सोमवार, 2 मार्च 2026

 मानवीय संवेदनाओं की कहानियां

                                                                           - डॉ. विशाला शर्मा

     पुष्पिता अवस्थी मूल रूप से कवयित्री है। साथ ही डायरी, यात्रा वृत्तान्त, विविध प्रकार के आलेख, शोध समीक्षाएं सभी आपके लेखनी का हिस्सा रही हैं। साहित्य विधा के धरातल पर प्रत्येक विधा को आपने अपनी कलम से नापा है। टेलीविजन के लिए भी आपका काम करती रही। शिवप्रसाद सिंह, श्रीलाल शुक्ल, विद्यानिवास मिश्र पर श्रंखला बनाने का कार्य भी आपके द्वारा किया गया। विश्व के अधिकतर देशों की यात्राएं आपने की। आपकी पुस्तक ‘आधुनिक हिंदी काव्यालोचना के सौ वर्ष’ बड़ी चर्चित हुई। आपके द्वारा भारतेंदु जी से लेकर नामवर सिंह तक की कविताओं की आलोचना की गई। अपनी उम्र के ग्यारह  वर्ष से ही आपने कविताएं लिखना आरंभ कर दिया और युवा होते-होते युगवाणी में अपनी कविताएं पढ़ने शुरू की। ‘छिन्नमूल’ आपका चर्चित उपन्यास है। जिसमें सुरीनाम के प्रवासी भारतीय परिवारों की जीवन शैली और संस्कृति के साथ-साथ उनके संघर्ष को विस्तृत फलक पर दर्शाया गया है। साहित्य के क्षेत्र में लगभग 90 पुस्तकें पुष्पिता जी की प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही संस्मरण एवं अन्य विधाओं में भी सजग होकर साहित्य लेखन की ओर आप अग्रसर है। आपका कहानी संग्रह गोखरू एवं जन्म कहानी कला क्षेत्र के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। साथ ही छिन्नमूल उपन्यास में प्रवासी साहित्यकार पुष्पिता अवस्थी ने सुरीनाम में रहने वाले गिरमिटिया भारतीयों और उनके वंशजों के संघर्षों का विस्तृत वर्णन किया है। सातवें विश्व सम्मेलन का आपने सफलतापूर्वक संयोजन किया। ‘बचपन बचाओ’ आंदोलन और स्त्री अधिकारों के लिए आप सदैव संघर्षरत रही।

1984 में प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय के साथ उनके इलाहाबाद स्थित आवास पर पुष्पिता अवस्थी

‘गोखरू’ कहानी संकलन में आपकी आठ कहानियां संग्रहित है। सामाजिक सरोकारों को लेकर लिखी गई यह कहानियां अपने निम्न वर्ग कि त्रासदी के बीच जन्में पात्रों की सच्ची बयानी है। ‘उघन्नी’ कहानी में निम्न वर्ग का पात्र रामदिन पाठक के मन में अपनी जगह बना लेता है। वह चन्ना, मूंगफली, मटर रेत में भूनकर अपनी जीविका चलाता है। अपने पिता की हत्या से हुई मौत ने उसे हमेशा के लिए सतर्वहृ बना दिय गया था। ‘‘अब वह जागते हुए भी सोता था क्योंकि चुप रहता था और सोते हुए भी जागता था क्योंकि अपने पिता की हत्या से हुई मौत देखी है। पिता की मौत ने उसे हमेशा के लिए जगा दिया है। मां की चीख ने आंखें खोल दी है। उसकी हथेली में मुलायम सपने की जगह दियासलाई की डिबिया रखी हुई है जिससे वह रोज अपने भड़भूजे की अँगीठी सुलगाता है। दाने भूंजता है - इसके साथ-साथ कहीं-न-कहीं वह अपने पिता के हत्यारों को भी इसी तरह भूनने की कल्पना करता है।’’ अर्थात, प्रतिशोध की अग्नि से वह जल रहा है लेकिन बेबस है समय ने उसे उम्र के पहले ही प्रौढ़ बना दिया है उसकी छोटी-सी दुनिया में उसकी जीवन का आधार एक मात्र उसकी मां है और उसकी छोटी-सी कोठरी जिसमें वह रहता है वहां उसे सर्वाधिक सुरक्षा का मानसिक आधार मिलता है। ‘‘वय में किशोर रामदीन अपने धन्धे में कुशल और प्रौढ़ है... समय से पहले ही छोटे हाथ अनुभवी हाथों में तब्दील हो गए है। एकाएक वह मुलायम से मजबूत हो गए है, मजदूरी की रगड़ से। बोलता कम था शायद इसलिए भी कि अनुभव का संसार छोटा था। उसकी दुनिया में माँ और माँ की कोठरी थी दृ कोख-सी छोटी और सुरक्षित।’’ 

 इसी कहानी में निम्न वर्ग का दूसरा पात्र किशन है। रामदीन की दुकान पर किशन का रोज का आना जान है अपनी पिता की हत्या की सारी घटना वह किशन को बतलाता है किशन के परिवार में उसकी एक सीधी-साधी मां है। अपनी मां की याद आने के बाद ‘‘किशन सोचता है इस दुनिया में अगर कुछ बचा है और बचा रहेगा तो मां और मां का घर...। सन्तान के कोख के बाहर आने पर भी मां अपनी औलाद की वैसे ही सुरक्षा करती है। रक्षा-कवच होती है मां। अनाथ अकेली होने के बावजूद। दुआओं का घर होती है मां...। और सच। अपनी मनौतियों से निर्जला उपवासों से बचाती रहती है- वह सब कुछ अपनी कोशिश पर।’’ किन्तु परिस्थितियां व्यक्ति को समय के पहले समझदार बना देती है। किशन अब रामदीन की चूप्पी का दर्दनाक कारण जान गया था। अपनी दुकान पर रखी अंगीठी की आँच में वह अपनी जिंदगी सेंक रहा है उसके कान में एक संदूक के चाभी का छल्ला हमेशा लटकता रहता है। और वह रामदीन की पहचान बनाने का अनुठा तरीका है। बिना विज्ञापन के वह अपनी दुकान की पहचान खुद बना लेता है। ‘‘भईयाजी है, कान पर टँगल चाभी का छल्ला हमार पहचान बा। नाही तौ... ई भारी चम्मक-दम्मकवाले सहर मा कहां हमार बोर्ड... और का हमार पहचान। सुनकर किशन की आंखंे चमक उठी बच्चे की उजली चमक से सरोबार।’’

 किशन टेम्पो से अपनी नोकरी की जगह पर पहुंचता था वह देखता है टेम्पो भरने का काम अर्थात संवारी जुटाना और चिल्ला-चिल्लाकर संवारी को बुलवाना लोगों की झिडकियां सुनाना हाई-वे रास्ते पर तेज रफ्तार में दौंडे हुए टेम्पो में लोहे के हैंडल को पकड़कर अपनी जीवन की दोर को बचाने का काम कम उम्र के बच्चे किया करते है। लेखिका इन कहानी में उन बाल मजदूरों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करती है गरीबी इन बालमजूदरों को नाजुक नहीं बने रहने देती है। रामदीन जैसे लोगों या फिर इन टेम्पो पर काम करनेवाले बालमजदूर गांव से पैसे कमाने आए किशन जैसे पात्र जीवन की त्रासदी के बीच सदी की कहानियों के सच्चे पात्र हैं। जो अपने जीवन में अपनी संवेदना को दिखाकर करुणा की भीख  नहीं मांगले अपितु इस जगत् की निष्ठुरता को चुपचाप सहते है, निम्नवर्ग की दशा कहानी ‘प्रातः तव द्वार पर’ कहानी में लयलीना मृत्यु के रु-ब-रु नहीं होना चाहती थी। अपनी कुसुम गुरुजी की हत्या और उनके दाह संस्कार की रस्मों ने मौत के प्रति एक खौफनाक दर्द पैदा कर दिया था। किन्तु पेट की भूख व्यक्ति को कितना लाचार बनाती है इसका वर्णन स्मशान घाट पर होनवाली कुछेक घटना जब लयलीना के समक्ष सवाल बनकर उपस्थित होती है कि लोग शव की अधबुझी लकड़ियों को चुराते हुए उठाकर गंगा में बुझकर बटोर ले जाते हैं रात के चूल्हे के ईंधन के लिए। पेट की रोटी के लिए। मौत से चुराए हुए चइलों से सिंकती हुई रोटी को देखकर वह कई बार सिहर चुकी है कि जिंदगी अपनी भूख मिटाने के लिए कितने जीवन विरोधी खौफनाक काम करवाती है।’ 

 इस कहानी में दहला देने वाली खौफनाक मौत का सामना लयलीना करती है। जिस भांजी को कुसुम गुरुजी पढ़ा-लिखाकर अपने पाँव पर खड़ा करती है वही उनकी हत्या कर देती है पैसा और सारी जायजाद पाना उसका उद्देश्य होता है। कुसुम के मृत्य अंगुठे से कंचन मकान के कागजात पर निशान लगवा लेती है। समाज में ऐसी घटनाएं घटित होती है तब हमारे सम्मुख यह प्रश्न उपस्थित होता है कि पैसों के लिए मानवीय संवेदनाएं हमेशा के लिए खत्म होती है ऐसे ही प्रवासी बेटे और मां के संबंधों की कहानी ‘गोखरू’ है। बुढ़ापे में भी अपनी मान-सम्मान की रक्षा करनेवाले बुजुर्ग भारत में रहते है। ऐसे ही पात्र बुढ़ी नानी है। अपने बेटे और बहु के द्वारा नानी को अपशब्द कहने पर गांव छोड़ देती है। इस कहानी में गोखरू नानी के पैरों में पड़नेवाली दर्दनाक गाठे है। जो जीवनभर कैटस की तरह चुभते रहते है लेकिन उसकी आत्मा में उग आए गोखरू के दर्द को उसने कभी नहीं लोगों के सामने खोला अपना घर द्वार छोड़कर अपनी बेटी के सूसराल में आकर रहने का दर्द कादंबरी महसूस करती है। जब बुढ़ी नानी के मौत की चिठ्ठी उसके हाथ लगती है ऐसे ही दर्दनाक गोखरू आज उसके मन में टीस पैदा कर रहे है। जब उसका बेटा प्रताप कादंबरी को विदेश से खबर देता है कि उसने अपने लिए लडकी पसंद की है। उसे अपने पत्नी निशांत कि याद आती है। जो उसे इस दुनिया में अकेला छोड़कर चले गए है। ‘‘प्रताप की एकसाल की पढ़ाई बाकी थी कि उसके पिता का एक एक्सीडेंट में निधन हो गया। उनके जीवन बीमे के पैसे से प्रताप को पढ़ाया-लिखाया। पिता की मृत्यु से प्राप्त हुए धन से पुत्र की पढ़ाई हुई। अपने पिता की कब्र पर उगा हुआ पेड़ है प्रताप जिसकी न छाया नसीब है कादम्बरी को, न फल। अपने हालात के बारे में सोचती है तो छाती धक से रह जाती है।’’ 


 ‘देहिया’ कहानी उम्र और शरीर से जुड़ी देह की कहानी है। अपने बहु बेटे का रास्ता देखती बुढ़ी मां, बहु सावित्री और बेटे आनंद के आने के बाद अपने सारे दुःख दर्द उन्हें बताकर बांटना चाहती है अपने मजबुरी के रहते सावित्री और आनंद को नीदरलैंड में माँ को वृद्धाश्रम में रखना पड़ता है। जहां विदेशी वृद्ध ओल्ड हाऊस में टेलिव्हिजन के सामने बैठकर और एक-दूसरे से संवाद कर अपने दिन गुजार रहे है, भारतीय वृद्ध अपने बच्चों का आने का इंतजार में टकटकी लगाए होते है। वृद्धों की छोटी छोटी जरुरत अपने परिवार के लोग ही पूरी कर सकते है। जिससे उन्हें सुख भी मिलता है बुजुर्ग अपने अतीत की मीठी यादों में वर्तमान के दुःख को भूलना चाहते है पर अतीत के पन्नों को खोलने के लिए उनके समक्ष अपना कोई नहीं होता। आनंद की मां अपनी बहु से कई उम्मीदें रखती है। सावित्री जब घर जाने के लिए मां से अलग होती है तो वह ‘‘मां के सामने वह आंसू नहीं पोछती है क्योंकि इससे मां को पता लग जायेगा कि वह रो रही है... वह सोचती है कि मां की धुंधली आंखों को आंसू नहीं दिखाई देंगे। जबकि सावित्री का यह सिर्पहृ भ्रम भर है। मां की भीतरिया आंखों को सब कुछ साफ-साफ दिखाई देता है। क्योंकि अनुभव की आंखें कभी बुढ़ी नहीं होती हैं..। बल्कि यूं देखा जाये कि जैसे-जैसे अनुभव की आंखों की उम्र बढ़ती है उन्हें साफ और इतना अधिक साफ दिखाई देने लगता है कि वे रक्त की पहचान करने लगती है। उनकी कांपती हथेलियों के स्पर्श में खून की तासीर बोलने लगती है। यहां तक कि वे भविष्य भी देखने लगती है।’’ 

 ‘जन्म’ कहानी की हनिका और सोफिया बिना पिता के बच्चों को पाकर भी खुश है। कामकाजी महिला होते हुए अपने बच्चों को बड़े प्यार से पालती है। सोफिया कहती है, ‘‘मैं तो इस बात से खुश हूं और ईश्वर को धन्यावाद देती हूँ कि इस उम्र में भी मेरे अपने पैदा किए हुए दो बच्चें है, मुझे कम-से-कम अकेलापन और जिंदगी काटने के लिए कुत्ता, बिल्ली तो नहीं पालने पड़ेगे और मेरी माँ पिताजी के साथ-साथ विशेषकर मेरी दादी बहुत खुश है। वे कहती हैं कि ‘‘जब तुम्हारे पास काम अधिक हुआ करे और वीकेन्ड में समय हो तो बच्चे हमारे पास छोड़ दिया करना। हम लोग देखभाल कर लेंगे। ईश्वर को धन्यावाद दो कि उसने तुम्हें दो खूबसूरत बच्चे दियें है।’’

 इस बात में सच्चाई है कि मानवतावाद और इन्सानियत मौत से साक्षात्कार होने के बाद ही जन्म ले लेते है। सुरीनाम देश की राजधानी पारामरिबो का तीन सौ साल पुराना अस्पताल जिसमें रिया अपने ऑपरेशन के लिए भरती हुई है। ‘ए’ क्लास के कमरे में ‘‘रिया को लग रहा था- अस्पताल के बाहर का आदमी रुपया... मकान, औरत और माया के बारे में सोचता है। लेकिन अस्पताल में भर्ती हुआ आदमी सिर्पहृ जिंदगी और इंसानियत के बारे में सोचता है। सबकी भलई के लिए वह एक बार फिर से जी लेना चाहता है। किसी तरह बच जान चाहता है। रह-रहकर ईश्वर से प्रार्थना करता है और दुआएं मांगता है।’’ 

 उसी अस्पताल में पीनास नर्स सभी मरिजों की हृदय से ठीक होने की कामना करती है। अपनी करुणा, प्रेम और दया भाव के साथ मानवतावाद में उनका विश्वास है। जब रिया कुछ नहीं खाती तो वह खुद के पैसे से फ्रूट ज्यूस के दो बोतले लेकर आती है। जब रिया बिस्तर से नीचे गिर जाती है दर्द के कारण वह कॉलबेल बजाती है अपनी ड्यूटी पर रहनेवाली एक अन्य नर्स उसके कॉलबेल बजाने पर आकर डॉटती और फटकारती है पीनास और डांटनेवाली नर्स के व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर था। पिनास जब अपने ड्यूटी पर आती है उसे जब पता चलता है तब वह रिया से कहती है, ‘‘मैडम, वी मस्ट प्रे... भगवान से हम लोगों ऐसे लोगों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए कि वे दूसरों को दुःख पहुंचाने वाले कठोर हृदय को बदल दें और उनके निर्दयी अत्याचारों के लिए उन्हें क्षमा करें। जिससे वह निर्बल... सरल लोगों को दुःख पहुंचाना छोड़ दें। उन्हें नहीं मालूम कि, असहाय्य और जरुरतमंदों को दुःख पहुँचाना ईश्वर को दुःख पहुंचाना है और ईश्वर को पहुंचा हुआ दुःख पलटकर दुःख देनेवाले तक पहुंचता है- देर-सबेर ही सही।’’ 

 सामाजिक सरोकारों की चर्चा करे तो बाजार, औद्योगिकीकरण, बढ़ता उपभोक्तावाद और महंगाई के दुश्चक्र में फंसा आम आदमी का चित्रण ‘रिया’ कहानी के द्वारा हमारे समक्ष आता है। मार्क कहता है, ‘‘महंगाई और उपभोग की चाहतों ने आदमी को किस तरह से पागल बना दिया है। जिनके पास इस महंगाई से लड़ने के लिए नौकरी नहीं है और न ही कोई खिलाने-पिलाने वाला तो वे लोग राह चलते लोगों के सामान... और पर्स छीनते है...’’

 ‘उपस्थिति’ कहानी की मां अपने पति के चले जाने के बाद हरपल उनकी कमी को महसूस करती है। अपनी कर्मठ, मां के जीवन के बारे में जब नताशा सोचती है मां का जीवन उसे खुली किताब की तरह ऩजर आता है। ‘‘मां, जीवनभर बप्पा की गृहस्थी तथा खेत-खलिहान में बैल की तरह जुती रही। घर की चक्की पीसते हुए, नौ-नौ बच्चे पाल-पोसकर बड़े किये। छब्बीस गायों का गौशाला संभाला तो चालीस मुर्गी का दइबा भी देखा-भाला। घर के आगे-पीछे की जमीन में तरकारी बोने और तोड़ने में जुती रहती थी जिसे अपने जीवन में प्यार को महसूस करने का समय ही नहीं मिला। जब बच्चे बड़े हुए तो बप्पा बुढ़ा गये। एक ओर अपनी बीमारी से और दूसरी ओर, बच्चों के विश्वासघात से बप्पा ऐसे टूट गये कि रोज-रोज की अपनी इस दर्दनाक घुटन को भी सहने में असमर्थ हो गये थे। हर क्षण मृत्यु से भी भयानक पीड़ा को झेलने से अच्छा है मर जाना। ...और जब यह मर जान सहज नहीं होता है तभी लोग अपने को मार लेते हैं और बप्पा ने भी लोग अपने को मार लिया था। बगैर माँ का पूछे-बताये। मां को जैसे वे और बातें बताना जरुरी नहीं समझते थे वैसे ही इसे बावजूद मां हमेशा बप्पा के साथ रहीं। आज भी सोते-जागते उनकी ही जरुरतों के साथ हैं।’’ 

 ‘अधर्म’ कहानी में गायत्री समाज में उपस्थिति धर्म के प्रश्नों ने आहत होकर विश्व में जिस ‘रिलिजन’ शब्द ने चिंता पैदा की है उस रिलीजन की किताब को खरीदकर अॅम्बेसडर की फेयरवेल पार्टी में देना चाहती है। पुष्पगुच्छ देने की अपेक्षा किताब देना बहुत ज्यादा उपयुक्त समझती है। ‘‘गायत्री ने सोचा रिलिजन की किताब खरीदना बेहतर होगा? रिलिजन को लेकर पूरे विश्व में चिंतक पैदा हो गये है। किताबों की दुनिया में उन्होंने अपनी अच्छी मार्वेहृट बनाई है। कुछ आधुनिक दिमाग के गुरु बने बैठे हुए हैं।’’

आज गायत्री राजदूत के विदाई समारोह में शामिल हुई है एक प्रवासी भारतीय होने के नाते वह जानती है कि ‘‘भारतीय दूतावास में प्रवासी भारतीय और भारतवंशियों को कोई महत्व नहीं मिलता है। सामान्य कागजों पर हस्ताक्षर के लिए उन्हें महिनों दौड़ना पड़ता है जैसे भारतीय अधिकारियों को अपने देश के नागरिकों को दौड़ाने और चक्कर लगवाने की आदत पड़ जाती है वैसा ही सलूक वे विदेश के भारतीय नागरिकों के साथ करते हैं। पर वे अपना यह दर्द किससे कहें आखिर भारत सरकार के ये ही तो सुनाई करने वाले नियुक्त अधिकारी हैं। जबकि नीदरलैंड के सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों में एक फोन-कॉल पर अपाइंटमेंट मिल जाता है।’’

 अतः भारतीय होने का दंभ भरनेवाले लोग अपने ही लोगों से आहत होते है जबकि जिस देश में वे प्रवास कर जीविका चलने के लिए गए है वहाँ के लोग उनके साथ आत्मियता के साथ व्यवहार करते है वैसे ही अपने देश के प्रति सम्मान का भाव मन से निकल जाता है कारण सिर्पहृ एक ही होता है। उस विदेशी धरती पर अपने ही लोगों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के कारण उनकी सोच अपने देश के कारण बदल गई है। वही ‘विन्टरकोनिंग’ कहानी में अपने ही बच्चों से आहत  माताजी के जवीन की घुटन है और वह मां है अब वह ओल्ड हाऊस में रहती है। इस मां के जीवन की कहानी बिल्कुल अलग है आज युरापीय वृद्धाश्रम का उबला हुआ खाना मां को नहीं भाता जहां पांचवी मंजिल से झांक कर हमेशा शेखर और शिला के आने का रास्ता देखती है इस अनपढ़ मां ने। पति से प्यार करने और वैवाहिक जीवन का सुख जीवना चाहता तो पैंतालीस वर्ष की उम्र तक के बीच दस बच्चे पैदा करने में बीत गये। सब बन गये जब, तब अपना-अपना सबने घर बसा लिया और कुछ ऐसे बसा लिया कि मां-बाप के लिए किसी के पास न जगह बची और न ही समय बचा। पिता बच्चों के प्यार के अभाव की अनुभूति में टूट गये। अपने बड़े लड़के की बातें न सुनीं। धीरे-धीरे परिवार में दरारे पड़ती गयीं और परिवार बिखर गया। इस टूटन से पिता टूट गये। आस्थावान पिता अपनी प्रार्थना में ईश्वर से हाथ जोड़कर... हाथ उठाकर यही मांगते है... हे प्रभू... अब की बार मनुष्य जन्म मत देना। मानव बनने में बड़ा दुख है। जीना कठिन है। ऐसे ही कठिन जीवन से थककर एक शाम मां को छोड़कर चले गये। अंतिम समय माँ से यही कहा था कि अपने पन्द्रह बरस की उम्र से तुम हमारी साथी रही हो...। तुमने मेरा सबसे ज्यादा साथ दिया है...। तुमसे मुझे कोई दुःख नहीं पहुंचा है...। लेकिन... अब हम जाते हैं। जीना कठिन है...। और ... और... वह बैठक में लरजकर गिर गये। लडखडाते हुए उनके गिरने से पैंट की जेब से एक छोटी-सी शीशी गिरी। 

  भारतीय नारी के जीवन की त्रासदी को समाज के समक्ष लाने का कार्य साहित्य के द्वारा किया गया। प्रवासी साहित्य में कई ऐसे स्त्री पात्र हमारे समक्ष आते है जो पुरुषीय मानसिकता के शिकार है। पुष्पिता जी अपने गोखरू कहानी में तीन पीढ़ियों की महिलाओं का चित्रण करती है। जो एक ही परिवार से है। कादम्बरी, उसकी मां और मां की नानी जिसे सभी बुढ़ी नानी कहते थे। बुढ़ी नानी विचारों से बहुत आगे की सोच रखती है। उन्होंने अपने जीवन में कभी घूंघट नहीं निकाला, परंतु अपने बहु और बेटे के व्यवहार से आहत होकर वह अपने बेटी के यहां रहने चली जाती है। कादम्बरी अपनी पति के मृत्यु के बाद अपने इकलौते पुत्र को पढ़ा लिखाकर विदेश भेजती है। और वहीं बेटा मां को फोन पर सूचना देता है कि उसने अपने लिए लडकी ढूंढ ली है। मां के आग्रह के पश्चात भी वह कभी मां को खत नहीं लिख पाता। अपने पुत्र की इच्छाओं के आगे उसने अपने जीवन का बलिदान कर दिया। अपना घर बेचकर सारा पैसा आनेवाली बहु और बेटे के लिए जमा करती रही। वह पुत्र को पाल रही थी जिससे प्रताप वहां अपने मनोकुल नौकरी पा सके। पुत्र की जरुरत पूरी करने के लिए कादम्बरी अपनी जरुरत कम-से-कम करती गई। उसका बस चलता तो पेट एक कोर का कर लेती और देह एक हाथ की। कादम्बरी ने अपने खर्चे को पूरा करने के लिए एक स्वूहृल में नौकरी कर ली थी।’’ 


‘ठंडे बस्तें पिघलता लावा’ में सुधा प्रथम दर्जे की अफसर है। वह उच्च पदस्थ कमिशनर रेंज की अधिकार के साथ साथ एक साहसी महिला भी है। कई तरह के दबाव के चलते भी वह अटल रहकर वह अपनी ड्यूटी निभाती रही। इतनी सशक्त महिला की जब हत्या हो जाती है तो कार्यालय के अधिकारी उसकी मौत का कारण चरित्रहीन होना घोषित करते है। उसके केस की फाईलें भी गायब कर दी जाती है। वही पुष्पिता जी की ‘कंचा’ कहानी में हेमा जैसी स्वतंत्र किन्तु आत्मविश्वासी लडकियों को भी समाज गलत नजरियें से देखता है। अपने पिता के उम्र के  श्रीनाथ जी के साथ जब वह मकान ढूंढने जाते है तो लोग उसे गलत नजर से देखते है। जिससे हेमा के वजूद को चोट लगती है। किन्तु अपनी वाणी में संयम रखते हुए वह प्रत्युत्तर देती है। हेमा जैसे पात्र निडर होकर जीने का साहस पैदा करते है। वही विधवा स्त्रियों की दशा पर भी ‘कजरोटा’ कहानी में प्रकाश डाला गया है।

 ‘इनीका’ कहानी में इनीका के मां को जब उसके पिता तलाक देकर चले जाते है, तो इनीका के संवेदनशील मन में अपने मां और नानी के दुःख और दर्द धरोहर के रूप में इकट्ठा हो जाते है। इस तरह पुष्पिता जी के कहानी में शोषण, अमानवीयता, अन्याय-अत्याचार के खिलाफ खुला प्रतिवाद भी है। उनके नारी पात्र आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन जीना चाहते है। नौकरीपेशा महिला, घरेलू महिला, बुर्जूग महिला, युवा महिला सभी वर्ग और आयु की महिला पात्र मानविय भावनाओं और विचारों के साथ आपके कथासाहित्य का हिस्सा है।

निष्कर्ष - साथ ही अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय नारी का शोषण अन्याय, अत्याचार और उसका खुला प्रतिवाद भी नजर आता है। मानवतावाद, करुणा, प्रेम भी उनकी कहानियों का हिस्सा है। तो रोजगार की तलाश में निम्न वर्ग की दयनीय स्थिति में जीवन जीनेवाले रामदीन और किशन की पीड़ा भी है। समग्रता से मानवीय जीवन का संवेदनात्मक आख्यान उनकी कहानियों में परिलक्षित होता है। उनकी कहानियों में विचारों के उलझाव और जटिलता नहीं है। किन्तु विभिन्न सामाजिक प्रश्नों पर प्रश्न चिह्न लगाती हुई उनकी कहानियां में सार्थक अभिव्यक्ति है।

(गुफ़्तगू के जुलाई-सितंबर 2025 अंक में प्रकाशित )