हिन्दी छन्दों पर आधारित ग़ज़लों का लेखन
- अजीत शर्मा ‘आकाश’
ग़ज़लकार राजेंद्र वर्मा की पुस्तक ‘हृदय की बात’ में उनकी 88 ग़ज़लें सम्मिलित हैं, जिन्हें उन्होंने कथ्य और भाषिक विधान और हिन्दी छन्दों के आधार पर हिन्दी ग़ज़लों का नाम दिया है। कथ्य के दृष्टिकोण से रचनाओं के वर्ण्य-विषय में विविधता का समावेश परिलक्षित होता है। वर्तमान समाज का चित्रण, जीवन की अनुभूतियां और संवेदनाएं, व्यक्ति एवं समाज का दुख-दर्द, सामाजिक सरोकार, आम आदमी का संकट, आज का राजनीतिक परिदृश्य आदि को चित्रित किया गया है। कुछ ग़ज़लों में प्रेम एव श्रंगार के भी मनोभाव परिलक्षित होते हैं तथा वर्तमान सत्ताधारियों के प्रति कटाक्ष एवं तीक्ष्ण व्यंग्य भी किये गये हैं।
रचनाओं में प्रयुक्त भाषा प्रमुखतः सरल एवं सहज है, जो कहीं-कहीं खड़ी बोली के तत्सम एवं तद्भव शब्द भी लिये हुए हुए है। कुछ स्थानों पर संस्कृतनिष्ठ शब्दावली, यथा-प्रहार, विहंग, स्वप्न आदि भी हैं। ठकुरसुहाती जैसे आम बोलचाल के शब्द भी हैं। पुस्तक में हिन्दी ग़ज़लों के नाम पर यद्यपि साहित्यिक हिन्दी भाषा का सायास प्रयोग किया गया प्रतीत होता है, फिर भी लाजिम, महफ़िल, फ़ितरत, हयात, अजल, यक़ीनन, जैसे उर्दू-फ़ारसी के शब्द भी ग़ज़लों में आये हैं। शिल्प की दृष्टि से संग्रह की ग़ज़लें कथ्य और भाषिक विधान तथा हिन्दी छन्दों पर आधारित हैं। इनमें उर्दू की उन्हीं बह्रों का प्रयोग किया गया है, जिनके समानांतर हिन्दी कें छन्द उपलब्ध होते हैं। मुजतस, कामिल, वाफ़िर जैसी बह्रों के समानान्तर हिन्दी में छन्द नहीं हैं, अतः उन्हें सम्मिलित नहीं किया गया है। उर्दू की आम प्रचलित बह्रों से तो ग़ज़लों के पाठक परिचित हैं, किन्तु मनोरम, मालिका, विमोहा, बाला, श्येनिका, सम्मोहा, अभीर, विजात, मधुमालती, अरिल्ल, ताटंक जैसे हिन्दी छन्दों को तो मात्र हिन्दी विषय के विद्यार्थी ही समझ सकते हैं। इस दृष्टि से इस पुस्तक को लक्षण ग्रन्थों की श्रृंखला में रखा जा सकता है।
रचनाओं के अंतर्गत वोटें, गबारा, इनसानियत जैसे शब्द आये हैं, जो भाषा-व्याकरण एवं वर्तनी की अशुद्धियों से युक्त हैं। ग़ज़ल व्याकरणानुसार ऐबे-तनाफ़ुर एवं तक़ाबुले रदीफ़ जैसे दोष भी कुछ ग़ज़लों में दृष्टिगत होते हैं। इसके अतिरिक्त कल्मष जैसे क्लिष्ट एवं बोझिल शब्दों का प्रयोग ग़ज़ल के स्वभाव के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। पुस्तक में संग्रहीत कुछ ग़ज़लों के अशआर प्रस्तुत हैं-‘दर्द छलका तो होगी हंसी/दर्द भीतर-ही-भीतर सहो।..... मुखौटा धर्म का शातिर लगाए है/ मगर जनता भी उसको सिर चढ़ाए है।..... अभी तो आंख भर देखा न उनको/ हृदय लेकिन उन्हीं का हो गया है।..... अब सनातन ही अकेला एक दर्शन/ साम्यवादी बनके रहना जुर्म जैसे।..... लोग धर्मांध होते चले ही गए/ अंततः एक दिन हो गया गोधरा।..... व्यथा एक-सी है हमारी-तुम्हारी/ सुनो कुछ हमारी, कुछ अपनी सुनाओ।..... शुक्रिया ऐ वक़्त! तूने मेरी आँखें खोल दीं/ यों तो सब लगते थे अपने, था नहीं अपना कोई।..... हम तो हैं घरबार वाले, हम कहाँ जाएँ/ आप तो झोला उठाकर चट से चल देंगे।..... हज़ारों हेक्टेयर घेरे ज़मीनें धर्म के पटठे/ हमारे भाग लेकिन आ न पायी झोपड़ी-भर की।“
कुल मिलाकर पुस्तक पठनीय एवं सराहनीय है, जो रचनाकार की सृजनशीलता एवं काव्यधर्म को उजागर करती है। इसके माध्यम से हिन्दी छंदों के नामों एवं उदाहरणों के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 112 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 225 रुपये है।
रोचक और सराहनीय अशआर का संकलन
शायर मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ की ‘मशवरा’ शीर्षक लघु पुस्तक में उनकी ग़ज़लों के कुछ चुनिंदा अशआर प्रस्तुत किये गये हैं, जिनके माध्यम से रचनाकार की काव्यात्मक क्षमता एवं सृजनात्मक शक्ति का परिचय प्राप्त होता है। रचनाकार ने अपने मनोभावों को सरल, स्पष्ट एवं सहज भाषा में व्यक्त करने का प्रयास किया है, जिसमें उन्हें सफलता भी प्राप्त हुर्ह है। पुस्तक में संग्रहीत अशआर भावपक्ष तथा कथ्य की दृष्टि से भी रोचक एवं सराहनीय बन पड़े हैं। जीवन में व्याप्त संघर्ष तथा देश-दुनिया की बातें इत्यादि विषयों को शब्द-चित्रों के माध्यम से प्रकाश में लाने का प्रयास किया गया है।
आसान शब्दावली से युक्त इन संग्रहीत अशआर की भाषा सरल, सहज बोधगम्य तथा जनसामान्य की भाषा है। इनमें हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेज़ी के प्रचलित एवं अति प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिसके कारण ये आम बोलचाल की भाषा के निकट के प्रतीत होते हैं। कुछ शे’रों को पढ़कर पाठक को आनन्द की अनुभूति होती है। संग्रहीत हर एक शे’र का अपने आप में एक अलग महत्व है, जिसके माध्यम से रचनाकार की प्रतिनिधि शायरी एवं सृजन क्षमता की झलक देखने को मिलती है। प्रस्तुत हैं इस पुस्तक के कुछ अंश-‘मुझको ‘तन्हा’ जीवन में बस इसी बात का खेद था/जिसके जिसके तलुवे चाटे उन तलुवों में छेद था।’, ‘मंज़िल मिलेगी तुमको सही राह से ‘तन्हा’/ रफ़्तार तेज़ होने से मंज़िल नहीं मिलती।’, ‘तन्हा’ मेरा जुनून भी कितना अजीब है/ गुज़रा वहीं-वहीं से जहां रास्ता न था।’, ‘रोशन हो तेरी याद से दिल मेरा ऐ ख़ुदा/दुनिया ये मुझको भूल भी जाए तो ग़म नहीं।’, ‘ख़ुद को समझ रहा है वो इक आइना ‘तन्हा’/अब टूटने से कैसे भला बच वो सकेगा।’, ‘दास्तां उम्र की कुछ इतनी तवील है आखि़र/चंद लफ़़्ज़ों में इसे कैसे समेटूं ‘तन्हा’।’
पुस्तक में कुछ स्थानों पर भाषिक एवं व्याकरणिक छोटी-मोटी अशुद्धियां भी दृष्टिगोचर होती हैं, यथा- इमान, ख़्याल आदि (वर्तनी/प्रूफ), तुम मुझको, मिल लेंगे (ऐबे-तनाफ़ुर), बरसों के इन्तज़ार....(पृ.-9), सज़ा तजबीज़ है.....(पृ.11) जैसे कुछ अशआर को पढ़ने पर उनमें बह्र-दोष प्रतीत होता है। यह भी ध्यातत्य है कि एक ही शे‘र के मिसरों में तेरी और तुमने, दे और दीजिए जैसा प्रयोग करने से ऐबे-शुतुरगुर्बा (सम्बोधन दोष) आ जाता है, जो पुस्तक के कुछ शे’रों में दृष्टिगत होता है, यथा- क्यों ख़फ़ा हो.... (पृ.-7), अभी बैठो.... (पृ.-28), ये नहीं कहता.... (पृ.-29)। इसे बड़ा दोष माना गया है। रचनाकारों को इस दोष से सदैव बचना चाहिए।कुल मिलाकर विविध रंग लिए हुए चुनिन्दा अशआर की इस लघु पुस्तक को रोचक, पठनीय एवं सराहनीय कहा जा सकता है। इस पुस्तक को गुफ़्तगू पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया गया है, जिसकी कीमत 25 रुपये है।
रोचक पुस्तक ‘फुर्सत किसे है इन दिनों’
‘क़त्अः’ उर्दू,-फ़ारसी नज़्म की एक क़िस्म है, जिसमें गज़ल की तरह क़ाफ़िये की पाबन्दी होती है, और जिसमें कोई एक बात कही जाती है। क़त्आत शब्द इसी क़त्अः का बहुवचन रूप है। हिन्दी काव्यशास्त्र में इस विधा को मुक्तक कहा जाता है। चार पंक्तियों के क़त्अः (मुक्तक) में विभिन्न विषयों पर लिखी गई छोटी-छोटी विचार प्रधान रचनाएं होती हैं। छंदों का परस्पर कोई संबन्ध नहीं होता तथा प्रत्येक छन्द अपने आप में पूर्णः स्वतंत्र एवं संपूर्ण अर्थ वाला होता है। शायर मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ की पुस्तक ‘फुर्सत किसे है इन दिनों’ क़त्आत (मुक्तकों) का संग्रह है। आज के समाज तथा आम आदमी के जीवन में व्याप्त विसंगतियां, विद्रूपताएं, आशा एवं निराशावाद, पारस्परिक सद्भाव और भाईचारे में कमी जैसे बिन्दु पुस्तक के प्रमुख वर्ण्य-विषय हैं।
शिल्प की दृष्टि से रचनाकार ने छन्दविधान का पालन करने का प्रयास किया है, जिससे रचनाओं में लय, प्रवाह एवं गतिशीलता विद्यमान रहती है। लेखन-शैली सामान्य तथा कहीं-कहीं व्यंग्यात्मक भी है। रचनाओं की भाषा सरल, सहज, स्वाभाविक तथा आम बोलचाल की है। इनमे शुद्ध हिन्दी के साथ-साथ उर्दू एवं अंग्रेज़ी के दैनिक बोलचाल के शब्दों का प्रयोग भी किया गया है, यथा-प्रतीक्षा, मर्यादा, स्वीकार, कश्ती, मतलबपरस्त, सिस्टम फ़ेसबुक, मोबाइल आदि।
पुस्तक में संग्रहीत क़त्आत के कुछ अंश इस प्रकार हैं- ‘उलझे हुए हैं लोग मोबाइल में इस तरह/फुर्सत किसे है इन दिनों चेहरा कोई पढ़े।..... जब से बने हैं दोस्त फ़ेसबुक पे बेहिसाब/‘तन्हा’ अब दोस्ती के माने बदले गए हैं।..... इक दिन वक़्त की गर्दिश में मिट जाता है सब ‘तन्हा’/मगर पहली मोहब्बत की निशानी याद रहती है।..... है किस आमाल से लिखी हुई क़िस्मत भला इनकी/ये वो बच्चे हैं जो फुटपाथ को ही घर समझते हैं।..... ज़िन्दगी की कश्ती में इतना न तू सामान भर/आएगा तूफ़ान तो सब कुछ बहा ले जाएगा।..... क्या मिलेगा आपसी झगड़ों से ऐ ‘तन्हा’ हमें/आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए।..... ‘तन्हा’ ये जब लगा कि हैं मतलब परस्त लोग/जीने का हमने अपने तरीक़ा बदल दिया।’
पुस्तक के कुछ क़त्आत काव्यदोष युक्त हैं-जैसे ऐबे-तनाफ़ुर-किसी मिसरे में किसी शब्द के अंतिम अक्षर की उसके बाद वाले शब्द के पहले अक्षर से समानता होने पर शेर पढ़ते समय उसका उच्चारण परवर्तित हो जाता है। नफ़रत़$तो= नफ़रत्तो, इक$कमी= इक्कमी, भर$रहा= भर्रहा, और$रब= और्रब आदि में यह दोष है। हालाँकि यह दोष बहुत हल्का माना जाता है। इसी प्रकार ऐबे-शुतुरगुर्बा (सम्बोधन दोष)-एक ही शे’र के दो मिस्रों में किसी के लिए दो अलग-अलग संबोधनों, यथा-तुम और तू या आप और तुम का प्रयोग। यथा- ‘नाज़ तुम करते हो ‘तन्हा’ किसलिए इस ख़ाक़ पर/शाम तक ढल जाएगी तेरी जवानी सोच लो।’ (पृष्ठ-16)। पृष्ठ सं.-18, 24, 37, 38, 53, 54, 56, 70, 108 आदि पर भी यह दोष है। शायरी एवं काव्य में यह बड़ा दोष माना गया है। किसी भी हालत में इससे बचना चाहिए। (3) अशुद्ध वर्तनी- गल्ती (ग़लती) पृ.-4, ख़्यालात (ख़यालात) पृ.-12, लब्ज़ (लफ़्ज़) पृ.-85, जंगो जूं (जंगो जू) पृ0-93 आदि। (4) भाषा-व्याकरण के अनुसार अशुद्ध भाषा- हर जज़्बात (पृ.-22), अश्क बहता (पृ.-27), गुज़रे राहों (पृ.-55), हर धड़कनों (पृ.-57), इक इक लम्हों (पृ.-106) आदि। इन सबके बावजूद यह कहा जा सकता है कि ‘फुर्सत किसे है इन दिनों’ पुस्तक रोचक एवं पठनीय है। गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की कीमत 300 रुपये है।
(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित )




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