शनिवार, 7 नवंबर 2026

पत्थर फेंकने से चली गई मुर्गी के बच्चे की जान 

आत्म-ग्लानि में कैफ़ी आज़मी ने दो दिन तक नहीं उठाई क़लम 

अंतिम समय में आज़मगढ़ स्थित अपने गांव आकर किए कई काम

                                                              - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

कैफ़ी आज़मी
 

कैफ़ी आज़मी ऐसे शायरों में शुमार हैं, जिन्होंने ज़िन्दगी के अंतिम पल तक इंसानियत की बेहतरी के लिए काम किया, वर्ना आमतौर पर लोग मकबूलियत और बुलंदी हासिल करने के बाद अपने पिछड़े पैतृक गांव की तरफ मुड़कर नहीं देखते और कभी गांव आना भी पड़ता है तो महज एक-दो दिन के लिए। मगर, कैफी आजमी का इस मामले में कोई सानी नहीं था। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी पांच वर्ष से अधिक का समय आजमगढ़ स्थित अपने गांव मेजवां में बिताया। फ़ालिज़ का शिकार होने के बाद जब वे अपने गांव आए, तब भी वे शांत बैठकर आराम नहीं करते रहे, बल्कि इस दौरान भी बेहद सक्रिय रहे। गांव को दूरसंचार से जोड़ा, पक्की सड़क बनवाई, पोस्ट आफिस में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई। आजमगढ़ से दिल्ली के लिए ट्रेन चलवाई, आज उन्हीं की कृति ‘कैफियात’ के नाम पर आज़मगढ़ से दिल्ली के लिए कैफियात ट्रेन चल रही है। उनकी बेटी शबाना आज़मी का कहना है-‘‘मेरे वालिद का मानना था कि देश की तरक्की तभी हो सकती है, जब गांव की तरक्की हो। यही वजह है कि फ़ालिज की गिरफ्त में आने के बाद वे मुंबई छोड़कर आजमगढ़ आ गए थे।’’ शबाना को इस बात पर बहुत फख्र है कि आजमगढ़ के अलावा, दिल्ली, लखनऊ और मुंबई आदि शहरों में उनकी जन्मतिथि और पुण्यतिथि लोग बड़ी इज़्ज़त मनाते हैं।

लता मंगेशकर(बाएं) और शौक़त (दाएं) के साथ बीच में कैफ़ी आज़मी।


 एक बार बातचीत में कैफी आज़मी की पत्नी शौकत कैफी ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया था-‘‘एक दिन घर से सवा चार बजे अस्पताल पहुंची, कैफी बिस्तर पर पड़े थे। उनके कमरे के दरवाजे पर ‘डू नाट डिस्टर्ब’ की तख़्ती लगी थी। मैं खुद भी चार बजे से पहले उनके कमरे में दाखिल नहीं हो सकती थी। अस्पताल में मैंने देखा कि एक छात्र कैफ़ी के सिरहाने बैठा अपना दुखड़ा सुना रहा है। सिरदर्द के बावजूद वह बड़े ध्यान से उसकी बातें सुन रहे हैं। मैं देखते ही झल्ला गई। मैंने कहा, ‘हद हो गई, डाक्टर ने आपको बात करने से भी मना किया है और आप उनसे बात कर रहे हैं।’ फिर मैंने उस लड़के से कहा, मियां तुम बाहर जाओ। लड़का उठकर जाने लगा तो कैफी ने अपनी लड़खड़ाती आवाज में कहा, ‘शौकत यह स्टूडेंट है इसे कुछ मत कहना। हो सके तो इसकी जो भी ज़रूरत हो उसे पूरा कर देना।’ अच्छा-अच्छा कहकर मैं भी बाहर निकल गई। पूछने पर पता चला कि वह अहमदाबाद का रहने वाला है, सौतेली मां के अत्याचार से घबराकर भाग आया है, वह कैफी से काम मांगने आया था।’’ 

बाएं से- बाबा आज़मी, तन्वी आज़मी, शौक़त(कैफ़ी आज़मी की पत्नी), कैफ़ी आज़मी, शबाना आज़मी और जावेद अख़्तर।


 एक अन्य घटना का जिक्र करते हुए शौकत कैफी ने बताया था ’‘एक बार लॉन में बैठे लिख रहे थे। फूल-पौधों से उन्हें बड़ा प्रेम था। इसके लिए वे बहुत परिश्रम करते थे। फूलों के बाग में उसी वक्त एक मुर्गी अपने दस-बारह छोटे-छोटे बच्चों के साथ आ गई। वह अपने पंजों से गमलों के बीज कुरेद-कुरेदकर खाने लगी। बस कैफी को एकदम गुस्सा आ गया। उन्हें भगाने के लिए उन्होंने एक छोटा सा पत्थर उनकी ओर फेंक दिया। वह पत्थर मुर्गी के एक बच्चे को लग गया और वह तड़पने लगा। बस फिर कैफी से रहा न गया। वे जल्दी से अपनी जगह से उठे, मुर्गी के बच्चे को पानी पिलाने और किसी तरह से उसे बचाने की कोशिश करने लगे। जब वह बच न सका तो उन्होंने कलमबंद करके रख दिया और दो दिन तक कुछ नहीं लिखा। मुझसे कहने लगे मैंने बहुत ज़्यादती की है। उन्हें आवाज़ से भी भगा सकता था। जब बैठता हूं वह मुर्गी का बच्चा नज़रों के सामने घूमने लग जाता है। मैंने हंसकर बिल्कुल बच्चों की भांति समझाया यह तो अचानक हो गया, आपने जानबूझकर उसकी जान नहीं ली है।’’ 

कैफ़ी आज़मी, शबाना आज़मी और शौकत (कैफ़ी आज़मी की पत्नी)। 

एक अन्य घटना का जिक्र करते कहते हुए शौक़त कैफी ने बताया था-‘‘एक दिन हमारे घर में चोरी हो गई। तमाम बेड, चादर, कम्बल चोरी हो गए। मुझे मालूम था कि चोर कौन है। एक चोर माली हमारे घर किसी प्रकार आ गया था। जब हमारे घर में निरंतर चोरियां होने लगीं और मुझे पता चला कि यह सारा काम उसी माली का है तो मैंने उसे निकाल दिया। फिर एक दिन जब हम घर से बाहर गए हुए थे और घर खुला हुआ था तो अवसर पाकर वह माली फिर आया और घर के तमाम कम्बल और चादरें उठा ले गया। जब मैंने कैफ़ी से कहा कि तुम पुलिस में सूचना दे दो, तो कहने लगे-‘देखो शौक़त बारिश होने वाली है, उस गरीब को भी तो चादरें और कम्बल की ज़रूरत होगी। उसके बच्चे कहां सोएंगे। तुम तो और खरीद सकती हो लेकिन वह नहीं।’ मैंने अपना सिर पीट लिया, अब क्या जवाब देती।’’

 इन घटनाओं से सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कैफी सिर्फ़ शायर नहीं थे, बल्कि इंसानों की बेहतरी के लिए काम करने का जज़्बा उनके अंदर कूट-कूट कर भरा था। जीवन के अंतिम क्षठों तक लोगों के लिए काम करते रहे, उनकी यह कार्यशैली आज के लोगों के लिए बड़ी सीख़ है। प्रगतिशील आंदोलन को बेहरत ढंग से जारी रखने में भी उनका बड़ा योगदान रहा है। मुंशी प्रेमचंद, सज्जाद ज़हीर और फै़ज़ अहमद फै़ज़ के बाद इन्होंने अली सरदार जाफ़री के साथ मिलकर प्रलेस को आगे बढ़ाने के लिए उल्लेखनीय काम किया है। न सिर्फ लेखन स्तर पर बल्कि वास्तविक जिन्दगी में भी।

कैफ़ी आज़मी के साथ शबाना आज़मी।

कैफी आजमी का असली नाम अतहर हुसैन रिज़वी था। 14 जनवरी 1919 को आजमगढ़ के मेजवां गांव में पैदा हुए थे, और 10 मई 2002 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। घर में ही शेरो-शायरी का अच्छा-ख़ासा माहौल था। खुद उनके घर में शेरी-नशिस्त का दौर चलता था। कैफी ने 11 साल की उम्र में ही शेर कहना शुरू कर दिया था। पहली बार उन्होंने अपने घर में नशिस्त के दौरान कलाम पेश किया। जिसे सुनकर उनके पिता बहुत खुश हुए। उन्होंने कैफ़ी को पार्कर पेन और एक शेरवानी दी। इसी के साथ उनका उपनाम ‘कैफ़ी’ रख दिया। तब से ही वे कैफ़ी आज़मी हो गए। वे बचपन से ही बहुत संवेदनशील थे, लोगों के दुःख-दर्द, भूख एवं गरीबों से बहुत प्रभावित होते थे, हमेशा उनकी मदद करने की फ़िराक़ में रहते थे। रूस में जब इंक़लाब आया तो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी उसका समर्थन कर रही थी। कैफ़ी कम्युनिस्ट पार्टी का समाचार पत्र ‘कौमी जंग’ बड़े शौक से पढ़ा करते थे। जो मज़दूरों और किसानों का समर्थन करता था। कैफ़ी रूस के पक्ष में कविताएं लिखकर ‘कौमी जंग’ अख़बार डाक से भेज देते थे, लेकिन कविताओं के साथ अपना नाम नहीं लिखते थे। उस समय पीसी जोशी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव थे। सज्जाद ज़हीर और सरदार जाफ़री पार्टी के  महत्वपूर्ण नेता थे। ये लोग कविताएं देखते और दंग रहे जाते ‘या अल्लाह ! इतनी अच्छी नज़्में लिखने वाला आखिर अपना नाम पता क्यों नहीं लिखता।’ फिर सोचते कि शायद सरकारी मुलाजिम है, नाम लिखते हुए घबराता है।’ बाद में सज्जाद ज़हीर ने पता कर लिया कि यह नज़्म कैफ़ी ही लिखकर भेजते हैं, उन्होंने कैफ़ी से मुलाकात की और उनसे मुंबई चलने को कहा। कैफी उनके साथ मुंबई चले गए। फिर वहां फिल्मी दुनिया समेत तमाम लोगों से उनकी मुलाकात हुई, वहां भी बहुत साल गरीबी में बिताए। 

 उनकी प्रमुख कृतियों में आखि़री शब, झंकार, कैफियात और आवारा सज़्दे हैं। उन्होंने तमाम फिल्मों के लिए भी गीत लिखे, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला।

(गुफ़्तगू के अप्रैल-जून 2026 अंक में प्रकाशित)