शनिवार, 13 जून 2026

प्रेम की एक अनोखी दास्तान : रॉबर्ट गिल और ......’

                                                           - अजीत शर्मा ‘आकाश’


  

 ‘रॉबर्ट गिल और अजन्ता की पारो’ शीर्षक की पुस्तक लेखिका डॉ. प्रमिला वर्मा की उपन्यास कृति है, जो एक ब्रिटिश सैन्य अफ़सर के प्रेम और जज़्बात की सच्ची कहानी पर आधारित है। लेखिका के अनुसार वर्ष 1824-1879 के समय को सामने रखकर यह उपन्यास लिखा गया है, जिसके सभी पात्र एवं घटनाएं सत्य हैं। इसके अंतर्गत अजन्ता ग्राम में पारो एवं रॉबर्ट गिल की प्रेम कहानी को घटनाओं के आधार पर कल्पना का सहारा लेते हुए इसके कथ्य की रचना की गयी है। लेखिका ने उपन्यास के स्थान, पात्रों एवं घटनाओं को जीवंत करने की कोशिश की है। रॉबर्ट गिल की उन्नीस वर्ष की आयु से लेकर उसके संपूर्ण जीवन का चित्रण इस कृति में किया गया है। रॉबर्ट 1824 में कैडेट के रूप में लंदन में सेवा में भर्ती होने के पश्चात् वह ऐच्छिक नियुक्ति पर इंडिया आ गया था। लेफ्टिनेंट एवं कैप्टन के पश्चात् वह ब्रिटिश सैन्य अधिकारी मेजर के पद पर था। विशेष अनुरोध पर उसे जॉन स्मिथ द्वारा प्राचीन भारतीय कला के मूर्तरूप में खोजी गयी अजन्ता में बौद्ध गुफाओं का एक चित्रमय रिकॉर्ड बनाने के लिए नियुक्त किया जाता है। इस कार्य हेतु हैदराबाद के निजाम द्वारा महाराष्ट्र के औरंगाबाद में अजन्ता ग्राम स्थित बारादरी में उसके रहने का प्रबन्ध किया गया।

  गुफाओं की चित्रकारी और पेंटिंग के दौरान यहीं पर रॉबर्ट गिल को उसी अजन्ता ग्राम की कोली जाति की आदिवासी ‘पारो’ नाम की बनजारा लड़की अपनी बगिया का काला गुलाब दिया करती थी। वह अक्षर ज्ञान से अनभिज्ञ एक नृत्यांगना तथा समझदार लड़की है, जो गुफाओं की पेंटिंग्स में उसके साथ होती थी। गांव की आदिवासी लड़की पारो और रॉबर्ट का यह प्रसंग धीमे-धीमे प्रेम में बदल जाता है। सैन्य अधिकारी मेजर रॉबर्ट गिल बहुमुखी प्रतिभा का मालिक, तबियत से चित्रकार और फ़ोटोग्राफ़र है, साथ ही माउथ ऑर्गन और प्यानो का शौकीन तथा बहुआयामी व्यक्तित्व का स्वामी है। सेना में होने के बावजूद वह अत्यन्त भावुक प्रवृत्ति का है, जबकि सैन्य-क्षेत्र में भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं होता। उपन्यास के कथानक के अनुसार रॉबर्ट गिल की पत्नी फ्लावर ड्यू वैचारिक मतभेद के कारण उसे इंडिया में छोड़कर लन्दन वापस चली गयी थी। ऐसी मनः स्थिति में पारो के प्रेम ने ही उसे संभाला था। बाद में गांव वालों द्वारा गर्भवती पारो की हत्या कर दी जाती है। इसके पश्चात् रॉबर्ट की जिंदगी में एनी आई और उसने रॉबर्ट को इस अवसाद से बाहर निकाला। उपन्यास के अन्त में रॉबर्ट गिल की भी मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार यह एक दुखान्त उपन्यास है।

 रॉबर्ट गिल और पारो के प्रेम की यह एक अनोखी दास्तान आज भी विश्व प्रसिद्ध कही जाती है। रॉबर्ट की कब्र पर महाराष्ट्र के भुसावल में आज भी हर साल उसकी डेथ एनिवर्सरी मनाई जाती है। कहा जा सकता है कि प्रेमानुभूति को झकझोरने वाला यह एक बेहतर एवं महत्वपूर्ण उपन्यास है, जो ब्रिटिशकालीन इंडिया की स्थिति एवं मराठी कल्चर का विस्तृत वर्णन करता है। और रॉबर्ट के सैन्य जीवन का अभूतपूर्व वर्णन पाठकों के समक्ष आता है। लेखिका के अनुसार यह कृति उनके इस विषय पर श्रमपूर्वक किये गये रिसर्च का परिणाम है।

  सरल, सहज एवं प्रवाहमयी भाषा तथां रोचक शैली में लिखा गया यह उपन्यास पठनीय एवं सराहनीय है। मानवीय रिश्ते, मानवीय कमज़ोरियां हृद्गत भावनाएं एवं संवेदनाएं एवं विभिन्न घटनाएं पाठक को निरन्तर बांधे रखती हैं। रचना-कर्म के साथ न्याय करते हुए उपन्यासकार ने इसकी रचना की है। पुस्तक का मुद्रण एवं अन्य तकनीकी पक्ष उच्चकोटि का है। लोकमित्र प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस हार्ड बाउण्ड पुस्तक का मूल्य 600 रुपये है।     


सराहनीय ग़ज़लों का संग्रह ‘शाम तक लौटा नहीं’



 ग़ज़ल-संग्रह ‘शाम तक लौटा नहीं’ की रचनाओं के वर्ण्य-विषय प्रमुखतः प्रेम, विरह, सामाजिक मुद्दे, प्रकृति की छटा आदि हैं, जिनके अंतर्गत जीवन की विभिन्न अनुभूतियों और संवेदनाओं को शब्द प्रदान किये गये हैं। कहीं-कहीं दर्शन, श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य का भी पुट देखने को मिलता है। रचनाकार ने अपने आस-पास, घर-परिवार, समाज, सोशल मीडिया, सिनेमा आदि के माध्यम से जो अनुभव प्राप्त किये हैं, उन्हें इन रचनाओं के माध्यम से पाठकों से साझा करने का प्रयास किया है। पुस्तक में संग्रहीत ग़ज़लों के कुछ उल्लेखनीय अंश इस प्रकार से हैं-‘ये धूल ये धुआं ये नदी जल ये उजड़े वन/माहौल ये हुआ है कि जीना मुहाल है।’, ‘नदी में बाढ़ की तरह बहा था/ये कैसा प्यार था जो घट गया है।’, ‘अंधेरा है बड़ा घनघोर चारों ओर/मशालें फिर जलाना है चलो साथी।’, ‘एक सागर खड़ा का खड़ा रह गया/इक नदी खो गयी दो किनारे लिये।’, 

 इन गज़लों में रचनाकार ने हिन्दी-उर्दू के साथ ही अंग्रेज़ी के दैनिक बोलचाल के शब्दों से युक्त सरल-सुगम, तथा प्रवाहमय भाषा का प्रयोग किया है। विचारों, भावों एवं अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में स्पष्टता झलकती है। लेखन में हालांकि सावधानी एवं सतर्कता का परिचय प्रदान किया गया प्रतीत होता है, फिर भी ग़ज़ल-व्याकरण की दृष्टि से कुछ रचनाओं में ऐब (दोष) भी यत्र-तत्र परिलक्षित होते हैं। यथा- मन नहीं, हर रोज, आराम मत, हर रूत,, पास साहिल जैसे प्रयोगों में ऐबे-तनाफ़ुर (स्वरदोष), तक़ाबुले रदीफ़- पृ.-36, त्रुटिपूर्ण क़ाफ़िया- हरजाई- परछाई आदि। हटा कर राख फिर से कुछ अंगारे ढूंढने होंगे-बह्रदोष। फिर भी, कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि संग्रह की ग़ज़लें पाठकों को निराश नहीं करती हैं। रचनाधर्मिता एवं सृजनात्मकता की दृष्टि से लेखन सराहनीय है। इस पुस्तक को गुफ्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज ने प्रकाशित किया है, जिसकी पृष्ठ संख्या 104 तथा मूल्य 200 रूपये है।


एक ही रूक्न से बनी ग़ज़लों का संग्रह


 

‘पतवार तुम्हारी यादें’ रचनाकार महावीर सिंह ‘दिवाकर’ की पुस्तक है, जिसमें उनकी 84 ग़ज़लें संग्रहीत हैं। यह ग़ज़ल-संग्रह अन्य ग़ज़लकारों के ग़ज़ल-संग्रहों से इसलिए अलग है, क्योंकि इसकी समस्त ग़ज़लें ‘बह्र-ए-मीर में हैं, जो एक विशेष रूक्न ‘फेलुन’ तथा उसके दोहराव से बनी होती है। यह बह्र अपवाद स्वरूप है, जिस पर अरूज़ के नियम नहीं लागू होते हैं। सभी मिसरों में कुल मात्राएं बराबर होने के कारण यह मात्रिक बह्र कहलाती है। लय भंग न होने देना ही इस ग़ज़ल की एक प्रमुख एवं अनिवार्य शर्त है। शास्त्रीय पक्ष के दृष्टिगत संकलन में रूक्न ‘फेलुन’ तथा उसके दोहराव से बनी छोटी तथा लम्बी बह्रों में ग़ज़लें कही गयी हैं, यथा- ‘अपनापन रख/मत अनबन रख’ और ‘ज्यादा से ज्यादा क्या होगा तेरे बिन मैं मर जाऊंगा।’ यह मात्रिक ग़ज़लों का संग्रह है, जिसे ग़ज़लकार का एक विलक्षण प्रयोग कहा जा सकता है।

  रचनाकार ने परंपरा से हटकर अनेक नये और विशिष्ट क़ाफ़ियों तथा रदीफ़ों का प्रयोग भी किया है, जैसे- चिरकुट-गुट, न्यूटन-दरपन, मृग-दृग आदि। रदीफ़- ओके, तू जाने आदि। शिल्प की दृष्टि से ग़ज़लें शुद्ध हैं। हालांकि, कुछ मिसरों में मात्रा गिराने के कारण लयभंग का दोष प्रतीत होने के कारण पढ़ने में अटकाव-सा आता है, यथा- आखि़र मन को कचोट बिकेगा (पृ.-25), आंखंे दिल जां शहर में तेरे ही (पृ.-27), काम शुरू होने के समय जो सुझाव नहीं रखते (पृ.-76) आदि। ग़ज़लों की भाषा सरल, सहज एवं शुद्ध है, जो उर्दू-हिन्दी शब्दों का मिलाजुला रूप है। उदाहरणार्थ, दग्ध-हृदय, अपावन, प्रतिबिंब, रोमांटिक, पोज़, साजन, चाय सुड़क ले, फीका चावल, ताक-धिना-धिन जैसे शुद्ध हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी एवं आम बोलचाल के शब्द एवं शब्दावली का प्रयोग किया गया है। आवश्यकतानुसार कुछ कठिन शब्दों के अर्थ फु़टनोट में दिये गये हैं।

 पुस्तक में संग्रहीत ग़ज़लों के कुछ उल्लेखनीय अशआर प्रस्तुत हैं- दौर-ए-हाज़िर मे मक्कारी/बनकर आला घूम रही है। आ पहुंचे आखि़र मज़िल पर/रस्ते ने भटकाया तो था। किसके होश ठिकाने थे/दोनो दिल दीवाने थे। दग्ध-हृदय था पहला कवि/गीत बनी थी पहली आह। तू आवाज़ तो दे मुझको/तेरे भीतर बैठा हूं। शीशे सा है अपना दिल/और ज़माना पत्थर है। उड़कर आ फिर चीं-चीं का सगीत सुना/डाली-डाली उपवन-उपवन गौरैया। 

 ग़ज़ल व्याकरण के दृष्टिगत कुछ ग़ज़लों में दोष भी परिलक्षित होते हैं। यथा- कोलाहल लहरें, उमस सी, ख़ालिस सोना, ढब बाज़ारी आदि में ऐबे तनाफुर (स्वरदोष- किसी शब्द के अंतिम अक्षर की उसके बाद वाले शब्द के पहले अक्षर से समानता) है। तक़ाबुले रदीफ- मतले के अलावा किसी भी शे’र की पहली पंक्ति के अन्त में रदीफ़ या रदीफ़ के हिस्से की मौजूदगी का दोष-बरसेंगे-सच के (पृ.-16), भर का-मेरा-दुनिया (पृ.-23) आदि। इसके अतिरिक्त ग़ज़लों में अनेक स्थानों पर ‘यार’ शब्द भरती का प्रतीत होता है। ‘परछाईं’ के स्थान पर प्रयुक्त ‘परछाई’ शब्द में भाषाई त्रुटि है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ‘पतवार तुम्हारी यादें’ एक सहज और सम्प्रेषणीय, श्रेष्ठ, पठनीय एवं सराहनीय ग़ज़ल-संग्रह है। नव रचनाकारों के लिए यह संग्रह प्रेरक हो सकता है। हिन्दी शिक्षण संस्थान, जोधपुर द्वारा प्रकाशित 112 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 250 रुपये है।


रचनाधर्मिता का परिचायक काव्य संग्रह


 ‘मैं कविता हूं’ शीर्षक पुस्तक में कवियत्री नीना मोहन श्रीवास्तव की 62 काव्य-रचनाएं संग्रहीत हैं। कथ्य की दृष्टि से इनके वर्ण्य-विषय में वैविध्य है। संग्रह में छन्द रहित एवं छंदबद्ध, दोनों ही प्रकार की कविताएं सम्मिलित हैं। कथ्य की दृष्टि से पुस्तक में विविध विषय, भावानुभाव एवं अंतर्मन की अभिव्यक्तियां समाहित हैं। ‘गणेश वन्दना’ एवं ‘सरस्वती वन्दना’ रचनाओं से पुस्तक का प्रारम्भ किया गया हैं। इसमें ‘देशगीत’, ‘तिरंगा’, ‘निराला देश है मेरा’ आदि देशभक्तिपरक कविताएं हैं तथा ‘गुलमोहर’, ‘ऋतुराज बसंत’, ‘चीर हरित वसुधा’, ‘गगन का चाँद’ आदि के माध्यम से प्रकृति-चित्रण किया गया है। ‘समय चक्र’, ‘जीवन धारा’, ‘ये जो ज़िन्दगी है’, ‘वक्त’ आदि रचनाओं के द्वारा जीवन को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। ‘मन’, ‘कसक’, ‘पीड़ा’, ‘विश्वास’ शीर्षक कविताएं भी इसी कोटि की हैं। इसके अतिरिक्त नारी विमर्श को भी महत्त्व प्रदान किया गया है, यथा- ‘निर्भया’, ‘नारी क्यों मौन हो तुम’, ‘हां, मैं ही सिन्धु’, ‘मैं ना हारी’, ‘बेड़ी’ आदि रचनाएं नारी की पीड़ा एवं उसके अन्तःकरण की अभिव्यक्तियों को प्रतिबिम्बित करती हैं।

 रचनाओं की भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है, जिसमें हिन्दी की तत्सम शब्दावली एवं कुछ संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग किया गया है। भाषा-व्याकरण के अनुसार ‘प्रीति दिखाया है- रीत निभाया है’ (पृ.-81) जैसे वाक्यांश दोषयुक्त हैं। ‘अमलतास’ शीर्षक कविता में ‘तुम’ के साथ ‘तेरी’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जो निषिद्ध है (पृ.-79)। रचनाओं में ‘न’ के स्थान पर ‘ना’ का प्रयोग शुद्ध नहीं माना जाता है। पुस्तक में संग्रहीत रचनाओं के कुछ अंश प्रस्तुत हैं-व्यथित यामिनी तिमिर घना है/नवल प्रभात खिलेगा ही/धूप कड़ी आयेगी सन्ध्या/शीतल मलय चलेगी ही। (सुख की आहट)। टूटी जब भी आशा मन की/आहत उतनी बार हुआ है/हंसना चाहा जब भी मैंने/आहों से सत्कार हुआ है (आहें)। नहीं बदली अगर यह दुर्दशा तो/खड्ग की धार बन कर तनी हंूं/चीर देने को तम का हरेक बंधन/दामिनी की धमक बन कर चली हूं (हां, मैं ही सिन्धु,)। मांग सजाये कड़ी दुपहरी किसे जोहती गुलमोहर/हरी चुनर में पुष्प लाल हैं करे प्रतीक्षा गुलमोहर। (गुलमोहर)। कमल पुष्प पर ऊषा काल में/लेटी चमक बिखेरे हुए/राह निहारी भानु किरण की/सुध‘-बुध को बिसराते हुए। (तुहिन)।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कवयित्री की सृजनशीलता एवं रचनाधर्मिता सराहनीय है, जिसका परिचायक यह काव्य संग्रह है। राका प्रकाशन, प्रयागराज द्वारा प्रकाशित 128 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 250 रुपये है।


विसंगतियों को चित्रित करती लघुकथाएं


‘पहला वेतन’ पुस्तक रचनाकार केदारनाथ ‘सविता’ की 64 छोटी-बड़ी लघुकथाओं एवं कहानियों का संग्रह है। कहानियों कें कथ्य के अंतर्गत कहानीकार द्वारा आम आदमी की समस्याओं, समाज के लोगों का खोखला चरित्र,, क्रूरताओं, ग़लत परंपराओं और विश्वासघातों की जांच-पड़ताल कर समाज को दर्पण दिखाकर उसे एक नयी राह दिखाने तथा मध्यमवर्गीय परिवारों का विघटन, भौतिकता की चकाचौंध, समाज का दोहरा चरित्र आदि सामाजिक विसंगतियों का चित्रण कर समस्याओं का समाधान खोजने की चेष्टा की गयी है। वर्तमान समय ने सामाजिक और मानवीय रिश्तों को प्रभावित कर उन्हें विघटित-सा कर दिया है। रिश्तों और संबंधों की समूहवादी चेतना व्यक्तिवादी चेतना में बदलती जा रही है। मनुष्य आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। रिश्तों की मजबूत डोर कमजोर होकर टूटती-सी जा रही है। समाज में इस प्रकार की की मनःस्थिति एवं उससे उत्पन्न पीड़ा का भी चित्रण लघुकथाओं तथा कहानियों में किया गया है। वर्तमान परिवेश के अनेक बड़े सामाजिक प्रश्नों को सम्मुख लाने एवं उनसे जूझने का एक प्रयास लघुकथाओं में परिलक्षित होता है।

  ‘पहला वेतन’ लघुकथा मध्यमवर्गीय परिवारों कें विघटन को दर्शाती है, जहां बेटा अपने बूढ़े बाप से दूरी बना लेता है। ‘हल्के आभूषण’ दहेज प्रथा पर एक प्रहार-सा है। ‘दवा’ कहानी में मरीज़ों की जान से खिलवाड़ करने वाले चिकित्सकों को आइना दिखाने का प्रयास किया गया है। ‘हनुमान जी की कृपा से’ लघुकथा में लोगों में व्याप्त अन्धविश्वास एवं अज्ञान को दर्शाया गया है। ‘चुनावी हथकंडे’ गांवों तक पहुँच चुकी सियासत की गन्दगी का चित्रण करती र्है। इस प्रकार सभी कहानियां किसी न किसी समस्या को प्रदर्शित करती हैं। इन कहानियों में रचनाकार द्वारा सरल, सहज और साधारण बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। इस प्रयास में भाषा में कहीं-कहीं अ-स्तरीयता उत्पन्न हो गयी है तथा इस प्रकार की भाषा साहित्यिकता से काफ़ी दूर होती गयी है। रचनाकार ने सृजनात्मकता को ध्यान में रखते हुए लघुकथाओं तथा कहानियों में अपने सचाई बयान करने का सम्पूर्ण प्रयास किया है। संग्रह की लघुकथाएं रचनाधर्मिता के प्रति आश्वस्त करती हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि पुस्तक पठनीय है तथा रचनाकार की रचनाधर्मिता सराहनीय है। 128 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 300 रुपये है, जो हिन्दी श्री पब्लिकेशन, सन्त रविदासनगर द्वारा प्रकाशित की गयी है।

मनोभावों की अभिव्यक्ति का सराहनीय सृजन



 ‘गहवर’ शीर्षक कविता-संग्रह की रचनाकार डॉ. मधुबाला सिन्हा हैं, जिसमें उनकी 51 कविताएं सम्मिलित हैं। इन कविताओं का वर्ण्य विषय प्रमुखतः श्रृंगार एवं प्रणय है, साथ ही वर्तमान समाज, जीवन की अनुभूतियों तथा संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों, स्त्री की व्यथा-कथा, उसके अन्तर्मन के मनोभावों आदि का चित्रण भी इनमें किया गया है। संकलन की कविताओं को यदि शिल्प की दृष्टि से देखा जाए, तो इनमें काव्य एवं छन्दानुशासन का नितान्त अभाव परिलक्षित होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि काव्य व्याकरण एवं छन्द शास्त्र को नज़रअन्दाज़ कर रचनाओं को किसी प्रकार से काव्य-रूप देने का प्रयास किया गया है। 

 संग्रह की कुछ कविताओं के अंश प्रस्तुत हैंः- मैं स्त्री हूं- स्त्री हंू/ हां, गर्व है मुझे कि मैं स्त्री हूं/सृष्टि के आदि से ही/उज्ज्वलता की किरण हूं/हां, क्योंकि मैं स्त्री हूं। क्यों छोड़ंू- क्यों छोड़ूं मैं/उस जीवन को जो देता है ख़ुशी आशीष प्यार/अपनत्व भरे अपनों का इज़हार। जिंदगी- ऐ जिंदगी, खुशनसीब है तू/मत कह खुद को कंगाल। नारी हूं- पर शोषित अब मैं नहीं बनूंगी/धार उलट के दिशा बहूंगी। क्या पता है तुम्हें?- जैसे रह जाती हैं आत्माएं/इंसान के जाने के बाद भी/वैसे ही रह जाएगा/मेरा और तुम्हारा प्रेम/और प्रेम का एहसास भी। 

 रचनाओं में अधिकतर सरल एवं सहज शब्दों का प्रयोग किया गया है, किन्तु कुछ स्थानों पर भाषा व्याकरण, वाक्य विन्यास, वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ पाठक के समक्ष आती हैं। यथा- दिग्भर्मित, खण्डर, सम्भालते, बनाईए, गहराईयों आदि (अशुद्ध वर्तनी)। तुझीको, बिखरी ढेरों में, सर्पीली मोड जैसे शब्दों के अशुद्ध प्रयोग तथा हर रस्म निभे अपनो का, लकड़ी फिर उसमें सुलगाया, हर रिश्ते अकेले पड़ने लगे हैं जैसे वाक्यांशों में व्याकरणिक अशुद्धियाँ दृष्टिगत होती हैं। अनुस्वार सम्बन्धी त्रुटियां तो अनेक स्थानों पर हैं। पुस्तक का शीर्षक ‘गहवर’ है, जो स्वयं में एक अशुद्ध शब्द है। शब्दकोश के अनुसार शुद्ध शब्द ‘गह्वर’ है, जिसका अर्थ होता है गुफा। हमरूह पब्लिकेशन हाउस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 108 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 199 रुपये है।

भारत की महान विभूतियों का परिचय


 चित्रकार एवं लेखक विनय कुमार दुबे की पुस्तक शब्द-रंग में 101 भूले बिसरे साहित्य मनीषियों, हिन्दी सेवियों, साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों तथा राजनीतिज्ञों के चित्र उनकी परिचयात्मक टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत किये गये हैं। ऐसा करके रचनाकार ने उन महान विभूतियों की छवियों तथा उनके कृतित्व को मूर्तिमान रूप देने का प्रयास किया है। पुस्तक के इस प्रथम भाग में 101 दिवंगत साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, निबन्धकारों, पत्रकारों तथा कुछ अन्य भाषा के उन्नायकों के व्यक्ति-चित्र एवं परिचय को सम्मिलित किया गया है। 

 इस पुस्तक में सम्मिलित कुछ व्यक्तित्वों तथा महान विभूतियों के नाम इस प्रकार से हैं- फ़ारसी के कवि- अमीर खुसरो, सन्त रविदास। हिन्दी के साहित्यकार कवि- कबीरदास, मलिक मुहम्मद ‘जायसी’, मीराबाई, महाकवि गंग, सूरदास, नरोत्तमदास, गोस्वामी तुलसीदास, अब्दुल रहीम खानखाना,रसखान, आचार्य केशवदास, सन्त मलूकदास, बिहारीलाल, भूषण, महाकवि देव, गिरिधर कविराज, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, जगन्नाथदास रत्नाकर, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पन्त, सोहनलाल द्विवेदी, महादेवी वर्मा, नागार्जुन, राहुल सांकृत्यायन, गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’, डॉ. धर्मवीर भारती। गद्यकार- राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’, बाबू देवकीनन्द खत्री, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, बालकृष्ण भट्ट, भारतेन्दं हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, डॉ. श्यामसुन्दर दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बाबू गुलाबराय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा। कहानी एवं उपन्यासकार- मुंशी प्रेमचन्द, वृन्दावन लाल वर्मा, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, अमुतलाल नागर, फणीश्वरनाथ रेणु। हिन्दी के अनन्य सेवक- सुब्रह्मण्य भारती, फ़ादर कामिल बुल्के। पत्रकार- बाबूराव विष्णु पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी। अन्य विभूतियाँ- दयानन्द सरस्वती, महामना पं0 मदन मोहन मालवीय, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गान्धी, राजर्षि पुरूषोत्तमदास टुडन, डॉ. सम्पूर्णानन्द, जय प्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया आदि।

 पुस्तक के कथ्यात्मक लेखन में यत्र-तत्र भाषाई व्याकरण तथा वर्तनीगत अशुद्धियां परिलक्षित होती हैं साथ ही प्रूफ़ सम्बन्धी त्रुटियां भी हैं, यथा- ना-ना विषयोन्मुख, निहारे/निहारें, श्वांस, अभित्सिंचित, चेष्ठा, श्रद्धांजली, क्रितित्व, नामोलेख, अतिसयोक्ति, नजरबंध आदि। 

कहा जा सकता है कि 101 विभिन्न भारतीय विभूतियों का परिचय एक साथ प्राप्त करने के दृष्टिकोण से यह यह एक उपयोगी पुस्तक है। लेखक द्वारा श्रमपूर्वक कार्य करके इसकी सामग्री जुटायी गयी है। इस दृष्टि से पुस्तक को राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार प्रसार में एक महत्त्वपूर्ण योगदान की भाँति माना जा सकता है। पुस्तक को एवं लेखक के श्रम को सराहनीय कहा जाएगा। 126 पृष्ठों की इस पुस्तक में इसके प्रकाशक एवं मूल्य का उल्लेख नहीं किया गया है।


प्राचीन छन्द कुण्डलिया की सराहनीय पुस्तक



 पुस्तक ‘मेरी प्रिय कुण्डलियां’ में रचनाकार डॉ. राकेश ‘चक्र’ की 321 रचनाएं संग्रहीत हैं। पुस्तक 15 विषयों में विभक्त की गयी है, जिनमें प्रकृति, प्रेम, भ्रष्टाचार, भ्रूण हत्या-दहेज, चुनाव राजनीति, प्रेम भक्ति/अध्यात्म, दर्शन, हास परिहास आदि सम्मिलित हैं। जन जीवन से जुड़े इस प्रकार के विविध विषयों पर रचनाओं के माध्यम से हमारे आज के समाज की विकृतियों, विद्रूपताओं, राजनैतिक पाखण्ड आदि पर प्रहार करते हुए प्रेम, अघ्यात्म, सकारात्मकता तथा सुविचार जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना पर बल प्रदान किया गया है। पुस्तक की रचनाएँ आज के परिवेश का चित्रांकन करते हुए समाज को जोड़ने की बात करती हैं।

कुण्डलियों में प्रयुक्त भाषा सरस, सुबोध एवं भावानुकूल प्रकार की है, जिसमें हिन्दी के तत्सम, तद्भव तथा  देशज शब्दों के साथ-साथ दैनिक बोलचाल के उर्दू- अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग भी सम्मिलित है। ‘टन्न’ (कुण्डलिया सं.-108) जैसे नितान्त व्यावहारिक शब्द पाठक से तादात्म्य स्थापित करते हैं। पुस्तक की रचनाओं के कुछ अंश प्रस्तुत हैं- ’बीवी अच्छी वो लगे, रखे सदा घर टन्न/पति से मिलने पर सदा, मन को रखे प्रसन्न/मन को रखे प्रसन्न, बात खाने की पूछे/मीठे-मीठे बोल सुनाकर पति पर रीझे/कहे चक्र’कविराय, मिले बस ऐसी बीवी/अच्छी जिसकी सोच, वही सुन्दर है बीवी।’  ‘फैशन के इस दौर में कपड़े दिए उतार/खुले हुए तन से बहे, मस्ती की रस धार/मस्ती की रस धार, नहावैं दौलत वाले/चेहरे उजले लगें, मगर अन्दर से काले/कहे ‘चक्र’ कविराय, बढ़े फैशन के लैशन/संसाधन भी बढ़े, कि चहुंदिश छाया फैशन।’ 

  कुण्डलिया का छन्द-विधान विशिष्ट प्रकार का होने के कारण इससे अनभिज्ञ रचनाकार प्रायः दोषपूर्ण कुण्डलिया रच देते हैं। इस पुस्तक के रचनाकार ने यथासम्भव इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए छन्द की शर्तों के पालन का प्रयास किया है। बावजूद इसके कुछ दोहे तथा रोला छन्द-दोषयुक्त हो गये हैं, जिसके कारण इन कुण्डलियों के पठन में लयात्मकता तथा प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है। यथा- मकर संक्रान्ति (कुण्डलिया सं. 10), जन्म सरस्वती मां का (कुण्डलिया सं. 14), अच्छी नियुक्ति (कुण्डलिया सं. 42) आदि। कुण्डलिया सं. 192, 194, 195, 266 आदि में प्रथम तथा अन्तिम शब्द सम्बन्धी आंशिक दोष दृष्टिगत होता है। कुछ रचनाओं (कुण्डलिया सं. 9, 11 आदि) के अन्त में गुरू-लघु आया है, जो निषिद्ध माना जाता है। ‘दिग्गंत’ तथा ‘अनेकों’ (कुंडलिया संत्र 14, 145) जैसे प्रयोग भाषा-व्याकरणिक दृष्टि से अशुद्ध हैं तथा ‘झूमीं’ (कुण्डलिया सं. 1) जैसे शब्दों में अनुस्वार सम्बन्धी दोष है। तथापि, कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पुस्तक पठनीय है तथा लेखक की रचनाधर्मिता एवं सृजनशीलता सराहनीय है। आर.के.पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 144 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 700 रुपये रखा गया है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)


सोमवार, 8 जून 2026

‘देश को आज़ाद कराने में अख़बारों की मुख्य भूमिका’

‘हिन्दी पत्रकारिता के 200 साल’ पर बोले न्यायमूर्ति अशोक कुमार

सम्मान प्राप्त करने के बाद का ग्रुप फोटो

प्रयागराज। 21वीं सदी की पीढ़ी अख़बारों से दूर हो रही है। हमारे समय में सामान्य ज्ञान बेहतर करने के लिए अख़बार पढ़ना ज़रूरी हुआ करता था। आज अख़बार और मीडिया भी बिल्कुल बदल गया है। आज का मीडिया पीजा और बर्गर की तरह हो गया है, अजीब-अजीब की तरह ख़बरें ख़ास तौर सोशल मीडिया पर देखने को मिलती हैं। शायद इस वजह से भी लोग मीडिया से दूर हो रहे हैं। 1947 से पहले देश को आज़ादी दिलाने में अख़बारों का मुख्य योगदान रहा है। यह बात राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक कुमार ने कही। कार्यक्रम का आयोजन 07 जून को प्रयागराज के बाल भारती स्कूल में किया गया।

गुफ़्तगू के जून-2026 अंक का हुआ विमोचन

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडी सेंटर के कोआर्डिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कहा कि इलाहाबाद ही ऐसा शहर है, जिसने महात्मा गांधी तक को पत्रकार बना दिया। ट्रेन छूट जाने पर महात्मा गांधी इलाहाबाद स्थित पॉयनियर अख़बार के दफ्तर पहुंचे थे, संपादक से इंटरव्यू छापने का कहा। संपादक ने उन्हें लिखकर दे जाने को बोला। गांधी जी तब 17 पेज का लेख वहीं बैठकर लिखा। लेख देने पर अख़बार ने नहीं छपा। बाद में वही लेख महात्मा गांधी की किताब ‘ग्रीन बुक’ के नाम से छपी। उन्होंने कहा कि कोलकाता से ‘उदन्ड मार्त्तण्ड’ अख़बार शुरू करने वाले पं. जुगल किशोर शुक्ल हमारे उत्तर प्रदेश के कानपुर के ही रहने वाले थे।

वरिष्ठ पत्रकार लईक़ रिज़वी ने कहा कि देश का पहला उर्दू अख़बार इलाहाबाद से ही मुंशी सदासुख लाल ने ‘बुद्धि प्रकाश’ से निकाली थी। इलाहाबाद का पत्रकारिता से बहुत ख़ास रिश्ता रहा है।

जुगल किशोर शुक्ल सम्मान प्राप्त करते बलराम दीक्षित

डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने कहा कि इलाहाबाद साहित्य और पत्रकारिता का मुख्य केंद्र रहा है। यहां के तमाम पत्रकार आज देश की प्रमुख मीडिया में बड़े पदोें पर हैं। ऐसे में ‘हिन्दी पत्रकारिता के 200 साल’ पर कार्यक्रम होना बेहद ज़रूरी था।

जुगल किशोर शुक्ल सम्मान प्राप्त करते मोहम्मद ताहिर

नई दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार रविकांत ने कहा कि पहले के संपादक विज्ञापन का दबाव बर्दाश्त नहीं करते थे, देश की आज़ादी और भलाई के लिए जी-जान से काम करते थे। वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र ने कहा कि पत्रकारिता का स्वरूप एकदम से बदल गया है। विज्ञापन को ध्यान में रखकर अगर संपादक काम नहीं करेगा तो अख़बार कैसे छपेगा। अख़बार चलाने का खैरात देना समझना गलत है। अपने हितों की रक्षा तो करनी पड़ेगी। 

जुगल किशोर शुक्ल सम्मान प्राप्त करते संजय मिश्र

इस दौरान पांच लोगों को ‘जुगल किशोर शुक्ल सम्मान’ प्रदान किया गया साथ ही ‘गुफ़्तगू’ के नये अंक का विमोचन किया गया। कार्यक्रम का संचालन मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ ने और धन्यवाद ज्ञापन गुफ़्तगू के सचिव नरेश महरानी ने किया। दूसरे दौर में कवि सम्मेलन और मुशायरा का आयोजन किया गया।

जुगल किशोर शुक्ल सम्मान प्राप्त करते अनिल सिद्धार्थ


 डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी, नीना मोहन श्रीवास्तव, धीरेंद्र सिंह नागा, शिवाजी यादव, अफ़सर जमाल, हकीम रेशादुल इस्लाम, डॉ. सोमनाथ शुक्ल, आसिफ़ उस्मानी, डॉ. एस.एम. अब्बास, मंजुलता नागेश, अर्चना जायसवाल ‘सरताज’, रचना सक्सेना, संजय सक्सेना, सुनील दानिश, प्रभाशंकर ‘प्रयागी’, केशव सक्सेना, शिबली सना, शाहीद खूश्बू आदि ने कलाम पेश किया।

जुगल किशोर शुक्ल सम्मान प्राप्त करते योगेंद्र कुमार मिश्र




गुरुवार, 4 जून 2026

01 अक्तूबर 1950 से शुरू हुआ ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’

एचटी मीडिया ग्रुप की इस पत्रिका के पहले संपादक थे मुकुट बिहारी वर्मा 

एक प्रति का मूल्य ’तीन आना’ था, नौ रुपये में मिलती थी पूरे वर्ष पत्रिका

                                                                    - डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी

 देश से प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का ख़ास स्थान रहा है। 1950 के दशक में पत्रिकाएं खूब पढ़ी जाती थीं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के प्रकाशन के साथ ही इसकी प्रतिस्पर्धा ‘धर्मयुग’ से शुरू हुई थी। देश के लगभग सभी बड़े लेखक इन पत्रिकाओं में छपते थे। नये लोगों की रचना का इसमें प्रकाशन हो जाना किसी सपने से कम नहीं था। इन पत्रिकाओं में छपने वाले ‘पाठकों के पत्र’ में भी छप जाना ख़ास अहमियत रखता था। पत्र छप जाने पर ही नये लोग अपने को लेखक मानने लगते थे, फूले नहीं समाते थे। 26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू होने के लगभग आठ महीने बाद ही इसका पदार्पण हुआ और देशभर में यह पत्रिका छा गई।

साप्ताहिक हिन्दुस्तान का कवर पेज

 नई दिल्ली में एचटी मीडिया ग्रुप से शुरू हुई इस पत्रिका के प्रबंधक देवी प्रसाद शर्मा और पहले संपादक मुकुट बिहारी वर्मा थे। 01 अक्तूबर 1950 को छपे पहले अंक में जैनेंद्र कुमार का लेख ‘हम कहां क्यों ?’ और ‘गांधी जी बापू क्यों ?’ शीर्षक से बनारसी दास चतुर्वेदी का लेख प्रकाशित हुआ। इसी अंक के पेज नंबर पांच पर एक चित्र प्रकाशित हुआ था। इस चित्र में गिरधारी कृपलानी और श्रीमती कृपलानी के नवजात शिशु को महात्मा गांधी आशीर्वाद दे रहे हैं। इसी अंक के पेज नंबर 23 पर महात्मा गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु का चित्र छपा था। 08 अक्तूबर 1950 के दूसरे अंक के पेज नंबर एक पर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का गीत और पेज तीन पर सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘आवाहन’ प्रकाशित हुई थी। तब पत्रिका की एक प्रति का मूल्य मात्र तीन आना था, छह महीने की सदस्यता शुल्क पांच रुपये और एक वर्ष का नौ रुपये था।

साप्ताहिक हिन्दुस्तान के पहले का पहला पेज


 01 अक्तूबर 1950 के अंक में यह संदेश प्रकाशित हुआ था-‘‘गांधी जयंती के अवसर पर गांधी जी के जीवन की प्रमुख विशेषताओं की पुनरावृत्ति करना या उनकी प्रार्थना सभाओं में दिए गए बहुमूल्य संदेशों की फिर चर्चा करना कोई नई बात नहीं होगी। यह संदेश तो आज भी देश के कोने-कोने में हर स्त्री, पुरुष और बच्चों के दिल में गूंज रहे हैं। अतः यहां हम एक दूसरे महापुरुष -- गोपाल कृष्ण गोखले -- के उन उद्गारों को उद्घृत कर रहे हैं, जो उन्होंने गांधी जी के प्रति आज से 38 वर्ष पूर्व सन 1912 में व्यक्त किए थे, जब इन पंक्तियों के अधिकांश पाठक या तो नन्हें बच्चे थे या जन्मे ही नहीं थे। बहुतों के लिए तो यह पंक्तियां बिल्कुल नई होंगी और जो इनसे परिचित हैं, उन्हें इनका पुनः पारायण करने में आनंद आएगा। गंाधी जी के संबंध में इनसे अधिक प्रशंसात्मक शब्दों का प्रयोग आज तक किसी ने नहीं किया। फिर भी भारतीय जनता जानती है कि गोखले से बढ़कर शांत और अधिक संतुलित व्यक्ति देश में और कोई नहीं हुआ। यह देशभक्त 1912 में दक्षिण अफ्रीका गया था, जबकि भारतीय प्रवासियों का जनरल बोथा तथा स्मट्स की गोराशाही से भयंकर संग्राम चल रहा था। यह भाषण गोखले जी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटकर लाहौर में भारतीय कांग्रेस के 24वें अधिवेशन के अवसर पर दिया था। उसे यहां प्रकाशित करने का केवल यही कारण नहीं है कि उसमें गांधी जी के प्रति कुछ अमर उद्गार व्यक्त किए गए हैं। बल्कि यह भी कि उनका आज की दक्षिण अफ्रीका संबंधी समस्त समस्या से घनिष्ठ संबंध हैं। गोखले जी अपने समय के एक महान राजनैतिक नेता था और सार्वजनिक रंगमंच पर तथा शाही धारा सभा के भीतर दिए गए उनके भाषणों से अपने को धर्मात्मा मानने वाले ब्रिटिश शासकों का अहंकार उतना ही विचलित हो उठा था, जितना रानाडे, तिलक, अरविंद घोष और लाजपत राय जैसे अन्य समकालीन तथा बाद के नेताओं के कार्य से। कुछ भाषण, जिनका श्री नटेसन ने संग्रह किया है, बड़ा ही जोखि़म उठाकर दिए गए थे, क्योंकि उनसे लार्ड कर्जन जैसे शक्तिशाली व्यक्ति के अप्रसन्न होने की निरंतर आशंका बनी रहती थी।’’

हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संग्रहालय में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ की फाइल देखते डॉ. इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और दुर्गानंद शर्मा।

इस पत्रिका के एक अंक में 26 जनवरी 1950 को उप प्रधानमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल द्वारा दिया गया यह संदेश प्रकाशित हुआ था-‘‘आज से ठीक 20 वर्ष पूर्व हमने पूर्ण स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा की थी। इस प्रतिज्ञा के पीछे संपूर्ण जनता का निश्चय तथा बल छिपा था। 15 अगस्त 1947 को मिली स्वतंत्रता अधूरी थी। ईश्वर की कृपा से आज हमारी प्रतिज्ञा पूर्ण हो गई। इस महान अवसर पर हमें अपने राष्ट्रपिता की याद आना स्वाभाविक है। 

07 जनवरी 1951 के अंक में छपा यह चित्र इलाहाबाद के बमरौली हवाई अड्डे का है। सरदार बल्लभ भाई पटेल का अस्थिपात्र हाथ में लिए खड़े हैं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद।

वे यहां अनुपस्थित रहकर भी ऊपर से अपना आशीर्वाद हमें दे रहे रहे हैं। आज का दिन भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। विदेशी सत्ता की समाप्ति के साथ हमें वास्तविक स्वतंत्रता मिल गई है, हम अब अपने भाग्यविधाता हैं। पुनर्निर्माण के लिए हमें अभी अनेक बलिदान करने पड़ेंगे। अतः हम उत्सव की गंभीरता को समझकर कठोर परिश्रम करें। ईश्वर हमारी सहायता करेगा।’’ यह संदेश आज भी हमारे लिए अनुकरणीय है।

साप्ताहिक हिन्दुस्तान के पहले अंक में प्रकाशित चित्र। इसमें गिरधारी कृपलानी और श्रीमती कृपलानी के नवजात शिशु को महात्मा गांधी आशीर्वाद दे रहे हैं।

साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 07 जनवरी 1951 के अंक में एक चित्र प्रकाशित हुआ था, जिसमें इलाहाबाद के बमरौली हवाई अड्डे पर सरदार बल्लभ भाई पटेल का अस्थिपात्र हाथ में लिए खड़े हैं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद। 29 अप्रैल 1951 के अंक में मासिक पत्रिका ‘जीवन साहित्य’ का विज्ञापन प्रकाशित है, इस पत्रिका के संपादक के तौर पर हरिभाऊ उपाध्याय और यशपाल जैन का नाम छपा है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान के 12 जनवरी 1992 के अंक में सआदत हसन मंटो के बारे में देवेन्द्र इस्सर का लेख ‘उर्दू का वह युगांतरकारी कहानीकार था’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इस लेख में मंटो की कहानियों की शानदार ढंग से समीक्षा की गई है। साथ ही मंटो की लेखन-शैली का भी उल्लेख किया गया है। 12 अप्रैल 1992 के अंक में मनोहर श्याम जोशी का लेख ‘अमूर्त कला: भ्रांतियां और सच्चाई’ प्रकाशित हुआ था। 

08 अक्तूबर 1950 के अंक में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का गीत।


08 अक्तूबर 1950 के अंक में सुमित्रानंदन पंत की कविता।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में मीडिया स्टडी सेंटर के को-ऑडिनेटर डॉ. धनंजय चोपड़ा बताते हैं-‘‘1977 के बाद 80 के दशक में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के अलावा ‘रविवार’ और ‘दिनमान’ नामक साप्ताहिक पत्रिकाएं भी निकलती थीं। लेकिन इनमें साप्ताहिक हिन्दुस्तान ही पारिवारिक पत्रिका थी। इसमें हर तरह का स्वाद मौजूद था। बेहतरीन प्रस्तुति थी। कई बड़े उपन्यासों के धारावाहिक भी इसमें प्रकाशित हुए। हम बड़े चाव से इसे पढ़ते थे।’’ वरिष्ठ पत्रकार स्नेह मधुर के मुताबिक-एक साप्ताहिक पत्रिका का इस तरह से प्रकाशन होना गौरव की बात थी। बड़े-बड़े विद्वान लेखक इसमें छपते थे। धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान में आपस में जबरदस्त मुकाबला भी था। वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय कहते हैं-‘‘हिन्दुस्तान की पत्रकारिता में एक तरह जबरदस्त बदलावा आ गया था। अख़बारों की पत्रकारिता के साथ अब साहित्यिक पत्रकारिता का दौर शुरू हो गया था। ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं ने लोगों को बताया कि साहित्यिक पत्रकारिता की अलग ही धारा है। साप्ताहिक हिन्दुस्तान को पढ़ने वाले देश के कोने-कोने में मौजूद थे। बड़े-बड़े लेखकों को इस पत्रिका में स्थान मिलता था। साहित्य के अलावा अन्य विषयों को भी पर्याप्त स्थान मिलता रहा। 80 से लेकर 90 के शुरूआती दशक तक पत्रिकाओं का खूब बोलबाला था।’’

साप्ताहिक हिन्दुस्तान में यह चित्र भी प्रकाशित हुआ।

 इस पत्रिका के पहले संपादक मुकुट बिहारी वर्मा थे। इनके बाद क्रमशः बांके बिहारी भटनागर, मनोहर श्याम जोशी और मृणाल पांडेय इसकी संपादक रहे हैं। 10-16 मई, 1992 का अंक ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का अंतिम पड़ाव था। इसके बाद यह पत्रिका बंद कर दी गई।


(गुफ़्तगू के जनवरी-मार्च 2026 अंक में प्रकाशित )