गुरुवार, 3 मई 2012

रोज़ एक शायर में आज- तौक़ीर जै़दी


अपने होंठों पे तबस्सुम ये सजाये रखिए।
दर्द-ओ-ग़म सीने के सीने से लगाये रखिए।
दिल की दुनिया में अंधेरा न कहीं छा जाए,
उनकी यादों के चिराग़ों को जलाए रखिए।
वक़्त पड़ने पे ये खुद ही से उबल जाएगी,
दिल की बातें अभी दिल ही में दबाए रखिए।
काम आते नहीं नाकामी में रिश्ते कोई,
कामयाबी का भरम आप बनाए रखिए।
ये अलग बात है पूरा ना वो होने पाए,
ख़्वाब पलकों पे मगर आप सजाए रखिए।
आपकी इश्क़ को जा जिन्दा-ए-जावेद करे,
लौ लगानी है तो लौ उससे लगाए रखिए।
---
तेरी बात थी तेरा जि़क्र था तेरा साथ था मुझे याद है।
वो सुहाने पल वो थमी घड़ी वो हसीन फि़ज़ा मुझे याद है।
मैं नई डगर नए मोड़ से नए रास्तों से हूं बेख़बर।
मेरे घर सेे जो तेरे घर को है वही रास्ता मुझे याद है।
तू कदम-कदम मेरे साथ था तेरे हाथ में मेरा हाथ था।
तेरी चाह का तेरे प्यार का वहीं सिलसिला मुझे याद है।
मेरी जि़न्दगाीन की धूप में तेरी जुल्फ़ की घनी छांव थी,
वहीं दिल को मेरे सुकून था वही सो गया मुझे याद है।
तुझे सुब्हो-शाम मनाने मैं मेरी सुब्ह-शाम गुज़रती थी,
वो ज़रा ही बात पे दम-ब-दम तेरा रूठना मुझे याद है।
कभी छत पे अपनी टहलता था, कभी छत से नीचे उतरता था,
तेरे वास्ते मेरा दौड़ना मेरा भागना मुझे याद है।
मुझे ख़ूब याद है हमनशीं किसी भीड़ में मुझे देखकर,
तेरे हाथ में वो जो फूल था उसे चूमना मुझे याद है।
किसी राह पे किसी भीड़ में मैं नज़र से तेरी जो ग़ुम हुआ,
मुझे पागलों की तरह से फिर तेरा ढूढ़ना मुझे याद है।

मोबाइल नंबर. 9598981500ए 7860611776

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें