शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

अपनी बातों को बता देने के खुले बहाव में रमेश नाचीज़


रमेश नाचीज़ का ग़ज़ल-संग्रह अनुभव के हवाले से हाथों में है. पन्ने खुले हैं. प्रस्तुतियों के शब्दों का स्वर ऊँचा है. मेरे पाठक से संवाद बनाने को आतुर ! और, मेरे पाठक को सुनने सुनने की ऑप्शन है ही नहीं. उसे इन्हें सुनना ही है. बिना सुने रह नहीं सकता. पाठकीय स्वभाव नहीं मानवीय संवेदना का आग्रह है कि इन्हें सुना जाय. स्वभाव और आचरण से ये शब्द आग्रही हैं. सुनना वैधानिक या नैतिक नहीं बल्कि मानवीय अपराध होगा. इन शब्दों की आवाज़ में साहित्यिक या वैचारिक क्लिष्टता नहीं है, निवेदन है, बल्कि अपनी पृष्ठभूमि की गर्भिणी गंगा के कीचड़-कादो से सने ये शब्द असहज उच्चार करते हुए सीधे-सीधे मुँह पर चीख रहे हैं. इनके कहे में व्यक्तिवाची भाव कत्तई नहीं है. तभी तो इनमें ग़ज़लकार की अहमन्यता भी नहीं देखते हम ! शताब्दियों की पृष्ठभूमि से इनको मिला कीचड़-लेप इन्हें अनगढ़ ही सही किन्तु आवश्यक रूप से मुखर तो बना ही रहा है, खूब साहसी भी बना रहा है. इस ग़ज़ल-संग्रह के शब्द संवाद-संस्कार का वायव्य भाव नहीं बनाते, बल्कि अपनी बातों को बता देने के खुले बहाव में दीखते हैं. यही कारण है कि संग्रह की ग़ज़लों के शब्द मायनों का विशेष रूप अख़्तियार कर पा रहे हैं.
किन्तु यह भी जानना आवश्यक है कि अभिव्यक्ति के उत्साह में कितनी स्पष्टता है और कितना दायित्वबोध है ? इनपर अवश्य ही मीमांसा होनी चाहिये. क्योंकि साहित्य आम-जन के पक्ष को रखता हुआ भी संप्रेषण-संस्कार से ही सधता है. यहीं साहित्यकर्म आकर्षक या आवश्यक ही सही किसी नारा या चीख से अलग दीखता है. यहीं रचनाकर्म का परिणाम साहित्य की कसौटियों पर खुद ही जीने-पकने लगता है. अक्सर देखा गया है कि पक्ष प्रस्तुतीकरण का प्रारूप यदि चीख है, तो वह चीख के आर्त को साझा तो अवश्य करता है, परन्तु कई बार सटीक या विन्दुवत होने से रह जाता है. और, हक़ की बातें हाशिये पर चली जाती हैं. साहित्यकर्म नारों या चीखों को स्वर भले दे, स्वयं नारा या चीख होने लगे तो नुकसान उस पूरे समाज को होता है, जिसके तथाकथित हित के लिए चीख-चीत्कार हुआ करती है.
जो अतुकान्त परिस्थितियाँ और सामाजिक विसंगतियाँ नाचीज़ भाई के संग्रह की मूल विन्दु बनी हैं, वे अब किन्हीं विशेष संज्ञाओं के स्वरों की मुखापेक्षी नहीं रह गयी हैं. मेरा पाठक भाई रमेश नाचीज़ के ग़ज़ल-संग्रह को इन्हीं संदर्भों की टेक पर आगे समझना चाहता है.
लेकिन उससे पहले यह अवश्य समझ लिया जाय कि अनुभव आखिर है क्या, जिसकी तथाकथित कसौटी पर कसे तथ्यों का हवाला दिया जा सके ? और, अनुभव का दायरा यथार्थबोध से कितना संतुष्ट होता है ? किसी संप्रेषण में जाती अनुभव का विस्तार और उसकी गहराई कैसे समझी जाय ? क्या कागद लेखी’ किसी ’कानों सुनी’ या किसी आँखिन देखी’ के समक्ष टिक पाती है ? अव्वल, क्या किसी दमित समाज की दारुण स्थितियाँ या पीड़ित व्यक्तियों की दशा-अभिव्यक्तियाँ सापेक्षता की आग्रही हैं ? यदि हाँ, तो कविधर्म और उसका रचनाकर्म फिर क्या है ? साहित्य में संवेदनाओं के कैटेगराइजेशन और उसके क्लासिफ़िकेशन को कितनी मान्यता मिलनी चाहिये ? क्योंकि, मेरी स्पष्ट मान्यता है कि साहित्यकर्म कोई व्यक्तिगत विलासिता या गुण-प्रदर्शन का ज़रिया होकर एक दायित्वबोध है, जो व्यक्तिगत दुःखों और उसके संप्रेषण को सार्वभौमिक बनाता है. इस हिसाब से साहित्यकर्म उस श्राप का पर्याय है जिससे ग्रसित कोई रचनाकार अपने जाती दुःखों के साथ-साथ यदि संपूर्ण समाज नहीं, तो कम-से-कम एक विशिष्ट तबके के दुःखों और पीड़ाओं को ही जीने को विवश होता है. तभी तो किसी रचनाकार की अभिव्यक्ति समस्त तबके की अभिव्यक्ति हो पाती है.
समाज के मठों के असंगत निरुपणों और रूढियों का प्रतिकार ही नहीं, खुल्लमखुल्ला नकार भी आवश्यक है. तभी कोई साहसी दम सार्थक रूप से अपेक्षित दायित्व का निर्वहन कर सकता है. साहित्य अगर आम-आदमी ही नहीं शताब्दियो से पीड़ित जन की बात करता है तो उसे जन को क्लासिफ़ाई करने के दोष से बचना ही होगा. लेकिन, रचनाकार यदि स्वयं विसंगतियों और तदनुरूप दुर्दशाओं का भोगी हुआ तो शब्दों की तासीर कई गुना बढ़ जाती है. तभी कोई रचनाकार द्वारा ऐसा ऐलान हो सकता है -
पापी, गँवार, शूद्र बताये गये हैं हम
लाखों बरस से यों ही सताये गये हैं हम ॥
या,
दलितों की सहके पीड़ा लिक्खो तो हम भी मानें
जो दर्द है तुम्हारा, वो दर्द है हमारा
उपरोक्त पंक्तियों के तथ्य सीधा वही कहते हुए दीखते हैं जो कहना चाहते हैं, बग़ैर अनावश्यक इंगितों के.
यहाँ ग़ज़लकार अपने समाज, अपने वज़ूद को लेकर संवेदनशील ही नहीं, अपेक्षित रूप से मुखर भी है, तो कई मायनों में दुःखी भी है -
हरिजन, गँवार, शूद्र, दलित, नीच और अछूत,
इका आदमी की ज़ात को क्या-क्या कहा गया
हरगिज़ आने देंगे हम रामराज वर्ना,
जायेगा मारा लोगो ! शम्बूक् अफिर हमारा
सामाजिक रूप से बना दी गयी जातिगत और वर्णगत सीमाओं का प्रतिकार करते हुए किसी क्षुब्ध मन से जागरुक तारतम्यता की अपेक्षा करना कत्तई उचित नहीं. लेकिन ग़ज़लकार बहुत हद तक संयम बनाए रखता है -
रूढिवादी मान्यताएँ टूट जायेंगी ज़रूर,
जोश में ग़र होश भी हाँ सम्मिलित हो जायेगा
फिर,
हम एकता की बात तो करते हैं आज भी,
हालांकि जातिवाद की दीवार है तो क्या
एक और बानग़ी -
पीछे हटे देने से क़ुर्बानियाँ कभी,
मिटते रहे जो देश पे, हम वो अछूत हैं
लेकिन यही संयम अपनी क्षीण दशा नहीं मुखर आवेश के कारण अक्सर टूटता है -
हम लोग अपने आपको हिन्दू कहें तो क्यों,
नाचीज़ जब अछूत बताये गये हैं हम
या,
कौन है मनुवादियों के पोषकों में अग्रणी,
इसका उत्तर सिर्फ़ तुलसीदास लिखना है हमें
एक ये भी -
क्या पढ़ें इस मुल्क का इतिहास भ्रम हो जायेगा,
वाह-वाही, छल-कपट से युक्त है इतिहास भी
इस परिप्रेक्ष्य में यह साझा करना आवश्यक होगा कि हर संप्रेषण के विधान अलग हुआ करते हैं. उनके मायने अलहदे हुआ करते हैं. जो काम साहित्यकार को शोभता है, वह राजनैतिक-दायित्वों से असंभव है. इसीतरह, राजनैतिकबोध भी साहित्यिक समझ की मात्र परिधि पर ही टँगा रह जाता है. तभी तो उचित यही माना जाता है कि किसी साहित्यकर्मी को उन मुखौटाधारियों से सचेत रहना चाहिये जो सियासती-नेज़े को आस्तीन में छुपा कर साहित्य के अरण्य में शिकार करते फिरते हैं. राजनीति और साहित्य का घालमेल कितना सुफल अर्जित कर पाया है, आज उसे यथार्थ की कसौटी पर संयत रूप से समझना हर साहित्यकार का फ़र्ज़ होना चाहिये. कहते हैं, देश की विडंबनाओं के प्रतिकार का हर रास्ता दिल्ली ही पहुँचता है. लेकिन यह सोच वाकई कितनी तर्कसंगत है इसे समझना ही होगा. क्या ऐसे विचारों का पोषण खुद सियासत का ही षडयंत्र नहीं है, ताकि जन-जन की आवाज़ को दिल्ली का चारण बनाये रखा जासके ? ऐसा होता तो आज़ादी के इतने सालों के बाद भी हाशिये पर पड़े जन की अपेक्षाएँ अनुत्तरित होतीं. लेकिन इस षडयंत्र से बच पाना इतना सहज नहीं है. अन्यथा, इन पंक्तियों का कोई कारण बनता -
तुम्हें मानना ही होगा तुम बनजारे ठहरे,
वर्ना हमको मज़बूरन समझाना होगा
भारत की सियासत की अगर बात करूँगा,
गँठजोड़ की सरकार बनाने से करूँगा
साहित्य यदि सियासत की पीठ पर सवारी करता हुआ अपना हासिल चाहता है तो यह अवश्य है कि वह अपनी मुख्य राह से हट कर डाइवर्सन पर चला गया है और भटकाव को जी रहा है. सामाजिक चेतना एक बात है तो राजनीति करना ठीक दूसरी बात. साफ़ ! दोनों में घालमेल हुआ नहीं कि नई परिचयात्मकता और परिभाषाएँ विद्रुप उदाहरणों से भर जायेंगी. कई-कई मायनों में यही हो भी रहा है.
इस जगह यह जानना रोचक होगा कि इस संग्रह का ग़ज़लकार वस्तुतः चाहता क्या है ? क्योंकि, प्रतिक्रियावादिता कभी कोई हल नहीं है. बल्कि, यह एक सिम्पटम है. आज के ग़ज़लकार भाई रमेश नाचीज़ से एक प्रबुद्ध साहित्यकार के तौर पर सामाजिक विसंगतियों के बरअक्स सुगढ़ सोच और व्यवस्थित समाधान की अपेक्षा रहेगी.
   संग्रह की भूमिकाओं में भाई यश मालवीय का नज़रिया जहाँ संतुलित और सर्वसमाही होने के कारण श्लाघनीय है, तो वहीं वरिष्ठ-शाइर और इस संग्रह के ग़ज़लकार रमेश नाचीज़ के अदबी-उस्ताद आदरणीय एहतराम इस्लाम की सार्थक विवेचना उनके प्रति अपेक्षित कारुण्यभाव से पगी मातृवत है. आदरणीय एहतराम साहब ने पाठकों को ग़ज़लकार की साहित्यिक यात्रा का हमराही बना कर उनकी अपेक्षाओं और उनके प्राप्य को स्पष्ट कर दिया है. वहीं, प्रो. भूरेलाल संग्रह की भूमिका लिखने के क्रम में इसकी विभिन्न सीमाओं का कई बार अतिक्रमण करते हुए-से प्रतीत हुए हैं, जिससे बचा जाना उन जैसे एक वरिष्ठ साहित्यप्रेमी के लिए सर्वथा उचित होता.
ग़ुफ़्तग़ू प्रकाशन के बैनर तले प्रकाशित इस ग़ज़ल-संग्रह अनुभव के हवाले सेका हार्दिक स्वागत किया जाना चाहिये. सामाज में व्याप्त विभिन्न स्तरों को समरस कर एक धरातल पर लाने का कठिन कार्य साहित्य का ही है, भले ही डंका कोई माध्यम क्यों पीटता फिरे. साहित्य-संसार में ग़ुफ़्तग़ू प्रकाशन ने बतक कई वैचारिक मान्यताओं को स्वर दिया है. भाई रमेश नाचीज़ की वैचारिकता को मुखर कर गुफ़्तग़ू प्रकाशन ने अपने दायित्व का निर्वहन ही किया है. यह अवश्य है कि टंकण त्रुटियों के प्रति संवेदनशील होने के बाद भी कतिपय दोष यत्र-तत्र दिख जाते हैं. 96 पृष्ठों की सज़िल्द पस्तक का मूल्य रु. 125/ मात्र है.
*************************
सौरभ पाण्डेय
एम-2/ -17, एडीए कॉलोनी, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)
मो- 09919889911

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

इंडिया शाइनिंग की तरह है गुजरात का विकास

                                   --- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ----
भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी नरेंद्र मोदी को लेकर उसी तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, जिस तरह 2004 के आम चुनाव में एनडीए के लोग बोल रहे थे। तब ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा दिया गया था। जोर-शोर से प्रचार किया गया था कि एनडीए के कार्यकाल में भारत पूरी दुनिया में चमकने लगा है। इस नारे के साथ चुनाव में उतरे एनडीए को मुंह की खानी पड़ी थी। एक बार फिर से उसी तरह का नारा दोहराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इस बार निगाहें कहीं है, और निशाना कहीं और पर है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार उनके संप्रदायिकता वाली छवि के कारण बनाया गया, चूंकि यह खुलेआम कही नहीं जा सकती, इसलिए गुजरात के विकास का माडल दिखाकर मोदी को पेश किया गया है। उत्तर प्रदेश, जो अध्योया आंदोलन के समय से ही सांप्रादयिक आंदोलनों की प्रयोगशाला रहा है, यहीं से नरेंद्र भाई मोदी और अमित सहाय ने अपने अभियान की शुरूआत की है, इन दोनों नेताओं को गुजरात से सोची-समझी रणनीति के तहत लाया गया है। संदेश साफ है कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश को ऐसे सांप्रदायिक रंग में रंग दिया जाए कि देशभर के हिन्दू और मुसलिम वोटर धर्म के आधार पर बंटकर वोटिंग और भाजपा को हिन्दू वोटों का लाभ मिले। भाजपा को अपने इतिहास से भी सबक लेना नहीं आता। उसे याद रखना चाहिए कि 90 के दशक में लाल कृष्ण आडवानी, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार आदि की छवि एक कट्टर फायर बिग्रेड हिन्दू नेता की थी, कमोवेश आज जो छवि नरेंद्र मोदी की है। आज की तारीख में इन नेताओं की खुद भाजपा में कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। मुरली मनोहर जोशी को इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से हार का सामना करने के बाद अपना चुनाव क्षेत्र तक बदलना पड़ा। विनय कटियार अयोध्या से ही लगातार दो बार हार चुके हैं। उमा भारती को दर-दर की ठोंकरें खाने के बाद भाजपा में वापस आना पड़ा है, जहां उनकी स्थिति दूसरे कतार में खड़े नेताओं से भी खराब है। कल्याण सिंह कई बार भाजपा में आए-गए और अब पार्टी में उनकी कोई पूछ नहीं है। लाल कृष्ण आडवानी को पार्टी और राष्टीय सेवक संघ ने ही दरकिनार करके नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया है। आडवानी लाख विरोध करते रहे लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी।
भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में तब उभरी जब उसने बाबरी मसजिद और रामजन्म भूमि को अपना मुख्य मुद्दा बनाया। 6 दिसंबर 1992 को मसजिद शहीद कर दी गई, और पूरे देश में दंगा भड़क उठा, इसके बाद ही भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा सामने आया। तब की भाजपा सबसे मजबूत मानी जाती है, लेकिन बाबरी विध्वंस के बाद भी भाजपा को केंद्र में सरकार बनाने के लिए बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा, गठबंधन सरकारों का मजाक उड़ाने  वाली पार्टी छोटे-छोटे दलों को मिलाकर और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे अपेक्षाकृत सेक्युलर चेहरे को लाना पड़ा, साथ ही पार्टी को अपने प्रमुख मुद्दे राम मंदिर और धारा-370 की बलि देनी पड़ी थी। तब कहीं जाकर भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी थी। देश के सभी हिन्दुओं के प्रतिनिधित्व करने का दावा चाहे संघ जितना भी कर ले, लेकिन वह इस सच्चाई को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकता है कि वह जिस भाजपा का समर्थन करती है, उसके पक्ष में आज तक बहुमत हिन्दुओं का वोट नहीं डलवा सकी है वर्ना भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता था। इसमें कोई शक नहीं कि देश का अधिकतर पढ़ा-लिखा तबका चाहे वह हिन्दू या मुसलिम सेक्युलर है और सांप्रदायिकता के आधार पर वोटिंग नहीं करता। चंद नासमझ लोगों के कारण ही सांप्रदायिक दंगे होते रहे हैं और विभन्न मौकों पर राजनीति का संरक्षण मिलता रहा है। मगर हर मौके पर इस देश का पढ़ा-लिखा तबका आगे आकर सांप्रदायिक शक्तियों का मुकाबला करके उन्हें परासत करता रहा है। यही वजह है कि तमाम विडंबनाओं के बावजूद आज भारत के हर तबके के लोग बिना किसी डर के मिल-जुलकर एक साथ रहते आये हैं।
सच्चाई यह है कि संघ भी अंदरूनी रूप से नरेंद्र्र मोदी को पसंद नहीं करता, क्योंकि गुजरात में शासन करने के दौरान मोदी ने संघ की कभी नहीं सुनी, वे वही करते आये हैं, जो उन्हें ठीक लगता है। लेकिन इस वक़्त देश को जो माहौल है, उसमें संघ अप्रासंगिक हो गया है, उसे अपने अस्तित्व बचाने की चिंता सता रही है। ऐसे में संघ की प्रासंगिकता तभी साबित होगी जब केंद्र में भाजपा या उसके नेतृत्व वाली सरकार बने। ऐसे में संघ को लगता है मोदी भले ही प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी न सुनें लेकिन देश में उनकी प्रासंगकिता तो बनी रहेगी। अपने आपको बचाए रखना पहली चुनौती है। इसी को ध्यान में रखते हुए संघ ने मोदी पर दांव खेला है।
अब संघ और भाजपा की मुश्किल ये है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तो बना दिया, लेकिन उन्हें उम्मीदवार बनाये जाने का असली कारण नहीं बता सकती। इसी वजह से कहा जा रहा है कि नरेंद मोदी ने गुजरात का विकास किया है पूरे देश का करेंगे। जबकि उनको सामने ले आने की वजह उनकी कट्टर छवि है। संघ-भाजपा का मानना है कि नरेंद्र मोदी की इसी छवि के कारण उन्हें हिन्दू मतों का फायदा होगा, लेकिन ये खुलेआम नहीं कही जा सकती, इसलिए गुजरात का राग अलापा जा रहा है, जबकि गुजरात से अधिक काम सबसे पिछड़ों राज्यों में से एक बिहार और मध्य प्रदेश में हुआ है। गुजरात की वास्तविक स्थिति को छुपाकर देश के पेश सामने करने की कोशिश की जा रही है, इसके लिए बकायदा एक गु्रप को लगा दिया गया है। गुजरात को लेकर हाल ही में सीएजी ने जो रिपोर्ट पेश की है, उसके मुताबिक एक तिहाई लड़कियां कुपोषण की शिकार हैं। इसके अलावा तरकीबन सत्तर फीसदी लड़कियां पांचवीं कक्षा से आगे पढ़ने के लिए नहीं पहुंच रही हैं। गुजरात से लगे पाकिस्तान बार्डर का हिस्सा सबसे अधिक असुरक्षित है। सीबीआई ने जांच के बाद एनकांउटर मामलों की जो रिपोर्ट बनाई है, उसमें से इशरतजहां का मामला साफ तौर पर सामने आ गया है कि वह आतंकवादी या आतंकियों की साथी नहीं थी, कालेज की एक सामान्य छात्रा थी। 2002 के दंगों में मोदी के इशारे पर जो कत्लेआम हुआ, वह गुजरात के इतिहास में कालों पन्ने पर दर्ज हो चुका है। हक़ीक़त ये है कि नरेंद्र मोदी पंूजीवादी ताकतों के हाथों खेल रहे हैं, उन्हे खुश करने के लिए सारा काम गुजरात में किया जा रहा है। लाखों आदिवासी किसानों को वनभूमि के नए पट्टे देने के बजाए उन्हें उनकी पुश्तैनी खेती की ज़मीनों से भी पीट-पीटकर भगा दिया गया है। दूसरी ओर रतन टाटा को 2200 करोड़ रुपए निवेश करने के लिए 9570 करोड़ रुपए ऋण सरकार ने मात्र 0.1 फीसदी ब्याज पर दे दिया। इस कर्ज को टाटा बीस वर्षों में चुका सकते हैं। दो लाख एकड़ ज़मीन टाटा, आदानी, अंबानी और ईटीवी ग्रुप को दे दिया गया है। ये ज़मीनें 900 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से दी गई हैं, जबकि इसका बाजार मूल्य दस हजार रुपए प्रति वर्ग मीटर है। नरेंद्र मोदी जब 2001-02 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, उस समय गुजरात का ऋण 45,301 करोड़ रुपए था, इस समय यह ऋण 1,76,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। प्रतिदिन राज्य सरकार को 4.5 करोड़ रुपए ब्याज के रूप में देना पड़ रहा है। नरेंद्र मोदी इन आंकड़ों से अच्छी तरफ वाकिफ हैं और उन्होंने ऐसी व्यवस्था बना रखी है कि विकास की हकीकत लोगों तक न पहुंच पाए। आज कोई भी स्वतंत्र एजेंसी गुजरात का सही और ठीक आंकलन अपने हिसाब से आसानी से नहीं कर सकती। ऐसे लोगों को सरकारी नुमाइंदे जहां चाहते हैं, जो चाहते हैं, वही दिखाया जाता है। आगामी लोकसभा चुनाव जहां भारत को एक नई दिशा की ओर जाने वाला साबित होगा, वहीं नरेंद्र मोदी को उनकी राजनैतिक हैसियत भी बताने वाला है। किसी भी गणित से भाजपा की अकेले सरकार नहीं बनने वाली, और दूसरे दल मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने से रहे।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

पठनीयता का संकट कम, चोचलेबाजी ज्यादा-प्रो. बिसमिल्लाह

                                              

कवि, कथाकार व उपन्यासकार के रूप में अपनी खास पहचान बनाने वाले अब्दुल बिस्मिल्लाह उन चंद भारतीय लेखकों में हैं, जिन्होंने गंगा-जमुनी तहजीब को न सिर्फ काफी नज़दीक से देखा, बल्कि उसे अपनी लेखनी का विषय भी बनाया है। दंतकथा उपन्यास में नाबदान में फंसे एक मुर्गे के बहाने पूरी धरती पर व्याप्त भय, असुरक्षा व आतंक के बीच जीवन संघर्ष करते प्राणी की स्थिति का बेजोड़ शब्द चित्रण हो या पूर्वांचल बुनकरों की समस्या को बेस्ड बनाकर ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास में बेजोड़
शब्दों की झीनी-झीनी प्रभावी बुनावट, यह उन्हें आम लेखकों से अलग बनाती है। नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में बतौर हिंदी प्राध्यापक अब्दुल बिस्मिल्लाह को सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड, हिंदी एकेडमी दिल्ली, उप्र हिंदी संस्थान से दो बार, मप्र साहित्य परिषद, देव अवार्ड, साहित्य सम्मान, कथाक्रम सम्मान, साहित्य शिरोमणि सरीखे तमाम अवार्ड मिले हैं। उन्होंने मुझे बोलने दो (कविता संग्रह) टूटा हुआ पंख ;(लघु कथा संग्रह), छोटे बुतों का बयान (कविता संग्रह), समर शेष है (उपन्यास), झीनी झीनी बीनी चदरिया (उपन्यास), जहरबाद ;(उपन्यास), दंतकथा(उपन्यास), वली मोहम्मद और करीमन बी की कविताएं (कविता संग्रह), कितने कितने सवाल (लघु कथा संग्रह), रैन बसेरा ;(लघु कथा संग्रह), अतिथि देवो भव (लघु कथा संग्रह), जेनिया के फूल(लघु कथा संग्रह), मुखड़ा क्या देखे (उपन्यास),  रफ रफ मेल(लघु कथा संग्रह), अपवित्र आख्यान (उपन्यास), रावी लिखता है (उपन्यास) आदि लिखकर अपनी खास पहचान बनाई है। इनकी रचनाओं में झीनी झीनी बीनी चदरिया उपन्यास का उर्दू, ‘द सांग आॅफ द लूम’ अंग्रेजी में तर्जुमा हुआ। इसी प्रकार दंतकथा उपन्यास का मराठी तथा रवि लिखता है का पंजाबी, रफ रफ मेल का फ्रेंच में अनुवाद हुआ। पठनीयता के संकट को चोचलेबाजी बताने वाले अब्दुल बिस्मिल्लाह इसे कुछ लोगों का दिमागी फितूर बताने तक से नहीं चूकते। कहते हैं, पठनीयता के संकट जैसा कोई मसला नहीं है। इसी बीच उल्टे सवाल दागने तक से नहीं चूकते- अगर आपकी रचना को पाठक नोटिस न लेकर उसे खारिज कर दे रहा है तो इसे पठनीयता का संकट नहीं माना जा सकता। पाठकों की बदलती अभिरूचि का भी ख्याल लेखकों को रखना होगा। इस पर भी सोचना होगा कि आखिर क्या वजह है पाठक रचना के बारे में कायदे से नोटिस नहीं ले रहा है। इलाहाबाद में 9 जून 2013 को ‘गुफ्तगू’ द्वारा आयोजित एक सेमिनार में भाग लेने आए श्री बिसमिल्लाह से शिवाशंकर पांडेय ने बात की।
सवाल- हिंदी ग़ज़ल को लेकर कितने आषान्वित हैं आप?
जवाब- देखिए, रचनाओं को भाशा में बांटना कतई ठीक नहीं है। ऐसा करना उसे छोटा करने का कार्य है। देष की तमाम भाशाओं में ग़ज़लें लिखी जा रही हैं।
सवाल- फिर भी उर्दू और हिंदी के बीच जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं ...?
जवाब- ;बीच में ही बात काटकर हमने पहले ही कहा कि इसे हिंदी-उर्दू में बांटना उचित नहीं है। हिंदी और उर्दू दोनों में ग़ज़लें बखूबी लिखी जा रही हैं।
सवाल- अच्छी ग़ज़लें कहने के लिए क्या-क्या अहम बातें जरूरी होती हैं?
जवाब- सबके अपने अलग-अलग तरीके हैं, लेकिन प्रभावी तरीके से ग़ज़लें लिखने के लिए परंपरा का जानना बहुत ही ज़रूरी होता है। अगर परंपरा से वाकि़फ़ नहीं हैं तो कामयाबी मिलना मुष्किल हो जाता है। यह जान लीजिए कि छंद के बगैर ग़ज़ल हो ही नहीं सकती पर ग़ज़ल केवल छंद भी नहीं है।
सवाल-नए ग़ज़लकारों के लिए क्या कहेंगे?
जवाब-एक बात तय जानिए कि ग़ज़ल लिखने के लिए कायदे से पढ़ना और उसे समझना बहुत ज़रूरी है। दिक्कत यह है कि इधर, नये ग़ज़लकार पढ़ बहुत कम रहे हैं। इसका असर उनकी रचनाओं में भी दिख रहा है। 
सवाल-‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास के बारे में कुछ बताइए। 
जवाब- यह उपन्यास काफी चर्चा में रहा। ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ लिखने के लिए लंबी तैयारी करनी पड़ी। पूर्वांचल के कई बुनकर बस्तियों, उनके टोले-मोहल्ले की ख़ाक छाननी पड़ी। बुनकरों की दिनचर्या, उनके रहन-सहन, बोली, हंसी-मज़ाक करने का अंदाज़ से लेकर उनकी समस्याओं का न सिर्फ़ गहराई से अध्ययन किया बल्कि उसे महसूस भी किया। तब कहीं जाकर झीनी झीनी बीनी चदरिया उपन्यास सामने आया। इसे पाठकों ने जमकर सराहा। कई विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में षामिल किया गया। बाद में इस हिंदी उपन्यास के उर्दू और अंग्रेज़ी भाशाओं में भी कई संस्करण छपे।
सवाल-अक्सर पठनीयता के संकट की बातें कही जाती है, कितना सहमत हैं आप?
जवाब- पठनीयता का संकट कम, चोचलेबाजी ज्यादा है। यह सब कुछ लोगों का दिमागी फितूर है। पठनीयता के संकट जैसा कोई मसला नहीं है। आपकी रचना को पाठक अगर नोटिस न लेकर उसे खारिज़ कर रहा है तो इसे पठनीयता का संकट नहीं माना जा सकता। पाठकों की बदलती अभिरूचि का भी ख़्याल लेखकों को रखना होगा। इस पर भी सोचना होगा कि आखि़र क्या वज़ह है कि पाठक रचनाओं की क़ायदे से नोटिस नहीं ले रहा है। उनकी बदलती अभिरूचि को समझकर लिखे जाने की ज़रूरत है।
(गुफ्तगू के जुलाई-सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)