शनिवार, 15 अगस्त 2026

 बिहार गवर्नर की मेहमान बनी टीम गुफ़्तगू

डॉ. ग़ाज़ी, उस्मानी, तन्हा और महरानी पटना में दो दिन रुके 

ऐतिहासिक गुरुद्वारा और खुदाबक्श लाइब्रेरी भी देखने गए

                                                           - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

लोकभवन में राज्यपाल के साथ बाएं से- नरेश कुमार महरानी, मनमोहन सिंह तन्हा, आरिफ़ मोहम्मद ख़ान, आसिफ़ उस्मानी और डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 बिहार के राज्यपाल महामहिम आरिफ़़ मोहम्मद ख़ान साहब के आमंत्रण पर हम चार लोग (डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, आसिफ़ उस्मानी, मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी) 01 फरवरी, 2026 की सुबह लगभग आठ बजे अपनी कार से प्रयागराज से पटना के लिए निकले। आरिफ़ साहब जब केरल के राज्यपाल थे, तब से ही हम लोगों को बुला रहे थे, लेकिन किसी न किसी वजह से हम जा नहीं पा रहे थे। बहुत टाल-मटोल और रस्सा-कस्सी के बीच 01 फरवरी को जाना फाइनल हुआ।

 हम कार से पटना के लिए निकले थे। हमारा अंदाज़ा था कि पांच-छह घंटे में पहुंच जाएंगे। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। रास्ता भटक जाने और बीच में सासाराम स्थित शेरशाह सूरी के मक़बरा पर जाने की वजह से हमें पटना पहुंचने में काफी विलंब हो गया। सुबह आठ बजे ही निकले थे, हमें भूख लगी थी। एक रेस्टोरेंट पर नाश्ता करने की सोचकर हम कार रोककर बाहर निकले। रेस्टोरेंट के अंदर गए, अंदर बिल्कुल सन्नाटा था, एक भी आदमी नहीं था, सिर्फ़ रेस्टोरेंट के कर्मचारी थे। सन्नाटा देखकर हमलोग वापस आने लगे। हमारे वापस आने पर रेस्टोरेंट के दो कर्मचारी हमारे पास आ गए और हमारे वापस जाने का कारण पूछने लगे। काफी बहस करने लगे, वे किसी भी हालत में हमें वापस जाने देना नहीं चाह रहे थे। लेकिन, हमें लगा कि इतना सन्नाटा होने का मतलब बासी बनाया हुआ खाना मिलेगा। इसलिए हमलोग रुके नहीं। लगभग दो किलोमीटर आगे जाकर एक ढाबा पर रुके, वहां पहले से ही और लोग भी नाश्ता कर रहे थे। इसलिए हमलोगों ने भी वहीं नाश्ता किया।

 नाश्ता करने के बाद जब हम आगे बढ़े, आसिफ़ उस्मानी ने कहा कि यहीं पर शेरशाह सूरी का मक़बरा है। हमें वहां ज़रूर चलना चाहिए। दिन के तकरीबन 11 बजे थे। हमने अपनी गाड़ी सासाराम में स्थित शेहशाह सूरी के मक़बरे की तरफ़ घुमा दी। मक़बरे के अंदर जाने के लिए टिकट लिए और प्रवेश कर गए। मक़बरे के दोनों तरफ बड़ा सा तालाब है। तालाब का पानी इतना साफ़ है कि उसमेें तैरती हुई मछलियां साफ़ दिखाई दे रही थीं। तकरीबन, 40-45 मिनट हमने मक़बरे का भ्रमण किया, विभिन्न तरह से तस्वीर खिंचाई। फिर बाहर आए तो एक आईसक्रीम वाला खड़ा था। हमने आइसक्रीम खाई, फिर पटना की ओर निकल गए। प्रयागराज से सासाराम तो हम बहुत आसानी से आ गए थे, बिना किसी विलंब या रुकावट के। लेकिन, सासाराम से जब पटना की ओर चले तो रास्ता भटक गए। हाई-वे से न जाकर मुख्य सिटी से चले, जिसकी वजह से जगह-जगह जाम के कारण परेशानी होती रही। बीच-बीच में महामहिम राज्यपाल साहब के पी.ए. अनिल जी का फोन मेरे मोबाइल पर आता रहा कि ‘अभी आप लोग कहां हैं?’ मैं उन्हें अपना लोकेशन बताता रहा। हमारा अनुमान था कि तीन बजे तक ज़रूर पहुंच जाएंगे। लेकिन, भटकते-भटकते हम शाम 7ः30 बजे पहुंचे।

 गवर्नर हाउस के गेट पर सुरक्षा कर्मियों ने हमें रोका। हालांकि, 31 जनवरी की शाम को ही गवर्नर साहब के पीए अनिल जी ने मुझे फोन करके सभी आने वालों का नाम और गाड़ी नंबर आदि नोट कर लिया था, जो गेट पर अंकित कराया गया था। गेट पर हमने अपना नाम बताया। सुरक्षाकर्मी तुरंत ही अपने केबिन में गया और एक लिस्ट उठा लाया। लिस्ट से नाम मिलाकर बोला-आप लोग जा सकते हैं।

 गवर्नर हाउस (लोक भवन) में एक फरवरी की शाम सात बजे से ही स्थापना दिवस का कार्यक्रम था। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और चंडीगढ़ का स्थापना दिवस कार्यक्रम शुरू हो गया था। हमारे पहुंचने पर गवर्नर साहब के पीए हमारे पास आए और बोले-‘आप लोग पहले अपने रुकने वाले कमरे में चलेंगे या सीधे प्रोग्राम में ?’ हमने फैसला किया कि पहले हम प्रोग्राम में जाएंगे। हमें आगे से दूसरी पंक्ति में बैठाया गया। गवर्नर साहब मंच पर जा चुके थे, उनके बगल में अन्य लोगों के अलावा उनकी पत्नी भी बैठीं थीं। गवर्नर साहब के अभिभाषण समेत कई रंगारंग कार्यक्रम हुए। हम सुबह से ही चले थे, शायद इसी वजह से आसिफ़ उस्मानी का शुगर लो होने लगा। उन्होंने मुझसे कहा कि मेरा शुगर लो हो रहा है, मेरे लिए कुछ खाने-पीने का इंतज़ाम कराइए। मैंने अनिल जी से यह बात बताई। उन्होंने तुरंत ही कुछ बिस्किट और चाय मंगवा कर दिया। आसिफ़ साहब के साथ मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश महरानी ने भी चाय-बिस्किट का आनंद लिया, मेरा चाय पीने का मन नहीं हुआ। इस आयोजन में ढेर सारे आई.ए.एस., पी.सी.एस. और आईपीएस अधिकारी समेत अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।

बिहार लोकभवन में राज्यपाल महामहिम आरिफ़ मोहम्मद ख़ान से मुलाकात 

 लगभग 8ः45 तक कार्यक्रम चला। कार्यक्रम के बाद वहीं उसी हॉल में डिनर का इंतज़ाम किया गया था। तीन-चार टेबिल पर बोर्ड लगे थे ‘गवर्नर फैमिली के लिए’। हमें इसी रिज़र्व टेबिल पर बिठाया गया। हमने साथ में खाना खाए। गवर्नर साहब के पीए ने भी हमारी ही टेबिल पर हमारे साथ ही खाना खाया। ठीक बगल वाले टेबिल पर गवर्नर साहब ने अपनी पत्नी, बेटे-बेटियों और पोता-पोतियों के साथ खाना खाया। खाने के बाद काफी देर तक लोग गवर्नर साहब के साथ फोटो खिंचवाते रहे। इसके बाद गवर्नर साहब हमारे पास आए। बोले, हमारे साथ आप लोग चलिए। फिर हमलोग उनके साथ गवर्नर हाउस के उस हिस्से की तरफ बढ़े, जिधर लोगों के रुकने का इंतज़ाम था। लिफ्ट के पास पहुंचे तो गवर्नर साहब ने  हमारी ओर इशारा करते हुए अपने सुरक्षाकर्मियों से कहा-‘इन लोगों को लिफ्ट से उपर ले चलो, मैं सीढ़ी से उपर आता हूं।’ हम लिफ्ट से दूसरी मंज़िल पर पहुंच गए। वहां ढेर सारे सोफ़े-कुर्सियां लगी थीं। बीच वाले सोफे को छोड़कर उसके दोनों तरफ के सोफे पर हम बैठ गए। एक तरफ मैं और आसिफ़ उस्मानी, दूसरी तरफ मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी। थोड़ी ही देर में गवर्नर साहब आकर अपनी सीट पर बैठ गए। फिर उन्होंने अपने कर्मचारियों से कहा कि इन लोगों को ‘कहवा’ पिलवाइए। फिर बातचीत शुरू हुई, जो लगभग ढाई घंटे चली। इसी बीच हमें ‘कहवा’ सर्व कर दिया गया था। तकरीबन 11ः30 बज गए, गवर्नर साहब ने कहा अब आप लोग अपने कमरे में आराम करिए, कल सुबह मिलते हैं। 

 हम चारो लोगों को साथ लेकर अनिल जी उन कमरों की तरफ आए, जहां हमारे रुकने का इंतज़ाम था। एक कमरा मेेरे (डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी) और आसिफ़ उस्मानी साहब के लिए, ठीक उसी के बगल वाला कमरा मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार ‘महरानी’ के लिए था। हमलोग अपने-अपने कमरे में आ गए। थोड़ी ही देर में नरेश कुमार महरानी हमारे कमरे में आ गए, बोले-’हमलोगों के कमरे में तो बाथरूम ही नहीं है।’ मुझे इस पर बहुत हैरानी हुई। मैंने अनिल जी को फोन करके यह बात बताई। अनिल जी हंसे, बोले-’गवर्नर हाउस के गेस्टरुम में बाथरुम न हो, ऐसा मुमकिन है? ठीक से देखिए।’ नरेश महरानी से मैंने कहा कि परदे वग़ैरह हटाकर देखिए, बाथरूम होगा। कमरे में कई तरफ़ भारी-भरकम परदे लगे हुए थे, बाथरूम का दरवाजा़ परदे से ढके होने की वजह से उनकी नज़र बाथरुम की तरफ़ नहीं पड़ी थी। कमरे में ही बाथरुम था, जो खोजने पर मिला।

बिहार लोकभवन के रिज़र्व टेबिल पर खाना खाते टीम गुफ़्तगू के लोग।

 हमारे लिए जो सेवक लगाया गया था, उससे आसिफ़ उस्मानी ने कहा कि मैं सुबह छह बजे ही काली चाय पीता हूं। उसके बाद ही बाथरूम जाता हूं। सेवक ने कहा-‘सुबह छह बजे आपको काली चाय मिल जाएगी।’ थोड़ी देर तक बात करने के बाद ही हमलोग सो गए। सुबह आठ बजे से ही चले थे, काफी थक गए थे। अगले दिन ठीक सुबह छह बजे कमरे की घंटी बजी। मैंने दरवाज़ा खोला, चाय-बिस्किट लिए सेवक खड़ा था। आसिफ़ उस्मानी ने उस सेवक से कहा कि हिन्दी का जो भी अख़बार आता हो, ले आओ। हमने चाय-बिस्किट का आनंद लिया, फिर बाथरूम गए। थोड़े ही देर में हमारे कमरे में ‘हिन्दुस्तान’ अख़बार आ गया। मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी भी हमारे ही कमरे में आ गए। एक बार फिर से हमने चाय के लिए आर्डर किया। इस बार चार लोगों के लिए चाय-बिस्किट आ गया। बातचीत करते-करते सुबह के नौ बज गए। तभी एक सेवक आकर बोला, आप लोग आइए नाश्ते के लिए। पास के ही कमरे में डाइनिंग टेबिल लगी थी। वहां अनिल जी और एक-दो लोग बैठे थे, हम भी पहुंच गए। मुझसे मुख़ातिब होते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में अनिल जी बोले-‘बाथरुम मिला था या नहीं।’ हमलोग भी हंस पड़े। फिर हम सभी ने नाश्ता किया। 

रात में गवर्नर साहब से बातचीत के दौरान ही मैंने उनको बताया दिया था कि मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ अपनी किताब ‘मशवरा’ लेकर आए हैं। आपके हाथों विमोचन कराना चाहते हैं। उन्होंने कहा था कि-’सुबह विमोचन हो जाएगा, तब हमारा कमैरामैन और अन्य लोग भी रहेंगे।‘ नाश्ते के बाद हमें गवर्नर साहब के ऑफ़िस में ले जाया गया। बीच वाली कुर्सी गर्वनर साहब के लिए थी। बाकी अगल-बगल वाली कुर्सियों पर हमलोग बैठ गए। थोड़ी ही देर में गवर्नर साहब आ गए। उन्होंने आते ही सेवक से चाय लाने को कहा। चाय आ गई। फिर उन्होंने कहा- ’किताब लाइए, विमोचन हो जाए।’ तब तक फोटोग्राफर और कई अन्य लोेग भी आ चुके थे। विमोचन हो गया, फोटोग्राफी भी हो गई।

पंजाब, हरियाण, दिल्ली और चंडीगढ़ दिवस पर बिहार लोकभवन में आयोजित हो रहा रंगारंग कार्यक्रम।

मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी ने कहा कि ’बिहार विधान सभा की कार्यवाही चल रही है, हमलोग देखना चाहते हैं।’ फिर मैंने अनिल से इनकी इच्छा बताई। अनिल जी कहा कि आप लोग देर से बता रहे हैं, फिर भी मैं पास बनवाने की कोशिश करता हूं। बहरहाल, थोड़ी देर में ही इन दोनों का पास बन गया। तन्हा और महरानी लोकभवन की गाड़ी में ही बैठकर बिहार विधान सभा गए। वहां बहुत लोगों के साथ-साथ इनकी मुलाकात मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से हुई। लगभग दो घंटे बाद ये लोग बिहार विधान सभा से लौटकर आए। इस दौरान मैं और आसिफ़ उस्मानी साहब अपने कमरे में ही रहे।

फिर, गवर्नर साहब से हमने पटना के गुरुद्वारा और ‘खुदाबख़्श लाइब्रेरी’ जाने की इच्छा जताई। हमारी बात सुनकर पास में खड़े पीए ने कहा कि आइए सारे इंतज़ाम करा देता हूं। गवर्नर साहब ने कहा कि दिन में मुझे कई कार्यक्रमों में जाना है, शाम को हमलोग फिर से साथ बैठेंगे। यह कहकर गवर्नर साहब अपने निर्धारित कार्यक्रम के लिए निकल गए। गवर्नर हाउस के एक सीनियर कर्मचारी ने आकर हमसे कहा कि आप लोगों के लिए नीचे कार तैयार है, आ जाइए। हम चारों लोग लिफ्ट से नीचे आ गए। गवर्नर हाउस की कार में चालक पहले से ही तैयार बैठा था। हमलोग भी बैठ गए।

 विभिन्न रास्तों से होते हुए हमारी कार गुरुद्वारे के दरवाज़े पर पहुंची। पहले से ही यहां हमारे आने की सूचना दी जा चुकी थी। कार के रुकते ही सिख धर्म का एक आदमी हमारी कार के दरवाज़े पर आया। हमें बहुत ही सम्मान के साथ गुरुद्वारे के अंदर ले गया। पहले हमें गुरुद्वारे के गेस्टरूम में ले जाया गया। वहां, पहले हमें पानी दिया गया, फिर थोड़ी ही देर में सबके लिए चाय आ गई। हमने चाय पी। इसके बाद गुरुद्वारे का ही एक आदमी हमें साथ ले गया। गुरुद्वारे के विभिन्न हिस्सों से हम घूमते हुए निकल रहे थे, काफ़ी भीड़ थी। भीड़ से ही लग रहा था कि यह कोई ख़ास और ऐतिहासिक गुरुद्वारा है। हमें प्रसाद दिया गया, साथ ही गेरूआ रंग का शॉल भी दिया गया। मैंने ग़ौर किया-यह शॉल सिर्फ़ हमीं चार लोगों को ही दी गई, अन्य जो लोग घूम रहे थे, उन्हें नहीं दिया गया। फिर गुरुद्वारे के उस हिस्से में हम गए, जहां लंगर चल रहा था। मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ और नरेश कुमार महरानी अन्य लोगों के साथ लंगर खाने के लिए कतार में बैठ गए। बुजुर्गों के खाने के लिए दो-तीन बेंच और टेबिल लगे हुए थे। आसिफ उस्मानी अपनी लंगर की थाली को लेकर उसी बेंच पर बैठ गए। मैं भी उनके साथ बैठ गया, लेकिन मैंने लंगर की थाली नहीं ली, मेरा खाना खाने का मन नहीं कर रहा था। तीनों लोगों के लंगर खा लेने के बाद हम गुरुद्वारे के दरवाज़े की तरफ़ आ गए। दरवाजे़ पर खड़ी कार में चालक हमारा इंतज़ार कर रहा था।

  हम सभी कार में बैठे और फिर ‘खुदाबख़्श लाइब्रेरी’ की तरफ़ चल पड़े। थोड़ी ही देर में लाइब्रेरी पहुंच गए। यहां भी हमारे आने की सूचना पहले ही दे दी गई थी। कार के पहुंचते ही लाइब्रेरी के दो कर्मचारी आ गए। सलाम किए और अंदर ले गए। मोहम्मद असग़र साहब के चैम्बर में हमें बिठाया गया। पहले चाय-बिस्किट हमें पेश किया गया। इसके बाद असग़र साहब ने लाइब्रेरी में मौजूद बहुत सारे पुराने कु़रआन दिखाए, कई ऐसे कु़रआन भी इस लाइब्रेरी में है, जो पांचवीं और छवीं शताब्दी के हैं, जिन्हें सोने से लिखा गया। और बहुत सारी ऐतिहासिक किताबें दिखाई गईं। फिर मैंने उत्सुकता से पूछा-यहां ‘गुफ़्तगू’ पत्रिका भी भेजी जाती है, वह कहां रखी है। असग़र साहब हमें साथ उस ओर ले गए, जहां गुफ़्तगू पत्रिका रखी हुई थी, हमने उसकी फोटो ली। लाइब्रेरी का पूरा मुआयना करने के बाद हम वापस गवर्नर हाउस आ गए। शाम के छह बज गए थे। गुरुद्वारे में मैंने लंगर नहीं खाई थी, इसलिए भूख लग गई थी। मगर, यह खाने का वक़्त भी नहीं था। इसलिए अपने कमरे में पहुंचकर मैंने टोस्ट और चाय लाने को कहा। थोड़ी ही देर में ढेर सारा टोस्ट और चाय आ गया। मेरे साथ अन्य तीन लोगों ने भी चाय-टोस्ट लिया। फिर आराम करने का मन हुआ। अपने-अपने बेड पर लेट गए।

  रात के आठ बजे हमें खाना खाने के लिए बुलाया गया। हमारे साथ कई अन्य लोग भी ख़ाना खाने बैठे। दो लोग कश्मीर से भी थे। गवर्नर साहब ने सुबह ही कह दिया था कि आज के खाने में आप लोगों को मखाने का हलवा खिलवाऊंगा, यहां का बहुत ख़ास डिश है। खाना खाने के बाद मीठे के तौर पर मखाने का हलवा दिया गया। हम सभी ने बड़े चाव से उसका आनंद लिया। फिर हम अपने कमरे में आ गए। तकरीबन 20 मिनट बाद हमें यह कहकर बुलाया गया कि गवर्नर साहब बुला रहे हैं। एक दूसरे कमरे मे हम पहुंचे, जहां सोफे-कुर्सियां लगी थीं। हम पहले उस कमरे में पहुंचे, तुरंत ही गवर्नर साहब भी आ गए। फिर उन्होंने ‘कहवा’ का आर्डर दिया, हमने कहवा का आनंद लिया। फिर बातचीत शुरू हुई। बातचीत करते 11 बज गए।

पटना के खुदाबक्श लाइब्रेरी में दूसरी किताबों के साथ ‘गुफ़्तगू’ पत्रिका।

 मनमोहन सिंह तन्हा ने पहले ही बताया था कि कि कल बैंक में एक ज़रूरी काम है, इसलिए बिल्कुल सुबह ही निकलना पड़ेगा। सुबह जल्दी निकलने की बात जब गवर्नर साहब से बताई गई, तो वे नाराज़ हो गए, बोले-नाश्ता करने के बाद 10 बजे तक निकलिए। लेकिन, जब मनमोहन सिंह तन्हा ने अपना ज़रूरी काम बताया तो उन्होंने सुबह निकलने की इज़ाज़त दे दी। सुबह छह बजे निकलने की प्लानिंग हुई, इसलिए रात में ही गवर्नर साहब से हमलोगों ने विदाई ले ली। हमलोग अपने कमरे मे आ गए। थोड़ी ही देर में अनिल जी गवर्नर हाउस के बैग में रखे हुए हमलोगों के लिए गिफ़्ट लेकर आ गए, हमने उसे सहर्ष रख लिया और फिर सो गए। सुबह पांच बजे ही मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने हमारे कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। मैं और आसिफ़ उस्मानी उठ गए। फ्रेश होने के बाद हम चारो ने एक साथ अपने कमरे में ही चाय-टोस्ट वगैरह लिए और फिर प्रयागराज के लिए निकल गए। शाम चार बजे तक घर पहुंच गए।

(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित ) 


बुधवार, 12 अगस्त 2026

 कबीर, रहीम की तरह साधक हैं डॉ. सोमनाथ: अतुल

डॉ. सोमनाथ शुक्ल की पुस्तक ‘श्रम-साधक’ का हुआ विमोचन

बालीवुड अभिनेता का ‘गुफ़्तगू’ ने किया नागरिक अभिनंदन

अतुल तिवारी

प्रयागराज। डॉ. सोमनाथ शुक्ल के दोहे पढ़कर सहज ही कहा जा सकता है कि इन्होंने कबीर और रहीम की तरह साधना करके काव्य रचा है। इतनी आसानी से मजदूरों और श्रमिकों को रेखांकित करते हुए दोहा लिख देना बहुत बड़ी बात है। ‘श्रम साधक’ पुस्तक में इन्होंने जिस तरह से मजदूरों की हालात को रेखांकित किया है, वह आज दौर में बहुत अधिक ही उल्लेखनीय है। यह बात 09 अगस्त की शाम गुफ़्तगू की तरफ से सिविल लाइंस स्थित एक होटल में डॉ. सोमनाथ शुक्ल की पुस्तक ‘श्रम-साधक’ के विमोचन अवसर पर बॉलीवुड अभिनेता अतुल तिवारी जी ने कही। 

श्री तिवारी ने कहा कि यह पहली बार है कि किसी शहर ने मेरा नागरिक अभिनंदन किया है, वर्ना मेरे होम सिटी लखनऊ ने कभी नागरिक अभिनंदन नहीं किया। इसके लिए मैं गुुफ़्तगू संस्था का आभारी हूं।

डॉ. सोमनाथ शुक्ल की पुस्तक ‘श्रम-साधक’ का विमोचन करते अतिथिगण

डॉ. सरोज सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि डॉ. सोमनाथ जी ने दोहा लिखने के लिए जिन मुद्दों को उठाया है, आज के दौर में इस मुद्दे पर काव्य का लेखन नहीं हो रहा, अलबत्ता कहानियां लिखी जा रही हैं। डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि डॉ. सोमनाथ शुक्ल हमारे दौर के बहुत ही प्रतिभावान कवि हैं, ऐसे लोगों का सम्मान होना चाहिए। डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कहा कि इस पुस्तक में कुछ ऐसे दोहे हैं, जो मेरे जीवन से जुड़े हुए हैं। न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. सोमनाथ शुक्ल की किताब बेहद सराहनीय और ख़ास है। संचालन मनमोहन सिंह तन्हा और धन्यवाद ज्ञापन नरेश कुमार महरानी ने किया।

फिल्म अभिनेता और कवि अतुल तिवारी का नागरिक अभिनंदन करते टीम गुफ़्तगू के लोग

इस मौके पर प्रभाशंकर शर्मा, नीना मोहन श्रीवास्तव, शैलेंद्र जय, आसिफ़ उस्मानी, डॉ. एस.एम. अब्बास, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, शिबली सना, अफसर जमाल, शिवाजी यादव, मंजुलता नागेश, सुनील दानिश, धीरेंद्र सिंह नागा, क्षमा द्विवेदी, शाहीद खुश्बू आदि मौजूद रहे।


सोमवार, 3 अगस्त 2026

सज्जाद ज़हीर को नहीं रास आया पाकिस्तान

मज़हब की बुनियाद पर बने मुल्क को छोड़ने का लिया था फैसला

पाकिस्तान में हो गई थी उम्रकै़द, पंडित नेहरु ने ज़हीर को छुड़वाया

                                                                          - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


 प्रगतिशील लेखक संघ का ज़िक्र आते ही सबसे पहले सज्जाद ज़हीर का नाम जे़ह्न में अपने-आप आ जाता है। 11 सितम्बर 1973 को लखनऊ में जन्मे सज्जाद ज़हीर ने ही मुल्कराज आनंद और ज्योतिर्मय घोष के साथ मिलकर 1935 में इंग्लैंड में प्रलेस का गठन किया था। 21वीं सदी के प्रथम दशक तक इस संघ ने बहुत शानदार काम किया है, मगर अब कई मुद्दों पर भटकता हुआ-सा दिखता है। सत्ता की महत्वाकांक्षा और खुद को सबसे बेहतर साबित करने की मंशा के कारण यह संगठन अपने मूल उद्देश्यों से ही भटक गया है। हालांकि कुछ शहरों में यह संगठन अब भी अच्छा कार्य कर रहा है।

सज्जाद ज़हीर

 सज्जाद ज़हीर की बेटी नादिरा ज़हीर बब्बर बताती हैं-‘‘सैंतालिस में जब देश आज़ाद हुआ  उस वक़्त अब्बा पाकिस्तान में थे। पाकिस्तान तो इस्लामिक विचार से बना था इसलिए वहां पर कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करने वालों की धर-पकड़ शुरू हो गई, अब्बा इसी पार्टी के लिए काम करते थे। इसी वजह से वो अंडरग्राउंड हो गए, लेकिन फाइनली उनको किसी ने मुख़बिरी करके पकड़वा दिया और उनको उम्रकैद हो गई। फिर यहां पर मेरी मां ने अपने तीनों बच्चों को पाला। उस समय मेरी मां और हम लोग लखनऊ में ही थे। मैं उस समय बहुत छोटी थी, मां ने बहुत मेहनत की। हम तीनों बहनों को लेकर एक बार पाकिस्तान भी गई थीं, अब्बा से जेल में मिलीं। जब उनसे हम मिलने पहुंचे तो अब्बा ने कहा तुम लोग भी यहीं आ जाओ तो मिलने में आसानी रहेगी। लेकिन उस समय मेरी मां ने फैसला लिया कि मैं ऐसे मुल्क में नहीं रहूंगी जो मज़हब की बुनियाद पर बना हो। अब्बा ने मेरी मां की बात पर सहमति जताई, फिर हम वापस लखनऊ आ गए।

अपनी पत्नी और चारो बेटियों के साथ सज्जाद ज़हीर।

 

 उस वक़्त मां ने बहुत मेहनत की और अब्बा को लाने की कोशिश की। जवाहरलाल नेहरू से मिलीं। उनसे कहा कि-‘‘मेरा शौहर तो पाकिस्तान में कैद है और यहां के लोग बोलते हैं कि जब हिन्दोस्तान आज़ाद हुआ तो सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान में थे, तो वो पाकिस्तानी हो गए। सज्जाद ज़हीर पाकिस्तान में जेल में बंद हैं, हम लोग पूरी फैमिली यहां हैं तो हम लोग पाकिस्तानी कैसे हो गए।’’ उस वक़्त मोरारजी देसाई गृहमंत्री थे, उन्होंने इनके ख़त पर लिख दिया कि ये तो पाकिस्तानी हैं, हमको इनसे कोई लेना-देना नहीं है। फिर जवाहरलाल नेहरू साहब ने हस्तक्षेप करके, पाकिस्तान सरकार से बात करके उनको रिहा कराने की कोशिश की और सज्जाद ज़हीर दिसंबर 1957 में भारत वापस आ पाए। अब्बा के वापस भारत लौटने के बाद मेरी सबसे छोटी बहन नूर ज़हीर का जन्म हुआ, इससे पहले हम तीन बहनें थीं।’’ 

 नादिरा बताती हैं-‘‘अब्बा के पाकिस्तान से वापस आने के बाद हम लोग दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। दिल्ली में कोई घर नहीं था तो किराए का घर लिया जिसका साढ़े तीन सौ रूपया किराया था। दो बेडरूम थे, एक हॉल था और किचन था। हम लोग चार बहनंे थीं, एक कमरे में हम सब बहनें रहती थीं। एक में अब्बा रहते थे। रात में अब्बा हॉल में चले जाते थे, मेरी छोटी बहन उन्हीं के पास सोती थी। खाना हमारे यहां बहुत अच्छा बनता था। अब्बा को इंदिरा गांधी जी भी जानती थीं, क्योंकि इंदिरा जी के साथ भी उन्होंने काम किया था। जब शिमला समझौता हुआ था तो अब्बा वहां साथ में गए थे। मैं भी अब्बा के साथ थी। उस वक़्त बाद में इनको दिल्ली में रहने के लिए मकान इंदिरा जी ने दिया था और कहा कि आपने हमारे लिए जो काम किया है, उसके लिए ये एक छोटी सी भेंट है।’’

बाएं से-सज्जाद ज़हीर, कृष्ण चंदर, फ़िराक़ गोरखपुरी और जोश मलीहाबादी।

सज्जाद ज़हीर के जेल में बंद होने के दौरान जब उनकी पत्नी और बच्चे वापस लखनऊ अपने घर आ गए, तब यहां सर वजीद हसन साहब की कोठी में ये लोग रहते थे। उनके परिवार के पाकिस्तान से लौट आने पर सज्जाद ज़हीर की मां को बहुत बुरा लगा। उन्होंने अपनी बहू से कहा कि तुम गई थी, मगर मेरे बेटे को वापस लिए बिना लौट आई ? वह तुम्हारी वजह से ही बिगड़ गया। तुम उसको मना नहीं कर सकती थी कि वो कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम न करे? तुमको मना करना चाहिए था। तुम्हें यहां रहने की कोई ज़रूरत नहीं है। तुम अब यहां नहीं रह सकती हो। इस पर उनकी पत्नी रज़िया ने कहा कि घर में न सही हमको इस घर के बाहर बने आउटहाऊस में ही रहने दीजिए। किसी तरह आउटहाऊस में रहने की इज़ाज़त मिल गई। 

 आउटहाऊस की स्थिति अच्छी नहीं थी, बरामदे में बहुत बड़ी-बड़ी घास थी, पत्थर थे, सांप थे। सब साफ कर इन लोगों ने रहना शुरू किया। बाद में यहीं पर प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकें होने लगीं। पत्नी रज़िया ज़हीर ही बैठक करती थीं। सज्जाद भाई बन्ने भाई के नाम से मशहूर थे। सब लोग उन्हें बन्ने भाई ही बोलते थे। उस वक़्त रज़िया ने अदब से संबंधित कामों का बीड़ा उठाया हुआ था। उस समय भी जब लोग मिलने के लिए आते थे तो उनकी सास सब पर नज़र रखती थीं कि कौन आया, कहां से आया ? पूछती थीं भाई तुम कौन हो, किसके लड़के हो, ज़रा सी भी वो बोलने में चूक जाए तो वो पकड़ लेती थीं। तुम तो वो नहीं हो। तुम उनके लड़के तो नहीं हो। उसके तो तीन बेटे हैं, तुम कौन से वाले हो, इस तरह से वो सब पर चौकीदारी करती थीं, निगाह रखती थीं। बाद में लोरगों के आने-जाने के लिए पीछे की तरफ से एक दरवाज़ा बनाया गया। 

राजेंद्र सिंह बेदी और गु़लामी रब्बानी ताबां के साथ सज्जाद ज़हीर।

नादिरा बताती हैं-‘‘मेरे अब्बा बहुत अच्छे इंसान थे। एकदम नर्म मिज़ाज, चुपचाप रहने वाले, वो ज़्यादा बात भी नहीं करते थे, मुस्कराते रहते थे। किसी से रूडली तो कभी बात ही नहीं करते थे। अम्मी की बहुत इज़्ज़त करते थे। उनको कुछ कहा ही नहीं कभी। मिसाल के तौर पर खाना जैसे लगता था, हमेशा बैठ जाते थे और सबसे पहले डोंगा उठाकर अम्मी को देते थे और कहते थे - लीजिए रज़िया। अम्मी ये इन सब चीजा़ें से बजाय खुश होने के नाराज़ होती थीं।‘‘ 

 नादिरा यह भी कहती हैं-‘‘हम लोग नैनीताल जाते थे। वहां पर किसी का एक कॉटेज था, जो अम्मी की वजह से मिल जाता था। वह छह कमरे का था और सब कमरे अच्छे थे।  उसमें खाना हम लोग खुद पकाते थे। शाम के वक़्त सब घूमने जाते थे। खाना अच्छा पका हो तो कहते थे-तुम लोग बहुत अच्छा पकाती हो, आज तो बहुत अच्छा पका है। तुम लोग पहले खाओ। कभी-कभार अम्मी टोक देती थीं, बेटा थोड़ा शर्म करो वो तुम्हारा बाप है, थोड़ा लिहाज करो, थोड़ी अच्छी बोटियां छोड़ दो उनके लिए, सब अपनी प्लेट में उड़ेल लोगी! मैं कहती-मैं क्या करूं वो तो खुद ही कह रहे हैं। वो कहते हैं पर तुम्हें भी तो अकल होनी चाहिए।’’

प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते सज्जाद ज़हीर।

नादिरा के मुताबिक अब्बा हम लोगों को पढ़ाते नहीं थे, अम्मी ही पढ़ाती थीं। लेकिन, अब्बा शायरों और शायरी के बारे में अच्छे से समझाते थे। अदब के बारे में भी समझाते थे। कैसे क्रिटिसिजम होता है, सब समझाते थे। बाकी मेरी दोनों बड़ी बहने बहुत ज़हीन थीं, वो ही पढ़ा देती थीं और कुछ अम्मी पढ़ा देती थीं। गणित पढ़ाने के लिए एक टीचर आते थे, इसहाक नाम था उनका। अम्मी ने कहा कि थोड़ा इसको भी दो-चार मिनट दीजिए और मैथ पढ़ा दिया करिए, क्योंकि मेरी मैथ बहुत वीक थी और मन भी नहीं लगता था। मन तो खेलने में रहता था। कैसे यहां से भागूं, खेलने जाऊं। वो कहते थे कहां है आपका ध्यान, कहां है आपका ध्यान। घर में सब अदब के लोग आते थे, बातें होती थी माहौल था और हम लोग भी बैठे रहते थे। हम सब सुनते थे इसलिए ये अपने आप आ गई। अलग से सिखाने के लिए कुछ नहीं था।

बाएं से - साहिर लुधियानवी, सज्जाद ज़हीर और जां-निसार अख़्तर।

 सज्जाद ज़हीर की चार बेटियों के नाम नजमा ज़हीर बक़र, नसीम ज़हीर भाटिया, नादिरा ज़हीर बब्बर और नूर ज़हीर हैं। उन्होंने कई किताबें लिखीं हैं, जो बहुत चर्चित रहीं हैं। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार ‘क़ौमी जंग’ और ‘नया ज़माना’ अख़बार में प्रधान सम्पादक की हैसियत से काम किया। लंदन में जर्नलिज्म की पढ़ाई, संपादकीय सूझ-बूझ और अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि की बदौलत इन पत्रों ने ज़ल्द ही लोगों के बीच अपनी पहचान बना ली थी। 13 सितंबर, 1973 को अल्माअता (सोवियत संघ) में (जो कि अब कज़ाकिस्तान में पड़ता है।) अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित)