रविवार, 25 दिसंबर 2011

हिन्दी का लेखक आर्थिक रूप से पिछड़ा है - अमरकांत



सुप्रसिद्ध कहानीकार अमरकांत जी से गणेश शंकर श्रीवास्तव की बातचीत


सवाल: आपकी पैदाईश कब और कहां हुई?


जवाब: मेरा जन्म एक जुलाई 1925 को पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्थित बलिया जिले के भगमलपुर गांव में हुआ।


सवाल: आपके साहित्य लेखन की शुरूआत कब और कहां से हुई ?


जवाब: 1948 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. करने के बाद आगरा से प्रकाशित होने वाले दैनिक अख़बार ‘सैनिक’ से मैंने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की। आगरा से ही प्रगतिशील लेखक संघ की सभा में अपनी पहली कहानी ‘इंटरव्यू’ सुनाई, जिसमें बेरोजगार नौजवानों के इंटरव्यू का चित्रण था।



सवाल
: नए रचनाकार अपने साहित्यिक मूल्यों और उत्तरदायित्वों को लेकर कहां तक सचेत हैं?


जवाब: मूल्य भी अब वे मूल्य नहीं रहे, हर दौर में ऐसे लोग होते हैं जो नए तरीके से सोचते हैं। पहले के लोग जहां धार्मिक होते थे, वहीं आज के लोगों के जीवन में भौतिकता का समावेश है। आज के नौजवानों को हर हाल में एक नौकरी चाहिए। पचास के दशक में 100 रुपए की तनख्वाह मिलती थी और रोजमर्रा की ज़िन्दगी आसानी से चल जाया जाती थी, आज हजारो की तनख्वाह भी कम पड़ जाती है। पहले पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी अब वह कैरियर है।



सवाल
: पुरस्कार प्राप्त करने के बाद कैसा महसूस करते हैं?


जवाब:स्वाभाविक है कि अच्छा ही लगता है। जब किसी लोकप्रिय लेखक का पुरस्कार मिलता है तो उसके पाठक को यदि अच्छा लगता है तो यही लेखक की खुशी है। मुझे खुशी है कि मुझे पुरस्कार मिलने पर साहित्य जगत में इसका स्वागत किया जाता है।


सवाल
: हिन्दी कहानी और उर्दू कहानी में परस्पर कैसे संबंध है?


जवाब: दोनों में गहरा संबंध है। दरअसल, हिन्दी-उर्दू एक ही भाषा हैं, सिर्फ़ लिपि का अंतर है। प्रगतिशील लेखक संघ में तो हिन्दी-उर्दू के हमलोग एक साथ ही रहते थे। मेरी अनेक कहानियां उर्दू पत्रिकाओं में छपी हैं। इसी प्रकार उर्दू के कई कहानीकारों की कहानियां हिन्दी की पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। मंटो, कृष्ण चंदर, राजेंद्र सिंह वेदी हिन्दी में भी छपते हैं और पसंद किए जाते हैं। प्रलेस में ही बन्ने भाई सज्जाद ज़हीर जैसे तमाम लोगों से मिलने का अवसर मिला। दुनिया बहुत नजदीक हो गई है, फिर हिन्दी और उर्दू वाले तो सहोदर भाई हैं।



सवाल
: अपनी कहानियों में आपकी सबसे प्रिय कहानी कौन सी है?


जवाब: लेखक जब कहानी लिखता है तो वह उससे अलग हो जाती है। लेखक अपनी कहानी में अपनी भावनाओं को रखता है। कौन सी कहानी बेहतर है और कौन सी बेहतर नहीं है यह निर्धारित करना तो पाठक और आलोचक का काम है।लेखन को तो अपनी सभी कहानियां समान रूप से प्रिय होती हैं।



सवाल
: नई कहानी आंदोलन के दौर में आपका किन लोगों से जुड़ाव रहा?


जवाब: हम सभी लेखकों के एक दूसरे से आत्मीय संबंध थे। उस समय इलाहाबाद में कमलेश्वर, भौरो प्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय,दुष्यंत कुमार आदि उर्दू-हिन्दी के लेखक एक ही मंच पर विराजमान होते थे। इस आंदोलन के दौर में हिन्दी-उर्दू के लोगों के मध्य खूब गहमा-गहमी थी। कमलेश्वर के साथ तो मेरे बड़े भावनापूर्ण संबंध थे, मैंने वागर्थ के लिए उन पर एक लेख लिखा था। जब मैं बीमार था तो कमलेश्वर मुझे देखने इलाहाबाद आए थे। कमेलश्वर ने साहित्यिक जीवन की शुरूआत यहीं से की , बाद में दिल्ली और मंुबई चले गए।


सवाल
: क्या मात्र मसिजीवी होकर एक अच्छा जीवन बिताया जा सकता है?


जवाब: आज के दौर में साहित्यिक स्वतंत्र लेखन संभव नहीं है। साहित्यिक लेखों का समय से पारिश्रमिक नहीं मिलता और न ही ठीक ढ़ंग से रॉयल्टी मिलती है, हिन्दी का लेखक आर्थिक रूप से पिछड़ा है, जबकि अंग्रेजी के लेखक की कमोवेश स्थिति बेहतर है। हिन्दी को हर जगह दबाया जाता है चाहे वह सरकार के स्तर पर हो या लोगों के। हिन्दी हर जगह उपेक्षा की शिकार है। फिर भी जिनकी आस्था है, रुचि है वे लिखेंगे ही तमाम कठिनाई और व्यवधानों के बावजूद।



सवाल
: एक अकादिमिक लेखक जैसे रीडर, प्रोफेसर आदि और विशुद्ध साहित्यिक लेखक की रचनात्मकता में क्या फ़र्क़ है?


जवाब: मैं नहीं समझता कि अकादमिक क्षेत्र या विशुद्ध साहित्यिक क्षेत्र में होने पर किसी व्यक्ति की रचनात्मकता में कोई विशेष अंतर आता है। यूनिवर्सिटी में होने से लेक्चरर से रीडर, प्रोफेसर के रूप में प्रमोशन तो होता है लेकिन मैं तो न रीडर रहा और न प्रोफेसर फिर भी मेरी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं हुई।



सवाल
: विगत वर्ष 2006 में, जनकवि कैलाश गौतम अचानक हमें छोड़कर चले गए, उनके साथ अपने संबंधों पर प्रकाश डालिए?


जवाब: कैलाश गौतम जितने अच्छे साहित्यकार थे, उतने ही भले व्यक्ति थे। मनोरमा में काम करते हुए गौतम से मेरे आत्मीय संबंध बने। वे एक अच्छे वक्ता और संचालक थे। वे साहित्य जगत की विभिन्न धाराओं में समन्वयकर्ता थे, गंगा-जमुनी तहजीब से पोषक थे। मैं जब भी बीमार रहता कैलाश मुझे देखने आते। एक बार मैं बहुत बीमार था तो उन्होंने ‘अमौसा का मेला’ सुनाकर मेरे में खुशी भर दी। वास्तव में मंत्री से संतरी तक लोकप्रिय थे।



सवाल
: पिछले कुछ वर्षों से स्वानुभूति बनाम सहानुभूति की जो बहस चल रही है, इसको आप किस रूप में देखते हैं?


जवाब: स्वानुभूति जीवन का एक निजी अनुभव है, यह निश्चित रूप से जरूरी है लेकिन जब उसका चित्रण करें तो व्यापक सहानुभूति और संवदेना आवश्यक है, ताकि आप बिना दुर्भावना के लिख सकें। इन दोनों के अभाव में गंभीर साहित्य लेखन संभव नहीं। सफल संप्रेषणीयता के लिए व्यापक सहानुभूति एवं गहरी संवेदना होनी चाहिए।



सवाल
: नए रचनाकारों को क्या संदेश देंगे?


जवाब: नए लेखक खुद अपने से रास्ते बनाते हैं। यह ज़रूरी है कि वे साधारण लोगों के बीच रहें क्योंकि यह साधारण लोग ही होते हैं जो अनुभव जनित मुहावरे गढ़ते हैं। आप साहित्य की जिस विधा में जाएं उसके बारे में अधिक से अधिक पढ़े। देश-समाज का व्यापक अध्ययन करना आवश्यक है। अपनी रचना पर बार-बार मेहनती करनी पड़ती है तभी वह अपना प्रायोजन पूरा कर पाएगी।


गुफ्तगू
के जनवरी-मार्च 2008 में प्रकाशित

1 टिप्पणियाँ:

वीनस केशरी ने कहा…

"हिन्दी का लेखक आर्थिक रूप से पिछड़ा है"

वाह,
कितना सटीक विश्लेषण है

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