोचना की बहुत महत्वपूर्ण किताब लिखी, तब उसका भी मूल्यांकन करके, आपको पीएचडी दी जा सकती थी। यह व्यवस्था बाद में ख़त्म हो गई। मुझे तो हमेशा ये लगता है कि अगर किसी को शोध कार्य करना हो तो करे, मगर कोई सृजनात्मक कार्य करे तो उसका भी मूल्यांकन करके आप उसको पीएचडी दीजिए। पीएचडी हमेशा एक बंधे-बंधाए काम पर और शोध पर ही क्यों दिया जाए। किसी भी आदमी ने अगर आलोचना में या किसी भी विधा में कोई अच्छा गंभीर, मौलिक काम किया है तब उसे भी पीएचडी मिलना चाहिए। बहुत बड़ी संख्या में हो रहे शोधकार्य के कारण, इसे नौकरियों में अनिवार्य कर दिया गया है। इसलिए बेचारे बच्चे जैसे तैसे इसे पूरा करते हैं मगर उसमें उनकी प्रतिभा भी नष्ट हो रही है। विद्यार्थी के हाथ में तो कुछ है नहीं। वो चाहता है कि किसी तरह से पीएचडी पूरी हो जाए तो मैं नौकरी के लिए अप्लाई करूं। इसलिए शोध के ढांचे को बदलने की ज़रूरत है। 

बाएं से - विनोद दास, राजेश जोशी, विजय कुमार, अनूप सेठी और निरूपा जोशी (पत्नी)।

सवाल: नई पीढी नौजवानों मे हिंदी में पठन पाठन के घटते रुझान पर आपको क्या महसूस होता है ?

जवाब: वास्तविकता तो ये है कि भाषा का सम्मान जब तक नहीं बढ़ेगा, साहित्य का सम्मान भी नहीं बढ़ेगा। साहित्य का सम्मान तब ही बढ़ता है जब भाषा का सम्मान बढ़ता है। रूस में जब क्रांति हुई तो रूसी भाषा का सम्मान बढ़ा, तब हम सबने जाना टॉलस्टॉय, गोर्की और तमाम लोगों को। जब भाषा का सम्मान बढ़ा तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूसी में लिखे जा रहे साहित्य का भी सम्मान बढ़ा। कई भाषा में अनुवाद होना शुरू हुआ। जब आप अपनी भाषा को सम्मान दिला पाएंगे तब ही आप अपेक्षा कर पाएंगे कि लोग हिंदी साहित्य की तरफ भी जाएं। यहां दिक़्क़त ये है कि बहुत सारे लोग इस गलतफहमी में हैं कि अंग्रेज़ी में सब कुछ बहुत अच्छा लिखा जाता है। अंग्रेज़ी में कुछ तो बहुत कूड़ा लिखा गया है। अंग्रेज़ी में जितना पल्प राइटिंग है उतना हिंदी में नहीं है। बहुत पल्प है और वो पूरे मार्केट में बिखरा पड़ा है। ये बहुत सजावट के साथ बेचा जाता है और क्योंकि अंग्रेज़ी बहुत कम लोग जानते हैं तो अंग्रेज़ी की कोई बहुत ही दो कौड़ी की किताब हाथ में लेकर, लोग समझते हैं कि वो कोई बहुत महान काम या सम्मानित किताब लिए हुए हैं। शिवपुराण को अंग्रेजी में पढ़कर, एक लेखक ने शिव पर तीन चार उपन्यास लिख दिए। वो बहुत ज्यादा बिके। उनका हिंदी अनुवाद हुआ।मेरा यह कहना है कि उसको पढ़ने से पहले ओरिजनल शिवपुराण पढ़ लो। लोगों को ये नहीं मालूम कि ये सारे काम, हिंदी और संस्कृत में बहुत पहले हो चुका जो आप अभी समझ रहे हो कि आप कोई बहुत बड़ा काम पढ़ रहे हो या देख रहे हो। अंग्रेजी का बहुत सारा सेकेंड ग्रेड राइटिंग है वो थोड़ा-बहुत अंग्रेजी जानने वाले हमारे भारतीय लोग बहुत शान के साथ पढ़ रहे हैं। 


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित)

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