शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

अब भी सक्रिय हैं नरेश मिश्र

                                     
    
नरेश मिश्र

                             -ंइम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
नरेश मिश्र इलाहाबाद और पूरे देश में साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में एक जाना-ंउचयमाना वयोवृद्ध नाम है। कई अख़बारों में नियमित काॅलम और आकाशवाणी इलाहाबाद में नौकरी के दौरान प्रस्तुत किए गए अपने कार्यक्रमों की बदौलत इन्होंने अपनी सक्रियता और लेखन का कुशल परिचय हमारे समाज को दिया है। 15 सितंबर 1934 को पंडित तारा शंकर मिश्र के घर जन्मे नरेश मिश्र चार भाई और दो बहनें थीं। पिता तार शंकर मिश्र उस ज़माने में इलाहाबाद में मशहूर वैद्य थे। दूर-ंदूर से लोग इलाज के लिए आते थे। माता बैकुंठी देवी सकुशल गृहणि थीं। प्रारंभिक शिक्षा के बाद राधा रमण इंटर कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद पिता जी इन्हें वैद्य बनाना चाहते थे, चिकित्सक की शिक्षा के लिए इनका दाखिला करा दिया। चंद दिनों के अंदर ही एक दिन शिक्षा के दौरान ही एक लाश सामने लाकर उसके बारे में बताया जाने लगा, इस प्रक्रिया से वे बेहद घबरा गए और चिकित्सक की पढ़ाई छोड़कर चले आए। फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में स्नातक के लिए दाखिला लिया, लेकिन यहां भी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। क्योंकि उस समय डाॅ. जगदीश गुप्त अध्यापक थे जो इनके पिताजी को जानते थे, उनको लगा कि पिता की मर्जी के विपरीत इस विभाग में एडमीशन लेकर पढ़ाई कर रहा है, इसलिए उन्होंने कहा कि अपने पिताजी से लिखवाकर ले आओ की यहां पढ़ाई करनी है। डाॅ. जगदीश गुप्त इनके पिताजी को जानते थे, नरेश मिश्र अपने पिताजी से लिखवाकर नहीं ला पाए, इसलिए पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी। 1956 में आपको दिल का दौड़ा पड़ा, फिर दुबारा अटैक आया। जिसकी वजह से आप गंभीर बीमार हो गए। संपूर्ण इलाज के बाद जब 1960 में ठीक हुए तो फिर से पढ़ाई और नौकरी की चिंता सताने लगी। इनके सारे दोस्त कहीं न कहीं नौकरी पा चुके थे।
नरेश मिश्र के दोस्त बद्री नाथ तिवारी उस समय ‘भारत’ अख़बार में नौकरी कर रहे थे। उन्होंने इनसे लिखने के लिए कहा। उनके कहने पर नरेश मिश्र पहली कहानी लिखकर दे आए। जब बद्री नाथ तिवारी आफिस से लौटे तो 10 रुपये थमाते हुए कहा कि यह तुम्हारी कहानी का पारिश्रमिक है, बाउचर पर हस्ताक्षर करके यह पैसा ले लो और आगे भी लिखने का काम जारी रखो, बहुत अच्छा लिखते हो। पत्र-ंपत्रिकाओं में लिखने का क्रम शुरू हो गया। फिर कादंबिनी का संपादन कार्य इलाहाबाद से शुरू हुआ तो उसके संपादकीय विभाग में नौकरी करने लगे। इसके बाद गांधी मेमोरियल ट्रस्ट में गांधी साहित्य के संपादन का काम तीन वर्षों तक किया। 1962 में आकाशवाणी इलाहाबाद में स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर चयन हुआ, लेकिन पांच साल तक नियुक्ति के लिए इंतज़ार करना पड़ा क्योंकि आकाशवाणी की तरफ से वैकेंसी नहीं हो रही थी, 1967 में नियुक्ति मिली। 25 साल दो महीने तक आकाशवाणी से नौकरी की, इस दौरान कई बार प्रमोशन का आफर मिला, लेकिन प्रमोशन के साथ तबादले की शर्त थी, इसलिए प्रमोशन नहीं लिए। आपकी कुल पांच संताने थीं, जिनमें एक पुत्र का देहांत हो चुका है। दो पु़त्रों में एक पुत्र लेबर विभाग से सेवानिवृत्त हो चुका है, दूसरा पुत्र कचेहरी में नौकरी करता हैं। दोनों की पुत्रियों की शादी हो चुकी है, अपने-ंअपने घरों में आबाद हैं।
अब तक आपकी 70 से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें ‘इंद्रधनुष’, ‘इतिहास बिथी’, ‘क्रांति के स्वर’, ‘इतवारी लाल’ और ‘कश्मीरियत के लिए’ आदि प्रमुख हैं। दो किताबों के प्रकाशन का कार्य प्रगति पर है, शीघ्र ही सामने आएंगी। 82 वर्ष की आयु में आज भी लेखन के प्रति सक्रिय हैं, जो लोगों के लिए मिसाल है।

( गुफ्तगू के जुलाई-ंसितंबरः 2017 अंक में प्रकाशित )

1 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-09-2017) को "कैसा हुआ समाज" (चर्चा अंक 2722) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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