मंगलवार, 3 सितंबर 2013

किसी कानून से नहीं डरते बाबा लोग


इम्तियाज़ अहमद गाज़ी 
एक नाबालिग से यौन शोषण के आरोप में पकड़े गए आसाराम बापू फिर से कुकर्म के लिए चर्चा में आ गए हैं। इससे पहले भी इन पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन सख़्त कानूनी कार्रवाई अब तक नहीं हो पाई है। यही वजह है कि आसाराम ने अपने कुकर्मों और अनैतिक-गैर कानूनी कार्यों से खुद को रोकने के लिए शायद सोचा तक नहीं। देश की कानून व्यवस्था जो राजनैतिक इच्छा पर ही निर्भर करती है। किसी भी बड़े बाबा या राजनीतिज्ञ पर कार्रवाई तभी करती है जब उस प्रदेश या देश की सरकार ऐसा चाहे और सरकार चलाने वाले लोग इस तरह का निर्णय सही या गलत के आधार पर न लेकर अपने राजनैतिक हितों और वोट बैंक को ध्यान में रखकर ही करते हैं। आसाराम और इनके तरह के अन्य बाबा इसी का लाभ उठाते हैं। बाबाओं को अच्छी तरह से पता है कि उनके भक्तों की प्रतिक्रियायें ऐसा माहौल बना देंगी, जिसके आगे सरकार और पुलिस घुटने टेक देगी और वे आसानी से बच निकलेंगे। यह बात स्पष्ट रूप से उस दिन और साफ हो गई, जिस दिन आसाराम ने हिन्दू जन जागरण मंच के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए कहा कि मुझे गिरफ्तार करने की हिम्मत पुलिस में नहीं है, मेरे भक्त ऐसा कभी नहीं होने देंगे। अपने इस वक्तव्य से पहले तक लगातार 12 दिनों से आसाराम फरार चल रहे थे, पुलिस उन्हें तलाश रही थी। इस तरह की बात क्या कोई आम आदमी कह सकता है। देश का संविधान स्पष्ट करता है कि कानून सभी के लिए एक समान है। लेकिन देश के बड़े राजनीतिज्ञ और आसाराम की तरह बाबा देश के कानून का धता बताने में जरा भी देर नहीं लगाते। यही वजह है कि आज आसाराम की तरह कई बाबाओं पर गैर कानूनी कार्य करने के आरोप हैं, बालात्कार, हत्या और ज़मीन हड़पने जैसे अनेकानेक मामले अदालतों में कई बाबाओं पर चल रहे हैं। कई मिसालें ऐसी भी हैं, जिनमें अदालती आदेश का बावजूद स्थानीय प्रशासन कार्रवाई नहीं करता, क्योंकि सरकार चलाने वाले राजनीतिज्ञ ऐसा नहीं चाहते। 
दिल्ली में दामिनी प्रकरण के बाद बालात्कार जैसे अपराध के लिए नया सख्त कानून बना है। इस कानून के बाद आसाराम पर एक नाबालिग लड़की का यौन शोषणा का मामला सामने आया है। अब तक की कार्यवाही से जो संकेत दिख रहे हैं, उससे इस बात की संभावना काफी बढ़ गई है कि आसाराम इस आरोप से आसानी से मुक्त नहीं हो पाएंगे। जिन धाराओं में मामला दर्ज किया गया, उसके साबित होने पर उन्हें उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। दरअसल, होना यह चाहिए कि चाहे राजनीतिज्ञ हो, बाबा हों, या किसी भी धर्म का ऐसा धर्मगुरू जो लोगों की आस्था का फायदा उठाकर गैरकानूनी कार्य करता हो, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई सख्ती से की जानी चाहिए। ऐसे लोग एक तरह से समाज के लिए माॅडल का काम भी करते हैं, ऐसे में अगर इन पर गंभीर आरोप लगता है तो तत्परता से सख़्त कार्रवाई होनी ज़रूरी है, ताकि आस्था खिलवाड़ का विषय न बने।
बाबाओं की सैद्धांतिक और कागजी बातों की बात की जाए तो इन सबका दावा है कि वे समाज का उद्धार करने के लिए ही अपना जीवन समर्पित करते हैं। लेकिन इनमें से कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि उनके पास जो अकूत संपति है, वे उन्हें किन स्रोतों ने किस प्रकार के लोगों ने दी है। बड़े-बड़े दान देने वाल लोगों की कमाई क्या एक नंबर की दौलत है। इस तरह का सवाल किसी भी बाबा से किया जाता है तो तिलमिला जाते हैं।देश के कुछ बाबाओं की संपति और कार्यप्रणाली की विवरण इस प्रकार है-
आसाराम बाबू- आसाराम की संपति इस समय दस हजार करोड़ से भी अधिक की है। दिल्ली में आसाराम के चार मंदिर-आश्रम हैं। सीलमपुर का आश्रम बाबा ने मंदिर पर कब्जा करके बनाया है, करोलबाग वाला बाबा का मंदिर व राजोकरी का आश्रम वनभूमि पर बना है तो नजफगढ़ का मंदिर ग्राम पंचायत की भूमि पर कब्जा करके बनाया गया है। ऋषिकेश का आश्रम किसानों की भूमि पर बना है, ग्वालियर में शिवपुरी रोड पर बना आश्रम गांव की चरनोई भूमि पर है। छिंदवाड़ा में बापू का आश्रम आदिवासियों की जमीन पर कब्जा करके बनाया गया है, मामला अदालत में है। मेघनगर में 108 एकड़ ज़मीन पर बने बापू के आश्रम की भूमि के असली मालिक आदिवासी हैं, अदालत ने भी इसे मान लिया है। रतलाम में 500 एकड़ की भूमि पर आश्रम खड़ा किया है, जिसकी मालकिन उनकी भक्तिन प्रेमा बहन है। गुजरात के पेठमाला में किसानों की जमीन कब्जा करके आश्रम बनाया गया है, जिसकी कीमत लगभग 350 करोड़ रुपये है। वाराणसी में आसाराम के आश्रम की भूमि का मामला अदालत में चल रहा है। चंडीगढ़ में तो उन्होंने इन हदों को भी पार कर दिया। इन्होंने अपने भक्तों को फ्लैट देने के लिए पांच-पांच लाख रुपये जमा करा लिया, इस तरह उन्होंने 500 करोड़ अर्जित कर लिया, लेकिन फ्लैट आज तक नहीं बने। पांच-पांच लाख रुपये देने वाले लोग जब इंतज़ार करके थक गए तो अदालत की शरण में जा पहुंचे हैं। आसाराम के बारे में इंटरनेट पर सबसे अधिक सामग्री उपलब्ध है। जिसमें इनके और इनके भक्तों द्वारा खूब गुणगान किया गया है। ऐसे गुणगानों में तमाम अनैतिक आधारहीन बातों का वर्णन किया गया है। वे अपने गलत कामों पर पर्दा डालने के लिए दावा करते हैं कि उनकी यौन इच्छाओं की पूर्ति करना भगवान की इच्छाओं की पूर्ति करना है। इनका पुत्र नारायण सिंधी पर भी कई बार बालात्कार के आरोप लग चुके हैं, मामले दर्ज हुए हैं। हैरानी की बात तो यह है कि इनकी पुत्री भारती भी अपने पिता की पाश्विक यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए उनकी मदद करती है। इंटरनेट पर उलब्ध सामग्री के अनुसार वह आश्रम में आयी महिलाओं को यह समझाती है कि बापू की किसी भी बात से इंकार किया तो भगवान नाराज हो जाएंगे। उसके अनुसार बापू के साथ बिताए गए पल भगवान संग बिताए गए पल की तरह हैं। जिस नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में बापू पर इस वक्त कानूनी कार्यवाही चल रही है, उसके माता-पिता आसाराम के अंध भक्त थे, उन्हें भगवान की तरह पूजते थे, लेकिन अब उनकी पुत्री के सााथ जब यह घटना हो गई है, उसके बाद से वे आसाराम को फांसी की सजा देने तक की मांग कर रहे हैं।
सत्यसाईं बाबा- इन्होंने अपने आपको भगवान बताया था, और अपनी मृत्यु की तारीख भी बता दी थी। इनके बताने के मुताबिक 96 वर्ष की आयु में इनकी मृत्यु वर्ष 2022 में होनी चाहिए थी, मगर वर्ष 2011 में ही चल बसे। खुद के बारे में की गई इतनी बड़ी भविष्यवाणी गलत होने के बावजूद इनके भक्तों की आंखें नहीं खुलीं। अब तक ज्ञात स्रोतों के मुताबिक सत्यसाईं अपने पीछे 40 हजार करोड़ की संपत्ति छोड़ गए हैं। इस संपत्ति को अर्जित करने में इन्होंने सिर्फ दान का सहारा नहीं लिया है, बल्कि अपने भक्तों को लूटा भी है, उनके साथ धोखाधड़ी भी की है। जिसके खिलाफ मुकदमे भी चले, लेकिन सरकार चलाने वाले लोग इनका पैर छूते हैं, जिसकी वजह से कार्रवाई नहीं हो सकी। ये अपने भक्तों के सामने चमत्कार करते थे। जिसमें हवा में हाथ फैलाकर घडि़यां, सोने के चेन, अंगूठी, रुद्राक्ष आदि ले आते थे। इनकी इस करिश्मे को जादूगर पीसी सरकार ने चैलेंज भी किया था, उसका कहना था बाबा द्वारा चमत्कार का दावा किया जाना गलत है, मैं इसे करके उनके सामने दिखा सकता हूं। पीसी सरकार ने बाबा के सामने ये सब करके दिखाने का दावा किया था, लेकिन बाबा ने उससे मिलने से ही इंकार कर दिया था। सत्यासाईं के समलैंगिग यौनाचार के तमाम मामले सामने आये थे, जिसे सरकार की दबाव में दबा दिया जाता रहा है। यौनाचार का विरोध करने वाले कई लोगों की हत्या अथवा गायब करने का भी आरोप लगते रहे हैं, इन पर। ये आमतौर पर 11 से 15 साल के लड़कों को अपनी हवस का शिकार बनाते थे।
रविशंकर महाराज- ये अपने को श्री श्री रविशंकर कहते हैं, क्योंकि इस देश के एक विश्व विख्यात संगीतज्ञ का नाम है रविशंकर। इस रविशंकर के आगे कहीं इनका नाम दब न जाए इसलिए इन्होंने अपना नाम श्रीश्री रविशंकर रख लिया। इनका दावा है कि इन्होंने चार साल की उम्र से ही भगवत गीता की कथा कहने लगे थे, 17 साल की उम्र में स्नातक कर लिया था और 1982 में सुदर्शन क्रिया सीख लिया है। ये सारी बातें रहस्य के दायरे में आती हैं। श्रीश्री का सालाना आय 450 करोड़ की है। दुनियाभर के 140 देशों में इनके आश्रम हैं। राजाओं की मुकुट पहनते हैं। किसी कार्यक्रम में जब ये प्रवेश करते हैं तो भगवान की तरह अवतरित होते हैं। राजाओं की तरह मुकुट पहनते हैं। ये ज्ञान के साथ मुस्कान की भी शिक्षा देते हैं। अब कोई समझाये कि 78 फीसदी जनता जो 20 रुपये रोज से गुजारा करती है, उनके चेहरों पर मुस्कान कैसे आयेगी, ये आर्ट आॅफ लीविंग की शिक्षा किस तरह ग्रहण करेंगे।
बाबा रामदेव-ये कालेधन के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। मगर खुद कानून के हिसाब से चलना नहीं चाहते।कनखल में इनके औषधि संस्थानों में औषधियों के रूप में उत्पाद तैयार होते हैं। कानून के अनुसार इन संस्थानों का पंजीयन फैक्टृी एक्ट के तहत होना चाहिए, लेकिन इन्होंने पंजीयन नहीं कराया। इनके संस्थानों में काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा के लिए श्रम कानूनों का पालन किया जाना चाहिए। उन्हें हाजिरी कार्ड, न्यूनतम वेतन, आठ घंटे का काम व इससे अधिक काम करने का ओवरटाइम दिया जाना चाहिए।नियमित किये जाने चाहिए और भविष्य निधि काटी जानी चाहिए। लेकिन बाबा इन सब के लिए तैयार नहीं हैं। क्या इन सब कानूनों के परे रहकर धन एकत्र करना काले धन की की श्रेणी में नहीं आता? आखिर बाबा के कालेधन की परिभाषा क्या है? बाबा की कंपनियों में बनी रही दवाओं के लेकर भी विवाद है। उपभोक्ता कानून के तहत हर उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार है कि वो जो उत्पाद खरीद रहा है, उसमें क्या-क्या मिला है? दवा अधिनियम के तहत तो हर दवा में उसमें पाये जाने वाले तत्व, उनकी मात्रा,अनुपात और उसके निर्माण की तारीख के साथ ही एक्सपायरी डेट डालना भी ज़रूरी है।बाबा इन नियमों का पालन नहीं कर रहे थे, मामला अदालत में पहुंचा, जिसके बाद कुछ चीजों का पालन करने लगे हैं, लेकिन अभी सभी नियमों को पालन नहीं करते। बाबा की घोषित संपत्ति 1147 करोड़ रुपये की है, हालांकि इन्होंने 45 कंपनियों की संपत्ति को छिपाया है, जिसके निदेशक उनके निकटत सहयोगी बालकृष्ण हैं। एक दशक पहले तक रामदेव साइकिल से गांव-गांव जाकर योग की शिक्षा देते थे, दस साल में इतनी बड़ी संपत्ति आखिर कैसे अर्जित कर ली।पतंजलि योग पीठ किसानों की जमीन हड़प कर बनाया गया है।हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने का भी प्रशासन साहस पैदा नहीं कर पा रहा था, बाद में बाबा को जमीन वापस करने की घोषण करनी पड़ी। मध्यप्रदेश की शिवराज चैहान सरकार ने जबलपुर में बाबा को चार सौ एकड़ भूमि देने की घोषणा की है। इस जमीन पर आदिवासी पीढि़यों से खेती कर रहे हैं। इन गरीबों का रोजगार छीनकर बाबा अपना औषधि संस्थान खोलेंगे।बाबाक ी दवाओं के बारे में जो जानकारियां आईं थीं, उसके अनुसार इन दवाओं में मानव हड्डियों और यौन ताकत देने वाली दवाओं में बंदर के शरीर के कुछ अंग डाले जाते हैं। उत्तराखंड में ही कुछ संतों ने बाबा पर आरोप लगाया कि उन्होंने प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री को 25 लाख की रिश्वत देकर जांच रिपोर्ट को प्रभावित किया। 
इस तरह के मामलों का एक दूसरा पहलू यह भी है कि लोग जरूरत से ज्यादा अंधभक्त हो जाते हैं। बाबाओं को भगवान समझने लगते हैं, उनके द्वारा बताये गए एक शब्द-शब्द अक्षरतः भगवान का शब्द समझते हैं। इसी वजह से जहां भारी भरकम राशि उन्हें दान में देने लगते हैं वहीं अपने घर की महिलाओं को उनके लिए अकेले में छोड़ देते हैं। बाबा लोग इसी का फायदा उठाते हुए सारे कुकर्म बिना किसी भय के करते हैं। कानून अपना काम इसलिए नहीं कर पाता कि राजनीतिक इच्छा शक्ति उन्हें हासिल नहीं होती। आसाराम के इस मामले में तो उनके भक्त ऐसे भी दिखाई दे रहे हैं, जो सबकुछ देखते-जानते हुए भी उनका बचाव कर रहे हैं। यहां तक कि पत्रकारों पर हमले किया जा रहे हैं। आखिर हम किस युग-देश में रह रहे हैं कि ऐसी हालात का सामना करना पड़ रहा है। क्या किसी आरोपी पर कानून के हिसाब से कार्यवाही भी नहीं होनी चाहिए। हमें जागना होगा, ऐसे अंधभक्ति- अंधविश्वास के खिलाफ खड़ा होना होगा ताकि ऐसे अपराध करने का मौका किसी बाबा को न मिले।

रविवार, 18 अगस्त 2013

इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने जांबाज़ तैयार नहीं किये

‘इलेक्ट्रानिक मीडिया के दौर में अख़बार’ विषय पर सेमिनार आयोजित
इलाहाबाद। इलेक्ट्रानिक मीडिया घुटने के बल चल रहा है। अभी तक इसने अपना प्रारूप ही तय नहीं किया है। इस मीडिया को चलाने वाले लोग भी अख़बारों से ही गये हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने जांबाज़ तैयार नहीं किये। यह बात वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार अजामिल ने कही। वे 17 अगस्त को साहित्यिक संस्था ‘गूफ्तगू’ की ओर से महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय में ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया के दौरा में अख़बार’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार बीएस दत्ता ने की, जबकि संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। विशिष्ट अतिथि के तौर पर हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’, प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित, रविनंदन सिंह, शिवाशंकर पांडेय और शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ मौजूद थे। इस मौके पर दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’,बीएस दत्ता,रतन दीक्षित और शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ को गुफ्तगू की ओर सम्मानित किया गया।
अध्यक्षता कर रहे बीएस दत्ता ने कहाकि इलेक्ट्रानिक मीडिया में निवेश तो हुआ लेकिन संस्कार का अभाव रहा। यही वजह है कि विश्वसनीयता अख़बारों की है, इलेक्ट्रानिक मीडिया उत्तेजित होने वाली ख़बरों ही ज्यादा दिखाता है। इलेक्ट्रानिक मीडिया अब सिर्फ ख़बर नहीं दिखाता बल्कि अपनी बेतुकी टिप्पणी देता है, जिसका को कोई आधार नहीं होता। हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’ ने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने ख़बरों की भूख बढ़ा दी है, क्योंकि इनकी ख़बरों ने भूख तो बढ़ा दी विश्वसनीयता नहीं दी, जिसकी वजह से लोग अख़बारों का इंतज़ार करते  हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी विज्ञापन अब नेट पर जारी होने लगे हैं, जिसकी वजह  से अख़बारों को विज्ञापन मिलना कम हो गया है। यही हाल रहा तो आने वाले बीस वर्षों में अख़बार बंद होने लगेंगे। रविनंदन सिंह ने कहा मीडियम से मीडिया बना है। मीडिया का काम लोगों को ‘वेल इनफार्म’ रखना है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले जूलियस सीजर ने रोमन में अख़बार निकाला था, जो बड़े चाव से पढ़ा जाता था। आज हम कई माध्यमों से अपने को अपडेट करते हैं, जिसमें प्रिन्ट मीडिया, श्रव्य मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया प्रमुख है। अब तो सिटीजन पत्रकारिता की भी शुरूआत हो चुकी है। प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित ने कहा कि पांच-छह साल पहले ‘हिन्दू’ अख़बार ने इस विषय पर सेमिनार का आयोजन किया था, जिसमें प्रिन्ट मीडिया के सामने आ रही चुनौतियों पर चर्चा की गई थी और यह बात सामने आयी कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने से प्रिन्ट मीडिया के प्रति लोगों को रूझान और बढ़ा ही है। शिवाशंकर पांडेय ने कहा कि इस अख़बारों का सामाजिक सरोकार बढ़ा है, जिसकी वजह से पाठकों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ ने कहा कि सबसे पहले कलकत्ता से 1780 में अख़बार की शुरूआत हुई थी। आज़ादी के आंदोलन में अख़बारों की भूमिका बहुत अहम रही है, हालांकि मौके-मौके पर अंग्रेज़ों ने इनका भी दमन किया।इस मौके पर गुफ्तगू की संपादक नाजि़या ग़ाज़ी, नरेश कुमार ‘महरानी’,वीनस केसरी, अजय कुमार, शिवपूजन सिंह,संजय सागर,रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, सुशील द्विवेदी, नंदल हितैषी, असरार गांधी, इमरान लाफ्टर,फरमूद इलाहाबादी, तारिक सईद ‘अज्जू’,धनंजय सिंह,सत्यभामा मिश्रा, सोनिका अग्रवाल, सलाह गाजीपुरी, विजय विशाल आदि मौजूद रहे।
सम्मानित हुए लोगों के साथ लिया गया ग्रुप फोटो, बायें से: नरेश कुमार ‘महरानी’,शिवपूजन सिंह,शिवाशंकर पांडेय,शाकिर हुसैन ‘तश्ना’,बीएस दत्ता,अजामिल व्यास,दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’, रतन दीक्षित और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
कार्यक्रम को संबोधित करते हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’
कार्यक्रम को संबोधित करते रतन दीक्षित
कार्यक्रम को संबोधित करते रविनंदन सिंह
कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोग

उर्दू दैनिक ‘इंक़बाल’ के पत्रकार शाकिर हुसैन ‘तश्ना’ का सम्मान, बायें से: अजामिल व्यास और तश्ना
इलाहाबाद प्रेस क्लब के अध्यक्ष रतन दीक्षित का सम्मान, बायें से: अजामिल व्यास, रतन दीक्षित, दयाशंकर शुक्ल सागर
हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’ का सम्मान करते अजामिल व्यास
नार्दन इंडिया पत्रिका के संपादक बीएस दत्ता का सम्मान, बायें से: शाकिर हुसैन ‘तश्ना’,बीएस दत्ता,अजामिल व्यास, दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

चंद्र दर्शन के लिए फोन व खबर की गवाही मान्य नहीं


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 ईद का संबंध इबादत से है, जो रमजान के महीने से शुरू होता है और इसी महीने के समाप्त होने पर मनाई जाती है। रमज़ान सकुशल संपन्न हो जोने पर अल्लाह के शुक्र के तौर पर खुले मैदान, ईदगाह या सुविधानुसार मसजिद में नमाज पढ़ी जाती है। धार्मिक विधान के अनुसार इस इबादत की शुरूआत उस समय तक नहीं हो सकती, जब तक संतोषप्रद तरीके यह मालूम न हो जाए कि रमजान का महीना शुरू हो चुका है और समाप्त भी उस समय तक नहीं हो सकता जब तक ईद का चांद न देख लिया जाए। रमजान का महीना जब से शुरू हो और जब तक रहे हर मुसलमान का उसके रोजे रखने चाहिए। महीनेभर का रोजा पूरा किए बिना किसी ईद का हरगिज़ कोई सवाल पैदा नहीं होता। इस मामले में असल चीज मुसलमानों की एकता नहीं है, बल्कि रमजान के महीने की समाप्ति है। रमजान एक क़मरी यानी चांद वाला महीना है, जो चांद के दिखने पर निर्भर करता और इसके बारे में नबी का स्पष्ट संदेश मौजूद है, जिसमें कहा गया है कि चांद देखकर रोजे रखो और चांद देखकर ही रोजे खत्म करो। लेकिन आसमान साफ न हो तो तीस रोजे की गिनती पूरी करो, सिवाय इसके कि दो सच्चे और विश्वसनीय गवाह यह गवाही दें कि उन्होंने चांद देखा है। हजरत मुहम्मद सल्ल ने इस आदेश में दो बातें स्पष्ट रूप से निर्धारित की है- एक यह है कि चांद देखने की गवाही उस समय जरूरी होगी जब आसमान साफ न हो, दूसरे- यह कि इस स्थिति में खबर पर नहीं बल्कि दो सच्चे न्यायप्रिय गवाहों की गवाहों पर चांद देखने का फैसला किया जाएगा।
चंद्रदर्शन की गवाही के बारे में किसी व्यक्ति द्वारा फोन पर गवाही दिए जाने या रेडियो-टेलीवीजन पर खबर सुन लिए जाने को नहीं माना जाता। गवाहों का सामने मौजूद होना जरूरी है।जिस प्रकार दुनिया की कोई अदालत टेलीफोन या वीडिया कांफ्रेंसिंग आदि पर की गई गवाही को नहीं मानती, उसकी प्रकार चांद के मामले में भी ऐसी गवाही पर चांद दिखने का ऐलान नहीं किया जा सकता। यह सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया में एक ही दिन चांद देख लेना मुमकिन नहीं है। रहा किसी देश या किसी बड़े इलाके में सब मुसलमानों की एक ही दिन ईद होने की बात, तो शरीअत में इसको भी जरूरी नहीं किया गया है। यह अगर हो सके और किसी देश में शरई कानून के अनुसार चांद देखने की गवाही और उसके ऐलान का प्रबंध कर दिया जाए तो इसको अपनाने में हर्ज नहीं है। मगर शरीअत की यह मांग बिल्कुल नहीं है कि जरूर ऐसा ही होना चाहिए। अब रही ईद मानने की बात तो ईद की मुबारकबाद के असली हकदार वे लोग हैं, जिन्होंने रमजान के मुबारक महीने में रोजे रखे कुरआन मजीद की हिदायत को ज्यादा से ज्यादा उठाने की कोशिश फिक्र की, उसको पढ़ा, समझा, उससे रहनुमाई हासिल करने की कोशिश की। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद सल्ल ने कहा है कि रमजान-उल-मुबारक के पूरे होने की खुशी में खुले मैदान में दो रक्अत नमाज अदा करो। अल्लाह केे सभी बंदों के लिए दयालुता का साधन बन जाओ। जिस तरह रोजे रखकर अल्लाह के आदेश का पालन करते हो, उसके आदेश को पूरा करते हो, उसी तरह ईद के दिन लोगों में खुशी का संचार कायम करो, ताकि मनुष्य का हर वर्ग, अल्लाह का हर बंदा आनंद के सागर में खुशी से भरे माहौल में गोते लगाए। अगर हमने रोजे रखे, नमाज पढ़ी, स्वस्थ रहे, लेकिन अपने आसपास के लोगों और अन्य लोगों को तकलीफ पहुंचाई, तकलीफें दीं और हमारे अंदर ईश-परायणता के लक्षण नहीं पाए गए तो हमारी सारी इबादत बेकार हो गई।
नमाज, रोजा, हज, जकात और तौहीद इसलाम मजहब के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। जब तक कोई मुसलमान जकात और फितरा अदा नहीं करता, तब तक उसकी ईद की नमाज अल्लाह की बारगाह में स्वीकार नहीं होती। जकात साल मंें एक बार देना होता है, इसके अंतर्गत सात तोला सोना से अधिक के मूल्य की जितनी धनराशि है, उस अधिक धन का ढाई प्रतिशत धन गरीबों में बांटना ही जकात है। जकात अदा न करना इसलाम मजहब में बहुत बड़ा गुनाह है। यदि कोई मुसलमान हर तरह की इबादत करता है, इमानदारी से जीवन व्यतीत करता है, लेकिन अगर सालाना जकात अदा नहीं करता तो उसकी सारी इबादतें अल्लाह की बारगाद में अस्वीकार कर दी जाएंगी। इसी तरह सभी मुसलमानों को फितरा अदा करना अनिवार्य है। ईद की नमाज पढ़ने से पहले फितरा अदा कर देने का आदेश है, वर्ना नमाज स्वीकार नहीं होगी। फितरे में हर मुसलमान को अपने परिवार के सदस्यो की संख्या के बराबर प्रति सदस्य दो किलो चालीस ग्राम गेहूं के मूल्य के बराबर धन गरीबों में देना होता है। इसमें सबसे पहले अपने पड़ोसी को देखना चाहिए कि वह फितरा लेने की स्थिति में है तो उसे पहले देना चाहिए, इसके बाद रिश्तेदारों को देखना चाहिए। वास्तव में ईद संपूर्ण मानवता के खुशी का दिन है इससे खुदा का कोई बंदा वंचित न हर जाए, इसका ध्यान रखना हर पड़ोसी का फर्ज है।

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

पुरानी यादों के मंज़र सुहाने लगते हैं


                          मुनव्वर राना
‘ऐन रशीद’, मुझे उस वक़्त से अच्छे लगत थे, जब मैं मोहम्मद जान हायर सेकेंडरी स्कूल की आठवीं जमात में पढ़ता था। ‘ऐन’ रशीद, शुम्सुज्जमां, कलीमुद्दीर शम्स, मन्नान रशीद, मुनीर नियाज़ी और वसीमुलहक़ वगैरह अब्बू के नौजवान दोस्तों में थे। अब्बू को शायर व अदीब हजरात से बहुत लगाव था, अब्बू शायर या अदीब नहीं थे लेकिन शायद वह अपनी इस महरूमी को शायरों, अदीबों, सहाफि़यों, दानिशवरों और कलंदर सिफ़त लोगों में उठबैठकर पूरा करते थे। प्रो. एज़ाज अफ़ज़ल, सालिक ‘लखनवी’, रईस अहमद जाफ़री, शाहाब लखनवी, सोज़ सिकन्दरपुरी और महमूद अयूबी की बहुत बेतकल्लुफ़ी थी। ज़ाहिर है कि इन हालात में खरबूजे का खरबूजे को देखकर रंग बदलना यक़ीनी था। अपनी ट्रेेनिंग में के सिलसिले में ऐन रशीद को कुछ दिनों के लिए इलाहाबाद में क़याम करना था। शम्सुज्जमां साहब की याद दिहानी पर उनके रहने और ठहरने का इंतज़ाम इलाहाबाद में नेमतुल्लाह साहब के घर पर किया गया। ये ऐन रशीद का रख रखाव था कि वह मुझसे हमेशा नेमतुल्लाह साहब और उनके घरवालों के बारे में पूछते और बरसरे महफि़ल अपनी मुसीबत के दिनों में मदद करने वालों को याद करते थे। अब्बू जब तक जिन्दा रहे, अपनी अहबाब के बारे में मुझसे बराबर पूछते रहते थे। माजी की मुंडेर पर बैठे हुए यादों के कबूतर कभी पत्थर मारने से भी उड़ते हैं। पुराने दोस्त, पुरानी चीज़े, पुराने वाक़यात और पुराने खतूत के बराबर दुनिया की कोई चीज़ कीमती नहीं हो सकती। जिस दिन वकील ‘अख़्तर’ का इंतिकाल हुआ था, उस दिन कलकत्ते में गाडि़यों की हड़ताल थी। वकील अख़्तर की बेज़ान मिट्टी को उनके गांव की मिट्टी बुला रही थी। शम्सुज्जमा साहब ने अब्बू को सूरतेहाल बताई। हड़तालियों के मारपीट करने की वजह से कोई भी ड्राइवर ट्रक ले जाने के लिए राज़ी नहीं था। अब्बू खुद ट्रक के स्टेयरिंग पर बैठे और गाड़ी वेलसिली स्ट्रीट तक चलाकर ले गये। काश! में उनके इस खिदमते ख़ल्क़ जज्बे पूरी तरह आरास्ता हो सकता। ‘ऐन’ रशीद की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह छोटे बड़ों का बहुत लिहाज़ रखते थे और सबको अच्छे लगते थे। सबके  पंसदीदा थे, सबके चहेते थे। मैं पूरी इमानदारी से यह अजऱ् कर सकता हूं कि मैंने पूरे हिन्दुस्तान में इतना इमानदार पुलिस अफ़सर नहीं देखा बल्कि ऐसी हमाजिहत शख़्सीयतें तो अमूमन किस्से कहानियों में नज़र आती हैं-
जो डूबना है तो इतने सूकुन से डूबो
कि आसपास की लहरों को भी पता न लगे
।- क़ैसर-उल-ज़ाफ़री
उर्दू वालों में ऐसे ज़हीन, फराख़दिल, ईमानदार और निडर लोगों की हमेशा कमी रही है। जो कलंदरी को लगे लगाये। ज़ेहानत की दिल खोलकर कद्र करें। खुश मज़ाकी का एहतराम करें कि ये फूल बहुत देर तक तरोताज़ा नहीं रहते लेकिन शायद उर्दू ज़बान की बदनसीबी है कि ‘शाद’ आरफ़ी ने रामपुर के एक फोटो के स्टुडियों के बाहर लकड़ी के एक स्टूल पर बैठकर जि़न्दगी गुजार दी, ‘यगाना’ सारी जि़न्दगी शह्रे तहज़ीब के तमाम हमअस्र शायरों और अदीबों के ज़रिये जलील होते रहे। ‘मस्त’ लखनवी को कव्वाली का शायर कहकर ‘वहशत’ व ‘टैगोर’ की अदबी चटाई से बाहर कर दिया गया, ‘मुज़तर’ हैदरी को बंधे हाथ पैरों समेत गोल तालाब के गहरे पानी में डूब जाने दिया। इब्राहीम होश को घर का एक कोना पकड़कर मर जाने दिया, ‘शहूद’ आलम आफ़ाक़ी सारी जि़न्दगी उर्दू की जं़ग में ज़रूरी असलहे के बग़ैर लड़ता रहा। ‘सालिक’ लखनवी की बूढ़ी आंखें किसी अच्छे अस्पताल का सफ़्फ़ाक़ बिस्तर ढूढने में क़तरा-क़तरा बुझ रही है।
अपने ओहदे, अपनी इल्मी लियाकत और क़दआवर शखि़्सयत के बावजूद स्टेज पर जहां जगह मिली, वहां बैठे जाने की अदा सिर्फ़ ऐन रशीद के पास थी जो उनके साथ ही हज़ारों मन मिट्टी के नीचे दबकर सो गई-
लोग ढूढ़ंेगे हमें भी हां मगर सदियों के बाद
जब ज़मीनों से कभी पत्थर निकाले जाएंगे।
- कबीर अंजुम
उनकी सबसे अच्छी आदत यह थी कि उन्हें जिस महफि़ल में बुलाया जाता था, वह अपनी तमाम मसरूफि़यतांे के बावजूद जाते थे लेकिन उनकी शखि़्सयत के आगे अपने आपको शमा महफि़ल समझने वाले साहबान आंधी के चिराग़ की तरह लरज़ने लगते थे। शह्र के तमाम साहबाने दस्तार अपनी-अपनी दस्तारों पर मसलिहत के पत्थर रख लेते थे। उनकी कलंदरी की कोई कद्र नहीं करता था, बल्कि दिल ही दिल में कुछ हज़रात नापसंदीदगी का इज़हार भी करते थे. उनकी शबो-रोज़ की मयख़्वारी के पर्दे में अपनी-अपनी ख़बासते छुपाते थे. अपनी अदबी कम मायेगी की चोट पर उनकी ग़ीबत की शराब मलते थे कि उससे दर्द में काफ़ी कमी हो जाती है। ऐन रशीद ने जिस शान से जि़न्दगी गुज़ारी, उसी शाने बेनियाज़ी से दुनिया से उठकर चले भी गये। न बीमारी का ऐलान किया, न किसी को तकलीफ़ दी, न बिस्तर पकड़ा, न ऐडि़या रगड़ीं, न रोये, न गिड़गिड़ाए। सच है कि अल्लाह अपने नेक बंदों पर मौत आसान कर देता है-
जि़न्दगी जिसका बड़ा नाम सुना जाता है
एक कमज़ोर सी हिचकी के सिवा कुछ भी नहीं
- नामालूम
वह सारी जि़न्दगी फ़कीराना अदा के साथ जिन्दा रहे। न दौलत की हवस, न शोहरत का गुर्रा, न खुद साख़्ता अज़मतों की ख़्वाहिश, नौकरी की तो बादशाहों की तरह, शायरी भी की तो अपनी मिज़ाज और तबीयत के मुताबिक, शराब भी पी तो अपनी पसंद और मूड के मुताबिक, गुफ़्तगू की तो स्टाइल में, सारे हिन्दुस्तान में (कलकत्ते को छोड़कर) उनके चाहने वाले, उनकोे पसंद करने वाले, उनसे मोहब्बत करने वाले आसानी से शुमार नहीं किये जा सकते. ये खुशनसीबी कलकत्ते के किसी और शायर को मुश्किल से नसीब हो सकेगी। दरअसल, ऐन रशीद मग़रिबी बंगाल की अदबी पेशानी पर दमकते हुए उस झूमर की तरह थे जिसमें कलंदरी और बेनियाज़ी के हजारहा मोती जड़े हुए थे। यूं भी झूमर कैसा भी हो उसके बग़ैर पेशानी बग़ैर आबिद की इबादतगाह लगती है। उनका शेरी मज़मूआ, उनकी जि़न्दगी में मंज़रेआम पर नहीं आ सका, इससे उनकी फ़क़ीर मिज़ाजी और ज़ेबे ख़ास की हालत का अंदाज़ा लग जाता है लेकिन वह अपना मसौदा कमोबेश रोज़ ही उलटपलटकर देखते थे। उन्हें ये तो मालूम था कि मसौदे के कासे में भीख उसी वक़्त मिलती है जब आप यह तहरीर कर दें कि आप फ़क़ीर हैं, लेकिन जो शख़्स ज़ेहानत और लियाक़त का बादशाह हो, वह भीख कैसे मांग सकता है.
11-12 बरस पहले धनबाद में एक हिन्दो-पाक मुशायरे का इनएकाद हुआ था। सरदार मनमोहन सिंह धनबाद के एसएसपी थे और अभय कुमार ‘बेबाक़’ जो  खुद भी बड़े ताज़ाकार शायर हैं, धनबाद में एसपी सिटी थे। पुलिस वालों की अदबी दिलचस्पी के बायस ये मशरिक़ी हिन्दुस्तान का बड़ा मुशायरा था। डा. मुजफ्फ़र हनफ़ी और ऐन रशीद को भी इस तारीख़ी मुशायरे में शरीक़ होना था। तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक ऐन रशीद, डा. साहब के फ्लैट पर पहुंच गए। डाॅ. साहब भी सामाने सफ़र बांधे हुए थे। डाॅ. साहब के घर पे ‘शहूद’ आलम आफ़ाक़ी भी तशरीफ़ फ़रमा थे। शहूद भाई की डाॅक्टर साहब बहुत कद्र करते थे। एक तरफ़ महकमए पुलिस के आला तरीन ओहदे पर बिराजमान ऐन रशीद और दूसरी तरफ तारीख़ साज़ कलकत्ता यूनीवर्सिटी के इक़बाल चेयर के प्रोफेसर मुजफ्फ़र हनफ़ी और कहां एक ग़रीब ट्राम कंडक्टर शहूद आलम आफ़ाक़ी। लेकिन जब डाॅक्टर ने ऐन रशीद को बताया कि ‘शहूद’ साहब भी हमलोगों के साथ धनबाद चलेंगे तो ऐन रशीद ऐसे खुश हो गए जैसे कस्बात में बच्चे ईदगाह देखकर खुश हो जाते हैं। तीन शायरों पर मुश्तमिल ये काफि़ला हावड़ा स्टेशन पहंुचा। पुलिस के कई आला अफ़सर ऐन रशीद की खिदमत पर मामूर थे। एक पुलिस आफी़सर ने ऐन रशीद साहब को उनके तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक राजधानी के एसी कोच के दो टिकट लाकर दिये। पुलिस और मिलेट्री के आलातरीन हुक्काम के नाम चार्ट और टिकट में कुछ एहतियातों के बिना पर दजऱ् नहीं किये जाते, लेकिन ज़ाहिर है कि ये दोनों  टिकट ऐन रशीद और मुजफ्फ़र हनफ़ी साहब के लिये थे। ज़हीनतरीन ऐन रशीद ने फ़ौरन महसूस कर लिया कि ‘शहूद’भाई अपनी ग़ुरबत और कम माईगी की बिना पर टूट फूट जाएंगे और मुमकिन है तकल्लुफ़ में धनबाद जाने से इंकार भी कर दें। ऐन रशीद ने पास खड़े मुअद्दिब पुलिस अफ़सर से कहा कि भई ये दोनों टिकट तो ‘शहूद’ साहब  और डाॅ. मुजफ्फ़र हनफ़ी साहब के हैं। शायद आपलोग हमारा ही टिकट लेना भूल गये। सामने खड़ा पुलिस अफ़सर भी शायद सूरतेहाल जान चुका था। उसनेे  ऐन रशीद से कहा कि सर आप डिब्बे में तशरीफ़ रखें मैं दस  मिनट में आपका टिकट हाजिर कर रहा हूं। यह कहकर वह पुलिस अफ़सर एक और टिकट लेने के लिए काउंटर की तरफ भागा। रास्तेभर, ऐन रशीद, शहूद भाई की शायरी के गुलबूटों पर इज़हारे ख़्याल करते रहे। उनकी कलंदराना शखि़्सयत और अदबी खिदमात पर गुफ़्तगू करते रहे। एक पुलिस का आला अफ़सर अगर इतना हस्सास और दरियादिल हो तो उसे फ़रिश्ता ही समझना चाहिए क्योंकि पुलिस का महकमा तो इतना बदनाम है कि बक़ौल हक़ीम साहब वजू की हालत में पुलिस स्टेशन का नाम लेने से ही वजु टूट जाता है। धनबाद स्टेशन पर ऐन रशीद का इस्तक़बाल करने के लिए पुलिस के कई आला अफ़सर मौजूद थे। उनके साथ उनके मातेहत भी बाअदब बामुलाहिजा की तस्वीर बने हुए थे। ट्रेन रुकते ही डाॅक्टर साहब और ऐन रशीद का सामान पुलिस वालों ने अपने हाथों में ले लिया। शहूद भाई का खस्ताहाल सूटकेश ऐन रशीद के हाथ में था और वह उस सूटकेश को इस तरह से उठाये हुए थे जैसे नोबेल इनाम याफ्ता अपना प्राइज उठाये रहते हैं। कई मातेहत अफ़सरों ने उनके हाथों से सूटकेश लेना चाहा लेकिन उन्होंने यह कहकर सूटकेश किसी को सौंपने से इंकार कर दिया कि मैं इस एज़ाज में किसी को हिस्सेदार नहीं बना सकता। मुशायरे के बाद क़तील शिफ़ाई, निदा फ़ाज़ली और मख़्मूर सईदी में बहुत देर तक खुमार आलूद गुफ्तगू होती रही। मख़्मूर साहब उस बात पर नाराज़ हो रहे थे कि ऐन रशीद ने कई बार मेरे हिस्से की शराब भी पी डाली जो क़तई ग़ैर अख़लाकी हरकत है। ऐन रशीद अपनी सफाई इस मज़बूत दलील के साथ दे रहे थे कि मैं हमेशा अपने ज़र्फ़ के मुताबिक पीता हूं। आपकी  शराब तो अक्सर महफि़लों में इसलिए पी जाता हूं कि आप ज़्यादा शराब पीते ही गिलास की निचली सतह से भी नीचे आ जाते हैं और ये ख़राब सूरतेहाल मैं क़तई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि एक बड़े शायर जो बेइंतिहा मुहज्ज़ब और खुशअख़लाक भी हैं, लोग तीसरे दर्जे  के शराबियों में शुमार करते फिरें।
मुशायरे की हाउ हू खत्म होने के बाद भी ऐन रशीद के दिल में एक फांस खटक रही थी क्योंकि जब ऐन रशीद अपने आबाई शहर तोप चांची पहुंचे, जहां उनकी वालिदा अपने छोटे बेटे शाहनवाज़ खां के साथ रहती थी। (ऐन रशीद के इंतिकाल के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने भी दुनिया से मंुह मोड़ लिया)घर में दाखि़ल होते ही ऐन रशीद बच्चों की तरह मां से लिपटकर कहने लगे कि इधर देखो अम्मा, मैं ऐसे शायर को लाया हूं जो तुम्हारे बेटे से भी बड़ा शायर है-
  नामुरादाने मोहब्बत को हिक़ारत से न देख   
  ये बड़े लोग जीने का हुनर जानते हैं। 
- सलीम अहमद
कुर्रतुलऐन हैदर कलकत्ता तशरीफ़ लायीं तो कलकत्ता दूरदर्शन वालों ने उनका इंटरव्यू  करने के लिए ऐन रशीद का इंतिख़ाब किया। ‘ऐनी’ आपा से इंटरव्यू लेना आसान काम नहीं है लेकिन ‘ऐन’ रशीद ने उनका यादगार इंटरव्यू लिया। बातचीत के दौरान ऐन रशीद ने एक शरारती सा सवाल किया कि ‘ऐनी’ आपा! आपने आजतक शादी क्यों नहीं की? ऐनी आपा ने हंसते हुए जवाब दिया कि मेरी शादी इसलिए नहीं हो सकी कि तलाश के बावजूद ‘ऐनी’ को कोई ‘ऐन’ नहीं मिल सका-
देर तक कायम रहे दाता तेरी ऊंची सराय
सब मुसाफिर हैं यहां कोई नहीं रह जाएगा
- वाली आसी
 

गुफ्तगू के अप्रैल-जून 2013 अंक में प्रकाशित

शनिवार, 13 जुलाई 2013

पहले शेर पर अब्बा ने की थी पिटाई - बशीर बद्र


 बशीर बद्र इस दौर के ऐसे शायरों में शुमार किये जाते हैं, जिनकी मक़बूलियत लोगों के सर चढ़कर बोलती है। भारत के अलावा दूसरे मुल्कों में भी इनकी शायरी से प्यार करने वालों की कमी नहीं है। मुशायरों में इनकी मौजूदगी कामयाबी की जमानत हुआ करती है। इनके तमाम अश्आर मुहावरों की तरह लोगों को याद है। 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र का असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। इन्होंने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी की। हिन्दी और उर्दू लिपी को मिलाकर लगभग डेढ़ दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें इमेज, आमद, लास्ट लगेज, आसमान, आहट, तुम्हारे लिये, आंच, उजाले अपनी यादों के, अफेक्शन, धूप की पत्तियां, हरा रिबन आदि प्रमुख हैं। शायरी में नये शब्दों के प्रयोग में ये अग्रणी रहे हैं।1996 में मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें अखिल भारतीय मीर तक़ी मीर पुरस्कार दिया। 1999 में पद्मश्री और साहित्य अकादमी से नवाजा गया। पाकिस्तान से भी इनकी कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने उनसे बात की-
सवालः सबसे पहले आपको कब लगा कि आप शायर हैं ?
जवाबः बचपन में तकरीबन छ-सात साल की उम्र में शेर कहने का शौक़ हुआ। पहला शेर जो मुझे याद है और जिस पर अब्बा ने पिटाई भी की थी वो था-
    हवा चल रही है उड़ा जा रहा हूं/तेरे इश्क़ में, मैं मरा जा रहा हूं।   
सवालः हिन्दी पाठकों में ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने का श्रेय किसे देंगे?
जवाबः हिन्दी पाठकों में ग़ज़ल को पसंदीदा बनाने में ग़ज़ल के शायर, सिंगर, ग़ज़ल छापने वाले रिसाले सभी शामिल हैं। मुशायरे और कवि सम्मेलन की वजह से भी ग़ज़ल लोकप्रिय हुई।
सवालः दुनियाभर में आपके बहुत से शेर मशहूर हैं, मुहावरों की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं, आप इसे किस रूप में देखते हैं?
जवाबः मैं इसे खुदा की मेहरबानी, करम और उसकी अता समझता हूं।
सवालः 21सदीं का सबसे मक़बूल शायर आप किसे मानते हैं?
जवाबः ये 22वीं सदी में मालूम होगा।
सवालः हिन्दी भाषा के कवि अब खूब ग़ज़लें लिख रहे हैं, आप इसे किस रूप में लेते हैं?
जवाबः  बहुत अच्छी बात है। मुझे बहुत खुशी हुई, हर ज़बान के कवि और शायर को ग़ज़ल लखना चाहिए। ग़ज़ल लिखने के मायने हैं कि उसके पास मोहब्बत भरा दिल है।
सवालः बार-बार यह बात सामने आ रही है कि ग़ज़ल की नफ़ासत, नज़ाकत और बह्र को जाने बिना ही हिन्दीभाषी लोग ग़ज़ल कह रहे हैं, जिसकी वजह से ग़ज़ल की दुगर्ति भी हो रही है?
जवाबः  जी हां, जो लोग ग़ज़ल की रूह को नहीं पहचान पाते वो दिल और दिमाग को छूने वाले शेर कह भी नहीं पाते।
सवालः नस्र की किस विधा को सबसे प्रभावशाली मानते हैं आप ?
जवाबः मैं तो ग़ज़ल का शायर हूं, फिर भी आप पूछ रहे हैं तो अफसाने, कहानियां और ड्रामे ये प्रभावशाली हैं। कोई एक नाम नहीं लिया जा सकता।
सवालः पाकिस्तान की शायरी भारत की शायरी से किस प्रकार अलग है, अलग है भी या नहीं ?
जवाबः पाकिस्तान और हिन्दुस्तान की शायरी में फ़कऱ् करना मुश्किल है। बस ये कहा जा सकता है कि हर मुल्क का शायर अपने आसपास अपने शहर अपने मुल्क और फिर दुनिया के हालात से मुतासिर होकर शायरी करता है और ख़्यालात का इज़हार करता है।
सवालः भारत में उर्दू की दयनीय हालत क्यों है?
जवाबः भारत में उर्दू मर नहीं रही है, मरी हुई उर्दू मर रही है। जिन्दा उर्दू तो ग्रो कर रही है, फैल रही है। 1985 में मैंने लिखा था कि पचास साल बाद 2035 में मेरे लिखे के बारे में बात करना, आज नहीं। तब तक उर्दू-हिन्दी-अंग्रेज़ी के हजारों लफ्ज़ों को उर्दू अपना लेगी। हम उर्दू में इंटरव्यू दे रहे हैं, आप हिन्दी में ले रहे हैं। यही फ़कऱ् है। वर्ना दोनों ज़बानें एक हैं। बुकिश लैंग्वेज मरेगी, आर्टिफिशियल लैंग्वेज मरेगी। हम ज़बान में शायरी करते हैं। उर्दू-हिन्दी एक है। जब मैं बोलता हूं तो भाषा शायरी की रहती है। मैं शायर की ज़बान की परवाह करता हूं, लिपि की नहीं। शायरी में सब भषाएं एक हैं।
सवालः अब तकरीबन हर उर्दू शायर की किताब हिन्दी में छप रही है, क्या अब उर्दू शायरों को पाठक नहीं मिल रहे हैं?
जवाबः  अब उर्दू और हिन्दी ज़बान जो दिल में उतर जाती है, वो एक है और शायर चाहता है कि उसकी बात आवाम तक पहुंचे। मेरी किबातें उर्दू, हिन्दी के अलावा पंजाबी, बंगाली, मद्रासी, फ्रंच, रशियन और कई दूसरी ज़बानों में छप रही हैं।
सवालः हिन्दी ग़ज़लकारों में सबसे बड़ा नाम दुष्यंत कुमार का कहा जाता है, आप इससे सहमत हैं?
जवाबः दुष्यंत कुमार ने जो ग़ज़ल के अश्आर लिखे वो ग़ज़ल के उसूलों पर सही उतरे इसलिए
उनको ग़ज़ल का कवि माना गया।
सवालः अगर शिल्प को छोड़ दिया जाए तो हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल में क्या  फर्क  है?
जवाबः कोई फर्क नहीं है।
सवालः ये आम चर्चा है अदब के प्रति लोगों का रूझान कम हो रहा है, आप इसे किस रूप में लेते हैं ?
जवाबः मैं तो समझता हूं बढ़ रहा है। बस ज़रूरत है नये तालिबे इल्म को सही गाइड करने वालों की।
सवालः इलेक्ट्रानिक मीडिया के बूम से अदब पर क्या प्रभाव पड़ा है?
जवाब: इलेक्ट्रानिक मीडिया से तो बहुत फायदा हुआ। इधर मैं ग़ज़ल लिखता था और टीवी पर सुनाते ही सारी दुनिया में देखने वाले सुनकर मुझे ख़त और मैसेज भेज देते थे। यानी इंटरनेट पर आप बशीर बद्र की वेबसाइट देखकर नया पुराना सारा कलाम दुनिया के किसी भी शहर मे ंपढ़ सकते हैं। मेरे बेटे तैयब बद्र जो आईआईटी मद्रास में पढ़ रहे हैं, कहते हैं कि लाखों लोग रोज अब्बा आपकी वेबासाइट www.bashirbadra.com और www.irspbb.com खोलकर पढ़ रहे हैं।
सवाल: कहा जाता है कि अदब समाज का आईना है। आपको लगता है कि वर्तमान समय के शायर अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा कर रहे हैं ?
जवाब: जी हां, शायर ने हमेशा जिम्मेदारी को महसूस किया है। और समाज सुधार के लिए आगे भी लिखते रहेंगे।
सवाल: कहा जाता है कि शायर जिन अलामतों का जिक्र अपनी शायरी में करते हैं, आमतौर पर उस पर खुद ही अमल नहीं करते हैं। क्या आपने यह महसूस किया है?
जवाब: आपका इशारा किन शायरों की तरफ है मुझे नहीं मालूम। 2008 ई. में अपनी बीवी डा. राहत बद्र के साथ हज बैतुल्ला की सआदत नसीब हुई। मदीन मुनव्वर में जहां मुझे ठहराया गया था उस कमरे की खिड़की से रौजा-ए-मुबारक का दीदार मैं मुस्तकिल कर सकता था। मुझे ये मेरा शेर अल्लाह सच कर दिखाया।
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए।
जहां से मदीन दिखाई न दे।
चंद शेर और मुलाहिजा फरमाइए-
सात संदूकों में भरकर दफन कर दो नफ़रतें
आज इंसान को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
जिस दिन से मैं चला हूं मेरी मंजि़ल पे नज़र है,
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जि़न्दगी की शाम हो जाये।
सर पर ज़मी लेके हवाओं के साथ जा,
 आहिस्ता चलने वालों की बारी न आएगी।
(गुफ्तगू के जून-2013 अंक में प्रकाशित)

शुक्रवार, 28 जून 2013

गुफ्तगू के फरमूद इलाहाबादी अंक का विमोचन और मुशायरा


फरमूद की शायरी मौजूदा दौर की ज़रूरत-काज़मी 
इलाहाबाद।फरमूद इलाहाबादी की शायरी मौजूदा दौर की ज़रूरत है, क्योंकि हास्य-व्यंग्य के नाम पर लतीफेबाजी और अश्लीलता परोसी जा रही है। ऐसे में फरमूद इलाहाबादी ने हास्य-व्यंग्य के असली मानकों पर शायरी की है और अपनी ऐसी ही शायरी से पूरे देश में पहचान बना लिया है। हमें उन्हें मुबारकाबाद देनी चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए इनसे और दूसरे हास्य-व्यंग्य के शायर भी प्रेरणा लेंगे। यह बात पूर्व महाधिवक्ता एसएसए काज़मी ने गुफ्तगू के फरमूद इलाहाबादी अंक के विमोचन अवसर पर कही। 22 june  की शाम महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय में पत्रिका का विमोचन किया गया। जिसकी अध्यक्षता श्री काजमी ने की जबकि मुख्य अतिथि इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के सचिव अमरनाथ उपाध्याय थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। अमरनाथ उपाध्याय ने कहा कि फरमूद की शायरी समाज और देश में फैली विसंगतियों पर करारा प्रहार करती और हमें विसंगतियों के खिलाफ उठ खड़े होने की प्रेरणा जगाती है। हास्य-व्यंग्य ही ऐसा माध्यम है जिसके जरिये अपनी बात चुटीले ठंग  से कही जा सकती है। उन्होंने कहा कि गुफ्तगू की संपादकीय टीम ने फरमूद इलाहाबादी का परिशिष्ट प्रकाशित करते सराहनीय कार्य किया, ऐसे शायरों को मंजरेआम पर लाना साहित्य की बड़ी सेवा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य और उत्कृष्ठ लोगों के परिशिष्ट सामने आएंगे। वरिष्ठ शायर बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि इलाहाबाद से जब हास्य-व्यंग्य शायरी की बात होती है तो अकबर इलाहाबादी और कैलाश गौतम का नाम सबसे उपर आता है।इन दोनों रचनाकारों की गिनती देश के बड़े कवियों-शायरों में होती है। फरमूद इलाहाबादी ने भी इनके नक्शेकदम पर चलना शुरू कर दिया है, मुशायरों की दुनिया में काफी नाम कमा रहे हैं, आने वाला दिन इनके लिए अच्छे साबित होंगे। हमें ऐसी शायरी की सराहना करते हुए हास्य-व्यंग्य के नाम पर लतीफा सुनाने वालों का विरोध करना चाहिए। हिन्दुस्तानी एकेडेमी के कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह ने कहा कि फरमूद इलाहाबादी की शायरी की तारीफ करते हुए यह भी जोड़ा कि गुफ्तगू टीम ने ऐसे शायरों का परिशिष्ट प्रकाशित करके सराहनीय कार्य किया है। आज के दौर में साहित्यिक पत्रिका निकालना एक बड़ा काम है, लेकिन टीम गुफ्तगू ने इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया है। इलाहाबाद और इसके साहित्यिक एक और इजाफा है। हमेशा से ही इलाहाबाद से बड़ा कार्य होता रहा है। फरमूद इलाहाबादी ने अपने वक्व्य में कहा कि गुफ्तगू बानी इम्तियाज़ अहमद गा़ज़ी ने मेरे उपर परिशिष्ट करके मेरी काफी हौसलाअफज़ाई की है, मैं इनका बेहद शुक्रगुजार हूं। दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता बुद्धिसेन शर्मा ने की। मुनेश्वर मिश्र, शकील गाजीपुरी, आसिफ गाजीपुरी, सलाह गाजीपुरी, शादमा जैदी ‘शाद’ शब्दिता संजू, गुलरेज इलाहाबादी, राधेश्याम भारती, अनुराग अनुभव, रोहित त्रिपाठी, सफदर काजमी, विजय विशाल, नंदल हितैषी, शाहिद अली शाहिद,खुर्शीद हसन आदि लोग मौजूद थे। अंत में अजय कुमार ने सबके प्रति आभार प्रकट किया।



सबसे पहले युवा कवि अजय कुमार ने शेर पेश किया-
भत्ता तो अब नहीं मिलेगा उस पर भाग्य भी फूटा,
जंच कराये पता चला कि पैर का पंजा टूटा।


शब्दिता संजू-
बातों में तकल्लुफ ये आंखों में हया है,
हसरत का मचलना ये तुझे कुछ तो हुआ है।

वीनस केसरी के अश्आर काफी सराहे गये-
                                                   ऐ दोस्त खुशतरीन वो मंज़र कहां गए,
हाथों में फूल हैं तो वो पत्थर कहां गए।

राज सुल्तानपुरी-
                                                    ये इश्क़ का चराग जलाकर तो देखिए
                                                    नफ़रत की तीरगी को मिटाकर तो देखिए
                                                     हर ओर बिखर जायेगी चाहत की चांदनी
गंगा में मुहब्बत की नहाकर तो देखिए।


शायरा सबा ख़ान ने बेहतरीन कलाम पेश किया-
                                                    दीया हूं मैं कोई सूरज नहीं जो बुझ जाउं,
शिकस्त खाती है आंधी मुझे बुझाने में।


 आसिफ़ ग़ाज़ीपुरी-
                                                  रात शबनम ने कहा फूल से रोते-रोते,
तू भी मिट जाएगा कल धूप के होते-होते।


शादमा ज़ैदी ‘शाद’-
                                                    खार चुभते हैं तो हर गुल केा सज़ा मिलती है,
                                                    बगवां सोच ले इंसाफ तेरा ठीक नहीं
                                                    मेरे होठों पे लगी शाद खामोशी की मोहर,
अजऱ् मैं कैसे करूं ठीक है क्या ठीक नहीं।


सलाह ग़ाज़ीपुरी-
                                                    भारत महान देश है इसका नहीं जवाब,
मिट्टी यहां की आज भी सोना उगाए है।



शरीफ़ इलाहाबादी ने तरंनुम में ग़ज़ल सुनाकर महफिल में जोश पैदा कर दिया-
                                                     ऐ शरीफ़ अपने ग़म का ग़म न करो,
उनको देखो जो बेसहारे हैं।


युवा कवयित्री गीतिका श्रीवास्तव ने अच्छी कविता प्रस्तुत की-
                                                   ओ री सजनी सज तू, तोरे साजन आज आए,
ओ री सजनी नच तू, अंगना में सुख छाए।


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी-
                                            यू तो कहते हैं हम तुझे सबकुछ, बस कभी अजनबी नहीं कहते,
                                            सिर्फ़ महबूब की खुशामद को, दोस्तों शायरी नहीं कहते।

 फ़रमूद इलाहाबादी-
भूल पाया नहीं अपनों से मिली घात अभी
चैन लेने दे ज़रा गर्दिशे हालात अभी
मान जाओ न करो काई खुराफ़ात अभी
यार समझा करो पहली है मुलाकात अभी।


 अजीत शर्मा ‘आकाश’ ने की ग़ज़ल काबिलेगौर थी-
                                                         वीरानी है, सन्नाटा है, क्यों भाई,
क्या कोई सपना टूटा है, क्यों भाई


सौरभ पांडेय ने कहा-
                                                       संयम त्यागा स्वार्थवश, अब दीखे लाचार
                                                       उग्र हुई चेतावनी, बूझ नियति व्यवहार
                                                       तू मुझमें बहती रही, लिए धरा-नभ रंग,
मैं उन्मादी मूढ़वत, रहा ढंढता संग।


अध्यक्षता कर रहे बुद्धिसेन शर्मा ने कहा-
                                                    दर्द जैसा भी हो, पलभर में हवा होता है
याद उसे कीजिए, फिर देखिए क्या होता है।




मंगलवार, 18 जून 2013

मौजूदा दौर की सबसे लोकप्रिय विधा है ग़ज़ल- प्रो. बिसमिल्लाह

     ‘ग़ज़ल: सफ़र दर सफ़र’ विषय पर ‘गुफ्तगू’ ने किया सेमिनार
इलाहाबाद। ग़ज़ल अरब देश से भारत में आयी, उर्दू की विधा बनी और फिर हिन्दी सहित तमाम देश-विदेशी भाषाओं की चहेती विधा बन गई है। आज सूरतेहाल यह है कि लगभग हर भाषा के काव्य में ग़ज़ल का सृजन हो रहा है। हिन्दी-उर्दू पाठकों के बीच तो यह सबसेे लोकप्रिय विधा बन गई है। यह बात प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह ने साहित्यिक संस्था गुफ्तगू आयोजित सेमिनार में कही। 9 जून की शाम इलाहाबाद स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्टृीय हिन्दी विश्वविद्याल के सभागार में ‘ग़ज़लः सफ़र दर सफ़र’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काज़मी ने की, मुख्य अतिथि प्रो. बिसमिल्लाह थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। सबसे पहले साहित्यकार न होते हुए साहित्यिक आयोजनों में भाग लेने वाले उमेश नारायण शर्मा, डाॅ.पीयूष दीक्षित, इं. अखिलेश सिंह, जीडी गौतम, मुकेश चंद्र केसरवानी, सीआर यादव और धनंजय सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान किया गया। 8 जून की देर रात वरिष्ठ शायर अरमान गाजीपुर का निधन हो गया था, कार्यक्रम के दौरान उन्हें श्रद्धांजलि भी दी गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काजमी ने कहा कि उर्दू और हिन्दी काव्य विधा में ग़ज़ल लोगों की धड़कन बन गई है, साहित्य से मोहब्बत करने वाला इंसान ग़ज़ल ज़रूर सुनता-पढ़ता है। मीर, ग़ालिब के जमाने से लेकर आज  बशीर बद्र, निदा फाजली, मुनव्वर राना, दुष्यंत कुमार आदि की मक़बूलियत की बुनियाद ग़ज़ल पर टिकी हुई है। उन्होंने कहाकि आज यह आयोजन बेहद कामयाब रहा है, लोग आखि़र तक सबका वक्तव्य सुनते रहे हैं, मैं इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने कहूंगा कि वे ऐसे आयोजन प्रत्येक तीन महीने पर कराते रहें। प्रो. अली अहमद फातमी ने कहा कि ग़ज़ल बहुत ही नाजुकी मिजाज विधा है, इसके लिए इस्तेमाल किये जाने वाले अल्फाज में शीरीन मिठास होनी चाहिए, लेकिन प्रयोग के नाम पर ऐसे शब्द का इस्तेमाल भी किया जाने लगा है, जो ग़ज़ल की भाषा हो ही नहीं सकती। एहतराम इस्लाम ने कहा कि ग़ज़ल लिखने के लिए उसके व्याकरण से वाकिफ़ होना बेहद ज़रूरी है लेकिन केवल छंद ही ग़ज़ल नहीं है। ग़ज़ल की लोकप्रियता केा देखते हुए लोग ग़ज़ल लिखना तो शुरू कर देते हैं, लेकिन उसके व्याकरण को समझने की कोशिश नहीं करते, जिसकी वजह से कुछ हिन्दी भाषी कवियों पर ग़ज़ल के स्वरूप को बिगाड़ने का आरोप लगता रहा है, हालांकि हिन्दी में भी बहुत लोग बड़ी अच्छी ग़ज़लें लिख रहे हैं। कानपुर विश्वविद्यालय की डाॅ.नगीना जबीं ने ‘ग़ज़ल की शायरी में औरतों का योगदान’ विषय पर अपना वक्तव्य दिया, कहा कि परवीन शाकिर, अज़रा परवीन और फहमीदा रियाज जैसी महिला शायरायों ने ग़ज़ल के विकास में काफी अहम किरदार निभाया है। आज भी भारत समेत कई देशों में महिलाएं बहुत अच्छी ग़ज़लें कह रही हैं। डाॅ. असलम इलाहाबादी ने ‘गजलिया शायरी में इलाहाबाद’ विषय पर कहा कि इलाहाबाद हमेशा से अदब का अहम मरकज रहा है, नूह नारवी, अकबर इलाहाबादी, फिराक गोरखपुरी, राज इलाहाबादी आदि शायरों ने हिन्दुस्तानी ग़ज़ल को काफी आगे बढ़ाया है, देश के ग़ज़लिया शायरी का इतिहास इनके जिक्र बिना मुकम्मल नहीं हो सकता। आज भी इस शहर में कई लोग बहुत अच्छी ग़ज़लें लिख रहे हैं, नौजवानों का ग़ज़ल के प्रति बढ़ता रूझान इसका सुबूत है। ‘गुफ्तगू’ ने इस विषय पर आयोजन करके साबित कर दिया है कि साहित्य का गंभीर काम इलाहाबाद जैसे शहर में ही हो सकता है।
कार्यक्रम के दौरान प्रो.संतोष भदौरिया, मुनेश्वर मिश्र, सागर होशियारपुरी, तलब जौनपुरी, वीनस केसरी, सौरभ पांडेय, संजय सागर, शुभ्रांशु पांडेय, अशरफ़ अली बेग, हसीन जिलानी, अख़्तर अज़ीज़, अजय कुमार, शिवपूजन सिंह, सफदर काजमी, असरार गांधी, निकहत बेगम, हसीन जिलानी, सुषमा सिंह, शिवाशंकर पांडेय, रविनंदन सिंह, नंदल हितैषी, शैलेंद्र जय, गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी, अनुराग अनुभव, गीतिका श्रीवास्तव, विवेक सत्यांशु, शाहीन, अजीत शर्मा ‘आकाश’ आदि लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान लिया गया ग्रूप फोटो
कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
शान-ए-इलाहाबाद सम्मान पाने वाले लोगों का परिचय पढ़कर सुनाते सौरभ पांडेय
उमेश नारायण शर्मा को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
डा. पीयूष दीक्षित को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
अखिलेश सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
मुकेश चंद्र केसरवानी को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी

सीआर यादव को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
धनंजय सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
विचार व्यक्त करते एहतराम इस्लाम
विचार  व्यक्त करतीं डा. नगीना ज़बीं
विचार व्यक्त करते डा. असलम इलाहाबादी
विचार व्यक्त करते प्रो. अली अहमद फ़ातमी
विचार व्यक्त करते प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह
 विचार व्यक्त करते एसएसए काज़मी

मंगलवार, 11 जून 2013

और बंद हो गईं उर्दू की पत्र-पत्रिकाएं

                                                              -इम्तियाज़ अहमद गाजी
 आज भी इलाहाबाद पूरी दुनिया में अपनी साहित्यिक कार्यप्रणाली और कारनामों के लिए जाना जाता है। देश का यह इकलौता शहर है जिसके हिस्से में छह ज्ञानपीठ पुरस्कार आएं हैं। हिन्दी कथाकारों में अमरकांत और उर्दू आलोचना में शुम्सुर्रहमान फ़ारू़की का नाम अदबी दुनिया के आसमान पर सितारों की तरह चमक रहे हैं। अकबर इलाहाबादी, फिराक गोरखपुरी, एहतेशाम हुसैन, मुजाविर हुसैन, प्रो.फजले इमाम, अली अहमद फातमी और एहतराम इस्लाम जैसे लोगों का नाम इस शहर से जुड़ा हुआ है। लेकिन उर्दू अदब के पसमंजर में अगर आज के इलाहाबाद की बात करें तो यह बेहद अफसोसनाक है कि आज के तारीख में इस शहर से एक भी उर्दू की पत्र-पत्रिका प्रकाशित नहीं हो रही है, धीरे-धीरे करके सारी पत्रिकायें बंद हो चुकी हैं। एक तरफ लोगों की पढ़ने में कम हो रही रुचि तो दूसरी ओर उर्दू से लोगों कम होती निस्बत ने ये हालात पैदा कर दिये हैं। पत्रिकाओं के अलावा उर्दू अखबारों का हाल भी बहुत ही खराब है। सही मायने में दो हिन्दी अखबार घरानों के उर्दू अखबार प्रकाशित हो रहे हैं और मार्केट में दिखते भी हैं, लेकिन कई हिन्दी अखबार जहां अस्सी हजार से एक लाख तक बिक रहे हैं, वहीं इन दोनों उर्दू अखबारों के बिकने वाली प्रतियों की संख्या 200 से भी कम है। वर्ना एक दौर ऐसा भी था जब अब्बास हुसैनी के निकहत पब्लिकेशन से प्रकाशित होने वाली जासूसी दुनिया के नाॅवेलों की एडवांस बुकिंग होती थी, पिछड़ जाने की सूरत में कई बार लोगों को ब्लैक में खरीदना पड़ता था। इब्ने शफी के इन नाॅवेलों की दुनिया के कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। 1996 से शुरू हुई ‘शबखून’ नाम मासिक पत्रिका शम्सुर्रहमान फारूकी के संपादन में वर्ष 2005 तक प्रकाशित हुई, इस पत्रिका की पहुंच दुनिया के उन सभी देशों में थी जहां उर्दू अदब से रिश्ता रखने वाले मौजूद थे। लेकिन आखिरकार सितंबर 2005 में इसके बंद होने का ऐलान कर दिया गया।
इलाहाबाद से प्रकाशित हुए उर्दू साहित्यिक पत्रिकाओं के इतिहास पर गौर करें तो यहां से सबसे पहले 1890 में मोहम्मद हमीदुल्ला ने ‘इलाहाबाद रिव्यू’ नाम से पत्रिका निकाली, फिर 1921 में डाॅ. ताराचंद्र ने ‘हिन्दुस्तानी’ निकाली। 1922 से 1927 तक आजम कुरेवां, आगा अली खान और तालिब इलाहाबादी ने मिलकर ‘अकबर’ नामक पत्रिका निकाली। इसी दौर में एज़ाज हुसैन ने ‘शुआ-ए-उर्दू’ नामक पत्रिका प्रकाशित की थी। इनके अलावा ‘अदीब’,‘चांद’,‘कारवां’,‘फसाना’,‘नयी जिन्दगी’, ‘नया हिन्द’, ‘जहांनुमा’, ‘शाहकार’, ‘सबरंग’, ‘शहपर’, ‘तीसरी दुनिया’, ‘अल-अजीज’, ‘शफक’, ‘सवेरा’, ‘अंदाजे’ और ‘पासवान’ आदि पत्रिकायें समय-समय पर निकलीं और फिर बंद हो गईं। कुछ दिनों तक प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने ‘नया सफर’ नामक पत्रिका प्रकाशित की थी, लेकिन इस पत्रिका के असली कर्ता-धर्ता डा. कमर रईस हैं, जो दिल्ली से इस पत्रिका को प्रकाशित करते थे, कुछ समय के लिए वो रूस चले गये तो इसके प्रकाशन की जिम्मेदारी उन्होंने प्रो. फातमी को दे दी थी। फिर जब डा. रईस वापस भारत लौटे तो यह पत्रिका भी फिर से दिल्ली से प्रकाशित होने लगी। 2007 में स्वालेह नदीम और अख्तर अजीज ने मिलकर ‘तहसीर’ नामक पत्रिका निकाली। इसके पहले अंक का बड़ी धूम-धाम से विमोचन भी किया गया, लेकिन इस पत्रिका का सफर भी मात्र तीन अंकों तक ही रहा। आज की तारीख में उर्दू की एक भी साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित नहीं हो रही है। अगर कहीं कोई प्रकाशित कर भी रहा होगा तो वह मात्र फाइल काॅपी तक ही सीमित होगी, किसी स्टाल में इलाहाबाद से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्रिका कहीं देखने को नहीं मिलती।
आज सूरतेहाल यह है कि उर्दू से आम लोग तो कट रहे रहे हैं, मगर उर्दू साहित्य से जुड़े हुए लोग भी इस दिशा में कोई प्रयास करते नहीं दिखते, उनसे बात करने पर सारी जिम्मेदारी सरकार पर डालकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। उर्दू में जो काव्य संग्रह या कहानी संग्रह आदि जैसी किताबें प्रकाशित हो रही हैं, उनकी तादाद 200 तक सिमट चुकी है। इन पुस्तकों का प्रकाशन करके दोस्तों को मुफ्त में बांटने और उर्दू अकादमियों में जमाकर पुरस्कार बंटोरने के लिए हो रहा है।

गुरुवार, 6 जून 2013

गुफ़्तगू के जून-2013 अंक में


3.  ख़ास ग़ज़लें (मीर तक़ी मीर, परवीन शाकिर, फि़राक़ गोरखपुरी, दुष्यंत कुमार)
4-5 संपादकीय (फेसबुकिया शायरों ने किया सत्यानाश)
ग़ज़लें
6.  बेकल उत्साही, बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना
7.  इब्राहीम अश्क, गौतम राजरिशी, हस्तीमल हस्ती, किशन स्वरूप
8. अख़्तर अज़ीज़, तलब जौनपुरी
9. मिसदाक़ आज़मी, अखिलेश निगम‘अखिल’, भारत भूषण जोशी,विशाल चर्चित
10. सरफ़राज़ अहमद ‘आसी,अभिनव अरुण, वीनस केसरी, गणेश श्रषि
11. विमल वर्मा, ए.एफ.नज़र
12. नरेश कुमार ‘महरानी’, इरशाद अहमद बिजनौरी, आर्य हरीश कौशल

कविताएं
13. कैलाश गौतम, माहेश्वर तिवारी, बुद्धिनाथ मिश्र
14. जयकृष्ण राय तुषार, अमरनाथ उपाध्याय
15. शिबली सना, कृष्ण कुमार यादव, प्रशांत शुक्ल
16. शब्दिता संजू, अशोक भारती देहलवी
17.सौरभ पांडेय, अनंत आलोक
18-19.तआरुफ़ः सबा ख़ान
20-23. विशेष लेख: पुरानी  यादों के मंजर सुहाने लगते हैं- मुनव्वर राना
24-26. इंटरव्यू:बशीर बद्र
27-28. उस्ताद-शार्गिद की परंपरा के क्या फायदे-नुकसान हैं ?
29. कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित
30-34.मुंतजि़र मिजऱ्ापुरी के सौ शेर
35.इल्मे-क़ाफि़या भाग-13
36-39.तब्सेरा (थोड़ा सा रूमानी हो लें हम,मन के विपरीत,टुकड़ा कागज़ का,मैं हूं ग़ज़ल,छेनियों का दंश)
40. तब्सेराः मेरी नज़र में
41-44. अदबी ख़बरें
45-48. कहानीः अपना खून-इश्तियाक़ सईद
49-50. इन दिनों: बात सिर्फ़ एक अदद हिन्दुस्तानी एकेडेमी की ही नहीं है- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
परिशिष्ट: फ़रमूद इलाहाबादी
51.  फ़रमूद इलाहाबादी का परिचय
52-56. सभी के दिलों में बहानी है गंगा- आर.पी.शर्मा ‘महर्षि’
57-59.फ़रमूद इलाहाबादी: खूबसूरत अंदाज़ का शायर-रविनंदन सिंह
60-80. फ़रमूद इलाहाबादी के कलाम