मंगलवार, 20 जून 2017

नई पीढ़ी हड़बड़ी में दिख रही है: प्रो. राजेंद्र कुमार

बाएं से- प्रभाशंकर शर्मा, प्रो. राजेंद्र कुमार और नरेश कुमार महरानी

ग़ज़ल की गहराई एवं आलोचना के मर्म को समझने वाले प्रो. राजेंद्र कुमार की आधुनिक हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान है। अत्यंत सरल स्वभाव वाले प्रो. राजेंद्र कुमार जी की कविताएं देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होती रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त प्रो. राजेंद्र कुमार इन दिनों जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। बचपन में राजेंद्र कुमार के मन में अपने बाबा की संगत में बचपन से ही संस्कार के रास्ते साहित्य कब प्रवेश कर गया, पता ही नहीं चला। शुरूआती छात्र जीवन में विज्ञान विषय का विद्यार्थी होने के बावजूद आपकी साहित्य में रुचि रही। आपकी प्रमुख पुस्तकों में ‘ऋण गुणा ऋण’, ‘हर कोशिश है एक बगावत’,‘लोहा लक्कड़’, ‘शब्द घड़ी में समय’, ‘प्रतिबद्धता के बावजूद’ आदि हैं। प्रभाशंकर शर्मा, नरेश कुमार महरानी और लोकेश श्रीवास्तव ने आपसे मुलाकात कर विस्तृत बातचीत की, प्रस्तुत है उसका संपादित भाग।
सवाल: पाठकों की तरफ से सबसे पहले हम आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और शुरूआती जीवन के बारे में जानना चाहेंगे ?
जवाब: मेरे परिवार में चाचा, ताउ, किसी ने सरकारी नौकरी नहीं की। जमींदारी खत्म हुई तो रस्सी जल गई ऐंठन नहीं गई, लगातार आर्थिक स्थिति गिरती गई। दो साल की उम्र में ही मां का देहांत हो गया। बाबू जी मेरे लिए माता-पिता दोनो थे। वे मुझे बहुत प्यार करते थे, लेकिन ज्यों-ज्यों हम बड़े होते गए हमारे बाप-बेटे में तल्खी आती गई, क्योंकि उनको लगता था कि हम कैसे-कैसे लोगों के साथ उठते-बैठते हैं। कारण यह था कि हम कम्युनिष्ट पार्टी के मेम्बर थे। हालांकि हम पढ़ने में तेज़ थे। मेरा जन्म कानपुर में हुआ था, कानपुर उन दिनों मिलों-मजदूरों का शहर था, और हम सुल्तान नियाजी और काॅमरेड रामआसरे आदि की संगत में रहते थे, मिलों के गेट पर धरना-प्रदर्शन आदि में हिस्सा में लेते थे। यह सब पिताजी को खराब लगता था। यह 1957 की बात है जब मैं हाईस्कूल में था। मैं शुरू में विज्ञान का विद्यार्थी था, बीएससी और एमएससी किया। पढ़ाई के विषय में तो घर वालों को हमसे कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन मेरा घूमना-फिरना नागवार लगता था।
सवाल: विज्ञान के विद्यार्थी होकर भी आप साहित्य में कैसे आ गए?
जवाब: मेरा अपने बाबा से तालमेल बैठता था। मैं अपने बाबा का हुक्का भरता था और उनके ज्यादा करीब था। उस ज़माने में लोग उर्दू और फारसी जानते थे। अक्सर वे मुझे फिरदौसी, ग़ालिब आदि के शेर सुनाया करते थे। मेरी दादी रामचरितमानस पढ़ती थीं और उनका निधन हो गया था। एक दिन मेरे बाबा ने कहा दादी की आलमारी खोलो और उसमें पीले कपड़े में लिपटी किताब निकालकर मुझे उसका एक पेज रोज़ सुनाया करो। और बाबा को रामचरित मानस सुनाते-सुनाते संस्कार में साहित्य आ गया। जब हम हाईस्कूूल में पढ़ते थे तो मेरे हिन्दी के जो अध्यापक थे उनका हुलिया पं. नेहरु से मिलता था। उनका श्रीमान शुक्ला था। वे हमें बहुत प्रोत्साहित करते थे, हम कविता पाठ और डिवेट में हिस्सा लेते थे। और हिन्दी साहित्य से जुड़ते चले गए।
सवाल: परंतु विज्ञान का छात्र होते हुए आप हिन्दी के प्रोफेसर कैसे हो गए ?
जवाब: घर में असंतोष का माहौल था, पिताजी से तालमेल नहीं था। आर्थिक समस्याओं के चलते ट्यूशन पढ़ाता था। कई बार घर से भागा। गंगानगर व दिल्ली भी गया, पर घर की याद आई तो वापस आ गया। कानपुर में जेएनके इंटरमीडिएट कालेज में विज्ञान का अध्यापक हो गया था। कानपुर में सीपीआई का सदस्य होने के कारण और मजदूर आंदोलनों में हिस्सा लेने (1958 से 1965 के बीच) के कारण पुलिस हमें परेशान करती थी। चिट्ठी-पत्री के माध्यम से हम अमृत राय और श्रीपत राय (मुंशी प्रेमचंद्र के पुत्र) के संपर्क में आ गया। अमृत राय जी ‘हंस’ पत्रिका के संपादक थे और उन्होंने हमें इलाहाबाद बुला लिया। मेरा उनका रिश्ता लेखक और संपादक का था। अमृत राय जी के यहां एहतेशाम हुसैन साहब का आना-जाना था। हुसैन साहब ने एक दिन मुझसे कहा सिर्फ़ अदब से घर नहीं चलता, कुछ बेअदबी भी करो (उनका इशारा कुछ कामधाम यानि धनोपार्जन से था)। इसके बाद उन्होंने मुझे तीन  फार्म लाकर दिए। हिन्दी,  उर्दू और अंग्रेजी, और कहा कि जिसमें तुम्हारा एडमीशन हो उस विषय में एमए कर लो, और हिन्दी में मेरा एडमीशन हो गया। 1970 में मेरा एमए पूरा हुआ और 1971 में मैं सीएमपी डिग्री कालेज में लेक्चरर हो गया। कई पत्रिकाओं में लिखना-पढ़ना चलता रहा। दिल्ली और कोलकाता की पत्रिकाओं में लेखन चलता रहा और साहित्य का सिलसिला चल पड़ा। 1979 में मैं इलाहाबाद विश्वविद्याल में आ गया और यहीं से विभागाध्यक्ष हिन्दी पद से 2003 में सेवानिवृत्त हुआ। 
सवाल: आप आधुनिक हिन्दी में आलोचक के रूप में जाने जाते हैं?
जवाब: आलोचना से नहीं मैं कविता से जुड़ा था और जब अध्यापक हो गया तो पढ़ाना और व्याख्या करना होता था, और लोग लिखाने लगे। मांग और पूर्ति के इस क्रम में हम आलोचक हो गए। मेरी पहली कविता की किताब 1978 में ‘ऋण गुणा ऋण’ छपी थी। इस पर मुझे हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कार मिला, तब तक आलोचना पर मेरी कोई किताब नहीं छपी थी। मेरी प्रचार-प्रसार में कोई रुचि नहीं थी।
सवाल: आलोचना की आपकी दृष्टि में वास्तविक परिभाषा क्या है ?
जवाब: आलोचना में विवेक की स्वतंत्रता पहली चीज़ है। आलोचना साहित्य का विज्ञान है। पानी चाहे कुएं का हो या बिसलेरी का, सबका सू़त्र एचटूओ है। लेकिन साहित्य में लोगों की राय में विभिन्नता होती है। जितने आब्जेक्टिबली हम साइंस में होते हैं, उतने हम साहित्य में नहीं हो सकते। साहित्य में संवेदनशीलता भी ज़रूरी है। विवेक और संवदेना का संतुलन ही आलोचना है।
सवाल:  क्या आलोचक ग्रुपों में बंटे हुए हैं ?
जवाब: पहले प्रलेस नाम का एक संघ था, बाद में इसकी शाखाएं जलेस और जसम भी बनीं और मतभेत होता गया। लोग अपने-अपने ग्रुपों को प्रोत्साहित करने लगे। अगर वास्तविक लेखक है तो उसके लिए संगठन गौड है, मूलरूप से हम लेखक हैं। ईमानदार लेखन को किसी सांचे में या खूंटे में नहीं बांधा जा सकता। 
सवाल: हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल में किस प्रकार से भिन्नता है ? सिर्फ़ छंद के स्तर पर फ़र्क़ है या विषय वस्तु के आधार पर भी अंतर है ?
जवाब: ग़ज़ल शब्द का अर्थ है माशूका से बातचीत। हिन्दी कविता रूमानियत को खराब मानती है, जबकि ग़ज़ल में आज भी रूमानियत है। ग़ज़ल मूलतः प्रेम विषयक थी। जब सामाजिक सतह पर समस्याएं आईं और प्रगतिशील लेखक संघ बना। सज्जाद जहीर अच्छे संगठनकर्ता थे। इससे ग़ज़ल का मिज़ाज शोषित और वंचित के पक्ष में आ गई। नए बिंब और प्रतीक लाए गए। उर्दू लेखकों ने शाक़ी, शराब और बुलबुल छोड़कर देशी प्रतीकों का चयन किया। लेकिन उर्दू ग़ज़ल छंद शास्त्र की बहुत पाबंद है, इसमें बह्र, रदीफ़, क़ाफ़िया बिल्कुल दुरुस्त होना चाहिए। उर्दू में एक परंपरा रही इस्लाह की, जिसे उस्ताद दुरुस्त करते थे। हिन्दी ग़ज़ल बहुत सी शर्तें नहीं निभा पाई, जो उर्दू ग़ज़ल निभाती है। चाहे हमारे यहां दुष्यंत कुमार ही क्यों न हों उनकी ग़ज़ल में भी कहीं-कहीं संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्द आ गए हैं। ग़ज़ल में आम शब्द होने चाहिए।
सवाल: साहित्य के पाठक कम होते जा रहे हैं ? क्या इसकी वजह इलेक्टानिक मीडिया है या कुछ और ?
जवाब: ये व्यवस्था की गड़बड़ियां हैं, जब जीविका का संकट होगा तो साहित्य कैसे आगे बढ़ेगा ? पंूजवादी समाज का फार्मूला होता है कि कम मेहनत में कम समय में हम ज़्यादा हासिल कर लें, पर साहित्य में यह संभव नहीं। पिछले दिनों नोटबंदी के कारण इलाहाबाद में पुस्तक मेला टल गया। जब धन का आदर बढ़ा तो साहित्य का आदर कम होता गया।
सवाल: युवा पीढ़ी या हमारे नए साहित्यकारों के नाम आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?
जवाब: आज की पीढ़ी संघर्ष के ज़्यादा उपलब्धि पर जोर दे रही है। इनमें संघर्ष का धैर्य नहीं है। छोटी-छोटी उपलब्धियों से ही संतुष्ट हो जाते हैं। नई पीढ़ी अनुभव से ज़्यादा इंटरनेट के भरोसे चलना चाहती है। उदाहरण के तौर पर कोई युवा साहित्यकार नेट पर देखकर किसान जीवन की कहानी बना लेता है, जबकि उसे किसान जीवन का कोई अनुभव नहीं रहता है। नई पीढ़ी हड़बड़ी में दिख रही है। किसी कहानी, कविता को फेसबुक पर 200-300 लाईक मिल गई तो उसी में खुश हो जाते हैं, जबकि रचनात्मकता को धार संघर्ष से मिलती है और संघर्ष से ही आत्मविश्वास आता है।
बाएं से -लोकेश श्रीवास्तव, प्रभाशंकर शर्मा, प्रो. राजेंद्र कुमार और नरेश कुमार महरानी

(गुफ्तगू के जनवरी-मार्च 2017 अंक में प्रकाशित)

1 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (22-06-2017) को
"योग से जुड़ रही है दुनिया" (चर्चा अंक-2648)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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