भोजपत्र: सगुण एवं निर्गुण का संधिपत्र
- डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी
सह-आचार्य, हिंदी विभाग
क्वान्ग्तोंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, चीन
‘काव्य’- मानव ह्रदय से करुणा की कल कलनिःसरित अविरल धारा है। ‘काव्य’ अर्पण, दर्पण, समर्पण की प्रतिध्वनि है। काव्य मनुष्य के ह्रदय, मन तथा प्रज्ञा का वह संतुलित एवं सार्थक स्वरुप है, जिससे मानव मानव बनता है। काव्य ऐसे मनीषियों की सृष्टि है, जो संपूर्ण एवं सर्वज्ञ हो। इसलिए कवि-कर्म को काव्य संसार कहा गया है, और कवि को इस काव्य संसार का प्रजापति अर्थात स्रष्टा कहा गया है। ‘अपारे काव्य संसारे कवि एवं प्रजापति’ इस आप्त वचन के अनुसार कवि काव्य रूपी संसार का प्रजापति अर्थात स्रष्टा होता है। कवि निर्मित काव्य संसार में सहृदय जन काव्य गत चारुता एवं रसात्मक संवेदनाओं से आह्लादित होते रहते हैं, कारण कि उस सृजनात्मक सृष्टि का स्रष्टा स्वयं ही रसमय है। रस के वशीभूत होकर ही वह सृष्टि की संरचना में संलग्न हुआ है, फलतः रसमय स्रष्टा के समान ही कवि रुपी प्रजापति की संरचना भी सर्वदा रस से परिपूर्ण रहती है, इसलिए रस को काव्य की आत्मा कहा गया है- ‘रसात्मकंवाक्यंकाव्यं’
कु धातु में अच् (इ ) प्रत्यय जोड़कर कविशब्द की व्युत्पति बतलाई गयी है। यहां ‘कु’ शब्द का अर्थ व्याप्ति एवं आकाश अर्थात सर्वज्ञता से है। अतः कवि सर्वज्ञ है, दृष्टा है। हमारी महान श्रुति कहती है-कविर्मनीषीपरिभूःस्वयंभूः। परिभूः अर्थात जो अपनी अनुभूति के लिए किसी अन्य का ऋणी न हो। वैदिक साहित्य में कवि, दृष्टा एवं ऋषि समानार्थक है। इसीलिए वेदों के प्रकाशक भगवन ब्रह्मा को आदि कवि कहा गया है। लौकिक साहित्य में विशिष्ट रमणीय शैली में काव्य की रचना करने वालों के लिए कवि शब्द प्रयुक्त किया जाता है।
प्रो. पुष्पिता अवस्थी जी की काव्य संग्रह ‘भोजपत्र’ वाचन करते समय कवि शब्द की परिभाषा, सार्थकता, उपयोगिता सर्वथा फलित हुई जान पड़ती है। कवयित्री द्वारा शताधिक पुष्पों से गुम्फित यह ‘भोजपत्र’ रूपी कव्यामाला प्रत्येक मानव के ह्रदय में स्थित कवि मन को श्रांत करने में पूर्णतः सिद्ध होती हुई दिखती ह।ै प्कवियित्री द्वारा अपने ह्रदय के उद्गारों को सरल भाषा व सहज रूप में पाठकों के समक्ष परोसा गया है, जिसके रसास्वादन से शायद ही कोई वंचित होना चाहेगा। संस्कृत साहित्य के आचार्य भामह ने काव्य की लक्षण बताते हुए कहा है कि शब्दार्थाैसहितौकाव्यम् अर्थात शब्द तथा अर्थ का समन्वय काव्य है, कवयित्री ने इस ‘भोजपत्र’ काव्य संग्रह में आचार्य की इस उक्ति को इसे पूर्णतः स्थापित किया है। ‘प्रेम धुन’, ‘सुन्दरतम रहस्य’ शीर्षक से संग्रहीत कविताओं को पढ़ते समय पाठकों को आचार्य शौद्धोदनि की ‘काव्यंरसादिमद्वाक्यंश्रुतसुखविशेषकृत्’ अर्थात् जिस वाक्य में रस हों, वही ‘काव्य’ है की उक्ति की सार्थकता का अनुभव होगा।
‘काव्यस्यात्मा ध्वनि:। सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्वमेवकाव्यलक्षणम्।’ आचार्य आनंदवर्धन ने ध्वनि को काव्य की आत्मा मानते हुए कहा है कि जो सहृदय के हृदय को आह्लादित कर दे, वही काव्य है ‘सुनकर छूती हूं’, ‘अमृत अर्थ’, ‘आकाश गंगा’ शीर्षक से लिखित काव्य पुष्पों का सुगंध लेते समय पाठकपाठकों को यह उक्ति चरितार्थ होती हुई दिखेगी। आचार्य वाग्भट की उक्ति है कि ‘साधु शब्दार्थ सन्दर्भ गुणालंकारभूषितम्प्स्फुटरीतिरसोपेतंकाव्यंकुर्वीतकीर्तये।’ अर्थात श्रेष्ठ शब्दार्थ गुण एवं अलंकारों से सुसज्जित रीति एवं रस से युक्त रचना काव्य है जो कवि की कीर्ति करने वाला होता है।
प्रो. पुष्पिता अवस्थी जी प्रेम के देह की नहीं, विरन्तु परिपक्व प्रणय के विदेह की कवयित्री है। वे भक्ति कुल के प्रेम की कवयित्री हैं। उनका ‘तुम’ मनुष्य नहीं ईश्वर है। ईश्वर विश्व सृजन की वैश्विक अलौकिक शक्ति है। इसलिए विश्व ह्रदय में धड़कने वाले अधिष्ठित ईश्वरी शक्ति को, उसके प्रेम को संबोधित करती है। वे भक्ति काल की मीरा, छायावाद की महादेवी की प्रेम कविताओं की परिपाटी का विस्तार करते हुए वैश्विक हृदय को समर्पित हार्दिक प्रेम की कविताएं लिखती हैं। वे विदेहीप्रणय चेतनाकी वर्षों से स्थापित कवयित्री हैं। उनकी प्रेम अभिव्यक्ति में पुरुष हृदय का प्रेम भी धड़कता है। प्रकृति के उपमाओं से संबोधित उनका प्रेम, इसलिए ईश्वरी है, वैश्विक है। शब्दों में समाए अर्थ और अर्थ में समाए ब्रह्म और ब्रह्म में समाए ब्रह्मांड और उसकी शक्तियों को ईश्वर का प्रारूपमानकर उसी से प्रेम करती हैं।
वे निराकार निर्गुणकी नहीं साकार सगुण प्रणय की कवयित्री हैं। वे विराग के राग की, अनुराग के अनासक्ति की कवयित्री हैं। मीरा के सिर्फ श्रीकृष्ण थे, इनके तो ईश्वर है, ईश्वर अंश जीव अविनाशी सृष्टि है, इसलिए यह अनासक्ति की चित्त और चेतना में सिद्ध आत्मा को समर्पित प्रणयन की कवयित्री हैं। देह की आयु होती है, पर चित्त और चेतना की नहीं, इसलिए अपनी आयु की हर अवस्था में अपनी उसी प्रणय रागिनी के विभोर होकर अभोग की वे कविताएं लिखती आ रहीं हैं। इसलिए इनकी कविताओं के विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हुए, कई देशों के दूरदर्शन में काव्य पाठ हुए, यूट्यूब द्वारा वैश्विक स्तर पर संकलित और संग्रहित है।
मृदुललितपदाढ्यंगूढ़शब्दार्थहीनंजनपदसुखबोध्यंयुक्तिमन्नृत्ययोज्यम्,
बहुकृतरसमार्गंसंधिसंधानयुक्तं स भवतिशुभकाव्यंनाटकप्रेक्षकाणाम्।
आचार्य भरत मुनि ने शुभ काव्य के सात लक्षण माने हैं- 1. मृदुलालित पदावली 2. गूढ़ शब्दार्थ हीनता 3. सर्वसुगमता 4. युक्तिमता 5. नृत्य में उपयोग किये जाने की योग्यता 6. रस के अनेक स्रोतों के प्रवाहित करने के विशिष्ट गुण 7. संधियुक्तताप् आचार्य भरत मुनि द्वारा प्रस्तुत इन काव्य लक्षणों का सफल प्रयोग कवियित्री द्वारा ‘भोजपत्र’ में सर्वत्र हुआ है, यह काव्य संग्रह निश्चित ही भारतीय काव्य परम्परा की श्रीवृद्धि में अपना अद्वितीय योगदान देगा। आचार्य दंडी ने ‘इष्ट’ अर्थात चमत्कृत एवं सुंदर अर्थ से परिपूर्ण शब्दावली को काव्य कहा है। आचार्य वामन ने काव्य को दोष रहित तथा अलंकार सहित मानते हुए ‘सौंदर्य’ को अलंकार कहा है-सौन्दर्यमअलंकारः। ‘रीतिरात्माकाव्यस्य’ में आचार्य वामन जब रीति को काव्य की आत्मा मानते हैं तथा शब्दार्थ को काव्य का शरीर कहते हैं। आचार्य आनंदवर्धन ने उपरोक्त लक्षणों से अलग मार्ग का अनुसरण करते हुए ध्वनि सिद्धांत की स्थापना है तथा ध्वन्यार्थ (ध्वनि के अर्थ) को ही काव्य की आत्मा कहा है -काव्यस्यात्मा ध्वनिः। सहृदयहृदयाह्लादिशब्दार्थमयत्वमेवकाव्यलक्षणम्। (‘ध्वन्यालोक’- प्रथम उद्योत)
आचार्य कुंतक ने वक्र अर्थात टेढ़ी उक्ति को काव्य कहा है- शब्दार्थाैसहितौवक्रकविव्यापारशालिनी।
बंधे व्यवस्थितौकाव्यंतद्विदाह्लादकारिणी।’ (वक्रोक्तिजीवितम् 1/7)
संस्कृत वांग्मय के विभिन्न आचार्यों ने काव्य के जो अलग अलग एवं आवश्यक लक्षण बताए हैं। प्रो. पुष्पिता अवस्थी जी द्वारा रचित इस काव्य संग्रह में अलग अलग स्थानों पर मुखर रूप से ध्वनित हुआ हुआ है। पंडितराज जगन्नाथ के अनुसार ‘रमणीयार्थप्रतिपादकःशब्दःकाव्यम्’ अर्थात् रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द ही काव्य है। यहां रमणीय का अर्थ रसात्मकता है। आचार्य जगन्नाथ की दृष्टि से काव्यत्व शब्द में निहित होता है न कि सम्पूर्ण वाक्य में। इस काव्य संग्रह में पाठकों को सर्वत्र ही काव्य रस का आनंद प्राप्त होगा। हिंदी साहित्य के आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-‘जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्थाज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्थारसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आयी है, उसे कविता कहते हैं।’ ‘भोजपत्र’ पाठकों को न केवल कवियत्री की आत्मा के ज्ञानदशा से परिचित कराएगी बल्कि कवियित्री की ह्रदय के रसदशा का पान भी कराएगी। प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने इस काव्य संग्रह के माध्यम से न केवल मानव जीवन के राग को झंकृत करने वाले काव्यों का संकलन किया है, बल्कि मानवीय ह्रदय, चित, बुद्धि आदि के विभिन्न पक्षों का भारतीय दर्शन की कसौटी पर कसते हुए, सरल एवं सहज भाषा में प्रस्तुत करते हुए, हमारे महान काव्यशास्त्रीयों की विरासत को नए युग में नए अर्थ को समाहित करते हुए, नव पीढ़ी को आशीर्वाद स्वरुप प्रदान की है-
एकान्तिक मौन विलाप
सुदूर होकर भी
अपने धडकनों के भीतर
महसूस किया है- उसे
जैसे-
नदी
जीती है - अपने भीतर
पूर्णिमा का चांद
दीपित सूर्य
झिलमिलाते सितारे
‘ऋतुओं की हवाएं’ शीर्षक से कविता में प्रयुक्त इन काव्य बिंबों में कवियित्री द्वारा मानवीय मनः स्थिति का अत्यंत ही मर्मस्पर्शी चित्र प्रस्तुत किया गया है। इसमें न कोई शब्द भण्डार का अधिक क्लिष्ट रूप हगे न कोई चमत्कार, कवियित्री ने सरल शब्दों में मानवीय हृदय का जो रूप प्रस्तुत किया है, वह न केवल हमारे ह्रदय को छूता है बल्कि हमें एक नए अर्थ से साक्षात्कार कराता है।
प्रेम आंखों में खुलता और खुलता है
दृष्टि बनकर रहता है-आंख में
प्रेम रचता है- प्रेम
सारे विरोधों के बावजूद।
‘प्रेम’ शीर्षक से कविता में प्रयुक्त उक्त काव्य बिंबो के माध्यम कवयित्री ने मानवीय जीवन के प्राण तत्त्व प्रेम को सरल भाषा में सहज रूप से चित्रित किया है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में मानव समाज को प्रेम की नितांत आवश्यकता है।
कोमल शब्द
अजन्मे शिशु की तरह
क्रीड़ा करते हैं
संवेदनाओं के वक्ष भीतर
और भर देते हैं-सर्वस्व को अनाम ही
‘आत्मीयता’ शीर्षक से कविता में प्रयुक्तबिंबों के माध्यम से कवियित्रीमानवीय संवेदना का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है।
महावीर प्रसाद द्विवेदी का कथन है-‘अन्तः करण की वृतियों के चित्र का नाम कविता है।’ भोजपत्र काव्य संग्रह में संग्रहीत कविताएं न केवल मानव के अधीर मन को श्रांत करने में सक्षम हैं, साथ ही प्रेम रूपी शाश्वत सत्य की जन जन में प्रसार करने में भी पूर्णतः सक्षम हैं। सनातन ग्रंथों के अध्यात्म के ज्ञान का सार इस काव्य संग्रह के माध्यम से कवयित्री द्वारा सरल भाषा में पाठकों के समक्ष पहुंचाया गया है। काव्य संग्रह में संगृहीत कविताएं चिताकर्षक तथा हृदयस्पर्शी हैं। विविध भावभंगिमाओं से युक्त रमणीय पदावलियां प्रशंसनीय तथा प्रेरणास्पद है। काव्य रत्न रूपी इस काव्य सरिता से प्रवाहित विविध भाव- त्रसरणियों से निःसरितभावतरंगिणीयां मानव ह्रदय को बलात आकर्षित करने में भी सर्वथा समर्थ है। कवयित्री की यह कृति निश्चित रूप से उनकी कीर्ति में वृद्धि करेगी तथा पाठकवृन्द के ह्रदय को आह्लादित करते हुए उन्हें मानवता, राष्ट्रीयता, प्रेम, अध्यात्म, सनातन धर्म के मार्ग पर चलने को प्रेरित करेगा।
(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)




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