रविवार, 4 मई 2014

कैम्पस काव्य प्रतियोगिता में फर्रूखाबाद के जयप्रकाश प्रथम

प्रथम पुरस्कार विजेता जयप्रकाश मिश्र को पुरस्कृत करते एसएमए काज़मी, वज़ीर अंसारी और नरेश कुमार ‘महरानी’
 गुफ्तगू का यह प्रयास बेहद सराहनीय-अंसारी
इलाहाबाद। साहित्यिक संस्था ‘गुफ्तग’ के तत्वावधान में 27 अप्रैल 2014 को आयोजित हुए कैम्पस काव्य प्रतियोगिता-3 में फर्रूखाबाद के जयप्रकाश मिश्र ने प्रथम स्थान हासिल किया, दूसरे स्थान पर लखीमपुर खीरी के धनंजय मिश्र और तीसरे स्थान पर इंदौर के अशीष तिवारी ‘जुग्नू’ रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि अजामिल व्यास ने की, मुख्य अतिथि मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन नई दिल्ली के सचिव मोहम्मद वज़ीर अंसारी थे। निर्णायक मंडल में अमर उजाला के संपादक अरुण आदित्य, वरिष्ठ पत्रकार रणविजय सिंह सत्यकेतु, पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काज़मी, हसनैन मुस्तफ़बादी, रितंधरा मिश्रा, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव, डॉ.पीयूष दीक्षित, अखिलेश सिंह, रविनंदन सिंह और अख़्तर अज़ीज़ शामिल थे। संचालन इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। प्रतियोगिता तीन स्टेप में पूरा किया गया। कुल 114 लोगों ने आवेदन किया था, इनमें स्तरीय रचना के अधार पर 42 लोगों का चयन करके उन्हें बुलाया गया। 42 में 38 लोग पहुंचे थे, इन प्रतिभागियों का टेस्ट अजामिल व्यास और अख्तर अज़ीज़ ने लिया। 38 में से 15 लोगों का चयन करके उनका काव्य पाठ मुख्य चयन समिति के सामने कराया गया।
कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में मुख्य अतिथि वज़ीर अंसारी ने कहा कि इलाहाबाद की संस्था गुफ्तगू ने छात्र-छात्राओं की प्रतियोगिता आयोजित करके बेहद सराहनीय कार्य शुरू किया है, इससे नये प्रतिभाओं का उत्साहन मिल रहा है। अरुण आदित्य ने कहा जब यह महसूस हो कि कविता लिखे बिना जिन्दा नहीं रह सकता तभी  कविता लिखना चाहिए, अन्यथा कविता लेखन का कोई मतलब नहीं है। पूर्व महाधिवक्ता एसएसमए काज़मी ने कहा कि जिस प्रकार गांधी जी लोगों को संगठित करने के लिए कार्य करते थे, ठीक उसी प्रकार गुफ्तगू संस्था लोगों को एक मंच पर लाकर संगठित होने का कार्य कर रही है, खासतौर पर नये लोग जुड़ते जा रहे हैं। इलाहाबाद शहर में इस संस्था का आंकलन अच्छे ढंग से किया जाने लगा है। प्रतियोगिता में प्रथम स्थान वाले का 2100 रुपये नगद, 500 रुपये की किताब और प्रशस्तिपत्र, दूसरे स्थान वाले को 1500 रुपये नगद, 500 रुपये की किताब और प्रशस्तिपत्र, तीसरे स्थान वाले को 1000 रुपये नगद, 500 रुपये की किताब और प्रशस्तिपत्र दिया गया। इनके अलावा दस प्रतिभागियों को विशिष्ट सम्मान के रूप में 500-500 रुपये की किताबें और प्रशस्ति पत्र दिया गया, यह सम्मान पाने वालों में सुधा शुक्ला, धीरेंद्र प्रताप सिंह, शुभम श्रीवास्तव, अराधना मिश्रा, नीलू मिश्रा, ऋषिकेश सारस्वत, विजय यादव, नेहा मिश्रा, पूजा कुमारी और प्रभात राय हैं। कार्यक्रम में मुख्य रूप से नरेश कुमार ‘महरानी’, शिवपूजन सिंह, नायाब बलियावी, अजय कुमार, अनुराग अनुभव, हुमा अक्सीर,रोहित त्रिपाठी रागेश्वर, प्रभाशंकर शर्मा, रमेश नाचीज़, डॉ. वीरेंद्र तिवारी, शुभ्रांशु पांडेय, सौरभ पांडेय,शादमा ज़ैदी शाद, एखलाक सिद्दीकी, अजीत शर्मा ‘आकाश’सागर होशियारपुरी,कविता उपाध्याय, सलाह गाजीपुरी आदि मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान मौजूद लोग
द्वितीय पुरस्कार विजेता धनंजय मिश्र को पुरस्कृत करते अजामिल व्यास, एसएमए काज़मी और वज़ीर अंसारी
तृतीय पुरस्कार विजेता आशीष तिवारी को पुरस्कृत करते अजामिल व्यास, एसएमए काज़मी और वज़ीर अंसारी
पूजा कुमारी को पुरस्कृत करते रणविजय सिंह, अजामिल व्यास, एसएमए काज़मी और वज़ीर अंसारी
विजय यादव को पुरस्कृत करते वज़ीर अंसारी, हसनैन मुस्तफ़ाबादी और ऋतंधरा मिश्रा
सुधा शुक्ला को पुरस्कृत करते नरेश कुमार ‘महरानी’,पीयूष दीक्षित, रणविजय सिंह और अजामिल व्यास

मोहम्मद वज़ीर अंसारी
 अजामिल व्यास
एसएमए काज़मी
अरुण आदित्य
हसनैन मुस्तफ़ाबादी
गोपी कृष्ण श्रीवास्तव
अख़्तर अज़ीज,   
ऋतंधरा मिश्रा
पीयूष दीक्षित
रणविजय सिंह
संचालन करते इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
पहले दौर का टेस्ट लेते अजामिल व्यास और अख़्तर अज़ीज़
काव्य पाठ करते जय प्रकाश मिश्र
काव्य पाठ करते आशीष तिवारी
काव्य पाठ करती अराधना मिश्रा
काव्य पाठ करतीं सुधा शुक्ला
काव्य पाठ करते धनंजय मिश्र
काव्य पाठ करते विजय यादव,
काव्य पाठ करते अतुल जायसवाल
काव्य पाठ करते धीरेंद्र प्रताप सिंह
काव्य पाठ करते मानस भल्ला
काव्य पाठ करती नीलू मिश्रा
काव्य पाठ करती नेहा मिश्रा
काव्य करते प्रभात राय
काव्य पाठ करती पूजा कुमारी
काव्य पाठ करते ऋषिकेष सारस्वत
काव्य पाठ करते शुभम श्रीवास्तव

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

गुफ्तगू का अदबी सफ़र शानदार-क़दीर

नवाब शाहाबादी अंक का विमोचन और मुशायरा
इलाहाबाद। साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ अपने प्रकाशन के 11वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है, इलाहाबाद शह्र से इस तरह की पत्रिका का प्रकाशन होना अपने आप में बेहद सराहनीय है। गुफ्तगू टीम ने इस दौर में साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन सफलतापूर्वक करके एक मिसाल कायम किया है। ये बातंे वरिष्ठ शायर एम.ए.क़दीर ने छह अप्रैल 2014 को महात्मा गांधी अंतरराष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय के परिसर में नवाब शाहाबादी अंक के विमोचन अवसर पर कही। वे कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पं. बुद्धिसेन शर्मा ने की, विशिष्ट अतिथि के तौर पर कानुपर के प्रो. खान फारूक, प्रो. अली अहमद फ़ातमी और गोपीकृष्ण श्रीवास्तव मौजूद रहे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। गोपीकृष्ण श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा कि यह पत्रिका अब धीरे-धीरे इलाहाबाद की पहचान बन गई है। हमें ऐसे प्रयासों की प्रसंशा करनी चाहिए।
दूसरे दौर में मुशायरे का आयोजन किया गया।
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी-
                                                      अब इलेक्शन का ये फलसफ़ा हो गया।
वो जो क़ातिल रहा रहनुमा हो गया।



 नरेश कुमार महरानी-
                                                    निगाहों में बसी थी तू कभी मेरे इस तहर के,
भुलाने तुझे कसमें कभी खाई नहीं होती

 अजय कुमार-
                                                                मर्यादा के भाव न जाने,
                                                                 बनते रधुनंदन,
                                                                    कट्टा पिस्टल हाथों में है
माथे पर चंदन

 शिवपूजन सिंह-
                                                          कुछ यादें कुछ वादें, कुछ दिल की फरियादें
                                                           कुछ इरादे कुछ मुरादें,
कुछ कुछ यही तो है ज़िन्दगी

 कविता उपाध्याय-
                                                 ज़िन्दगी ख्वाब की मानिन्द हुई जाती है,
जब तलक होश में आए हैं फिसल जाती है।

 अख़्तर अज़ीज़-
                                                 हमसे अलग-थलग वो कहीं डर के हो गए,
हम एहतियातन आज से पत्थर के हो गए।

 रमेश नाचीज़-
दो पैरों दो हाथों वाले जितने भी हैं दुनिया में,
मैं सबको इंसान समझ लूं ये कैसे हो सकता है।
 संजू शब्दिता-
                                                         बेकली मेरे दिल की मिटा दीजिए।
ऐ मेरे चारागर कुछ दवा दीजिए।

 शैलेंद्र जय-
                                                   ज्ीने की कला मैंने फूलों से उधार ली है,
यू ही नहीं ज़िन्दगी कांटों में गुजार ली है।

 मनमोहन सिंह तन्हा-
                                                काम जो तन्हा करो तुम काम वो दिल से करो,
ज़िन्दगी का क्या भरोसा आज है कल हो न हो।

 रज़िया शबनम-
                                                     मैं किससे गुफ्तगू करूं किससे मिलूं गले,
मुझको अभी खुलूस का इंसां नहीं मिला
।
 रोहित त्रिपाठी ‘रागेश्वर’-
मेरे हंसने से चिढ़ते हो अगर तो पहले कह देते,
मेरे कारण तेरा जलता है घर तो पहले कह देते।
-
 नुसरत इलाहाबादी-
                                                          उनकी आंखों में तश्नगी के सिवा,
हमने अब तक नमी नहीं देखी।

 अरविन्द कुमार वर्मा-
                                                    कई बार होठों पर याचना के थरथराए हैं वचन,
भूली सी राह पर बढ़ गए हैं अंजाने कदम।

 अशरफ अली बेग-
तड़प हर आन पीछे जाएगी फ़िर,
बला टल करके भी सर आएगी फिर.
डा. विक्रम-
                                                   खता क्या थी कि लोगों ने पागल बना दिया,
बाजार गया तो लोगों ने अवारा बना दिया।

 केशव सक्सेना-
                                                         सार्वजनिक होती अश्लीलता से
                                                          अपने देश को बचाओ
नई पीढ़ी को संस्कार सिखाओ।

 अमित कुमार दुबे-
                                                       नये ये नजारे बहुत दिलनशीं हैं,
मगर मुझको भाती है चीजें पुरानी।
 
 रितंधरा मिश्रा-
                                                    निगाहों से शरारत सामने ही कर रहा कोई,
अपनी ही अदायगी से मोहब्बत कर रहा कोई।

 अजय पांडेय-
ढल रही शाम यह दिन गगन में ढल गया,
लो ज़िन्दगी का एक दिन हाथ से फिसल गया।
 एम.ए.क़दीर-
                                             खेल और जंग के वह खुद ही बनाता है उसूल,
                                               और जब हारने लगता है, बदल देता है।
                                                रोज़ पत्थर की इमारत पर कहां पड़ती है जान,
                                                  इश्क़ सदियों में कोई ताजमहल देता है।


शनिवार, 15 मार्च 2014

!!! गुफ्तगू के मार्च-2014 अंक में !!!

3.ख़ास ग़ज़लें - हसरत मोहानी, शकेब जलाली, परवीन शाकिर, अदम गोण्डवीं
4-5. संपादकीय- यह कैसी प्रगतिशीलता
ग़ज़लें-
7.मुजफ्फर हनफ़ी, मुनव्वर राना, वसीम बरेलवी, इब्राहीम अश्क
8.एम.ए. क़दीर, किशन स्वरूप, नज़र कानपु
री, हसनैन मुस्तफ़ाबादी
9.सागर होशियारपुरी, अब्बास खान ‘संगदिल’,अख़्तर अज़ीज़, सजीवन मयंक
10.शफ़ीक रायपुरी, पूनम शुक्ला, नरेश कुमार ‘महरानी’,पीयूष मिश्र
11.मिसदाक आज़मी, डा. सूर्य प्रकाश ‘सूरज’,ओम प्रकाश यती, चंद्र प्रकाश माया
12.अनुपिन्द्र सिंह ‘अनूप’, सेवाराम गुप्ता ‘प्रत्यूष’, राकेश मलहोत्रा नुदरत, विवके त्रिपाठी
13.अमित कुमार दुबे, अजय कुमार

कवितायें-
14.फ़िराक़ गोरखपुरी
15.कैलाश गौतम, यश मालवीय, शिवपूजन सिंह
16.नंदल हितैषी, जयकृष्ण राय तुषार
17.ब्रजेंद्र त्रिपाठी

18-19.तआरुफ़- संजू शब्दिता
20-22.विशेष लेख- साहित्य में आलोचना की चिंता- डा.सादिका नवाब ‘सहर’
23-27.इंटरव्यू- फ़हमीदा रियाज़
28-30.चौपाल- इलेक्टानिक मीडिया के बूम से पठनीयता पर असर?
31-34.तब्सेरा- ग़ज़ल के साथ, सूरज के बीज, कहानी कोई सुनाओ मिताशा
35-38.कहानी- सच्चा सपना-चंद्र प्रकाश पांडेय
39-40.गुलशन-ए-इलाबाहाबाद: शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी
41.बशीर बद्र की ग़ज़लें
42-45.अदबी ख़बरें
46-50.डा. नरेश सागर के सौ शेर
परिशिष्टः नवाब शाहाबादी
51.नवाब शाहाबादी का परिचय
52-53.नवाब शाहाबादी की कुंडलियां-प्रो. सोम ठाकुर
54-56. दुनिया की फिक्र जिन्हें वो असली शायर-रविनंदन सिंह
57.कुछ अपनी कलम से
58-84.नवाब शाहाबादी की कुंडलियां
 

शनिवार, 1 मार्च 2014

!!!! यह कैसी प्रगतिशीलता !!!


                                                                                                                   - NAZIYA GHAZI
प्रगतिशील लेखक मंच और इसके सहयोगी संस्थाओं ने 8 दिसंबर 2013 को इलाहाबाद में सांप्रदायिकता विरोधी रैली निकाली, सभा और काव्य संध्या का आयोजन किया। इसमें शिरकत करने के लिए बाहर से भी कई प्रगतिशील लोग आए थे। मुद्दा था कि देश-प्रदेश में सांप्रदायिकता फैलाने वालों के प्रति लोगों को जागरुक किया जाए। देखने-सुनने में तो यह विषय बहुत ही अच्छा है, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। इस आयोजन के तकरीबन 10-12 दिन पहले तीस्ता शीतलवाड़ गुजरात से इलाहाबाद आयीं थीं, इनको लेकर कई सामाजिक संगठनों ने गोष्ठियों का आयोजन किया। तीस्ता ने गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों की वास्तविकता से लोगों को रुबरु कराया, इन आयोजनों में कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी सहित कई नेता और कार्यकर्ता भी शामिल हुए। कांग्रेसियों के शिरकत करने पर प्रलेस की इलाहाबाद इकाई ने आपत्ति जताई, उनका कहना था कि इसमें किसी राजनैतिक दल को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। प्रलेस ने सिर्फ़ आपत्ति ही नहीं जताई बल्कि तीस्ता के कार्यक्रमों का बहिष्कार भी किया। मजे की बात यह है कि विरोध करने का निर्णय भी प्रलेस इलाहाबाद इकाई के दो-तीन लोगों ने मिलकर ले लिया, कार्यकारिणी में शामिल एक दर्जन से अधिक लोगों की राय तक इस विषय पर नहीं ली गई। इसका नतीज़ा यह हुआ कि सिर्फ़ तीन-चार लोग ही इनके विरोध के समर्थन में आए, इनके अलावा पूरा प्रलेस तीस्ता के कार्यक्रमों में शरीक हुआ। अब सवाल यह उठता है कि सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलन में अगर किसी राजनैतिक दल के लोग शामिल हो रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है, हमें तो ऐसे लोगों का स्वागत करना चाहिए, चाहे वे किसी दल से हों। गलत तब होता जब किसी राजनैतिक दल के आयोजन में प्रलेस या कोई सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन शामिल हों। अगर हमारे आयोजन में कोई शिरकत करने आता है तो यह हमारे लिए अच्छी बात है, इससे नतीज़ा यह निकलता है कि हमारा आयोजन-आंदोलन सही दिशा में हैं।
सिक्के के दूसरे पहलू को देखा जाए तो तीस्ता के कार्यक्रमों के बाद 8 दिसंबर को जब सांप्रदायिकता विरोधी रैली निकाली गई। इसमें एक ऐसे व्यक्ति-नेता को भी आमंत्रित किया गया जिसने कुछ दिनों पहले अपने देखरेख में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का चौपाल लगाया था, ग्रामीणों को बुलाकर उन्हें कांग्रेस के हक़ में वोट देने की बात कहलवायी गई थी। आखिर प्रलेस का यह कैसा चरित्र है, दूसरे के आयोजन में कांग्रेसी नेता आएं तो उसका विरोध और खुद के आयोजन में ऐसे लोगों को आमंत्रण। 8 दिसंबर के ही कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बीएचयू के एक अवकाश प्राप्त अध्यापक को बुलाया गया, जिनके प्रगतिशील होने का डंका प्रलेस के लोग खूब पीटते हैं। इन्होंने अपने सांप्रदायिका विरोधी वक्तव्य में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर अलाचोना की, यहां तक कि मुजफ्फनगर दंगों के लिए भी भाजपा और उसके सहयोगियों पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया। मजे की बात यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं कहा। जबकि मुजफ्फनगर दंगों के मामले में यह बात पूरी तरह से उजागर होकर सामने आयी है कि शासन-प्रशासन की लापरवाही से ही दंगा इतना अधिक भड़का। अगर प्रशासन सख़्त हो जाए तो बड़े से बड़े षयंत्रकारी की हिम्मत नहीं है कि वह अपने नापाक इरादे में कामयाब हो सके। मगर बीएचयू के सेवानिवृत्त अध्यापक महोदय को ऐसा नहीं लगता, उनकी नज़र में मुजफ्फनगर दंगों के प्रति प्रदेश सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है। बाद में पता चला कि इन महोदय को प्रदेश सरकार की एक संस्था ने ‘लोहिया सम्मान’ से नवाजा़ है, इसलिए वे उनके खिलाफ़ नहीं बोलेंगे, आखिर यह कैसी प्रगतिशीलता? क्या यही है वर्तमान समय की प्रगतिशीलता। इसी प्रकार प्रलेस के राष्टीय अध्यक्ष दिल्ली में बीजेपी और आरएसएस के नेताओं के साथ पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में मंच साझा कर रहे हैं, उनके साथ तमाम फोटाग्राफ सोशल मीडिया पर देखे जा सकते हैं, तब वे सही हैं और प्रगतिशील भी हैं? कुल मिलाकर प्रगतिशीलता का मतलब सभी धर्मों को गाली देना, अय्याशी करना और दारू-मुर्गा का सेवन करना रह गया है। प्रगतिशील लेखक संघ का पदाधिकारी बनने से कोई प्रगतिशील नहीं हो सकता, इंसान अपने कामों-विचारों और प्रगतिशीलता के अनुपालन से प्रगतिशील होता है। प्रगतिशील होने के लिए किसी संस्था का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।