गुरुवार, 17 जनवरी 2013

अमवसा क मेला: कैलाश गौतम


ई भक्ति के रंग में रंगल गांव देखा
धरम में करम में सनल गांव देखा
अगल में बगल में सगल गांव देखा
अमवसा नहाये चलल गावं देखा।
एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा
अ कान्ही पर बोरी, कपारे पर बोरा
अ कमरी में केहू, रचाई मं केहू
अ कथरी में केहू, दुलाई में केहू
अ आजी रंगावत हई गोड़ देखा
घुंघटवैसे पूछै पतोहिया कि अइया
गठरिया में अबका रखाई बतइहा
एहर हउवै लुग्गा ओहर हउर्व पूड़ी
रमायन के लग्गे हौ मड़ुवा क ढ़ूढी
ऊ चाउर अ चिउरा किनारे के ओरी
अ नयका चपलवा अंचारे के ओरी
अमवसा के मेला अमवसा क मेला
इहै हउवै भइया अमवसा क मेला
मचल हउवै हल्ला चढ़वा उतारा
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा
एहर गुर्री गुर्रा, ओहर लोली लोला
अ बिच्चे में हउवै शराफ़त से बोला
चपायल हो केहू, दबायल हो केहू
अ घंटन से उप्पर टंगायल हौ केहू
केहू हक्का बक्का, केहू लाल पीयर
केहू फनाफनात हउवै कीरा के नीयर
अ बप्पारे बप्पा, अ दइया रे दइया
तनी हमैं आगे बढ़ै देत्या  भइया
मगर केहू दर से टसकले न टसके
टसकले न टसकै, मसकले न मसकै
छिड़ल हो तिहाई नताई के चरचा
पढ़ाई लिखाई कमाई क चरचा
दरोगा क बदली करावत हौ केहू
अ लग्गी से पानी पियावत हो केहू
अमवसा के मेला अमवसा के मेला
इहै हउवै भइया अमवसा के मेला
जेहर देखा ओहर बढ़त हउवै मेला
अ सरगे क सीढ़ी चढ़त हउवै मेला
बड़ी हउर्व सांसत न कहले कहाला
मूड़ैमूड़ सगरो न गिनले गिनाला
एडी भीड़ में संत गिरहसत देखा
सबै अपने अपने में हौस व्यक्त देखा
अ टाई में केहू, त टोपी में केहू
अ झूंसी में केहू, अलोपी में केहू
अखाड़न क संगत, अ रंगत ई देखा
बिछल हौ हजारन क पंगत ई देखा।
कहीं रासलीला कहीं परबचन हौ
कहीं गोष्ठी हौ कहीं पर भजन हौ
केहू बुढि़या माई के कोरा उठावै
अ तिरबेनी मइया में गोता लगावै
कलपबास में घर क चिन्ता लगल हो
कटल धान खरिहाने वइसै परल हो
अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इहै हउवै भइया अमवसा क मेला
गुलब्बन क दुलहिलन चलैं धीरे-धीरे
भरल नाव जइसे नदी तीरे-तीरे
सजल देह जइसे हो गौने क डोली
हंसी हो बताशा शहद हउवै बोली
अ देखैलीं ठोकर बचावैलीं धक्का
मनै मन छोहरा मनै मन मुनक्का
फुटेहरा नियर मुसकिया मुसकिया के
निहारैलीं मेला सिहा के चिहा के
सबै देवी देवता मनावत चलैलीं
अ नरियर पर नरियर चढ़ावत चलैलीं
किनारे से देखैं इशारे से बौलें
कहीं गांठ जोड़ैं कहीं गांठ खोलैं
बड़े मन से मंदिर में दरसन करैलीं
अ दूधे से शिवजी क अरघा भरैलीं
चढ़ावैं चढ़ावा अ गोंठैं  शिवाला
छुवल चाहैं पिण्डी लटक नाहीं जाला।
अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इहै हउवै भइया अमवसा क मेला
बहुत दिन पर चम्पा चमेली भेंटइली
अ बचपन क दूनो सहेली भेंटइली
ई आपन सूनावैं ऊ आपन सुनावैं
दूनों आपन गहना गदेला गिनावैं
असों का बनवलू असों क गढ़वलू
तू जीजा क फोटो न अब तक पठवलू
न ई उन्हैं रोकैं न ऊ इन्हैं टोकैं
दूनो अपने दुलहा के तारीफ झोकैं
हमैं अपने सासू क पुतरी तू जान्या
अ हम्मैं ससुर जी क पगरी तू जान्या
शहरियों में पक्की देहतियों पक्की
चलत हउवै टेम्पो चलत हउवै चक्की
मनैमन जरै और गड़ै लगती दूनों
भयल तू-तू मैं-मैं लड़ै लगलीं दूनो
अ साधू छोड़ावै सिपाही छोड़वै
अ हलुवाई जइसे कराही छोड़ावै
अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इहै हउवै भइया अमवसा के मेला
कलौता के माई क झोरा हेरायल
अ बुद्धू के बड़का कटोरा हेरायल
टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहै
बिजुलिया क भाई बिजुलिया के जोहै
मचल हउवै मेला में सगरों में ढुढ़ाई
चमेला क बाबू चमेला क माई
गुलबिया सभत्तर निहारत चलैले
मुरहुवा मुरहुवा पुकारत चलैले
अ छोटकी बिटिउवै के मारत चलैले
बिटिउवै पर गुस्सा उतारत चलैले
गोबरधन के सरहज किनाने भेंटइलीं
गोबरधन के संगे पउंउ़ के नहइलीं
घरे चलता पाहुल दही गुड़ खियाइत
भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइत
उहैं  फेंक गठरी परइलैं गोबरधन
न फिर फिर देखइलैं धरइलै गोबरधन।
अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इहै हउवै भइया अमवसा क मेला
केहू शाल सुइटर दुशाला मोलावै
केहू बस अटैची क ताला मोलावै
केहू चायदानी पियाला मोलावै
सोठउरा के केहू मसाला मोलावै
नुमाइस में जाते बदल गइलीं भउजी
अ भइया से आगे निकल गइलीं भउजी
हिंडोला जब आयल मचल गइलीं भउजी
अ देखतै डरामा उछल गइलीं भउजी
अ भइया बेचारू जोड़त
हउवै खरचा
भुलइले न भूलै पकउड़ी के मरचा
बिहाने कचहरी कचहरी क चिनता
बहिनिया क गौना मसहरी क चिन्ता
फटल हउवै कुरता टुटल हउवै जूता
खलित्ता में खाली केरया क बूता
तबौ पीछे-पीछे चलत जात हउवन
गदोरी में सुरती में मलत जात हउवन।।
अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इहै हउवै भइया अमवसा क मेला


2 टिप्पणियाँ:

ajay yadav ने कहा…

वाह !
दुर्लभ कृति |
“अजेय-असीम"

alka sarwat ने कहा…

यह कविता अब तक सैकड़ों बार पढ़ चुकी ,पर हर बार नयी लगती है .

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