रविवार, 6 जनवरी 2013

अभिव्यक्ति की कार्यशाला हैं ‘निशीथ’ की कवितायें


                                                   इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
गुफ्तगू पब्लिकेशन ने हाल ही में डा. नन्दा शुक्ला का काव्य संग्रह ‘निशीथ’ का प्रकाशन किया है। डा. शुक्ला नई कवयित्री हैं, इसी संग्रह के जरिये उन्होंने साहित्य की दुनिया में पर्दापण किया है। इन्होंने अपनी पुस्तक इस भले ही अब प्रकाशित करवाई है लेकिन इसमें शामिल रचनायें उनके छात्र जीवन की हैं। पुलिस विभाग ज्वाइन करन के बाद इन्होंने कवितायें फिर लिखना शुरू कर दिया है। नौकरी में आने के बाद लिखी गई उनकी कविताओं का संग्रह भी शीध्र ही सामने आएगा है। जहां तक ‘निशीथ’ का सवाल है तो इसमें शामिल रचनाओं को एक स्कूली छात्रा की कविताओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए। जाहिर है छात्र जीवन में कोई भी उतना संवेदनशील नहीं होता, जितना कि नौकरी और दांपत्य जीवन में आने और दुनियादारी से रूबरू होने के बाद होता है। कथ्य और शिल्प के स्तर पर बहुत परिपक्वता भले ही इनकी कविताओं में नहीं हैं, लेकिन इतना तो तय है कि इन्होंने अपनी संवेदना को व्यक्त करने में न तो कोई ढिलाई बरती है और न ही संकोच किया है। अपने आसपास की चीज़ों को जैसे जिस रूप देखा और महसूस किया है, उसे बिना किसी लाग-लपेट के व्यक्त कर दिया है, कहीं-कहीं अपनी कविताओं के जरिए उपदेश देते हुए दिख रही हैं, जो उनके बालमन की अभिव्यक्ति ही की जाएगी। अन्य महिला रचनाकारों की तरह इनकी कविताओं में भी महिलाओं की तकलीफें, एहसास और अपने महिला होने की बात बार-बार दिखाई पड़ रही हैं। कहती हैं-
जीवन में रहा नहीं अब कोई भाव विशेष/न रही जीवन आकांक्षा शेष
बचा नहीं जीवन का कोई अवशेष/तिमिर में सिमिट गया ये जीवन शेष

अगर इन कविताओं के नसीब में भूरी-भूरी प्रसंशा नहीं है तो इन्हें रद्दी की टोकरी में भी नहीं फेंका जा सकता है। क्योंकि नन्दा शुक्ला की रचनात्मकता ही आगे चलकर साहित्य के सरोकारों को उल्लेखित करेंगी और अपने अनुभवों-शिल्पों के ज़रिये साहित्य का अभिन्न अंग बन सकती हैं। इसलिए हमें इनकी शुरूआती दिनों में लिखी गई इन कविताओं को इसी रूप स्वीकार करते हुए इनके लिए आगे का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए, और उम्मीद की जानी चाहिए कि एक अच्छी कवयित्री बनकर नन्दा शुक्ला ज़रूर देश के पटल पर अवश्य उभरेंगी। इनके कहन का एक अन्य अंदाज देखें-
हर दर्द हर इंसा को सहना है/सह कर भी चुप रहना है
कितने तूफानों से घिरे रहे/हर तूफां को अंदर ही बंद रखना है।

मानव जीवन की व्याख्या अपनी दृष्टि इन्होंन इस तरह किया है-
ये वीरान सा प्रागंड़/ये खंडहर होते भाव
ये कुछ और नहीं/मानव मन का नीरव अहसास।

कुल मिलाकर यह ज़रूर कहा जाना चाहिए कि नयी प्रतिभाओं में उर्जा भरने के लिए उनका उत्साहवर्धन ज़रूर किया जाना चाहिए साथ ही उनकी रचनाधर्मिता की बेहतरी के लिए उचिता मार्गदर्श
भी किया जाना बेहद ज़रूरी है।
पुस्तक का नाम- निशीथ
कवयित्री: डा. नन्दा शुक्ला
मूल्य: पेपर बैक 40 रुपये, सजिल्दः 60 रुपए
पेज: 64
प्रकाशक: गुफ्तगू पब्लिकेशन, इलाहाबाद
ISBN- 987-81-925218-1-7

                                                        

2 टिप्पणियाँ:

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

डॉ ० नंदा शुक्ल एक होनहार कवयित्री हैं |उनको बहुत -बहुत बधाई |प्रकाशन के क्षेत्र में पदार्पण करने के लिए आपको बधाई और शुभकामनायें |

drnanda shukla ने कहा…

बहुत-2 धन्यबाद ।अभी कम्प्यूटर मे क ख ग लिख रहें हैं ।

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