गुरुवार, 28 मई 2015

भोगा हुआ सच है डाॅ. विक्रम की कविताएं- प्रो. फ़ारूक़ी

                                                        
              गुफ्तगू के डाॅ. विक्रम अंक का विमोचन और मुशायरा 

इलाहाबाद। डाॅ. विक्रम की कविताएं बेहद सराहनीय और समाज की कुरूतियों पर प्रहार करती हुई हैं, जिन पर लोग अक्सर बात करने से बचते हैं। जीवन का भोगा हुआ सच डाॅ. विक्रम ने अपनी कविताओं में बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया है। यह बात इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एनआर फ़ारूक़ी ने ‘गुफ्तगू’ के डाॅ. विक्रम अंक के विमोचन अवसर पर कही। कार्यक्रम का आयोजन 17 मई की शाम सिविल लाइंस स्थित बाल भारती स्कूल में साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में किया गया। प्रो. फ़ारूक़ी कार्यक्रम मुख्य अतिथि थे, अध्यक्षता पं. बुद्धिसेन शर्मा और संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया।
वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहाकि ‘गुफ्तगू’ की शुरूआत बहुत ही मुश्किल दौर में इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने की थी। आज यह एक सफल पत्रिका के रूप में जाने-पहचानी जाती है। डाॅ. दीनानाथ ने कहा कि डाॅ. विक्रम ने अपनी कविताओं में दलित साहित्य की मूल चीजें को खोजने का काम साहस के साथ किया है। यह बड़े हिम्मत की बात है। रविनंदन सिंह ने कहा कि डाॅ. विक्रम की रचनाएं दलित चेतना को जागृत करती हैं, हालांकि अब समाजिक स्थितियों में काफी बदलाव आ रहा है। पं. बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि आज के दौर में गुफ्तगू जैसी पत्रिका का सफल प्रकाशन कोई आसान काम नहीं है, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने अपनी मेहनत और सूझबूझ से इसे कायम रखा है, इलाहाबाद से ऐसी पत्रिका का प्रकाशन गौरव की बात है। शिवाजी चंद्र कौशिक, जमादार धीरज और शैलेंद्र कपिल और ने भी विचार व्यक्त किया। दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया, जिसका संचालन शैलेंद्र जय ने किया। सागर होशियारपुरी, शिवपूजन सिंह, नरेश कुमार महरानी, स्नेहा पांडेय, अजीत शर्मा आकाश, प्रभाशंकर शर्मा, वाकि़फ़ अंसारी, संजू शब्दिता, अमित वागर्थ, नईम साहिल, रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, मनीष सिंह, कविता उपाध्याय, मनमोहन सिंह तन्हा, शादमा जैदी शाद, शाहीन खुश्बू, रमेश नाचीज आदि ने कलाम पेश किया।
                                                                                            

पं. बुद्धिसेन शर्मा
प्रो. एनआर फ़ारूक़ी 
मुनेश्वर मिश्र
 शैलेंद्र कपिल 
 इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
शिवपूजन सिंह
वाकि़फ़ अंसारी
संजू शब्दिता
रोहित त्रिपाठी रागेश्वर
मनीष सिंह
कविता उपाध्याय

शादमा जैदी शाद
शाहीन खुश्बू
रमेश नाचीज

शनिवार, 2 मई 2015

प्रो. ओम प्रकाश मालवीय

प्रो. ओम प्रकाश मालवीय
 

                                                                                -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
अपने काम और सक्रियता के दम पर प्रो. ओपी मालवीय ने इतना काम अब तक समाज के लिए किया है कि वे किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है। सक्रिय सामाजिक कार्य से जुड़े रहने के कारण इलाहाबाद में लगभग हर आदमी उनको अच्छी तरह से जानता है। 81 वर्ष की उम्र पार करने बाद भी आज देश और समाज की बेहतरी के लिए काम करने में सक्रिय हैं। इससे पहले भी जब-जब इलाहाबाद में सामाजिक माहौल खराब करने का प्रयास किया गया तब-तब मालवीय जी ने आगे आकर ऐसे प्रयासों को विफल करने में सक्रिय भूमिका निभाई है। 19 सितंबर 1933 को इलाहाबाद के ही कोटवा जमुनीपुर मंे जन्मे श्री मालवीय के पिता का नाम पं. शंभुनाथ मालवीय और माता का नाम रमा देवी मालवीय है। रमादेवी म्यूनीसिपल अपर मीडिल स्कूल में प्रधानाचार्या थीं, उन्होंने समाज की बेहतरी के लिए बहुत कार्य किया है, प्रो. मालवीय पर उनकी कार्य शैली का बहुत अधिक असर पड़ा, यही वजह है कि वे शुरू से ही सामाजिक कार्यों में जुड़े रहे। केसरवानी वैश्य विद्यालय से 1949 में हाईस्कूल और गर्वमेंट इंटमीडिएट कालेज से 1951 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की। इंटरमीडिएट की परीक्षा में पूरे प्रदेश की मेरिट में आप तीसरे स्थान पर रहे। अंग्रेजी, संस्कृत और प्राचीन इतिहास विषय के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और अंग्रेजी विषय से इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही स्नाकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की। एमए की पढ़ाई के दौरान ही ‘विश्व सभ्यता का इतिहास’ और ‘प्राचानी काल में अरब सभ्यता’ नामक पुस्तकंें लिखीं, जिसे काफी समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता रहा है। 
1955 में एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद इसी वर्ष सीएमपी डिग्री कालेज में अध्यापन कार्य से जुड़ गए। 1957 में पीसीएस में चयन होने के बाद आजमगढ़ में डिप्टी कलेक्टर के रूप में नियुक्ति मिली। इनका मन प्रशासनिक कार्यों के बजाए अध्यापन में अधिक लगता था, उनकी इच्छा थी कि देश समाज के निर्माण के लिए बच्चों को पढ़ाना अधिक बेहतर कार्य है। यही वजह है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य के लिए वैकेंसी निकली तो इन्हांेंन आवदेन किया। साक्षात्कार के दौरान इंटरव्यू लेने वालों ने हैरानी से पूछा कि जब आप डिप्टी कलेक्टर के रूप में नियुक्ति पा चुके हैं, तो फिर यहां क्यों आना चाहते हैं? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि बच्चों को शिक्षा देने का कार्य ज्यादा बेहतर समझता हूं। उनके जवाब से इंटरव्यू लेने वाले काफी प्रभावित हुए और इनकी नियुक्ति अंग्रेजी अध्यापक के रूप में हो गई। इन्होंने डिप्टी कलेक्टरी की नौकरी छोड़ दी। यहीं से अध्यापन करते हुए 1991 में सेवानिवृत्त हुए। इन्होंने उस्ताद दिलशाद हुसैन से संगीत की भी शिक्षा ली है, क्लासिकल संगीत में आपकी खास रुचि रही है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के गीतों, फि़राक़ गोरखपुरी के नज़्मों और कालीदास के श्लोक को इन्होंने संगीबद्ध किया है। समय-समय पर होने वाले आयोजन में इन गीतों को अपनी सुरीली आवाज़ में प्रस्तुत करते हैं। अक्सर कार्यक्रमों में इनसे फि़राक़ गोरखपुरी की नज़्म सुनने की फरमाइश की जाती है। अब तक आपने आधा दर्जन से अधिक किताबें लिख चुके हैं, अत्यधिक उम्र होने के बावजूद अपने घर पर ही बच्चों को अंग्रेजी की निःशुल्क शिक्षा देते हैं। विश्वविद्यालय और डिग्री कालेजों के छात्र-छात्राएं इनसे आज भी शिक्षा ग्रहण करने के लिए इनके घर आते हैं। अटाला कब्रिस्तान के अंदर इनके द्वारा किया गया पौधरोपड़ का कार्य लोगों में ख़ासा चर्चा का विषय रहा है, बहुत से लोग इनकेा पौधरोपड़ कराने वाले बाबूजी के नाम से भी पुकारते हैं। इस कार्य में इतनी तन्मयता से लगे रहे कि लोगों ने आरोप लगाया कि पैसा लेकर यह कार्य कर रहे हैं, बाकायदा जांच-पड़ताल करवाई गई। जब हक़ीक़त का पता चला तो आरोप लगाने वाले लोग ही इनका गुणगान करने लगे। 1992 में बाबरी मजिस्द के शहीद होने के बाद पूरा देश दंगों की चपेट में आ गया था। उस दौरान इलाहाबाद में भी कई जगह दंगे हुए, तमाम जगहों पर जानबूझ कर दंगे कराने की कोशिश की गई, तब प्रो. मालवीय ने पूरे शहर में घूम-घूम कर लोगों को शांति और एकता का संदेश दिया, लोगों को दंगों से दूर रहने की सीख दी, इनके साथ इनका पूरा परिवार सुबह से ही निकलता और शाम तक लोगों को शांति और भाईचारे का संदेश देता रहता। तब इनके कार्य को आम जनता के अलावा प्रशासनिक तौर पर भी काफी सराहना मिली। इनकी कोशिश की वजह से ही सैकड़ों परिवार दंगों की चपेट में आने से बचे। पिछले लोकसभा चुनाव में वामपथी दलों के बुरी तरह फेल होने जाने पर इनका कहना है कि अब मध्यम वर्ग के पास अपेक्षाकृत अधिक धन आ गया है, जिसके कारणा लोगों में संघर्ष की प्रवृत्ति खत्म सी हो गई है, उपर से खासतौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जातिगत आधार पर राजनीति होने लगी है, जिसके कारण वामपंथी आंदोलन एक तरह प्रभावी नहीं दिख रहा है, इसके लिए नये सिरे से प्रयास करने की ज़रूरत है। प्रगतिशील लेखक संघ की बागडोर भी अब सही लोगों के हाथ में नही ंहै।
प्रो. मालवीय ने पांच पुत्र हैं। अमिताभ मालवीय भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। आनंद मालवीय सांख्यिकी विभाग में नौकरी करते हैं, प्रियदर्शन मालवीय लखनउ में आरटीओ हैं। शुभदर्शन मालवीय और परिमल मालवीय इलाहाबाद हाईकोर्ट में सेक्शन आफिसर हैं। वर्तमान समय में आप मालवीय नगर मुहल्ले में रहते हैं।
(‘गुफ्तगू’ के मार्च-2015 अंक में प्रकाशित)

रविवार, 26 अप्रैल 2015

गुफ्तगू के मार्च-2015 अंक में

3.ख़ास ग़ज़लें (फि़राक़ गोरखपुरी, दुष्यंत कुमार, शकेब जलाली, मेराज फै़ज़ाबादी)
4.संपादकीय: साहित्य को तमाशा बना दिया
5-6. डाक (आपके ख़त)
ग़ज़लें 
7. बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, इब्राहीम अश्क
8.बुद्ध्सिेन शर्मा, सागर होशियारपुरी, ज़फ़र मिजऱ्ापुरी, नज़र कानपुरी
9.मनीष शुक्ल, असद अली असद, राकेश मलहोत्रा ‘नुदरत’
10. उद्धव महाजन बिस्मिल, अरुण अर्णव खरे, आर्य हरीश कोशलपुरी, सुशील साहिल
11. इश्क़ सुल्तानपुरी, जसप्रीत कौर फ़लक़, महेश अग्रवाल, हुमा अक्सीर
12.अखिलेश निगम ‘अखिल’, क़मर आब्दी
कविताएं 
13.परवीन शाकिर, कैलाश गौतम
14.बुद्धिनाथ मिश्र, शैलेंद्र कपिल
15.केदारनाथ सविता, स्नेहा पांडेय, भानुमित्र
16.डा. अली अब्बास उम्मीद, प्रभाशंकर शर्मा, नईम खान
17.खुर्शीद खैराड़ी, प्रशांत तिवारी
18.हर्ष त्यागी, लोकेश श्रीवास्तव,
19. सायमा युसुफ अंसारी, मुकेश कुमार मधुकर
20-21.तआरुफ: अमित वागर्थ
22-24. चैपाल: आम आदमी साहित्य से दूर क्यों हो रहा है?
25-29.विशेष लेख: साहित्य और संस्कृत का संकट - डाॅ. सादिका नवाब ‘सहर’
30-32.इंटरव्य: धनंजय कुमार (अमेरिका)
33-35.तब्सेरा ( परिंदे, करुणा जिस दिन क्रांति बनेगी, लख्ते हाय दिल, क़तरा-क़तरा दरिया)
36-39. अदबी ख़बरें
40-44. कमलेश भट्ट कमल के सौ शेर
45-46. बेरली के साहित्यकारों के मोबाइल नंबर
47-48. इल्मे क़ाफि़या भाग- 16
49-50. गुलशन-ए-इलाहाबाद: प्रो. ओम प्रकाश मालवीय
परिशिष्ट: डाॅ. विक्रम
51-53. परिचय
54-56. डाॅ. विक्रम की कविताएं और दलित अस्मिता- जमादार धीरज
57-58. संघर्ष और इतिहास बोध का दर्शन कराती कविताएं- डाॅ. दीनानाथ
59-63. दलित अस्मिता के संघर्ष का साक्ष्य कराती कविताएं- डाॅ. भूरे लाल
64-80. डाॅ. विक्रम की कविताएं

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सोमवार, 6 अप्रैल 2015

काव्य गोष्ठी में बही कविताओं की बयार


इलाहाबाद। साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में 22 मार्च की शाम काव्य गोष्ठी एवं नशिस्त का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता बुद्धिसेन शर्मा ने की, मुख्य अतिथि नायाब बलियावी थे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया।
सबसे पहले युवा कवि मनीष सिंह ने कविता पेश की-
आंखों में सपने लेकर उड़ना चाहा नीले आकाश में,
मोड़ना चाहती थी संसार को सच की तरफ इस विश्वास में।
चाहती थी फर्क बताना जिन्दा और मुर्दा लाश में,
परिवर्तन तो हो जाता है अगर हिम्मत हो हर सास में।
प्रभाशंकर शर्मा ने कहा-
अबकी भाई हम फंसिन गए, अंधरन के आंख-मिचैली में।
चेहरे की सारी चमक गई, रगड़ाई गए हम होली में।
रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’ की कविता यूं थी-
दुश्मनों का जोर इतना था कि क्या करते,
एक तरफा शोर इतना था कि क्या करते।
इसलिए महफिल में आया हूं अदब की दोस्तो,
दिल मेरा कमज़ोर इतना था कि क्या करते।
डाॅ. शाहनवाज़ आलम-
पत्थरों से सवाल करते हो, यार तुम भी कमाल करते हो।
पूछते क्यों नहीं ज़माने से, आइने से सवाल करते हो।

लोकेश श्रीवास्तव की कविता यूं थी-
खाना बना चुकने के बाद, इंतज़ार कर रहा हूं मैं।
उस भूख का जो, सिर्फ़ भोजन की ही है।

अजय कुमार ने कहा-
जब जब उनका आना होगा, आंखों को समझाना होगा।
कब तक भागूंगा सच में मैं, इक दिन तो अपनाना होगा।

अनुराग अनुभव ने तरंनुम में ग़ज़ल पेश किया-
तंज भी समझती है फब्तियां समझती हैं,
हर नज़र की फितरत को लड़कियां समझती हैं।

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा-
शक्ल पर तो शराफ़त मिली, और भीतर सियासत मिली।
आदमी तो हजारों मिले, कम मगर आदमीयत मिली।

शाहिद अली शाहिद ने कहा-
शिकस्ते खवाब का इक सिलसिला अभी तक है।
मेरे खिलाफ़ मेरा हमनवा अभी तक है।

नायाब बलियावी ने तरंनुम में प्रभावी ग़ज़ल पेश किया-
तेरी इक तरफ़ की कशिश ने ही मेरी जि़न्दगी को बचा लिया।
तू ग़ज़ल का शहरे हसीन है मैं तो एक उजड़ा दयार हूं।

बुद्धिसेन शर्मा ने कहा-
अभी सच बोलता है ये, अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा।
अगर डांटोगे तो बच्चा बहना सीख जाएगा।

 धर्मेंद्र श्रीवास्तव ने सबके प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया

शिवपूजन सिंह, नरेश कुमार ‘महरानी’, अखलाक खान,संजय सागर आदि ने भी कलाम पेश किया। 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

‘मीडिया हूं मैं’ में कई अनछुए पहलू-रवीन्द्र कालिया


मीडिया की दो किताबों का विमोचन और सात लोगों का सम्मान
इलाहाबाद। जयप्रकाश त्रिपाठी की पुस्तक ‘मीडिया हू मैं’ में कई अनछुए पहलू हैं, जिसे पढ़कर बहुत सी जानकारियां हासिल हो जाती है। मीडिया जगत मेें हो रही गतिविधियां और क्रियाकलापों को जानने के लिए यह किताब हर किसी को पढ़ना चाहिए। यह बात प्रसिद्ध साहित्यकार रवींनद्र कालिया ने पुस्तक ‘मीडिया हूं मैं’ और ‘क्लास रिपोर्टर’ के विमोचन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि कही। कार्यक्रम का आयोजन 08 फरवरी को सिविल लाइंस स्थित बाल भारती स्कूल में किया गया।  अध्यक्षता प्रो. अमर सिंह ने की। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया।

अपने संबोधन में श्री कालिया ने कहा कि आज मीडिया का स्वरूप बहुत व्यापक हो गया है, इसे देखने और समझने की जरूरत हैं। ममता कालिया ने कहा कि पत्रकार के पास कलम, कागज और कैमरे के अलावा और कुछ नहीं रहता, बेहद असुरक्षा के माहौल में काम करता है, जबकि मामूली नेता भी तमाम तरह की सुरक्षा व्यवस्था के बीच चलता है। पुुस्तकों के लेखक जयप्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि पिछले 34 वर्षों में मीडिया की जो दशा मैंने देखी है, उसे सही रूप से रेखांकित किया है, बहुत चीजें इसमें शामिल हैं, जिनका उल्लेख किया जाना जरूरी था। रविनंदन सिंह ने कहा कि यह संयोग है कि 9 फरवरी 1926 को ‘उदंड मार्तंदंड’ नामक सबसे पहले हिन्दी अखबार के प्रकाशन का काम शुरू हुआ था, और आज के दिन मीडिया की दो किताबों का विमोचन हुआ। धनंजय चोपड़ा ने कहा कि पत्रकारिता क्षेत्र में आने वाले नए लोगों को ये किताबें जरूर पढ़नी चाहिए। क्योंकि अब तक जो किताबें लिखी गई हैं वो अध्यापकों की ही हैं, जिसमें सैद्धांतिक बातें तो हैं लेकिन प्रायोगिक बातें नहीं हैं। लेकिन इन दोनों किताबों में प्रायोगिक सामग्रीा प्रचुर मात्रा में हैं। पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि मीडिया में रहते हुए इन बातों को रेखांकित करना बेहद खास हैं।बुद्धिसेन शर्मा ने कहा कि आज दौर गुफ्तगू पत्रिका जिस तरह से निकल रही है, वह अपने आपमें एक बड़ी बात है, वर्ना बड़े पूंजीपति घरानों की पत्रिकाएं बंद हो चुकी है। ऐसे में हमें इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के इस कारनामे की प्रशंसा करनी पड़ेगी। प्रो. अमर सिंह, और अनिल शर्मा ने भी विचार व्यकत किया। शिवपूजन सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस मौके पर नरेश कुमार महरानी, संजय सागर, प्रभाशंकर शर्मा, डॉ. शाहनवाज़ आलम, इश्क सुल्तानपुरी, अजय कुमार, अनुराग अनुभव, लोकेश श्रीवास्तव, रमेश नाचीज, अमिताभ त्रिपाठी, रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, मोनिका मेहरो़त्रा, अखिल गुप्ता, शुभांगी गुप्ता, नरेंद्र सिंह, ज्ञानेंद्र विक्रम, सागर होशियारपुरी, अख़्तर अज़ीज़, तलब जौनपुरी, शाहिद इलाहाबादी, राजेश कुमार श्रीवास्तव आदि प्रमुख रूप से मौजूद रहे।                                                                                                                                                          इलाहाबाद। अपनी गतिविधियों से साहित्यिक कार्यक्रमों को गति पहुंचाने वाले सात लोगों शान-ए-इलाहाबाद सम्मान स्वरूप प्रशस्ति पत्र,शाल और मेमेंटो भेंट किया गया। साहित्यकार रवींद्र कालिया ने कामरेड जियाउल हक, प्रो ओपी मालचीय, जफर बख्त, डॉ. देवराज सिंह, डॉ. राजीव सिंह, धर्मेंद्र श्रीवास्तव और प्रदीप  तिवारी को सम्मानित किया।
सम्मान समारोह के बाद गु्रप फोटो
रवींनद्र कालिया
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
अनिल शर्मा
धनंजय चोपड़ा
मुनेश्वर मिश्र
जय प्रकाश त्रिपाठी
ममता कालिया
शैलेंद्र कपिल
रविनंदन सिंह
प्रभाशंकर शर्मा
अजय कुमार
प्रदीप तिवारी
शिवपूजन सिंह
डॉ. शाहनवाज़ आलम
प्रो. अमर सिंह
कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोग
प्रो. ओपी मालवीय का सम्मान रवींद्र कालिया से ग्रहण करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र
रवींद्र कालिया से सम्मान ग्रहण करते हुए जफ़र बख़्त
रवींद्र कालिया से सम्मान ग्रहण करते हुए डॉ. देवराज सिंह
रवींद्र कालिया से सम्मान ग्रहण करते हुए प्रदीप तिवारी
रवींद्र कालिया से सम्मान ग्रहण करते हुए धर्मेंद्र श्रीवास्तव

रविवार, 18 जनवरी 2015

क्या प्रलेस अपने मौलिक सिद्धांतों से भटक गया हैं ?

 ‘गुफ्तगू’ के दिसंबर में चौपाल कालम के अंतर्गत ‘क्या प्रलेस अपने मौलिक सिद्धांतों से भटक गया हैं ?’ विषय पर प्रो. राजेंद्र कुमार, मुनव्वर राना, प्रो. अली अहमद फ़ातमी, बुद्धिनाथ मिश्र और यश मालवीय के विचार प्रकाशित हुए हैं। इन लोगों ने सच्चाई बयान किया है, प्रगतिशीलता के नाम पर लोगों को बेवकूफ़ बनाने पर जबरदस्त प्रहार है। इसे लेकर छद्म प्रगतिशील लोग काफी भड़के हुए हैं। लोगों को गुफ्तगू के प्रति भड़काने की कोशिश की जा रही है, अफवाहें फैलाई जा रही हैं। इस विषय पर हम अगले अंक में भी आप सबका विचार  प्रकाशित करने जा रहे हैं। नीचे दिए विद्वानों के विचार पढ़ने के बाद आप अपनी राय अधिकतम 200 शब्दों में पासपोर्ट साइज फोटो, संपूर्ण पता मोबाइल नंबर सहित guftgu007@gmail.com   पर मेल कर दें।
 प्रो. राजेन्द्र कुमार-यदि किसी को दिशा नहीं मिल पा रही है तो उसमें आरोप-प्रत्यारोप क्या लगाया जाये। जितने साथी हैं जो चिन्तन करते हैं, उनका सोचना तो चलता है लेकिन व्यवहार में क्रियान्वयन नहीं हो पाता है। परेशानी तब होती है जब व्यवहार और विचार साथ नहीं चलते हैं। इसलिए इसे भटकाव कह लीजिए या कमज़ोरी कह लीजिए। यह कमज़ोरी तो सभी की है जो समाज को लेकर परेशान रहते हैं। प्रलेस एक आन्दोलन था और उसने अपना आन्दोलनात्मक रूप गँवा दिया है। प्रगतिशील लेखक संघ अब केवल बौद्धिक स्तर पर ही चल रहा है। इसलिए इसे कोई सही गति या सही परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। आजकल क्या है कि जो नयी चीज़ें आ गयी हैं, जैसे- भूमण्डलीकरण, बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद आदि। इन सब ने ऐसा सब कुछ छेंक लिया है कि आप कहीं से भी बचकर नहीं निकल सकते। अब ग़ैरज़रूरी चीजों को ज़रूरी बनाया जा रहा है। पुराने जमाने में प्रलेस ने पुरानी रूढ़ियों को तोड़ने की बात की थी और उन्हें तोड़ा भी। लेकिन इस बाज़ारवाद ने जो नयी रूढ़ियाँ बनायी हैं, अब उन नयी रूढ़ियों को तोड़ने की हिम्मत की जाये, तब कुछ बात बने। अब तो बौद्धिकता भी फैशन बन गयी है। उसका भी बाज़ार तैयार हो गया है। बौद्धिकता व विचारों को भी बाज़ार ने हथिया लिया है। इसको समझने की ज़रूरत है। वर्तमान में हमारे समय के जो नये दबाव आ गये हैं, उनको पहचाने बिना प्रगतिशील आन्दोलन की कोई गति सम्भव नहीं है।
 मुनव्वर राना-असल में प्रलेस उसी वक़्त तक था, जब सरदार, कैफ़ी, मजरूह आदि मौजूद थे। उनके बाद जो नयी विचारधारा आयी, एक तरह से सत्ता की बागडोर उनके हाथ में आ गयी। तो सब इधर-उधर तख़्ती तो लगाये रहे प्रगतिशील की और जिसको जहाँ मौका मिला, अपना भेष बदलकर चला गया। और उसी तरह ज़िन्दा भी है और ये दोनों जगह रहना भी चाहते हैं। जो प्रलेस के ख़िलाफ़ हैं वहाँ से भी उन्हें फ़ायदा मिलता रहे और प्रलेस से भी फ़ायदा मिलता रहे। और ऐसा कोई आदमी है भी नहीं, जिसकी सरदारी पर यह लेखक संघ चल सके। तो ज़ाहिर सी बात है कि उद्देश्य से भटकना चाहिए था, और भटक गये। बेसिक बात यह है कि प्रलेस ने उर्दू साहित्य हो या हिन्दी साहित्य हो, दोनों को बहुत कुछ दिया था और उनकी जो इकाई थी- एकता, एक-दूसरे पर भरोसा करना तथा एक-दूसरे की मदद करना, उससे साहित्य को फ़ायदा मिला था। लेकिन यह साहित्य की बदनसीबी होती है कि कोई भी संघ जिससे साहित्य को फ़ायदा होने वाला होता है, वो बहुत दिनों तक चलता नहीं है। यही प्रलेस के साथ भी हुआ। जिन्होंने ज़मीन में बैठकर, टाट-पट्टी में बैठकर इसकी ख़िदमत की थी; उनमें से तो बहुत ऐसे थे, जिन्हें बहुत कुछ हासिल ही नहीं हुआ, कुछ ख़ुशनसीब थे, जिन्हें बहुत कुछ मिला भी। उनके बाद जो ये प्रगतिशील वाले बिल्ले लगाये घूम रहे हैं; इनके पास बिल्ला ही है, प्रगति नहीं। बगै़र बोले और बग़ैर बताये कि मैं प्रगतिशील हूँ, हमें अपना काम करते रहना चाहिए। इसका फ़ैसला तो पचास बरस बाद होना है। इसमें चीखने-चिल्लाने से कुछ नहीं हो सकता है। 
प्रो. अली अहमद फ़ातमी-ऐसा तो नहीं है; कुछ ऊँच-नीच हो जाती है, लेकिन प्रलेस मूल उद्देश्यों सेे भटक गया है, यह कहना जरा भी मुनासिब नहीं है। देखिये कुछ गरम-गरम बातें हो जाती हैं, उन्हें डिस्कस भी किया जाता है। हाँ, यह ज़रूर है कि कभी-कभी कुछ मुद्दे ऐसे आ जाते हैं, जिन पर विरोध हो जाता है। यह तो साहित्यकारों व विचारकों में हो जाता है और किसी भी संगठन के विकास के लिये यह ज़रूरी भी है। हर आदमी को अपनी बात कहने का हक़ होता है। तो यह कहना कि प्रगतिशील लेखक संघ अपने उद्देश्यों से भटक गया है, मैं इससे सहमत नहीं हूँ।
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र-सही बात है। दरअसल प्रलेस की स्थापना के बाद यह ध्यान नहीं दिया गया कि हमारे लिए साहित्य महत्वपूर्ण है, राजनीति नहीं। इस पर राजनीतिक परिस्थितियाँ हावी रहीं। वर्तमान में नब्बे प्रतिशत राजनीति है, दस प्रतिशत साहित्य है। हम लोग उसमें कभी शामिल नहीं रहे। जो रचनाकार है, वो भीड़ में शामिल नहीं हो सकता। वो ज़्यादातर व्यक्तिगत होता है। इसका मतलब है कि जो कमतर प्रतिभा के लोग थे, वही प्रलेस से जुड़े।.....यह राजनीति वर्तमान की राजनीति नहीं है, इस राजनीति का हमारी ज़मीन से कोई लेना-देना नहीं है।

 यश मालवीय-वो बहुत दिनों से भटका हुआ है। वो अब ऐसे लेखकों की संस्था हो गयी है, जो अपनी स्थापना के लिए व अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहाँ अब स्वस्थ प्रतिस्पर्धा जैसी कोई चीज़ नहीं रह गयी है। प्रलेस का स्वर्णिम इतिहास रहा है, उसमें अमरकांत व अजित पुष्कल जैसे लोग रहे हैं। मौजूदा समय में इसमें अलेखक घुस आये हैं, जो लेखक हैं ही नहीं। वे या तो धनकुबेर हैं या ऐसे लोग हैं, जिनकी कोई विशेष पहचान नहीं है। यह केवल प्रलेस की ही बात नहीं, अधिकांश लेखक संगठनों की यही स्थिति है। जो इनके प्रति प्रतिबद्धता न दिखाये यानी जो लेखक संघ में सम्मिलित नहीं है, उसको सामान्य निमन्त्रण भी नहीं दिया जाता। जबकि पुराना इतिहास यह रहा है कि प्रलेस के सम्मेलनों में अन्य लोगों को भी सम्मान से बुलाया जाता रहा है। अब यह है कि आपने सदस्यता ली है तो बुलाये जायेंगे, नहीं तो नहीं। मेरा मानना है कि लेखक प्रकृति से ही वामपन्थी होता है। जहाँ भी असमानता है, विषमता है व ऊँच-नीच है; वो वहाँ चोट करता है, लिखता है। तो ऐसी स्थिति में यह आवश्यक नहीं है कि हम किसी से शिष्यत्व लें या किसी संघ में सम्मिलित हों। यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो लेखक संघों ने साहित्य का नुक़सान ही किया है। जन और वाम की बात करने वाले ये लोग ज़्यादातर जनविरोधी हैं। ऐसे में यह आन्दोलन भटक ही नहीं गया है, बल्कि लम्बे समय से भटका हुआ है। प्रलेस भी हमारे वर्तमान समाज का आईना बनता जा रहा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि नये लोग सामने आयंे, जिनके लिए साहित्य ही प्रतिबद्धता हो, साथ ही जिनके लिए मूल्य एवं मर्यादायें भी प्रतिबद्धता हों, तभी बात बनेगी।
(डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ से बातचीत पर आधारित)

बुधवार, 7 जनवरी 2015

                                                    
 प्रो. अमर सिंह                                               
                                                इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
                         
प्रो. अमर सिंह के पिता बाबू अचल सिंह रायबरेली जिले के तालुकेतार थे,  माता रानी चंद्र कुमारी देवी कुशल गृहणी थीं। 30 दिसंबर 1932 को जन्मे प्रो. अमर सिंह ने प्राइमरी की शिक्षा रायबरेली में ही हासिल की,
प्रतापगढ़ से 1949 में हाईस्कूल और वाराणसी के उदय प्रताप कालेज से  इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्होंने स्नातक और स्नातकोत्तर की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हासिल की। इसके बाद प्रो. देव साहब ने उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही अध्यापन कार्य के लिए नियुक्ति करा दी। इसी विश्वविद्यालय से 1992 में सेवानिवृत्त हुए। इस दौरान इनके मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी से अभिन्न संबंध हो गए। अध्यापन कार्य के दौरान प्रो. सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। सेवानिवृत्ति के बाद 1992 से 1994 उच्चतर माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के सदस्य रहे। प्रो. सिंह की कोई संतान नहीं है, अपने छोटे भाई के परिवार के साथ इलाहाबाद में 24, जवाहर लाल नेहरु पर ही रहते हैं। छोटे भाई की तीन पुत्रियां हैं, बड़ी पुत्री दिल्ली में रहतीे है, मझली  सीएमपी डिग्री कालेज में अध्यापक हैं और तीसरी बंगाल में रहती हैं। प्रो. सिंह ने साहित्य, संस्कृति और इतिहास का गहरा अध्ययन किया है। इनके साथ बैठकर किसी भी विषय की गहरी जानकारी हासिल की जा सकती है। लेकिन इनकी कमी यह है कि इन्होंने कभी लेखन नहीं किया, खुद इनका कहना है कि लिखना बहुत मेहनत वाला काम लगता है, इसलिए कभी लिखने का प्रयास ही नहीं किया। 1984 का वाक्या याद करते हुए प्रो. सिंह बताते हैं कि अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ने आए थे। तभी उनके पिता और मशहूर साहित्यकार हरिवंश राय बच्चन भी इलाहाबाद आए। हरिवंश राय ने इलाहाबाद विश्वदविद्यालय प्रो. सिंह को आधुनिक कविता पढ़ाई थी, उन्होंने प्रो. सिंह को मिलने के लिए गंगा नाथ हास्टल में बुलाया और संदेश दिलवाया कि यह मुलाकात बिल्कुल भी राजनैतिक नहीं होगी। उनके बुलावे प्रो. मिलने गए तो बच्चन जी ने गेट पर ही उनका हाथ पकड़ लिया। बड़ी आत्मीयता से इलाहाबाद और देश-समाज की समस्याओं पर चर्चा की। फ़िराक़ गोरखपुरी से उनके बड़े आत्मीय संबंध रहे हैं। फ़िराक़ साहब और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ गहरे दोस्त थे । प्रो. सिंह बताते हैं कि अक्सर निराला जी गोश्त लेकर फ़िराक़ साहब के घर आते थे वही बनता था, तीन लोगमिलकर सेवन करते, लेखन और देश-समाज के हालात पर चर्चा करते। इसके बाद  प्रायः रात दो बजे निराला जी अपने घर दारागंज के लिए निकलते, तब रिक्शा किया जाता और अक्सर ही रिक्शे का किराया 25 पैसा फ़िराक़ साहब अदा करते थे। फ़िराक़ साहब की दो पुत्रियों बारे में प्रो. सिंह बताते हैं कि उनकी दो पुत्रियां बिहार में ब्याही थीं, लेकिन अब उनके बारे में कुछ पता नहीं है। अक्सर यह बात चर्चा में आती है कि फ़िराक़ साहब हिन्दी कविताओं और साहित्य का माखौल उड़ाते थे, लेकिन प्रो. सिंह इसको ग़लत बताते हैं, उनका कहना है कि फ़िराक़ हिन्दी प्रेमी थे, लेकिन वे हिन्दी के नाम पर घालमेल और नकली हिन्दी का विरोध करते थे। फ़िराक़ साहब सौंदर्य प्रेमी थे, सुंदरता कविता की परंपरा रही है, वे बदसूरती पसंद नहीं करते थे। निराला जी उर्दू शायरी के बहुत बड़े प्रेमी थे, उनके आइडियल शायर ग़ालिब थे। प्रो. सिंह का कहना है कि मीर बहुत बड़े शायर हैं, लेकिन उन्होंने परिस्कृत उर्दू का ही प्रयोग अधिक किया, जबकि ग़ालिब ने उस उर्दू भाषा को संवारने का काम किया। हिन्दी की नई कविता के बारे में प्रो. सिंह का कहना है कि वर्तमान नई कविता तो कविता ही नहीं है, अब हिन्दी कविता का मुख्य विषय ही खो गया है। एक तरह से भटक सी गई है हिन्दी कविता। हिन्दी दिल्ली पहुंचकर विलुप्त सी हो गई, वास्तविक हिन्दी साहित्य एक तरह से भटकता हुआ दिख रहा है। उर्दू शायरी के बार में उनका कहना है कि अब यह उर्दू प्रोग्रेसिव प्रधान हो गई है ग़ालिब और मीर के बाद फ़ैज़ का युग आया, इसके बाद उर्दू शायरी में कोई उल्लेखनीय शायर सामने नहीं आया। प्रो. सिंह का कहना है कि हिन्दी और उर्दू दोनों ही भाषाओं में वर्तमान में बड़े कवियों का टोटा सा है। हिन्दी और उर्दू साहित्य लिखे जा रहे आलोचना की बात पर प्रो. सिंह कहते हैं कि स्वच्छ मानिकता से आलोचना लेखन का काम नहीं किया जा रहा है। अलग-अलग ग्रुप बने हुए है, एक दूसरे ग्रुप के लोगों को नीचा दिखाने का कामा किया जा रहा है। यह स्थिति हिन्दी और उर्दू दोेनों की आलोचना की है।
 
  ( गुफ्तगू के दिसंबर-2014 में प्रकाशित )
नोट- इस कालम में अब तक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी और कॉमरेड ज़ियाउल हक के बारे में प्रकाशित किया जा चुका है।


बाएं से- प्रो अमर सिंह, रविनंदन सिंह और इम्तियाज़ अहमद गाज़ी