शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

रंगमंच की सफलता के लिए सरकारी या ग़ैर सरकारी मदद ज़रूरी: नादिरा ज़हीर बब्बर

 संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, रंगमंच और फिल्मों की जाने-मानी अभिनेत्री एवं निर्देशिका नादिरा जहीर बब्बर का प्रारंभिक जीवन लखनऊ में बीता। आपके पिता सज्जाद ज़हीर प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक थे। आपकी शादी प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता-सांसद राज बब्बर से हुई है। आप एनएसडी दिल्ली से अभिनय में स्नातक (गोल्ड मेडलिस्ट) हैं। आपने फिल्म ‘ब्राइड एंड प्रेजुडिस’, ‘जय हो’, ‘मीनाक्षीः ए टेल ऑफ थ्री सिटीज’, ‘घायल वन्स अगेन’ सहित कई फिल्मों में अपने दमदार अभिनय किया है। रंगमंच के लिए ‘यहूदी की लड़की’, ‘संध्या छाया‘, ‘लुक बैक इन एंगर’, ‘बल्लबपुर की रूपकथा’, ‘बात लात की हालात की’, ‘भ्रम के भूत’ और ‘बेगम जान’ जैसे कई प्रसिद्ध नाटकों का सफल निर्देशन के साथ ‘दयाशंकर की डायरी’, ‘शक्कुबाई’, ‘सुमन और सना’, ‘जी जैसी आपकी मरजी’, ‘फुटनोट्स ऑफ लाईफ’ जैसे कई नाटकों का लेखन भी किया है। अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’ ने मंुबई स्थित इनके आवास पर मुलाकात करके विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है इस बातचीत के  प्रमुख अंश-

 नादिरा ज़हीर (बीच में) से इंटरव्यू करते अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’(दायें), साथ में बैठी हैं कुमुद श्रीवास्तव(बाएं)

सवाल: आपका प्रारंभिक जीवन लखनऊ और दिल्ली में बीता। अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए?

जवाब: मेरे अब्बा सज्जाद जहीर पीडब्लूए के संस्थापक सदस्यों में से थे। मेरी मां भी टीचर के साथ-साथ बहुत अच्छी शायरा थीं। घर में साहित्यिक माहौल था तो अदब की समझ थी।  हमारे घर में ही प्रोग्रेसिव राइटर यानी प्रगतिशील लेखक संघ की सब मीटिंग होती थी। उस समय के बड़े-बड़े शायरों का घर पर आना-जाना था। हमारे घर में अक्सर तीन-चार घंटे की बैठकें होती थी। इन बैठकों का इंतजाम मुझे ही करना पड़ता था। बहुत गुस्सा भी आता था कि दरियां बिछाओ, सफाई करो, झाड़ू लगाओ, चादरें बिछाओ। जब अब्बा पाकिस्तान की जेल में थे तो कुछ पैसा भी नहीं था। अम्मी एक कालेज में पढ़ाती थीं। वहां से उस समय 180 रुपये तनख़्वाह मिलती थी। उसी में हम तीन बहनो की किसी तरह गुजर बसर हो रही थी। 

गुफ़्तगू पत्रिका पढ़ती हुईुं नादिरा ज़हीर बब्बर।


सवाल: आप अपने पहले नाटक जिसमें आपने अभिनय किया और इससे संबंधित कुछ खास बातें बताइए। 

जवाब: मैंने अपना पहला नाटक एनएसडी में ही किया। उस नाटक में एक मशहूर अदाकारा  का महत्वपूर्ण रोल था परंतु लास्ट मिनट में उन्होंने प्राब्लम खड़ी कर दी। वो बहुत इररेगुलर और इर्रिस्पांसिबिल थी। हमारे डायरेक्टर साहब को गुस्सा आ गया कि पहले शो से ही यह गडबड़ कर रही हैं। उन्होंने मुझे बुलाया कि नादिरा इस रोल के लिए तुम तैयार हो। मैने कहा मैं तो ....। उन्होंने कहा मैं तो क्या, अब तुम्हें यह रोल करना है। चार पांच सीन और अच्छे खासे डायलॉग हैं। अभी इसे करो, आगे तुम्हें बहुत बड़ा रोल मिलेगा। तीसरे दिन शो हुआ, मेरे अभिनय की खूब प्रशंसा हुई।


सवाल: एनएसडी के बाद आपका अगला पड़ाव कौन सा था?

जवाब: एनएसडी में मुझे गोल्ड मेडल मिला था। फिर डायरेक्शन के क्षेत्र में पढ़ाई के लिए, मैं जर्मनी चली गई। वहां पर मैं डेढ़ साल रही, वहां बहुत कुछ सीखने का मौका मिला। बहुत सारे नाटकों के डायरेक्शन में असिस्ट किया। फिर जब मेरे अब्बा का इंतकाल हुआ तब वहां से वापस, इंडिया आ गई।


सवाल: डायरेक्शन की पढ़ाई के दौरान जर्मनी का अनुभव कैसा रहा ? 

जवाब: जर्मनी जाने से पहले मैंने दो-तीन महीने जर्मन सीखी थी। जब जर्मनी गई तो लगभग थर्टी परसेंट जरमन आता था। वहां मैं फर्राटे से बोल रही थी। मैं पेईंग गेस्ट के तौर पर वहां जिनके घर पर रहती थी, उनका नियम था कि इतने समय तक आपको आना है, इतने समय पर नाश्ता करना है। मेरा कोर्स तो दो साल का था, लेकिन डेढ़ साल में ही मैं वापस आ गई। उसी समय रूस में मेरे फादर की डेथ हो गई। वो वहां पर अलमाती रूस में एक कांफ्रेंस में गए हुए थे। मैं जर्मनी से लंदन आई और लंदन से इंडिया आई। रशिया से जो मय्यत आई थी वो इंडिया वाया थ्रो ही आया था। सेम फ्लाइट में हम लोग और हमारे फादर की मय्यत दिल्ली आई थी। मेरी बेटी जूही की शादी जब 2007 में थी तो जर्मनी से भी कुछ लोग इस शादी में आये थे। राज साहब ने कहा था कि अपने कौन-कौन से लोग है, जिनको बुलाया जा सकता है तो उनको भी बुलाया गया था। हालैंड से भी कुछ लोग आए थे। 


सवाल: राज बब्बर जी से आपकी शादी कैसे हुई ?

जवाब: मेरी बड़ी बहिन की तो अरैंज मैरिज हुई थी, दूसरी बहन ने विनोद भाटिया से लव मैरिज की थी  फिर मुझे राज बब्बर साहब से इश्क़ हो गया। इनके यहां कुछ खास ऐसा था तो नहीं, लेकिन अम्मी ने कहा, कोई बात नहीं लालच में शादी नहीं करनी है। लड़का अगर तुम्हे पसंद है और एक्टर अच्छा है तो कुछ न कुछ करेगा। राजबब्बर मुझसे तीन साल जूनियर थे। उसके बाद अम्मी ने कहा शादी कर लो। फिर हमारी शादी हुई। मेरा ससुराल टुंडला में था। मेरे ससुर साहब दिल्ली में थे। वहां जाकर मैं थोड़े दिन रही फिर हम दिल्ली आ गए। दिल्ली में इंदिरा जी ने अम्मी को एक चार कमरे का फ्लैट दिया था। वो फ्लैट अम्मी ने हम लोगों को दे दिया। बाद में राज बब्बर जी और मैं मुंबई शिफ्ट हो गए। 

लंदन मेें-नादिरा ज़हीर (बाएं), सज्जाद ज़हीर और नजमा ज़हीर (सज्जाद ज़हीर की बेटी)

सवाल: निर्देशन, अभिनय तथा लेखन, इन तीनों में से आपकी पहली पसंद कौन सी है?

जवाब: एक्टिंग ही मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। मैं अपने आप से बेहतरीन एक्टिंग, बहुत आसानी से करवा लेती हूं। आज भी मुझे नाटकों में एक्टिंग का ही ज्यादा शौक है।


सवाल: आपने कई नाटक भी लिखे हैं। अपने कुछ नाटकों के बारे में बताइए। 

जवाब: मैंने सबसे पहला नाटक दयाशंकर की डायरी लिखा, जिसको आशीष विद्यार्थी  परफार्म करते थे। यह एक आम आदमी के मायानगरी मुंबई में जीवन-संघर्ष की कहानी है। इसका नायक यूपी के एक शहर इलाहाबाद से मुंबई आने पर, यहां मंत्रालय में नौकरी कर लेता है। यह साधारण आदमी जब गांव से यहां आता है तो उसको यहां का माहौल में लगने लगता है कि मैं बेस्ट हूं और यहां जो कुछ भी है उसको मैं हासिल कर सकता हूं। वो एमएलए साहब की लड़की को चाहने लगता है। यह साधारण आदमी अपनी बड़ी-बड़ी महत्वाकांछाओं को पूरा करने की कोशिशों के बीच कब पागल हो जाता है, उसको पता ही नहीं चलता। 

 मैंने दूसरा नाटक ‘सक्कूबाई’  लिखा। यहां पर घरों में काम करने वाली जो औरते होती हैं उनको बाई बोलते हैं। आम लोगों के घरों में होने वाली घटना-दृश्यों का इसमें समावेश है। अभी 2022-23 में हमने एक और नाटक ‘फरीदा’ किया। यह नाटक कशमीर के बैकग्राउंड पर है। मेरा एक और नाटक ‘जी जैसी आपकी मर्जी’ है। ये चार औरतों की कहानी है। फिर लिखा ‘फुटनोट्स ऑफ लाईफ’ जो मेरा बेस्ट है । इसमें चार कहानियां है। बाहर की चीज़ को देखने के लिए हमें बाहर जाने की ज़रूरत नहीं है, हम खिड़की से भी देख सकते है। इसमें वही कोशिश की गई है। यह इस तरह से लिखा गया है कि आप जब यह नाटक देखेंगे तब  इसकी भावना को आप महसूस करेंगे। मेरे लड़के आर्य बब्बर ने भी उसमें रोल किया है। एक और प्ले का नाम है ‘सलाम 1950 के नाम’। इस नाटक को भी बहुत लोग इंजॉय करते हैं। साल 2026 में हमारा नाट्य ग्रुप ‘एकजुट’ पैतालिस साल का हो रहा है ।

सज्जाद ज़हीर और रज़िया ज़हीर अपनी बेटियों के साथ। 


सवाल: विस्थापितों तथा नार्थ ईस्ट की समस्याओं पर आधारित नाटकों पर भी आपने काम किया है। इन नाटकों के बारे में बताइए। 

जवाब: वर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगों और विस्थापित कश्मीरी पंडितों के परिप्रेक्ष्य में मैंने  ‘सुमन और सना’ नाटक किया है। इंटरवल से पहले गुजरात और इंटरवल के बाद कशमीर की कहानी है। दोनों के घर से बिछड़ने की वेदना को समेटकर उसमें डालने की, हमने कोशिश किया है। हमने किसी को बुरा या भला नहीं कहा। जो लोग गुजरात में घर छोड़कर कब्रिस्तान मे या जम्मू में जो कैम्प में रह रहे थे, उन सबसे मिलकर उनकी सारी तकलीफें समझकर, उन सब चीजों को हमने नाटक में डाला है और बहुत अच्छा नाटक बना है। इंडियन आर्मी और आसाम के उल्फा ग्रुप, पर आधारित एक नाटक ‘ऑपरेशन क्लाउड बर्स्ट’ था। दोनों के पक्ष को हमने इसमें रखा है, कि ये लोग क्यों तथा किन परिस्थितियों में ऐसा काम कर रहें हैं और भारतीय सेना का सम्मान क्यों करना चाहिए। 

सवाल: आजकल थिएटर की राह में मुख्य बाधाएं क्या-क्या हैं ?

जवाब: थिएटर में हर समय पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है। कोई भी काम हो, बाधाएं तो उसमें होती ही हैं। थिएटर में अच्छे पैसों का नहीं मिलना भी एक बहुत बड़ी बाधा है। कितना भी बढ़िया आपका ग्रुप चल रहा हो, आपके प्ले की टिकटें कितनी भी बिक जाए, आप लाखों रूपया नहीं कमाने की वजह से थिएटर से जुड़े कलाकारों और अन्य लोगों को अच्छा पेमेंट नहीं कर सकते हैं। थिएटर में पैसे की कमी हमेशा रहती है, लेकिन जो काम पसंद है या जो सीखा है जिसको जुनून है वो करता है। अब क्या कर सकते हैं? इसलिए हम लोग लगे हुए हैं अब इसी में मजा आता है। परेशानियां तो होती ही हैं। प्ले तैयार है, एक एक्टर भाग गया। उसको कहीं और काम मिल गया तो छोड़ गया। परेशान बैठे हैं कि कैसे होगा, एक नया एक्टर ढूंढ कर कहां से लाएं। और भी इस तरह की बहुत चीजे हैं। इन्न्यूमरस ग्रांट्स वगैरह भी कभी-कभी मिल जाती है। आदमियों कलाकारों की अलग परेशानी है लेकिन आर्थिक परेशानी ही मुख्य है। 

रज़िया सज्जाद ज़हीर और सज्जाद ज़हीर

सवाल: छोटे शहरों में थिएटर की कितनी सफलता की संभावना है ? 

जवाब: बेगुसराय, आजमगढ़, लखनऊ, भोपाल आदि कई शहरों में हमने नाटक किए हैं। बेगूसराय में इतनी भीड़ उमड़ी कि सीटें कम पड़ गई। ऐसा ही आजमगढ़ में भी हुआ। लेकिन लखनऊ जैसे शहरों में हमें पास देने पड़ते हैं। बड़े-बड़े अधिकारियों को पास देने के बावजूद, वो खुद देखने नहीं आते। इन अधिकारियों में संतोष कुमार झा जी (कोंकण रेलवे के चेयरमैन) जैसे कुछ कद्रदान भी हैं। करीब पच्चीस-तीस साल से हम लोगों को जानते हैं, हमारी बहुत इज़्ज़त करते हैं। छोटे शहरों में भी नाटक सफल हो रहे हैं। दर्शक आ रहे है। हमारी कोशिश ये रहती है कि दर्शक दस रूपया देकर आएं लेकिन जरूर आएं। भोपाल में ऐसे ही होता है।  हालांकि सस्ते दर पर टिकट देने पर इतने कम पैसे मिलते हैं कि स्पांसरशिप की जरूरत पड़ सकती है। उसके बिना, आयोजन नहीं हो पाता। 


सवाल:  आप थिएटर और फिल्म-टीवी को किस तरह परिभाषित करती हैं ? 

जवाब: थिएटर के प्रति मेरे बच्चे या कोई भी यंगर जनरेशन आजकल बहुत सीरियस नही है और ये लोग थिएटर करना नहीं चाहते, क्योंकि थिएटर में बहुत पैसे नहीं मिलते। अपने बच्चे या आने वाली पीढ़ी से ये एक्स्पेक्ट करना कि वो जिंदगी भर थिएटर के लिए डिवोटेड रहेंगे, बहुत मुश्किल है। यह बहुत तकलीफ की बात है। हां, अगर सरकार की तरफ से कुछ ऐसी मदद मिले जिससे वो अपना मिनिमम खर्च बियर कर सकें और उनका घर चल सके, तब लोग जरूर करना चाहेंगे। लोगो को यह भी पता है कि थिएटर में हम एक तरह का रियाज कर अपने आपको निखारते हैं। हर कोई दस बार आडिशन देने के बावजूद निकाल दिया जाता है तब उसे पता चलता है कि उसको थिएटर करना चाहिए। थिएटर में रिहर्सल्स के दौरान एक-एक बात को उनको समझाया जाता है, लेकिन फिल्मों या सीरियल में इतना टाईम नहीं होता कि आपको एक-एक चीज  बताया जाय। आपने एक लाईन बोल दी वो भी इनके लिए काफी है। खूबसूरत लड़की कैसा भी कर ले, बस एक लाईन बोल दे, तो भी चल जाएगा लेकिन थिएटर में अच्छी अच्छी एक्ट्रेस हैं लेकिन उनको फिल्मों में काम इसलिए नहीं मिलता कि खूबसूरत नहीं हैं। फिल्मों और सीरियल में खूबसूरत होना ज़रूरी है। बड़े-बड़े अच्छे एक्टर भी यहां टिक नहीं पाते।

नादिरा ज़हीर को अपनी पुस्तक भेंट करते अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’, साथ में बैठी हैं कुमुद श्रीवास्तव।

सवाल: सीमित आर्थिक संशाधनों के बीच माहौल में आ रहे बदलावों को आप कैसा महसूस करती हैं ?

जवाब: यह सच्चाई है कि थिएटर में लोग अधिक पैसा नहीं लगाते हैं। लोग यह नहीं मानते हैं कि बहुत पैसा लगाने से हमारी बहुत अच्छी आडियंस आएगी। यह तो इस पर डिपेंड करता है कि आपका नाटक कैसा है। हां, थिएटर में भी पैसा लगाने वाले एकाध लोग हैं, लेकिन जनरली यह नहीं होता। कुछ नाटक बहुत अच्छे कमाते हैं। हमारा नाटक ‘ये है बाम्बे मेरी जान’ कम से कम दो तीन साल से चल रहा है और लगातार बेहतरीन शो हो रहे हैं। उसकी आडियंस कम हो जाय ऐसा नहीं है। थिएटर में यही देखा जाता है कि कितना बड़ा सेट लग रहा है। वैसे ज्यादातर हाल बहुत बड़े नहीं होते कि बहुत बड़ा सेट लग जाय। टाटा थिएटर बड़ा है पर अभी सिर्फ़ किराया ही डेढ़ लाख रुपये है। बड़े थिएटर में हमारे यहां नीता अंबानी वाला हाल है, जिसमें बड़े-बड़े भव्य सेट लगते हैं। यहां पर मुगले आज़म अभी होने वाला है। अगर इतना कोई पैसा दे, तो हम भी ऐसा करेंगे। हमारा एक नाटक ‘सलाम नाइन्टीन फिफ्टीज के नाम’ है। इसके अंदर अलग-अलग 15-20 लोकेशंस हैं। अच्छे से क्रिएट हो सकती है। अच्छे अच्छे डांसेज, अच्छे बड़े बड़े गाने हैं। कलाकार भी अच्छे हैं तो वो बिल्कुल हो सकता है लेकिन इतना पैसा मिलता नहीं। सब कोई एसेंस नहीं डालते।  

  रंगमंच की व्यापक सफलता के लिए निष्पक्ष रूप से सरकारी या गै़र सरकारी मदद ज़रूरी है। हमें भी अगर कोई बड़ा प्रोड्यूसर मिल जाता है तो हम भी भव्य और बड़े स्तर पर नाटक करेंगे। हमारे पास भी ऐसे बड़े नाटक हैं जो हम कर सकते हैं। मेरी संस्था ‘एकजुट’ को पैंतालीस साल हो गया और मुझे भी नाटक करते करते साठ साल हो गया। लेकिन अब परिस्थितियों के साथ-साथ लोगों में भी बदलाव आ गया है। हम तो इस बदलाव को झेल रहे हैं। 2014 से हम इलाहाबाद नहीं पहुंच पाए। अब एनसीजेडसीसी हमें बुलाती ही नहीं। 


सवाल: गुफ़्तगू के पाठकों के लिए आपका क्या संदेश है?

जवाब: संदेश यही है कि सफलता के लिए जिं़दगी भर मेहनत करिए। आप लगातार बिना थके बिना हटे अपना काम करते रहिए। अच्छी-अच्छी चीजें़ पढ़िए और अच्छी-अच्छी ऐसी चीजें लिखिए जो लोगों के अंदर समाज में व्याप्त मुद्दों तथा संवेदनाओं को निष्पक्ष औश्र सही तरीके से समझने की नज़र पैदा कर समाज को बेहतर बना सके।

( गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2026 अंक में प्रकाशित )


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