शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

उर्दू भाषा खड़ी बोली का निखरा हुआ रूप है-वसीम बरेलवी


प्रो0 वसीम बरेलवी उर्दू अदब का ऐसा नाम है, जिन्होंने शायरी को हिन्दुस्तान के कोने-कोने तक पहुंचाने के साथ ही दूसरे मुल्कों में भी उसकी रोशनी बहुत ही सलीक़े से पहुंचाई है। पिछले चार-पांच दशकों से वे सक्रिय हैं और शायरी को अपने हसीन ख़्यालों से लगातार नवाज़ रहे हैं। किसी भी मुशायरे में उनका शिरकत करना ही उस मुशायरे की कामयाबी का जमानत है। 18 फरवरी 1940 को बरेली में जन्मे श्री बरेलवी की अब तक कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें आंखो-आंखों रहे,मौसम अंदर बाहर के, तबस्सुमे-गुम, आंसू मेरे दामन तेरा, मिजाज़ और मेरा क्या आादि प्रमुख हैं। इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने उनसे कई मसलों पर बात की-

सवालः ग़ज़ल को हिन्दी और उर्दू के रूप में परिभाषित किया जाना कितना उचित है?


जवाबः ग़ज़ल, ग़ज़ल होती है, उस पर लेबल लगाना ठीक नहीं है। हां, जब तक ग़ज़ल कहने वाला उसकी रिवायत से परिचित न हो, तब तक ठीक ढंग से ग़ज़ल को निभा नहीं सकता।


सवालः दुष्यंत कुमार को हिन्दी का पहला ग़ज़लकार कहा जाता है, आप इससे सहमत हैं?


जवाब: अगर पहले शायर-कवि की बात की जाए तो हिन्दी और उर्दू दोनों के पहले शायर-कवि अमीर खुसरो हैं। दुष्यंत ने फार्मेट तो उर्दू वाला ही अख़्तियार किया, लेकिन मौजूआत उर्दू शायरों से थोड़ा हटकर चुना, जिसकी वजह से उन्हें हिन्दी ग़ज़लकार कहा जाने लगा, मगर असल में वो उर्दू शायरी के ही करीब रहे। हिन्दी भाषा के जानकारों ने ऐसी ग़ज़लें तब तक नहीं कही थीं या हिन्दी वाले ग़ज़ल नहीं कह रहे थे, इसलिए इन्हें पहला हिन्दी ग़ज़लकार कहके परिभाषित किया जाने लगा।


सवाल: वर्तमान मुशायरे के स्तर पर उठाया जा रहा है?


जवाब: इस तरह के सवाल हर दौर में उठाए जाते रहे हैं। मीर और ग़ालिब के दौर में भी ऐसी बातें होती रही हैं। आज के मुशायरों के हालात बिल्कुल अलग हैं। रिवायती शायरी अब मुशायरों से दूर होती जा रही है। मैगज़ीनों का भी यही हाल है। 80 से 90 फीसदी शायरी बकवास होती है। 10 से 20 फीसदी ही स्तरीय होती है। यही हाल मुशायरों का भी है। मगर इस 20 फीसदी शायरी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।


सवाल: फिल्मों में हिन्दी कवियों के मुकाबले उर्दू शायर ज़्यादा कामयाब हैं, ऐसा क्यों?


जवाब: उत्तर भारत में खड़ी बोली का इस्तेमाल होता है। उर्दू भाषा खड़ी बोली का निखरा हुआ रूप है, जिसे पहले हिन्दवी भी कहा जाता रहा है। उर्दू को लखनउ और दिल्ली के घरानों ने निखारा। इसके विपरीत हिन्दी भाषा संस्कृत के तत्सम और तत्भव से बनकर सामने आयी है, जो अपेक्षाकृत क्लिष्ट थी, जो आम आदमी की ज़बान पर आसानी चढ़ नहीं पायी। चूंकि उर्दू वालों ने खड़ी बोली को अपनाया, इसलिए यह आम आदमी की ज़बान बन गयी, खा़सतौर पर बोली के स्तर पर। इसके अलावा उर्दू शायरी लयबद्धता को निभाती रही है। जो म्यूजिक में ढलने के लिए ज़रूरी है। फिल्में आम बोलचाल की भाषा में बनती हैं। यही वजह है कि उर्दू शायर फिल्मों में अधिक कामयाब रहे हैं। ‘गुफ्तगू’ का एक बड़ा पाठक वर्ग सिर्फ़ इसलिए है कि देवनागरी में आप उर्दू पत्रिका निकाल रहे हैं, जिसको जानने और समझने वालों की तादाद सबसे अधिक है।


सवाल: टीवी चैनलों के चकाचौंध का अदब पर क्या असर पड़ा है?


जवाब: अदब का सफ़र बिल्कुल अलग है। टीवी चैनल फौरीतौर पर भले ही देखी जाती हो, लेकिन इसका असर लंबे समय तक नहीं होता। चार-पांच दिन पहले की क्लीपिंग किसी को याद नहीं होगा। मीर,ग़ालिब और तुलसी वगैरह को आज का बच्चा-बच्चा जानता है। मगर समकालीन फिल्मी या डृामा कलाकारों का नाम कोई नहीं जानता। अमिताब बच्चन इस दौर के बड़े अभिनेता हैं। हरिवंश राय बच्चन से ज़्यादा मक़बूल हैं, मगर इनकी मक़बूलियत उतने दिनोें तक कायम नहीं रह सकती, जबकि हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला सदियों तक याद की जाएगी।


सवाल: जब-जब पुरस्कारों का ऐलान किया जाता है, तो इसकी इमानदारी पर सवाल खड़े किए जाते हैं?

जवाब: सरकार संस्थाओं द्वारा मिलने वाले पुरस्कार के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यहां आम आदमी शामिल नहीं होता, यहां बैठे लोग आम आदमी के बारे में नहीं सोच पाते या सकते। मैं सरकारी इनामों को कम करके के भी नहीं आंकना चाहता, हां ऐसी तमाम संस्थाएं हैं जो अदबी लोगों को शामिल करके एवार्ड का ऐलान करती हैं। ऐसे एवार्ड की अहमीयत मेरी नज़र में सबसे अधिक है। लेकिन एवार्ड पाना ही कामयाबी नहीं है। अगर आप द्वारा रचित साहित्य लोगों तक पहंुचता है, लोग उसे पसंद करते हैं, तो आप कामयाब हैं।


सवाल: नई पीढ़ी में आप क्या संभावना देखते हैं?


जवाब: मैंने पूरी ज़िदगी उर्दू अदब की खिदमत की है। पिछले 45 सालों से मुशायरों की दुनिया में हूं, हम जाते-जाते कुछ ऐसे लोगों को छोड़ जा रहे हैं जो उर्दू अदब को संजीदगी से आगे ले जाएंगे। हमें इस बात बहुत सुकून है। डाइज सिर्फ़ तारीफ़ तक ही सीमित नहीं है। यहां से बहुत गंभीर बातें भी समय-समय पर कही जाती रही हैं। बहुत नए लोग आ रहे हैं, दो-चार का नाम लेना ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसे में कई लोगों का नाम छूट जाएगा। बहरहाल, अदब सुरक्षित हाथों में है।


सवाल: आपने शायरी कब शुरू की, आपके उस्ताद कौन हैं?


जवाबः जब मैं छठीं क्लास में था, तभी से कुछ कहने लगा था। मगर संजीदा शायरी तब शुरू की, जब मैं एम ए कर रहा था। मेरे वालिद नसीम मुरादाबादी भी शायर थे। हमारे घर जिगर मुरादाबादी का भी आना जाना था। कई बार वालिद ने मेरे कलाम को जिगर साहब को भी दिखाया, मगर मेरे बकायदा उस्ताद मंुतकित हैदराबादी थे।


गुफ्तगू
के जुलाई-सितंबर 2008 अंक में प्रकाशित

4 टिप्पणियाँ:

Dr. Ahmad Ali Barqi Azmi ने कहा…

HAI NEHAYAT KHOOBSOORAT YEH BLOG
GUFTAGOO KA SILSILA JAARI RAHE

HO YEH URDU KE LIYE EK FAAL E NEK
WAJD HAI JO AB SADA TAARI RAHE
AHMAD ALI BARQI AZMI

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बहुत बहुत उम्दा !!

Aadil Rasheed ने कहा…

aap adab (sahity) ki jo sewa kar rahe hain wo yaqeenan qabile sataish hai
aadil rasheed

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत अच्छा लगा यह इंटरव्यू पढ़कर!

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