गुरुवार, 2 जुलाई 2026

       ईमान ताज़ा करने वाली किताब

                                                                          - डॉ. वारिस अंसारी


           

     रज़िया काज़मी का तअल्लुक़ इलाहाबाद से है, जो किसी तआरुफ़ (परिचय) की मोहताज नहीं हैं। शायरी यूं तो ख़ुदादाद सलाहियत होती है, लेकिन ख़ुदा उन्हीं को कामयाब व कामरान करता है जो अपने काम के लिए कोशा रहते हैं। रज़िया काज़मी भी एक ऐसा नाम है जो अपना बहुत क़ीमती वक़्त अदब के लिए खर्च कर रही हैं। उनकी ये मेहनत अदबी दुनिया में हमेशा ज़िन्दा रहेगी। उनकी किताब ‘गुल हाय अक़ीदत़’ पढ़ कर ईमान ताज़ा हो जाता है। वह एक दीनदार और तालीम-याफ़्ता (शिक्षित) खानदान से तअल्लुक़ रखती हैं। उनकी शायरी पढ़ कर कहीं भी ऐसा महसूस नहीं होता कि उन्होंने कोई कोताही की है बल्कि हर शेर उनके जिंदा दिली की गवाही देता नज़र आता है। वह ख़ुदा की ज़ात, रसूले करीम, अहलेबैत और बुज़ुर्गान-ए-दीन पर ईमान रखने वाली एक कामिल शायरा हैं। उन्होंने इस किताब ‘गुल हाय अक़ीदत’ को हम्द, नात, सलाम और मन्क़बत से सजाया है। उनकी शायरी में शगुफ्तगी, दर्द, शीरी बयानी, आसान अल्फ़ाज़ और पढ़ने में रवानी है। जिससे क़ारी (पाठक) का मज़ा दोबाला हो जाता है। उन्होंने बड़े ही सलीके से ख़ुदा की वहदानियत, रसूल की रिसालत, अहले बैत और बुज़ुर्गान-ए-दीन की मोहब्बत को अपने अशआर में पिरोया है। 

 यह किताब ईमान का पैग़ाम है जो कि अहले ईमान में मील का पत्थर साबित होगी। आइए उनके कुछ अशआर भी पढ़ते चलें-‘दिल में वह शम्मा जला दे या रब/ राह भटके हैं दिखा दे या रब/ कुछ मोहब्बत का सिला दे या रब/ बंदगी हमको सिखा दे या रब।’, ‘सभी अंबिया में हैं आला मोहम्मद/ नहीं कोई भी आप जैसा मोहम्मद/ किया तीरगी में उजाला मोहम्मद/ कि हैं नूर ए हक़ का मिनारा मोहम्मद।’, ‘करे हुसैन कोई आपकी विला के बगैर/ तो ज़िंदगी ये हुई उनकी मुद्दुआ के बग़ैर/ ख़लील होती है ज़िबहा अज़ीम कुर्बानी/हुसैन इब्ने अली सिब्ते मुसतफ़ा के बगैर।’ मज़कूरा बाला शेर उनकी शायराना हैसियत की ग़म्माज़ी के लिए काफी है। बाक़ी पूरी किताब गुल हाय अक़ीदत पढ़ने लायक़ है। बहुत ही खूबसूरत हार्ड कवर और उम्दा कागज़ के साथ उनकी किताब 96 पेज की है । जिसको फरीद कंप्यूटर ग्राफिक्स, करेली इलाहाबाद ने कम्पोज किया और स्काईलाइन प्रिंटर्स, प्रयागराज से छपा कर गुफ्तगू पब्लिकेशन 123।/1 , हरवारा, धूमनगंज से प्रकाशित किया गया। किताब की क़ीमत दो सौ (200) रुपए है। दुआ है ख़ुदा रज़िया काज़मी को इस ईमान अफ़्ज़ा किताब के लिए अल्लाह जज़ा-ए-खैर अता फरमाए। आमीन ।


इरशाद की शायरी में कई तरह के रंग


 

 इस वक़्त मेरे हाथ में इरशाद आतिफ का शेरी मजमुआ (काव्य संग्रह) ‘जुस्तजू’ है। जिसे पढ़ कर मैं भी उनकी जुस्तजू से रुशनास हुआ। इनकी शायरी में जिंदगी के उतार चढ़ाव, समाजी हालत, इश्क मोहब्बत हर तरह के रंग देखने को मिलते हैं। वह शायरी में जद्दू जेहद करते नज़र आते हैं। कहीं वह अपने आपसे तो समाज और वक्त के हुक्मरानों से लड़ते नज़र आते हैं। और इतनी मेहनत के बाद भी वह किसी चीज़ को बोझ नहीं समझते बल्कि हर लम्हा बेदार नज़र आते हैं। जुस्तजू की तमाम ग़ज़लें पढ़ने पर पता चला कि उनकी ग़ज़लों में लताफ़त है और फनी शउर भी, वह सच्ची शायरी करते हैं और अपनी बात सलीके से कहने का हुनर भी रखते हैं। वह एक हस्सास शायर हैं, यही वजह है कि उनकी शायरी में हक़्क़ानियत (सच्चाई) नज़र आती है। उनकी ग़ज़लें बहुत सादा और आम फ़हम ज़बान में हैं, जो कि कारी (पाठक) बआसानी रवानी के साथ पढ़ता चला जाता है और अपने आप पर बार भी नहीं महसूस करता। चंद अशआर देखें- 

‘हमारा दिल दुखाया जा रहा है/ मगर उनको हंसाया जा रहा है/ जो हैं मज़लूम दुनिया में उन्हीं को/ बड़ा ज़ालिम बताया जा रहा है।’, ‘उन गरीबों की भूख के बदले/ लो ज़मीर अपना बेचता हूं मैं/ मुझसे दो बात देख ले करके/ ज़ख़्म भर जाएंगे दवा हूं मैं।’ ऐसे तमाम खूबसूरत अशआर पढ़ने पर पता चलता है कि इरशाद आतिफ एक हुनरमंद शायर हैं। वह शायरी के ग्रामर से भी बहुत हद तक वाक़िफ़ हैं। फने ग़ज़ल पर उन्हें बड़ा उबूर (महारथ) हासिल है। उन्होंने मजमुआ की शुरुआत नात से की है, जिससे उनके दीनी इल्म का भी अंदाज़ा होता है। तीन शेर उनकी नात के भी पढ़ते चलें-‘दौलत उसे मिल जाती है अनमोल जहां में/ जिसको भी खुदा देता है ये नामे मोहम्मद।’, ‘मेरे सरकार की आमद तो है बेशक अंधेरे में/ मगर दुनिया तो आई है उसी दिन से उजाले में।’, ‘माने न माने कोई हक़ीक़त है ये मगर/ इक दिन पड़ेगी सबको ज़रूरत रसूल की।’ 

 इनकी ग़ज़ल का एक और शेर जो वाकई बहुत ही सादा है, लेकिन अपने अंदर इतनी गहराई लिए है जिसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। सच पूछो तो उनका ये शेर ही उनकी इंसानियत और इंकसारी का पता देता है। ‘दुश्मनों को गले लगाता हूं/ ये मेरा इन्तेक़ाम होता है।’

इस तरह पूरी किताब में एक से बढ़ कर एक शेर मौजूद हैं। इस शेरी मजमुआ जुस्तजू में खूबसूरत हार्ड जिल्द के साथ 190 पेज हैं, जिसकी डिजाइन गुलाम मोहम्मद अंसारी ने की है। किताब को गुजरात उर्दू साहित्य अकादमी के माली इमदाद से अनीका पब्लिकेशंस कनाल नारोल अहमदाबाद से प्रकाशित किया गया है जिसकी कीमत 350 रुपए है।

(गुफ़्तगू के अक्तूबर-दिसंबर 2025 अंक में प्रकाशित)


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