रविवार, 2 सितंबर 2012

साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ की मासिक काव्य गोष्ठ व नशिस्त



साहित्यिक पत्रिका ‘गुफ्तगू’ के तत्वावधान में 01 सितंबर 2012 की शाम करैली स्थित अदब घर में काव्य गोष्ठी (नशिस्त)का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर सागर होशियारपुरी ने की जबकि मुख्य अतिथि के रूप में शकील गाजीपुरी मौजूद रहे, संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने की। इस गोष्ठी में छह युवा कवि लवकुश कुमार, आंनद कुमार आदित्य, अजय भारतीय, पीयूष मिश्र, अनुराग अनुभव और नीतिश कुशवाहा ने पहली बार मंच से काव्य पाठ किया।
अनुराग अनुभव
सबसे पहले अनुराग अनुभव ने कविता सुनाई-
मंजि़ल दूर हो तो ख़्वाब को कमज़ोर मत करना
हसीन ख़्वाब लम्बी रात को छोटा बनाते हैं।
नितीश कुशवाहा ने कहा-
कांटो पे भी मुझे चलना पड़ा
जीने की खातिर मरना पड़ा।
मेरी किसी से इश्क़ की आरजू नहीं थी
तेरी मासूमियत ने कहा था तो करना पड़ा।
अजय भारती की काव्य रचना इस प्रकार थी-
जलाना घर मेरा हर शब औ उजाला करना
लोगों को ये हुनर बड़ी शिद्दत से आया है।
जि़न्दगी कैसी होगी बिन तेरे कैसे कहूं,
यहां तो हर पल तेरी यादों के साए से गुजरा है।
लवकुश कुमार ‘आनंद’ की कविता थी-
जि़न्दगी एक सफ़र है जिसका मुसाफिर हूं मैं
हर सफ़र है आखि़री एक दिन जिसका इंतिहा हूं मैं।
कांटो के ताज सही गमों के ढेरों से खौफ नहीं,
ग़मज़दा महफिल में भी, खुशनुमा संघर्ष हूं मैं।
पीयूष मिश्र ने कहा-
हम पूर्वा हवाओं के साथ अक्सर बहते थे
कभी-कभी पछुवा हवा की मार सहते थे।
आज पछुवा हवायें ही आ रही हैं,
पूर्वा हवाये ंतो इन्हें ही देखकर शरमा रही हैं।
आनंद कुमार आदित्य की कविता उल्लेखनीय रही-
मयखाने को जाती है वो गली
जहां खिलती है सपनों की कली
इस अजनबी के प्यार की चाहत
इस अंजान दिल में जगी
रमेश नाचीज़
युवा ग़ज़लकार रमेश नाचीज़ की ग़ज़ल सराही गई-
ज़र्रे-ज़र्रे में खुदा है ये नकारा भी नहीं
और पत्थर पे कभी फूल चढ़ाया भी नहीं।
नौजवान शायर अमन दरियाबादी ने तरंनुम में अच्छी ग़ज़ल पेश की-
फिक्र को उड़ान देता हूं, फर्श को आसमान देता हूं।
आज रात अपने गीतों को, साज़े हिन्दुस्तान देता हूं।

नजीब इलाहाबादी ने कहा-
ऐ मुल्के अतश के मेरे बेयार मुसाफि़र,
संगम के किनारे से दुआ मांग रहे हैं।
उड़ते नहीं बे फ़ैज़ फि़जाओं में कबूतर,
फिर अम्न-ओ-मोहब्बत की फि़ज़ा मांग रहे हैं।
डा. मोनिका नामदेव की ने बेटी को रेखांकित करते हुए कहा-
कली है बेटी का प्रतीक/क्यों उसे रौंदा कुचला जाता है
कली को कली न रखकर/फूल क्यों नहीं बनाया जाता है।
वीनस केसरी की ग़ज़ल काफी सराही गई-
ग़ज़लों से पहले दोस्ती फिर प्यार फिर दीवानगी
मुझको ये बढ़ती तिश्नगी जाने कहां ले जा रही।
वरिष्ठ कवि अशोक कुमार स्नेही ने गीत सुनाकर महफिल को भाव-विभोर कर दिया-
कहना महल दुमहले सूने सूनी जीवन तरी हो गई,
प्रिया तुम्हारे बिना मिलन की सूनी बारादरी हो गई।
इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी के अशआर लोगों ने पसंद किया-
सच को सच से मिलाके छोडूगा/इस ज़मी को हिला के छोडूगा।
वो जो छल बल से बना है शायर/उसको घर पे बिठा के छोडूगा।
फरमूद इलाहाबादी ने हास्य-व्यंग्य रचना सुनाकर लोगों को गुदगुदाने पर विवश कर दिया-
पहले के जैसे गाल हमारे न तुम्हारे/अब होंठ लाल लाल हमारे न तुम्हारे।
चांदी सा जिस्म और न मोती के जैसे दांत/सोने के जैसे बाल हमारे न तुम्हारे।
शैलेन्द्र जय

शैलेन्द्र जय ने कहा-
सुबह से शाम तक की आपधापी के बीच,
बैठ जाती है काठ होकर कविता
संवेदना का मुंह चुराना लगता है खो
जाना हृदय का
युवा कवि अजय कुमार की कविता सराहनीय रही-
ओ मेरे भाग्य सुन/इतना न तू मुझसे यहां इतरा
तुझे काबू में रखूंगा/मुझे तू जानता ही क्या ?
नरेश कुमार ‘महरानी’
नरेश कुमार ‘महरानी’ ने गीत सुनाया-
मैं गुडि़या नादान मुझको टल्ली बना दिया
मंजूर बाकराबादी की ग़ज़ल सराहनीय रही-
जुर्म महबूबा में उस पे मार जब पड़ने लगी
कह उठा यह छोकरी अम्मा भी है बिटिया भी।
देखकर दुल्हन परेशां हो गई मंडप में यूं
अल्ला-अल्ला देखिये दूल्हा मेरा बूढ़ा भी है।
आसिफ ग़ाज़ीपुरी
 आसिफ ग़ाज़ीपुरी ने तरंनुम में अच्छी ग़ज़ल पेश की-
अब कहां जा के छुपाओगे ये खूनी चेहरा,
उम्र कट जायेगी इस दाग़ का धोते-धोते।
आपके हुस्ने तगाफुल का नहीं कम एहसास,
मैं तो मर जाउंगा इस बोझ को ढोते-ढोते।


खुर्शीद हसन ने कहा-
सबक ये मिलता है इक़बाल के तराने से
अम्न से दुनिया है आबाद एक ज़माने से
करें हमेशा मदद एक दूसरे की हम,
नहीं है फ़ायदा लड़ने से और लड़ाने से।

जफर सईद जिलानी ने कहा-
हक़परस्ती के ज़बानी न करो दावे तुम
कुछ कदम चल के भी इस रह पे दिखाओ तो सही।

फरहान बनारसी का शेर यू  था-
मेरी अक्ल को तू शउर दे, मेरे इल्म को तू निखार दे

तलब जौनपुरी की ग़ज़ल काफी सराही गई-
दुश्वारियों के डर से जुबां खोलता नहीं
सच देखता तो हूं मैं मगर बोलता नहीं
धड़कन की ठंडकों से मेरा खून जम गया
जुल्मो-सितम की आग में भी खौलता नहीं।

मुख्य अतिथि शकील ग़ाज़ीपुरी ने कहा-
करो मत वक्त जाया गुफ्तगू में/लिपट जाओ जाने के दिन हैं।
शकील उनका तसव्वुर काम आया/हकीकत में नज़र आने के दिन हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सागर होशियारपुरी की ग़ज़ल सराहनीय रही-
रेत की नींव पे बनी इमारत पल दो पल ही टिकती
लाख छिपाएं लोग मगर यह सच्चाई कब छिपती।

इस मौके पर देवेंद्र कुमार श्रीवास्तव ‘देवेश’, एहतराम इस्लाम, अख्तर अज़ीज़, राजीव निगम ‘राज’, निजाम हसनपुरी, शााहिद इलाहाबादी और शादमा जैदी ‘शाद’ कार्यक्रम में मौजूद रहे लेकिन काव्य पाठ नहीं कर पाए। अंत में वीनस केसरी ने सबके प्रति आभार प्रकट किया।

2 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

आयोजन की बहुत खूबसूरत रपट पेश की ………आभार्।

कवि सचिन 'गिर्जा' ने कहा…

महोदय मैं भी युवा कवि हुँ और पहली बार मंच पर आना चाहता हुँ और अपनी रचनायें सुनाना चाहता हुँ जो कि आपके सहयोग से सम्भव है कृपया मेरा निवेदन स्वीकारकर इस क्षेत्र में उत्साहवर्धन करें। सम्पर्क 08400765209

एक टिप्पणी भेजें