इलाके के ख़ास समाज सेवी डॉ. श्यामा दत्त
- सुहैल ख़ान
ग़ाज़ीपुर जिले के दिलदानगर के रहने वाले डॉ. श्यामादत्त पांडेय न सिर्फ़ एक चिकित्सक थे, बल्कि इसके साथ-साथ बेहतरीन समाजसेवी और समाज सुधाकर भी थे। बचपन से ही इनको इस बात की चिंता थी कि हमारे यहां के अधिकतर लोगों का जीवन इतना निम्न स्तर का क्यों है? लोगों के जीवन को बेहतर बनाने और उन्हें सही शिक्षा, स्वास्थ प्रदान करने के लिए उन्होंने पूरा जीवन कार्य किया। जिसकी वजह से आज उन्हें बहुत सम्मान के साथ याद किया जाता है। इनका जन्म बभनौलिया गांव के पं. श्यामदास पांडेय के यहां 10 नवंबर 1924 को हुआ। उस समय गांव में प्लेग रूपी महामारी से बचने के लिए गांव से बाहर झोपड़ी में लोग रहते थे। उसी झोपड़ी में आपका जन्म हुआ। आपकी माता का नाम साधवी थी, जो उदार और साक्षात गृहलक्ष्मी थीं। डॉ. श्यामादत्त ने प्रारंभिक शिक्षा बिहार राज्य में अपने नाना के यहां प्राप्त की। आपके नाना उदार, दानी और संस्कृत के प्राकंड विद्वान थे। वे गरीब छात्रों और रिश्तेदारों की सहायता अपने परिवार से छिपकर करते थे। उनके इन्हीं संस्कारों का प्रभाव आप पर भी पड़ा। इसके बाद आपने दरभंगा के चिकित्सा शिक्षालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और बिहार के रका चिकित्सा संस्थान में सर्जन के पद पर आसीन हुए।
इनके गांव में शिक्षा के लिए कोई स्कूल नहीं था। इसे देखते हुए इन्होंने 26 जनवरी 1948 को प्राइमरी विद्यालय भवन के निर्माण की नींव रखी। फिर आपने 26 जनवरी 1950 को अपने निजी मकान में ‘नेहरु पुस्तकालय’ की स्थापना की। इससे गांव में शिक्षा और संस्कृति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। दिलदारनगर और आसपास के लोगों की सेवा की खातिर इन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद दिलदानगर बाज़ार में अपना निजी सेवा सदन स्थापित किया, जहां गरीबों, अपाहिजों और असहायों लोगों की चिकित्सीय सेवा शुरू की। सन 1967 में देश सूखे की चपेट में आ गया, लोगों दाने-दाने को मोहताज होने लगे। तब उन्होंने पूरे इलाके में खोज-खोजकर ऐसे लोगों तक भोजन पहुंचाया, जिन्हें खाना नसीब नहीं हो रहा था। इनकी इसी सेवा को देखते हुए आपको ‘दीनबंधु’ की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित किया गया।
डॉ. श्यामादत्त जी का जीवन लगभग 50 वर्षों का ही रहा। इनकी मृत्यु अचानक 05 जनवरी 1973 को पटना में हो गई। डॉ. श्यामादत्त पांडेय चिकित्सा के क्षेत्र के साथ साहित्य और संगीत के क्षेत्र में भी एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे। उनके ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय डॉ. सुधाकर पांडेय ने भी इस परंपरा का निर्वाह किया। एक व्यस्त चिकित्सक होते हुए भी संगीत, साहित्य और समाज के क्षेत्र में अपने पिता के साहित्यिक कार्यों को संजोने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। उनके जीवन शैली में पिता के आदर्श और विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। डॉ. सुधाकर पांडेय के पुत्र सिद्धार्थ पांडेय अपने पिता के सम्मान में प्रत्येक वर्षों कई क्षेत्रों में लोगों को ‘डॉ. सुधाकर पांडेय अवार्ड’ से सम्मानित कराते हैं।
( गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित )


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