किताबों का कोई विकल्प नहीं, इनसे बेहतर कोई दोस्त नहींः डॉ. सरोज सिंह
डॉ. सरोज सिंह वर्तमान में सीएमपी डिग्री कॉलज में हिन्दी की विभागाध्यक्ष हैं। हिन्दी साहित्य की विद्वान शिक्षक, प्रखर विचारक तथा अपने विचारों को स्पष्ट तथा सटीक रूप से रखने वाली गंभीर आलोचकं है। साहित्य सृजन के लिए आपको अब तक सर्जनपीठ शिखर सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान, नेशनल बिल्डर एवार्ड, शान-ए-इलाहाबाद सम्मान आदि से विभूषित किया जा चुका है। आपका जन्म कलकत्ता में हुआ। प्रारंभिक जीवन कलकत्ता में व्यतीत होने के कारण, आपकी एम फिल तक की शिक्षा कलकत्ता के बांग्लाभाषी विद्यालयों तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय से हुई। एस एस जालान गर्ल्स कालेज, कलकत्ता में दो साल तक पढ़ाने, एवं केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक, बैंक में राजभाषा अधिकारी जैसे विभिन्न पदों पर कार्य कर चुकी हैं। आपने डीफिल की उपाधि, इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय से प्राप्त की। हिंदी भाषा में मध्यकालीन साहित्य, स्त्री विमर्श आलोचना तथा हिंदी गद्य साहित्य पर आपकी विशेषज्ञता है। अब तक आपकी लिखी चार पुस्तकों तथा दो संपादित पुस्तकों सहित नवासी (89) शोध आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’ ने इनसे, इनके शैक्षिक, साहित्यिक जीवन के साथ-साथ स्त्री विमर्श तथा हिंदी भाषा संबंधित विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत बातचीत की है। प्रस्तुत है इस बातचीत पर आधारित प्रमुख अंश-
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डॉ. सरोज सिंह |
सवाल: आपकी प्रारंभिक शिक्षा कहां हुई, और हिंदी भाषा तथा हिन्दी साहित्य में आपका रुझान कब, क्यों और कैसे हुआ?
जवाब: मेरा जन्म कलकत्ता महानगर में हुआ और पूरी प्रारंभिक शिक्षा हायर सेकेंडरी, सेकेंडरी, ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और एम फिल तक की हमारी शिक्षा कलकत्ता में ही हुई। मेरी मां मुझे, साइंस पढ़ाकर डॉक्टर बनाना चाहती थी लेकिन मेरा उसमें कोई रुझान नहीं था। बचपन से लिट्रेचर पढ़ने का बहुत शौक था। मैंने हिन्दी, इतिहास, शिक्षाशास्त्र और एक भाषा के रूप में इंग्लिश लेकर स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में (पूरी यूनिवर्सिटी में फर्स्ट क्लास फर्स्ट) पास की। बीए में मेरी शादी हो गई लेकिन मेरे पति एवं घर वालों का पूरा सपोर्ट मुझे मिलता रहा। कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम ए (गोल्ड मेडल) तथा बीएड किया। मेरे पिताजी भी स्वयं टीचर थे और उनका यह मानना था कि लड़कियों के लिए टीचिंग से बेहतर कोई और जॉब नहीं होती है। मैंने सन 1993 में इलाहाबाद में इंटरव्यू दिया और मेरी पोस्टिंग सीएम पी डिग्री कालेज इलाहाबाद में हुई और 1 फरबरी 1994 में मैंने ज्वाइन कर ली।
सवाल: साहित्य, समाज में व्याप्त सम्वेदनाओं को उभार कर समाज के सामने प्रदर्शित करने का एक सशक्त माध्यम है, इस कथन से आप कहां तक सहमत हैं?
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डॉ. सरोज सिंह का इंटरव्यू मोबाइल में रिकार्ड करते अशोक श्रीवास्तव ‘कुमुद’। |
जवाब: साहित्यकार, एक सामाजिक प्राणी की तरह अपने आस-पास तमाम तरह की गतिविधियों को घटित होते, देखता रहता है और वहीं से वो अपना कच्चा माल इकट्ठा करता है। लेकिन वो कोई पत्रकार नहीं है कि यथाशीघ्र या यथानुसार वो वस्तुस्थिति और घटनाक्रम को, रिपोर्ट की तरह प्रस्तुत कर दे। साहित्यकार किसी भी पहलू को बहुत सम्वेदना के साथ प्रस्तुत करता है। इतिहास या किसी घटना को भी, अगर कोई साहित्यकार, कहानी या उपन्यास में प्रस्तुत करता है तो उसमें उसकी अपनी सम्वेदना भी होती है। जैसे प्रेमचन्द ने कृषक और महिलाओं पर बहुत लिखा है। बहुत सारी महिलाओं ने भी अपने ऊपर बहुत कुछ लिखा है। लेकिन जब प्रेमचन्द के साहित्य को आप पढ़ते हैं तो ये लगता है कि वो सहानुभूति से उत्प्रेरित होकर लिख रहे हैं। जब आप कृषक जीवन के बारे में कहानी पूस की रात, गोदान या आप प्रेमाश्रम पढ़ते हैं तो पूरे पूर्वांचल के भारतीय समाज का परिदृश्य, आपके सामने उपस्थित होता है। हम और आप अक्सर इन दृश्यों को देखते हैं लेकिन कथाकार, जमींदार के शोषण के तरीके, शोषण-चक्र, तमाम सामाजिक बंधन और कृषक की नियति को अपनी पारखी दृष्टि से कुशलतापूर्वक व्यक्त करता है। जिसके बीच वो मरजाद के लिए अपनी मर्यादा के लिए हमेशा व्याकुल रहता है। उन सभी को सम्वेदना के साथ वो प्रकट करता है। वो घटना को ज्यों का त्यों प्रकट नहीं करता है और यही साहित्यकार की खूबी होती है कि जब वह किसी भी विषय को पकड़ता है तो वो उसको बड़ी ही सम्वेदना के साथ प्रस्तुत करता है। स्त्रियां अगर स्त्री संबंधित किसी चीज को लिखेंगी तो उसमें स्वानुभूति होगी ये लगेगा कि वो स्त्री है और स्त्री की पीड़ा को उसके दुख-दर्द को, उसकी तकलीफ को ज्यादा महसूस कर सकती है। पुरूष वैसा महसूस नहीं कर सकता है। स्वानुभूति और सहानुभूति है लेकिन साहित्यकार की अनुभूति, सम्वेदना उससे अलग है वो उसको लेखक या रचनाकार बनाती है और रचना को कालजयी बनाती है।
सवाल: आधुनिक साहित्य एवं मध्यकालीन साहित्य में मुख्य अंतर क्या है ?
जवाब: मध्यकाल को हम लोग दो भागों, पूर्व मध्य काल और उत्तर मध्य काल में बांटते हैं। पूर्व मध्यकाल को हम भक्तिकाल और उत्तर मध्यकाल को रीति काल कहते हैं। पूरा का पूरा भक्तिकाल परिवेश, भक्ति आंदोलन से जुड़ा था। वहां जाति, धर्म,वर्ण,संप्रदाय का कोई भी स्वरूप नहीं था। वो एक तरह से जन आंदोलन था। लोक जागरण था लेकिन परिवेश सामंती था। सामंती परिवेश की जो आम नियति होती है, उसकी वो पीड़ा सभी वर्ग के लोग झेल रहे थे लेकिन वहां कोई बंधन नहीं था। धीरे-धीरे जब विकास क्रम की ओर हम आते हैं तो रीति काल में देखते हैं कि जो वहां भक्ति का स्वरूप था चाहे वो सूफियों की या संतो की या सगुण संप्रदाय के कवियों की भक्ति हो, वो धीरे-धीरे लौकिकता को ग्रहण कर रही थी। जो अलौकिक राम और कृष्ण थे वो लौकिक धरातल पर आ गए थे। वहां स्त्री का भी जो शृंगारिक चित्रण हो रहा था, वो बहुत मांसल्य, दैहिक चित्रण हो रहा था। वो उस समय के राजाओं को तो मुग्ध कर, उनकी वासना की तृप्ति कर रहा था लेकिन आम जनता के लिए कोई उपयोगी नहीं था। जहां भक्तिकाल आम जनता, आम मनुष्य के लिए प्रेरक था; वहां रीति काल केवल कलापक्ष की दृष्टि से आगे बढ़ रहा था। अगर हम कुछ कवियों को छोड़ दें तो उसमें कहीं न कहीं जीवन का पक्ष छूट रहा था। लेकिन जब हम रीति मुक्त कवियों घनानंद, आलम, आदि को देखते है तो वहां जीवन एवं व्यक्तिकता के साथ-साथ, सामाजिकता का भी स्वरूप देखने को मिलता है। लेकिन जब आधुनिकता का प्रारंभ हुआ तब वहां सबसे बड़ा कार्य नवजागरण का हुआ, पुनर्जागरण हुआ। पुनर्जागरण उन सारी सुप्तावस्था से जागरण का काल था। मध्यकाल से धीरे-धीरे आगे की ओर अग्रसर होकर अंग्रेजी काल में हमारे देश की तमाम प्रगति के साथ-साथ हमारी मानसिक प्रगति भी हुई। सती विवाह, बाल विवाह, विधवा विवाह, जैसे तमाम तरह के समाज सुधार हुए तो आधुनिकता का समावेश हुआ। साथ-साथ, भाषा के स्तर पर भी हमको बहुत बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है। मध्यकाल की भाषा मूल रूप से अवधी या ब्रज भाषा थी लेकिन आधुनिक काल में आते आते भारतेंदु युग, द्विवेदी युग के प्रारंभ तक ब्रज भाषा का प्रभाव तो रहता है लेकिन बाद में खड़ी बोली अपना स्थान ग्रहण कर लेती है और खड़ी बोली का स्वरूप अपने विराट और विशाल कलेवर में दिखाई देने लगता है। धीरे धीरे उसी सोपान पर आगे चलकर, भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नयी कविता, समकालीन कविता और आज हम जहां पर है वो इसी आधुनिकता के ही कारण है। धीरे धीरे उसका प्रभाव भाषा, शैली, प्रवृत्तियों और विशेषताओं के स्तर पर भी बदलता चला गया। जहां मध्यकाल में नारी के स्वरूप पर तुलसीदास कहते है।
ढोल गँवार शूद्र पशु नारी,
ये सब ताड़न के अधिकारी।
तो रीति काल में घनानंद कहते हैं-
रावरे रूप की रीत अनूप, नयो नयो लागत ज्यौं ज्यौं निहारियै।
त्यौं इन आँखिन बानि अनोखी अघानि कहूँ नहिं आनि तिहारियै।।
बिहारी या केशव नारी का अलग चित्रण करते हैं लेकिन जब आप आधुनिक काल में आते हैं, तो प्रसाद कहते हैं-
नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास-रजत-नग पगतल में।
पीयुष-स्रोत-सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में।
इस तरह से साहित्य में क्रमिक बदलाव दिखाई देता है।
सवाल: साहित्य में पितृसत्ता के विरोध और स्त्री विमर्श को आप किस तरह देखती हैं?
जवाब: यह सामान्य कथन है कि समाज में पितृसत्ता का बहुत हस्तक्षेप रहता है और पितृसत्ता ने ही स्त्रियों के लिए समाजिक रूढियां तथा बंधन बनाए हैं। स्त्रियों को यह तथा पुरूष को यह करना चाहिए। मगर विचार किया जाए तो पितृसत्ता का पोषक, स्त्री एवं पुरूष दोनों ही हो सकते हैं। अत: हम केवल पुरूष को ही इसके लिए, हर जगह, दोष नहीं दे सकते। मेरे विचार से स्त्री-पुरूष दोनों ही समाज के लिए बहुत जरूरी हैं। एक के अभाव में समाज का निर्माण नहीं हो सकता और इसी लिए दोनों का अन्योन्याश्रित संबंध है। हम अगर केवल पितृसत्ता का विरोध करते रहें और ये सोचें कि पितृसत्ता का पोषक केवल पुरूष है तो मुझे अपने पिता, पति से घृणा होगी और तत्पश्चात अपने बेटे से भी घृणा होगी। एक बार मान लेते है कि स्त्री, पिता से घृणा कर सकती है, पति को भी छोड़ सकती है, लेकिन पुत्र मोह को नही छोड़ पाती। अतरू पुरूष हमारा विरोधी नहीं है। हमारे देश में बंगाल या नार्थ ईस्ट में बहुत से मातृसत्तात्मक समाज हैं। मेरी परवरिश बंगाल में हुई है। मैंने वहां देखा कि वहां बेटियों का बहुत मान है। वहां बहु को भी बहुमाँ, बेटी को भी बेटीमाँ कहते हैं। वो माँ शब्द उनके लिए इतना पवित्र है कि वहां समाज में, मातृसत्तात्मक रूप है।
पितृसत्ता से मेरा केवल इतना विरोध है कि जो उसकी रूढ़ियां या मान्यताएं कहती हैं कि लड़कियों को यह करना चाहिए और लड़को को यह करना चाहिए, उन मान्यताओं को मैं अस्वीकार करती हूँ। आज कोई ऐसा काम नहीं है जो लड़के कर सकते हैं और लड़कियां नहीं कर सकती। क्या खाना बनाना, झाड़ू-पोछा, बरतन मांजना केवल लड़कियों का काम है। ये लड़कों का काम नहीं है। बड़े बड़े होटलों में जो खानसामे, बाबर्ची, शेफ पुरूष होते हैं वो, महिलाओं से बेहतर, लाजवाब और लज़ीज खाना बनाते हैं। अतरू कोई काम, पुरूष या स्त्री विशेष का नहीं होता, जनाना और मर्दाना नहीं होता। वो हम सबके कार्य होते हैं। मैं आज जहां खड़ी हूं उसके पीछे भी किसी न किसी पुरूष का ही सहयोग था। मेरे पिता ने, अगर मुझे पढ़ाया नहीं होता, इतना सोचने-समझने की शक्ति तथा अवसर नहीं दिया होता, तो आज मैं जहां पर हूँ वहां कभी भी नहीं पहुँच पाती और दूसरा अगर मेरे पति ने, मुझे इतना सहयोग न दिया होता कि मैं, बिना रोक-टोक के अपने अनुसार पढ़ूं-लिखूं तो मैं इतना आगे नहीं बढ़ पाती और इसमें मेरे बच्चों का भी बहुत योगदान है। अतरू सफलता में कहीं न कहीं पूरे परिवार का योगदान रहता है।
सवाल: कामकाजी महिलाओं के लिए घर और ऑफिस के कार्यों को संतुलित रख कर पारिवारिक तथा सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य है ?
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अवार्ड प्राप्त करतीं डॉ. सरोज सिंह |
जवाब: आपका प्रश्न बहुत वाजिब है। दोनों ही क्षेत्रों में किसी भी महिला के लिए, अपने आपको बेहतर साबित करना बहुत मुश्किल होता है। अगर आपको समाज और घर वालों के बीच, दोनो जगह स्थान बनाना है तो आपको दोनों में सामंजस्य बैठाना होगा। जब आप अपने पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति करेंगे तो मानसिक रूप से, अपने घर की ओर से, संतुष्ट रहेंगे। किसी को आप के प्रति कोई असंतोष नहीं होगा। जब आप संतुष्ट होकर घर से निकलेंगे तब आप, अपने आपको, बाहर भी बेहतर साबित कर सकते हैं। स्त्रियों को इतना समझना होगा कि जो कामकाजी महिलाएं हैं, उनको घर-बाहर, दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा। यह नहीं कि हम नौकरी कर रहे हैं तो हम घर के कार्य का बहिष्कार कर दें। घर की मालकिन-गृहस्वामिनी भी तो हम ही हैं। हम पति की कमाई पर, अधिकार के साथ-साथ, अपनी जिम्मेदारियों का कितना निर्वहन करते हैं ? वो हमें अपने अंदर झांकना होगा। उसकी पूर्ति करना होगा। जब हम उसकी पूर्ति कर लेंगे, तो जब हम अपने कॉलेज में आएंगे, तो विद्यार्थियों को बेहतर से बेहतर शिक्षा दे सकेंगे। आप महसूस कीजिए कि जो पढ़ी लिखी महिलाएं, तीस-चालीस साल की उम्र तक नौकरी नहीं करती हैं, उनके अंदर उदासीनता की भावना, फ्रस्ट्रेशन आ जाता है किषपढ़ाई का कोई उपयोग नहीं हो रहा है। मैं अपने विद्यार्थियों, खासकर लड़कियों को बहुत प्रोत्साहित करती हूँ कि बेटा तुम्हारे ऊपर जो जिम्मेदारी है, उसका निर्वहन करो। समझ लो कि तुम नवदुर्गा हो। कर्मयोगी की तरह जितना कार्य करोगी उतनी तुम्हारी शक्ति भी बढ़ेगी।
सवाल: एक सामान्य कथन है कि साहित्य रचना आपको आत्मिक सुख एवं प्रसिद्धि तो प्रदान कर सकती है परंतु आपकी क्षुधा पूर्ति हेतु आजीविका का साधन नहीं हो सकती है ?
जवाब: आपका प्रश्न इसलिए बहुत सही है कि हिंदी हमारी मातृभाषा है और खासकर यह हिंदी प्रदेशों की समस्या है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ क्षेत्रों में हिन्दी भाषा-भाषी बहुत हैं और उन्हे लगता है कि हिंदी हमारी मातृभाषा है इसलिए हम सब कुछ कर सकते हैं। मगर देखा जाए तो हिंदी में ज्यादातर वर्तनी की अशुद्धियां और उच्चारण दोष, इन्हीं प्रदेशों के लोग करते हैं। अगर आप इससे बाहर निकलकर देखें तो अन्य जगहों में, हिंदी भाषा के प्रति बहुत रुझान है। मैं बंगाल में, पैदा हुई। वहां पढ़ी-लिखी। मुझे पता नहीं था कि उस समय हिन्दी में क्या स्कोप हो सकता है। लेकिन अभिरूचि थी तो मैंने उसमें बेहतर किया। आज मैं जिस मुकाम पर हूँ, वो हिन्दी की वजह से ही संभव हुआ है। चार नौकरी छोड़ने के पश्चात, यह मेरी पांचवी नौकरी है। अगर मैं हिन्दी के अलावा कोई और विषय पढ़ रही होती तो शायद मुझे इतनी नियुक्तियां नहीं मिलती। मेरा यह मानना है कि जो भी विषय आप पढ़िए उसको अपना 100ः दीजिए। आप अगर हिन्दी पढ़ रहे हैं तो उसको इतना बेहतरीन बनाइये कि लोग आपसे सीख लेकर हिंदी की ओर अग्रसर हों। बच्चों को प्रयोजनमूलक हिन्दी पढ़ाते समय, हम लोग बताते हैं कि हिन्दी की उपयोगिता तब ही है जब हिंदी में आप दक्ष हों।
सवाल: नौजवानों में हिंदी साहित्य के पठन-पाठन एवं सृजन के प्रति निरंतर घटते रुझान तथा परिणामस्वरूप प्रिंट मीडिया के निरंतर क्षय के संबंध में आप सोचती हैं ?
जवाब: आज की युवा पीढ़ी, प्रिंट मीडिया से एकदम दूर होती जा रही है। हम लोग के जमाने में पुस्तकें ही पढ़ने का एकमात्र सहारा थीं और पुस्तकालय माध्यम था। पुस्तकालय मे जाकर या किताबें खरीदकर हम लोग पढ़ते थे। आजकल की पीढी के अंदर धैर्य की कमी है। वो चाहते हैं कि कम से कम समय में, ज्यादा से ज्यादा ज्ञान प्राप्त हो जाय और इस सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में, गूगल सर्च कर, उसी के माध्यम से पढ़ाई करते हैं। उनको पीडीएफ चाहिए। सब कुछ उनको परोसा हुआ चाहिए। उनको कुछ बनाना नहीं है। पुराने दौर में, अपने नोट्स बनाकर फिर पढ़कर, हम लोग परीक्षाएं देते थे। आजकल के बच्चों का रुझान ही उस ओर नहीं है कि अध्यन और गहन अध्यन कैसे किया जाता है। वो सतही ज्ञान अर्जित करते हैं। इसी वजह से भविष्य में, किसी के पास रोज़गार होता है और किसी के पास रोज़गार नहीं होता। मेरा ये मानना है कि प्रिंट मीडिया का, किताबों का आज भी कोई विकल्प नहीं है।
सवाल: आजके बदलते दौर में, साहित्यिक विकास में सोशल प्लेटफॉर्म को आप किस तरह से देखते हैं।
जवाब: मैं, सोशल मीडिया की विरोधी नहीं हूँ। इससे आपके ज्ञानार्जन के साथ-साथ आपके समय का दुरूपयोग भी कहीं न कहीं होता है। जो समय आप पठन-पाठन में देना चाहते हैं, वो समय, सोशल मीडिया पर चौटिंग में चला जाता है। पहले आप जो पूरा-पूरा वाक्य लिखते थे, उसको अब एकदम संक्षिप्त करते चले जा रहे हैं। अगर अंग्रेजी में हववक लिखते थे तो अब हक लिखने लगे हैं। बहुत बदलाव हो गए हैं और इस बदलती दुनिया मे इससे न तो आपका भाषा ज्ञान रह जाता है और न आपकी बौद्धिक क्षमता उजागर हो पाती है।
सवाल: आजकल के दौर में साहित्य रचना हेतु नवीन महिला साहित्यकारों के लिए आपका क्या संदेश हैं?
जवाब: महिला साहित्यकारों के लिए, मेरा ये मुख्य रूप से संदेश है कि वे केवल अपने बारे में या अपने लोगों के बारे में या अपने जीवन के ही बारें में न सोचें, अपने साथ-साथ आसपास की दुनिया में उनके अलावा भी बहुत सारी मजदूर, कृषक, दलित, शोषित स्त्रियां है। तमाम देवदासियों के साथ-साथ वेश्यालयों की समस्यायें है। उनकी परिस्थितियों-समस्याओं को देखें, चिंतन-मनन करें। इन सब चीजों को भी उनको देखने की जरूरत है। और अगर इनको, वो एक मुद्दे के तौर पर अपने साहित्य में इस्तेमाल करेंगी तो शायद आजकल के स्त्री लेखन से कल का स्त्री लेखन बेहतर दिखाई देगा।
(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2025 अंक में प्रकाशित)
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