गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

तुम्हारी याद में अक्सर, कितनी दूर और चलने पर, ख़्वाब जो सज न सके, तुम्होर लिए और अनवरत

डाॅ. सादिक़ देवबंदी सहारनपुर के नौजवान शायर हैं, ग़ज़ल लेखन के प्रति काफ़ी सक्रिय हैं। हाल ही में इनका ग़ज़ल संग्रह ‘तुम्हारी याद में अक्सर’ प्रकाशित हुआ है। पुस्तक को देखने-पढ़ने से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन्हें ग़ज़ल विधान की ठीक-ठाक जानकारी है। क्योंकि इनकी ग़ज़लों में बह्र और रदीफ, क़ाफ़िया की प्रायः कोई ग़लती नज़र नहीं आती। इन पुस्तक की ग़ज़लें खुद ही बयां करती हैं कि डाॅ. सादिक़ ग़ज़ल की परंपरा से वाक़िफ़ हैं। डाॅ. शमीम देवबंदी ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है- ‘डाॅ. सादिक़ ने न केवल ग़़ज़ल के दामन पर चार चांद लगाए हैं बल्कि उसको आबरू-मैयार और वक़ार भी बख्शा है, इनकी ग़ज़लों में गाहे-ब-गाहे ऐसे नज़ारे मिलते हैं, जो उनकी उम्र से ज़्यादा तजुर्बात को ज़ाहिर करते हैं।’ इब्राहीम अश्क का कहना है ‘डाॅ. सादिक़ नई नस्ल के ग़ज़ल के शायर हैं। इनकी ग़ज़ल के सिरे यूं तो रिवायत का भरपूर एहतराम करते हैं लेकिन इनकी ग़ज़लों में नए मज़ामीन भी साफ़तौर पर दिखाई देते हैं।‘ इनकी एक ग़ज़ल शेर यूंह है- ‘खुदगर्ज़ियां शामिल अगर हो जाएं तो सादिक़/फिर दोस्ती का ज़ाइक़ा मीठा नहीं रहता।’ यह शेर आज के दौर की इंसानियत की बखूबी तर्जुमानी करता है। एक और ग़ज़ल के दो अश्आर देखें ‘कुछ न दिल में मलाल रखा कर/ ज़िन्दगी को संभाल रखा कर। दुश्मनों से किनारा कश रह कर/दोस्तों का ख्याल रखा कर।’ इस तरह पूरी किताब में जगह-जगह उल्लेखीय अश्आर से सामना होता है। इनकी पहली किताब के लिए मुबारकबाद। 128 पेज वाले इस पेपर बैक संस्करण को रवि पब्लिकेशन, मेरठ ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत मात्र 60 रुपये है।
आगरा में जन्मे सत्येंद्र कुमार रघुवंशी आईएएस अफसर रहे हैं, सेवानिवृत्ति के बाद उत्तर प्रदेश शासन में सचिव पद पर कार्यरत हैं। मुख्यतः छंदबंध रचनाओं का सृजन करते हैं। हाल ही में इनका दूसरा काव्य संग्रह ‘कितनी दूर और चलने पर’ प्रकाशित हुआ है। इस पुस्तक में गीत के साथ ग़ज़लों को स्थान दिया गया है। पुस्तक में शामिल गीतों को पढ़ने पर सहज ही अंदाज़ा हो जाता है कि कवि प्रकृति प्रेमी है। अधिकतर गीतों में प्रकृति की सुंदरता और प्रेम का वर्णन मनोरम ढंग से किया गया है। एक गीत में कहते हैं - ‘कहां जा रहे हैं ये बादल/अपना बेग बढ़ाकर/किसकी प्यास याद आयी है/ किसके अधर जले हैं/दहके हैं क्या नंदन-वन सब/ क्या सब भ्रमर जले हैं।’ एक गीत में कहते हैं - ‘पीतल की दृष्टियां हमारी/ हम क्या समझें, कंचन क्या है/ मन की जगह हमारे अंदर/ कोई  चिटका फूलदान है/लगता है जैसे पांवों में/ सौ-सौ सड़कों की थकान है’। इनकी ग़ज़लों के तेवर भी काफी शानदार हैं, एक ग़ज़ल का मतला और शेर यूं हैं -‘यों लबालब आंसुओं के जाम हैं/हम बिना कोशिश उमर ख़ैयाम हैं। देखिए साज़िश अमावस की ज़रा/ हर सुबह पर कुछ न कुछ इल्ज़ाम हैं।’ इस तरह पूरी पुस्तक बेहद पठनीय है। 134 पेज की इस पेपर बैक किताब को इलाहाबाद के अनामिका प्रकाशन ने प्रकाशित किया है जिसकी कीमत 195 रुपये है।
ठाणे, महाराष्ट के एन.बी. सिंह ‘नादान’ काफी दिनों से रचनारत हैं। ग़ज़ल, मुक्तके अलावा काव्य की कई अन्य विधाओं में लिख रहे हैं। इनकी पुस्तक ‘ख़्वाब जो सज न सके’ हाल में ही प्रकाशित हुआ है, यह इनकी पंद्रहवी किताब है। इससे पहले 14 किताबें छप चुकी हैं, जिनमें ‘शाख़ों में नमी कम’, ‘हंसते हुए ग़म’, ‘भले मानुस सुन’, ‘फूल और पंखुड़ियां’, ‘कागज़ कलम दवात’, ‘दर्द का रिश्ता’ आदि शामिल हैं। इस पुस्तक में ग़ज़लों के अलावा मुक्तक भी शामिल हुए हैं। हिन्दी में नई कविता के प्रचलन के साथ तमाम लोग छंदबद्ध रचनाएं लिख रहे है, इसमें भी ग़ज़ल लेखन चरम पर है। वर्तमान समय में ग़ज़ल लेखन और पाठन दोनों खूब रहा है। मंच पर तो ग़ज़ल, गीत और मुक्तक खूब पढ़े जा रहे हैं। इसी परंपरा का निर्वाह नादान साहब ने किया है। इनकी ग़ज़लों में प्रायः समाज के बिगड़ते माहौल पर चिंतन दिखाई देता है, इन्हें इस बात की फ़िक्र है कि समाज में इतनी विकृति क्यों आ गई है, लोग इंसानियत के धर्म से दूर क्यों हो रहे हैं। इनकी ग़ज़लों के कई शेर ऐसे हैं, जिन्हें पढ़कर पाठक आहत होगा, फिक्रमंद होगा कि वाकई आज का माहौल कितना गर्म कितना तंग है कि जिसमें जीना क्या, यहां सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। एक शेर में कहते हैं ‘अगर इंसान में कोई नहीं फितरत नज़र आये/ज़मीं जो आज दोज़ख है वही जन्नत नज़र आए।’ एक ग़ज़ल का मतला यूं है-’जो ढूंढ रहा मुझमें वो मिलने से रहा है/ इंसान ये कितना गिरेगा कितना गिरा है।’ पूरी किताब में इसी तरह उल्लेखनीय अशआर पढ़ने को मिलते हैं। 156 पेज वाले इस सजिल्द पुस्तक की कीमत 270 रुपये है, जिसे ठाणे के शारदा प्रकाशन ने पब्लिश किया है।
जालंधर के बिशन सागर लधुकथा, यात्रा संस्मरण, ग़ज़ल और नई कविताएं लिखते रहे हैं। पिछले दिनों इनकी नई कविताओं का संग्रह ‘तुम्हारे लिए’ प्रकाशित हुआ है। यह इनकी पहली पुस्तक है, जिसमें मुख्यतः प्रेम विषयक कविताएं शामिल की गई हैं। प्रेम के नए प्रसंग और खुद का महसूस किया हुआ अनुभव कविताओं के रूप में लोगों से साझा करने का प्रयास किया है, जिसमें प्रायः सफल होते नज़र आ रहे हैं। हिन्दी में बिना छंद के कविता लेखन की परंपरा सी चल पड़ी है। अक्सर देखने में आ रहा है कि जिन लोगों को काव्य का कोई सलीक़ा नहीं है, वे भी कुछ भी लिखकर उसे कविता बता देते हैं। यही वजह है कि वर्तमान समय में सबसे कम पाठक नई कविता के हैं। हालांकि इसी भीड़ में ऐसे लोग भी हैं जो बहुत अच्छी नई कविताएं लिख रहे हैं और अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। बिशन सागर भी ऐसे ही लोगों में से एक हैं। पुस्तक की पहली कविता में इन्होंने अपने पिताजी को याद किया है। लिखते हैं- ‘गंगा-घाट पर/पिताजी की अस्थियां/विसर्जन करने के लिए सफ़ेद पोटली खोली तो/उसमें दिखने लगा उनका चेहरा। उस पोटली को मैंने कई बार टटोला/नहीं मिलीं वो दो चमकीली आंखें/जो अंधेरों में हमें रास्ता दिखाया करती थीं’। यह कविता अंदर से झझकोर देती है और हर  पाठक को अपने पिता की याद शिद्दत से दिलाती है। एक कविता में अपने प्रेम का इज़हार करते हुए कहते हैं- ‘बंद दरवाजों से/झांकती हज़ारों/ख़्वाहिशें/जिम्मेदारियों के बोझ/तले दबी बेनाम/हसरतें/नहीं कर पाया मैं/प्यार का इज़हार’। पिता को समर्पित पहली कविता को छोड़कर पूरी पुस्तक में जगह-जगह प्रेम के एहसास की तर्जुमानी की गई है।112 पेज वाले सजिल्द पुस्तक की कीमत 195 रुपये है, जिसे दीपक पब्लिकेशन, जालंधर ने प्रकाशित किया है।
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के रहने वाले कवि शनिल की कविताओं की पुस्तक ‘अनवरत’ का प्रकाशन हुआ है। इस किताब में छोटी-छोटी कविताएं शामिल की गई हैं। पुस्तक की शुरू में फ़िराक़ गोरखपुरी का 27 जुलाई 1975 का लिखा हुआ एक संदेश प्रकाशित हुआ है, जिसमें फ़िराक़ साहब ने शनिल को प्रतिभावन युवा कवि बताया है। जिससे यह सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कवि का परिचय फ़िराक़ गोरखपुरी से रहा है। पुस्तक में शामिल कविताओं की विषय वस्तु में जहां समाज में जूझते हुए लोग हैं, जो अपनी ज़रूरतों और रोजमर्रा के हालत का सामना करते हुए एक-एक दिन काटते हैं तो दूसरी ओर प्रेम का इज़हार और अपने प्रियसी के लिए कुछ भी कर गुजरने की बात की गई है। एक कविता में कहते हैं- ‘नहीं भूलती मुझेे वह रात/कहीं थी जब तुमने यह बात। जब कभी दिल हुआ करे उदास/चले आया को तुम मेरे पास’। इसी तरह अन्य विषय वस्तु को अपने नज़रिए के अनुसार उल्लेखित किया गया है। पेज वाले इस पेपरबैक पुस्तक को दिल्ली के मनीष पब्लिकेशन्स ने प्रकाशित किया है, जिसकी कीमत 100 रुपये है।
(गुफ्तगू के जनवरी-मार्च 2017 अंक में प्रकाशित)

1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-04-2017) को
"लोगों का आहार" (चर्चा अंक-2616)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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