बुधवार, 16 जनवरी 2013

विवेकानंद ने दरिद्र को नारायण बनाने का ज्ञान दिया-रवि

‘गुफ्तगू’ ने विवेकानंद जयंती पर किया मुशायरे का आयोजन
इलाहाबाद। विवेकानंद हालांकि कम उम्र में ही दुनिया को छोड़ गये लेकिन उन्होंने जो काम जनता के लिए किया वह चिरस्थायी है। उन्होंने अपने गुरु द्वारा दी गई शिक्षा (कल्याणकारी ज्ञान से जीव सेवा) को जीवन में रूपांतरित करके दरिद्र को नारायण बना देने का ज्ञान दिया। यह बात हिन्दुस्तानी एकेडेमी के कोषाध्यक्ष रविनदंन सिंह ने ‘गुफ्तगू’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कही। 12 january 2013 को महात्मा गांधी अंतरराष्टृीय हिन्दी विश्वविद्यालय में साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ द्वारा मुशायरे का आयोजन किया गया, मुशायरे की शुरूआत रविनदंन सिंह के व्यक्तव्य से हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता तलब जौनपुरी ने की, मुख्य अतिथि रविनंदन सिहं थे, जबकि संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया।

अजय कुमार -
क्या तुम्हें अस्तित्व अपना मुझ बिना उज्ज्वल है दिखता
पर न भूलो है मनुज की बीज बिन पा पौध उगता
गर तुम्हारी दृष्टि में पुरुषत्वता उन्माद ही है
तो न भूखी शक्ति यह भी मां का आशीर्वाद ही है।
 विमल वर्मा ने -
सद्विचार रंगीन अक्षरों के लिबास में बंधे,
किताबों की जेल में बंद पड़े, घुट रहे हैं।
उन्हें तो चाहिए बस, एक निष्ठ आचारण का जामा।
 चांद जाफरपुरी-
यादों से तेरी दिल मेरा मअमूर हो गया।
दिवाना तेरे नाम से मशहूर हो गया।

 विपिन ‘दिलकश’-
किसी के दिल में जुस्तजू मेरे लिए क्यों नहीं है
इन बहारों में रंगो बू मेरे लिए क्यों नहीं है।
 दिनेश अस्थाना-
बहुत सहा है अब न सहेगी
बेख़ौफ़ आज़ाद रहेगी
देखेगी अब दुनिया सारी
कितनी बलशाली कविता।
 
 मखदूम फूलपुरी-
मुसाफि़र अब कोई घर चाहता है,
ये दरिया है समुन्दर चाहता है।
हटा दो पत्थरों को शीशा लाओ,
कहीं पत्थर को पत्थर चाहता है।
 
 फरमूद इलाहाबादी -
मेरी आस्तीं में पले कुछ जि़यादा,
कई सांप उनमें खले कुछ जि़यादा।
किया रास बेगम ने ढ़ीली ज़रा सी,
तो हम हो गए मनचले कुछ जि़यादा।


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी -
सच को सच से मिला के छोड़ेंगे।
इस ज़मी को सजा के छोड़ेंगे।
कोई जुम्मन न कोई होरी है,
फिर भी मुंशी बना के छोड़ेंगे।
 
 जयकृष्ण राय तुषार -
फ़क़ीरों की तरह धूनी रमाकर देखिये साहब।
तबीयत से यहां गंगा नहाकर देखिये साहब।
यहां पर जो सुकूं है वो कहां है भव्य महलों में,
ये संगम है यहां
तंबू लगाकर देखिये साहब।
 वीनस केसरी-
अब हो रहे हैं देश में बदलाव व्यापक देखिए।
शीशे के घर में लग रहे लोहे के फाटक देखिए।
 पीयूष मिश्र-
सुन्दरता कहीं मन को अभिलाषा है
तो कहीं क्रौंच पक्षी के दर्द की परिभाषा है।

शैलेंद्र जय -
भाईचारे की दुनिया आधी-अधूरी है, सहिष्णुता लग रही मज़बूरी है
अपनी हरकतों से बाज आता नहीं, पाकिस्तान को अब देना जवाब ज़रूरी है।

सौरभ पांडेय-
यह सत्य निज अंतःकरण का सत्वभासित ज्ञान है
मन का कसा जाना कसौटी पर मनस-उत्थान है।
जो कुछ मिला है आजतक, क्या है सुलभ बस होड़ से,
इस जि़न्दगी की राह अद्भुद, प्रश्न हैं हर मोड़ पर से।

 शाहनवाज़ आलम-
मेरे खुदाया तुझे पता है तू जानता है
तू जानता है तुझे पता है मगर खुदाया
जब तूने वादा लिया है मुझसे, जो काम करते हैं
उसका बदला हमें अज़ाबो-शवाब देगा मगर,
खुदाया मैं जब से जन्मी हूं, ऐसा क्यों है
जो जुल्म करते हैं बढ़ रहे हैं जो जुल्म सहते हैं
मर रहे हैं, मेरे खुदाया अगर पता है तो
फिर देर कैसी 

मंजूर बाकराबादी
रिश्वत चाहे जितना ले लो, बाबू हमको नौकरी दे दो।
चाय के बदले पव्वा पी लो, बाबू हमको नौकरी दे दो।


कु. गीतिका श्रीवास्वत-
आसमां छुना अगर पांव को रखना ज़मीन पर
ये ना हो महलों को पाकर, भूल जाओ माटी का घर।

स्नेहा पांडेय-
अभी भी यक़ीन नहीं
छली गयी तुमसे
प्रेम तो सच था ही तुम्हारा
या मैं संभाल न सकी
या तुम बांटते रहे


रविनंदन सिंह-
वो दिल के पास है इतना कि अक्सर छूट जाता है
बहुत मासूम है हर बात पर ही रूट जाता है।
गहन संवेदना का व्याकरण होता ही ऐसा है,
चोट छेनी को लगती है तो पत्थर टूट जाता है।

 सबा ख़ान-
जि़न्दगी जब भी किसी मोड़ पे दुश्वार हुई।
ये मेरा अज्म है मैं और भी खुद्दार हुई।


तलब जौनपुरी-
मुहब्बत के गुलिस्तां में कहीं नफ़रत नहीं उगती
दयारे इश्क़ में कोई न हिन्दू है न मुस्लिम है।
जो बोये बाहमी नफ़रत उसे मज़हब नहीं कहते,
विवेकानंद का पैग़ाम दुनियाभर में सालिम है।


डा. ज़मीर अहसन-
लाश पर मेरी खड़े हो के क़द्दावर न हुए।
मेरा सर काट के तुम मेरे बराबर न हुए।

कार्यक्रम की ग्रुप फोटोः बायें से खड़े- विमल वर्मा, विपिन श्रीवास्तव, पीयूष मिश्र, चांद जाफरपुरी, रविनंदन सिंह, मखदूम फुलपुरी, शैलेंद्र जय, शाहनवाज़ आलम, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, शुभ्रांशु पांडेय
बायें से बैठे- मंजूर बाकराबादी,सौरभ पांडेय, तलब जौनपुरी, डा. ज़मीर अहसन, सुषमा सिंह,
पांडेय, सबा ख़ान और दिव्या सिंह


 

बुधवार, 9 जनवरी 2013

नए इक़दार और नई उर्दू ग़ज़ल


                                                                                 -प्रो0 अली अहमद फ़ातमी
उर्दू की नई ग़ज़ल के इमकानात को ग़ज़ल की सिन्फ़ी नज़ाकतों और जि़न्दगी की सफ़्फ़ाक सदाक़तों के दरमियान ही तलाश किया जा सकता है. उर्दू ग़ज़ल जहां अपनी लताफ़तों व नज़ाकतों की वजह से मक़बूल-ए-ख़ास-ओ-आम हुई, वहां उसकी महदूदियत और मशयतियत-से मुतल्लिक़ उस पर तंगदामनी और गर्दन ज़दनी के इलज़ामात भी लगाए गए, हालांकि उर्दू ग़ज़ल ने अपनी मन्जि़ल पर ही अपने आप को महज़ हुस्न-ओ-इश्क़ के दायरे से निकाल कर सूफि़याना व हकीमाना ख़यालात से मालामाल किया-मीर, सौदा, दर्द वगै़रह की शायरी इस तरह के ख़यालात से भरी पड़ी है. ग़ालिब ने आगे बढ़ा कर फ़लसफ़-ए-हयात और उसके मुख़तलिफ़ अफ़कार से उसका दामन लबरेज़ किया और ग़ज़ल में जि़न्दगी के वह रंग पेश किये कि ग़ज़ल के रवायती कारईन व शायक़ीन दंग रह गए-इतना सब कुछ कहने के बावजूद ग़ालिब को यह महसूस होता रहा-
बक़द्र-ए-शौक़ नहीं जर्फ़ तंगनाए-ग़ज़ल।
कुछ और चाहिये वुसअत मेरे बयाॅ के लिये।।

और फिर जब मुल्क और समाज पर एक ऐसा वक़्त आया जब गुलामी से बेज़ारी और जंग आज़ादी अपने उरूज पर पहुंची और पूरे समाज में क़ौमियत और सियासत को मर्कज़ीयत हासिल हो गई तो बातिनी एहसासात की बुनियाद पर परवरिश पाने वाली ग़ज़ल ख़ारजी दबाव, सियासी जब्र और समानी नशेबो-ओ-फ़राज़ की ताब न लाकर पसमंज़र में चली गई. इक़बाल-चकबस्त-अकबर-जोश वग़ैरह ने अगरचे ग़ज़ले भी कहीं लेकिन उनकी गरजती-चमकती नज़्मों के आगे ख़ुद उनकी ग़ज़लें ही नहीं बल्कि पूरी उर्दू ग़ज़ल लड़खड़ा गयी और ऐसा लगा कि ग़ज़ल का अहद ख़त्म हो गया और ग़ज़ल वाक़ई अपनी तंगदामनी का शिकार होकर रूपोश हो गयी. लेकिन तरक़्क़ी पसन्द शायरों का दौर आया और इस अहद के बाज़-शोअरा, बिलखुसूस फ़ैज़ और मजरूह ने ख़ारजी और सियासी मौज़ूआत को ग़ज़ल के नर्म-ओ-नाजु़क पैमाने में उतार कर बल्कि जज़्ब-ओ-पेवस्त किया और ग़ज़ल की ताज़ीम-ओ-तकरीम का पूरा ख़याल रखते हुए पहली बार बराह-ए-रास्त सियासत से उसका रिश्ता जोड़ दिया, तो ग़ज़ल की वुस्अत-ए-क़लबी, फ़राखदिली और वसीअदामनी को देख कर सभी दंग रह गए. जब मजरूह ने कहा.
सर पर हवा-ए-जु़ल्म चले सौ जतन के साथ।
अपनी कुलाह ख़म है उसी बांकपन के साथ।।

तो ग़ज़ल में यह सियासी कजकुलाही वाक़ई पूरे बांकपन के साथ समा गयी और आम फ़रसूदा रवायती इल्ज़ामात पर पानी फेर गयी. हरचन्द कि यह एक मुश्किल मरहला था और ग़ज़ल के लिये बड़ा नाजुक दौर, लेकिन फ़ैज़, मजरूह, जज़्बी, मजाज़, सरदार जाफ़री वगैरह की गेरां कद्र, ग़ज़लिया शायरी से यह मुश्किल मरहला बआसानी तय हुआ और ग़ज़ल का एक नया दौर शुरू हुआ, जहां से उर्दू ग़ज़ल के मुख़तलिफ़ रंग देखे जा सकते हैं.
अंग्रेज़ रूख़सत हुए, मुल्क आज़ाद हुआ तो हिन्दुस्तानी अवाम ने पैर फैला दिये. एक बेमक़सद और ग़ैर मुनज़्ज़म जि़न्दगी सामने आयी, मआशरा लड़खड़ाया तो ग़ज़ल भी बहक गयी, अलामती ग़ज़ल, आज़ाद ग़ज़ल और कुल मिलाकर जदीद ग़ज़ल और अब तो इबहाम से भरा यह दौर भी रूख़सत हुआ, लेकिन जो दौर आया वह अपने साबिक़ा दौर से ज़्यादा पेचीदा और सफ़्फ़ाक निकला, यह तो होना ही था. बेमक़सद और बेलगाम हिर्स-ओ-हवस की जि़न्दगी का जो अंजाम होना था वह हुआ. तरक़्क़ी व तबदीली के नाम पर हम इस दुनिया में पहुंच गए, जहां बेबाकाना जराएम, बेहेजाबाना सियासत के गुलाम है-बेरहम फि़रक़ावारियत, मज़हबी तक़द्दुस की बेडि़यों में कैद, दफ़्तरों में बदउनवानी और रिश्वत सतानी इल्म-ओ-इन्साफ़ के इदारों पर बेएअतेमादी, झूठ, धोखा, मक्र-ओ-फ़रेब और पूरे समाज में लाक़ानूनियत और उन सब पर हावी तशद्दुद और तशद्दुर के इस बारूदी माहौल में इन्सानियत रूपोश-इन्सानी कदरें पारा पारा हो गयी. शराफ़त, ऐख़लाक़, वफ़ादारी किस्स-ए-पारीना. उसूल, आदर्श दासतानवी ख़यालात और भी बहुत कुछ जिसकी तफ़सील में जाने की ज़रूरत नहीं कि हम आप सिर्फ़ वाकि़फ़ ही हीं बल्कि बराह-ए-रास्त झेल रहे हैं, भोग रहे हैं. इन सबके दरमियान जिन चीज़ों ने सबसे ज़्यादा अहमियत खोई है वह है इन्सान की इन्सानियत और उसका सबसे बड़ा हथियार क़लम और लफ़्ज़ की अज़मत-ओ-हुरमत. माज़ी में भी उथल पुथल हुई और इन्सानों की सफ़ की सफ़ साफ़ कर दी गयी, क़त्ल-ओ-ग़ारेतगरी के बाज़ार गर्म हुए-लेकिन उस बदली में सूरज चमका-इन्के़लाबी व इहतेजाजी-शायरी हुई, अल्फ़ाज की हुरमत और शायरी की अज़मत ने अपना असर दिखाया. आज़ादी, तक़सीम-ए-हिन्द, फि़रकावारियत के ऐन दरमियान आला अदब तखलीक़ हुआ और उसका जादू भी चला जिस पर आज भी लोग सर धुनते हैं और यह अजीब बात भी है कि अच्छा अदब आम तौर पर मुश्किलात में ही पैदा होता है. ऐसी मुश्किलात कि जिसको हल करने और जिससे टकराने का एक बड़ा मिशन नज़रों के सामने हो-फि़क्र  की सालमीयत और क़लम की ख़ल्लाकि़यत और मक़सद की इन्फ़ेरादीयत ग़मज़दा माहोल में जोश-ओ-जज़्बा भर देती है, जिस से बड़े अदब की तख़लीक़ हुआ करती है-लेकिन जहां ऐसा न हो, जि़न्दगी को कोई मकसद न हो, फिक्र साकित-ओ-जामिद हो, समाज में इन्तेशार हो और पूरा मूल्क एक मकरूह सियासत का नंगा खेल खेल रहा हो, आदर्शो पर ज़रगरी का क़ब्ज़ा, क़लम रक़म की गिरफ़्त में हो, तख़लीक़ अपनी नस्रो-ओ-इशाअत, इज़हार-ओ-इबलाग़ के लिये सरमायादारो का मुंह तक रही हो, लफ़्ज़ों का कारोबार हो रहा हो, धर्म के नाम पर इन्सानों का क़त्ल किया जा रहा हो, ज़बान-ओ-तहज़ीब के हवाले से नफ़रतों की दीवारें खड़ी की जा रही हों तो मिशन, विज़न, ज़ेहन, क़लम वगै़रह का गुमराह हो जाना या मुन्ताशिर हो जाना कोई गै़र फि़तरी या हैरत अंगेज़ नहीं. लेकिन शायरी तो फिर भी हो रही है और अदब फिर भी तख़लीक किया जा रहा है. आदतन या शायद ज़रूरतन भी. कुछ कहा नहीं जा सकता, कुछ जियाले तो हैं जो इस आंधी में चराग़ जलाए हुए हैं-आईये
इन चराग़ो की कपकपाहट और थरथराहट का सरसरी जायज़ा लें-शायद कोई उम्मीद की लौ हमारे हाथ आ जाए-लेकिन पहले मशहूर तरक़्क़ी पसन्द शायर अली सरदार जाफ़री की ताज़ा ग़ज़ल का एक शेर पेश करते हैं
जब से इन्सान की अज़मत पे ज़बाल आया है।
है हर इक बुत को ये दावा कि खुदा हो जैसे।।

और एक बिल्कुल नए शायर ने अपने अन्दाज़ में यू कहां.
घर से चलो तो चारों तरफ़ देखते हुए।
क्या जाने कौन पीठ में खंजर उतार दे।।
                (असलम इलाहाबादी)
ऐसी नाज़ुक पेचीदा और संगीन सूरत-ए-हाल में और ऐसी शिकस्ता और बिखरी हुई सूरतों में सबसे पहले इन्सान को अपने वजूद का एहसास और अपने तहफ़्फ़ुज का जज़्बा बेदार हुआ और यही वजह है कि उर्दू की नई ग़ज़ल में अक्सर-ओ-बेेश्तर अपनी ज़ात की फि़क्र, अपने बजूद और उसके बक़ा-ओ-फ़ना के सिलसिले कहीं फि़तरी, कहीं मनतिकी और कहीं फ़लसाफि़याना अन्दाज़ में बिखरे हुए हैं-कहीं कहीं यह ख़याल अपनी ज़ात के अन्दुरून में डूब जाने पर मजबूर कर देता है और कहीं कहीं अहबाब के धोखे-इन्सानियत के फ़रेब अपनों की बेगानगी, ग़रजकि इन्सानी रिश्तों की शिकस्ताहाली और उसके इर्दगिर्द शायर को पहुंचा देती है. चन्द अशआर देखिये.
वो मेरा होके भी शामिल है क़ातिलों में मेरे।
इस इन्केशाफ़ ने तक़सीम कर दिया है मुझे।
               
इश्रत ज़फ़र
न दोस्तों की तरह है न दुश्मनों की तरह।
ये कौन लोग सफ़-ए-दोस्तों में आने लगे।
               
अकबर हमीदी
ये किन अजीब ज़मानों में जी रहा हूं मैं।
कहां गई मेरी आंखों की रोशनी सारी।
               
असद बदायूंनी
ये तजरबा भी अजब है कि अपने आप से मैं।
कोई सवाल करूं और उदास हो जाऊं।
                रईस मंज़र
मैं आदमी हूं मुझे आदमी ने घाव दिये।
किसी चटान में कैसे शिगाफ़ होता है।।
वो कि़स्स-ए-ख़वाब हूं हासिल नहीं कोई मेरा
ऐसा मक़तूल कि क़ातिल नहीं कोई मेरा।।
            ऐन ताबिश
जीने को जी रहा हूं मगर सोचता हूं मैं।
क्यों जि़न्दगी के नाम से डरने लगा हूं मैं।
               
अहमद महफ़ूज
इन तमाम सूरतो और बदहालियों से समाज की जो ऊपर-ऊपर फ़ेज़ा बन रही है उसने समाजी माहौल, उसूल-ओ-ज़वाबित, नज़्म-ओ-ज़ब्त सब कुछ उलट पलट कर दिया है. ख़ैर पर शर, हक़ पर बातिल का क़ब्ज़ा होता चला जा रहा है-धोखा, फ़रेब आज की जि़न्दगी का अटूट हिस्सा बन चुका है-सच्चाई, सादगी, ईमानदारी, हक़ीक़त पसन्दी सब दम तोड़ रही हैं. इस पर इक़तेसादी बदहाली, एख़लाक़ी पामाली मुस्तक़ाबिल की फि़क्रमन्दी, क़त्ल-ओ-ग़ारतगरी, अलाहेदगी पसन्दी, और दीगर समाजी उथल पुथल मसलन सिनअती रेल पेल, नई तबक़ाती कशमकश या तबक़ो की नई तक़सीम उस पर पूरे समाज का काम सिलाईजेशन. इन सबने मिलकर नए समाज की जो तस्वीर उभारी है वह बड़ी ही अजीब-ओ-ग़रीब है-जिस में बस यह तो साफ़ है कि सेहत मन्द और स्वालेह क़द्रो का ज़वाल हो चुका है. इन्सानियत मर रही है इन्सानी क़द्रों की पामाली इस दौर का मुक़द्दर बन चुकी है, बाक़ी सब धुंधला है इस वाजे़ह और गै़र वाज़ेह समाज की मिली जुली तस्वीरों का अक्स उर्दू की नई ग़ज़ल में साफ़ झलकता दिखाई देगा चन्द अशआर इस कि़स्म के भी देखिये।
हमारे अह्द का हर शख़्स बे तदबीर है शायद।
नज़र में धुंध है पैरों में भी ज़न्जीर है शायद।
            शाहिद कलीम
जो तेरे शहर में मुझसे मिली है बे पर्दा।
वो दोस्ती है मगर कारोबार करती है।
            निज़ाम उद्दीन निज़ाम
अब तो इस शह्र में जीने का मज़ा ही न रहा।
अब तो क़ातिल भी किराए के हैं साजि़श ही नहीं।।
कौन निकले घर से बाहर कौन देखे क्या हुआ।
मेरा हमसाया है ख़ुद मेरी तरह सहमा हुआ।।
            रईस मंज़र
घेरे हुए हैं हमको मसाइल ज़मीन के।
हम से तो आसमां की दुआ ली न जाएगी।।
           
अताउर्रहमान तारिक़
ज़मी के और तक़ाजे़ फ़लक कुछ और कहें।
क़लम भी चुप है कि अब मोड़ ले कहानी क्या।।
                अज़रा परवीन
लहू की आग में जलती है हसरते क्या क्या
हमारे साथ लगी हैं ज़रूरते क्या क्या।।
               
शब्बीर आसिफ़
हर वफ़ा अतवार अबके बे वफ़ा होने को है।
शह्र में थे कैसा हंगामा बपा होने को है।।
           
ऐन ताबिश
शाकी, बदज़न आज़ुरदा है मुझसे मेरे भाई यार।
जाने किस जा भूल आया हूं, रख कर मैं गोयाई यार।।
            शमीम अब्बास
जे़हानतों को कहां वक़्त खूं बहाने का।
हमारे शह्र में किरदार क़त्ल होते हैं।।
           
अज़हर इनायती
रातों के गह्रे सन्नाटे अब शामों से छा जाते हैं।
हू का आलम है बस्ती में बातें करता कोई नहीं।।
           
असद बदायूनी
बे सर-ओ-सामां निकलना घर से अच्छा ही रहा।
राह में ग़ारतगरों का सामना होना ही था।
           
अहमद महफू़ज़
बेबिसाती, बेकसी, बेसाज़-ओ-सामानी भी है।
फिर भी जीते हैं कि हर मुश्किल को आसानी भी है।
           
नसीम सिद्दीक़ी
हाल की बदहाली, बेचैनी, अफ़रा तफ़री और मुस्तक़बिल का शदीद एहसास, तमाम इक़दार-ओ-रवायात की शिकस्तगी और मौजूदा दौर का बेहंगम शोर कुल मिलाकर हाल की बेचैनी का इस्तेआरा बन कर रह गयी, चुनांचे ऐसे में माज़ी की याद और उसकी बाज़याफ़्त अहम जुज़ बन कर उभरी और उर्दू की नई शायरी की रग-ओ-रेशे में सरायत कर गयी. माज़ी की यह याद कहीं ख़यालात का सरचश्मा बनती है तो अक्सर ग़ज़लों की नई तशकील की जि़म्मेदार भी ठहराई जा सकती है. कहीं ये वाक़या-ए-कर्बला की तरफ़ ले जाती है तो कहीं इसराफ़ील-सुलेमान-आदमज़ाद-सुराब और अन्धे कुएं ही तरफ़ ले जाती है. वाक़य-ए-कर्बला से मुताल्लिक़ प्रोफेसर सैय्यद मुहम्मद अक़ील अपनी किताब ग़ज़ल के नए जेहात में लिखते हैं-‘एक जे़हनी इन्तेशार-ओ-बे यकीनी और दरबदरी के एहसास के साथ मालूम नहीं कहां से वाकय-ए-कर्बला की इशारियत और मज़लूमियत भी तेज़ी से दाखि़ल हो रही है. मेरे लिये यह बताना मुश्किल है कि नई ग़ज़ल में यह कैफि़यत कहां से दबे पांव दाखि़ल हूई-बज़ाहिर तो कोई बैरूनी दबाव नहीं मालूम होता न इस कैफि़यत में तफ़ाटवर है न ऐलान न तरक्क़ी पसन्दों की ललकार. हालात में पिसते हुए इन लोगों में जो कर्बला की इशारित-फ़रात-नोक-ए-सेना पर सर और जूए खूं की बातें मिलती है, उनमें एक तरह की खुदकलामी है. बस अपने दिल से बातें करने या सलाह करने की सूरत है-मज़लूमियत उभरती है और न किसी मुख़ालिफ़ के जु़ल्म का एलान न इन्साफ़ न मिलने की शिकायत बस जो कुछ महशरसतां शायर के जे़हन में मौजूद है उसका इज़हार अपने अशआर में कर दिया है.
उर्दू की नई ग़ज़ल में वाकए-ए-कर्बला की इशारियत या बतौर-इस्तेआरा इसका इस्तेमाल इन दिनों कसरत से हो रहा है, ऐसा क्यों है? यह एक लम्बी बहस हो सकती है जिसकी तफ़सील की यहां गुंजाईश नहीं-मुख़तसरन इसे यूं समझते चलें कि वाकय-ए-कर्बला की इशारियत में अगर एक तरफ़ आज की लाचारी और मज़लूमियत से रिश्ता जोड़ने की कोशिश है तो दूसरी तरफ़ इन्सानी व इख़लाक़ी कद्रों के हवाले से शर पर ग़ालिब आने वाली एक मौहूम सी सूरत या फिर सीधी सी यह बात हो सकती है कि वह आज के रंज-ओ-ग़म को ग़म-ए-इमाम हुसैन से वाबस्ता करके क़द्रे राहत व तसल्ली की तलाश, या फिर कुछ नयापन बस इससे ज़्यादा बात बनती नज़र नहीं आती. लेकिन यह ज़रूर है कि नई ग़ज़ल में कहीं कहीं यह एक अच्छा और नया पहलू उभर कर आया है, जिसने कैफि़यत और मानवीयत की एक नई दुनिया तलाश की है.
तमाम वुसअत-ए-सहरा-ए-तिश्नगी मेरी।
तमाम सिलसिल-ए-दजला-ओ-फुरात मेरा।
          
  इशरत ज़फ़र
ये जो बिकने के लिये रक्खे हैं बाज़ारो में।
इन्हीं कासों में किसी दिन मेरा सर भी होगा।
         
   अख़्तर लखनवी
मुझको लाखों की नहीं चाह बहत्तर चाहिये।
जो ख़ुदा की राह में कट जाए वो सर चाहिये।।
           
अतीक इलाहाबादी
उर्दू की नई ग़ज़ल में माज़ी का ताल्लुक़ एक याद की शक्ल में भी ज़ाहिर होता है और बड़े कसक भरे अन्दाज़ में अच्छे और गुज़रे हुए लम्हात की याद-सेहतमन्द क़द्रों की याद-रिश्तों और वफ़ाओं की याद-ग़ज़ल में यह सब कुछ कहीं कहीं बड़े पुरकशिश अन्दाज़ में ज़ाहिर होता है.
रास्तो क्या हुए वह लोग जो आते जाते।
मेरे आदाब पे कहते थे कि जीते रहिये।।
            अज़हर इनायती
चराग़ रौशनी लेते थे जिनकी सूरत से।
वो लोग ख़ाक हुए दर्द की निहायत से।।
            तौसीफ़ तबस्सुम
रहते थे दास्तानों के माहोल में मगर
क्या लोग थे कि झूठ कभी बोलते न थे।
           
अज़हर इनायती
गुज़र गए हैं जो मौसम कभी न आएगें।
तमाम दरिया किसी रोज़ डूब जाएगें।।
            आशुफ़्ता चंगेज़ी
माज़ी की यह कसक शायरी का एक हिस्सा तो है लेकिन बड़ा हिस्सा बन कर नहीं उभरता, अगरचे इन नई ग़ज़लों में हालिया समाज की एक से एक दिलखराश तस्वीरें है. अगर एक तरफ़ ख़ौफ़ और धुंए का हब्स है तो दूसरी तरफ़ रिवायती तौर पर सही हुस्न-ओ-जमाल की शबनमी ठंडक है. हुस्न-ओ-जमाल के रवायती अज़कार, लेकिन मुख़तलिफ़ पैराय-ए-इज़हार के साथ, इसलिये, नए दौर की तमाम अशया के साथ साथ इश्क़ भी नया और उसके अन्दाज़ भी नए कि जमालयात का तसव्वुर बहरहाल इक़्तेसादयात और मआशियात से बराह-ए-रास्त वाबस्ता रहता है और साथ साथ तारीख़ और जुग़राफि़या से भी ऐसी हंगामियत में क़ल्ब और वारदात-ए-क़ल्ब का जि़क्र तरह तरह से किया गया है. लेकिन तमाम जि़क्र बस रूके रूके और डरे डरे से हैं. चन्द अशआर इस रंग के भी देखिये।
धूप इतनी है कि जलते हैं गुलाबों के बदन।
क़हर इतना है कि होटों पे लगे हैं कांटे।।
           
नियाज़ हुसैन
हवा के हाथ भी पैग़ाम वह अगर भेजे।
ख़याल बन के भी उसके नगर न जाऊंगा।।
            अनवर महमूद
हिज्र के सहरा में तेरी याद का कितना गु़बार।
इक मुसाफि़र बे सर-ओ-सामान-ओ-तन्हा मेरा दिल।।
           
शहबाज़ नक़वी
अक्सर तेरी यादें ही अपना सरमाया होती हैं।
अक्सर तेरी यादों से हम कतराया करते हैं।।
          
  शुऐब निज़ाम
अब किसी पांव की आहट भी नहीं आती है।
छुप गए मेरे ग़ज़ालान-ए-सुबुक गाम कहां।।
           
असग़र मेंहदी होश
वस्ल के मौसम हो या हों हिज्र की रातें।
अब हमें लगने लगे हैं सारे मन्ज़र एक से।।
           
महताब हैदर नक़वी
दो अलग लफ़्ज नहीं हिज्र-ओ-विसाल।
एक में एक की गोयाई है।।
           
फ़रहत एहसास
हुस्न-ओ-इश्क़, दर्द-ओ-कर्ब के दरमियान से निकतली हुई यह राह नई शायरी का कौन सा जमालयाती तसव्वुर व तग़ज़्जुल पेश करेगी, अभी से कुछ कहा नहीं जा सकता. प्रोफ़ेसर अक़ील साहब ने यहां तक कह दिया ‘शायद नई नस्ल के पास तग़ज़्जुल’ कुछ है ही नहीं वह सिर्फ़ माशूक के हवालों से अपनी बात और अपनी जि़न्दगी लोगों तक पहुंचाना चाहता है.’
मैंने अपने इस मुख़तसर से मज़मून को सिर्फ़ हिन्दुस्तान की शायरी तक महदूद रक्खा है. पाकिस्तान में होने वाली शायरी, इसके अलावा अमरीका, कनाडा, लन्दन वगै़रह की उर्दू ग़ज़ल का जि़क्र नहीं किया है. यही वजह है कि मैंने दरबदरी, बेघरी, हिजरत, जैसे मौज़ूआत को हाथ नहीं लगाया और न ही ग़ज़ल की ज़बान और डिक्शन के बारे में बहस उठायी है हालांकि जदीद दौर की नई नई इस्तेलाहातें, लफि़्ज़यात, मुहावरात, हिन्दी अंग्रेजीं के अलफ़ाज जिस तरह उर्दू ग़ज़ल में शामिल व दाखि़ल हो चुके हैं उसको देखते हुए नई ग़ज़ल का लिसानी व उसलूबियाती मुतालेआ एक अच्छा रुख़ तलाश किया जा सकता है. बहरहाल मुतजि़क्करा बाला सिम्तों में रवां दवां उर्दू की नई ग़ज़ल जैसाकि अजऱ् किया गया. किसी मख़सूस सिम्त का तअय्युन नहीं करती. ग़ज़ल में वैसे भी प्रोजेक्शन के इमकानात कम होते हैं, बस एक इशारिया ही तैयार किया जा सकता है और न ही उसके अन्देशों और इमकानात पर हतमी बातें की जा सकती हैं.
आखि़र में एक सवाल ज़रूर उठाना चाहता हूं वह यह कि आखिर क्या वजह है कि जदीद दौर में अपने कर्ब-ओ-अलम, दर्द-ओ-सितम, तन्हाई व वीरानी, लाचारी व वेबसी हब्स और घुटन के बावजूद नई ग़ज़ल में बेचैनी व बेकैफ़ी की लहर तो है लेकिन इहतेजाज की गूंज नहीं. इहतेजाज तो दर किनार मज़ाहेमत भी नहीं है और हद यह है कि माशूक़ के जौर-ओ-सितम की शिकायत, शैख़-ओ-नासेंह की शिकायत-आसमान की चश्म-ए-बद और फ़रेब-ए-तक़दीर की शिकायत, नई ग़ज़ल से रिवायती शिकायत का चलन क्या रूठा, मज़ाहेमत का लहजा ही रूठ गया, जबकि ऐसे हालात में नई ग़ज़ल का मज़ाहेमती लहजा उसका एक अहम लहजा होना चाहिये, जैसा कि पाकिस्तान की ग़ज़लिया शायरी का है. लेकिन शायद ऐसा न होने में वहां सरकारी निज़ाम और यहां की जमहूरियत काम करती दिखाई देती है.
गुफ्तगू के दिसंबर 2012 अंक में प्रकाशित 


-229ए,लूकरगंज, इलाहाबाद, मोबाइल नंबर: 9415306239

रविवार, 6 जनवरी 2013

अभिव्यक्ति की कार्यशाला हैं ‘निशीथ’ की कवितायें


                                                   इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
गुफ्तगू पब्लिकेशन ने हाल ही में डा. नन्दा शुक्ला का काव्य संग्रह ‘निशीथ’ का प्रकाशन किया है। डा. शुक्ला नई कवयित्री हैं, इसी संग्रह के जरिये उन्होंने साहित्य की दुनिया में पर्दापण किया है। इन्होंने अपनी पुस्तक इस भले ही अब प्रकाशित करवाई है लेकिन इसमें शामिल रचनायें उनके छात्र जीवन की हैं। पुलिस विभाग ज्वाइन करन के बाद इन्होंने कवितायें फिर लिखना शुरू कर दिया है। नौकरी में आने के बाद लिखी गई उनकी कविताओं का संग्रह भी शीध्र ही सामने आएगा है। जहां तक ‘निशीथ’ का सवाल है तो इसमें शामिल रचनाओं को एक स्कूली छात्रा की कविताओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए। जाहिर है छात्र जीवन में कोई भी उतना संवेदनशील नहीं होता, जितना कि नौकरी और दांपत्य जीवन में आने और दुनियादारी से रूबरू होने के बाद होता है। कथ्य और शिल्प के स्तर पर बहुत परिपक्वता भले ही इनकी कविताओं में नहीं हैं, लेकिन इतना तो तय है कि इन्होंने अपनी संवेदना को व्यक्त करने में न तो कोई ढिलाई बरती है और न ही संकोच किया है। अपने आसपास की चीज़ों को जैसे जिस रूप देखा और महसूस किया है, उसे बिना किसी लाग-लपेट के व्यक्त कर दिया है, कहीं-कहीं अपनी कविताओं के जरिए उपदेश देते हुए दिख रही हैं, जो उनके बालमन की अभिव्यक्ति ही की जाएगी। अन्य महिला रचनाकारों की तरह इनकी कविताओं में भी महिलाओं की तकलीफें, एहसास और अपने महिला होने की बात बार-बार दिखाई पड़ रही हैं। कहती हैं-
जीवन में रहा नहीं अब कोई भाव विशेष/न रही जीवन आकांक्षा शेष
बचा नहीं जीवन का कोई अवशेष/तिमिर में सिमिट गया ये जीवन शेष

अगर इन कविताओं के नसीब में भूरी-भूरी प्रसंशा नहीं है तो इन्हें रद्दी की टोकरी में भी नहीं फेंका जा सकता है। क्योंकि नन्दा शुक्ला की रचनात्मकता ही आगे चलकर साहित्य के सरोकारों को उल्लेखित करेंगी और अपने अनुभवों-शिल्पों के ज़रिये साहित्य का अभिन्न अंग बन सकती हैं। इसलिए हमें इनकी शुरूआती दिनों में लिखी गई इन कविताओं को इसी रूप स्वीकार करते हुए इनके लिए आगे का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए, और उम्मीद की जानी चाहिए कि एक अच्छी कवयित्री बनकर नन्दा शुक्ला ज़रूर देश के पटल पर अवश्य उभरेंगी। इनके कहन का एक अन्य अंदाज देखें-
हर दर्द हर इंसा को सहना है/सह कर भी चुप रहना है
कितने तूफानों से घिरे रहे/हर तूफां को अंदर ही बंद रखना है।

मानव जीवन की व्याख्या अपनी दृष्टि इन्होंन इस तरह किया है-
ये वीरान सा प्रागंड़/ये खंडहर होते भाव
ये कुछ और नहीं/मानव मन का नीरव अहसास।

कुल मिलाकर यह ज़रूर कहा जाना चाहिए कि नयी प्रतिभाओं में उर्जा भरने के लिए उनका उत्साहवर्धन ज़रूर किया जाना चाहिए साथ ही उनकी रचनाधर्मिता की बेहतरी के लिए उचिता मार्गदर्श
न भी किया जाना बेहद ज़रूरी है।
पुस्तक का नाम- निशीथ
कवयित्री: डा. नन्दा शुक्ला
मूल्य: पेपर बैक 40 रुपये, सजिल्दः 60 रुपए
पेज: 64
प्रकाशक: गुफ्तगू पब्लिकेशन, इलाहाबाद
ISBN- 987-81-925218-1-7

                                                        

शनिवार, 5 जनवरी 2013

‘अलविदा-2012’ पर हुआ मुशायरे का आयोजन

अमर उजाला के संपादक अरुण आदित्य को गुफ्तगू ने किया सम्मानित
इलाहाबाद।साहित्यिक पत्रिका गुफ्तगू के तत्वावधान में 30 दिसंबर को सम्मान समारोह और मुशायरे का आयोजन  इलाहाबाद स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय के शाखा परिसर में किया गया। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार अजामिल ने की जबकि मुख्य अतिथि सीनियर डीओएम जी के बंसल थे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। इस अवसर पर कवि व संपादक अरुण आदित्य को सम्मानित किया गया। सबसे पहले शिवपूजन सिंह ने 2012 में हुए गुफ्तगू की गतिविधयों के सालभर का चिट्ठा सुनाया और बताया कि हमने इस वर्ष बारह साहित्यिक आयोजन किए हैं, नई प्रतिभाओं को आगे लाने के लिए विशेष कार्य किये गए हैं। दसवें वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर हम अप्रैल महीने में एक बड़ा आयोजन करने जा रहे हैं। अजमेर से आए विशिष्ट अतिथि नईम सिद्दीक़ी ने कहा कि गुफ्तगू उर्दू और हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही है, हमें ऐसे प्रयासों की सराहना करनी चाहिए। वरिष्ठ मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि गुफ्तगू टीम लगातार साहित्यिक गतिविधियों में तत्लीनता से लगी हुई है, जिसके वजह से इलाहाबाद की साहित्यिक सरगर्मी बनी हुई है। रविनंदन सिंह ने कहा कि अरुण आदित्य ने साहित्य के साथ ही पत्रकारिता में भी खासी अच्छा योगदान किया है, इनके इलाहाबाद आने से साहित्यिक खबरों को अधिक स्थान मिल रहा है। अजामिल ने भी गुफ्तगू की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस टीम कार्य ही असली साहित्य की सेवा है, हम ऐसे प्रयासों की प्रशंसा करनी चाहिए।दूसरे सत्र में मुशायरे का आयोजन किया गया !

                                                                                                               

अजामिल का स्वागत करते वीनस केसरी
गौरव कृष्ण बंसल का स्वागत करते नरेश कुमार ‘महरानी’

अरुण आदित्य का स्वागत करते वीनस केसरी
नईम सिद्दीक़ी का स्वागत करते सौरभ पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र का स्वागत करते शिवपूजन सिंह
कार्यक्रम के दौरान मौजूद साहित्यप्रेमी
अमर उजाला के इलाहाबाद यूनिट के संपादक अरुण आदित्य को सम्मानित किया।
बायें से-इम्तियाज़ अहमद ग़ाजी़, नईम सिद्दीक़ी, नरेश कुमार महरानी, अरुण आदित्य, गौरव कृष्ण
बंसल और अजामिल
 
कार्यक्रम के दौरान विचार व्यक्त करते नईम सिद्दीक़ी

अजामिल-
इस सर्कस में
उस एक बित्ते के आदमी को
सौंपी गयी है जिम्मेदारी
दुनिया को हंसाने की
इस तरह पेश होगी
एक बार फिर
सबके हंसने की चीज़



गौरव  कृष्ण बंसल-
कोई बदलेगा नहीं ख़ुद को बदलना होगा,
आग बरसेगा मगर घर से निकलना होगा।
कल इसी राख पे फूलों की कतारें होंगी,
आज लकड़ी को मगर आग में जलना होगा।


अरुण आदित्य-
हर दिल में उतर जाएगी जज़्बात की तरह,
हो जाए अगर शायरी भी बात की तरह।
इस शहर के पत्थर भी होते हैं तर-बतर,
बरसो तो जरा टूट के बरसात की तरह।


अशोक कुमार स्नेही-
कहना महल दुमहले सूने सूनी जीवन तरी हो गई,
प्रिया तुम्हारे बिना मिलन की सूनी बारादरी हो गई।


यश मालवीय-
कैसी ये बारीकियां, कैसे तंज महीन,
हम बोले मर जाएंगे, वो बोले आमीन।


                                                       इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी-
इश्क़ की राह पर आप चलिए मगर,
शह्र
है हादसों का ज़रा देखकर।
नाज़ करते थे जो अपनी अंगड़ाई पर,
 
आज रोने लगे आईना देखकर।



सागर होशियापुरी-
अलविदा आप कहिये अब इस साल को
सुनिये दस्तक नए साल की ध्यान से
कह रहा है वो शायद कि ग़म भूलकर,
मांग ले हर खुशी अपने भगवान से।



तलब जौनपुरी-
ज़माना नेक राहों पर मुझे चलने नहीं देता,
ज़मीर अपना रहे ईमां से भी हटने नहीं देता।
      विजय लक्ष्मी विभा-
राख के ढेर में जलता हुआ अंगारा है
कोई धोखे में न रहना कि वो बेचारा है।


रविनंदन सिंह-
कांपते हाथों की खंडित धार लेकर क्या करूंगा
जि़न्दगी में रेत सा आधार लेकर क्या करूंगा।
संवेदना की सुक्ष्मतम अभिव्यक्ति काफी है,
मैं कोरे शब्द का आभार लेकर क्या करूंगा।

मंजूर बाकराबादी-
मां के ममता की कोई कीमत चुका सकता नहीं,
मां का रुतबा क्या है कोई बता सकता नहीं।
जिसने करली मां की सिदमत जन्नती वह हो गया,
उम्रभर तकलीफ़ वह दुनिया की पा सकता नहीं।

रमेश नाचीज़-
शिकवे-गिले भुला के मेरे प्यारे दोस्तो,
कुछ करिये बातचीत, नया साल आ गया।
दीवार ज़ात धर्म की ‘नाचीज़’ तोड़कर,
लीजे दिलों को जीत, नया साल आ गया।
 अजीत शर्मा ‘आकाश’-
चूल्हे चैके से जो पाये थोड़ी फुर्सत औरत
तब करें औरत के हक़ की भी हिमायत औरत।

 सौरभ पांडेय-
जो न मरती है, न जीती है, सुनो वो औरत
बेहया काठ सी बस उम्र गुज़र करती है
ज़र्द आंखों की जुबां और कहो क्या सुनता

शर्म वो चीज़ है, ऐसे में असर करती है।



वीनस केसरी-
मेरी मां आजकल खुश है इसी में,
अदब वालों में बेटा बोलता है।


विमल वर्मा-
चिरागे रूह काफ़ी है, रौशने राह की खातिर,
कहां तक साथ रे पायेंगी ये रंगीनियां आखिर।

नरेश कुमार ‘महरानी’-
गज-गज भर की रोशनी, गले अटकती जाये,

मैं दौड़ा में बांस को, सागर नाव चलाये।


अजय कुमार- 

नाज़ था मुझको अपनी प्रबल बुद्धि पर
वार संवाद के भी मैं सह ना सका।


धन्यवाद ज्ञापित करते शिवपूजन सिंह

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

तरही ग़ज़ल मुकाबला का परिणाम


जुलाई-सितंबर अंक में ‘गुफ्तगू तरही ग़ज़ल मुकाबला’ की घोषणा की गई थी। दिए गए तरह ‘लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं’ पर प्राप्त हुई ग़ज़लों को श्री एहतराम इस्लाम से जांच कराया गया, उन्हें परिणाम निकालने के लिए सिर्फ़ ग़़ज़लें ही दी गई थीं, शायरों के नाम उन्हें नहीं दिए गए, ताकि निष्पक्ष निर्णय हो। प्राप्त सभी ग़ज़लों में 1 से 20 स्थान पाने वालों की ग़ज़लें उनके क्रम में प्रकाशित की जा रही हैं। बाकी ग़ज़लें प्रकाशित करने में हम असमर्थ हैं- संपादक
अनिल पठानकोटी (प्रथम स्थान)
दुख में भी पुरसकून हैं बेज़ार हम नहीं।
फिर किस तरह बताओ कि खुद्दार हम नहीं।
हम अपनी झोंपड़ी में बहुत खुश हैं दोस्तो,
रंगीन महफि़लों के तलबगार हम नहीं।
जो छल, कपट, फरेब सियासत से हो भरी,
ऐसी किसी कहानी का किरदार हम नहीं।
हम जानते नहीं हैं मोहब्बत, दुआ वफ़ा,
ताजि़र हैं हम फ़क़त मियां फनकार हम नहीं।
मुफलिस के दिल से निकली हुई बद्दुआ हैं हम,
पायल की मस्त, झूमती, झंकार हम नहीं।
मिलते हैं हम सभी से खिले फूल की तरह,
राहों में भी बिछाते कभी खार हम नहीं।
ज़ालिम का ज़ुल्म सह के भी कुछ बोलते नहीं,
आखि़र हम आदमी ही हैं अवतार हम नहीं।
लो आज खून हमने तमन्ना का कर लिया,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
-गार्डन कालोनी, मिशन रोड, पठानकोट-145001
मेबाइल नंबर: 9465280779

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सागर होशियारपुरी (द्वितीय स्थान)
सच है किसी धरम के तरफ़दार हम नहीं।
रब के सिवा किसी के परस्तार हम नहीं।
अपने तुम्हारे अपने हैं, अग़यार हम नहीं।
ज़ख़्मी करे जो फूल को वो ख़ार हम नहीं।
हमने किनारा कर लिया दुनियावी इश्क़ से,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार में हम नहीं।
बेशक हैं हम ग़रीब मगर हैं वतनपरस्त,
कैसे ज़मीर बेच दें, ग़द्दार हम नहीं।
सब कुछ अता किया हमें परवरदीगार ने,
इंसान की मदद के तलबगार हम नहीं।
इंसानियत का सबने पढ़ाया सबक़ मगर,
इंसान का निभा सके किरदार हम नहीं।
कोशिश ये है कि दह्र में अम्नो-अमां रहे,
बेशक करेंगे पहला कभी वार हम नहीं।
-563-452, पुराना ममफोर्डगंज, इलाहाबाद
मोबाइल नंबर: 9450961173

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धर्मेंद्र सिंह ‘सज्जन’ (तीसरा स्थान)
तलवे जो चाटते वो वफ़ादार हम नहीं।
आशिक़ हैं किन्तु इश्क़ में बीमार हम नहीं।
आखि़र ढहे हम आज मुहब्बत के बोझ से,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
लिपटे हुए हैं राख में पर यूं न छेडि़ए,
मुट्ठी में ले लें आप वो अंगार हम नहीं।
रोटी दिखा के मां की बुराई न कीजिए,
भूखे तो हैं ज़रूर प’ गद्दार हम नहीं।
पत्थर भी खाएं आप के, फल आप ही को दें,
रब की दया से ऐसे भी लाचार हम नहीं।
दिल के वरक़ पे नाम लिखा है बस एक बार,
आते जो छप के रोज़, हैं अख़बार, हम नहीं।
घाटा,नफ़ा, उधार, नकद, मूल, सूद सब,
सीखे पढ़ें हैं खूब प’ बाज़ार हम नहीं।
-एनटीपीसी लिमिटेड, कोलडैम हाइडृो पावर प्रोजेक्ट
ब्रमाना, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश

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डाॅ. सूर्या बाली ‘सूरज’ (चैथा स्थान)
तेरे सिवा किसी के तलबगार हम नहीं।
फिर भी तेरी नज़र में वफ़ादार हम नहीं।
सींचे थे जिस चमन को कभी अपने खून से,
अब उस चमन के फूल के हक़दार हम नहीं।
क्यूं लेके जा रहे हो मसीहा के पास तुम,
बस हिज़्र में उदास हैं बीमार हम नहीं।
तोहमत लगे सवाल उठे चाहे जो भी हो,
अपनी नज़र में अब तो गुनहगार हम नहीं।
बस यूं ही भाव देखने हम भी निकल पड़े,
बाज़ार में खड़े हैं खरीदार हम नहीं।
रहते हैं अब भी शान से हम कब्रगाह में,
माना के पहले जैसे जमींदार हम नहीं।
हम जि़न्दगी से दूर तेरी ख़ुद ही जा रहे,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
-आॅल इंडिया मेडिकल साइंस इंस्टीट्यूट,
भोपाल, मोबाइल नंबरः 8989097518

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सौरभ पाण्डेय (पांचवां स्थान)
अब कर सको वज़ू कि वो जलधार हम नहीं।
गंगा करे गुहार, गुनहग़ार हम नहीं।
जिनके लिये पनाह थे, उम्मीद थे कभी,
वोही हमें सुना रहे ग़मख़्वार हम नहीं।
जीना तुम्हारी याद में, रातें संवारना,
अब तो सनम ये मान जा बेकार हम नहीं।
दुश्वारियां ख़ुमार सी तारी मिजाज़ पे,
हर वक़्त है मलाल कि बाज़ार हम नहीं।
हक़ मांगने के फेर में बदनाम यों हुए,
ये बोल भी न पा रहे ख़ूंखार हम नहीं।
हम शखि़्सयत पे दाग़ थे ऐसा न था मगर,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार में हम नहीं।
मासूमियत दुलार व चाहत नकार कर,
जो बेटियों पे गिर पड़े तलवार हम नहीं।

-एम-।।-ए-17,एडीए कालोनी,नैनी
इलाहाबाद, मोबाइल नं. 9919889911
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अफ़ज़ल इटावी (छठा स्थान)
हैरत है सब लुटा के भी हक़दार हम नहीं।
ग़द्दार कर रहे हैं वफ़ादार हम नहीं।
सारे जहां को याद है गुजरात की सितम,
किस मंुह से तुम कहोगे ख़तावार हम नहीं।
बस इसलिए दिलों पे हुक़ूमत है आज तक,
अख़लाक ले के निकले हैं तलवार हम नहीं।
इस्लाम ने सिखाया फ़क़त अम्न का सबक़,
ज़ुल्मो सितम के यानी तरफदार हम नहीं।
मुज़रिम की सफ़ में आपने लाकर बिठा दिया,
तारीख़ कह रही है कि गद्दार हम नहीं।
क़ुबानियों ने कान में लालच से कह दिया,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
-21,कस्साब खाना, पचराहा, इटावा
मोबाइल नंबर: 9719903731,9305352097

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डाॅ. संजय दानी (सातवां स्थान)
हां तीरगी के ज़ुल्म से बेज़ार हम नहीं।
क्या इसलिये उजालों के हक़दार हम नहीं।
हम इश्क़ के सिपाही, मुहब्बत हमारा धर्म,
मज़हब की सरहदों पे गिरफ़्तार हम नहीं।
तीमारदारी हुस्न की हर वक़्त क्यूं करें,
ऐ शोख़ लड़की इतने भी बेकार हम नहीं।
तनहाई की ज़मीन हमें रास आ गई,
लो अब तुम्हारी रहा में दीवार हम नहीं।
ग़ैरों के धर्म की न दिखाओ हमें कमी,
अपनी बताओ, इतने समझदार हम नहीं।
जो बाग़ बेवफ़ाई के पानी से हो भरा,
उस बाग़ को संवारने तैयार हम नहीं।
इस दर से भूखा एक भी साधू नहीं गया,
ग़ुरबत से रिश्ता रख के भी लाचार हम नहीं।

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सिबतैन परवाना (आठवां स्थान)
अहले वफ़ा हैं कोई जफाकार हम नहीं।
क्यों तुमने कह दिया है के वफ़ादार हम नहीं।
जाता हूं आज दूर बहुत दूर शहर से,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
इक झोपड़ी है अपने बुजुरगों की आज भी,
उंची इमारतों के तलबगार हम नहीं।
वो लोग और हैं जो तरसते है रोज़ ओ सब,
बेलोश चाहतों के खरीदार हम नहीं।
दहशतगरों के साथ वही लोग हैं मिले,
जो लोग कह रहे हैं खतावार हम नहीं।
-ग्राम-दिलालपुर, पो. सालमारी
जिला कटिहार-855113, मो. 9472217246

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तलब जौनपुरी (नवां स्थान)
ज़ालिम की फि़तरतों से ख़बरदार हम नहीं।
हाथों में हथकड़ी है गुनहगार हम नहीं।
हंस-हंस के हक़ की राह में कुर्बान होंगे हम,
मैदां से भाग जायें वो सरदार हम नहीं।
तेरा जहान छोड़ के दुनिया से हम चले,
लो अब तुम्हारी रहा में दीवार हम नहीं।
हैं आज जो किसी से वही कल किसी से हैं,
ऐसी मोहब्बतों के तरफ़दार हम नहीं।
अपनी कसम को वक़्त पे हम तोड़ कैसे दें,
दुनिया ही कहेगी वफ़ादार हम नहीं।
तामीर हमने की है यहां मंजि़लें तमाम,
साये में जिनके हैं कहीं गुलज़ार हम नहीं।   
महशर में डूब जायेंगी दुनिया की कश्तियां,
कश्ती को छोड़ने को भी तैयार हम नहीं।
457-255ए, बाघम्बरी हाउसिंग स्कीम, अल्लापुर
इलाहाबाद, मोबाइल न.9450617609

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सतीश यादव ‘असीर’ (दसवां स्थान)
कहने को तो कहें कि तेरे यार हम नहीं।
किसको यक़ीन होगा गुनहगार हम नहीं।
सारे जहां के ग़म को भी उल्फ़त तुम्ही से है,
तेरी वफ़ा के सिर्फ़ तलबगार हम नहीं।
तुम हो चमन की शान मगर ये भी जान लो,
हम खुश्बू-ए-चमन हैं कोई ख़ार हम नहीं।
नीले गगन पे चांद सितारों का राज है,
तन्हा अंधेरी रात में सरकार हम नहीं।
सबकुछ लुटा के आप के पहलू में आये हैं,
कहते हैं आप रौनके बाज़ार हम नहीं।
घबरा के अपने आपको ही कर दिया फ़ना,
ले अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
-241-18ए, मलाकराज, रामबाग
इलाहाबाद, मोबाइल: 9984612497

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कुमार साइल (ग्यारहवां स्थान)
शामिल तेरे गुनाह में किस बार हम नहीं।
फिर भी तेरे नज़र में वफ़ादार हम नहीं।
दिल है तो चोट खा के ज़रा तो करेगा उफ़,
ऐसा नहीं, ग़मों के परस्तार हम नहीं।
आतिश का था पता कि जला जायेगी हमें,
थे आग के धुंए से ख़बरदार हम नहीं,
दुनिया की तेज़ दौड़ में रिश्ते पिछड़ गए,
बदले हुए जहान में दरकार हम नहीं।
पहले लहू से सींचिये फिर ख़ाक डालिये,
ऐ यार, दोस्ती के तरफ़दार हम नहीं,
जो भी मिला हमें वो अदाकार कह गया,
चेहरे पे लाख ओढ़ते किरदार हम नहीं।
आंधी ही वो चली कि उड़ा ले गयी हवा,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
-प्रीतम पैलेस के पीछे, मंदिर मार्ग, हिसार रोड
सिरसा- 125055  मोबाइल नं. 9812595833

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आशीष दशोत्तर (बारहवां स्थान)
माना किसी फ़क़ीर सा किरदार हम नहीं।
फिर भी तेरे जहां के गुनहगार हम नहीं।
हमने तो जल के रात को रोशन बना दिया,
क्या अपनी रोशनी के भी हक़दार हम नहीं।
बच्चों से बोलकर यही मां-बाप चल दिए,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
सौदा किया है आपने अपने ज़मीर का,
इस काम के ही वास्ते तैयार हम नहीं।
तेरे खि़लाफ़ एक दिन आएंगी आंधियां,
सहते रहेंगे जुल्म यूं हर बार हम नहीं।
साझा करेंगे दर्द ही लग जाओ गर गले,
खं़जर घुसाए पीठ में वो यार हम नहीं।
-39,नागर वास, रतलाम-457001
मेबाइल नंबरः 9827084966

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संदीप वाहिद (तेरहवां स्थान)
वादा किया तो टालते हैं यार हम नहीं।
मौजूद हैं सदा कभी दुश्वार हम नहीं।
जलवा तेरा है ख़ूब कहां तू, हैं हम कहां,
हैं शख़्स मामूली अजी फ़नकार हम नहीं।
वादों के जाल में तेरे हम फंस चुके बहुत,
आएंगे तेरी चाल में इस बार हम नहीं।
हर शर्त है कुबूल सिवा एक बात के,
ख़ुद्दारी अपनी छोड़ दें तैयार हम नहीं।
न्ीलाम हो रही थी वफ़ा एक दिन वहां,
उस दिन से जाते हैं कभी बाज़ार हम नहीं।
महफ़ूज रख ले हमको तू, दिल की किताब हैं,
उस ताक पे रखा कोई अख़बार हम नहीं।
तेरी नज़र से खुद को गिराया सही किया,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।

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फ़ौजि़या अख़्तर (चैदहवां स्थान)
जी! बार-ए-हम नफस के तलबगार हम नहीं।
अफ़साना-ए-हयात के किरदार हम नहीं।
लहज़ा जो पुरशिकस्ता उमंगे भी मंद हैं,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
जज़्बों की इक लहक है मोहब्बत की नब्ज़ पर,
फुरक़त के सिलसिलों से बेज़ार हम नहीं।
अब रूह पर जो ज़ात के पर्दे हैं खुल गये,
पाबंदी-ए-ख़्याल के इफ्कार हम नहीं।
है ग़र्क एक शख़्स मोहब्बत की झील में,
तन्हा ही बे-खुदी के ख़तावार हम नहीं।
बरसों फिरा है क़ल्ब जो सहरा-ओ-दस्त में,
सायल हैं बस जुनूं के,तरहदार हम नहीं।
साहब! ये किसी रस्म-ए-वफ़ा है किधर का इश्क़,
दिल की ही रह-गुज़र के जो सरदार हम नहीं।
उल्फ़त में जिसकी हमने है खुद को भुला दिया,
जाएंगे उसको मिल भी वो बीमार हम नहीं।

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रहीम होशंगाबादी (पंद्रहवां स्थान)
ज़र की इनायतों के तलबगार हम नहीं।
अदना तो हैं, यतीम भी ज़रदार हम नहीं।
हमको मिली है, अपनी विरासत में नैमतें,
अरसे से हैं फ़कीर ख़रीदार हम नहीं।
आलिम नहीं हैं, इल्म की इबरत से बहुत दूर,
ज़ाहिर तो हैं, हकीर, गुनाहगार हम नहीं।
चल तो दिए हैं, हम भी सफ़र में शहर की सिम्त,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
कितने मिले फ़रेब ज़माने में बेशुमार,
ज़ाहिर में, हादिसों के ख़तावार हम नहीं।
यू ंतो दर-ए-हबीब झुकाते हैं सर भी हम,
क़ाबिल तो हैं, पनाह के हक़दार हम नहीं।
-छोटी मसजिद के पास, भीम वार्ड
पो. बीना, जिला-होशंगाबाद
मोबाइल नं.7580222901

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चंद्रा लखनवी (सोलहवां स्थान)
तेरी तरह बदलते हैं दिलदार हम नहीं।
होंगे हज़ार तेरे तलबगार हम नहीं।
तुम चाहे जिस तरह से गुज़ारो ये जि़न्दगी,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
रद्दो बदल ज़माने का दस्तूर है मगर,
आबो हवा बिगाड़ दें हक़दार हम नहीं।
अपनी वफ़ा के किस्से सुनाते फिरे हैं जो,
उनकी तरह से वाक़ई बीमार हम नहीं।
हमको ग़ुरूर है कि वतन के लिये हैं हम,
जां देंगे मुल्क़ के लिये गद्दार हम नहीं।
-922,जनकपुरी, बरेली, मोबाइल नं.9808222545
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आमिल सुल्तानपुरी (सत्रहवां स्थान)
खुद अपने दिल से बरसरे पैकार हम नहीं।
ऐसे दिवाने ऐसे तो बीमार हम नहीं।
वो बुज़दिली की लिखता रहा दास्तां नई,
इल्ज़ाम मुझ पे रक्खा वफ़ादार हम नहीं।
खुद को तुम्हारे इश्क़ में कर ही दिया फ़ना,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
तहज़ीबे नौ के पन्नों में हम तो समा गये,
हर कुफ़्र था लरज़ता वो तलवार हम नहीं।
लेता रहा है इम्तेहां हर एक मोड़ पर,
तुझ पर से मगर ऐ दिल कभी बेज़ार हम नहीं।
-प्यारे पट्टी, सुल्तानपुर, मोबाइलः 9450716540
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डाॅ. वजहुल क़मर सिद्दीक़ी (अठाहवां स्थान)
यंू तो हमारा दावा है गद्दार हम नहीं।
उनकी ज़ुबां से सुनिए वफ़ादार हम नहीं।
सद्दाम चढ़ के फांसी पे ऐलान कर गया,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
दिल और दिमाग़ चश्म हैं सब आप के लिए,
फिर आप कह रहे हैं कि दिलदार हम नहीं।
बेशक़ कि तेरी ज़ात है मुख़्तार व क़दीर,
एक नफ़् एक क़दम के भी मुख्तार हम नहीं।
आह-ओ-फ़ुगां-ओ-नाला-ओ-फरियाद सब किया,
इलज़ाम इस पे है कि रवादार हम नहीं।
नज़रों से पूछते हैं कि हूं कौन कैसा हूं,
बोले कोई जु़बां से तरहदार हम नहीं।
-नज़दीक हनीफ़ इंटर कालेज, लोलेपुर
सुल्तानपुर, मोबाइल नं.9451558318

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तरंनुम बद्र शमा (उन्नीसवां स्थान)
कैसे कहा कि तेरे परस्तार हम नहीं।
बच्चे इसी ज़मीं के हैं अग़यार हम नहीं।
तेरी खुशी थी रास्ते हमने बदल लिये,
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
कु़र्बान कर दी जान तक अब्दुल हमीद ने,
इलज़ाम पर यही है वफ़ादार हम नहीं।
इस गोद में पले हैं मुज़ाहिद वली नबी,
मां है मताए कूचा-ओ-बाज़ार हम नहीं।
नस्लों से हमने पाई है नस्लों को जाएगी,
यूं बेच देंगे इज़्ज़त-ओ-दस्तार हम नहीं।
-सेनानी बिहार कालोनी, गोरा बारिक अहमट
सुल्तानपुर, मोबाइल नंबर: 9839694922

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पीयूष द्विवेदी ‘पूतू’ (बीसवां स्थान)
सोचो सुकूं से बैठ ख़तावार हम नहीं।
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं।
माना तुम्हारी याद में रोये कभी-कभी,
मत सोचिये कि इश्क़ में बीमार हम नहीं।
मेरे खुतूत पढ़ न सके ग़ौर से कभी,
कहते फिरें यही कि तरफदार हम नहीं।
सच्ची कहें कि झूठ नहीं बोलते सुनो,
नित बेचते हैं देश को गद्दार हम नहीं।
अब आरजू रही नहीं हमें जुस्तजू रही,
मिट तिश्नगी गयी यूं तलबगार हम नहीं।
मैं तो तुम्हारी चाह में फिरता गली गली,
अब कर दिया मना कि मददगार हम नहीं।
तू खा गयी री भूख न जाने किसे-किसे,
सबको पता न क्योंकि ख़बरदार हम नहीं।

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