मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

गुफ्तगू की मासिक गोष्ठी में बही कविताओं की बयार

इलाहाबाद। साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन इलाहाबाद स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्टृीय हिन्दी विश्वविद्यालय के शाखा में किया गया, जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि मुनेन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने किया। मुख्य अतिथि डाॅ. अमिताभ त्रिपाठी थे, जबकि विशिष्ट अतिथि के तौर पर वरिष्ठ शायर सागर होशियापुरी मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। इस अवसर पर ‘गुफ्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता’ के विजेताओं को डीवीडी और फोटो वितरित किया गया।

सबसे पहले अनुराग अनुभव ने तरंन्नुम में कविता पढ़कर महफिल में जोश पैदा कर दिया-
मैं हवा पुरवई,तुम महक सुरमई /आओ मिलकर के कर दें समा जादुई।

युवा कवि पंकज फराज ने कहा-
फूलों की खूश्बू चुराने लगे हैं/मेरे महबूब ख़्वाब में आने लगे हैं।

भानु प्रकाश पाठक की कविता यूं थी- 
धीरे-धीरे कगना उतारा बहुरानी, सेंदुरा क खतम भइल तोहरे कहानी

कुमार विकास ने लय में गीत पढ़ा-
करीब आसमां के और ज़मीं से दूर होना है, जरा मगरूर हूं फिर भी बहुत मगरूर होना है

लवकुश कुमार आनंद की कविता भी सराहनीय रही-
आज हजारो के संग, संग अलख जगाने आया,रूप वतन का फिर वह नया दिखाने आया है।

नितीश कुमार कुशवाहा ने कहा-
हालात हुये हैं कुछ यूं हर वक्त/ खल्वत को खलाओ से लड़ते देखा है।

नित्यानंद राय ने कहा-
तुम भी शांत रहो, मत चिल्लाओ, तुम्हारे खेतों में भी उगेंगे माल, मत घबराओ।

 

रमेश नाचीज़ की ग़ज़ल काफी सराही गई-
दर्द हम अपने दिल का सुनाने लगे/लोग महफिल से उठ-उठ के जाने लगे।
क्या नसीहत मैं नाचीज़ देता उन्हें/ऐब मेरे ही जब तो गिनाने लगे।

पीयूष मिश्र ने कहा-
मैंने ये कैसी सजा पाई है, घर की मेरे रोशनी चुराई है।
दूर हो जाता है वो चुभ-चुभकर, और कहता है मेरा भाई है।

कवयित्री गीतिका श्रीवास्तव ने तरंन्नुम ने गीत पेश किया-
दुनिया के बेडि़यों को तोड़ते जाना/खुद से जो वादा है उसको निभाना।
पग-पग काटे हैं ये ना बिसराना/इन कांटों के ही आगे खुशी का खजाना।

विमल कुमार ने कहा-
नहीं सिर्फ़ पत्थरों में, नहीं बस किताबों में,कण-कण में व्याप्त सर्वत्र चेतना हूं मैं।

 

शुभ्रांशु पांडेय ने व्यंग्य लेख पढ़ा-
आप लोग हिन्दी में किसी से कहते हैं न बैठ जाओ, सो जाओ, और तो और आ जाओ, अब ये बताइये कि अगर कोई बैठ गया तो मतलब ये हुआ कि उसकी क्रिया की गति समाप्त हो गयी है, फिर अगर उसे चलना कहा जाये तो वो क्या चलेगा।

मंजूर बाकराबादी ने व्यंग्य कविता पढ़ा-
रिश्वत चाहे जितनी ले लो, बाबू हमको नौकरी दे दो
चाय के बदले पव्वा पी लो, बाबू हमको नौकरी दे दो।

विपिन श्रीवास्तव ने कहा- 
आइये मत शरमाइये बैठिये हुजूर नवाजि़श आपकी

शैलेंद्र जय ने कहा-
जीने की कला मैंने फूलों से उधार ली है, यूं ही नहीं जि़न्दगी कांटों में गुजार ली है।

अजय कुमार ने कहा-
मर्यादा के भाव न जाने बनते रघुनंदन, कट्टा पिस्टल हाथों में हैं माथे पर चंदन।
वीनस केसरी की कविता लोगों ने पसंद किया-
खूबसूरत दृश्य हम गढ़ते रहे, शब्द चित्रों की सफलता के लिए
शह्र धीरे-धीरे, बन बैठा महीन, दिख रहा हर कोई, कितना जहीन।गांव दंडित है सहजता के लिए।


 
तलब जौनपुरी ने कहा-
मेरी वो सरबुलन्दी है कोई छू भी नहीं सकता,
मुकाबिल अपनी हस्ती के केाई हस्ती नहीं लगता

अखिलेश द्विवेदी की कविता यूं थी-
इस जग में सब कुछ सुंदर है, तुम सुंदरता की किताब हो।
कितना मैं चाहूं तुझको, तुम मेरी चाहत का खिताब हो।

इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की ग़ज़ल भी सराही गई-
जख़्म देगा न बद्दुआ देगा, ग़म मेरा तुझको आसरा देगा,
शाम को तेरा छत पे आ जाना, शह्र में हादसा करा देगा।

सुषमा सिंह की ग़ज़ल सराहनीय रही-
कितने जज़्बात हमारे दिल में, धूप-बरसात हमारे दिल में।
बाहरी क़ैद न हथकडि़यां हैं, हैं हवालात हमारे दिल में।

सौरभ पांडेय ने कहा-
रुइया बादल कोना-कोना,परती धरती दौड़े छौना।
आस दुपहरी सोख गयी रे, हरिया तन की क्यारी-क्यारी।आओ गटकें पान-सुपारी।



नायाब बलियावी की ग़ज़ल ने महफिल में जोश पैदा कर दी-
दिल लगा लीजिए कुछ देर को हंस ली जै मगर,
मुस्तकि़ल इसके लिए आप को रोना होगा।

सागर होशियारपुरी ने कहा-
हमने किसी के इश्क़ में खुद को मिटा दिया,
मेयार आशिक़ी का यूं उंचा उठा दिया।
है पूजना तो पूजिए एक-इक किसान को,
मेहनत से जिसने मिट्टी को सोना बना दिया।
मुख्य अतिथि डा. अमिताभ त्रिपाठी ने कहा-
किसी को इतना न चाहो कि बदगुमां हो जाये
न लौ इतना बढ़ाओ के वो धुआं हो जाये।
       अध्यक्षता कर मुनेन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने कहा-
मन में जहां दुराव हो हमका न ले चलो
प्यार का अलगाव हो, हमका न ले चलो।
हम भाव के गगन के, उड़ते हुए पंछी,
जलता हुआ अलाव हो, हमको न ले चलो।


इस मौके पर आसिफ गा़ज़ीपुरी, अजय कुमार पांडेय, अशोक कुमार स्नेही, खुर्शीद हसन,अजीत शर्म आकाश, अरविन्द वर्मा आदि मौजूद रहे।

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

सराहनीय है गुफ्तगू का प्रयास-सोम ठाकुर


गुफ्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता में गीतिका श्रीवास्तव प्रथम
इलाहाबाद।कैम्पस काव्य प्रतियोगिता की शुरूआत करके ‘टीम गुफ्तगू’ ने एक सराहनीय कार्य किया है, इससे नये लिखने वालों की जबरदस्त हौसलाअफज़ाई होगी। हमें ऐसे प्रयासों का तहेदिल से स्वागत करना चाहिए। इलाहाबाद की सरज़मीन वैसे भी साहित्य के लिए काफी ज़रखेज रही है, गुफ्तगू का यह कदम इसमें एक जबरदस्त बढ़ोत्तरी है। यह बात उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष प्रो.सोम ठाकुर ने ‘गुफ्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के अवसर पर कही। गांधी जयंती के अवसर पर प्रीतमनग के मदर इंटरनेशलन पब्लिक स्कूल में कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम ने की जबकि मुख्य अतिथि प्रो. सोम ठाकुर थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। इस अवसर पर साहित्यिक पत्रिका गुफ्तगू के ‘अब्बास खान संगदिल’ अंक का विमोचन भी किया गया। मेयर श्रीमती अभिलाषा गुप्ता ने दीप प्रज्ज्वलित करके कार्यक्रम का उद्घाटन किया।काव्य प्रतियोगिता के अतंर्गत 20 प्रतिभागियों से काव्य पाठ कराया गया। जजों ने पैनल ने कविताओं के आधार पर प्रतियोगियों को अंक दिया, जिसके बाद विजेताओं का निर्णय हुआ। प्रतियोगिता में प्रथम स्थान गीतिका श्रीवास्तव   ने द्वितीय स्थान पीयूष मिश्र ने हासिल किया, जबकि तीसरे स्थान पर अनुराग अनुभव रहे। इसके अलावा कु. नीलू मिश्रा, दुर्गेश सिंह, अजय कुमार, प्रवीण वर्मा, सुशील द्विवेदी, रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, अमनदीप सिंह,नितीश कुशवाहा, अजय कुमार भारतीय और भानु प्रकाश पाठक को सांत्वना पुरस्कार के रूप में 500-500 रुपये की किताबें दी गईं। आनंद कुमार अािदत्य, दीपक त्रिपाठी,पंकज फराज, नैतिक प्रसाद पांडेय, अवधेश यादव एवं सनी सिंह को सहगाभागिता स्वरूप प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। कार्यक्रम की रूपरेखा पेश करते हुए शिवपूजन सिंह ने कहा कि हमने पिछले वर्ष इस कार्यक्रम का शुभारंभ किया था, लोगों का सहयोग मिलता रहा तो आने वाले दिनों यह आयोेजन और बड़ा रूप लेगा। वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि गुफ्तगू की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है, एक छोटे प्रयास से शुरू की गई यह पत्रिका आज देश-विदेश में नाम कर रही है। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम ने कहा कि आज गुफ्तगू जैसी पत्रिकाओं का ही चलन है, इसकी ख़ासियत यह है कि इसमें हिन्दी और उर्दू दोनों ही साहित्य की सामग्री पढ़ने को मिलती है। मध्य प्रदेश के खंडवा से आये शायर अब्बास खान संगदिल का कहना था कि इलाहाबाद जैसे नगरी में आकर सम्मान पाना मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि है, इसे मैं कभी भूल नहीं सकता। इस अवसर अपर नगर आयुक्त प्रदीप कुमार, जी डी गौतम, संजय कुमार सिंह,सी आर यादव, डाॅ. जे़बा महमूद, धनंजय सिंह, डाॅ. पीयूष दीखित, डाॅ. राजीव  सिंह, हसनैन मुस्तफ़ाबादी, सौरभ पांडेय, वीनस केसरी, नरेश कुमार महरानी, संजय सागर,डाॅ. सोनिया सिंह, तारिक सईद अज्जू, कृष्ण बहादुर सिंह, राजेश कुमार सिंह, नायाब बलियावी, सौरभ पांडेय आदि लोग मौजूद रहे।

दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन करतीं इलाहाबाद की मेयर श्रीमती अभिलाषा गुप्ता
मेयर श्रीमती अभिलाषा गुप्ता का स्वागत करतीं श्रीमती खुर्शीद जहां
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे एहतराम इस्लाम का स्वागत करते वीनस केसरी
एहतराम इस्लाम का स्वागत करते किसलय केसरवानी
उ.प्र. हिन्दी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सोम ठाकुर का स्वागत करते शिवपूजन सिंह
प्रो. सोम ठाकुर का स्वागत करते कृष्ण बहादुर सिंह
अब्बास खान ‘संगदिल’ का स्वागत करते नित्यानंद राय
राजीव राय का स्वागत करते नरेश कुमार ‘महरानी’
वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र का स्वागत करते नरेश कुमार महरानी
मुंडेरा मंडी परिषद के सचिव संजय सिंह का स्वागत करते तारिक सईद अज्जू
इलाहाबाद हाईकोर्ट ke संयुक्त निबंधक हसनैन मुस्तफ़ाबादी का स्वागत करते नायाब बलियावी
श्रीमती इंदु सिंह का स्वागत करतीं कु. नूरजहां
सी.आर. यादव का स्वागत करते आनंद सिंह
डा. ज़ेबा महमूद को प्रतीक चिन्ह भेंट करते प्रो. सोम ठाकुर साथ में खड़े हैं इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और नरेश कुमार महरानी
विचार व्यक्त करतीं मेयर श्रीमती अभिलाषा गुप्ता
कार्यक्रम का संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
विचार व्यक्त करते शिवपूजन सिंह
विचार  व्यक्त करते धनंजय सिंह
काव्य पाठ करते प्रवीण वर्मा
काव्य पाठ करती कु. नीलू मिश्रा
काव्य पाठ करती कु. गीतिका श्रीवास्तव
काव्य पाठ करते अनुराग अनुभव
काव्य पाठ करते सौरभ पांडेय
काव्य पाठ करते अब्बास खान संगदिल
विचार व्यक्त करतीं डा. ज़ेबा महमूद
काव्य पाठ करते प्रो. सोम ठाकुर
गुफ्तगू के अब्बास खान संगदिल अंक का विमोचनः बायें से-प्रदीप कुमार,इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी,नरेश कुमार महरानी, हसनैन मुस्तफाबादी,एहतराम इस्लाम, प्रो. सोम ठाकुर, अब्बास खान संगदिल, श्रीमती अभिलाषा गुप्ता,डा. ज़ेबा महमूद, मुनेश्वर मिश्र, जी डी गौतम, राजीव राय,श्रीमती इंदु सिंह, धनंजय सिंह और राजीव सिंह
ग्रूपिंग फोटोः खड़े हुए बायें से- वीनस केसरी, राजीव राय, नरेश कुमार महरानी, धनंजय सिंह, सौरभ पांडेय,डा. ज़ेबा महमूद, अब्बास खान संगदिल, प्रो. सोम ठाकुर, एहतराम इस्लाम, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, डा.रेखा सिंह, डा. शालिनी सिंह, डा. सोनिया सिंह और शिवपूजन सिंह। फूलमाला पहनकर बैठे हुए बायें से- अनुराग अनुभव, पीयूष मिश्र और गीतिका श्रीवास्तव
तृतीय पुरस्कार विजेता को पुरस्कार देते हुए अब्बास खान संगदिल, प्रो. सोम ठाकुर, डा. सोनिया सिंह और अन्य
द्वितीय पुरस्कार विजेता पीयूष मिश्र को पुरस्कार देते हुए डा.सोम ठाकुर, एहतराम इस्लाम और अन्य
प्रथम पुरस्कार विजेता गीतिका श्रीवास्तव को पुरस्कार देतीं डा. सोनिया सिंह,। बायें से शिवपूजन सिंह, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी, राजीव राय, गीतिका श्रीवास्तव, धनंजय सिंह, प्रो.सोम ठाकुर, डा सोनिया सिंह, वीनस केसरी

विचार व्यक्त करतीं डा. जे़बा महमूद, पीछे खड़े हैं गुफ्तगू के संस्थापक इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
प्रथम पुरस्कार विजेता गीतिका श्रीवास्तव अपनी सहेली के साथ
प्रथम पुरस्कार विजेता गीतिका श्रीवास्तव का बधाई देतीं डा. सोनिया सिंह
कार्यक्रम के दौरान डा. ज़ेबा महमूद से बात करते हुए गुफ्तगू के संस्थापक इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
काव्य पाठ करते नायाब बलियावी
कु. नीलू मिश्रा का सांत्वना पुरस्कार के लिए प्रशस्ति पत्र प्रदान करते प्रो.सोम ठाकुर, साथ में खड़े हैं एहतराम इस्लाम और सौरभा पांडेय
प्रतिभागियों का काव्य पाठ ध्यानपूर्वक सुनते निर्णायक मंडल के सदस्य सौरभ पांडेय, डा. पीयूष दीक्षित और नायाब बलियावी

धनंजय सिंह को प्रतीक चिन्ह भेंट करते प्रो. सोम ठाकुर साथ में खड़े हैं शिवपूजन सिंह, अब्बास खान संगदिल और नरेश कुमार महरानी

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

कैम्पस काव्य प्रतियोगिता एवं विमोचन समारोह दो अक्तूबर को


इलाहाबाद। ‘गूफ्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता’ एवं अब्बास खान संगदिल अंक का विमोचन आगामी दो अक्तूबर को गांधी जयंती के अवसर पर किया जाएगा। इलाहाबाद के प्रीतमनगर में स्थित मदर्स इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल में दोपहर 12ः30 बजे कार्यक्रम का शुभारंभ होगा। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष डा. सोम ठाकुर मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करेंगे,अध्यक्षता वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम करेंगे। कार्यक्रम का उद्घाटन इलाहाबाद शहर की मेयर श्रीमती अभिलाषा गुप्ता करेंगी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के प्रो. अली अहमद फ़ातमी, विधायक पूजा पाल, वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र, चंदौली के जिलाधिकारी पवन कुमार सिंह, उत्तर प्रदेश शासन में वित्त अधिकारी मनीष शुक्ल, चिट्स एंड फंड विभाग के मुख्य लेखाधिकारी जी.डी. गौतम, मंुडेरा मंडी परिषद के सचिव संजय कुमार सिंह, गनपत सहाय पीजी कालेज सुल्तानपुर में उर्दू की विभागध्यक्ष डा. ज़ेबा महमूद, उत्तर प्रदेश राज्य शैक्षणिक संस्थान की निदेशक भावना शिक्षार्थी, डा. पीयूष दीक्षित, डा. राजीव सिंह और मुंडेरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष धनंजय सिंह, अपर नगर आयुक्त प्रदीप कुमार, छिंदवाडा मध्य प्रदेश के शायर अब्बास खान संगदिल, बालमित्र स्कूल के प्रबंधक सी.आर. यादव कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत करेंगे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी करेंगे। कार्यक्रम का संयोजन शिवपूजन सिंह, नरेश कुमार ‘महरानी’, वीनस केसरी, जयकृष्ण राय तुषार, संतोष तिवारी, सौरभ पांडेय, संजय सागर, फरमूद इलाहाबादी, शाहनवाज़ आलम आदि कर रहे हैं। कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के अंतर्गत सभी शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं से प्रविष्टियां मांगी गई थीं। आयी हुई कुल प्रविष्टियों में से 15 लोगों का काव्यपाठ कार्यक्रम के दौरान कराया जाएगा। मौजूद अतिथि सभी को एक से दस के बीच अंक देंगे। सभी के अंकों को जोड़ने के बाद विजेता का निर्णय होगा। प्रथम पुरस्कार के रूप में 1500 रुपए नगद, द्वितीय पुरस्कार 1000 रुपए और तृतीय पुरस्कार के रूप में 751 रुपए दिए जाएंगे। इसके अलावा 10 प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार के रूप में 500-500 रुपए की साहित्यिक पुस्तकें दी जाएंगी।
                                   

सोमवार, 17 सितंबर 2012

हसैनन मुस्तफ़ाबादी के सौ शेर



जो खालिक़े अकबर है वह क़ुर्बे रगे जां है,
हर आन वही सब का हाफि़ज़ है निगहबां है।1

अगर चाहे कोई हक़ आश्ना का मरतबा देखे।
उसे चाहिए सूये बहारे करबला देखे। 2

है नूर जिस जगह वहां ज़ुल्मत का क्या सवाल,
शामिल नहीं ग़ुरूर कभी इनकेसार में।3

हम तो है राह में आंखें को बिछाये अपने,
जाने क्यों मुझसे वह बेज़ार नज़र आते हैं।4

लाख वह नमाज़ी हो पारसा नहीं होगा।
मां को जो अज़ीयत दे बावफ़ा नहीं होगा।5

कहना पड़ेगा रहमतों वाला हुसैन को,
नाना इन्हीं का रहमतुललिल आलमीन है।6

आज भी सिलसिलये जौरो जफ़ा बाक़ी है,
हैं गले आज भी मज़लूमों के खंजर बदले।7

हो मुख़्तसर हयात मगर आगही के साथ,
सदियां भी कम हैं गर हो बशर गुमरही के साथ।8

बख़्शी हुई जहां को है कुदरत की आबरु,
है हुस्ने कायनात से फितरत की आबरु।9

सिर्फ़ दावये मुहब्बत हो नहीं सकती दलील,
है वही महबूब जो रखे मुहब्बत का भरम।10

अज़मते रोज़ा है या शाने करीमी उसकी,
रोज़े में सोना इबादत के बराबर निकला।11

रोज़ा ये पैरों का है ये न ग़लत उठे कभी,
वरना रोज़ा भी चला जायेगा रफ़तार के साथ।12

जहां में बाप का साया अजीब होता है,
जो उठ गया तो कहां फिर नसीब होता है।13

मुसतहिक़ की जो मदद करने को तैयार न हो,
ग़ौर से देखिए वह कोई रेयाकार न हो।14

रुख़ मिलाता नहीं जब हाथ में आता है क़लम।
बा अदब सर को झुकाये हुए चलता है क़लम।15

दुनिया का भी नेेज़़ाम अजीबो गरीब है,
किस्मत का है धनी तो कोई बदनसीब है।16

कमाले फन की करो आगही की बात करो।
जो जि़न्दगी है तो फिर जि़न्दगी की बात करो।17

है ज़रूरत इसमें किरदारों अमल के तेल की,
जब नहीं सकता कभी भी दौलतो ज़र का चराग़।18

किस क़दर साबित क़दम है ज़ुल्मो इसतेबदाद पर,
मुनहसिर है ये किसी इंसां की इसतेदाद पर।19

उंगली पकड़ के राह दिखाते रहे जिसे,
देखा उसी के हाथ में पत्थर लिए हुए।20

होगा क्या अंजाम इसका ये खुदा पर छोड़ दो,
राहे हक़ में हर क़दम बढ़कर उठाना चाहिए।21

मूसा के आशिकों का हर सू है बोलबाला,
फि़रऔनियत जहां में हाथों को मल रही है।22

बेहतर का जि़क्र कीजिए बेहतर के सामने,
खोलो ज़ंबां हमेशा बराबर के सामने।23

कमज़र्फ खोलता है ज़बां के बेमेहल मगर,
खोली ज़बां तो नस्ल की पहचान हो गई।24

इस दौर बेहाई का ये हाले ज़ार है,
है जिस्म पर लेबास मगर तार-तार है।25

क़त्ल और ग़ारतगरी का शोर आलमगीर है।
इसलिए सहमा हुआ हर एक जवानो पीर है।26

क्या बताउं बेरुखिये हुस्न क्या-क्या कर गई।
उनको भी रुसवा किया मुझको भी रुसवा कर गई।27

खेल बिल्कुल इस सदी में दोस्ताना हो गया।
एक घिरौंदे का बनना और मिटाना हो गया।28

दुनियाओ आखि़रत में हुआ है वही ज़लील,
जिसकी ज़बान चलती है तलवार की तरह।29

कल भी हम थे अम्न के हामी हैं हामी आज भी,
ज़ुल्म परवर जे़हन में फितनागरी है आज तक।30
क़दम को सोच कर रखना ज़रूरी है जवानी में,
सफ़र पुरखार राहों में बहुत दुश्वार होता है।31

कोई हसनैन न हमदर्द ग़रीबों का मिला,
यंू तो इस शह्र में रातो को मैं अकसर निकला।32

बेझिझक वह ग़ैर की महफि़ल में बैठे थे मगर,
देखते ही बज़्म में मुझको हया आने लगी।33

शब में पड़ती है मुसीबत तो ये आता है ख़्याल,
क्या खुशी की भी ज़माने में सहर होती है।34

जो मसलहतन भी कुछ कहते नहीं वह सुन लें,
हक़ बात न कहना भी ज़ालिम की हिमायत है।35

बाली में आ के बैठ गये मंुह को फेरकर,
क्या ये भी कोई रस्मे अयादत का नाम है।36

मेरी वफ़ा की झलक मेरी बात बात में है।
तुम्हारे ज़ुल्म का चर्चा तो कायनात में है।37

राह में उल्फ़त की जो कांटा गड़ा वह रहा गया,
हंू तो मंजि़ल पर मगर वह चुभ रहा है आज भी।38

अब मेरे आंसू भी मेरा साथ दे पाते नहीं,
सामना है रोज़ मेरा एक नई उफ़ताद से।39

राह दुश्वार है हर गाम पे दुश्वारी है,
फिर भी सहराये मुहब्बत का सफ़र जारी है।40

वह उलझ जाते हैं मुझसे छोटी-छोटी बात पर,
मैं समझता हूं कि ये भी हुस्न के जौहर में है।41

कूये जानां में हमारी आबलापाई न देख,
थक के बैठा था मगर अज़्मे सफ़र पैदा हुआ।42

देश प्रेमी बन गये हैं आज सब अहले नज़र,
बेखुदी छायी है ऐसी कुछ नहीं अपनी ख़बर।43

क्या जियाले थे वतन पर मिट गये एक आन में,
फ़कऱ् पर आने न पाया शाने हिन्दुस्तान में।44

वह अपनी बज़्म में करते हैं तज़किरा मेरा,
यक़ी है इल्म उन्हें मेरे हाले ज़ार का है।45

लाख अगि़यार की कसरत सही हसनैन मगर,
हो भरोसा जो खुदा पर तो है कि़ल्लत काफी।46

महलों से सिमटे गोशये तुरबत में आ गये,
अब पूछिए कि दौलतो कसरत को क्या हुआ।47

गेसूये ख़म हैं चेहरये अनवर पे इस तरह,
दोनों के दरमियान दिले ज़ार आ गया।48

मेरी आवाज़ पे जब कोई न इमदाद मिली,
तब समझ में मेरे आया कि से सहरा होगा।49

जो लिखा है मिरी कि़स्मत में मिलेगा वह ज़रूर,
फ़ायदा क्या सर को दीवारों से टकराने में है।50

कुछ नहीं है हैरत उसमें फेदाकारी न हो।
जिस बशर के भी दिमागो-दिल में खुद्दारी न हो।51

दिलो-दिमाग की एकसानियत भी है दरकार,
बहुत ज़रूरी है ये रब्तबाहमी के लिए।52

मैं तो रुसवा ही हुआ आप भी महफ़ूज नहीं,
क्या कहें आपके कूचे से मैं क्योंकर निकला।53
हर एक काम की ख़ातिर है वक़्त बंदे का,
नहीं है वक़्त तो ख़ालिक की बंदगी के लिए।54

परदे में दोस्ती के है नफ़रत भरी हुई,
अब तो मुनाफक़त भी मुहब्बत का नाम है।55

इब्तेदा मुझसे मुहब्बत की ज़माने में हुई,
सच अगर पूछो हमीं पर इन्तेहा आज भी।56

वह नहीं करता कभी फिरदौस बनवाने का शौक़,
हाल जिसने भी सुना है जन्नते शद्दात का।57

राहे उल्फ़त की अज़ीयत झेलना आसां नहीं,
वह मुहब्बत ही कहां है जिसमें दुश्वारी न हो।58

काश कोई पूछता मेरे दिले नाशाद से,
फ़ायदा हासिल हुआ कुछ नालओ फ़रयाद से।59

राह दुश्वार है हर गाम पे दुश्वारी है,
फिर भी सहराये मुहब्बत का सफ़र जारी है।60

क़तरा वह बस है समा जाये समुन्दर जिसमें,
आग पानी में लगा दे वही चिन्गारी है।61

उनके दरदे इश्क़ का सौदा हमारे सर में है।
वहशते दिल का असर सहरा में दश्तो दर में है।62

दामन का चाक चाके गरेबां से मिल गया,
इतना बढ़ा जुनूं दिले ख़ाना खराब का।63

आंखें बचा के आये अयादत के वास्ते,
क्यों जल गया हसद से कलेजा जनाब का।64

इम्तेहां राहे मुहब्बत में कदम वह क्यों रखे,
जिसकी राहे हक़ में सर देने की तैयारी न हो।65

चल रहे है कूचये जानां में बेखौफ़ो खतर,
जो रहे उल्फ़त में चल सकते नहीं दो गाम भी।66

आग का दरिया है एक जिसमें गुज़रना है ज़रूर,
काश ग़ाफि़ल जान लेता इश्क़ का अंजाम भी।67

तश्नागने वादिये उल्फ़त को प्यासा देखकर।
पानी पानी हो गया ये हाल दरिया देखकर।68

वाये नाकामी की साहिल जब नज़र आने लगा,
डगमगाई  नाव दरिया का कनारा देखकर।69

दोस्तों से इतने खाये धोखे हमने बार-बार,
अब तो डर लगता है मुझको अपना साया देखकर।70

जुनूं में कूचे जानां जब नहीं मिलता बाआसानी,
मेरे हमराह हो जाती है मेरी चाक दामानी।71

बिछाये दुश्मनों ने लाख मेरी राह में कांटे,
मैं उसको रौंद कर पहुंचा सरे मंजि़ल बा आसानी।72

अजल से लेके अबद तक हर किसी के लिए।
खुलूस शर्त है माबैन दोस्ती के लिए।73

इश्क़ में तब है मज़ा जब कि हो एक़रार के साथ।
‘हां’ का मफ़हूम भी हो लहजये इन्कार के साथ।74

पहुंचे बाज़ारे मुहब्बत में मगर उस लम्हा,
जब खरीदार चले जा चुके बाज़ार के साथ। 75

वह संभल सकता नहीं है राह में ठोकर के बाद।
पैर फैलाता है जो भी कामते चादर के बाद।76

कोई भी ऐसा न था देता जो मंजि़ल का पता,
बढ़ न पाये एक क़दम हम तेरे संगे दर के बाद।77

जो लोग यूं तो मुहब्बत की बात करते हैं।
वही तो हर घड़ी नफ़रत की बात करते हैं।78

बजोर रिश्वतो असरात आज मिलती है,
कहीं ये जाती है अब बात मुनसिफी के लिए।79

बिजलियों की ज़द पे मेरा आशियाना आ गया।
इस बहाने ख़ैर उनको मुस्कुराना आ गया।80

जुनूने इश्क़े ले जाता है सहरा की तरफ़ ज़बरन,
मेरा रुख़ जब भी सूए कूचए दीदार होता है।81

मतलब की दोस्ती जो किसी को किसी से है।
देखा गया है बाद में नफ़रत उसी से है।82

मुल्क से उल्फ़त का किस्सा खुद नुमायां हो गया।
लब पे जब ‘हसनैन’ के कौमी तराना आ गया।83

मेरे नालों में कम अज़ कम ये असर पैदा हुआ।
नींद उनकी उड़ गई और दर्द सर पैदा हुआ।84

तोहमत किसी पे इसकी लगाना फुजूल है,
बदनामी जब भी होती है अपनी कमी से है।85

इस दौर में सच्चाई ढूंढे से नहीं मिलती,
अफ़वाहों की दुनिया में नायाब सदाक़त है।86

राह में उल्फ़त की जो कांटा गड़ा वह रह गया,
हूं तो मंजि़ल पर मगर वह चुभ रहा है आज भी।87

हर ऐब हुनर अब है ये दौरे सियासत है।
ना अहल रक़ीबों के हाथों में हुकूमत है।88

पहलू बदलना छोडि़ए मक्कार की तरह।
जिसकी तरफ़ भी रहिए तरफ़दार की तरह।89

सूये मंजि़ल जो नहीं चलते हैं रस्ता देखकर।
ठोकरें हमराह हो जाती हैं अन्धा देखकर। 90

एक बेकसी शिकवए बेदाद भला क्या करती,
रंग बदले हुए हालात थे खंज़र की तरह।91

क़ैस और फरहाद के किस्से हमें बतला गए,
कुए जानां का लगाना रोज चक्कर चाहिए।92

तिफ्ल मतकब न कीजै फलसफे की गुफ्तगू,
फलसफे की बात करिए फलसफी की देखकर।93

दर्द की तरह उठे दिल की तरह बैठ गए,
पास उल्फ़त किया मैंने लबे जां होकर।94

अल्लाह का करम है ये अक्सर ज़मीन पर।
अब्रे करम बरसता है बंज़र ज़मीन पर।95

मोहब्बत में है क्या लज़्ज़त इसे मुश्किल है समझाना,
कोई तो बात है जो जान दे देता है परवाना।96

ज़माना सुन रहा था शौक़ से इसका नहीं शिकवा,
हमें नींद आ गई खुद कहते-कहते अफ़साना।97

किरदार आदमी की है पहचान देखिए।
मत दूसरों का अपना गिरेबान देखिए।98

जहां में बुझ गए कब से मुरव्वतों के चिराग़,
है नफ़रतों का अंधेरा खुलसे यार कहां।99

किस तरह से गुजरते हैं फुरकत में रात दिन,
पूछे ये कोई लज़़्ज़ते दिल बेक़रार से।100


गुफ़्तगू के सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित 

- हसनैन मुस्तफ़ाबादी
155-सी/1सी/1ए, अली नगर, करैलाबाग़
इलाहाबाद-211016
मोबाइल नंबर: 9415215064, 8004904872


शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

नातिया शायरी में बदलाव

                                                 इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
इलाहाबाद पुरातन काल से ही संतों-फकीरों,खानकाहों और दायरों का शहर रहा है। इन दायरों और खानकाहों में शायरों का जमावड़ा लगता रहता है। शेरी नशिस्तों और मुशायरों के रिवाज़ के कारण यहां पर शायरी परवान चढ़ी है। सूफि़याना मिजाज़ और रिवाज़ होने की वजह से यहां पर रहने और आने जाने वाले अधिकतर आलिम और बुजुर्ग नातिया शायरी करते रहे हैं। मगर आज नातिया शायरी के टेृंड में जहां बदलावद देखा जा रहा है, वहीं नौजवान शायर नातिया शायरी से दूर हो रहे हैं। हजरत मुहम्मह सल्ल. की शान में की जाने वाली नातिया शायरी के कारण ही राज़ इलाहाबादी, शम्स इलाहाबादी, माहिरुन हमीदी, चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी, अज़ीज़ इलाहाबादी और माहिर इलाहाबादी जैसे शायर न सिर्फ़ भारत में वरन दूसरे मुल्कों में भी मक़बूल रहे हैं।
आज भी इस शहर में शायरों की अच्छी ख़ासी जमात मौजूद हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 150 उर्दू शायर इलाहाबाद में हैं, मगर इनमें से डा. असलम इलाहाबादी, शमीम गौहर, ज़मीर अहसन, इक़बाल दानिश, अरमान ग़ाज़ीपुरी, महमूद रम्ज़, हबाब हाशमी, हसीब रहबर, स्वालेह नदीम, अख़्तर अज़ीज़, फरमूद इलाहाबादी, गुलरेज़ इलाहाबादी, सलाह ग़ाज़ीपुरी और फरहान बनारसी जैसे कुछ गिने-चुने नाम ही हैं, जो बकायदा नातिया शायरी कर रहे हैं। इनके अलावा ज़्यादातर लोग नातिया शायरी करने में असमर्थ से हैं। असलम इलाहाबादी की पुस्तक ‘उर्दू शायरी का आग़ाज़ और इख्तेता’ के मुताबिक 18वीं और 19वीं सदी के इलाहाबाद के प्रमुख शायर शाह गुलाम कुतुबुद्दीन, नासिर अफ़ज़ली, शाह मोहम्मद अज़ीम, शाह मोहम्मद अजमल, भिखारी दास अज़ीज़, अब्दुल रहमान, अहमद जान कामिल, शाह आला नजफ़, शाह अबुल अली, शाह अज़मल, आज़म अफ़ज़ल, तैसी ज़फ़र आदि हैं। इनमें से अधिकतर यहां पर स्थित बारह दायरों में ही उपस्थित होकर नातिया शायरी सुनते-सुनाते रहे हैं। नातिया मजमूए के हिसाब से सबसे पहले सरवर इलाहाबादी की किताब ‘नूरे अजल’ 1956 में प्रकाशित हुई। इसके बाद नातिया मजमूओं के प्रकाशन का सिलसिला काफी दिनों तक ठप रहा। इस ख़ामोशी को अख़्तर अज़ीज़ ने 1997 में तब तोड़ा जब उनकी पुस्तक ‘सुब्हे मदीना तैबा की शाम’ प्रकाशित हुई। 1997 में ही तुफैल अहमद मदनी की ‘दिले रेजां-रेजां’, सन 2000 अतीक़ इलाहाबादी की ‘सरकार की गली में’ और 2005 में शमीम गौहर का नातिया मजमूआ ‘जजाए खैर’ प्रकाशित हुआ। डा. गौहर की 1988 में ‘नात के चंद शोअरा मुतकद्दमीन’ और 1996 में ‘उर्दू का नातिया अदब’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित हुई है। राज़ इलाहाबादी, माहिरुल हमीदी, शम्स इलाहाबादी, अज़ीज़ इलाहाबादी और स्वालेह नदीम वगैरह के किताबचे ‘पाकेट नातिया बुक’ समय-समय पर छपते रहे हैं।
बहरहाल, नातिया शायरी के परवान चढ़ने में यहां के दायरों का अहम किरदार रहा है। आज भी बारावफात की नौ तारीख को नासिर फ़ाखरी और 26 तारीख़ को दायरा शाह अजमल में नातिया मुशायरा होता है और यह सिलसिला तकरीबन 50 सालों से जारी है। बारावफात के ही महीने में करैलाबाग कालोनी में चार दिनों तक ईद मिलादुन नबी का आयोजन किया जाता है, जिसमें नातिया मुशायरा होता है। इसके अलावा बारावफात के और ग्यारहवीं के महीने में इलाहाबाद के विभिन्न मुहल्लों में ईद मिलादुन नबी और नातिया महफिलें सजती हैं। इन्ही महफिलों में शोअरा की हैसियत से शामिल होने के लिए लोग नात कहते हैं। मगर आज के अधिकतर नौजवान शायर नात कहने से पीछे हटते हैं। कुछ लोग तो मजहबी जानकारी कम होने की वजह से नात नहीं कहते, तो कुछ मज़हबी मिजाज न होने के कारण।
शमीम गौहर यूनिवर्सिटी और डिग्री कालेजों में नात पढ़ाने वाले कुछ अध्यापकों की आलोचना करते हैं। उनका मानना है कि जो लोग स्वयं मजहबी नहीं हैं, रसूल के बताये रास्तों पर नहीं चलते, उन्हें कोई हक़ नहीं है कि वो दूसरों को नात पढ़ाएं। उनका यह भी मानना है कि नात में कोई गलती होनी ही नहीं चाहिए और इसमें तनकीद के सारे दरवाज़े खोल देना चाहिए। शमीम गौहर की बात का जवाब देते हुए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में उर्दू के प्रोफेसर अली अहमद फ़ातमी कहते हैं ‘ वो ही इस्लाम को सही समझते हैं, तो वे ग़लतफ़हमी में हैं, मैं भी मुसलमान हूं, इसलाम को समझता हूं। पढ़ाना एक अलग फन है।’
शायरी ने अपना रुख़ बदला और ज़दीद शायरी की शुरूआत हो गई। नातिया शायरी में भी कुछ बदलाव देखा जा रहा है। नात शब्द के मायने ‘रसूल की तारीफ़’ होता है। लेकिन कुछ नात के शायरों ने देवबंदी और बरेलवी आदि के खेमों में बंटकर एक दूसरे के खिलाफ़ वाले शेर अपनी नातिया शायरी में शामिल कर रहे हैं। सभी मानते हैं कि यह ग़लत रिवाज़ की शुरूआत है। लेकिन शमीम गौहर इनसे अलग राय रखते हैं ‘नात’ रसूल की शान में कही और पढ़ी जाती है। इस हिसाब से रसूल की नाफरमानी करने वालों की आलोचना नात में होनी चाहिए।’ ज़मीर अहसन इलाहाबाद की नातिया शायरी की अच्छी संभावना को सिरे से  ख़ारिज़ करते हैं, तो शमीम गौहर और नस्र कुरैशी मानते हैं कि इलाहाबाद में नातिया शायरी की अच्छी संभावना है। प्रो. फ़ातमी नात के बहुत आगे बढ़ने की वजह बताते हुए कहते हैं कि रसूल ने दुश्मनों के साथ तअल्लुक, तिज़ारत, सियासत और लड़ाई की नज़ीर अपनी जि़न्दगी में पेश की है, लिहाजा इन सभी पहलुओं की चर्चा नात में होनी चाहिए। सिर्फ़ सरापा नूर और जुल्फ वगैरह तक ही बातें सीमित नहीं होनी चाहिए।
सहारा समय में 06 अगस्त 2005 को प्रकाशित