ग़ज़लों से नये चिराग़ जलाने की कोशिश
- डॉ. ज़की तारिक़
‘फ़िक्रे-नौ’ अज़हर रसूल की ग़ज़लों का संकलन है। जिसमें दो हम्द, पांच नात और एक मनक़बत तरानये-रमज़ान भी हैं। ये बात सभी जानते कि शेर कहना आसान काम नहीं है। खुदा जिस को चाहता है उस व्यक्ति को अपने करम से नवाज़ देता है। अज़हर रसूल के साथ भी यही हुआ है। तालीम हासिल करने के बाद टेलरिंग जैसे ख़ुश्क व्यवसाय को अपनाभर घर-बार चालाने वाला व्यक्ति घर के धार्मिक और साहित्यिक वातावरण के प्रभावित होकर शायरी से मुहब्बत कर बैठा। इस तरह वह धीरे-धीरे ग़ज़ल की जु़ल्फ़ें संवारने लगा। शुरू में क़सीम सहसरामी को ग़ज़लें दिखाई, जिनसे शायरी के शुरूआती गुण-दोष सीखते हुए अपने वालिद सबा कैफ़ी से ग़ज़ल का व्याकरण सीखा और अपने मन में पलती हुई अभिलाषाओं को ग़ज़ल के सांचे में ढालने में कामयाब हो गए। वह यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि इस दौर में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है-
कर दे मंज़िल से आशना जो तुम्हें,
ऐसा अब राहबर नहीं होता।
वह ग़ज़ल की तकनीक और शब्दों के प्रयोग से अच्छी प्रकार से परिचित हैं, इसीलिए सादा ज़बान में कहते हैं-
वह जब से मुझे याद आने लगे हैं।
मिरे ज़ख़्मे-दिल मुस्कुराने लगे हैं।
शह्र से कहीं अधिक उनको गांव के दृश्य पसंद आते हैं-
मुझे अब भी शह्रों से गांवों के मंज़र,
क़सम से बहुत ही सुहाने लगे हैं।
आज का इंसान दिल में नफ़रत और ज़बान पर मीठे बोल रखता है, जिसका भरपूर एहसास अज़हर रसूल को है। देखिए, कितना तीखा तन्ज़ वह करते हैं-
नफ़रत का ज़ह्र दिल में ज़बां पर है मीठी बात,
कहने का हाथ मुझसे मिलाये हुए तो हैं।
देश प्रेम में भी अज़हर रसूल किसी दूसरे हमवतन से पीछे नहीं हैं। उनका मज़बू इरादा इस शेर से साफ़ ज़ाहिर है-
किसी भी हाल में कश्मीर हम नहीं देेंगे,
मिलेगा कुछ नहीं दुश्मन का सर उठान से।
ज़मीं वतन की पुकारेगी जब कभी हमको,
तो पीछे हट नहीं सकते हैं सर कटान से।
सांप्रदायिक विचार रखने वालों से भी उन्होंने क्या सुंदर ढंग से अपनी बात कही है-
हमारे घर को तअस्सुब से देखने वालों,
महक वफ़ा की मिलेगी इसी घराने से।
आज जिस प्रकार ग़ज़ल का जादू सर चढ़कर बोल रहा है, शायर कहलाने के शौक़ में अदब में जिस प्रकार से साज़िश हो रही है, उसका उल्लेख भी उन्हीं के शब्दों में देखिए-
किसी का शेर है पढ़ता है कोई, अदब के साथ साज़िश हो रही है।
मिरी तख़लीक़ ही मुझको सुनाकर, बड़ी अच्छी नवाज़िश हो रही है।
अज़हर रसूल अपनी ग़ज़लों से समाज को जिस प्रकार जागृत करना चाहते हैं। हमें आशा है कि वह निरंतर इसी प्रकार ग़ज़लों से नये चिराग़ जलाकर समाज को रोशनी की किरन दिखाते रहेंगे। 144 पेज की इस किताब को आज़ाद स्क्रीन प्रिंटर्स ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 250 रुपये है।
ग़ज़ल की सजावट और बुनावट वाली शायरी
शौक़त ‘सबा’ कैफ़ी भोजपुर (बिहार) के मशहूर शायर हैं। इनका जन्म भोजपुर के एक छोटे से गांव पीरू में हुआ। इस गांव को इन्होंने अपनी मेहनत और सूझ-बूझ से शिक्षा का केंद्र बनाकर गांव में शायरी का चिराग़ रौशन किया और वहां के सीधे-सादे लोगों को शेर कहने और सुनने का सलीक़ा भी सिख़ाया।
शौक़त ‘सबा’ कैफ़ी ने कड़ी मेहरनत और बड़ी समझदारी से शायरी के मैदान में क़दम रक्खा है। पहले इन्होंने कैफ़ सहसरामी और बाद में हज़रत नावक हमज़ापुरी से शेर कहने के हुनर के साथ-साथ ग़ज़ल के क्राफ्ट का पाठ भी इसी मेहनत से पढ़ा कि बाद में पूरी ईमानदारी के साथ इस विधा में दक्षता प्राप्त कर ली। जिसका नतीज़ा इनका यह ग़ज़ल संग्रह ‘शजर-शजर’ हमारे सामने है। इनकी यह किताब पढ़कर अंदाज़ा हुआ कि वह शेर कहने के लिए शेर नहीं कहते है बल्कि पहले वह हालात का जायज़ा लेते हैं, उस पर विचार करते हैं, जब जाकर पूरी संजीदगी के साथ उन हालात को शेर का रूप देते हैं। वह जहां अपने सीने में धड़कता हुआ दिल रखते हैं, वही ज़िन्दगी की कड़ी धूप का सफ़ भी उनके क़दमों की रफ़तार को धीमा नहीं करता है। कुछ शेर उनके देखिए, जिनमें पूरे हौसले का इज़हार करते नज़र आत हैं-
यूं ही आंखों से जो टपक जाये,
अश्क इतना मिरा हक़ीर नहीं।
होगा इक दिन उसे मलाल बहुत,
मुझ को जो आज़मा रहा है अभी।
समाज में जिस प्रकार स्वार्थ और छल-कपट का बोलबाला है, उसका एहसास शायर को भली-भांति है। इस एहसास को वह अपने पाठक के मन में भी उतारना चाहता है, इसीलिए कहता है-
खुल न जाये भरम मुहब्बत का, आम से दास्तां न हो जाए।
वक़्त के साथ-साथ मुमकिन है, बेज़बानी ज़बा न हो जाए।
अब ये अपनी ज़बान खोलेंगे,
शह्र के बेज़बान बोलेंगे।
जिसे भी टूट के चाहेगे इस ज़मान में,
वह आस्तीन का खं़जर ज़रूर निकलेगा।
ग़ज़ल की सजावट और बुनावट में जिस मेहनत से उन्होंने काम किया है और भटके हुए इंसान, समाज में होने वाली कुरीतियों को अपनी ग़ज़ल में इंगित किया है, यक़ीनन वह इस बात की गवाही दे रही है कि शौक़त सबा कैफ़ी एक संवेदनशील शायर हैं और वह भटके हुए समाज को ईमानदारी और सांप्रदायिक सद्भाव का सच्चा रासाता दिखाना चाहते हैं। हम उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। 168 पेज की इस किताब को आज़ाद स्क्रीन प्रिंटर्स ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 250 रुपये है।
पहचान से अक़ील नोमानी की पहचान
- डॉ. वारिस अंसारी
अक़ील नोमानी का ग़ज़ल संग्रह ‘पहचान’ कई माने में अहम है। एक तो वह खुद ही मुस्तनद और मोहतरम शायर की हैसियत रखते हैं। दूसरे उनकी इस किताब पर इतने अज़ीम लोगों की टिप्पणी इसे खास बना रही है। अक़ील नोमानी की शायरी में ज़िंदगी के उतार चढ़ाव, समाजी हालत और इश्क़-मोहब्बत के हर तरह के रंग देखने को मिलते हैं। वह शायरी में जद्दोज़हद करते नज़र आते हैं। कहीं वह अपने-आप से तो कहीं समाज और वक़्त के हुक्मरानों से लड़ते नज़र आते हैं, और इतनी मेहनत के बाद भी वह किसी चीज़ को बोझ नहीं समझते, बल्कि हर लम्हा बेदार नज़र आते हैं। उनकी किताब पहचान पढ़ने पर पता चला कि उनकी ग़ज़लों में लताफ़त है और फनी शऊर भी। वह सच्ची शायरी करते हैं और अपनी बात सलीके़ से कहने का हुनर भी रखते हैं। वह एक हस्सास शायर हैं। यही वजह है कि उनकी शायरी में हक़्क़ानियत (सच्चाई) नज़र आती है। उनकी ग़ज़लें सादा और आमफ़हम ज़बान में हैं, जो कि क़ारी (पाठक) आसानी के साथ रवानी से पढ़ता चला जाता है और अपने आप पर बोर नहीं महसूस करता। चंद अशआर देखें-
अपनी कहो हमारी सुनो और खुश रहो।
आओ कलंदरों से मिलो और खुश रहो।
जुल्म उर्दू पे भी होता है और इस निस्बत से,
लोग उर्दू को मुसलमान समझ लेते हैं।
मुसाफिर तेरा जिक्र करते रहे,
महकता रहा रास्ता देर तक।
ख़बर है कोई चारागर आएगा,
सलीके से बैठें हैं बीमार सब।
इन अशआर में अक़ील नोमानी की फ़िक्ऱ का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इनकी ज़बान और उर्दू ग्रामर पर अच्छी और मज़बूत गिरफ़्त है। इनकी शायरी में ज़िंदगी का कर्ब भी है और इश्क़ की तमाम कैफ़ियत का इज़हार भी। वह काली रातों के अजाब पर भी नज़र रखते हैं और सुबह के उजालों की उम्मीद भी रखते हैं। उनकी शायरी में मतलब परस्ती, ज़माने के बदलते हुए मयार, कमज़ोर और मजलूम की मासूमियत और ताकतवरों का जुल्म व समाजी हालत का जिक्र जगह जगह है। इस तरह पूरी किताब में एक से बढ़ कर एक शेर मौजूद हैं। जिनको पढ़ने पर उनकी सच्ची और पाकीज़ा सोच का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इस किताब में खूबसूरत हार्ड कवर की डिज़ाइन,टीम अर्शिया पब्लिकेशंस देहली ने किया है । किताब क्लासिक आर्ट प्रेस देहली से कंपोज करा कर अर्शिया पब्लिकेशंस देहली से प्रकाशित किया गया है। शानदार कागज़ के साथ 116 पेज के किताब की कीमत 250 रुपए है।
रौशनी बिखेरता ‘शाम का धुंधलका’
इस वक़्त मेरे हाथ में डॉ. ज़की तारिक़ का शेरी मजमुआ (ग़ज़ल संग्रह) ‘शाम का धुंधलका’ है। बताना ये है कि वह जितना मज़मून निगारी पर कुदरत रखते हैं, उससे कहीं ज्यादा उन्हें शायरी में भी महारत हासिल है। क्योंकि डॉ. ज़की तारिक़ के वालिद एक कोहना-मश्क बुलंद पाया शायर थे। उनका तअल्लुक एक उम्दा पढ़े-लिखे खानदान से है। वह दीनी, इल्मी, अदबी तालीम से वाबस्ता फनकार हैं। वह रूमानी शायरी पर भी करिश्माई ताक़त रखते हैं और क्लासिकल शायरी पर भी बड़ी कुदरत रखते हैं। इसलिए इनकी शायरी किसी एक की तरफ नहीं जोड़ी जा सकती। बल्कि ये कहना गलत न होगा कि उन्होंने अपनी शायरी में समाज, दर्द, मोहब्बत सभी के साथ बराबर का हक़ अदा किया है। इनकी शायरी में जो फ़िक्री सलाहियत नज़र आती है वह कम ही लोगों में देखने को मिलती है।
मौजूदा दौर पर नज़र डाली जाए तो ग़ज़ल भी मुख्तलिफ उन्वान में ढली है। ज़बान व बयान के अंदाज भी बदले हैं। ग़ज़ल पर नए नए तजुर्बात हुए हैं। उर्दू के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी के अल्फाज़ के इस्तेमाल से भी ग़ज़ल को एक नई दिशा मिली है। डॉ. तारिक़ ने वक़्त के किसी मामले को और भी खूबसूरत पहलू में ढालने की कोशिश की है। इनके कुछ अशआर देखें-
पहले लीडर बन जाते है यार जक़ी,
फिर लोगों से मारा मारी करते हैं।
नफरतों का शजर है ऐ तारिक,
काश ! आए समर मोहब्बत का।
शगफ बढ़ा है मोबाइल का आजकल इतना,
रमक न आई नज़र दूर तक सवेरे की।
इनके अशआर में लीडर और मोबाइल अंग्रेजी के शब्द हैं। शायर ने इन शब्दों का इस्तेमाल करके शेर में चार चांद लगा दिया। इस तरह नफ़रत के पेड़ से मोहब्बत के फल की उम्मीद एक उम्दा फिक्र है। उनके चंद अशआर और देखते हैं-
मिले उनसे ज़माना हो गया है,
ये रिश्ता अब पुराना हो गया है।
बाम पर खड़े हो कर जुल्फ को संवारा है,
इस ग़ज़ल की लड़की ने फिर हमें पुकारा हैं।
मैं जकी एक कलंदर वह सिकंदर निकला,
वह जो आवाज़ भी दे मुझको तो जाऊं कैसे।
ऐसी खूबसूरत शायरी में जकी की जो सोच का इज़हार हो रहा है वह काबिले दाद है । वह आसान लफ्जों के साथ रवानी की शायरी करते हैं। इनकी शायरी में ऐसे बेशुमार पहलू मौजूद हैं। खूबसूरत हार्ड जिल्द के साथ 120 पेज की इस किताब को ख़ैरुल बशर (हापुड़) ने डिजाइन किया है। मासूमा एंड कंपनी से छपवा कर खुद ही डॉ. ज़की तारिक़ ने केला रोड , गौ शाला फाटक गाजियाबाद से प्रकाशित किया है। किताब की कीमत 200 रुपए है।
(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित)




