मंगलवार, 16 मार्च 2021

धीरज से पहली मुलकात को मैं भरत-मिलाप कहता हूं: गोपीकृष्ण

गोपी कृष्ण श्रीवास्तव का जन्म जनपद प्रतापगढ़ के ग्राम मधुपुर के सुशिक्षित एवं प्रतिष्ठित कायस्थ परिवार में 24 नवंबर 1930 को हुआ। आपकी शिक्षा-दीक्षा प्रताप बहादुर इंटरमीडिएट कॉलेज प्रतापगढ़ सिटी में हुई। आप कुछ दिनों तक पुलिस मुख्यालय में कार्यालय अधीक्षक के पद पर कार्यरत रहे। तत्पश्चात माध्यमिक शिक्षा परिषद में सेवा करते हुए नवंबर 1990 में सेवानिवृत्त हो गए। वर्तमान में आप राजरूपपुर प्रयागराज में रहते हुए साहित्य साधना में निमग्न हैं। 15 अगस्त 1990 में अपने ‘राष्ट्रीय साहित्य संगम’ नाम की संस्था की स्थापना की। जिसकी गणना आज प्रयाग की पुरानी साहित्यिक संस्थाओं में होती है। इसके माध्यम से आप निरंतर कार्यक्रम कराते हैं। आप गीत, ग़ज़ल, छंद, मुक्तक, दोहे आदि विधाओं में लेखन करते हैं। देश प्रेम और राष्ट्र भक्ति पूर्ण रचनाएं आपने अधिक की। स्मृति शेष जमादार धीरज  आपके अभिन्न मित्र थे। जो आपकी संस्था के उपाध्यक्ष भी रहे। धीरज जी का जाना इन्हें गहरे शोक में उतार गया। जमादार धीरज के बारे में नज़दीक से जानने के लिए अनिल मानव ने आपसे बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के संपादित भाग -

गोपीकृष्ण श्रीवास्तव से वार्ता करते अनिल मानव


सवाल:  जमादार धीरज से आप की पहली मुलाकात कब और कैसे हुई ?
जवाब:  जब वो गांव से यहां आए थे, वो वायुयान विभाग मनौरी, इलाहाबाद में राजपत्रित अधिकारी थे। रिटायर होने के बाद उन्होंने राजरूपपुर में मकान बना लिया और यहीं रहने लगे। उन्होंने भी हमारे बारे में सुन रखा था और मैं भी उनके बारे में। हम और वो दोनों लोग एक-दूसरे से मिलने के इच्छुक थे। लेकिन घर नहीं पता था। एक बार एक कवि सम्मेलन हुआ। वहां पर धीरज जी भी गए और मैं भी गया था। वहीं पर हम दोनों लोगों की पहली मुलाकात हुई। जिसे मैं ‘भरत-मिलाप’ कहता हूं। हमारी एक संस्था थी ‘राष्ट्रीय साहित्य संगम’। जिसकी स्थापना मैंने 15 अगस्त 1990 में किया था।  जिसमें 20-25 लोग थे, जिसका मैंने पंजीकरण कराया। इस संस्था का मैं अध्यक्ष था और धीरज जी को उपाध्यक्ष बना लिया।  अभी 6 मार्च 2020 को हमारी किताब का विमोचन पं. केसरीनाथ त्रिपाठी जी ने किया है। मैंने धीरज जी से पहले भी कई बार कहा था, कि आप अध्यक्ष बन जाइए, लेकिन वह बार-बार इनकार कर देते थे। और कहते थे, कि नहीं आप ही अध्यक्ष रहिए, मगर उस विमोचन के दिन हमें खुद मंच पर बोलने का मौका मिला। तब हमने कहा, कि अभी तक तो धीरज जी आप इंकार कर रहे थे, लेकिन आज सबके सामने में आपको अध्यक्ष मान रहा हूं। मैं संस्था में रहूंगा, अलग नहीं होऊंगा, मगर मुझे जिस पद पर रखेंगे मैं उसे खुले मन से स्वीकार कर लूंगा।
सवाल: राष्ट्रीय साहित्य संगम में जमादार धीरज की क्या भूमिका थी ? वह किस प्रकार से सहयोग करते थे ? 
जवाब: मैं राष्ट्रीय साहित्य संगम का अध्यक्ष केवल कहने के लिए था। जमादार धीरज जो कहते थे, वही मैं करता था। अब इससे बड़ी भूमिका और क्या होगी ? मैंने हमेशा उन्हीं को अध्यक्ष माना और अंतिम में 6 मार्च को सबके सामने घोषित भी कर दिया। राष्ट्रीय साहित्य संगम की जो भी कार्य योजनाएं बनती थीं, बैठक होती थी, उसमें प्रमुख रूप से धीरज जी की ही भूमिका रहती थी। धीरज जी संस्था के लिए बहुत से काम किए हैं उनका अतुलनीय योगदान है।

अनिल मानव, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


सवाल: इधर बहुत दिनों से राष्ट्रीय साहित्य संगम का कोई आयोजन नहीं हुआ है। इसकी क्या वजह हैं।
जवाब: ऐसा नहीं है। अभी 2 महीने पहले हमने इलाहाबाद सहित बाहर के बहुत से कवियों को इकट्ठा किया था। एक बड़ा कार्यक्रम चला था। लगभग चार-पांच घंटे का। इस तरह अभी हमने दो बार बड़ा कार्यक्रम कराया है।
सवाल: जमादार धीरज को आप कवि के रूप में कहां पाते हैं? 
जवाब: धीरज जी को मैं एक बड़ा कवि मानता हूं। उन्होंने देश और समाज के बारे में बहुत कुछ लिखा है। ‘दर्द हमारे गीत हो गए’ उनकी मशहूर कविता है। साहित्य को उन्होंने हमेशा साधना के रूप में रखा है। धीरज जी ने बहुत उम्दा और मार्मिक गीत लिखे हैं, जिसकी वजह से वह हमेशा अमर रहेंगे। मैं उन्हें अपने से भी श्रेष्ठ कभी मानता हूं। 

सवाल: इनके गीतों में भोजपुरी और अवधी शब्दों की भरमार है। इसको आप किस रूप में देखते हैं ?
जवाब: उनके गीतों और कविताओं में भोजपुरी और अवधी के शब्द बहुतायत देखने को मिलते हैं। अवधी की अपेक्षा भोजपुरी के शब्द कम इस्तेमाल करते थे। कवि को जिस मिट्टी से अधिक प्रेम और लगाव होता है, उसके काव्य में वहां की बोलियां और शब्द अनायास ही आ जाते हैं। ये नैसर्गिक होते हैं। इसके लिए कवि पूर्णतः स्वतंत्र होता है। यही उसकी विशिष्टता होती है। जो उसके काव्य को औरों से अलग बनाते हैं। उसे अलग पहचान दिलाते हैं। हम सदैव इसके पक्ष में हैं। कवि का अपना मन और लेखनी होती है, इस पर उसका निजी अधिकार होता है।

अनिल मानव, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव, मधुबाला गौतम और इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 सवाल: जमादार धीरज जिस स्तर के कवि थे, देश के पटल पर क्या उनको वह स्थान मिल पाया ?

जवाब: धीरज जी की रचनाएं बहुत दमदार हैं। इलाहाबाद में ज्यादातर लोग उन्हें जानते हैं। वह लगभग हर कवि गोष्ठियों में पहुंचा करते थे और उनका एक वरिष्ठ कवि के रूप में अलग सम्मान रहता था। लेकिन जो पहचान और स्थान उन्हें वृहद क्षेत्र में मिलना चाहिए था, शायद उतना नहीं मिल पाया है। पूरे देश में सब को पहचान मिल पाना बेहद कठिन होता है।

सवाल: जमादार धीरज की पुस्तक ‘युग प्रवर्तक डॉक्टर आंबेडकर’ को आप किस रूप में देखते हैं ? 

जवाब: इस किताब को लिखने से पहले धीरज जी ने इस पर मुझसे चर्चा की थी। इस किताब पर स्पेशल एक गोष्ठी भी हुई। मैं इसे एक उत्कृष्ट किताब मानता हूं। अम्बेडकर जी के जीवन से संबंधित तमाम स्याह और सफेद पक्ष इस किताब के जरिए उन्होंने उजागर किया है। उनके जीवन संघर्षों को बहुत अच्छे तरीके से धीरज जी ने रचा है जो काबिले-तारीफ है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)


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