विश्व-चेतना की कवयित्री पुष्पिता अवस्थी
- प्रो. अर्जुन चव्हाण
समकालीन ही नहीं अपितु हमकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में डॉ. पुष्पिता अवस्थी का नाम शीर्षस्थ है। आप बहुमुखी प्रतिभा की धनी है, लेकिन कविता के क्षेत्र में अग्रणी। उनकी कविता का फलक जितना परिव्याप्त है उतना ही ताप से युक्त है। उनमें प्रेम की संचेतना जितनी प्रखर है, उतनी ही विश्व-चेतना उर्वर। सच तो यह है कि विश्व-चेतना वाया प्रेम-चेतना माने डॉ. पुष्पिता जी की काव्य संवेदना। इसमें आधारभूत परिवेश एवं परिप्रेक्ष्य ही है जो स्वदेश से विदेश की धरती पर पलता-फूलता-खिलता गया। उनके काव्य-कैनवास का अवगाहन करने के बाद कहने में कोई संकोच नहीं होता कि विश्व-चेतना की कवयित्री पुष्पिता का साहित्य चिंतन वैविध्यपूर्ण है जिनमें प्रधान बिंदु इस प्रकाश लक्षित होते हैं।
डॉ. पुष्पिता मूलतः कवयित्री हैं। अतः सबसे ज्यादा चिंतन कविता को लेकर किया हुआ मिलता है। कविता क्या है इस बात का सबसे अधिक चिंतन ‘कविता संचयन’ खंड एक में दृष्टिगोचर होता है। कविता जीवन है से आरंभ किया हुआ यह चिंतन ‘कविता मेरा हृदय है। कविता के हृदय में मैं हूं। कविता मेरे हृदय और मानस की अचंचल इबारत है।... कविता के गर्भ से मैं स्वयं को उद्भूत मानती हूं। जब मैं खुश होती हूं, मेरी कविता मुझसे परिहास करती है, आत्म संवाद रचती है।’ कविता क्या है? जैसे विषय को लेकर कवयित्री सहज, सुबोध मगर गंभीर विचार चिंतन भी प्रस्तुत करती है कि जिनमें ‘कविता मेरी मां’ है। कविता मेरी मातृभूमि है। मैंने कविता के गर्भ से जन्म लिया है। जीवन और जिजीविषा की मेरी भूख कविता पढ़ने और लिखने से मिटती है। कविता ने मां की तरह मुझे पाला है। मेरी कविताओं ने अपनी संवेदनाओं का दुग्धपान करवा कर मेरा पोषण किया है। दुःखी, निराश और उदास होने पर विहवल मां की तरह कविता ने अपनी छाती से लगाया है, अपने आंचल में ढांपकर लोरी सुनाई है। मेरी सिसकियों और हिचकियों को उसी ने शब्द दिये हैं।’
पुष्पिता जी की मान्यता है कविता उनका घर है, जहां वे अपने प्रिय के सपने देखती है। कविता उनको अपनी आत्मा लगती है, देह की आत्मा, जीवन की आत्मा। कविता उनके लिए ईश्वरीय शक्ति है, प्रेम। कविता ने उनको जीवन दिया है। आधी रात की अंगड़ाई के बाद उनकी कविता जन्म लेती है। वह उनको प्रसव का सुख देती। उनकी इकलौती हार्दिक विधा कविता है। लेकिन उनकी स्वीकारोक्ति इस बात का बोध कराती है कि उनकी कविता भोगवादी कतई नहीं। स्वयं उन्हीं के शब्दों में -‘मेरी कविता भोग के मोह से मुक्त मानवता के संयोग से संयोजित है।’ उनके विचार से कविता ऐसी शक्ति जो हमें सम्पन्न बनाती है। कविता देह है जिससे कवि का जन्म होता है। स्वयं उन्हीं के शब्दों में-‘कविता मुझे सजीव मानवीय देह लगती है-वह मेरा हाथ थामती है... मुझे सुनाती है। मुझे देखती है... मुझसे अभिसार करती है। कविता मुझमें स्वप्न देखती है, मैं कविता में स्वप्न देखती हूं। मैं कविता में स्वप्न रचती हूं।’ कविता के बारे में सबसे बड़ी बात तो उन्होंने इन शब्दों में प्रस्तुत की है-‘कविता इस मानव विरोधी समय में मुझे मानवीय बने रहने की ताकत प्रदान करती है।’
कविता के बारे में पुष्पिता जी के विचार अत्यंत मौलिक, सामाजिक और वैश्विक हैं। बक़ौल पुष्पिता जी-‘मेरी दृष्टि में विश्व और मनुष्यता का रक्षण और संरक्षण ही कविता का मूल उद्देश्य है।’ मेरी दृष्टि से कविता की इतनी खूबसूरत जनवादी संकल्पना हो नहीं सकती।
भाषा पर पुष्पिता जी का जबरदस्त अधिकार है। उनकी रचनाओं में अत्यंत नपे-तुले शब्दों, रूपों एवं वाक्यों का प्रयोग मिलता है और प्रोक्ति का भी। उनका विचार है कि भाषा से मनुष्य के व्यक्तित्व की पहचान होती है। व्यक्ति के सामर्थ्य का परिचय भाषा से मिलना है। वे किसी के बाह्य व्यक्तित्व, शक्ल-सूरत, कद-काठी से अधिक महत्त्वपूर्ण भाषा को मानती है। उनकी मान्यता की शब्दावली इस प्रकार है-‘मेरे लिए किसी व्यक्ति की पहचान उनकी देह या चेहरे से नहीं बल्कि उसके भाषा-सामर्थ्य से निर्मित होती है।’ किसी व्यक्ति के सच्चे या झूठे पन का पता उनको भाषा से चलता है। किसी व्यक्ति के राज को भी भाषा से जाना जा सकता है। अपने भाषा विषयक विचार चिंतन को पुष्पिता जी इन शब्दों में बयान करती हैं-‘भाषा व्यक्ति के व्यक्तित्व के सारे रहस्यों को खोलकर रख देती है। भाषा से ही व्यक्ति के झूठ का पता चलता है।’
वास्तव में पुष्पिता अवस्थी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में ‘थ्री इन वन’ की अनुभूति होतीहै। हिंदी की तीन महान महिला साहित्यकारों की झांकियों को देखना हो तो आप में देख सकेंगे, किसी और में नहीं। समसामयिक एवं सामाजिक भेद के बावजूद, पुष्पिता जी में उक्त तीनों की ख़ासियतें अवश्य देखने को मिलती हैं। वेदना भले हो न हो मगर पुष्पिता जी में मीराबाई की संवेदना ज़रूर मिलती है। दुःख की बदली मिले-न-मिले मगर उनमें महादेवी की साधना एवं आराधना मिलती है और मन्नू भण्डारी के ‘महाभोज’ का बिसू या ‘आपका बंटी’ का बंटी न दिखता हो मगर मन्नू का ‘एक कहानी यह भी’ के तर्ज पर एक ‘कविता संचयन यहा भी’ का नोटिस तो लेना ही पड़ेगा। अपने पूर्ववर्ती तीनों साहित्यकारों को पढ़ना, जानना, गुनना जिनको संभव नहीं हुआ, वे सिर्फ़ पुष्पिता अवस्थी के साहित्य से आजमा सकते हैं। तीनों की कारयत्री और भावयत्री प्रतिभा अकेले आप में सबको देखने को मिलेगी, मगर इन तीनों के वेदना, करुणा और निराशा की भावना से अलग पुष्पिता जी के यहां उमंग, उत्साह और उर्धवगामी ऊर्जा स्रोत-ओतप्रोत है। यहां प्रेम दीवानी नहीं, कविता की दीवानी मिलेगी, रहस्यात्मकता नहीं, अभिव्यक्ति की सहज किंतु स्पष्टता मिलेगी और जीवन साथी पति की बेवफाई का गम नहीं बल्कि विश्व चेतना और मानवता की गहरी संवेदना है। सार यह कि पुष्पिता जी का व्यक्तित्व ‘थ्री इन वन’ का समन्वित रूप प्रतीत होता है।
कहना ज़रूरी नहीं कि पुष्पिता अवस्थी मूलतः प्रेम कविता को प्रस्तुत करती है। उनकी अधिकांश कविताएं प्रेम कविता की श्रेणी में आती हैं। लेकिन उनका प्रेम आत्म-चेतना से होते हुए विश्व-चेतना के आगोश में समाहित होता है। प्रेम कविता की यात्रा देह से बढ़कर आत्मा के तह तक पहुंच जाती है। उनकी प्रेम कविताएं वर्गीकरण एवं विवेचन-विश्लेषण की शोधपरक मांग करती है, जिसे शोध का विषय कहना चाहिए। उनकी कविता इस तथ्य का बोध कराती है कि ये सारी प्रेम कविताएं उनके हृदय की पूंजी है और स्याही भी। इस संदर्भ उनका कथन द्रष्टव्य है-‘मेरी प्रेम कविताएं मेरे हृदय की प्रेम-पूंजी और स्याही है।’
प्रेम के बारे में पुष्पिता अवस्थी की अपनी अलग मान्यता है कि ‘प्रेम अर्धनारीश्वर है। प्रेम हृदय का आनंद है। प्रेम आत्मा का सुख और चेतना की चौतन्य अभिव्यक्ति है। प्रेम आत्मा का धर्म है और धर्म की आत्मा है। प्रेम जीवन का बीजक है और धर्मों का भी बीजक मंत्र है।’ अतः बेहिचक कहना चाहिए कि पुष्पिता अवस्थी की प्रेम की अवधारणा उस तरह की नहीं जिसकी परिकल्पना अक्सर सामान्य सोच के लोग करते हैं। उनके प्रेम की ऊंचाई तथा गहराई को नापने के लिए बड़े व्यापक तथा गहरे कलेजे की ज़रूरत है। यही बात उनके प्रेम कविता को लागू होती है। उनका प्रेम काव्य आलोचना का नहीं, संवेदना का विषय है, सिर्फ़ व्याख्या का नहीं, अवगाहन का विषय है। उनकी दृष्टि से ‘प्रेम ईश्वरानुभूति का दूसरा नाम है।’ प्रेम कविता के जरिए उनका प्रेम विषयक दृष्टिकोण विशाल दिखाई देता है, जैसे-‘प्रेम का अनोखा पर्याय जीवन।’ उनका प्रेम संबंधी विचार है कि ‘प्रेम अनश्वर विरासत है’ प्रेम के बारे में उनकी मान्यता जितनी साफ उतनी ही अमाप है। ‘वसंत हुई देह में’ स्वयं उन्हीं की धारणा है-
प्रेम
जीवन का
हृदय है।
प्रेम के अहसास को तथा उसके आगमन को लेकर पुष्पिता जी की दृष्टि बड़ी सधी हुई लक्षित होती है, जैसे-
प्रेम चुपचाप
आपको चुराते हुए
आपके भीतर रहता है
जैसे-
आकाश की शून्यता
में ब्रह्मांड।
‘सूर्य की सुहागिन’ में कवयित्री ने प्रेम को ऐसी उपासना माना है, जिसमें उपवास रखना होता है। प्रेम की यह भव्यता और दिव्यता उनके इन शब्दों में देखी जा सकती है-
प्रेम उपासना में
रखती है- उपवास।
एक समय था कि दूरदर्शन तथा उसके चैनलों का प्रचार-प्रसार नहीं था, तब तक आकाशवाणी से मनोरंजन एवं प्रबोधनकार्य जारी था। मूलतः हिंदी और अन्य भाषाओं के अध्ययन ने उनके भीतर साहित्यिक संवेदना को विकसित किया है। मगर संगीत ने भी उनको प्रभावित किया। विशेषतः ‘फिल्मी गीतों’ ने विशेष प्रभाव डाला। स्वयं उन्हीं के शब्दों में- ‘परीक्षा की तैयारी के समय भी उस कालखण्ड में बनी फिल्मों के गीतों से प्रेम की रस पयस्विनी चित्त को तरंगित किये रहती थी। स्नातक और स्नातकोत्तर अध्ययन के दरमियान के सारे परिवेश ने कविता के अंतरंग शक्ति से साक्षात्कार करवाने शुरू कर दिये थे। कुछ शाश्वत गीत स्वदेश बिछोह की पीड़ा को भी आज वे ही गीत हरते हैं।’ कहना चाहिए कि पुष्पिता जी के जीवन के स्नातक तथा स्नातकोत्त अध्ययन के कालखण्ड के परिवेश ने उनके भीतर कविता की पहचान करा दी थी, जिसके प्रभाव स्वरूप गीतों की शब्द माधुरी ने कविता को हृदयशक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। कहना सही होगा कि गीत-संगीत का यह चरका कविता के सृजन का प्रेरक बना, जो आज भी निरंतर जारी मिलेगा।
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| वर्ष 2003 में सूरीनाम में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन में सूरीनाम के राष्टपति फिनिट्यांग को अपनी पुस्तक भेंट करतीं पुष्पिता अवस्थी, साथ में अशोक माहेश्वरी। |
पीड़ा हो या परेशानी, असल में जीवित होने की निशानी होते हैं। पुष्पिता अवस्थी भी इसके लिए अपवाद नहीं। मगर सच तो यह है कि यह वह व्यक्तित्व है जो सदाबहार, ऊर्जावान, तेजस्वी, तरोताजा, उत्साह वर्धक एवं अपने रुचि के कार्य में मगन रहनेवाला है। पठन-पाठन, लेखन-चिंतन-अनुचिंतन, आयोजन-संयोजन तथा दग्दर्शन-निर्देशन में जिंदगी की खुशियों को महसूसनेवाले इस शख्स को अवसाद मायूसी के लिए वक्त कहां है लगातार अपने दायित्व के निर्वहन में जिं़दगी के सातवें दशक के मध्याहन तक पहुंचने पर भी व्यक्तिगत स्तर पर निराशा या पीड़ा के पल में जीने की मानो फुर्सत ही नहीं मिली। लेकिन अपने वतन से बिछड़ने की याद आने पर कविता का सृजन होता है फिर वह प्रेम संबंधी हो, चाहे मूल्य या समाज-सेवा संबंधी हो या मानवता संबंधी। इतना सच है कि गीत-संगीत से चेतित होकर साहित्य-सृजन पुष्पिता जी की अलग प्रवृत्ति है।
भारतीय साहित्य और उसमें भी हिंदी साहित्य की बिरादरी बड़ी विशाल है। जहां तक पुष्पिता जी की बात है, संयोग से ज्ञान का और साहित्य का गढ़ माने जानेवाले और बचपन से उच्च शिक्षा तथा उपाधि धारक बनने तक का समय उनका बनारस में बीता। उनको बचपन से लेकर डॉक्टरेट की उपाधि तक शैक्षिक एवं साहित्यिक माहौल मिला। साहित्य की बिरादरी से, साहित्य के साधकों से अखंड, अक्षुण्ण, अटूट नाता रहा। संबंधों का निर्वाह सीखें तो कोई आपसे ही। हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, जैनेंद्र, अज्ञेय आदि से आपकी भेंट वार्ता होना, पिताश्री डॉ. राजेन्द्र कुमार अवस्थी का गांधी संस्थान में उच्चपदस्थ, सेवारत होना, विष्णुकांत शास्त्री की सलाह से हिंदी में एम.ए. करना, प्रो. नामवरसिंह, प्रो. काशीनाथ सिंह, प्रो. बच्चनसिंह, प्रो. केदारनाथ सिंह, अमृतराय, सुधा जी और ऐसे अनेक गण्य-मान्य लेखकों, विद्वानों के सहचार्य ने पुष्पिता अवस्थी के लेखन को ज़मीन प्रदान की। कार्ल मार्क्स की शताब्दी के अवसर पर ‘प्रो. नामवर सिंह ने मैक्सिम गोर्की के पत्रों की पुस्तक मुझे भेंट की जिसमें 23 नवंबर, 1899 को निझनी नोवोग्रोद से इल्या रेपिन को लिखा पत्र बहुत महत्त्वपूर्ण है।’ दिग्गज रचनाकारों से संपर्क के बावजूद सृजन-शक्ति का विकास हुआ। उन्होंने श्रेष्ठ-सृजन के संस्कार अपने संस्कार के बूते पर हासिल किये। वाणी की मधुरता, भाषा और अभिव्यक्ति की क्षमता, चेहरे पर विद्वत्ता, आत्मविश्वास की तेजस्वीता और व्यक्तित्व में सहजता-सुलभता की वजह से उनकी साहित्य जगत की मुसाफिरी को बल मिलता गया। इन पंक्मियों के लेखक ने सुभद्रा कुमारी चौहान की बेटी सुधा और प्रेमचंद के बेटे अमृतराय की शादी का किस्सा पुष्पिता अवस्थी से ही सुना था कि कैसे अमृतराय ने सुधा जी को देखते ही पसंद किया, अपने पिता प्रेमचंद को बताया और प्रेमचंद जी ने इस प्रस्ताव को सुभद्रा कुमारी को बताया तब इन दोनों की शादी हुई। पुष्पिता अवस्थी का इस परिवार में आना-जाना-मिलना, बातचीत होना बरकरार था।
बड़े-बड़े साहित्यकारों से मिलना, उनसे संवाद, संपर्क और नया सीखना निरंतर जारी था जिससे उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के सुचारु गठन में सहायता मिलती रही। ‘अलीगढ़ में 1984 में जनवादी लेखक संघ का महाअधिवेश हुआ जहां बाबा नागार्जुन के साथ मंच से काव्य-पाठ का अवसर मिला।’ जाने-अनजाने में साहित्य-सागर की सारी बिरादरी और उसकी मुसाफिरी से पुष्पिता अवस्थी की लेखन शक्ति अधिक समृद्ध हुई। अनगिनत नामी-गिरामी, देश-विदेश के श्रेष्ठ, प्रतिभावान साहित्यकारों से निरंतर संवाद अर्जित करने की प्रवृत्ति एवं असीम अध्ययनशीता, ये वे कारक हैं जिनकी बदौलत पुष्पिता जी की साहित्य क्षेत्र की मुसाफिरी स्थानीय से वैश्वीय तथा वैयक्तिक से ऊपर उठकर वैश्विक बन बैठी है इसमें दो राय नहीं।
पुष्पिता अवस्थी के जीवन सफ़र में उनका सक्षम लेखन ही उनका मूल साधन-स्रोत बना है। विदेश गमन की किसी की संस्तुति से नहीं बल्कि उनकी अपनी साहित्य निर्मिति से हुआ। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेई ने अपने आवास पर पुष्पिता अवस्थी का काव्यपाठ्य पहली बार सुना तो मूलतः कवि हृदय के प्रधानमंत्री जी ने उनकी क्षमता को भांप लिया। उनकी प्रतिभा, प्रस्तुति और काव्य प्रभाव को देखकर वाजपेई जी ने सूरीनाम की भारतीय दूतावास की राजदूत श्रीमती कमला सिन्हा को फोन किया कि ‘इस बार मैं एक कवि को सूरीनाम भेज रहा हूं। वह भी कवि स्त्री को। इसके परिणाम अवश्य ही कुछ विलक्षण होंगे।’ फिर क्या था, क़ाबिलियत को अवसर चाहिए और अवसर पर क़ाबिलियत। पुष्पिता अवस्थी का सूरीनाम जाना, उन्हें लेने राजदूत का आना, वहां पर बेहतरीन काव्यपाठ करना, स्थानीय कार्यक्रमों से जुड़ना, वहां के कवि जीत नाराइन और कवि लक्ष्मण हरिदत्त निवासी की कविताओं के हिंदी अनुवाद करना, वहां के पर्यावरण संरक्षक सिशिल और सेन्सी के कार्य से प्रभावित होकर उनपर कविताएं लिखना और सूरीनाम में संयोजित सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन का संयोजन डॉ. पुष्पिता अवस्थी को सौंपना उनके क्रियाशील एवं काबिल व्यक्तित्व को प्रमाणित कर गया। फिर क्या था, भारत से आये बड़े-बड़े दिग्गज-बाल कवि बैरागी, नरेंद्र कोहली, शैलेंद्र श्रीवास्तव, प्रो. रामशरण जोशी, प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण, कन्हैयालाल नंदन, महीपसिंह, सोम ठाकुर, कवि कुंअर बेचैन, चित्रा मुगदल, मृदुला सिहना आदि ने आपकी प्रशंसा की। यहां से आगे विश्व यात्री बनकर आधी से अधिक दुनिया के देशों की यात्राएं और जहां जाएं वहीं झंडा गाड़े बिना लौटी नहीं। अपनी सभ्यता और संस्कृति का और विशेषतः हिंदी का।
डॉ. पुष्पिता अवस्थी के साहित्य संसार एवं कारोबार ने उनसे विश्व यात्रा कराई है। युरोप और अन्य देशों की यात्राओं के विगत पच्चीस वर्षों ने उनकी अनुभूति और अभिव्यक्ति को वैश्विक बना दिया, व्यापक बना दिया। उनकी मान्यता है कि ‘सन 2001 से ही प्रवास में जीवन रहा। पच्चीस वर्षों के इस निर्वासन और विस्थापन ने मानवीय और आत्मीय संबंधों के सही मायने समझा दिए।’ विश्व यात्रा ने उनके चिंताओं, चेतना को वैश्विक बना दिया। हर देश यात्रा करने पर उन्हें अपना लगता है। सूरीनाम हो चाहे, नीदरलैंड-वहां की भाषा, संस्कृति और साहित्य के प्रति गहरी संवेदना निर्माण होने के कारण ‘कथा सूरीनाम’, ‘कविता सूरीनाम’ और ‘सूरीनाम का सृजनात्मक साहित्य’, सूरीनाम केंद्रित भारतवंशियों के जीवन पर ‘छिन्नमूल’ उपन्यास तथा ‘कैरिबियाई देशों में हिंदी शिक्षण’ ‘दि नागरी स्क्रिप्ट फॉर बिगनर्स’ विदेश में हिंदी प्रचार के लिए उपयुक्त पुस्तकें लेखिका को विश्व यात्री सिद्ध कर देती है। ‘संवेदना की आर्द्रता’ के बारे में उनकी मान्यता है कि ‘वैश्विक चिंताओं से प्रेरित होकर कुछ आलेख समय-समय पर लिखे गये लेख इसमें संकलित हैं।’
विश्वयात्रा की फलश्रुति के बारे में उनका कहना बेबाक सच रेखांकित करता है कि ‘विश्व यात्राओं ने मेरी चित्त और चेतना को इस तरह वैश्विक बना दिया है कि हर देश मुझे अपना देश लगता है, हर घर मुझे अपना लगता है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ पंक्ति का अर्थ मेरे मन के भीतर घर की तरह है।’
डॉ. पुष्पिता अवस्थी पर भारत के एकमात्र नोबेल विजेता कवि रवींद्रनाथ टैगोर का प्रभाव छात्र जीवन से था। उनका बंगाली में लिखा साहित्य पढ़ने के लिए पुष्पिता अवस्थी ने बंगाली सीखने का संकल्प किया था। उसकी पूर्ति भी की थी। लेकिन जब देश को छोड़कर विदेश की ज़मीन पर अपनीजड़ें ज़माने के लिए निकलना पड़ा तब टैगोर उनको अधिक अपने लगने लगे। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता उनको बल देती रही। उस संदर्भ में उनकी स्वीकारोक्ति है-‘स्वदेश छोड़कर विदेश में पांव जमाने और दुनिया समझने-जीने की चुनौतियों को स्वीकार करने की शक्ति कवि रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘एकला चलो रे’ से हासिल हुई-
एकला चलो रे
तेरी आवाज पे कोई न आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला, चल अकेला, चल, अकेला, चल अकेला रे।
टैगोर जी के अलावा नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली विदेशी त्रयी है जिनके साहित्य से पुष्पिता अवस्थी काफी प्रभावित हैं। उनमें से पहली चिली की कवयित्री ग्रेबीला मिस्त्राल है जिसे 1945 में कविता के लिए नोबेल मिला था। उनके गीति काव्य लैटिन अमेरिका निवासियों में प्रेरणा भरते रहे-लंबे समय तक। इनमें हृदय की कोमलता, शक्ति,आवेश, ममता और विद्रोह निहित है।
पुष्पिता अवस्थी की दूसरी नोबेल पुरस्कार प्राप्त पसंदीदा कवयित्री है नेली साख्स। हिटलर की यहूदी-विरोधी नीति के कारण उन्हें जर्मनी (बर्लिन) छोड़कर स्वीडन में बसना पड़ा था। उनकी कविताओं में यहूदियों की पीड़ा, यातना का अंकन है, प्रेम गीत, विरह गीत हैं, युद्ध की विभीषिका, अमानवीय कृत्यों के शिकार स्त्री-पुरुष और बच्चों की कराह अभिव्यक्त है। नेली साख्स की यह पीड़ा कि “सबके पास अपना एक घर है, जब कि मैं संसार के एक छोर पर लटकी हूं। पुष्पिता अवस्थी को अहम लगती है और उसकी यह रचना भी उपलब्धि लगती है-
संसार के द्वार पर परित्यक्त
मेरे भाइयों और बहनों
मैं तुम्हारे लिए युद्ध के गीत नहीं गाऊंगी,
सिर्फ बहते हुए रक्त को रोकूंगी
और जमें आंसुओं को
पिघलाकर बहा दंूगी।
स्पष्ट है कि भोगी हुई पीड़ा और परिवेश ने नेली साख्स के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समृद्ध बना दिया जिससे डॉ. पुष्पिता जी काफी प्रभावित रही हैं।
डॉ. पुष्पिता अवस्थी की तीसरी पसंदीदा नोबेल विजेता कवयित्री है पोलंड की विल्सावा शिंवोर्सका। स्वीडिश अकादमी ने उनके बारे में पुरस्कार देते हुए कहा था-‘विल्सावा शिंवोर्सका की कविता मानव जीवन के सत्या के इतिहास के साथ जैविक संदर्भ में भी महत्त्वपूर्ण है।’ पोलंड में रहकर ही वह सेंसरशिप के क्रूर पंजों से बचती है। मगर व्यवस्था के विरोध में कभी पीछे नहीं रही। डॉ. पुष्पिता अवस्थी की पसंद में विल्सावा की राजनीतिक कविता द्रष्टव्य है-
अराजनीतिक कविताएं भी गहरे अर्थों में राजनीतिक हैं
और हमारे ऊपर जो चंद्रमा चमक रहा है
वह भी विशुद्ध रूप से चंद्रमा नहीं है
यहां तक कि तुम जंगलों में भी चले जाओ
तो वहां भी तुम राजनीतिक मैदानों में
राजनीतिक कदम उठा रहे होंगे।
वस्तुतः पुष्पिता अवस्थी सभी नोबेल पुरस्कार प्राप्त साहित्यकारों की कृतियों से प्रभावित हैं किन्तु उपर्युक्त विदेशी तीन कवयित्रियों को ज्यादा पसंद करती हैं, उन्हीं के शब्दों में-‘मेरी चहेती यह तीन कवयित्रियां विशेष हैं।’
डॉ. पुष्पिता अवस्थी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व जिन रचनाकारों से प्रभावित रहा है, उनमें से एक है बांगला देश की निष्कासित लेखिका तसलीमा नसरीन। न केवल उनकी कविता का बल्कि जीने की शैली का प्रभाव भी पुष्पिता जी ने मान लिया है। उनकी धारणा है कि कविताएं- कवि के जीवन के लिए तो रास्ता बनाती ही हैं, वे अपने पाठकों के जीवन के लिए भी रास्ता बनाती है। तसलीमा जी की ‘तुम लड़की हो’ पुष्पिता अवस्थी को इसी श्रेणी की रचना लगती है, जैसे-
तुम लड़की हो
रखना यह अच्छी तरह याद
लाँघोगी जब घर की चौखट तुम
लोग तुम्हें देखेंगे तिरछी निगाह से
तुम जब जा रही होगी गली से
लोग पीछे पड़ेंगे, सीटी बजायेंगे
जब तुम आओगी चौड़े रास्ते पर
होकर गली से, लोग गाली देंगे तुम्हें
कहेंगे चरित्र हीन
यदि निकली तुम कमजोर
तुम पीछे लौटोगी
नहीं तो, जैसे जा रही हो, चलती जाओगी।
उनकी मान्यता है कि स्त्री के जीवन में इतनी लगामें लगाई जाती हैं कि उससे मुक्त होने के संघर्ष में ही सारी उम्र बीत जाती। ‘देश, समाज और संस्कृति की सारी लगामें स्त्री की गति को अवरुद्ध करने और वजूद को समाप्त करने के लिए होती हैं।’ पुष्पिता अवस्थी की यह मान्यता वर्तमान वैश्विक समाज की सच्चाई को दर्शाती है कि स्त्री की बेइज़्ज़ती करने वाले और उसकी इज़्ज़त से खेलने वाले वैश्विक खूंखार समाज के बावजूद वह है। वह ‘दैहिक बलात्कार अगर नहीं तो मानसिक बलात्कार को स्त्री झेलने के बावजूद जीवित है और सृजन तथा मानवीय संस्कृति को बचाए रखने की कविताएं लिख रही है। उस स्त्री समुदाय में से मैं भी एक हूं जिसने विश्व में अपने अध्ययन, अध्यापन, यायावरी और नौकरी के भीतर कविता बनाने के ज़रूरी तत्व इजाद किये।’
डॉ. पुष्पिता अवस्थी की वैश्विक संवेदना के बावजूद,अपनी इस विश्व यात्रा के बारे में जो मान्यता है, उससे उनकी व्यथा की कथा व्यक्त हुए बिना नहीं रहती। इसमें सबसे पहले दर्द का कारण है अपनों से बिछोह। सारे नज़ारे प्यारे दुलारे इन सबसे जुदा होना, जिनमें मां के साथ-साथ मातृभूमि से जुदा होना, भारतीय संस्कृति एवं प्रेम से जुदा होना आदि शीर्षस्थ हैं। हां, यह बात अलग है कि प्रवासी भारतीय विदेश वासियों में हमारी सभ्यता एवं संस्कृति की पताका को लहराने का दायित्व सबसे ज्यादा कवयित्री ने निभाया है और आज भी निभा रही हैं सादगी, संयम और दम खम के साथ। मगर विदेश की आत्मकेंद्रित स्वार्थी जीवन शैली भी उनकी निगाह से छूट नहीं पाती। उन्होंने युरोपीय जीवन शैली पर उंगली रखते हुए स्पष्ट किया है कि वहां रात और दिन में अलग पर्यावरण मिलता है। ‘जिस देश की यात्रा करती हूं उसे अपना मानकर जीती हूं’ कहनेवाली इस कवयित्री की पैनी निगाहों से विदेशी जीवन शैली बच पाई और विदेशी यात्राओं का यह दर्द स्वयं उन्हीं के शब्दों में-‘विदेश में वैसे भी आत्मकेंद्रित स्वार्थी जीवन शैली है। योरोपीय देशों के नागरिकों को दूसरे देश जाने पर भाषा और भाषाई संस्कृति का पर्यावरण अवश्य कभी-कभी रात्रि में प्रताड़ित करता होगा। लेकिन दिवस की जीवन शैली सूर्यप्रकाश की तरह विभेद रहित रहती है। ग्रीष्म में जैसे समुद्र तट पर सूर्य सबकी देह सेंकता है और समुद्र सबके मन को तरलता के आगोश में भरता है, वैसे ही विस्थापन के बावजूद वे निर्वासन के दंश से पीड़ित नहीं होते हैं। लेकिन मेरे लिए विदेश प्रवास इन सबसे अलग विशेष दर्दनाक रहा, क्योंकि माँ की तरह मातृभूमि छूट गई और भारतीय संस्कृति की तरह प्रेम भी वहीं स्वदेश में छूट गया। उसके बिना जीना और खुद को जिलाना पड़ा।’
अपने साहित्य में उन्होंने उस सच का भी संवेदनशीलता और ईमानदारी से अंकन किया है जो भारतवंशी विदेश में रहते हैं मगर वो सिर्फ़ दिखावे भर के भारतीय हैं। इसके बारे में उनकी यह बेबाक मान्यता दृष्टव्य है- ‘भारत से बाहर पीढ़ियों से रह रहे भारतवंशी खान-पान बोल-चाल से सिर्फ़ दिखावेभर को भारतीय होते हैं, आंतरिक रूप से वे पीढ़ियों से जिस देश में रह रहे हैं, वह मन, प्राण, आत्मा से उस देश के हो चुके होते हैं।’
कवयित्री का जीवन सफ़र देखने के बाद मुझे वह कहने में संकोच नहीं कि उनका व्यक्तित्व ‘अत्त दीप भव’ की बेहतरीन मिसाल है। वे स्वयं प्रकाशित व्यक्तित्व की धनी है। अपनी चेतना, संचेतना, आत्मचेतना एवं संवेदना के बल पर उन्होंने भारत के देहात गुरगांव (कानपुर, उ.प्र.) से विश्वगाँव (ळसवइंसटपससंहम) तक का शानदार सफ़र किया, जिसमें पीड़ा के पड़ाव, अवरोध-गतिरोध नहीं थे ऐसा नहीं। लेकिन यात्रा का हर पड़ाव उनका अपना चयन था, जिसमें उधर्वगामी सफ़र का पुरज़ोर संकल्प और उससे कहीं ज्यादा हुनर था। तभी तो हर मक़ाम पर अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के झंडे गाड़े।
सभ्यता एवं संस्कृति से, पुश्तैनी अमीर, समृद्ध होने के कारण डॉ. पुष्पिता अवस्थी अपनापा, कृतज्ञता की लता लगती है। मगर ऐसी लता जोस्नेह की कलियों और फूलों से लबालब होती है, जिसके अपनापे की सुगंध भौगोलिक सीमाओं के बाहर दुनिया के विविध देशों के कोने-कोने को महकाती है। विदेश में होते हुए स्वदेशियों को भी अपने कर्म की खुशबू से प्रसन्न करा देती है। कृतज्ञता का भाव उनकी आंतरिक शक्ति को बढ़ा देता है। अपने गुरु, शिक्षा संस्था के संस्थापक, साहित्यकार, लेखक, समीक्षक, गायक, नर्तक, कलाकार और अपने नाना-नानी एवं माता-पिता भ्राता का परिवार, इन सबके प्रति अपने हृदय सागर में जो अपार कृतज्ञता है वह यत्र-तत्र-सर्वत्र दृष्टिगोचर हुए बिना नहीं रहती। खासकर उनके ‘कविता संचयन’ के तीनों खंडों के समर्पण के पृष्ठ देखें तब इसका अहसास हुए बिना नहीं रहता। अपने परिवार वालों के समर्पण के बारे में उनके अनमोल शब्द हैं-‘यह समर्पण-स्याही से नहीं-हृदय के रक्त और आंसुओं से लिख रही हूं। क्योंकि इन लोगों ने जीवनभर मुझे अपना जीवन दिया है-अन्यथा मेरा जीवन और लेखन संभाव नहीं हो पाता।’ कहना सही होगा कि कृतज्ञता की स्वर्णिम शब्दावली देखें-पढे तो सिर्फ़ डॉ. पुष्पिता अवस्थी की रचनाओं में ‘कविता संचयन’ के खण्ड दो में समर्पण का शीर्षक है ‘मानस समर्पण’ जिसमें विश्वचिंतक जे कृष्णमूर्ति से लेकर प्रो. कृष्णनाथ, प्रो. नामवर सिंह, अमृतराय से होते हुए हमउम्र डॉ. अलका सिंह तक को याद करते हुए यह स्वीकारोक्ति है कि इन सबसे अनवरत संवाद से ही सृजन की अर्जित हुई। बक़ौल पुष्पिता अवस्थी-‘इस सत्य कथन के साथ कि विदेश के साहित्यिक विद्वानों से अधिक आत्मीयता और विश्वसनीयता स्वदेश के भारतीय हिंदी विद्वानों से है। जो कष्ट सहकर भी नई पीढ़ी की शक्ति बनते हैं।’ कृतज्ञता का विराट रूप उनकी‘कविता संचयन’ खण्ड-3 के ‘चाहत समर्पण’ के पृष्ठ पर भी लबालब भरा हुए लक्षित होता है-‘उन्हें, और उनके साथ विदेश में मेरी तरह बसे हुए उन सभी भारतीय साहित्यकारों को यह तीसरा खण्ड समर्पित जिनकी सक्रियता से वर्तमान भारत का विकसित अस्तित्व विदेशियों की अस्मिता के समक्ष चुनौतीपूर्ण है।’
किसी ग्रंथ की भूमिका माने हर साहित्यकार के अपने अंतरंग को जानने का सर्वाेत्तम साधन होता है। कहूं कि पुष्पिता जी के ‘कविता संचयन’ खंड एक की भूमिका माने मंदिर का महाद्वार कहना होगा। जिससे होकर मूर्ति तक अर्थात रचनाओं तक पहुंच जाना तथा उनको जानना अधिक आसान हो जाता है। इसमें कविता क्या है से लेकर उनकी सृजन यात्रा के सूत्र सर्वत्र विकीर्ण हैं। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को जानने एवं आत्मगत करने के क्ल्यू भूमिका के पृष्ठ-दर-पृष्ठ दृष्टिगोचर होते हैं। इतनी लम्बी भूमिका मेरे अध्ययन में शायद ही आई हो। महाराष्ट्र के महान संत तुकाराम के मराठी अभंगों के ‘तुकाराम अभंग गाथा’46का तीन खंडों में हिंदी अनुवाद वेदकुमार वेदालंकार जी ने किया और गुरुकुल के संस्थापक डॉ. अशोक कामत (पुणे, महाराष्ट्र) जी ने इन्हें प्रकाशित कर तीन खंडों की भूमिकाएं क्रमशः 39,45 तक 47 पृष्ठों में प्रस्तुत की है। दूसरा उदाहरण मराठी विश्वकोश के जनक ‘तर्कतीर्थ’ ’लक्ष्मण शास्त्री जोशी के समग्र साहित्य को अठारह खण्ड में संपादित’ कर महाराष्ट्र शासन की ओर से प्रकाशित करने का दायित्व जिन्होंने संपादक के नाते निभाया वे डॉ. सुनीलकुमार जी हैं- जिन्होंने प्रत्येक खण्ड की अलग-अलग भूमिकाएं लिखी कम-से-कम पचास से लेकर ज्यादा-से-ज्यादा सौ पृष्ठ तक।
करीब चौहत्तर पृष्ठों की दीर्घाकार भूमिका कवयित्री पुष्पिता का आत्मविष्कार और सुदीर्घ साहित्य-चिंतन का परिष्कार है और उपसंहार भी। मुझे कहने में तनिक संकोच नहीं कि ‘जहां-जहां जाऊं सोई परिक्रमा, जो कुछ करूं सोई पूजा’ में पुष्पिता अवस्थी ने ‘अनुभूतियों की दस्तकें और दस्तकों की इबारतें’ शीर्षक भूमिका में अपनी आत्मकथा ही प्रस्तुत की है, भले ही पूरी न सही, अधूरी क्यों न हो। लेकिन भावि में इसमें कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण आत्मानुभाव, घटनाएं, प्रसंग और अंतर्बाह्य सबलताओं तथा दुर्बलताओं के साथ दस्तावेज़ दर्ज करें तो हिंदी साहित्य को एक और सशक्त, संवेदनशील, प्रेरणादायी उर्ध्वगाती जीवन की, त्याग एवं ताप की अनोखी आत्मकथा मिलेगी इसमें संदेह नहीं। क्षमता तो उनमें है ही और आत्मकथा के लिए जिस चीज़ की ज़रूरत होती है, वह उनमें ग़ज़़ब की है ही। बस आवश्यकता है ठाने और ख़तरे उठाने की। क्योंकि आपके जितनी ईमानदार सर्जना शायद ही किसी प्रवासी भारतीय साहित्यकार में शायद ही मिलेगी। वो वृत्ति-प्रवृत्ति सामने आयेगी जो सिंदूर उतारने पर पत्थर का परिचय कराती है, साथ ही वो अच्छाइयां आलोक में आयेंगी जो बुराइयों के राख़ के नीचे ढकी की ढकी रही हैं। अतः इन पंक्तियों के लेखक का साग्रह आवेदन एवं निवेदन रहेगा कि ‘कविता संचयन’ खण्ड एक के आत्मकथ्य को आत्मकथा के रूप में आंतरित करने संकल्प साकार करें।
कवयित्री का साहित्य सृजन स्थानीय से वैश्वीय धरातल पर विकीर्ण है। उनके लेखन की संवेदना व्यापक है। उनके ‘स्व’ की अनुभूति पाठक को स्वयं अपनी लगती है। उनके कविता की चेतना ‘स्व’ तक सीमित न होकर ‘पर’ को प्रभावित करती है। वह वेदना और संवेदना- दोनों स्तरों पर तादात्म्य स्थापित कराती है और साधारणीकरण के स्थिति तक ले जाती है। उनकी अपनी मान्यता है है कि ‘मेरी दृष्टि में विश्व और मनुष्यता का रक्षण और संरक्षण ही कविता का मूल उद्देश्य है।’ जब वे यह मानकर लिखती है कि ‘जब मैं लिखूं तो ऐसे लिखूं कि उसमें अपनी बातें होते हुए भी पूरे विश्व की बातें हो, अपनी और अपनों की चिंता में पूरे विश्व की चिंता हो।’ तब कहने में कोई संकोच नहीं बचता कि उनका काव्य निजी परिपार्श्व के जरिए वैश्विक परिवेश एवं परिदृश्य को ही प्रस्तुत करता। जिसमें, अखंड एवं पाखंड, खुशी और गम, सबलताएं एवं दुर्बलताएं, स्वरूपता और विरूपता एवं ईमानी और बेईमानी के साथ अवतीर्ण है। उनका साहित्य संसार विशाल है जिसमें अस्सी से अधिक ग्रंथ हैं। कहानी, उपन्यास, आलोचना, शोध-निबंध और एक दर्जन से अधिक काव्य संग्रहों के बावजूद ‘कविता संचयन’ के तीन बड़े-बड़े खण्ड प्रकाशित हैं अपनी गरिमा और गौरव के साथ। इनमें आठसौ से अधिक कविताएं संकलित हैं।
मानव प्रेम और विश्व मानव प्रेम का गुणगान करनेवाली इस विश्व कोयल को यदि ‘कविता संचयन’के लिए किसी दिन ज्ञानपीठ या नोबेल पुरस्कार से नवाजा जाएँ तो किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिए। जन धर्मिता, प्रेम धर्मिता तथा विश्व धर्मिता का दायित्व वहन करने वाली इस कवयित्री का कलेजा इतना बड़ा विशाल है कि उसके काव्य-सागर के तह तक जाना सहज संभव नहीं।
डॉ. पुष्पिता अवस्थी के समग्र साहित्य का अध्ययन उनके चेतना के वैविध्य का परिचायक लगता है। उनकी काव्य-दृष्टि अत्यंत व्यापक है, जिसके ओर-छोर को पकड़ना क्षितिज को पकड़ने के प्रयास जैसा है। जीवन के चार दशक स्वदेश में बिताने के बाद वे विदेश भूमि में जा बसी- अपने कर्म की अलग पहचान के साथ। जिस देश की यात्रा की, उसे अपना माना। जो दायित्व मिला या सौंपा गया, उसे क्षमता से निभाया। अपने वैश्विक भ्रमण से, तजुर्बे से तथ्य पाया कि विदेशी साहित्यकारों से अधिक आत्मीयता और विश्वसनीयता स्वदेशी अर्थात भारतीय हिंदी विद्वानों में है। समकालीन ही नहीं अपितु हमकालीन कविता के क्षेत्र में उनका स्थान शीर्षस्थ है। उनकी कविता नई सदी का स्वर बनकर शब्द ब्रह्म की प्रतीति कराती है और अहं की समाप्ति। वह ‘स्व’ से ऊपर उठकर ‘पर’ का चिंतन बनती है। उसमें अर्थ का अवगाहन करने वाली ओजस्वी वाणी, दिव्यदृष्टि और प्रेरणा मिलेगी इसमें संदेह नहीं। कोई श्रेष्ठ या कालजयी साहित्यकार पुरस्कार या सम्मान के लिए नहीं लिखता मगर सम्मान की प्राप्ति उसके दायित्व को बढ़ाती है इसे नकार नहीं सकते।
(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)




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