गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

श्रोता के तौर पर आसिफ़ उस्मानी की है ख़ास पहचान

                                                             

 आसिफ़ उस्मानी

                                                           -इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

  मुशायरों का जिक्र होता है तो सबसे पहले यही बात होती है कि कौन-कौन शायर आए हैं या आ रहे हैं, या फिर किन शायरों ने अच्छे कलाम पेश किए, वगैरह..वगैरह। मगर, इन सबके साथ-साथ प्रयागराज में जब भी कहीं कोई मुशायरा होता है तो श्रोता के तौर पर एक नाम सबसे पहले याद किया जाता है। इनकी मौजूदगी में मुशायरा काफी दिलचस्प हो जाता है, क्योंकि शायरों के कलाम पेश करते ही ये साहब कोई न कोई दिलचस्प कमेंट कर देते हैं, जो सुनने वालों को भी काफी पसंद आता है। वह शख़्स हैं आसिफ़ उस्मानी। इनकी ख़ासियत यह है कि प्रयागराज में होने वाले लगभग हर मुशायरे में श्रोता के रूप में मौजूद रहते हैं और शुरू से आख़ीर तक मुशायरे का लुत्फ़ अपने ख़ास अंदाज़ में लेते हैं। आसिफ उस्मानी को इतना अधिक शौक़ है कि ये दूसरे शहरों में भी मुशायरा सुनने के लिए पहुंच जाते हैं। एक बार ये अलीगढ़ के मुशायरा में पहुंच गए थे, डाॅ. राहत इंदौरी की शायरी पर कमेंट करते ही राहत साहब ने इनको पहचान लिया और फिर बोले-‘आसिफ़ साहब जरा खड़े हो जाइए।’ उनके खड़े होने पर राहत इंदौरी से पूरे मजमे से तआरुफ़ कराते हुए इनके बारे में बताया, कहा कि जैसे मैं आल इंडिया मुशायरों का शायर हूं, उसी तरह आसिफ़ उस्मानी आल इंडिया मुशायरों के ‘हूटर’ हैं। मुनव्वर राना ने तो आसिफ उस्मानी पर एक ख़ास मज़मून ही लिख दिया है।

 आसिफ़ उस्मानी का जन्म 03 सितंबर 1955 को इलाहाबाद में हुआ। इनके पिता स्वर्गीय हाजी मोहम्मद उस्मानी गर्वमेंट इंटरमीडिएट काॅलेज में प्रधानाचार्य रहे हैं, मां स्वर्गीय कुलसुम बीवी कुशल गृहणिी थीं। आप दो भाई और चार बहने हैं। आपने कक्षा छह से नौ तक की पढ़ाई जीआईसी में की थी। कक्षा 10 से इंटरमीडिएट की पढ़ाई मजीदिया इस्लामिया इंटर काॅलेज से करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक किया, यहीं से लाॅ की पढ़ाई पूरी की। 1982 में रेलवे विभाग में आप अलीगढ़ में असिस्टेंट स्टेशन मास्टर हो गए। 1986 में इलाहाबाद डीआरएम आफिस में आ गए, यहीं से आप बतौर चीफ आफिस सुप्रीटेंडेंट सेवानिवृत्त हुए।

 आसिफ उस्मानी के पिता हाजी मोहम्मद उस्मानी उस्ताद शायर थे। जिसकी वजह से इनके घर जिगर मुरादाबादी, बलवंत सिंह, उपेंद्र नाथ अश्क, काजी अब्दुल सत्तार जैसे लोगों का आना-जाना रहा है। बचपन से ही इन लोगों की खिदमतगारी का मौका आसिफ उस्मानी को मिलता रहा है, जिसकी वजह से शायरी की समझ इनके अंदर भर गई थी। मुशायरा सुनने के शौक़ के बारे में इनका कहना है कि-‘शायर हमेशा अपनी शायरी में मौजूदा दौर की बात बड़े सलीक़े से करता है, जिन चीज़ों पर आम लोगों की नज़र नहीं होती उसका जिक्र अक्सर शायरी में मिल जाती है, इसलिए मुशायरा सुनना और समझना अच्छा लगता है।’ उनका कहना है कि शायरों के कलाम पर फौरन ही जवाब देने की वजह से लोगों और शायरों के बीच उनकी पहचान बन गई है। 

 कई बार तो मुशायरों में पहुंचने पर शायर यह पता लगाते हैं कि आज आसिफ़ उस्मानी आए हैं या नहीं। उनको इस बात की फिक्र रहती है कि कुछ गड़बड़ पढ़ने पर आसिफ़ ख़ामोश नहीं बैठेगा। आसिफ़ उस्मानी को तमाम शायरों के कई हजार अशआर याद है। किसी भी शायर का नाम लेते ही फौरन उसका कोई न कोई शेर पढ़कर सुना देत हैं। ‘खुद शायरी क्यों नहीं करते ?’ इस सवाल पर उनका कहना है कि मैं थोड़ी बहुत शायरी कर लेता हूं लेकिन स्टैंडर्ड शायरी नहीं कर पाता इसलिए अपने अंदर के शायर को बाहर लाने की कोशिश ही नहीं की, मुझे दूसरों को सुनने ही अच्छा लगता है। उनका कहना है कि उर्दू की तरक्की के लिए जावेद अख़्तर ने काफी काम किया है, पूरी दुनिया में अपनी शायरी के जरिए उर्दू की तर्जुमानी कर रहे हैं।

 (गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2020 अंक में प्रकाशित )


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