गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

मुनव्वर राना का मुहाज़िरनामा




बटवारे के समय बहुत से लोग पाकिस्तान चले गए, वहां इतने दिनों रहने के बाद भी हिन्दुस्तान को भूल नहीं पाए। वहाँ बसे लोगों को आज भी हिन्दुस्तान की एक-एक चीज़ उन्हें याद आती है। मशहूर शायर जनाब मुनव्वर राना ने इस दर्द को महसूस और मुहाज़िरनामा लिख डाला। इस मुहाज़िरनामा में 450 अशआर हैं। फिलहाल कुछ शेर प्रस्तुत है।


मुहाजिर हैं मगर एक दुनिया छोड़ आए हैं।
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं।
कई दर्जन कबूतर तो हमारे पास ऐसे थे,
जिन्हें पहना के हम चांदी का छल्ला छोड़ आए हैं।
वो टीपू जिसकी कुर्बानी ने हमको सुर्खुरू रक्खा,
उसी टीपू के बच्चों को अकेला छोड़ आए हैं।
बहुत रोई थी हमको याद करके बाबरी मसजिद,
जिसे फि़रक़ा-परस्तों में अकेला छोड़ आए हैं।
अगर हिजरत न की होती तो मस्जिद भी नहीं गिरती,
रवादारी की जड़ में हम ही मट्ठा छोड़ आए हैं।
न जाने क्यों हमें रह-रह के ये महसूस होता है,
कफ़न हम लेके आए हैं जनाज़ा छोड़ आए हैं।
गुज़रते वक़्त बाज़ारों से अब भी ध्यान आता है,
किसी को उसके कमरे में संवरता छोड़ आए हैं।
कहां लाहौर को हम शहरे-कलकत्ता समझते थे,
कहां हम कहके दुश्मन का इलाक़ा छोड़ आए हैं।
अभी तक हमको मजनूं कहके कुछ साथी बुलाते हैं,
अभी तक याद है हमको कि लैला छोड़ आए हैं।
मियां कह कर हमारा गांव हमसे बात करता था,
ज़रा सोचो तो हम भी कैसा ओहदा छोड़ आए हैं।
वो इंजन के धुएं से पेड़ का उतरा हुआ चेहरा,
वो डिब्बे से लिपट कर सबको रोता छोड़ आए हैं।
अगर हम ध्यान से सुनते तो मुमकिन है पलट जाते,
मगर ‘आज़ाद’ का ख़ुतबा अधूरा छोड़ आए हैं।
वो जौहर हों,शहीद अशफ़ाक़ हों, चाहे भगत सिंह हों,
हम अपने सब शहीदों को अकेला छोड़ आए हैं।
हमारा पालतू कुत्ता हमें पहुंचाने आया था,
वो बैठा रो रहा था उसको रोता छोड़ आए हैं।
कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं,
के हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं।
शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी,
के हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं।
वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की,
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं।
अभी तक बारिसों में भीगते ही याद आता है,
के छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं।
भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी,
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं।
ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी,
के हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाचा छोड़ आए हैं।
हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छुट गए आखिर,
के हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आए हैं।
महीनो तक तो अम्मी ख्वाब में भी बुदबुदाती थीं,
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं।
वजारत भी हमारे वास्ते कम मर्तबा होगी,
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं।
यहाँ आते हुए हर कीमती सामान ले आये,
मगर इकबाल का लिखा तराना छोड़ आए हैं।
हिमालय से निकलती हर नदी आवाज़ देती थी,
मियां आओ वजू कर लो ये जूमला छोड़ आए हैं।
वजू करने को जब भी बैठते हैं याद आता है,
के हम जल्दी में जमुना का किनारा छोड़ आए हैं।
उतार आये मुरव्वत और रवादारी का हर चोला,
जो एक साधू ने पहनाई थी माला छोड़ आए हैं।
जनाबे मीर का दीवान तो हम साथ ले आये,
मगर हम मीर के माथे का कश्का छोड़ आए हैं।
उधर का कोई मिल जाए इधर तो हम यही पूछें,
हम आँखे छोड़ आये हैं के चश्मा छोड़ आये हैं।
हमारी रिश्तेदारी तो नहीं थी हाँ ताल्लुक था,
जो लक्ष्मी छोड़ आये हैं जो दुर्गा छोड़ आये हैं।
गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं।
कल एक अमरुद वाले से ये कहना गया हमको,
जहां से आये हैं हम इसकी बगिया छोड़ आये हैं।
वो हैरत से हमे तकता रहा कुछ देर फिर बोला,
वो संगम का इलाका छुट गया या छोड़ आए हैं।
अभी हम सोच में गूम थे के उससे क्या कहा जाए,
हमारे आन्सुयों ने राज खोला छोड़ आये हैं।
मुहर्रम में हमारा लखनऊ इरान लगता था,
मदद मौला हुसैनाबाद रोता छोड़ आये हैं,
जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीँ हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आये हैं।
महल से दूर बरगद के तलए मवान के खातिर,
थके हारे हुए गौतम को बैठा छोड़ आये हैं।
तसल्ली को कोई कागज़ भी चिपका नहीं पाए,
चरागे दिल का शीशा यूँ ही चटखा छोड़ आये हैं।
सड़क भी शेरशाही आ गयी तकसीम के जद मैं,
तुझे करके हिन्दुस्तान छोटा छोड़ आये हैं।
हसीं आती है अपनी अदाकारी पर खुद हमको,
बने फिरते हैं युसूफ और जुलेखा छोड़ आये हैं।
गुजरते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है,
किसी को उसके कमरे में संवरता छोड़ आए हैं
हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी,
वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रखा छोड़ आये हैं।
तू हमसे चाँद इतनी बेरुखी से बात करता है
हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आये हैं।
ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी अपनी,
वहां इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आये हैं।
हमे मरने से पहले सबको ये ताकीत करना है ,
किसी को मत बता देना की क्या-क्या छोड़ आये हैं.

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

रोज़ाना एक शायर

गुफ्तगू ने ‘ रोज़ एक शायर ’ के तहत रोज़ाना किसी एक शायर की गज़लें उसके तस्वीर के साथ शेयर करने की शुरूआत की है। सभी मित्रों से निवेदन है कि अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें, साथ ही अपनी प्रतिनिधि ग़ज़लें और फोटो भेज दें,ताकि बारी-बारी सबकी ग़ज़ल पोस्ट किया जा सके। शुरूआत हम एहतराम इस्लाम की ग़ज़ल से कर रहे हैं।
अग्नि-वर्षा है तो है, हां!बर्फ़बारी है तो है।
मौसमों के दरमियां इक जंग जारी है तो है।
जि़न्दगी का लम्हा-लम्हा उसपे भारी है तो है।
क्रान्तिकारी व्यक्ति,कुछ हो,क्रांतिकारी है तो है।
मूर्ति सोने की निरर्थक वस्तु है उसके लिए,
मोम की गुडि़या अगर बच्चे को प्यारी है तो है।
खूं-पसीना एक करके हम सजाते हैं इसे,
हम अगर कह दें कि यह दुनिया हमारी है तो है।
रात कोठे पर बिताता है कि होटल में कोई,
रोशनी में दिन की, मंदिर का पुजारी है तो है।
अपनी कोमल भावना के रक्त में डुबी हुई,
मात्र ‘श्रद्धा’ आज भी भारत की नारी है तो है।
है तो है दुनिया से बे परवा परिन्दे शाख़ पर,
घात में उनकी कहीं कोई शिकारी है तो है।
आप छल बल के धनी हैं, जीतिएगा आप ही,
आपसे बेहतर मेरी उम्मीदवारी है तो है।
देश की संपन्नता कितनी बढ़ी है, देखिए,
सोचिये क्यों? देश की जनता भिखारी है तो है।
दिल्लियों, अमृतसरों की भीड़ में खोयी हुई,
देश में अपने, कहीं कन्याकुमारी है तो है।
‘एहतराम’अपने ग़ज़ल-लेखन को कहता है कला,
आप कहते हैं उसे जादूनिगारी है तो है।

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

एहतराम इस्लाम के सौ शेर



मुस्कुराहट तेरे होटों की मुझे,

अपनी मंजि़ल का पता लगती है।1
---
पेड़ गिनती के सही नफ़रत के,
सारी बस्ती को हवा लगती है।2
---
संग ही संग है, इस जगह,
आइना कुछ को क्या कीजिए।3
--
दिखाई दे तो है शब्दों में जादू,
सुनाई दे तो पत्थर बोलते हैं।4
--
यक़ीं आए न आए तुमको लेकिन,
बहुत से लोग मर कर बोलते हैं।5
---
मन में काली-काली रात,
तन पर उजला-उजला दिन।6
--
नभ में तारे चमकने लगते हैं,
जब भी आंचल पसारती है रात।7
---
मत पूछो क्या था बचपन,
दिन होली दीवाली रात।8
---
अंधेरा न रस्ते में आया कहीं,
कहां छोड़ता मेरा साया मुझे।9
--
मुक़द्दर मे थी मेरे मंजि़ल नई,
नया रास्ता रास आया मुझे।10
--
दर्द हर जाएगा दवा होकर,
कोई देखे तो दर्द का होकर।11
--
डंचे आसन पे जब से बैठ गया,
रह गया तू भी देवता होकर।12
--
कोई रिश्ता सच से यक़ीनन है मेरा,
मेरी बात लोगों को लगती है गाली।13
--
बड़ा आदमी कौन मानेगा तुझको,
तेरी जि़न्दगी है दिखावे खाली।14
---
फ़रिश्ता,देवता, शैतान देखो,
न ढूढो आदमी को आदमी में।15
--
तू जो मेरे लिए थकने से बचा,
रास्ता मैं भी भटकने से बचा।16
--
तुझको पहचान नहीं शोलों की,
खुद को फूलों पे लपकने से बचा।17
--
गूंज है गीतों की लेकिन,
जि़न्दगी का स्वर कहां है।18
--
‘एहतराम’ अब ख़्वाब में भी,
ख़्वाब का मंजर कहंा है।19
--
आंख वाला ही जब नहीं कोई,
क्या मिलेगा दीया जलाने से।20
--
तलाश करता है मौक़ा लहू बहाने का,
है कितना शौक़ उसे सुर्खियों में आने का।21
--
दुनिया के सर्द-ओ-गर्म ने पहुंचा दिया कहां,
ख़ुद मेरा आइना मुझे पहचानता नहीं।22
--
नवाजि़श है जो यह कविता पे इतनी,
कोई शब्दों में उलझा रह गया क्या।23
--
बन जाते हैं जब-तब मेरा मासूम सा बचपन,
जि़द पकड़े हुए पांव पटकते हुए लम्हे।24
---
मेरी पसंद,तमन्ना,इरादा जानता है,
तो क्या कोइ मुझे मुझसे ज़्यादा जानता है।25
--
जि़न्दा है इन्तिक़ाम की चिंगारियां जहां,
दिल का हर इक जख़्म वहां भर गया तो क्या।26
---
देश को देगी कितने चपरासी,
ये हजारों में अर्जियां जो हैं।27
---
नज़र आता है मेरा अस्ल चेहरा,
मगर मेरी अदम-मौजूदगी में।28
--
धर्म जुदागाना रखकर भी,
हम मज़हब होेते हैं बच्चे।29
--
तख्त-ए-दार चूमने वाला,
सरबुलंदी ज़रूर पाता है।30
---
मैदां में,कारखाने में,दफ्तर में औरतें,
आखिर परिंदे पिंजड़े से बाहर निकल गए।31
--
कोई इल्ज़ाम क्यों दूं बिच्छुओं को ‘एहतराम’ आखि़र,
मुझे ही डंक लगवाने का चस्का था बुरी लत थी।32
--
मुझे भी याद आयी है कोई भूली कथा अक्सर,
मेरी पलकों पे भी अक्सर सितारे झिलमिलाए हैं।33
---
इजाज़त दी गई है सांस लेने की यक़ीनन,
मगर माहौल में गाढ़ा धुआं रक्खा गया है।34
-----
है शहरियों से दोनों तरफ़ शांति की अपील,
और’ फ़ौज सावधान है सरहद के आसपास।35
--
शाख़,गुल,तितली,धनक,बिजली, घटा आई नज़र,
जिस तरफ देखा,हमें शान-ए-खुदा आई नज़र।36
--
कम-जर्फ़ ही नहीं है,सियह बख़्त भी है वो,
दरियाओं से जो करता है दरियादिली की बात।37
--
मान रखता कौन विष का,कौन अपनाता सलीब,
कोई ईसा था न शंकर,सच को सच कहता तो कौन।38
--
आदमी तो ख़ैर से बस्ती में मिलते ही न थे,
देवता थे,सो थे पत्थर, सच को सच कहता तो कौन।39
--
ब-असर लोगों की इस बस्ती में,
किससे पूछें कि असर किसका है।40
--
दर-ओ-दीवार है मेरे लेकिन,
सोचता रहता हूं, घर किसका है।41
--
यों ही शमशीरों का ललकारेगा,
रह गया धड़ पे सर आगे भी।42
--
दूर तक नाम नहीं साये का,
है तो पीछे भी शजर आगे।43
--
दायरे टूट न पाए वर्ना,
जो तो सकती थी नज़र भी।44
--
मुस्कुरा लेता हूं मैं भी जब तक,
मेरे एल्बम में भी तस्वीरें हैं।45
--
झुक के मिलना पड़ेगा हर इक से,
क़द हमारा बड़ा न हो जाए।46
--
मैं तो बे-दाग़ लौट आया हूं,
आपको हौसला न हो जाए।47
--
अगर चारा निगल जाती है धोखे से बड़ी मछली,
तो अक्सर ये भी होता है कि बंसी टूट जाती है।48
---
तू तो न पूछ ऐ मेरी सादा-दिली कि मैं,
दुनिया जिधर खड़ी थी, उधर क्यों नहीं गया।49
--
भटकता है जो दरिया जंगलों में,
समुन्दर से किसी दिन जा मिलेगा।50
--
क़ह्र सहता हूं रोज दर्पण का,
रोज दर्पण के पास जाता हूं।51
--
हाथ बच्चों पे कब उठाता हूं।
भूख से जूझना सिखाता हूं।52
---
चेहरे वही हैं, सिर्फ़ मुखौटे बदल गए,
कैसे कहें,फ़रेब के पुतले बदल गए।53
---
मातृ-भाषा,राष्टृ भाषा,राज भाषा, सब तो हैं,
बस ज़रा व्यवहार में हिन्दी नहीं तो क्या हुआ।54
--
पट्टियां आंखों पे चढ़वा दी गई हैं ‘एहतराम’,
देश की जनता अगर अंधी नहीं तो क्या हुआ।55
--
दुआ न दे कि जियूं बेशुमार बसरों तक,
कि जी के दो घड़ी तड़पा हूं यार बरसों तक।56
---
मौज-मस्ती का नज़ारा इक तरफ़,
आंसुओं की मुक्त धारा इक तरफ़।57
---
पग-पग भटकाव हो गए,
इस क़दर सुझाव हो गए।58
---
क्या तुम्हारे रूप का वर्णन करूं,
जिसने देखा तुमको दर्पन हो गया।59
---
सुधा के नाम पर विष पी रहा हूं।
यही जीना हुआ तो जी रहा हूं।60
---
निशि-दिन भ्रष्टाचार में है।
वह शायद सरकार में है।61
--
सारी व्यवस्था है पक्की
यस सर! वह भी कार में है।62
---
कतारें दीपकों की मुस्कुराती हैं दीवाली में,
निगाहें ज्योति का संसार पाती हैं दीवाली में।63
--
यूं ही हलचल ने अरमानों में होगी।
शरारत कुछ तो मुस्कानों में होगी।64
--
ले उठ रहा हूं बज़्म से मैं तश्नगी के साथ।
साक़ी मगर ये जुल्म न हो अब किसी के साथ।
---
भाज्य को भागफल समझते हैं।
लोग मजमे को दल समझते हैं।66
--
नंगा खड़ा है धूप में, दुनिया से बेख़बर।
टूटे हैं जाने कौन से सदमे दरख़्त पर।67
---
नज़रें न क्यों जमाएं बहलिया दरख़्त पर।
रुकने लगे हैं आके परिंदे दरख़्त पर।68
---
कैसी डरावनी थी, वो जंगल की रात भी,
काटी गई जो राम भरोसे दरख़्त पर।69
---
प्रश्न कोई कहां अभाव का है।
है तो वितरण में भेदभाव का है।70
--
इक तरफ़ मेरा अहम है, इक तरफ़ तेरी खुशी,
आ गया मेरे लिए पल ‘इम्तहानी’ हो न हो।72
--
सुर्ख़ मौसम की कहानी है,पुरानी हो न हो।
आसमां का रंग आगे असामानी हो न हो।73
---
फिर दिलों पर राज हो इंसानियत का या खुदा।
जि़न्दगी फिर जि़न्दगी महसूस हो हर शख़्स को। 74
---
दहशत ऐसी भी कभी महसूस हो हर शख़्स को।
खूं में तर चादर हरी मसहूस हो हर शख़्स को। 75
--
दीवाली में घर-घर दिये मुस्कुराए।
मगर तुम न मेरे लिए मुस्कुराए। 76
--
जुबां तो खोलने की है इज़ाज़त।
किसी से सच बोलने की है इज़ाज़त।77
--
बच्चा था मैंने अपने आपको को चाटा लगा दिया।
अग्रज हैं आप पीठ मेरी थपथपाइए। 78
--
चट्टान तोड़ने को न घूंसा उठाइए।
मुट्ठी को चोट आएगी, मुट्ठी बचाइए।79
---
क्या जि़दगी हमारी-तुम्हारी है इन दिनों।
हर मूली अपने पत्तों से भारी है इन दिनों।80
--
तेरे ख़्याल को कहता है, जि़दगी अपनी।
तेरा ख़्याल जिसे अस्त-व्यस्त रखता है।81
--
स्दा भटकता है,रस्ता कभी नहीं पाता,
जे ‘एहतराम’ इरादों को पस्त करता है।82
--
तरह-तरह के भुलावों में मस्त रखता हूं।
मुझे वो कैसी निपुणता ध्वस्त रखता हूं।83
--
रीते के रीते हैं हम।
जाने क्या जीते हैं हम।84
--
फंस ही गया मंझधार का मारा नहीं छूटा।
पर देखने वालों से किनारा नहीं छूटा।85
---
कोना तंहाई का दमकता है।
तेरी तस्वीर मुस्कुराई क्या।86
---
देता रहता है तू सफाई क्या।
तेरे दिल में है कुछ बुराई क्या।
--
तन पर है सजा मख़मल,पर मन की दशा क्या है।
सोचा कभी तुमने, जीवन की दशा क्या है।88
--
याद से कौन बचा?बच न सकेगा तू भी।
आग तंहाई की भड़केगी जलेगा तू भी।89
---
लहू का नाम न था खंजरों के सीनों पर।
मगर लिखी थी कथा सारी आस्तीनों पर।90
--
तूफां नज़र में था, न किनारा नज़र में था।
हिम्मत थी अपनी,तेरा सहारा नज़र में था।91
--
ज़मीन छोड़ी, न छोड़ा है आसमां मैंने।
तुझे तलाश किया है कहां-कहां मैंने।92
---
कैसे कहूं कि आपका जादू चला नहीं।
मुंह में जुबां है सबके,कोई बोलता नहीं।93
---
प्यार में कर्तव्य क्या, अधिकार क्या।
हो गणित जिसमें भला,वह प्यार का।94
--
यूं तो मिल न गई होगी मंजिल-ए-मक़सूद।
उबूर हमने किए होंगे मरहले कितने।95
--
ये बहस छोडि़ए किस-किस के संग थे कितने।
पता लगाइए साबित हैं आइने कितने।96
--
उच्च कुल वाला हूं,गिर सकता हूं मैं उंचे कुलों में,
यह कहां लाए हो,यह तो वैश्याओं की गली है।97
---
आधुनिक तहज़ीब पर क्या सोचकर चर्चा चली है।
आवरण सुंदर,सुभग,भीतर से पुस्तक खोखली है।98
--
याद तेरी रातभर का जागरण दे जाएगी।
स्वप्न की भाषा को लेकिन व्याकर दे जाएगी।99
--
आपका पत्र क्या डाकिया दे गया।
रातभर जागने की सजा दे गया। 100


एहतराम इस्लाम

635-547,अतरसुइया, इलाहाबाद-211003
मेबाइल नंबरः 09839814279


गुफ्तगू के जनवरी-मार्च 2012 अंक में प्रकाशित


गुरुवार, 22 मार्च 2012

मंच पर इलाहाबाद के अगुवा कवि


------- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी -------

साहित्य चाहे हिन्दी का हो या उर्दू का। दोनों ही भाषाओं के प्रमुख साहित्याकर इलाहाबाद से हुए हैं। मंचों की बात की जाए तो इस मामले में भी यह सरज़मीन काफ़ी जरखेज़ रही है। एक समय था जब निराला,महादेवी, फि़राक़, बच्चन,पंत और राज़ इलाहाबादी जैसे कवि मंचों पर विराजमान होते थे। तब देश का कोई बड़ा कवि सम्मेलन इलाहाबाद के कवियों को शामिल किए बिना असंभव था। ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा ज्ञान, निकलकर आंखों से चुपचाप बही होगी कविता अंजान’ जैसी कालजयी कविता का सृजन सुमित्रानंदन पंत ने इलाहाबाद की सरज़मीन पर बैठककर की थी। आज भी इस शहर की पहचान साहित्य और संस्कृति के रूप में ही होती है। वर्तमान में भले ही राष्टृीय स्तर के कवियों का इलाहाबाद में कमी दिखती हो, लेकिन यहां होने वाले कवि सम्मेलनों और मुशायरों की सरगर्मियों में ज़रा भी कमी नहीं आयी है। वैसे तो अब वर्षभर इस शहर में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और मुशायरे होते रहते हैं, लेकिन होली के मौके पर होने हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलनों ने देशभर में अपनी पहचान बनाई है। दूसरे शहरों और प्रांतों के कवि-शायर आज भी होली के मौके पर हेाने आयोजनों में खुद के बुलावे का इंतज़ार करते रहते हैं। महामूर्ख, महालंठ, हुड़दंग और ठिठोली आदि नामों से होने वाले आयोजनों ने इलाहाबादी परंपरा को जारी रखने का काम अब भी जारी रखा है। ये और बात है कि इनमें से कुछ आयोजनों की बागडोर, ख़ासतौर पर कवि को आमंत्रित करने की जिम्मेदारी ग़लत हाथों में सौंप दी गई है। जब तक कैलाश गौतम और अतीक इलाहाबादी जैसे लोगों के हाथों में यह कमान थी, जब तक अपेक्षाकृत आयोजन अधिक स्तरीय हुआ करते थे। बदलते दौर के साथ कुछ बदलाव आएं हैं, लेकिन यह उम्मीद करना गलत नहीं होगा कि गलत चीज़ें बहुत अधिक दिनों तक जारी नहीं रह सकतीं।
इलाहाबाद के कवि सम्मेलनों और यहां की सरज़मीन से रची गई शायरी की बात की जाय तो अकबर इलाहाबादी से होता हुआ कारवां निराला, महादेवी, फि़राक़, बच्चन,पंत,राज इलाहाबादी, अतीक इलाहाबादी और कैलाश गौतम तक पहुंचा है। इसके आगे की कड़ी को जोड़ने का प्रयास जारी है, मगर अभी इलाहाबाद से ऐसा कोई नाम नहीं दिख रहा जो इन महान रचनाकार की अगली कड़ी से जुड़ सके। हां, इतना अवश्य है कि प्रयास जारी है तो एक न एक दिन कामयाबी ज़रूर मिलेगी। बहरहाल, अकबर इलाहाबादी की बात की जाए तो उर्दू हास्य-व्यंग्य के कवियों में इतना बड़ा नाम अब तक नहीं हुआ। अकबर ने न्यायालय जैसे गंभीर और जिम्मेदार विभाग में नौकरी की, मगर उनकी कलम अपने विभाग से लेकर अपने कौम तक पर तंज करने में जरा भी नहीं हिचकी। वे फरमाते हैं
बेपर्दा कल जो आयीं नज़र चंद बीवियां।
अकबर जमीं पे गैरते-कौमी से गड़ गया।

पूछा जो उनसे आपका पर्दा वो क्या हुआ,

कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दो के पड़ गया।


बात जब अपनी शर्तों और गरिमा के साथ काव्य धर्म निभाने की आती है तो सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का नाम सबसे पहले लिया जाता है। निराला ने जीवनभर काव्य सृजन ही नहीं किया बल्कि काव्यधर्म को जिया भी है। उन्होंने व्यक्ति लाभ के लिए कभी किसी हुक्मरान के आगे अपने को नीचे नहीं होने दिया। मंच पर उनके साथ महादेवी वर्मा और फि़राक़ गोरखपुरी जैसे लोग हुआ करते थे, लोग वास्तविक कविताओं का भरपूर आनंद लिया करते थे। ये और बात है कि अब इस तरह के मंचों की सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है। निराला की काव्य सृजन का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक मजदूरनी को जेठ की भरी दुपहरी धूप में पत्थर तोड़ते हुए देखा और कालजयी रचना का सृजन कर डाला-
वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई
स्वीकार
श्याम तन,भर बंधा यौवन, नख नयन,
प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार सामने तरु-मालिका
अट्टालिका, प्रकार
चढ़ रही थी धूप गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप
उठी झुलसाती हुई
लू
सई ज्यों जलती हुई भू गई
चिनगीं छा गई
प्रायः हुई दुपहर
वह तोड़ती पत्थर।


हिन्दी साहित्य में महिला रचनाकारों का जब भी जिक्र होता है तो सबसे पहले महादेवी वर्मा का नाम लिया जाता है। और यह इलाहाबाद का सौभाग्य है कि महादेवी वर्मा की कर्मभूमि भी यही शहर रहा है। महादेवी को मंचों का ‘स्वर कोकिला’ कहा जाता रहा है। उनकी मौजूदगी कवि सम्मेलनों की सफलता की जमानत हुआ करती थी। उनकी एक मशहूर कविता-


कहां रहेगी चिडि़या?

आंधी आई जोर-शोर से

डाली टूटी है झकोर से
उड़ा घोंसला बेचारी का
किससे अपनी बात कहेगी
अब यह चिडि़या कहां रहेगी?


फि़राक़ गोरखपुरी ने अदब के चाहने वालों के लिए ऐसी शायरी पेश की है, जिसका जिक्र किए बिना कम से कम उर्दू शायरी का इतिहास तो पूरा नहीं हो सकता। उनकी नफ़ासत और शायरी का अंदाज़ उन्हें तमाम शायरों अलग खड़ा कर देती है। कवि सम्मेलनों और मुशायरों के मंच पर उनकी मौजूदगी भी विशेष महत्व रखती थी। वे फरमाते हैं-

बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं।
तुझे ऐ जि़न्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं।
तबीयत अपनी घबराती है जब सूनसान रातों में,
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं।

सुमित्रानंदन ‘पंत’ छायावादी युग के प्रवर्तक कवियों में से हैं। इलाहाबाद की सरज़मीन से उन्होंने अपने सृजन को देशभर के कोने-कोने में पहुंचाया है। लिखते हैं-

चंचल पग दीप-शिखा-से धर
ग्रह मग,
वन में आया वसंत।

सुलगा फाल्गुन का सूनापन,

सौंदर्य-शिखाओं में अनंत सौरभ की
शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में
मधुर दाह
आया वसंत,
भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह।

‘मधुशाला’ नामक कृति के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हुए कवि हरिवंश राय बच्चन की कर्मभूमि भी इलाहाबाद ही रहा है। उन्होंने शिक्षा से लेकर काव्य सृजन का हुनर यहीं सीखा है।


बड़े-बड़े परिवार मिटें यों,
एक न हो रोने वाला

हो जाएं सुनसान महल वे,
जहां थिरकती सुरबाला।

राज्य उलट जाएं,
भूपों का भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,

जमे रहेंगे पीने वाले,
जगा करेगी मधुशाला


मुशायरों की दुनिया में राज़ इलाहाबाद का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता रहा है। आज भी उनकी ग़ज़लें और नात पाकिस्तान तक में बेहद मक़बूल है और गायी जाती है। फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार और हेमामालिनी तक उनकी शायरी के फैन रहे हैं-


लज्जते
ग़म बढ़ा दीजिए, आप फिर मुस्कुरा दीजिए।

मेरा दामन बहुत साफ है,कोई तोहमत लगा दीजिए।

एक समुंदर ने आवाज़ दी, मुझको पानी पिला दीजिए।

हैरत इलाहाबादी का यह शेर पूरी दुनिया में मुहावरों की तरह इस्तेमाल होता है-


आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं,

सामान सौ बरस का पहल की ख़बर नहीं।

मंचों पर चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी,उमाकंात मालवीय, कैलाश गौतम और अतीक़ इलाहाबादी का नाम भी बड़ी इज्जत से लिया जाता रहा है। जब तक ये लोग जीवित रहे इलाहाबाद की विरासत को मंच के माध्यम से देश-विदेश में पहुंचाते रहे। कैलाश गौतम की कविताओं की मक़बूलियत तो मंत्री से लेकर संत्री तक के बीच आज भी। आम आदमी में अपनी कविताओं की वजह से मक़बूल होने वाले कैलाश गौतम इलाहाबाद के अेकेल कवि हैं। मंचों पर सक्रिय रहने वाले इलाहाबाद के प्रमुख कवियों में असलम इलाहाबादी, यश मालवीय, फरमूद इलाहाबादी, नायाब बलियावी,अख्तर अज़ीज़, ख़्वाजा जावेद अख़्तर, इक़बाल दानिश, जमीर अहसन, बुद्धिसेन शर्मा,सुरेंद्र नाथ नूतन, एहतराम इस्लाम, सुधांशु उपाध्याय,शकील गा़ज़ीपुरी,मखदूम फूलपुरी, शरीफ़ इलाहाबादी, नजीब इलाहाबादी, अरमान ग़ाजीपुरी, गुलरेज इलाहाबादी,जयकृष्ण राय तुषार,श्लेष गौतम,वाकिफ़ अंसारी, नईम साहिल,सुनील दानिश,अशोक कुमार स्नेही, गोपीकृष्ण श्रीवास्तव, जमादार धीरज,अखिलेश द्विवेदी,रविनंदन सिंह,नंदल हितैषी,मुनेंद्र नाथ श्रीवास्तव,हरीशचंद्र पांडे,जोवद शोहरत,तश्ना कानपुरी, अरविंद वर्मा आदि शामिल हैं।

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

कवि सम्मेलन के दलाल

.............. नाजि़या ग़ाज़ी ................

एक दौर था, जब कवि सम्मेलन और मुशायरों के मंच पर फि़राक़ गोरखपुरी, निराला, महादेवी वर्मा, पंत, राज़ इलाहाबादी जैसे साहित्यकार विराजमान होते थे और लोग उनकी शायरी को गंभीरता से सुनते थे. तब ऐसे मं
चों से कही गई बात देश और समाज के लिए मार्गदर्शक होती थी, संसद तक में यहां कही गई बातों पर चर्चा होती थी. मगर इस समय ऐसे मंचों को दलालों ने अपने कब्जे में कर लिया है. कवि सम्मेलन-मुशायरा कराने के लिए अलग-अलग गुट बन गए हैं, इन गुटों के लोग दिनभर विभिन्न सरकारी-गै़र सरकारी दफ्तरों में घूम-घूम कर कवि सम्मेलन कराने के लिए अधिकारियों को तैयार करने की कोशिश करते हैं, जी-हुजूरी करते हैं और फिर अधिकारी के तैयार हो जाने पर अपने गुट के कवियों को उसमें शामिल कराया जाता है, ऐसे लोगों को भी मंच पर बुलाकर काव्य पाठ कराया जा रहा है, जिनको न तो कविता लिखने की तमीज़ है और न ही समझने की. इस तरह के दलालों को अधिकारी भी ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं, अधिकारी अपने विभाग से सांस्कृतिक आयोजन के नाम पर धन उपलब्ध करा रहे हैं और खुद मंच पर मुख्य अतिथि बनकर गौरवान्वित हो रहे हैं. इसमें सबसे खराब बात यह है कि कवि सम्मेलनों की दलाली करने वाले लोग जानबूझकर उन लोगों को मंचों पर ले आ रहे हैं, जिन्हें एक लाइन की कविता-शायरी लिखने की तमीज़ नहीं है, दूसरों से मांगकर पढ़ते हैं और गलेबाजी की वजह से बड़े कवि बनते फिर रहे हैं. सबकुछ जानते हुए भी कवि सम्मेलनों के दलाल वास्तविक कवियों को मंच पर लाने की बजाए गवैयों को मंच पर बुला रहे हैं. कवि सम्मेलनों के संयोजक बने ये दलाल ‘तुम मुझे बुलाओ, मैं तुम्हें बुलाता हूं’ की तजऱ् पर काम कर रहे हैं. अच्छी और स्तरीय शायरी के आधार पर कवि सम्मेलनों में पढ़ने के लिए कवियों-शायरों को नहीं बुलाया जा रहा है. कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कवियों की पुण्य तिथि तक पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में दलाल और गैर मैयारी टाइप के उन कवियों को आमंत्रित करते हैं, जिन्हें खुद वही कवि पसंद नहीं करते थे, जिनके पुण्य तिथि पर कार्यक्रम हो रहा होता है. उनकी आत्मा इस बात पर भी नहीं जागती कि कम से कम पुण्य तिथि पर होने वाले कार्यक्रम में उन कवियों को बुलाएं जो अच्छे कवि के साथ उनके साथी भी रहे हैं. ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कवि सम्मेलनों की क्या स्थिति है. पिछले दिनों इलाहाबाद के हिन्दुस्तानी एकेडमी में मुशायरे का आयोजन किया गया था, मंच पर उर्दू के कई बड़े अदीब मौजूद थे. संस्थान के एक बड़े अधिकारी ने अपने वक्तव्य में देश एक बहुत बड़े शायर के बारे में कहा, ‘ये साहब तो इसी कार्यक्रम के लिए इलाहाबाद में तीन दिन से पड़े हुए हैं, और ये जो दूसरे सुल्तानपुर के कवि हैं इनको तो मैंने सिविल लाइन चैराहे से उठा लिया है.’ अफ़सोस की शायरों की इस तरह बेइज़्ज़ती करने वाले उस अधिकारी के वक्तव्य का किसी ने विरोध तक नहीं किया, दांत चिहार कर सब लोग हंस रहे थे. अधिकारी को भी मालूम है कि कवियों को आमंत्रित करने का लालच देकर उनके खिलाफ़ कुछ भी बोल दो, फ़कऱ् नहीं पड़ता. हालत इतना बदतर है कि लोग दिनभर यह पता लगाने में जुटे रहते हैं कि कहां और कब मुशायरा हो रहा है और उसमें शामिल होने के लिए किससे जुगाड़ लगवानी है.दूसरी बात यह है कवि सम्मेलनों के मंच पर उन लोगों को भी बुलाया जा रहा है जो कवि न होकर लतीफेबाज हैं, और तकऱ् दिया जा रहा है कि क्या करें लोग इन्हीं को पसंद कर रहे हैं. यहां यह गौरतलब है कि अगर लतीफेबाजों को ही लोग सुन रहे हैं और उन्हें ही बुलाना है तो फिर उस आयोजन का नाम कवि सम्मेलन या मुशायरा क्यों दिया जाता है. जिन कार्यक्रमों में लतीफेबाज बुलाए जा रहे हैं, उनका नाम लाफ्टर शो, लतीफा सम्मेलन या इसी तरह कुछ और नाम दिया जाना चाहिए, ये क्या बात हुई कि नाम कवि सम्मेलन का और मंच पर बैठे हैं लतीफेबाज लोग. दुखद पहलू यह है कि सबकुछ जानते हुए भी इन स्थितियों के खिलाफ़ खड़ा होने की कोई हिम्मत नहीं कर रहा है, जबकि तमाम ऐसे प्रभावशाली साहित्यकार हैं जो अगर खुलकर सामने आ जाएं तो बात बन सकती है.

गुफ्तगू के मार्च 2012 अंक का संपादकीय

गुरुवार, 15 मार्च 2012

युवा कवयित्री कु. सोनम पाठक



जन्म ः 16 अप्रैल 1993

पिता
ः श्री राकेश विहारी पाठक

शिक्षा
ः बी.ए.द्वितीय वर्ष (इलाहाबाद विश्वविद्यालय)

संपर्क ः क्वार्टर नं032, चैथी बटालियन, पी.ए.सी. काॅलोनी, धूमनगंज, इलाहाबाद-211011 विशेष ः ‘गुफ़्तगू’ द्वारा 30 अक्टूबर 2011को आयोजित कैम्पस काव्य प्रतियोगिता में प्रथम स्थान

अगर तुम न होती

अगर तुम न होती तो मेरी ये दुनिया न होती.....
मेरा ये जहान न होता, मेरी ये पहचान न होती...
तुम्हारी वजह से मैं आज जिन्दा हूं.....
अगर तुम न होती तो मेरी ये दुनिया न होती......

तुमने मेरी अंगुली पकड़कर मुझे चलना है सिखाया.....
इस संसार को मुझे अपनी आंखो से है दिखाया....

हर अच्छे-बुरे का ज्ञान है सिखाया.....

अपनी इच्छाओं का बलिदान देकर मेरा जीवन है सजाया.....

इस जीवन रूपी मझधार से वाकिफ है कराया...

जब रोए हम तुम्हारी भी आंखें नम हो गई....
जब भूख से तड़पें हम तुमने अपना कौर खिलाया.....

अगर तुम न होती तो मेरी ये दुनिया न होती......

जीवन का सारांश बताकर मुझे अपने कत्र्तव्यों पर चलना है सिखाया...
जिसको मैंने बड़ी ही सरलता से स्वीकार है किया॥
तुमने मुझे दुखों के सैलाब से उभरना है सिखाया....
संघर्ष और अवसादों में मुझे खुश रहना है सिखाया.....

जीवन के हर कदम पर मेरा साथ है निभाया.....

हर उतार-चढ़ाव में संभलना है सिखाया...
अगर तुम न होती तो मेरी ये दुनिया न होती......

ज्यों-ज्यों मुस्काता हुआ चांद धरती पर....

अपनी चमकती हुई रोशनी बिखेरता है...

त्यों-त्यों मुझे तुम्हारी याद सताती है....

मानों ऐसा लगता है ममता के बादलों में....

मंडराती कोमलता मेरे हृदय को छू रही हो....

हर पल, हर तरफ, चारो दिशाओं में.....

आकाश में, पाताल में बस तुम्हारी ही तस्वीर नजर आती है.

मुझसे इतनी दूर क्यों चली गई हो....
मैंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया जिसके कारण...

मेरे अन्तर्मन को दुःख हो रहा है.....

मानों ऐसा लगता है कि कहां तेरी खुशबू का अन्दाज मिल
मैं अपने पूरे जीवन को महका लूं....
तुझे और तेरी खुशबू को ऐसे कौन से पिंजरे में बन्द कर लूं.
जहां तू हर पल मौजूद रहे और मैं तुझे एकटक निहारती रहूं...

तेरी ममता की छांव को अपने अन्तर्मन में आत्मसात कर लूं.

तेरी इतनी दूरियां मुझसे सहीं नहीं जाती....

तेरे बिना मुझे हर विजय में हार का एहसास होता है....
ऐसा लगता है मानो पूरा संसार मुझ पर खिलखिला कर हंस रहा हो.

मेरी जिन्दगी रूक सी जाती है, कदम लड़खड़ाने से लगते हैं.

मुझे ऐसा लगता है मैं ऐसी कौन सी जगह ढूंढूं...

जहां सिर्फ और सिर्फ तेरा निशा हों, तेरा आसमां हूं....

सचमुच मैं ऐसे पाताली अन्धेरे की गुफाओं में....
धुंए के बादलों में, ऐसे बीहड़ो में खो जाना चाहती हूं....

जहां सिर्फ मुझे तेरी ममता की छांव मिले....

और मैं तेरी गोद में सर रखकर हमेशा के लिए सो जाऊ.....।


गुफ्तगू के मार्च 2012 अंक में प्रकाशित