शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

 लक्ष्मीकांत वर्मा ने स्वतंत्रता सेनानी का पेंशन नहीं लिया

बहुओं को बेटियों की तरह मानते थे, सर पर पल्लू  रखने पर था ऐतराज

                                                                    - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

  लक्ष्मीकांत वर्मा जी का जीवन वास्तविक रूप में लोहियावादी था। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिए थे, लेकिन इसका पेंशन लेने से उन्होंने यह कहते हुए इंकार कर दिया था ‘‘आज़ादी की लड़ाई पेंशन पाने के लिए नहीं लड़ा।’’ युवाओं से उनको बहुत स्नेह था, नए लिखने वालों को खूब प्रोत्साहित करते थे। उनकी बहू मंजुलता वर्मा का कहना है कि ‘‘जब मैं ब्याहकर इस घर में आयी तो बाबू जी मुझे बिल्कुल बेटी की तरह स्नेह करने लगे थे। उन्होंने सर पर पल्लू रखने से भी साफ़ मना कर दिया था। उनका आदेश था कि जैसे मेरी बेटियां रहती हैं, उसी तरह तुम भी इस घर में रहो।’’  

लक्ष्मीकांत वर्मा

मंजुलता वर्मा बताती हैं कि मैं घर का काम-काज करने के साथ ही एक कंपनी में नौकरी भी करती थी। आमतौर पर लोगों की घारणा है कि काम-काजी बहुएं घर के काम में ध्यान नहीं देतीं। इसी धारणा की वजह से वे मेरे हर काम को बहुत घ्यान से देखते रहते थे। एक बार चौका-चूल्हा का काम करने के बाद सारी चीज़ें समेट कर ठीक ढंग से रख रही थी, वे बहुत ध्यान से देख रहे थे। जब मैंने सबकुछ समेटकर ठीक ढंग से रख दिया, तो उन्होंने मेरी सासु मां को बुलाकर दिखाया। उनसे खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा कि-देखो सारा काम कितना अच्छे ढंग से करती है।

लक्ष्मीकांत वर्मा और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मोतीलात वोरा।

लक्ष्मीकांत के पौत्र श्लोक रंजन बताते हैं कि मेरे दादाजी मेरे मित्र की तरह थे। हर चीज़ को प्रैक्टिकली लेते थे। उनका मानना था कि एक बार में एक ही काम पर पूरा ध्यान देना चाहिए। अक्सर ही मैं उनके साथ बैठकर टीवी पर क्रिकेट मैच देखा करता था। मैं कक्षा चार का छात्र था। 1999 के वर्ल्ड कप में भारत का महत्वपूर्ण मैच था, उसी दिन मेरी परीक्षा थी। मेरा मन क्रिकेट मैच की तरफ था। उनको इसका आभास हो गया तो उन्होंने मेरी परीक्षा छुड़वा दी और कहा कि जब तुम्हारा मन क्रिकेट मैच की तरफ है तो फिर मैच ही देखो। श्लोक ने परीक्षा छोड़ दी और दादाजी के साथ बैठकर टीवी पर पूरा मैच देखा। लक्ष्मीकांत जी का कहना था कि जो चीज़ तुम्हें पसंद है, वही करो। किसी के दबाव में आकर कोई काम नहीं करना चाहिए। हालांकि श्लोक बहुत ही मेधावी छात्र हैं, इन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा 84 प्रतिशत अंकों के साथ पास किया है।

लक्ष्मीकांत वर्मा की बहू मंजुलता वर्मा, पौत श्लोक रंजन, डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और शिवाजी यादव

श्लोक को बचपन से ही पेंटिंग का शौक़ है। दादाजी की पुस्तक ‘मंुशी रायज़ादा’ जब छपने लगी तो उसका कवर श्लोक से उन्होंने डिजाइन कराया। उन्होंने अपने पौत्र का उत्साहवर्धन करने के लिए यह कार्य कराया। बाद में श्लोक के बनाए हुए उसी कवर को ही प्रकाशक ने थोड़ा संशोधित करके प्रकाशित किया। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल जब विष्णुकांत शास्त्री हुए तब उन्होंने लक्ष्मीकांत वर्मा जी को बुलाकर कहा कि आप स्वतंत्रता सेनानी हैं, इसलिए आपको सरकार की तरफ से पेंशन दिया जाना है। अपने कागज़ात उपलब्ध करा दीजिए। मगर, लक्ष्मीकांत जी ने पेंशन लेने से साफ इंकार कर दिया था।

 बहू मंजुलता वर्मा बताती हैं कि जब वे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष हो गए, तब भी वे बिल्कुल ज़मीन से जुड़े रहे। जब वे इलाहाबाद आते थे, उनकी सरकारी गाड़ी घर से कुछ दूर पर ही रुक जाती थी। गार्ड और गाड़ी चालक साथ में होने के बावजूद वे स्वयं गाड़ी से उतरने के बाद पास की ही सब्जी की दुकान से सब्जी खरीदकर अपने कुर्तें के आंचल में सब्जी लेकर घर आते थे। गार्ड और गाड़ी चालक के लाख कहने पर सब्जी उन लोगों को लाने के लिए नहीं देते थे। मुलायम सिंह यादव की सरकार में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष बने थे। जब दूसरी सरकार आ गई तो इनको हटाया जाना था। नई सरकार के मुखिया ने उनसे कहा कि लोहिया की किताब को मेरे सामने पैरों से रौंद दो, तो तुम्हें हिन्दी संस्थान के अध्यक्ष पद से नहीं हटाया जाएगा। यह बात लक्ष्मीकांत जी को बहुत बुरी लगी, और उन्होंने फौरन ही अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया और घर चले आए।

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में यश मालवीय को सम्मानित करते तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा, साथ में लक्ष्मीकांत वर्मा।

मंजुलता बताती हैं कि इसके बाद सरकार की तरफ़ से बार-बार इन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जाता रहा। अक्सर ही कोई अधिकारी घर आता। घर आकर पूरी संपत्ति और बैंक एकाउंट आदि की जांच करता, लेकिन कुछ नहीं निकलता। यह सिलसिला बहुत दिनों तक चला। एक बार उनकी मुलाकात केशरीनाथ त्रिपाठी जी से हुई, तो लक्ष्मीकांत जी ने यह बात उनसे बताई। केशरीनाथ इस पर बहुत दुःखी हुए और उन्होंने कहा कि आपने यह बात मुझे बहुत देर से बताई है। मैं देख लेता हूं, अब ऐसा नहीं होगा। इसके बाद उनकी जांच होनी बंद हो गई। मंजुलता के मुताबिक बाबू जी के निधन के बाद उनके बैंक एकाउंट में एक भी रुपया नहीं मिला, उन्होंने अपने जीते-जी अपना मकान भी नहीं बनवाया। उनके पिताजी ने जो मकान बनाया था, उसी में आज भी हमलोग रह रहे हैं। बाबूजी के मुलायम सिंह यादव से बहुत अच्छे संबंध थे, लेकिन अपने बेटों की नौकरी तक के लिए कभी भी उन्होंने मुलायम सिंह से नहीं कहा, जबकि बहुत सारे दूसरे लोगों की नौकरी उन्होंने लगवाई। अपने पुत्रों को लेकर उनका कहना था कि खुद से अपना रास्ता बनाओ, किसी के सहारे आगे नहीं बढ़ना चाहिए।

 लक्ष्मीकांत वर्मा जी का जन्म 15 फ़रवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के रुधौली तहसील के टँडौठी ग्राम में हुआ था। इन्हें हिन्दी, उर्दू , फारसी और अंग्रेजी भाषाओं की अच्छी समझ और ज्ञान था। 40 के दशक में महात्मा गांधी के आनंद भवन आगमन पर लक्ष्मीकांत जी को गांधी जी का सानिध्य प्राप्त हुआ था, जिसके बाद गांधी जी के आह्वान पर स्वतंत्रता-आंदोलन में इन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस आंदोलन में वे इतना अधिक सक्रिय हुए कि उनकी शिक्षा पर काफी प्रभाव पड़ा। फिर इसके बाद 1946 में वे राम मनोहर लोहिया के संपर्क में आ गए थे। इसके बाद वे समाजवाद से काफी प्रभावित हो गए थे। इनके जीवन में समाजवादी दर्शन के प्रति आस्था पनपी और एक वटवृक्ष का आकार ग्रहण कर गई। हिन्दी-भाषा को प्रचारित-प्रसारित करने में इनका विशिष्ट योगदान रहा है। उनका मानना था कि हिन्दी भाषा के विकास से भारतीयता का विश्व में प्रमुख स्थान बनेगा। ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग’ की अनेक सर्जनात्मक योजनाओं को उन्होंने प्रभावाकारी ढंग से क्रियान्वित किया था। उन्होंने कुछ समाचार-पत्रों के लिए नियमित लेखन-कार्य भी किया। इनके कॉलम काफी लोकप्रिय और चर्चित रहे हैं। 

 इनकी कई किताबें प्रकाशित हुई थीं, जिनके नाम ‘खाली कुर्सी की आत्मा’, ‘सफेद चेहरे’, ‘तीसरा प्रसंग’, ‘मुंशी रायज़ादा’, ‘सीमान्त के बादल’, ‘अपना-अपना जूता’, ‘रोशनी एक नदी है’, ‘धुएं की लकीरें’, ‘तीसरा पक्ष’, ‘कंचन मृग’, ‘राख का स्तूप’, ‘नीली झील का सपना’, ‘नीम के फूल’, ‘नयी कविता के प्रतिमान’ आदि हैं। इन्होंने इलाहाबाद से मासिक पत्रिका ‘आज की बात’ का प्रकाशन भी शुरू किया था, जो कुछ दिनों तक बड़़ी चर्चा के साथ प्रकाशित होती रही। इन्होंने 1960 में ‘सेतुमंच’ नाट्यसंस्था की स्थापना की थी, जिसके जरिए लोगों को रंगमंच से जोड़ने और प्रशिक्षण देकर उनके मार्गदर्शन का काम किया गया था। उत्तर प्रदेश हिन्दी-संस्थान, लखनऊ के वे कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे थे। संस्थान सम्मान, डॉ. लोहिया अतिविशिष्ट सम्मान, एकेडेमी सम्मान, साहित्य वाचस्पति आदि सम्मान इन्हें विभिन्न अवसरों पर प्रदान किए गए थे। 18 अक्तूबर 2002 को इनका निधन हो गया।


(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)   


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