पुष्पिता अवस्थी होना आसान नहीं
- डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
पुष्पिता अवस्थी हमारे दौर की ऐसी शख़्सियत हैं, जिनका पूरा-पूरा आंकलन एक लेख में करना असंभव है। इन्होंने सिर्फ़ एक ही विधा में काम नहीं किया। कविता, उपन्यास, कहानी समेत कई विधाओं में काम किया है। काम भी कोई ऐसा-वैसा नहीं। प्रत्येक विधा पर समुंदर में उतरकर उसकी पूरी गहराई ठीक-ठीक नाप लेने जैसा कार्य किया है। आम तौर पर कोई लेखक एक ही विधा में अधिक गहराई तक उतरकर काम कर पाता है, लेकिन उन्होंने प्रत्येक विधा में उल्लेखनीय कार्य किया है। इनके कार्य को देखकर अत्यधिक आश्चर्य और हैरानी होती है। ऐसे लोग पूरे लेखक समाज के लिए सही मायने में प्रेरणास्रोत होते हैं।
अगर इनकी कविताओं की बात करें तो इनमें अनेक देशों, द्वीपों, पहाड़ों, नदियों, महासागरों, आदिवासी जातियों की स्मृति जिनमें कैरेबियाई द्वीप, आस्ट्रिया का नाउदर गांव, रोम के भव्य भवन, आल्प्स की कोमल झील, सेंटलूशिया, अटलांटिक और हिंद महासागर के साथ और जाने क्या-क्या समाहित है। इतनी सारी चीज़ों को देखना-परखना और फिर उन अपनी अभिव्यक्ति ज़ाहिर करना वाक़ई हैरतअंगेज़ है। इसी तरह इनके उपन्यास के विषय-वस्तु और उनका उल्लेख हैरान कर देता है। जब पुष्पिता अवस्थी पर लिखने बैठिए तो समझ में ही नहीं आता कि आखिर किस विषय और बिंदु उठाया जाए।
उनके व्यक्तित्व की बात करें तो वे कवयित्री हैं, कवि हैं, अनुवादक, कहानीकार, कुशल संगठनकर्ता और हिंदी की विश्वदूत तो हैं ही। इसके साथ ग़ज़ब की फुटबाल प्रेमी भी हैं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ। पढ़ाई राजघाट, वाराणसी के प्रतिष्टित जे.कृष्णमूर्ति फाउंडेशन (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संबद्ध) में हुई। वर्ष 1984 से 2001 तक जे. कृष्णमूर्ति फाउंडेशन के वसंत कॉलेज फ़ॉर विमैन के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष भी रहीं। भारतीय दूतावास एवं भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र, पारामारियो, सूरीनाम में प्रथम सचिव एवं हिंदी प्रोफ़ेसर के रूप में सन् 2001 से 2005 तक कार्य किया। सन् 2003 में इन्होंने सूरीनाम में सातवां विश्व हिंदी सम्मेलन कराया। इस आयोजन की आजतक मिसाल दी जाती है।
सन् 2006 से नीदरलैंड स्थित ‘हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन’ की निदेशक हैं। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ और स्त्री अधिकारों के लिए भी लगातार लड़ती रही हैं, जूझती रही हैं, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। अपने सूरीनाम प्रवास के दौरान इन्होंनेएक हिंदी प्रेमी समुदाय संगठित किया, जिसकी परिणति उनके द्वारा अनूदित और संपादित समकालीन सूरीनामी लेखन के दो संग्रहों ‘कविता सूरीनाम’और ‘कहानी सूरीनाम’ का प्रकाशन हुआ। वर्ष 2003 में ही राजकमल प्रकाशन से मोनोग्राफ़ ‘सूरीनाम’ भी प्रकाशित हुआ। इनके कविता संग्रहों ‘शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएं’, ‘अक्षत’, ‘ईश्वराशीष’ और ‘हृदय की हथेली’ और कहानी संग्रह ‘गोखरू’ समेत लगभग सभी पुस्तकों को पाठकों ने हाथों-हाथ लिया है।
लीलाधर मंडलोई कहते हैं-‘‘पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निवार्सित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं। जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़, बिहार झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों यथा-सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। डॉ. अवस्थी पर इन्हीं पर दशकों तक काम किया है। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इनमें प्रवासी भारतीय के इलाकों की भी छवियां हैं। भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है।’’
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| जावेद अख़्तर के साथ पुष्पिता अवस्थी |
पुष्पिता अवस्थी लगभग दो दशकों से विदेश में हिंदी साहित्य, भाषा, संस्कृति के प्रचार -प्रसार में संलग्न हैं। कविता, कहानी, निबंध, आलोचना, मोनोग्राफ व हिंदी शिक्षण, जीवनी इत्यादि की हिंदी, डच, अंग्रेजी व बांग्ला आदि भाषाओं की लगभग 90 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। विदेश में उनके प्रकाशित साहित्य एवं कृतित्व से हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए किए गए बहुविध कार्य उन्हें ‘हिंदी की विश्वदूत’ के रूप में एक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।
डॉ. अवस्थी सिर्फ़ साहित्य तक ही सीमित नहीं हैं। फुटबाल के प्रति भी इनकी दीवानगी चरम पर रही है। नीदरलैंड के आयक्स फुटबॉल क्लब (18 मार्च 1900 से स्थापित) के बिजनेस क्लब की वरिष्ठ सदस्य हैं और इतनी व्यस्तताओं के बावजूद दस वर्षों से राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साप्ताहिक फुटबॉल मैच नियमित रूप से देखती आ रही हैं। खुद उनका कहना है कि ‘‘मुझे यह खेल इसलिए पसंद है क्योंकि इस खेल में दोनों टीम का हर खिलाड़ी अंतिम क्षण तक हार नहीं मानता है और आखिरी सांस तक गोल करने के लिए प्राण-प्रण से लगा रहता है। गिरता है, पड़ता है, धक्के खाता है, चोटिल होता है फिर भी रुकता नहीं है, उसकी आंखें फुटबाल और गोल पर ही लगी रहती हैं।“
कुल मिलाकर पुष्पिता अवस्थी का होना हमारे देश और समाज के लिए बहुत ही ख़ास है। इन्होंने अपने पूरे जीवन के एक-एक क्षण का सदुपयोग किया है। ऐसी शख़्सियत हमेशा ही सबके लिए प्रेरणादयक होती है। बिना किसी संकोच के हम कह सकते हैं कि पुष्पिता अवस्थी होना आसान नहीं है।
(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित)



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