सोमवार, 8 मार्च 2021

लाॅकडाउन के 55 दिन और तन्हाइयां

                                                                                - डाॅ. हसीन जीलानी

                                         


इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी जो बुनियादी तौर पर तो सहाफ़ी हैं ‘गुफ़्तगू’ के ज़रिए उनकी पहचान शह्र और बैरून-ए-शह्र में एक अदीब व शायर की भी बन गयी है। उनके काम करने की लगन ने उनके चाहने वालों का दायरा काफी वसी कर दिया है। कुछ लोग इम्तियाज़ ग़ाज़ी की सरगर्मी पर अपनी हैरानी का इज़हार करते हैं और कहते हैं भाई आप अतने सारे काम कैसे कर लेते हैं। ऐसे मौक़े पर मुझे अल्लामा इक़बाल का मार्का-आरा नज़्म ‘खिज्रे-राह’ का एक शेर याद आता है -

                  क्या तअज्जुब है मेरी सरहान वर्दी पर तुझे

                  ये तगायू-ए-दमादम ज़िन्दगी की है दलील।

‘लाॅकडाउन के 55’ दिन इम्तियाज़ ग़ाज़ी की ताज़ा-तरीन किताब है। दुनिया में फैले वबा करोना की वजह से दुनिया के बेशतर मुमालिक में ज़िन्दगी जैसे ठहर सी गयी। हिन्दुस्तान में 25 मार्च 2020 को पूरे मुल्क में लाॅकडाउन नाक़िद कर दिया गया। इसके बावजूद बहुत से दानिश्वरों, अदीबों और शायरों ने इस पुर-आशोब दौर में भी पढ़ने लिखने का काम जारी व तारी रखा। इन्हीं में से एक नाम इम्तिया अहमद ग़ाज़ी का भी है। लाॅकडाउन के दरमियान इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने कारनामों का तज्जिया करने के लिए आॅनलाइन नशिस्तों का एहतिमाम किया, जिसमें लोगों ने अपने अपने ख़्यालात बड़ी बेबाक़ी से ज़ाहिर किए। इम्तियाज़ ग़ाज़ी ने इन्हीं ख़्यालात को तहरीरी शक्ल देकर बाक़ायदा किताब शायरा कर दी है। किताब में इम्तियाज़ ग़ाज़ी का सहाफ़ती रंग ग़ालिब है। दौर-ए-हाजिर के मारुफ़ शायर मुनव्वर राना ने दुरुस्त लिखा है कि-‘39 शायरों पर परिचर्चा तो एक मामूली काम है लेकिन ये एक बुनियाद है। गुफ़्तगू एक बुनियाद रख रहा है। यह अदब की एक बहुत बुलंद इमारत, साहित्य की आलीशान इमारत की बुनियाद है। लाॅकडाउन के ज़माने में एक अच्छा और एक सच्चा काम कर लेना बड़ी बात है।’

गुफ़्तगू पब्लिकेशन की जानिब से शाया इस किताब का कवर दिलकश है। तारीख़ी हैसियत की हामिल इस किताब की कीमत सिर्फ़ 300 रुपये है। 280 सफ्हात़ पर मुश्तमिल ये किताब हिन्दी और उर्दू दोनों ज़बानों में दस्तयाब है।

 


 ‘तन्हाइयां’ तबस्सुम नाज़ का तीसरा शेरी मजमुआ है जो कि हम्द, नात, मन्क़बत, ग़ज़ल, गीत और नज़्मों पर मुश्तमिल है। इससे क़ब्ल सन् 2008 ई. में ‘बूए-ग़ज़ल’ और सन 2015 ई. में ‘मुस्कुराहट’ नाम के मजमुए भी शाया होकर मंज़र-ए-आम पर आ चुके हैं। तबस्सुम नाज़ ब-यक वक़्त कई सलाहियतों की मालिक हैं। एक इंसान में ब-यक वक़्त कई सलाहियतों का होना कभी-कभी अच्छा होता है तो कभी-कभी मुश्किलें भी पैदा करता है। तबस्सुम नाज़ शेरी मजमुओं के साथ-साथ अफ़्सानवी मजमुआ ‘अंदाज़-ए-बयां कुछ और’ की भी मुसन्निफ़ हैं।

 तन्हाइयां में मुतालिआ से ये बात शिद्दत से महससू होती है कि तबस्सुम नाज़ के दिल में जज़्बात का एक समुंदर ठाठें मार रहा है जो कभी अफ़्साना निगारी की शक्ल में ज़ाहिर होता है तो कभी शायरी का रूप अख़्तियार कर लेता है, लेकिन इसमें बहने वाले बेशुमार कीमती  गुहर उज़्लत पसन्दी के सबब धागे में सलीके से नहीं पिरोये जा सके हैं। ख़्वाजा हैदर अली आतिश का बहुत मशहूर शेर है- 

              बन्दिश-ए-अज्फ़ाज़ जड़ने से नगों के कम नहीं

              शायरी भी काम है आतिश मुरस्सा साज़ का।

यानी फ़नकार के लिए लफ़्ज़ों को सलीके़मन्दी से शेरी पैक़र में ढालने के फन से वाक़िफ़ होना ज़रूरी होता है। जैसा तबस्सुम नाज़ साहिबा ने खुद फ़रमाया है कि परवीन शाकिर उनकी आइडियल शायरा हैं। अगर वाक़ई वह उन्हें अपना आइडियल समझती हैं तो परवीन शाकिर की शायरी के उन अहसन पहलुओं पर भी ग़ौर करना चाहिए जो उनको उर्दू शायरी का माह-ए-तमाम बनाते हैं। तबस्सुम नाज़ के चंद उम्दा शेर मुलाहिजा कीजिए -

                चलने दो हवा-ए-उल्फ़त फिर दुनिया बदलेगी चेहरा,

                उम्मीद जगी है पत्थर दिल इंसान पिघलने वाला है।

                सूरज के डूबने पे जला देते हैं चिराग़,

                सच्चाई को फ़रेब से झुटला रहे हैं हम।

150 पेजा पर मुश्तमिल इस किताब की क़ीमत सिर्फ़ 300 रुपये है, जो इरम पब्लिशिंग हाउस, पटना से शाया हुई है। किताब का कवर दिलकश है। उम्मीद है ‘तन्हाइयां’ को अदबी हल्क़े में क़द्र की निगाहों से देखा जाएगा।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित)


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