मंगलवार, 18 जून 2013

मौजूदा दौर की सबसे लोकप्रिय विधा है ग़ज़ल- प्रो. बिसमिल्लाह

     ‘ग़ज़ल: सफ़र दर सफ़र’ विषय पर ‘गुफ्तगू’ ने किया सेमिनार
इलाहाबाद। ग़ज़ल अरब देश से भारत में आयी, उर्दू की विधा बनी और फिर हिन्दी सहित तमाम देश-विदेशी भाषाओं की चहेती विधा बन गई है। आज सूरतेहाल यह है कि लगभग हर भाषा के काव्य में ग़ज़ल का सृजन हो रहा है। हिन्दी-उर्दू पाठकों के बीच तो यह सबसेे लोकप्रिय विधा बन गई है। यह बात प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह ने साहित्यिक संस्था गुफ्तगू आयोजित सेमिनार में कही। 9 जून की शाम इलाहाबाद स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्टृीय हिन्दी विश्वविद्याल के सभागार में ‘ग़ज़लः सफ़र दर सफ़र’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काज़मी ने की, मुख्य अतिथि प्रो. बिसमिल्लाह थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। सबसे पहले साहित्यकार न होते हुए साहित्यिक आयोजनों में भाग लेने वाले उमेश नारायण शर्मा, डाॅ.पीयूष दीक्षित, इं. अखिलेश सिंह, जीडी गौतम, मुकेश चंद्र केसरवानी, सीआर यादव और धनंजय सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद’ सम्मान प्रदान किया गया। 8 जून की देर रात वरिष्ठ शायर अरमान गाजीपुर का निधन हो गया था, कार्यक्रम के दौरान उन्हें श्रद्धांजलि भी दी गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काजमी ने कहा कि उर्दू और हिन्दी काव्य विधा में ग़ज़ल लोगों की धड़कन बन गई है, साहित्य से मोहब्बत करने वाला इंसान ग़ज़ल ज़रूर सुनता-पढ़ता है। मीर, ग़ालिब के जमाने से लेकर आज  बशीर बद्र, निदा फाजली, मुनव्वर राना, दुष्यंत कुमार आदि की मक़बूलियत की बुनियाद ग़ज़ल पर टिकी हुई है। उन्होंने कहाकि आज यह आयोजन बेहद कामयाब रहा है, लोग आखि़र तक सबका वक्तव्य सुनते रहे हैं, मैं इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने कहूंगा कि वे ऐसे आयोजन प्रत्येक तीन महीने पर कराते रहें। प्रो. अली अहमद फातमी ने कहा कि ग़ज़ल बहुत ही नाजुकी मिजाज विधा है, इसके लिए इस्तेमाल किये जाने वाले अल्फाज में शीरीन मिठास होनी चाहिए, लेकिन प्रयोग के नाम पर ऐसे शब्द का इस्तेमाल भी किया जाने लगा है, जो ग़ज़ल की भाषा हो ही नहीं सकती। एहतराम इस्लाम ने कहा कि ग़ज़ल लिखने के लिए उसके व्याकरण से वाकिफ़ होना बेहद ज़रूरी है लेकिन केवल छंद ही ग़ज़ल नहीं है। ग़ज़ल की लोकप्रियता केा देखते हुए लोग ग़ज़ल लिखना तो शुरू कर देते हैं, लेकिन उसके व्याकरण को समझने की कोशिश नहीं करते, जिसकी वजह से कुछ हिन्दी भाषी कवियों पर ग़ज़ल के स्वरूप को बिगाड़ने का आरोप लगता रहा है, हालांकि हिन्दी में भी बहुत लोग बड़ी अच्छी ग़ज़लें लिख रहे हैं। कानपुर विश्वविद्यालय की डाॅ.नगीना जबीं ने ‘ग़ज़ल की शायरी में औरतों का योगदान’ विषय पर अपना वक्तव्य दिया, कहा कि परवीन शाकिर, अज़रा परवीन और फहमीदा रियाज जैसी महिला शायरायों ने ग़ज़ल के विकास में काफी अहम किरदार निभाया है। आज भी भारत समेत कई देशों में महिलाएं बहुत अच्छी ग़ज़लें कह रही हैं। डाॅ. असलम इलाहाबादी ने ‘गजलिया शायरी में इलाहाबाद’ विषय पर कहा कि इलाहाबाद हमेशा से अदब का अहम मरकज रहा है, नूह नारवी, अकबर इलाहाबादी, फिराक गोरखपुरी, राज इलाहाबादी आदि शायरों ने हिन्दुस्तानी ग़ज़ल को काफी आगे बढ़ाया है, देश के ग़ज़लिया शायरी का इतिहास इनके जिक्र बिना मुकम्मल नहीं हो सकता। आज भी इस शहर में कई लोग बहुत अच्छी ग़ज़लें लिख रहे हैं, नौजवानों का ग़ज़ल के प्रति बढ़ता रूझान इसका सुबूत है। ‘गुफ्तगू’ ने इस विषय पर आयोजन करके साबित कर दिया है कि साहित्य का गंभीर काम इलाहाबाद जैसे शहर में ही हो सकता है।
कार्यक्रम के दौरान प्रो.संतोष भदौरिया, मुनेश्वर मिश्र, सागर होशियारपुरी, तलब जौनपुरी, वीनस केसरी, सौरभ पांडेय, संजय सागर, शुभ्रांशु पांडेय, अशरफ़ अली बेग, हसीन जिलानी, अख़्तर अज़ीज़, अजय कुमार, शिवपूजन सिंह, सफदर काजमी, असरार गांधी, निकहत बेगम, हसीन जिलानी, सुषमा सिंह, शिवाशंकर पांडेय, रविनंदन सिंह, नंदल हितैषी, शैलेंद्र जय, गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी, अनुराग अनुभव, गीतिका श्रीवास्तव, विवेक सत्यांशु, शाहीन, अजीत शर्मा ‘आकाश’ आदि लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान लिया गया ग्रूप फोटो
कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
शान-ए-इलाहाबाद सम्मान पाने वाले लोगों का परिचय पढ़कर सुनाते सौरभ पांडेय
उमेश नारायण शर्मा को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
डा. पीयूष दीक्षित को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
अखिलेश सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
मुकेश चंद्र केसरवानी को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी

सीआर यादव को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
धनंजय सिंह को ‘शान-ए-इलाहाबाद सम्मान’ प्रदान करते डा. असलम इलाहाबादी, प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह, एसएमए काज़मी
विचार व्यक्त करते एहतराम इस्लाम
विचार  व्यक्त करतीं डा. नगीना ज़बीं
विचार व्यक्त करते डा. असलम इलाहाबादी
विचार व्यक्त करते प्रो. अली अहमद फ़ातमी
विचार व्यक्त करते प्रो. अब्दुल बिसमिल्लाह
 विचार व्यक्त करते एसएसए काज़मी

मंगलवार, 11 जून 2013

और बंद हो गईं उर्दू की पत्र-पत्रिकाएं

                                                              -इम्तियाज़ अहमद गाजी
 आज भी इलाहाबाद पूरी दुनिया में अपनी साहित्यिक कार्यप्रणाली और कारनामों के लिए जाना जाता है। देश का यह इकलौता शहर है जिसके हिस्से में छह ज्ञानपीठ पुरस्कार आएं हैं। हिन्दी कथाकारों में अमरकांत और उर्दू आलोचना में शुम्सुर्रहमान फ़ारू़की का नाम अदबी दुनिया के आसमान पर सितारों की तरह चमक रहे हैं। अकबर इलाहाबादी, फिराक गोरखपुरी, एहतेशाम हुसैन, मुजाविर हुसैन, प्रो.फजले इमाम, अली अहमद फातमी और एहतराम इस्लाम जैसे लोगों का नाम इस शहर से जुड़ा हुआ है। लेकिन उर्दू अदब के पसमंजर में अगर आज के इलाहाबाद की बात करें तो यह बेहद अफसोसनाक है कि आज के तारीख में इस शहर से एक भी उर्दू की पत्र-पत्रिका प्रकाशित नहीं हो रही है, धीरे-धीरे करके सारी पत्रिकायें बंद हो चुकी हैं। एक तरफ लोगों की पढ़ने में कम हो रही रुचि तो दूसरी ओर उर्दू से लोगों कम होती निस्बत ने ये हालात पैदा कर दिये हैं। पत्रिकाओं के अलावा उर्दू अखबारों का हाल भी बहुत ही खराब है। सही मायने में दो हिन्दी अखबार घरानों के उर्दू अखबार प्रकाशित हो रहे हैं और मार्केट में दिखते भी हैं, लेकिन कई हिन्दी अखबार जहां अस्सी हजार से एक लाख तक बिक रहे हैं, वहीं इन दोनों उर्दू अखबारों के बिकने वाली प्रतियों की संख्या 200 से भी कम है। वर्ना एक दौर ऐसा भी था जब अब्बास हुसैनी के निकहत पब्लिकेशन से प्रकाशित होने वाली जासूसी दुनिया के नाॅवेलों की एडवांस बुकिंग होती थी, पिछड़ जाने की सूरत में कई बार लोगों को ब्लैक में खरीदना पड़ता था। इब्ने शफी के इन नाॅवेलों की दुनिया के कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। 1996 से शुरू हुई ‘शबखून’ नाम मासिक पत्रिका शम्सुर्रहमान फारूकी के संपादन में वर्ष 2005 तक प्रकाशित हुई, इस पत्रिका की पहुंच दुनिया के उन सभी देशों में थी जहां उर्दू अदब से रिश्ता रखने वाले मौजूद थे। लेकिन आखिरकार सितंबर 2005 में इसके बंद होने का ऐलान कर दिया गया।
इलाहाबाद से प्रकाशित हुए उर्दू साहित्यिक पत्रिकाओं के इतिहास पर गौर करें तो यहां से सबसे पहले 1890 में मोहम्मद हमीदुल्ला ने ‘इलाहाबाद रिव्यू’ नाम से पत्रिका निकाली, फिर 1921 में डाॅ. ताराचंद्र ने ‘हिन्दुस्तानी’ निकाली। 1922 से 1927 तक आजम कुरेवां, आगा अली खान और तालिब इलाहाबादी ने मिलकर ‘अकबर’ नामक पत्रिका निकाली। इसी दौर में एज़ाज हुसैन ने ‘शुआ-ए-उर्दू’ नामक पत्रिका प्रकाशित की थी। इनके अलावा ‘अदीब’,‘चांद’,‘कारवां’,‘फसाना’,‘नयी जिन्दगी’, ‘नया हिन्द’, ‘जहांनुमा’, ‘शाहकार’, ‘सबरंग’, ‘शहपर’, ‘तीसरी दुनिया’, ‘अल-अजीज’, ‘शफक’, ‘सवेरा’, ‘अंदाजे’ और ‘पासवान’ आदि पत्रिकायें समय-समय पर निकलीं और फिर बंद हो गईं। कुछ दिनों तक प्रो. अली अहमद फ़ातमी ने ‘नया सफर’ नामक पत्रिका प्रकाशित की थी, लेकिन इस पत्रिका के असली कर्ता-धर्ता डा. कमर रईस हैं, जो दिल्ली से इस पत्रिका को प्रकाशित करते थे, कुछ समय के लिए वो रूस चले गये तो इसके प्रकाशन की जिम्मेदारी उन्होंने प्रो. फातमी को दे दी थी। फिर जब डा. रईस वापस भारत लौटे तो यह पत्रिका भी फिर से दिल्ली से प्रकाशित होने लगी। 2007 में स्वालेह नदीम और अख्तर अजीज ने मिलकर ‘तहसीर’ नामक पत्रिका निकाली। इसके पहले अंक का बड़ी धूम-धाम से विमोचन भी किया गया, लेकिन इस पत्रिका का सफर भी मात्र तीन अंकों तक ही रहा। आज की तारीख में उर्दू की एक भी साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित नहीं हो रही है। अगर कहीं कोई प्रकाशित कर भी रहा होगा तो वह मात्र फाइल काॅपी तक ही सीमित होगी, किसी स्टाल में इलाहाबाद से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्रिका कहीं देखने को नहीं मिलती।
आज सूरतेहाल यह है कि उर्दू से आम लोग तो कट रहे रहे हैं, मगर उर्दू साहित्य से जुड़े हुए लोग भी इस दिशा में कोई प्रयास करते नहीं दिखते, उनसे बात करने पर सारी जिम्मेदारी सरकार पर डालकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। उर्दू में जो काव्य संग्रह या कहानी संग्रह आदि जैसी किताबें प्रकाशित हो रही हैं, उनकी तादाद 200 तक सिमट चुकी है। इन पुस्तकों का प्रकाशन करके दोस्तों को मुफ्त में बांटने और उर्दू अकादमियों में जमाकर पुरस्कार बंटोरने के लिए हो रहा है।

गुरुवार, 6 जून 2013

गुफ़्तगू के जून-2013 अंक में


3.  ख़ास ग़ज़लें (मीर तक़ी मीर, परवीन शाकिर, फि़राक़ गोरखपुरी, दुष्यंत कुमार)
4-5 संपादकीय (फेसबुकिया शायरों ने किया सत्यानाश)
ग़ज़लें
6.  बेकल उत्साही, बशीर बद्र, वसीम बरेलवी, मुनव्वर राना
7.  इब्राहीम अश्क, गौतम राजरिशी, हस्तीमल हस्ती, किशन स्वरूप
8. अख़्तर अज़ीज़, तलब जौनपुरी
9. मिसदाक़ आज़मी, अखिलेश निगम‘अखिल’, भारत भूषण जोशी,विशाल चर्चित
10. सरफ़राज़ अहमद ‘आसी,अभिनव अरुण, वीनस केसरी, गणेश श्रषि
11. विमल वर्मा, ए.एफ.नज़र
12. नरेश कुमार ‘महरानी’, इरशाद अहमद बिजनौरी, आर्य हरीश कौशल

कविताएं
13. कैलाश गौतम, माहेश्वर तिवारी, बुद्धिनाथ मिश्र
14. जयकृष्ण राय तुषार, अमरनाथ उपाध्याय
15. शिबली सना, कृष्ण कुमार यादव, प्रशांत शुक्ल
16. शब्दिता संजू, अशोक भारती देहलवी
17.सौरभ पांडेय, अनंत आलोक
18-19.तआरुफ़ः सबा ख़ान
20-23. विशेष लेख: पुरानी  यादों के मंजर सुहाने लगते हैं- मुनव्वर राना
24-26. इंटरव्यू:बशीर बद्र
27-28. उस्ताद-शार्गिद की परंपरा के क्या फायदे-नुकसान हैं ?
29. कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित
30-34.मुंतजि़र मिजऱ्ापुरी के सौ शेर
35.इल्मे-क़ाफि़या भाग-13
36-39.तब्सेरा (थोड़ा सा रूमानी हो लें हम,मन के विपरीत,टुकड़ा कागज़ का,मैं हूं ग़ज़ल,छेनियों का दंश)
40. तब्सेराः मेरी नज़र में
41-44. अदबी ख़बरें
45-48. कहानीः अपना खून-इश्तियाक़ सईद
49-50. इन दिनों: बात सिर्फ़ एक अदद हिन्दुस्तानी एकेडेमी की ही नहीं है- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
परिशिष्ट: फ़रमूद इलाहाबादी
51.  फ़रमूद इलाहाबादी का परिचय
52-56. सभी के दिलों में बहानी है गंगा- आर.पी.शर्मा ‘महर्षि’
57-59.फ़रमूद इलाहाबादी: खूबसूरत अंदाज़ का शायर-रविनंदन सिंह
60-80. फ़रमूद इलाहाबादी के कलाम

शनिवार, 25 मई 2013

फेसबुकिया शायरों ने किया सत्यानाश


    नाजि़या ग़ाज़ी
फेसबुक तेरा करूं मैं किस तरह से शुक्रिया/तूने बिलआखि़र सुखन को एक पैमाना दिया।
हर कोई अब शेर कह लेता है तेरी बज़्म में/शायरे  आज़म निकम्मों को बना तूने दिया।
टूटेफूटे शेर पर तहसीम की बाछौर उफ/अहकमों ने अब अदब को कितना छिछला कर दिया।
शायरा सबा ख़ान के ये अश्आर साफ़तौर पर इशारा कर रहे हैं कि फेसबुक पर किस तरह शायरी की जा रही है और ग़लत चीज़ों को किस तरह प्रमोट करने की कोशिशें जारी हैं। फेसबुक और इसके जैसे अन्य सोशल साइट्स ने साहित्य का कबाड़ा बनाने का जैसा बीड़ा ही उठा लिया है। कई प्रकार से शायरी का नुकसान हो रहा है। हालत यह है कि लोग एक शेर लिखते हैं और उसे बिना किसी से सलाह मश्विरा किये ही तुरंत फेसबुक पर पब्लिश कर देते हैं, शेर पब्लिश करते ही उसे पसंद करने वालों और उसके तारीफ़ में कमेंट करने वालों का तांता लग जाता है। इसमें अधिकतर पसंद व कमेंट करने वाले लोग तो बिना पढ़े ही तारीफ़ के पुल बांध देते हैं, और अगर शेर पब्लिश करने वाली कोई महिला हुई तो फिर उसके शेर को पसंद करने वालों की संख्या मिनटों में सैकड़ा पार कर जाती है। साथ ही कोई भी शेर पब्लिश होते ही वही शेर चंद मिनटों में कई लोग काॅपी करके अपने नाम से फ़ौरन ही पब्लिश कर देते हैं। जांचने के लिए किसी भी पब्लिश हुए शेर को सर्च करके देखा जा सकता है। ऐसे में काॅपी पेस्ट करके खुद को शायर-कवि बताने वालों की संख्या लाखों में पहुंच गई है। एक बात और उल्लेखनीय है कि जो लोग दूसरों के अश्आर पर कमेंट करते हैं या उसे पसंद करते हैं उन्हीं के अश्आर को लोग पसंद करते हैं। कहने का मतलब यह है कि अगर कोई शायर सचमुच का अच्छा शेर कहता है और वह खुद किसी के शेर की तारीफ़ नहीं करता है तो उसके अश्आर को पसंद करने वालों की संख्या बहुत ही कम होती है। बाकायदा लोगों का ग्रुप बना हुआ है कि किसका पसंद करना है और किसका नहीं करना है। कई लोग तो ऐसे हैं जिनके शेर पर तारीफ़ के कमेंट न करो तो वे नाराज़ हो जाते हैं, बातचीत बंद कर देते है, अनफ्रेंड करने में भी देर नहीं करते। विडंबना यह है कि कट-पेस्ट करके शायर बने लोग एक दूसरे को बड़ा शायर साबित करने में तल्लीनता से जुड़े हुए हैं। उनकी नज़र में वहीं सक्रिय और बड़े साहित्यकार हैं जो सोशल साइट्स से जुड़े हुए हैं। जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है, अधिकतर बड़े और स्तरीय साहित्यकार सोशल साइट्स पर नहीं आते। इस तरह की सक्रियता से ख़ासतौर पर नये लोगों में गलत संदेश जा रहा है और नये लोग सीख़ने-पढ़ने की बजाय कट-पेस्ट करके ही अपने को साहित्यकार साबित करने में जुटे हुए हैं। तुरंत ही कुछ लिखा और कहीं से कट किया अपने वाॅल पर पब्लिश कर दिया और धड़ाधड़ तारीफ करने वालों की लाइन लग गई। यह प्रवृत्ति साहित्य के लिए बेहद ही ख़तरनाक है। बकौल मुनव्वर राना ‘शायरी करना कुएं में नेकियां फेंकने जैसा अमल है। शायरी तो वो सब्र है, जिसका बांध कभी-कभी तो सदियों के बाद टूटता है। शायरी तो वह इम्तिहान है, कभी-कभी जिसका नतीज़ा आते-आते कई नस्लें मर-खप चुकी होती हैं। लेकिन ये सब्र इस लिहाज से क़ाबिले मुबारकबाद है कि आज तुलसी, कबीर, जायसी और ग़ालिब को तकरीबन सभी जानते हैं, लेकिन इस अहद के राजा नवाब या बादशाह के बारे में वो मुअर्रिख़ भी यक़ीन से नहीं बता सकते, तारीख़ रक़म करते-करते जिनकी उंगलियां शल, हाथ लरजिशज़दा और चेहरा झुर्रियों से मकड़ी के जाले जैसा हो चुका है ( गुफ्तगू- जुलाई-सितंबर 2005)।’
कहने का आशय है कि साहित्य ऐसी हंसी-मजाक की चीज़ नहीं है, जिसे फेसबुकिया शायरों ने बना रखा है। एक-एक शेर कहने और उस पर घंटों गौर करने के बाद अपने उस्ताद को दिखाया जाता है, उसे उस्ताद हर नज़रिये से जांचता परखता है फिर उसे कहीं छपने को दिया जाता है या किसी महफि़ल में पढ़ा जाता है। लेकिन फेसबुक के गिरोहबंद शायरों ने कट-पेस्ट करके और कचरी-अधकचरी सामग्री को लोगों के सामने ले आ रहे हैं। इसका सबसे ग़लत संदेश उन लोगों के सामने जा रहा है जो नये-नये लेखन से जुड़ते हैं, उनको लगता है कि असली साहित्य या शायरी यही है जो फेसबुक  और इसके जैसे अन्य सोशल साइट्स पर पेश किया जा रहा है। इन साइटों पर विभिन्न प्रकार के गु्रप बने हुए हैं, इन गु्रपों में शामिल लोग एक-दूसरे को देश का सबसे बड़ा शायर-कवि साबित करने में लगे हुए हैं। अपनी सामग्री अधिक से अधिक लोगों को पहुंचाने के लिए सोशल साइट्स बहुत अच्छे माध्यम हैं, लेकिन इनका दुरुपयोग ज़्यादा हो रहा है, इस पर ग़ौर किये जाने की ज़रूरत है।        
                                                                 

बुधवार, 15 मई 2013

बात सिर्फ एक अदद हिन्दुस्तानी एकेडेमी की ही नहीं है

Imtiyaz Ahmad Ghazi

                                                              -इम्तियाज़ अहमद गाजी
प्रदेश सरकार ने हिन्दुस्तानी एकेडेमी का अध्यक्ष सुनील जोगी को क्या बनाया, शहर के साहित्यकारों का जैसे जमीर जाग उठा है। इस बहाने शुरू हुए अभियान ने साहित्य के लिए कई राहें खोल दी हैं, साथ ही यह संकेत सामने आ गया है कि निराला और फि़राक़ जैसे लोगों का यह शहर उपर से थोपी हुई सभी चीज़ों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। एक अदद हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पर नई नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ अभियान अब प्रदेश स्तर का मुद्दा बना चुका है। ऐसे में प्रदेश सरकार को देर-सबेर साहित्यकारों की बात सुननी ही पड़ेगी। अच्छी बात यह है कि इस एक मुद्दे पर ही सही अधिकतर साहित्यकार एक जुट हुए हैं और भविष्य में उम्मीद की जा सकती है कि साहित्य की भलाई के लिए साहित्यकार एकजुट हो सकते हैं।
अप्रैल के पहले पखवारे में जब हिन्दुस्तनी एकेडेमी के अध्यक्ष की नियुक्ति हुई तो इलाहाबाद के साहित्यकारों को बड़ा झटका लगा। ख़ासकर जागरुक लोगों को यह एहसास हुआ कि सुनील जोगी किसी प्रकार से इस पद के लायक नहीं हैं। फिर साहित्यकारों की बैठकें शुरू हुईं, बात आगे बढ़ी तो पता चला कि सिर्फ़ हिन्दुस्तानी एकेडेमी ही नहीं बल्कि भारतेंदु नाट्य एकेडेमी,उत्तर प्रदेश संगीत नाटक एकेडेमी, उत्तर प्रदेश ललित कला एकेडेमी और उत्तर प्रदेश उर्दू एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर जिन लोगों की नियुक्ति हुई, वे सभी इन पदों के लायक नहीं है। उर्दू अदीबों के विरोधों के कारण उर्दू एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर जिस महिला केा नियुक्त किया गया था, उसे 24 घंटे के अंदर ही प्रदेश सरकार को हटाना पड़ा है, सरकार की इस कार्यवाही से साहित्यकारों में आस भी जगी है कि उनकी सुनी जाएगी। अब आंदोलन शुरू हो चुका है, लगभग सभी प्रमुख शहरों में इन नियुक्तियों के विरोध में हस्ताक्षर अभियान जारी है, जिन्हें एकत्र करके लखनउ में प्रेस कांफ्रेस करके जारी किया जाएगा और मुख्यमंत्री से मुलाकात करके उनके सामने अपनी बात रखनी है।
6 अप्रैल को इलाहाबाद में ही एक कवि सम्मेलन हुआ, जिसमें सुनील जोगी ने लोगों से समर्थन में हाथ उठवाते हुए एक कविता पढ़ी-‘बहुत हो चुका अब ना जनता के घाव कुरेदो, सारा देश कह रहा है अब मोदी को दिल्ली दे दो।’ आश्चर्यजनक है कि प्रदेश की सपा सरकार ने इसके चार दिन बाद जोगी को हिन्दुस्तानी एकेडेमी का अध्यक्ष बना दिया। जोगी कार्यभार ग्रहण करने के लिए इलाहाबाद आते हैं और बयान देते हैं कि यहां के साहित्यकारों ने इलाहाबाद को महाराष्टृ बना दिया है और मेरे साथ ठाकरे जैसा व्यवहार कर रहे हैं। जबकि जोगी को यह अच्छी तरह से पता है कि महाराष्टृ में यूपी-बिहार वालों के खिलाफ हिंसात्मक रवैया अपनाया जाता है, इलाहाबाद में उनके साथ ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ, मर्यादित ढंग से प्रदेश सरकार के इस निर्णय का विरोध हो रहा है, कोई धरना-प्रदर्शन या काम रुकावाट या फिर हिंसा वाली बात कभी नहीं आयी। इसके बाद फिर एक कार्यक्रम होता है तो उसमें जोगी इलाहाबाद के साहित्यकारों को संबोधित करते हुए कविता पढ़ते हैं कि ‘लूले लगड़े लोग अब मुझे चलना सिखला रहे हैं’। जोगी जी को यह कैसे भ्रम हो गया है कि इलाहाबाद के लोग लूले लगड़े हैं, वे अपने पैरों पर नहीं चल सकते हैं। जाहिर है ऐसी बातों से साहित्यकारों का पारा और चढ़ेगा ही और वही हुआ है।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी के संदर्भ में दो और महत्वपूर्ण बातें हैं, जिसका संज्ञान साहित्यकार तो ले चुके हैं, लेकिन सरकार ने अब तक नहीं लिया है। पहली बात यह है कि 80 के दशक तक एकेडेमी के अध्यक्ष पर नियुक्ति करने के लिए प्रदेश सरकार इलाहाबाद के वरिष्ठ साहित्यकारों से सलाह मांगती थी कि किसको अध्यक्ष बनाया जाए। साहित्यकारों द्वारा सुझाए गए नामों में से किसी को यह दायित्व दिया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। यही वजह है कि जिस प्रकार आज जोगी का विरोध हो रहा है, उतना विरोध कभी किसी अध्यक्ष के खिलाफ नहीं हुआ। दूसरी बात यह है कि एकेडेमी का अध्यक्ष बनाए जाने के लिए जो मानक तय किये गए थे, उनमें एक यह भी था कि सेवानिवृत्त अर्थात 60 वर्ष अधिक आयु के साहित्यकारों को ही अध्यक्ष बनाया जाए। लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि जोगी की नियुक्ति के लिए यह आयु सीमा घटाकर 25 वर्ष कर दी गई है। ये चीजें साफ दर्शा रही हैं कि राजनैतिक हितों के लिए साहित्यिक हितों की बलि किस प्रकार दी जा रही है। विडंबना यह है कि एक-दुक्का चाटुकार टाइप के साहित्यकार इन चीजों को समझते हुए भी अपने व्यक्तिगत हितों के लिए समर्थन कर रहे हैं। चाटुकार किस्म के लोग सत्ता में बैठे निर्णायक लोगों के पास भी आसानी से पहुंच जाते हैं।
साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है इसलिए सरकार से ये उम्मीद करना बेमानी नहीं है कि कम से कम अन्य निगमों की तरह सांस्कृतिक, साहित्यिक अकादमियों के अध्यक्ष पदों पर सिर्फ राजनैतिक हितों के मद्देनजर अध्यक्ष पदों पर नियुक्ति न करे। बल्कि ऐसी अकादिमयों पर योग्य लोगों की नियुक्ति करे ताकि कम से कम कला और संस्कृति का सही काम हो। जानकारों का यह भी मानना है कि अन्य राजनितिज्ञों के मुकाबले मुलायम सिंह यादव साहित्यकारों को तरजीह देते हैं, इसलिए अगर उनके पास इन बातों को ठीक ढंग से पहुंचाया जाए तो बात जरूर बनेगी। इसलिय यह माना जा रहा है कि साहित्यकारों की आवाज मुख्यमंत्री और सपा मुखिया के दरबार में दबायी नहीं जाएगी।

गुफ़्तगू की मासिक नशिस्त में चला शेरो-शायरी का दौर

इलाहाबाद।साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में 7 मई को मासिक काव्य गोष्ठी एवं नशिस्त का आयोजन  महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय के परिसर में किया गया। अध्यक्षता एहतराम इस्लाम ने किया, मुख्य अतिथि के रूप में सागर होशियापुरी व विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर  मिश्र थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया।
 युवा अजय कुमार की पंक्तियां यूं थीं-
रोजगार दफ्तर में जाकर खड़े हुए थे भइया,
भीड़ बहुत थी पैर दब गया और मार दी गइया।
भत्ता तो अब नहीं मिलेगा और भाग्य भी फूटा,
जांच कराये पता चला कि पैर का पंजा टूटा।
 अनुराग अनुभव की कविता यूं थी-
मैं हवा पुरवई, तुम महक सुरमई,
और मिलकर के कर दें समा जादुई
 राजीव श्रीवास्तव ‘नसीब’ ने कहा-
मर गए लोग सेरआम गलत, ढल गई जि़न्दगी की शाम गलत।
उठ काम बाकी है बहुत अभी, कर रहा है तू आराम गलत।
 इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की ग़ज़ल काफी सराही गई-
तेरे आंसुओं का सिला भी न देगा। ये मोहसिन तुझे हौसला भी न देगा।
बुलंदी पे पहंुचा जो तेरे सहारे, सहारा तो क्या रास्ता भी न देगा।
 सबा ख़ान ने ग़ज़ल का अलग ही रंग पेश किया-
गुलाब रंग सबा और बहार की बातें।
घुटन बहुत है करो अब करार की बातें।
 वीनस केसरी ने कहा-
दिल से दिल के बीच जब नज़दीकियां आने लगीं।
फैसले को खाप की कुछ पगडि़यां आने लगीं।
उम्र फिर गुजरेगी शायद राम की बनवास में,
दासियों के फेर में फिर रानियां आने लगीं।
 देवयानी ने कविता प्रस्तुत की
तुम समय को ढूंढ रहे हो, सुनो फिर
समय है जीवन और मृत्यु के बीच का अंतराल।
 विमल वर्मा ने कहा-
मां आटे में गूध कर,पानी के संग प्यार।
सिर्फ़ रोटियां ही नहीं, रचती है संसार।
 जयकृष्ण राय ‘तुषार’ ने इलाहाबाद की वसंगति पर गीत पेश किया-
मंच विदूषक, अब
दरबारों के रत्न हुए
मंसबदारी, हासिल
करने के बस यत्न हुए
यही
शहर है जहां
कलम की दुर्दिन सहती थी।
 नायाब बलियावी ने तरंनुम में कलाम पेश किया-
क़रीब हो के जो बंजर ज़मीन लगते हैं,
सितारे दूर ही रहके हसीन लगते हैं।
 शाहीन-
सुर्ख लाली लिये शाम ढलने लगी
ओढ़नी सर से नीचे सरकने लगी
ऐसे शरमाई जेैसे खता हो गयी।
प्यार करने को देखो सजा हो गयी।


सागर होशियारपुरी-
घर ही अमादा हो जब खुद लूटने को आबरू,
भागकर जाएं कहां घर से घरों की बेटियां।


एहतराम इस्लाम-
नेवले के दांत सांप की गर्दन में धंस गए,
बोला मदारी भीड़ से ताली बजाइए।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

प्रेमशंकर ने साहित्य के लिए सराहनीय काम किया- प्रो. वसीम बरेलवी

  प्रेमशंकर गुप्त की स्मृति में संगोष्ठी एवं मुशायरे का आयोजन
  इलाहाबाद।खुद साहित्यकार न होते हुए भी प्रेमशंकर गुप्त ने साहित्य के लिए अतुलनीय कार्य किया है। उनके द्वारा किये गये आयोजनों के कारण ही बहुत से साहित्यकार साहित्य की दुनिया में उभरकर सामने आये। यह बात प्रख्यात शायर प्रो. वसीम बरेलवी ने साहित्यि पत्रिका ‘गुफ्तगू’ द्वारा आयोजित संगोष्ठी एवं मुशायरे में कही। 13 अप्रैल को इलाहाबाद स्थित महात्मा गंाधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय के सभागार में कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ शायर बुद्धिसेन शर्मा ने की जबकि मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. वसीम बरेलवी मौजूद रहे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। रविनंदन सिंह, प्रदीप कुमार, अशोक कुमार और दिलीप कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे।रविनंदन सिंह ने कहा कि न्यायमूर्ति गुप्त जीवनभर साहित्य की भलाई के लिए कार्य करते रहे। इटावा में उन्होंने इटावा साहित्य निधि की स्थापना की, जहां वे प्रत्येक वर्ष अखिल भारतीय आयोजन कराते रहे हैं, उनके कार्यों को कभी भुलाया नहीं जा सकता।इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पंकज मित्थल, प्रो. अली अहमद फ़ातमी,एमए क़दीर और और सीनियर एडवोकेट केबी सिंह ने भी विचार व्यक्त किया। बुद्धिसेन शर्मा ने न्यायमूर्ति गुप्त के साथ बिताये गये समय का बखान करते हुए उन्हें साहित्य का महान सेवक बताया।दूसरे चरण में मुशायरे का आयोजन किया। इस मौके पर गुफ्तगू पत्रिका की संपादक नाजि़या ग़ाज़ी, फरीदा बेगम, सबा शोएब,मिस्बा मकसूद, अदीबा मकसूद, हमना शोएब, रमेश नाचीज,अजीत शर्मा ‘आकाश’,भानु प्रकाश पाठक, शुभ्रांशु पांडेय, विमल वर्मा, तलब जौनपुरी, देवयानी, शाहीन, सुचित कपूर,रितंधरा मिश्रा, धनंजय यादव, अवधेश यादव आदि मौजूद रहे.

विचार व्यक्त करते प्रो. वसीम बरेलवी
विचार व्यक्त करते न्यायमूर्ति पंकज मित्थल
विचार व्यक्त करते प्रो. अली अहमद फ़ातमी
विचार व्यक्त करते एम.ए. क़दीर
विचार व्यक्त करते रविनंदन सिंह
विचार व्यक्त करते प्रदीप कुमार
कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

अनुराग अनुभव ने तरंनुम में कलाम पेश किया-
मेरी पलकों तक आये हैं लहर बनकर मेरे आंसू
तुम्हारी याद से लड़ते मिले अक्सर मेरे आंसू।


अजय कुमार की पंक्तियां खूब सराही गईं-
अनाजों की बोरी है सड़ती जहां पर
व बिकता कफन है वहीं हिन्द है जी


वीनस केसरी ने कहा-
एक गुलाब ने खिलने की गुस्ताखी की,
सौ-सौ दावेदार हुए हैं बस्ती में।


नरेश कुमार ‘महरानी’ ने दोहा पेश किया-
गाड़ी दौड़त जल दिखत सड़कें दौड़े नाव
अन्ना जी अनशन करें साथी फेकत दाव।


शायरा सबा ख़ान के अच्छी ग़ज़ल पेश की-
बहुत सी उंगलियां उठ जाती हैं किरदारे हव्वा पर,
कभी गलती से गर दिल का कहा हम मान लेते हैं।


फरमूद इलाहाबादी ने अपने मजाहिया शेर से गुदगुदाया-
जीना हराम कर दिया खंासी जुकाम ने,
आती है एक सांस में दो छींक आजकल।


सौरभ पांडेय का कलाम सराहा गया-
शोर भरी ख्वाहिश की बस्ती, की चीखों से क्या घबराना
कहां बदलती दुनिया कोई उठना गिरना फिर जुट जाना।

शादमा जैदी शाद ने कहा-
हर मंजर खून से सना है यहां
कोई आस्तीन में भी छुपा है यहां



सागर होशियारपुरी ने कहा-
होली में और ईद में मिलते हैं हम गले,
लगता है प्यारा-प्यारा से सागर मिलन हमें।

 

बुद्धिसेन शर्मा का दोहा काबिले गौर था-
मछली कीचड़ में फंसी सोचे या अल्लाह
आखिर कैसे पी गये दरिया को मल्लाह।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

‘गुफ्तगू’ कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित

वर्ष 2012 की प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाने वाली गीतिका श्रीवास्तव को पुरस्कार देती हुई डॉक्टर सोनिया सिहं. बाएं से- शिवपूजन सिंह,इम्तियाज़ अहमद गाज़ी,राजीव राय,गीतिका श्रीवास्तव,धनंजय सिंह,प्रो. सोम ठाकुर,डॉक्टर सोनिया सिंह और वीनस केसरी

साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ की तरफ से इस साल भी ‘गुफ्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता’ का आयोजन किया जा रहा है। जिसके लिए छात्र-छात्राओं से प्रविष्टियां आमंतित्रत की गई हैं। किसी भी शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत छात्र-छात्राएं इसमें शिरकत कर सकतीं हैं। प्रतियोगिता के अंतर्गत प्राप्त होने वाले सभी प्रविष्टियों में से चुने हुए 20 प्रतिभागियों से काव्य पाठ कराया जाएगा, इस मौके पर मौजूद अतिथि इन प्रतिभागियों को अंक देंगे। सभी के अंकों को जोड़ने के बाद विजेता की घोषणा मंच पर ही कर दी जाएगी। प्रथम स्थान पाने वाले को 2100 रुपए, द्वितीय वाले को 1500 रुपए और तीसरे स्थान हासिल करने वाले को 1000 रुपए नकद और प्रशस्ति पत्र दिये जाएंगे। इसके अलावा दस प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार के अंतर्गत 500-500 रुपए की किताबें दी जाएंगी।प्रविष्टियां भेजने की अंतिम तिथि 31 जुलाई 2013 है। प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए निम्नलिखत सामग्री कोरियर या रजिस्टर्ड डाक से भेजनी है।
1.दो रचनाएं (कविता, गजल,गीत, नात आदि)
2.मौलिकता प्रमाणपत्र (एक सादे कागज पर)
3. पासपोर्ट आकार का रंगीन फोटो
4.बायोडाटा  (डाक का पता, मोबाइल और फोन नंबर सहित)
5.अध्ययनरत संस्थान के परिचयपत्र की फोटोकाॅपी
भेजने का पता
संपादक-गुफ्तगू
123ए-1,हरवारा,धूमनगंज,इलाहाबाद-211011
मोबाइल नंबररू 9889316790,9335162091,9453004398
वर्ष 2011 में हुए इस आयोजन में मुख्य अतिथि के तौर पर मशहूर शायर मुनव्वर राना मौजूद थे, जबकि 2012 के आयोजन में बतौर मुख्य अतिथि मशहूर गीतकार प्रो. सोम ठाकुर ने शिरकत की थी।
नोट-1. विशेष परिस्थिति में पुरस्कार की राशि बढ़ाई या घटाई जा सकती है।
वर्ष 2011 कीप्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाने वाली सोनम पाठक हाथ में प्रशस्ति पत्र और चेक लिए हुए. साथ में खड़े  हैं मशहूर शायर मुनव्वर राना, विधायक पूजा पाल और प्रदेश सरकार के तत्कालीन कैबनेट मंत्री नन्द गोपाल गुप्ता नंदी