गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

पुष्पिता अवस्थी होना आसान नहीं

                                                           - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

   पुष्पिता अवस्थी हमारे दौर की ऐसी शख़्सियत हैं, जिनका पूरा-पूरा आंकलन एक लेख में करना असंभव है। इन्होंने सिर्फ़ एक ही विधा में काम नहीं किया। कविता, उपन्यास, कहानी समेत कई विधाओं में काम किया है। काम भी कोई ऐसा-वैसा नहीं। प्रत्येक विधा पर समुंदर में उतरकर उसकी पूरी गहराई ठीक-ठीक नाप लेने जैसा कार्य किया है। आम तौर पर कोई लेखक एक ही विधा में अधिक गहराई तक उतरकर काम कर पाता है, लेकिन उन्होंने प्रत्येक विधा में उल्लेखनीय कार्य किया है। इनके कार्य को देखकर अत्यधिक आश्चर्य और हैरानी होती है। ऐसे लोग पूरे लेखक समाज के लिए सही मायने में प्रेरणास्रोत होते हैं।


 अगर इनकी कविताओं की बात करें तो इनमें अनेक देशों, द्वीपों, पहाड़ों, नदियों, महासागरों, आदिवासी जातियों की स्मृति जिनमें कैरेबियाई द्वीप, आस्ट्रिया का नाउदर गांव, रोम के भव्य भवन, आल्प्स की कोमल झील, सेंटलूशिया, अटलांटिक और हिंद महासागर के साथ और जाने क्या-क्या समाहित है। इतनी सारी चीज़ों को देखना-परखना और फिर उन अपनी अभिव्यक्ति ज़ाहिर करना वाक़ई हैरतअंगेज़ है। इसी तरह इनके उपन्यास के विषय-वस्तु और उनका उल्लेख हैरान कर देता है। जब पुष्पिता अवस्थी पर लिखने बैठिए तो समझ में ही नहीं आता कि आखिर किस विषय और बिंदु उठाया जाए।

उनके व्यक्तित्व की बात करें तो वे कवयित्री हैं, कवि हैं, अनुवादक, कहानीकार, कुशल संगठनकर्ता और हिंदी की विश्वदूत तो हैं ही। इसके साथ ग़ज़ब की फुटबाल प्रेमी भी हैं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ। पढ़ाई राजघाट, वाराणसी के प्रतिष्टित जे.कृष्णमूर्ति फाउंडेशन (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संबद्ध) में हुई। वर्ष 1984 से 2001 तक जे. कृष्णमूर्ति फाउंडेशन के वसंत कॉलेज फ़ॉर विमैन के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष भी रहीं। भारतीय दूतावास एवं भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र, पारामारियो, सूरीनाम में प्रथम सचिव एवं हिंदी प्रोफ़ेसर के रूप में सन् 2001 से 2005 तक कार्य किया। सन् 2003 में इन्होंने सूरीनाम में सातवां विश्व हिंदी सम्मेलन कराया। इस आयोजन की आजतक मिसाल दी जाती है।

 सन् 2006 से नीदरलैंड स्थित ‘हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन’ की निदेशक हैं। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ और स्त्री अधिकारों के लिए भी लगातार लड़ती रही हैं, जूझती रही हैं, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। अपने सूरीनाम प्रवास के दौरान इन्होंनेएक हिंदी प्रेमी समुदाय संगठित किया, जिसकी परिणति उनके द्वारा अनूदित और संपादित समकालीन सूरीनामी लेखन के दो संग्रहों ‘कविता सूरीनाम’और ‘कहानी सूरीनाम’ का प्रकाशन हुआ। वर्ष 2003 में ही राजकमल प्रकाशन से मोनोग्राफ़ ‘सूरीनाम’ भी प्रकाशित हुआ। इनके कविता संग्रहों ‘शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएं’, ‘अक्षत’, ‘ईश्वराशीष’ और ‘हृदय की हथेली’ और कहानी संग्रह ‘गोखरू’ समेत लगभग सभी पुस्तकों को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया है। 

लीलाधर मंडलोई कहते हैं-‘‘पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निवार्सित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं। जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़, बिहार झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों यथा-सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। डॉ. अवस्थी पर इन्हीं पर दशकों तक काम किया है। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इनमें प्रवासी भारतीय के इलाकों की भी छवियां हैं। भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है।’’

जावेद अख़्तर के साथ पुष्पिता अवस्थी 

पुष्पिता अवस्थी लगभग दो दशकों से विदेश में हिंदी साहित्य, भाषा, संस्कृति के प्रचार -प्रसार  में संलग्न हैं। कविता, कहानी, निबंध, आलोचना, मोनोग्राफ व हिंदी शिक्षण, जीवनी इत्यादि की हिंदी, डच, अंग्रेजी व बांग्ला आदि भाषाओं की लगभग 90 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। विदेश में उनके प्रकाशित  साहित्य एवं कृतित्व से हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए किए गए बहुविध कार्य उन्हें ‘हिंदी की विश्वदूत’ के रूप में एक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।

 डॉ. अवस्थी सिर्फ़ साहित्य तक ही सीमित नहीं हैं। फुटबाल के प्रति भी इनकी दीवानगी चरम पर रही है। नीदरलैंड के आयक्स फुटबॉल क्लब (18 मार्च 1900 से स्थापित) के बिजनेस क्लब की वरिष्ठ सदस्य हैं और इतनी व्यस्तताओं के बावजूद दस वर्षों से राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साप्ताहिक फुटबॉल मैच नियमित रूप से देखती आ रही हैं। खुद उनका कहना है कि ‘‘मुझे यह खेल इसलिए पसंद है क्योंकि इस खेल में दोनों टीम का हर खिलाड़ी अंतिम क्षण तक हार नहीं मानता है और आखिरी सांस तक गोल करने के लिए प्राण-प्रण से लगा रहता है। गिरता है, पड़ता है, धक्के खाता है, चोटिल होता है फिर भी रुकता नहीं है, उसकी आंखें फुटबाल और गोल पर ही लगी रहती हैं।“

कुल मिलाकर पुष्पिता अवस्थी का होना हमारे देश और समाज के लिए बहुत ही ख़ास है। इन्होंने अपने पूरे जीवन के एक-एक क्षण का सदुपयोग किया है। ऐसी शख़्सियत हमेशा ही सबके लिए प्रेरणादयक होती है। बिना किसी संकोच के हम कह सकते हैं कि पुष्पिता अवस्थी होना आसान नहीं है।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

 पुष्पिता अवस्थी की कहानियों में सांस्कृतिक गरिमा

                                                                  - डॉ. सरोज सिंह

   प्रो. पुष्पिता अवस्थी का कथा साहित्य मनुष्यता की पहचान का साहित्य है। पुष्पिता जी विश्व के भारतवासियों और प्रवासी भारतीय साहित्य की प्रखर उद्घोषिका हैं। वह निरंतर विश्व के अमर इंडिया और भारत के आदिवासियों के जीवन की समानधर्मिता पर अध्ययनरत रही हैं। इनकी समकालीन कहानी कहीं पर संवेदना बचा रही है, तो कहीं उसे कुंद भी बना रही है। वैचारिकता के निकट आ रही है, भावनात्मकता के परे होकर पाठकों से दूर होती जा रही है। कहीं उलझे हुए यथार्थ को पकड़ रही है। प्रयोगशील होने के साथ भाषिक रूप समृद्ध हुई है। कहानी जब समय की रवानी से मिलती है, तो ज़िन्दगी बनकर खिलती हैै। पुष्पिता अवस्थी की कहानियों को पढ़ते हुए ऐसा ही महसूस होता है। ‘कंत्राकी बागान और अन्य कहानियां’ कहानी संग्रह लेखिका पुष्पिता अवस्थी द्वारा 1987 से लेकर 2017 तक लिखी गई कहानियों का संकलन है। जिसमें तीन दशकों का इतिहास है। इन कहानियों के भारत से यूरोप होते हुए कैरेबियाई देशों की सौंधी-सौंधी सुगंध, प्रकृति, नैसार्गिक सुषमा और संस्कृत अस्मिता दृष्टिगोरचार होती है। लेखिका स्वयं कहती है कि इन कहानियों में पृथ्वी के तीन महाद्वीपों की कथाएं, बल्कि मनुष्य के मनमानष के तीनों की चिंताएं भी वर्णित हैं।

 प्रो. पुष्पिता अवस्थी

कंट्रॉक्ट का अपभ्रंश रूप कंत्राकी है। कहानी संग्रह का इसी नाम से शीर्षक ही रोचकता और जिज्ञासा जगृत करता है। जो कथा तत्व की विशेषता है। विश्व के पूर्वी देशों में क्लोनाइजरों द्वारा एग्रीमेंट के तहत हिन्दुस्तानियों को सूरीनाम, ब्रिटिश गयाना, फ्रेंच गयाना, ट्रिनिडाड ट्बैको और अन्य कैरेबियाई देश-द्वीपों में ले जाया गया, उन्हें आधार बनाकर कहानी-संग्रह की विश्व वस्तु को पिरोया गया हैै। पुष्पिता जी के इस कहानी संग्रह में ‘गोखरू’ शीर्षक अंतर्गत नौ कहानियां, जन्म के अंतर्गत आठ कहानियां और कंत्राकी बगान के अंतर्गत सात कहानियां हैं। तीन शीर्षक ही नहीं, तीन दशकों का पूरा परिवेश और घटनाओं का संयाजन कहानी संग्रह का मर्म यह स्पष्ट करता है कि संपूर्ण विश्व संस्कृति की अस्मिता एक ही है। संस्कृतियों के विविधता के बावजूद मनुष्यता कायम है। उधन्नी कहानी मंें वे लिखती हैं-‘ बच्चे का भाग्य मां और उसकी कोख नहीं, जन्मभूमि-जन्मभूमि सुनिश्चित करती है।’ प्रेम का स्वरूप और प्रवाह भी सवत्र विद्यामान है। हर संस्कृति और देश मेे समस्त प्राणी इससे प्रभावित होते हैं। ‘प्रातः तब द्वार पर’ कहानी में यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। ‘इसीलिए तो प्रेम से जीना चाहिए और प्रेम को हासिल करना चाहिए। प्रेम का सुख अगर देखा जाए तो जीवन का ही सुख नहीं है, मृत्यु पर विजय की घोषणा भी है।’

 ‘कंत्राकी बगान और अन्य कहानियां’ कहानी संग्रह की अनेक कहानियां नारी हृदय की मनोभावनाओं का बडा ही सटीक और सजीव अंकन करती है। घरेलू महिला हो अधिकारी, पढ़ी-लिखी हो अनपढ़, विवाहित हो या अविवाहिता, नवयुवती हो प्रौढ़, सभी स्थितियों को रेखांकन इनकी कहानियों में सजहता से दृष्टिगोचर होता है। ‘गोखरू’ केवल पांव में तलवे की छोटी-छोटी गांठे ही नहीं होती, बल्कि आत्मा में व्यथा और पीड़ा से उग आए गोखरू भी होते हैं, जिनसे घाव रिसता रहता है। ‘गोखरू’ कहानी में विलायत में पढ़ने वाला बेटा स्वत: अपना विवाह भी तय कर लेता है। मां ने कितने जतन करके पढ़ने भेजा। पिता की रही-सही पूंजी उस पर लुटा दी, किन्तु बेटे को मां की बेबसी, पीड़ा और बेचारगी महसूस ही नहीं होती। कहानी का प्रमुख पात्र कादम्बरी सोचती है-‘मुहताज है तो सिर्फ़ मां, लेकिन उसकी तड़प भरी ज़रूरत बेटे तक पहुंचे तब न ? घर देश से क्या दूर हो जाते हैं। लड़के बच्चे मां की छाती से भी दूर जा छिटकते हैं। मां ेकी छाती का सुनापन वे क्या जाने, ठठाता सागर कहीं द्वीप का सन्नाटा समझ पाता है। कलेजे के टुकड़े-सी संतान के दूर निकल जाने पर खोखल हो जाती है मां की छाती।’


 पुष्पिता जी बहुत ही संवदेनशील कथाकार हैं। ‘ठंडे बस्ते में पिघलता लावा’ कहानी में सुधा और कावेरी के माध्यम से उन्होंने स्त्री मन की उत्पीड़न एवं सराक्त दोनों चेतना के माध्यम उसके अंर्तमन और सामजित निर्मिति को भी सहजता से व्यक्त किया है। इस कहानी में सुधा उच्च पदस्थ  सरकारी अधिकारी हैं, उसने कभी भी स़्त्री होने का लाभ नहीं लिया। किंतु उसकी मृत्यु के उपरांत उस पर तमाम लांछन लगाए जाते हैं। मौत का कारण भी ‘स्त्री होना’ घोषित होता है, तो उसकी मित्र कावेरी को बहुत दुख होता है। सुधा की बातें उसे व्यथित करती है। पारिवारिक जीवन की विफलता, सरकारी नौकरी की सफलता के बीच भी नारी की नियति उसे हमेशा परेशान किए रहती है। आधुनिक समय में मनुष्य झंझावतों से जूझता जा रहा है। उन सभी का अंकन कहानियों में दृष्टिगोचार होता है। ‘कजरोटा’ जैसे लुप्त प्रायः तत्व और शब्द को लेकर लिखी गई उनकी कहानियां बहुत जीवंत हैं। कहानियां विषय-वैविध्य की दृष्टि से ही नहीं मानवीय संवेदना से युक्त है, जो पाठक को कहानी पढ़ने हेतु आकृष्ट करती है। उसकी भाषा में सहजता के साथ ही भाव गांभीर्य भी विद्वमान है। स़्त्री ही स्त्री मन के उद्वेग, पीड़ा, रहस्य और संत्रास को समझ सकती है। इस संग्रह की अधिकांश कहानियां स्त्री जीवन पर ही आधारित हैं। वे लिखती हैं-‘हर पुरूष स्त्री को अपने सांचे में ढालने का प्रयास करता है, जैसे वह सिर्फ़ मीडियम है, आदमी ही उसका सांचा है। इसमें उसे ढलना ही होगा, इसके बगैर ज़िन्दगी नहीं या वह जिन्दा नहीं रह सकती है या उसे जिन्दा नहीं रहने दिया जाता। पिता के घर में पिता का सांचा, पति के घर में उसका सांचा। क्या बिना बंधन के, रिश्तों के नाम के, पुरूष, अपने पुरूष प्रधान समाज के छल-प्रपंच के विरूद्ध उसका सहारा.... वास्विक अवलंब नहीं बन सकता।....मानवीय संबंधों के आधार पर।’

एजेक्स फुटबाल टीम कोच फ्रैंक डी बोयर के साथ पुष्पिता अवस्थी।

 पुष्पिता अवस्थी की कहानियों में पानी सी सरलता की साथ अपने की खुश्बू भी विद्यमान है। उन्होंने उपनिवेश की बस्तियों तथा गिरिमिटिया लोगों के दर्द को समझा, उन पर शोध करते हुए इस कहानी संग्रह ‘कंत्राकी बागान और अन्य कहानियां’ की विषय-वस्तु और परिवेश का चयन कर बड़ी आत्मीयता से लिखा। ‘मुट्ठी भर सुख’, अधर्म, अधर्म, भ्रम’ ‘जन्म’ जैसी कहानियां बहुत उत्कृष्ट करती हैं। मुट्ठीभर सुख कहानी में सूरीनाम में हिन्दू भारतवंशी सनातनी और आर्य समाजियों की स्थिति को व्यक्त किया गया है। उसने सनातन धर्म के विष्णु मंदिर में स्थित कार्यालय में देखा कि आर्य दिवाकर कार्यालय और मंदिर भी इसी सीध में अगली सड़क पर है और वह भी दिखाई देता है। दोनों भवनों का शीर्ष ंिसंदूरी रंग से रंजित है। भक्त दोनों भवनों के भीतर ईश्वर में विश्वास और आस्था से जाते हैं। प्रार्थना करते हैं....ध्यान लगाते हैं। फिर वह आर्य समाजी और सनातनी में क्यों बंटे हुए हैं। भारत में रहते हुए काव्यकुंज ब्राह्मण परिवार में पैदा होते हुए उसने कभी नहीं जाना कि वह सनातनी है या आर्य समाजी। लेकिन सूरीनाम जाकर उसे यह सब जानना पड़ा था। ‘इनिका’ कहानी में बेटी इनिका मां की स्मृतियों के जरिए अपना मार्ग तलाशती हैै तथा अपने अकेलेपन भतीं पूर्ति है। उसकी मां की स्मृतियां सदैव उसे आगाह करती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन आक्रमणकारियों के कारण बचने बचाने के क्रम में उसकी नानी किस तरह से अपने पति परिवार और भाई-बहन से अलग हो गई थी। इनिका ने अपनी मां से लोरी और परिकथाओं की जगह-अपने परिवार के भीषण संधर्ष की गाथाएं भी सुनी थी। युद्ध के दौरान कहीं से पहनने को पकड़ा मिल जाए, वहीं धन था, वही संम्पत्ति। रुपये-सिक्के देखने की कभी नौबत ही नहीं आयी। हथेलियों ने कभी रुपये के कागज की कड़क और सिक्कों की नमी ही नहीं जानी और न आंखों की चमक। सौभाग्य से मां को यह सब नसीब तो हुआ, लेकिन 1953 में उफनते समुंद्री तूफान की चपेट में दक्षिण हालैंड के साथ-साथ सी-लैंड प्रोविन्स भी समुंद्र में बह गया। समुंद्र से दो मीटर नीचे की नींदरलैंड की धरती पर कई मीटर उपर समुंद्री जल लहलहाने लगा तो इनिका अपने परिवार के साथ बेघर हो गई थी। उसने मां, पिता और भाइयों की मदद से गृहस्थी जमाई। भेड़ों और मुर्गियों का छोटा-मोटा व्यवसाय शुरू किया। परिवार का पोषण किया। इनिका के संवदेनशील मन के भीतर उसकी अपनी मां और नानी के दुख-दर्द का इतिहास है। जो विश्व इतिहास और वैश्विक युद्धों के समकालीन है।

1976 में आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की तरफ से रनर शील्ड विजेता पुष्पिता अवस्थी।

 इसी तरह ‘अधर्म’ कहानी भी पूरी दुनिया में व्याप्त धार्मिक मद्ध्यन्ता को दर्शाती है। सत्ता और हुकूमत के कारण यह व्याप्त होता जा रहा है। भारत के हिन्दूवादी सत्ताधारी लोग यह नहीं समझ पा रहे कि उनकी अपनी तथाकथिक धारणाओं के कारण पूरे विश्व में हिन्दू के अस्तित्व और धर्म की अस्मिता संकट में है। नीदरलैंड और सूरीनाम की स्थिति-परिस्थिति को दर्शाने वाली कहानियों वैश्विक परिदृश्यों को व्यक्त करने वाली है। 18वीं, 19वीं सदी के आसपास हालैंड अंग्रेज़ों के हुकूमततले मानव श्रमिक के दलालों ने एशियन देशों से मजदूरी के लिए मानव श्रमिकों का व्यसाय किया। अकरकाठियों ने नौकरी, मजदूरी के लोभ ने उन्हें फंसाकर उन सबकी मातृभूमि और जीवन को छीना। जलरस्युओं की तरह समुंद्री द्वीपों और देशों में जनशक्ति छिनौती करते रहे। महंगाई और उपभोग की चाहतों ने इंसान को पागल कर दिया है। ‘रिया’ शीर्षक कहानी में पुष्पिता जी ने सूरीनाम के सामाजिक परिवेश को गंभीरता से व्यक्त किया है। विक्टोरिया प्लांटेश कंत्राकी बगान शीर्षक कहानी प्लांटेशनकी यादों का एक क्रबगाह भर है-जंगल का महाश्माशान। विडंबना तो यह है कि हमारे हिन्दुस्तानी पुरखों ने कठोर और निर्दयी मजूदरी की उनकी दूरदर्शा का बयान है। भारतीय हेाने का गौरव एवं अपने देशवासियों के प्रति होने वाले कष्टों का आख्यान भी इन कहानियों में मिलता है।

पुष्पिता जी की कहानियों में एक साथ रिपोर्ताज, संस्मरण और रेखाचित्र जैसी विधाएं भी अपनी झलक दिखलाती है। इतने लंबे समय और विशाल कलेवर को समेटे इनका कहानी संग्रह विषय वैविध्य, भाषा वैविध्य, परिस्थिति वैविध्य, घटना विविध्य को अपन कथावस्तु में समाहित किए हुए है। रोचकता, प्रवाहमयता और गतिशीलता कथा को पठनीय बनाते हैं। भारतीय परिवेश के साथ विश्व के प्रमुख देशों के पर्यावरीय परिदृश्य के साथ संस्कृति गौरव और आसमता इस कहानी संग्रह बीच तत्व है। 


(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित )