सोमवार, 16 अप्रैल 2012

रोज़ एक शायर में आज- राहत इंदौरी



बीमार को मरज की दवा देनी चाहिए।
मैं पीना चाहता हूं, पिला देनी चाहिए।
अल्लाह बरकतों से नवाजेगा इश्क़ में,
है जितनी पूंजी पास लगा देनी चाहिए।
ये दिल किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं,
दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए।
मैं ताज हूं तो सर पे सजाएं लोग,
मैं ख़्वाब हूं तो ख़्वाब उड़ा देनी चाहिए।
सौदा यहीं पर होता है हिन्दुस्तान का,
संसद भवन को आग लगा देनी चाहिए।
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मुझ पर नहीं उठे हैं तो उठकर कहां गए।
मैं शह्र में नहीं था तो पत्थर कहां गए।
कितने ही लोग प्यास की शिद्दत से मर चुके,
मैं सोचता रहा कि समुन्दर कहां गए।
मैं खुद ही बेज़बान हूं, मेहमान भी हूं खुद,
सब लोग मुझको घर पे बुलाकर कहां गए।
ये कैसी रोशनी है कि अहसास बुझ गया,
हर आंख पूछती है कि मंज़र कहां गए।
पिछले दिनों की आंधी में गुंबद तो गिर चुका,
लिल्लाह जाने सारे कबूतर कहां गए।
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धूप बहुत है,मौसम का जल थल भेजो ना।
बाबा, मेरे नाम का बादल भेजो ना।
मोरसली के पेड़ों पर भी दिया जले,
शाख़ों का कैसरिया आंचल भेजा ना।
उमस उगी है आंगन के हर गमले में,
छांव की खुश्बू शाम का संदल भेजो ना।
नन्हीं मुन्नी बस चहकारें कहां गईं,
मोरों के पैरों की पायल भेजो ना।
बस्ती-बस्ती सन्नाटों का बोझ हैं क्यूं,
गलियों बाज़ारों की हलचल भेजो ना।
मैं तन्हा हूं, आखि़र किससे बात करूं,
मेरे जैसा कोई पागल भेजो ना।
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चराग़ों को उछाला जा रहा है।
हवा पर रोब डाला जा रहा है।
मेरे जूठे गिलासों की चखाकर,
बहकतों को संभाला जा रहा है।
हमीं बुनियाद का पत्थर हैं लेकिन,
हमें घर से निकाला जा रहा है।
जनाजे पर मेरे लिख देना यारो,
मोहब्बत करने वाला जा रहा है।


1 टिप्पणियाँ:

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

बहुत खूब..........................

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